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Saturday, May 21, 2022

भारत के भविष्य का उत्सव


फ्रांस में आयोजित विश्व प्रसिद्ध कान फिल्म फेस्टिवल में हिंदी के कालजयी कवि जयशंकर प्रसाद की कविता।  यह सोचना या कल्पना करना थोड़ा कठिन था लेकिन फेस्टिवल के इस संस्करण में ये हुआ। इंडिया फोरम के एक कार्यक्रम में अभिनेत्री वाणी त्रिपाठी टिक्कू ने जयशंकर प्रसाद की कविता की पंक्तियों से एक चर्चा सत्र का समापन किया। जब वाणी ने जयशंकर प्रसाद की कविता की पंक्तियां, हिमाद्री तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयं प्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती, अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो-बढे चलो, सुनाई तो हाल तालियों से गूंज उठा। वाणी ने ‘बढ़े चलो’ से भारतीय दर्शन को जोड़कर आगे बढ़ने की बात कही। कान फिल्म फेस्टिवल के दौरान हिंदी के कई वाक्य और मुहावरे गूंजे। सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने इंडिया फोरम के मुख्य मंच से अपनी बात ही हिंदी गीत ‘है प्रीत जहां की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूं, भारत का रहनेवाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं’ से आरंभ की। गीतकार और लेखक प्रसून जोशी ने भी भारत की रचनात्मकता को ‘बेचैन सपने’ जैसे पद से जोड़ा और कुछ कर गुजरने की बात की। लगभग इसी समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वडोदरा के युवा शिविर को संबोदित कर रहे थे। उन्होंने भी कुछ इसी तरह की बात की। उन्होंने भारत को दुनिया की नई उम्मीद बताते हुए कहा था कि कोरोनाकाल में संकट के बीच दुनिया को वैक्सीन और दवाईयां पहुंचाने से लेकर बिखरी हुई सप्लाई चेन के बीच आत्मनिर्भर भारत की उम्मीद तक, वैश्विक अशांति और संघर्षों के बीच शांति के लिए एक सामर्थ्यवान राष्ट्र की भूमिका तक, भारत आज दुनिया की नई उम्मीद है। ऐसे वक्त में जब देश में कुछ राजनीतिज्ञ हिंदी और भाषा को लेकर राजनीति कर रहे हों तो वैश्विक मंच पर भारत के गौरव को, भारतीय दर्शन को, भारत के युवाओं के सपनों को हिंदी में अभिव्यक्त करना न सिर्फ हिंदी बल्कि भारतीय भाषाओं का भी सम्मान है। वोट की राजनीति के लिए भाषा को हथियार बनाकर समाज को बांटने की जुगत में लगे नेताओं को ये बात समझनी होगी कि भारत की आकांक्षाओं को  वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए वैश्विक मंचों पर भारतीय भाषा में बात करनी होगी। हिंदी के लोगों को भी इस बात का ध्यान रखना होगा कि हिंदी की उन्नति का रास्ता भी भारतीय भाषाओं के आंगन से होकर जाता है। इस बार कान फिल्म महोत्सव में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने इस सोच को पूरी दुनिया के सामने रखा। यह अनायास नहीं था कि मंत्री अनुराग ठाकुर जब भारतीय प्रतिनिधिमंडल के साथ रेड कार्पेट पर चल रहे थे तो उनकी शेरवानी के बटन पर हिंदी, मराठी, गुजराती समेत अन्य भारतीय भाषाओं में भारत लिखा था। 

भारतीय फिल्मों को वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान को गाढ़ा करना है तो उसको भारत की कहानियों पर ध्यान देना होगा। अभिनेता माधवन ने ठीक कहा कि उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश तक में भारतीय समाज के नायकों की, उनकी सफलताओं की कहानियां बिखरी हैं। उन कहानियों पर फिल्में बनाई जाएं तो भारतीय फिल्मों की व्याप्ति पूरी दुनिया में होगी। आर्यभट्ट से लेकर सुंदर पिचाई तक भारतीयों की सफलता की कहानी पूरी दुनिया को बताने की जरूरत है। माधवन ने इसरो के वैज्ञानिक नंबी नारायणन की जिंदगी पर आधारित फिल्म राकेट्री, द नंबी इफेक्ट बनाई है जिसका प्रदर्शन कान में हुआ। ये फिल्म हिंदी, तमिल, तेलुगू समेत कई भारतीय भाषाओं में बनाई गई है। वैज्ञानिकों और तकनीक के महारथियों के जीवन पर बनी फिल्मों में अलग-अलग देशों के दर्शकों की रुचि इस वजह से संभव है कि उनके कार्य को कई देश के लोग जानते हैं। आज अगर गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई और माइक्रोसाफ्ट के सत्य नडेला की सफलता की कहानी को फिल्मों में चित्रित किया जाता है तो वो न केवल दुनिया के युवाओं को आकर्षित करेगी बल्कि भारत के गौरव को भी दुनिया में स्थापित कर सकेगी। आज अगर कोई फिल्मकार कोरोनाकाल में भारत की महामारी से लड़ने की जिजीविषा को केंद्र में रखकर फिल्म बनाता है तो पूरी दुनिया उसको ध्यान से देखेगी। कोरोनाकाल में जिस तरह से भय का वातावरण बना था और उस वातावरण में भारत ने वैक्सीन बनाया। भयंकर भय के उस माहौल में इस विशाल देश में वैक्सीन को अलग अलग राज्यों तक पहुंचाना और करोड़ों लोगों का टीकाकरण कराना किसी थ्रिलर से कम नहीं है। 

यह भी एक सुखद संयोग है कि कान फिल्म महोत्सव अपनी स्थापना के पचहत्तरवें साल में है, भारत अपनी स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है और भारत और फ्रांस के राजनयिक संबंध के भी 75 साल हो रहे हैं। इस संयोग को कान फिल्म फिल्म फेस्टिवल ने उत्साह के साथ समरोहपूर्वक मनाने का निर्णय लिया। भारत को फेस्टिवल के दौरान सम्मानित देश (कंट्री आफ आनर) का दर्जा दिया गया। ये पहली बार हो रहा है कि फिल्म फेस्टिवल के दौरान किसी भी देश को सम्मानित देश के तौर पर आमंत्रित किया गया है। कान फिल्म फेस्टिवल में चेतन आनंद की 1946 की फिल्म ‘नीचा नगर’ को सम्मानित किया जा चुका है, सत्यजित राय की फिल्म पाथेर पंचाली को भी । 2013 में अमिताभ बच्चन और लियेनार्दो द कैप्रियो ने संयुक्त रूप से कान फिल्म फेस्टिवल के औपचारिक शुरुआत की घोषणा की थी। भारत के फिल्मकार समय समय पर कान फिल्म फोस्टिवल की जूरी में नामित होते रहे हैं। अब कान फिल्म फेस्टिवल ने भारत की फिल्मों को,यहां की कहानियों को लेकर विशेष रुचि दिखाई है। कान फिल्म फेस्टिवल में भारतीय फिल्मों और फिल्मकारों को इतना महत्व मिलना ये साबित करता है कि पूरी दुनिया भारतीय मनोरंजन जगत को बहुत संजीदगी से देख रही है। मशहूर फिल्मकार और भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान, पुणे के चेयरमैन शेखर कपूर ने कान फिल्म फेस्टिवल के मंच से कहा कि ये भविष्य का उत्सव है। 

अब जब पूरी दुनिया भारतीय फिल्मों की ओर एक उम्मीद भरी नजरों से देख रही है तो भारतीय फिल्मकारों खासतौर पर हिंदी के फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों के सामने उन उम्मीदों पर खरा उतरने की चुनौती है। ऊलजलूल कहानियों से आगे जाकर, बेवजह की मारधाड़ और यौनिकता से आगे जाकर भारत के गौरव को स्थापित करनेवाली कहानियों को लेकर फिल्में बनानी होंगी। फिल्मकारों के लिए मुनाफा पहली प्राथमिकता है, होनी भी चाहिए लेकिन सिर्फ मुनाफे के लिए फिल्म बनाकर इस कला को समृद्ध नहीं किया जा सकता है। कला की उत्कृष्टता को बरकरार रखकर भी मुनाफा कमाया जा सकता है। पूर्व में कई फिल्मकारों ने ऐसा किया भी है। फिल्म ‘रंग दे बसंती’ और ‘तारे जमीं पर’ आदि का उदाहरण दिया जा सकता है। राजमौली ने अपनी फिल्मों में साबित किया है कि कला की भव्यता से भी जमकर पैसा कमाया जा सकता है। इस काम में राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम की महती भूमिका हो सकती है। भारत सरकार की इस संस्था को आगे आकर उन फिल्मकारों की पहचान करनी होगी जो भारतीय भूभाग पर बिखरी कहानियों की खोज करें। साथ ही उन फिल्मकारों को चिन्हित करें जो इन कहानियों पर उत्कृष्ट फिल्में बनाकर दर्शकों के सामने पेश कर सकें। इसके लिए आवश्यक है कि भारतीय फिल्म विकास निगम के पुनर्गठन के कार्य में तेजी लाई जाए। इसको अफसरशाही और लालफीताशाही की जकड़न से मुक्त किया जाए। फिल्म की समझ रखनेवाले, भारतीय कहानियों को, भारतीय भाषाओं में समझने और उसको भारतीय भाषाओं में ही अभिव्यक्त करनेवालों की भूमिका बढ़ाई जाए। अगर ऐसा हो पाता है तो न केवल भारतीय फिल्मों का भला होगा बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया जिस ‘नई उम्मीद’ की बात कर रहे हैं वो भारतीय फिल्म जगत में भी साकार हो सकेगा। 


Saturday, May 18, 2013

राजभाषा नहीं रोजगार भाषा बने हिंदी

फ्रांस के शहर कान में चल रहे अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने समारोह की शुरुआत की । यह बॉलीवु़ड समेत पूरे भारतीय फिल्म जगत के लिए गर्व की बात है । हिंदी फिल्मों के सौ साल पूरे होने के मौके पर अमिताभ बच्चन को संयुक्त रूप से इस समारोह के आगाज की इज्जत बख्शी गई । कान में अंतराष्ट्रीय श्रोताओं और तमाम देशों के जगमगाते सितारों के बीच अमिताभ बच्चन ने हिंदी का भी मान बढाया । बगैर इस बात की परवाह किए कि सुनने वाला कौन है, अमिताभ बच्चन ने समारोह की शुरुआत हिंदी में भाषण देकर की । बाद में अमिताभ बच्चन ने इस बात को स्वीकार किया कि हिंदी फिल्म जगत की वजह से उन्हें पहचान और सम्मान मिला लिहाजा उनका यह दायित्व था कि काम फिल्म फेस्टिवल में वो अपना संबोधन हिंदी में करें । अमिताभ बच्चन सही मायने में हिंदी के ब्रांड एंबेसडर हो सकते हैं, हैं भी । उन्होंने अपने बेहद लोकप्रिय कार्यक्रम- कौन बनेगा करोड़पति - में जिस तरह की हिंदी बोली और जिस तरह से हिंदी के कई शब्दों को पुनर्स्थापित किया वह तारीफ के काबिल है । पंचकोटि जैसे शब्द एक बार फिर से चलन में आए । जब भी मौका मिलता है अमिताभ बच्चन हिंदी में बात करते हैं । अमिताभ इस बात का खासा ख्याल रखते हैं कि उनका श्रोता कौन है और वो उसके हिसाब से ही भाषा का चुनाव करते हैं । लेकिन कान में अमिताभ ने अपने श्रोताओं की पसंद की बजाए अपनी मातृभाषा को तवज्जो दी ।  कान में हिंदी बोलकर अमिताभ बच्चन ने देशावासियों को दिल उसी तरह से मोह लिया जैसे विदेश मंत्री रहते अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक को हिंदी में संबोधित कर किया था । हिंदी के मसले पर अमिताभ बच्चन अपने साथी कलाकारों से अलग नजर आते हैं । हिंदी फिल्मों में काम करनेवाले कलाकरों की आपसी बोलचाल की भाषा भी अंग्रेजी है । कहा तो यहां तक जाता है कि सितारों को हिंदी की स्क्रिप्ट रोमन में लिखकर दी जाती है । लेकिन फिल्मों से जुड़े लोग बताते हैं कि अमिताभ बच्चन को स्क्रिप्ट हिंदी में ही दी जाती है ।
अगर हम देश में हिंदी को लेकर लोगों के मन में भाव देखें तो तस्वीर बिल्कुल अलहदा नजर आती है । रीडरशिप सर्वे और प्रसार संख्या के आंकड़ों के जारी होने के बाद एक बार फिर से यह बात साबित हो गई कि पूरे देश में हिंदी के पाठक सबसे ज्यादा हैं । हिंदी और अंग्रेजी के अखबारों के बीच प्रसार संख्या और पाठक संख्या दोनों का फासला भी बहुत बड़ा है । बावजूद इसके देश का हिंदी भाषी मानस अंग्रेजी को अपनाने के लिए ताबड़तोड़ कोशिश करता है । आज हिंदी भाषी प्रदेशों में तकरीबन हर माता पिता की इच्छा होती है कि उनकी संतान किसी अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़े । नतीजा यह हुआ है कि हर गली मुहल्ले में अंग्रेजी माध्यम के स्कूल कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं । इन स्कूलों में ना तो बच्चों को ठीक से हिंदी पढ़ाई जाती है और ना ही अंग्रेजी । बच्चों के भाषा संस्कार का विकास ही नहीं हो पाता है । कहावत है ना कि ना माया मिली ना राम । ना अंग्रेजी मिल पाती है और हिंदी से भी दूर होते चले जाते हैं । दरअसल यह एक मानसिकता है । आप अपने आसपास ही देखें तो पाते हैं कि मुहल्ले की परचून की दुकान की पर हिंदी में बात करनेवाला शख्स जब किसी मॉल में खरीदारी के लिए पहुंचता है तो वहां वह फौरन हिंदी का त्याग कर देता है । मॉल की दुकानों में घुसते ही एक्सक्यूज मी । टूटी फूटी और अशुद्ध अंग्रेजी बोलकर भी उनका सीना चौड़ा हो जाता है । यह हमारी वह मानसिकता है जो आजादी के छियासठ साल बाद अबतक गुलाम है । अंग्रेजी में बोलना फैशन नहीं है बल्कि अपने को श्रेष्ठ साबित करने की तमन्ना है, अपनी कुंठा को छुपाने का तरीका । हम अपनी भाषा की अस्मिता और उसकी ताकत को पहचान पाने में बुरी तरह से विफल रहे हैं ।
हां ,बाजार ने हिंदी की ताकत को जरूर पहचान लिया है । तमाम तरह के विज्ञापनों के कैंपन हिंदी भाषी लोगों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं । स्टार ग्रुप के सीईओ उदय शंकर ने हिंदी की ताकत को पहचानते हुए क्रिकेट की कमेंटरी हिंदी में करवानी शुरू की और उसके लिए अपने ग्रुप का एक अलग चैनल चिन्हित कर दिया। अब सौरव गांगली से लेकर कपिलदेव से लेकर नवजोत सिंह सिद्धू लगातार सिर्फ हिंदी में ही बात करते हैं । यह हिंदी के बाजार को भांपते हुए किया गया है । इसके अलावा अगर आप इंडिगो एयरलाइंस में सफऱ करेंगे तो उनके केबिन क्रू यह बात जोर देकर कहते हैं कि वो हिंदी में भी बात करते हैं । अभी इस बात को ज्यादा दिन नहीं बीते हैं कि एयरलाइंस उद्योग खासतौर पर अंग्रेजीदां उद्योग समझा जाता था । वहां हिंदी में बातचीत की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । लेकिन देश के सबसे बड़े निजी एयरलाइंस में से एक ने हिंदी को अपनाया है । कई बार तो इंडिगो में जिस ठोंगे में समोसा दिया जाता है उसपर हिंदी में एक छोटी कहानी लिखी होती है । एक मिनट की कहानी । यह एयरलाइंस उद्योग के कल्चर में आए बदलाव को इंगित करता है । यह सिर्फ इक्का दुक्का जगहों पर ही नहीं हो रहा है । हिंदी को लेकर बाजार बेहद उत्साहित है वजह साफ है कि बाजार ने हिंदी वालों की क्रयशक्ति को पहचाना है और उसको भुनाने में लगे हैं ।
बाजार तो हिंदी को भुनाने में लगी है, यह बाजार का स्वभाव भी है और चरित्र भी लेकिन हिंदी के कर्ता-धर्ता बाजार को अब भी अस्पृश्य मानते हैं । उनको लगता है कि बाजार हिंदी को नष्ट कर रही है । इस मसले पर वो हिंदी में बननेवाले विज्ञापनों का उदाहरण देते हैं जहां ये अंग्रेजी के शब्दों का मिलाकर ये दिल मांगे मोर बनाया जाता है । हिंदी की शुद्धता और शुचिता की वकालत करनेवाले और हिंदी के साथ अंग्रेजी शब्दों के इस्तेमाल की की आलोचना करनेवाले यह भूल जाते हैं कि हिंदी ने उस वाक्य में अपनी जगह तो बनाई । सवाल इस बात का अवश्य है कि हमें हिंदी के व्याकरण, उसके नियम कानून की रक्षा करनी चाहिए लेकिन सवाल यह भी है कि हिंदी को विश्व में उसकी सही जगह दिलाने के लिए हमें थोड़ा लचीला रुख अपनाना होगा ।  आज हिंदी के तमाम लोग जिनपर हिंदी को बढ़ाने का दायित्व है वो बाजार को कोसते हुए घर बैठे हैं । हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए क्या कर रहे हैं यह ज्ञात नहीं है । बाजार के अपने नियम और कायदे होते हैं । वह अपने हिसाब से हर चीज का उपयोग करना चाहती है । लेकिन बाजार आज एक हकीकत है, उससे मुंह नहीं मोड़ा जा साकता है , ना ही बाजार की ताकत से टकराया जा सकता है । तो ऐसे में सही रणनीति तो यही होनी चाहिए कि बाजार की ताकत का इस्तेमाल अपने हक में करें । आज हिंदी को बढा़ने के लिए बाजार का इस्तेमाल करने की जरूरत है, बाजार को कोसने की नहीं । आज जरूरत इस बात की है कि हिंदी के विकास के लिए बनाई गई संस्थाएं एकजुट होकर रणनीति बनाएं और बाजार के औजार का इस्तेमाल करते हुए उसके साथ नए लोगों को जोड़ने की पहल करें । हिंदी को अगर ताकतवर बनाना है तो उसको नए क्षेत्रों में लेकर जाना होगा । हिंदी को अन्य भारतीय भाषा के दुश्मन के तौर पर पेश नहीं करके उसको दोस्त की तरह से स्थापित करना होगा । फिल्मों और टेलीविजन चैनल पर चलनेवाले मनोरंजन के कार्यक्रमों को हिकारत की नजर से नहीं देखना होगा बल्कि उसको हिंदी के संवाहक होने की इज्जत बख्शनी होगी ।
सरकार से हिंदी के विकास और अहिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी के फैलाव के प्रयास की अपेक्षा करना व्यर्थ है । इस दिशा में हिंदी के लोगों को खुद ही आगे बढ़कर पहल करनी होगी । एक ऐसी पहल जिसमें हिंदी के लोगों को अपनी भाषा को लेकर आत्मविश्वास बढ़े और गैर हिंदी भाषियों के बीच हिंदी को लेकर दुश्मनी का भाव खत्म हो । हिंदी बाजार की भाषा बनने की राह पर बहुत आगे निकल गई है और अब जरूरत है कि इस भाषा को रोजगार से जोड़ा जाए । जिस दिन हिंदी को रोजगार की भाषा बनाने में हम कामयाब हो गए उस दिन हिंदी की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी और कान जैसे समारोह में हिंदी की स्वीकार्यता और इज्जत दोनों बढ़ेगी ।