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Saturday, February 25, 2023

छद्म प्रतिरोध का स्थापत्य गढ़ता कवि

हिंदी के एक कवि हैं। नाम है अशोक वाजपेयी। पूर्व नौकरशाह हैं। महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा के कुलपति रहे हैं। प्रतिभाशाली इतने कि  अपने पूरे कार्यकाल में दिल्ली कार्यालय से वर्धा के विश्वविद्यालय का संचालन करते रहे। ललित कला अकादमी, नई दिल्ली के चेयरमैन रहे। अकादमी का उनका कार्यकाल विवादित रहा। कई तरह के आरोप लगे। सीबीआई जांच हुई। उनके कुछ संवेदनहीन बयान हिंदी साहित्य जगत में बहुधा गूंजते रहते हैं। भोपाल गैस त्रासदी के बाद दिया उनका बयान कि मरने वाले के साथ मरा नहीं जाता या हिंदी के लेखकों को मैंने पहली बार हवाई जहाज पर चढ़ाया अब भी हिंदी के लोगों के स्मरण में है। भोपाल गैस त्रासदी के बाद के बयान पर वो खेद प्रकट कर चुके हैं।2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले पुरस्कार वापसी अभियान के अगुवा रहे। अशोक वाजपेयी के बारे में ये चर्चा इस कारण क्योंकि उनके समर्थक एक बार फिर से उनकी जय-जयकार कर रहे हैं। प्रसंग ये है कि दिल्ली में अर्थ कल्चर फेस्टिवल के दौरान उनको काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था। रेख्ता के सहयोग से आयोजित इस सत्र में अशोक वाजपेयी के अलावा अनामिका, बद्री नारायण, दिनेश कुशवाह और मानव कौल का नाम विज्ञापित किया गया था। यह फेस्टिवल के पहले दिन का अंतिम सत्र था। सत्र के आयोजन वाले दिन अशोक वाजपेयी ने इंटरनेट पर एक टिप्पणी लिखकर घोषणा की कि वो काव्य पाठ में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने लिखा ‘मैं आज अर्थ और रेख्ता द्वारा आयोजित कल्चर फेस्ट में भाग नहीं ले रहा हूं क्योंकि मुझसे कहा गया कि मैं ऐसी ही कविताएं पढ़ूं जिसमें राजनीति या सरकार की सीधी आलोचना न हो। इस तरह का सेंसर अस्वीकार्य है।‘ इसके बाद उनके समर्थक इस टिप्पणी का स्क्रीन शाट लेकर फेसबुक पर लहालोट होने लगे जैसे अशोक वाजपेयी ने किसी क्रांति का शंखनाद किया हो। 

अशोक वाजपेयी के इंकार के बाद अष्टभुजा शुक्ल का नाम काव्य पाठ वाले सत्र में शामिल किया गया । अनामिका, बद्री नारायण, दिनेश कुशवाह और मानव कौल ने कविताएं पढ़ीं। साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चयनित बद्री नारायण ने बताया कि उनको भी आयोजकों की तरफ से फोन आया था। फोन करनेवाले ने पूछा था कि वो किस तरह की कविताएं पढ़ेंगे। बद्री नारायण ने उनसे कहा कि वो हाशिए के लोगों को लेकर लिखी कविताओं का पाठ करेंगे।बात समापत हो गई। दिनेश कुशवाह को भी फोन कर पूछा गया था कि वो किस तरह की कविताएं पढ़ेंगे। उन्होंने तो आयोजकों को कहा कि वो जैसी कविताएं लिखते हैं वही पढ़ेंगे। उन्होंने जिज्ञासा भी प्रकट की कि ये प्रश्न क्यों पूछा जा रहा है। फोन करनेवाले ने बताया था कि ये सूचनाएं सत्र संचालक की सुविधा के लिए जुटाई जा रही हैं। बात खत्म हो गई। अब पता नहीं अशोक वाजपेयी को आयोजकों ने ऐसा क्यों कहा कि वो राजनीति या सरकार की सीधी आलोचना वाली कविता नहीं पढ़ें। वैसे अशोक वाजपेयी राजनीतिक कविता लिखने के लिए जाने भी नहीं जाते हैं। उनकी कविताओं का मूल स्वर तो प्रेम, प्रकृति और देह है। राजनीतिक कविताओं का तो वो उपहास ही करते रहे हैं। राजनीतिक कविताओं को लेकर उन्होंने एक बार टिप्पणी की थी कि इनमें अभिधा का आतंक होता है। ऐसे कवि से कोई भी आयोजक ये क्यों कहेगा कि वो राजनीति या सरकार की सीधी आलोचना वाली कविता न पढ़ें। वो भी रेख्ता जैसी संस्था जिनसे अशोक वाजपेयी का ना केवल परिचय रहा है बल्कि बहुत गहरे और पुराने संबंध भी। रेख्ता की तरफ से सफाई आई। उनकी तरफ से सिर्फ ये पूछा गया था कि अशोक जी किस विषय पर बोलने जा रहे हैं। रेख्ता की सफाई में ये भी कहा गया है कि उनकी तरफ से किसी विशेष कविता के नहीं पढ़ने या पढ़ने का कोई आग्रह नहीं किया गया था। रेख्ता के प्लेटफार्म पर तो जावेद अख्तर और कुमार विश्वास जैसे कवि अपनी कविताओं का पाठ करते रहे हैं और बहुधा राजनीतिक टिप्पणियां भी। रेख्ता का कहना है कि पूरा मसला चकित करनेवाला और अप्रसांगिक है। सचाई क्या है ईश्वर जानें। 

ऐसा प्रतीत होता है कि अशोक वाजपेयी किसी न किसी बहाने से चर्चा में बने रहने का बहाना ढूंढ़ते रहते हैं। वो हमेशा से राजनीति और सत्ता से दूर रहने का दंभ भी भरते रहे हैं। राजनेताओं के साथ मंच साझा करने को लेकर भी वो चुनिंदा स्टैंड लेते रहते हैं। किसी दल के नेता के साथ मंच साझा करने में उनको कोई आपत्ति नहीं होती है तो किसी दल के नेता के साथ वो मंच पर दिखना नहीं चाहते हैं। कई अवसरों पर उनको राजनेताओं के साथ देखा गया है, कई बार मंच पर भी। हाल ही में अशोक वाजपेयी ने राहुल गांधी की भारत-जोड़ो यात्रा में शामिल होकर अपनी प्रतिबद्धता को सार्वजनिक भी किया था। यहां वो कह सकते हैं कि ये राजनीतिक यात्रा नहीं थी लेकिन सचाई सबको पता है। लोकतंत्र में किसी को भी कहीं जाने या अपनी पसंद के दल के नेताओं के साथ दिखने की स्वतंत्रता है। अशोक वाजपेयी को भी है। जब पसंदीदा नेताओं या दल के मंच पर खड़ा होना है तो ये नैतिक स्टैंड खोखला लगता कि लेखकों को नेताओं से दूर रहना चाहिए। कांग्रेस पार्टी से उनके पुराने संबंध रहे हैं, हलांकि वो अपने लेखन में इसका साक्ष्य नहीं होने की बात करते हैं। लेखन में न सही लेकिन उनके क्रियाकलापों में तो ये निरंतर दिखता है। जब वो एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति थे तो गुजरात हिंसा के खिलाफ अभियान चलाया था। राष्ट्रपति को ज्ञापन आदि भी देने गए थे। अभी भी हर चुनाव के पहले चलनेवाले नरेन्द्र मोदी या भारतीय जनता पार्टी विरोधी हस्ताक्षर अभियान में उनके हस्ताक्षर दिख जाते हैं। वो इसको एक नागरिक के कर्तव्य के तौर पर प्रचारित करते हैं। उन्होंने ये स्वीकार भी किया है कि उनकी प्रशासनिक सेवाओं का दो तिहाई हिस्सा कांग्रेसी सरकारों के साथ काम करते हुए बीता है। इसमें वो ये जोड़ना नहीं भूलते कि वो सभी सरकारों को लोकतांत्रिक प्रणाली ने चुना था। प्रश्न ये उठता है कि 2014 से या उसके बाद जो सरकारें बन रही हैं क्या वो लोकतांत्रिक प्रणाली से नहीं चुनी जा रही हैं। 

अशोक वाजपेयी ने अपने एक साक्षात्कार में नामवर सिंह को अचूक अवसरवादी कहा था। उस साक्षात्कार में उन्होंने नामवर सिंह के विचलनों का साक्ष्य देने का दावा किया था। क्या राहुल गांधी के साथ उनकी पदयात्रा में शामिल होकर अशोक वाजपेयी ने स्वयं ये साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर दिया कि उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता क्या है। पदयात्रा में शामिल होने को वो प्रतिरोध का स्थापत्य गढ़ना भी कह सकते हैं लेकिन उनकी पालिटिक्स हिंदी समाज को समझ आती है। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले असहिष्णुता के नाम पर पुरस्कार वापसी अभियान चलाना भी उसी राजनीति का एक भाग था। अशोक वाजपेयी को उस समय आपत्ति नहीं हुई थी या कला संस्कृति पर कोई खतरा नजर नहीं आया था जब राजीव गांधी के शासनकाल में सलमान रश्दी की पुस्तक के आयात पर प्रतिबंध लगाया गया था। पुरस्कार वापसी जैसा कदम तब भी नहीं उठाया था जब मकबूल फिदा हुसैन ने भारत की नागरिकता छोड़ने का निर्णय लिया था। क्यों? क्योंकि तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। दरअसल अशोक वाजपेयी प्रतिरोध का स्थापत्य तभी गढ़ते हुए दिखते हैं जब राजनीति या राजनीतिक स्थितियां उनके अनुकूल नहीं होती है। आज स्थितियां इस तरह की बन गई हैं कि अशोक वाजपेयी ने नामवर सिंह को जिस विशेषण से विभूषित किया था वो पलटकर उनपर ही चिपकता नजर आ रहा है। नामवर जी में हो सकता है विचलन हो लेकिन इनके कांग्रेस प्रेम में तो निरंतरता है। 

Sunday, June 11, 2017

वैचारिक स्वतंत्रता का सम्मान

दो हजार चौदह में, जब से केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार बनी है, उस वक्त से ही साहित्य जगत में इस बात को लेकर काफी शोरगुल मच रहा है कि देश में फासीवाद लगभग आ ही गया है। अभिव्यक्ति की आजादी पर बढ़ रहे खतरे को लेकर भी खूब हो हल्ला मचा, बल्कि यों कहें कि अब भी मच रहा है । उस वक्त इस बात की आशंका भी जताई गई थी कि नई सरकार संस्थाओं का भगवाकरण करने में जुट जाएगी । कालांतर में इस बात को लेकर भी विरोध प्रदर्शन आदि हुए कि सरकार कला, साहित्य, शिक्षा और संस्कृति की स्वायत्त संस्थाओं पर कब्जा करना चाहती है । पुणे के फिल्म संस्थान से लेकर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में हुई नियुक्तियों पर सवाल खड़े होने लगे। सीताराम येचुरी तक ने राम बहादुर राय तक की नियुक्ति पर सवाल उठाया था । इस बात की आशंका भी व्यक्त की जाने लगी थी कि सरकार देश का इतिहास बदलने की मंशा से काम कर रही है। शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की आहट को लेकर भी विरोधी सक्रिय हो गए थे और सरकार पर भगवा एजेंडे को थोपने का आरोप लगने लगा था। इस बीच बिहार विधानसभा चुनाव का एलान हो गया और लगभग उसी वक्त पुरस्कार वापसी का बवंडर उठा। अशोक वाजपेयी की अगुवाई में पुरस्कार वापसी ब्रिगेड ने देश में बढ़ते असहिष्णुता को मुद्दा बनाकर साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटाने शुरू कर दिए। कुछ फिल्मकारों ने भी अपने पुरस्कार वापस किए। इनका एक ही आरोप कि संस्थाओं को सरकार नष्ट कर रही है और अभिव्यक्ति की आजादी से लेकर खाने पीने की आजादी पर अपनी मर्जी थोपना चाहती है। पुरस्कार वापसी अभियान को तबतक हवा दी जाती रही जबतक कि बिहार विधानसभा का चुनाव निबट नहीं गया। बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार के साथ ही पुरस्कार वापसी और असिहुष्णता के खिलाफ अभियान नेपथ्य में चले गए। फिर गाहे बगाहे जब भी इन सांस्कृतिक संस्थाओं में किसी तरह की नियुक्ति होती तो विरोध के सुर उठते हैं, कभी स्वर तीखा तो कभी हल्का। सरकार ने भी धीरे धीरे इन संस्थाओं में नियुक्तियां करनी शुरू कर दीं लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी इन संस्थाओं में सभी नियुक्तियां हो नहीं पाई हैं, हां लगभग सभी संस्थाओं के मुखिया नियुक्त हो गए। यह अलहदा विषय है कि इन संस्थाओं में काम-काज किस तरह से हो रहा है। या इन संस्थाओं के रहनुमाओं को अपने तरीके से काम कर पाने की कितनी सहूलियत मंत्रालय से मिल रही है । इस विषय में पहले भी इस स्तंभ में चर्चा हो चुकी है।
केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार पर यह आरोप लगता रहा है कि साहित्यक,सांस्कृतिक संस्थाओं से लेकर विश्यविद्यालयों तक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मर्जी और सलाह से ही नियुक्तियां होती हैं। लेकिन हाल में जो दो नियक्ति हुई उससे इस आरोप की भी हवा निकल जाती है। विरोधियों के वो आरोप भी धराशायी हो जाते हैं कि संस्थाओं पर सरकार अपनी विचारधारा के लोगों को थोपना चाहती है। या सरकार संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में अपनी मर्जी के लोगों को चुन चुन कर बिठा रही है। कुछ दिनों पहले बिलासपुर विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर सदानंद शाही की नियुक्ति की गई। सदानंद शाही जी केदारनाथ सिंह और गोरखपुर के प्रेमचंद शोध संस्थान से जुड़े रहे हैं। उनकी विचारधारा साहित्य जगत में ज्ञात है। उनकी नियुक्ति के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने कड़ा प्रतिवाद किया और परिषद का आरोप है कि सदानंद शाही पुरस्कार वापसी कर रहे लेखकों के समर्थन में थे और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में उन्होंने नक्सलियों के समर्थक कवि वरवर राव की रचनाओं का पक्ष लिया था। इस नियुक्ति के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने राज्यव्यापी आंदोलन की धमकी दी थी जिसके बाद तकनीकी कारणों से प्रोफेसर सदानंद शाही की नियुक्ति को टाल दिया गया। बार-बार इस बात को भी फैलाया जाता है कि संघ से हरी झंडी के बाद ही नियुक्ति होती है। अब सवाल यही उठता है कि अगर नियुक्तियों में संघ का दखल होता तो प्रोफेसर शाही की नियुक्ति कैसे हो जाती है। सरकार पर इस तरह के आरोप गलत है कि वो सिर्फ अपनी वैचारिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति दे रही है।
केंद्र सरकार पर इस तरह के आरोप किस कदर मिथ्या हैं इसका एक और सबूत है इलाहाबाद के जी बी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक के पद पर प्रोफेसर बदरी नारायण तिवारी की नियुक्ति। प्रो तिवारी जाने माने प्रगतिशील लेखक रहे हैं। दो हजार नौ में प्रकाशित उनकी किताब फैसिनेटिंग हिदुत्वा, सैफ्रन पॉलिटिक्स एंड दलित मोबलाइजेशन का हिंदी अनुवाद दो हजार चौदह में हिंदुत्व का मोहिनी मंत्र के नाम से छपा था। हिदुत्व का मोहिनी मंत्र की प्रस्तावना में बदरी नारायण जी लिखते हैं – दो हजार चौदह के चुनाव परिणाम ने इस पुस्तक के शोध के परिणाम की ओर इशारा कर इस पुस्तक की प्रासंगिकता बढ़ा दी है, जो शायद मैं नहीं चाहता था। वस्तुत: जिस खतरे की ओर इशारा करने के उद्देश्य से यह पुतक लिखी गई थी, उस खतरे को टाला नहीं जा सका। किन्तु, हमारा राजनीतिक वर्ग इस खतरे के प्रति सजग हो दलित समूह के एक वर्ग के भगवाकरण को रोक पाता, ऐसा नहीं हुआ। इस पुस्तक की जो प्रासंगिकता मैं चाहता था, वह ना होकर उल्टा हुआ और हिन्दुत्ववादी शक्तियों के सतत एवं सघन वर्षों के प्रयास से 2014 के चुनाव में दलित समूह का एक वर्ग भाजपा की ओर उन्मुख होता दिखा। यहीं यह लगता है कि अकादमिक शोध किसी खतरे की तरफ सिर्फ इशारा कर सकते हैं, उसे सीधे रोक नहीं सकता। बदरी जी जिस खतरे की ओर इशारा कर रहे हैं वह है भारतीय जनता पार्टी का उभार। तो जो आदमी भारतिय जनता पार्टी के उभार या बहमुत को खतरा मानता हो उसको ही महत्वूपूर्ण पद पर नियुक्त किया जाना सरकार पर लग रहे आरोपों को नकारती है। इसी पुस्तक में एक जगह बदरी नारायण भारतीय जनता पार्टी के बारे में लिखते हैं- अपने जन्म से ही यह पार्टी सांप्रदायिक राजनीति के लिए जानी जाती है। इस तरह की टिप्पणियां इस पुस्तक में कई बार और कई जगह दिखाई देती है।  अब अगर यह सरकार बदले की भावना से काम करती या फिर अपने विरोधियों को हाशिए पर डालती होती तो बदरी नारायण जी को मानव संसाधन विकास मंत्रालय पांच साल के लिए निदेशक के पद पर नियुक्ति कैसे देता। बदरी नारायण जी के प्रतिरोध के स्वर तो पुरस्कार वापसी के दौर से लेकर अखलाक की हत्या के बाद तक बहुत मुखर थे । अगर अपने विरोधियों को नियुक्ति नहीं देने का कोई अघोषित फैसला होता तब भी बदरी जी की नियुक्ति नहीं हो सकती थी। बदरी नारायण की नियुक्ति इस बात का उदाहरण है कि सरकार नियुक्तियों में भेदभाव नहीं करती है ।

अपनी विचारधारा वाले लोगों की नियुक्तियां हर सरकार करती रही हैं। आम आदमी पार्टी ने भी अपनी पार्टी से सहानुभूमि रखनेवालों को हिंदी अकादमी से लेकर हर जगह नियुक्ति दी। सरकारों को इस बात का हक भी है कि वो अपनी विचारधारा को बढ़ावा दे। विचारधारा को मजबूकी देने के लिए यह आवश्यक भी होता है कि अपने से जुड़े लोगों को मजबूत किया जाए। लेकिन मौजूदा केंद्र सरकार इस मायने में थोड़ी अलग है। यह वामपंथियों की तरह अपने विरोधी विचारधारा वालों को भी अस्पृश्य नहीं मानती है। उनसे दूरी नहीं बनाती या सायास उनको हाशिए पर धकेलने के लिए संगठित प्रयास नहीं करती है। ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब भारतीय जनता पार्टी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार से सहमत विद्वानों को सरकारी सस्थाओं में प्रवेश तक नहीं था। उनका मजाक उड़ाया जाता था । फेलोशिप से लेकर तमाम तरह कि नियुक्तियों में प्राथमिक शर्त यह होती थी कि वो उनकी विचारधारा को मानने वाला हो। यहां तक कि गोष्ठियों में भी इस बात का खास ध्यान रखा जाता था कि हिदुत्व की विचारधारा को मानने वाले मंच पर नहीं बैठें। साहित्य अकादमी से लेकर अन्य अकादमियों के पुरस्कारों में विरोधी विचारधारा के विद्वानों के नाम पर पुरस्कारों के लिए विचार ही नहीं होता था। दिन रात फासीवाद-फासीवाद की रट लगानेवालों को इस बात पर गौर करना चाहिए कि पिछले तीन साल में ऐसी स्थिति नहीं है। हर विचारधारा वाले को मंच मिलता है, नियुक्ति मिलती है और अन्य तरह की सहूलियतें भी। सवाल यही उठता है कि जो लोग संघ की आड़ लेकर सरकार पर हमले करते रहे हैं उनको बहुत ध्यान से आरोप लगाने चाहिए अन्यथा इन आरोपों से उनकी ही किरकिरी होती है।