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Saturday, June 27, 2020

वेब सीरीज पर लगाम कसने का समय


‘दुख हुआ, वेब-सीरीज ‘रसभरी’ में असंवेदनशीलता में एक छोटी बच्ची को पुरुषों के सामने उत्तेजक नाच करते हुए, एक वस्तु की तरह दिखाना निंदनीय है। आज रचनाकार और दर्शक सोचें कि बात मनोरंजन की नहीं, यहां बच्चियों के प्रति दृष्टिकोण का प्रश्न है, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है या शोषण की मनमानी? यह प्रश्न उठा रहे हैं केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड, जिसको बातचीत में सेंसर बोर्ड भी कहा जाता है, के अध्यक्ष और मशहूर गीतकार प्रसून जोशी। प्रसून जोशी पहले भी अपनी आपत्तियों को सार्वजनिक करने से बचते रहे हैं और जब से प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष बने हैं तब से तो बिल्कुल ही नहीं बोलते हैं, लेकिन वेबसीरीज ‘रसभरी’ के इस दृष्य ने उनको इतना उद्वेलित कर दिया कि वो सामने आए। उनकी इस आपत्ति का उत्तर दिया ‘रसभरी’ वेबसीरीज की नायिका स्वरा भास्कर ने, ‘आदर सहित सर, शायद आप सीन को गलत समझ रहे हैं, सीन का जो वर्णन किया है वो उसके ठीक उल्टा है। बच्ची अपनी मर्जी से नाच रही है, पिता देखकर झेंप जाता है और शर्मिंदा होता है। नाच उत्तेजक नहीं है, बच्ची बस नाच रही है, वो नहीं जानती समाज उसे सेक्सुअलाइज करेगा-सीन यही दिखाता है।‘  स्वरा बचाव करने की लाख कोशिश करे लेकिन बच्ची से उत्तजेक गाने पर नाच करवाने की कहानी या कहानी में जो पृष्ठभूमि या संवाद है उससे ही मंशा का पता चलता है। बच्ची के नाच के पहले एक महिला का ये कहना कि, ‘थोड़ा बहुत नाच गाना लड़कियों को आना चाहिए, कल को अपने पति को रिझाए रखेगी’ और गाना देखकर फिर वही महिला कहती है कि ‘तेरी बेटी के लक्षण ठीक नहीं लग रहे’ तो दूसरी महिला खास अदा के साथ कहती है कि ‘ये सिर्फ अपने पति को नहीं बल्कि पूरे मुहल्ले को रिझाएगी।‘ अगर इन संवादों के साथ प्रसून जोशी की आपत्ति को देखेंगे तो उसमें एक गंभीरता दिखाई देती है और स्वरा की प्रतिक्रिया बेहद हल्की और तथ्यहीन। किसी भी मुद्दे पर विचार करने से पहले उसपर समग्रता से सोचना आवश्यक होता है अन्यथा प्रतिक्रिया सतही होती है।

‘रसभरी’ और उसमें स्वरा की भूमिका ऐसी है जिसको खुद स्वरा ही नहीं चाहती की उसके पिता इस वेब सीरीज को उस वक्त देखें जब वो उनके आसपास हो। ये तो स्वरा ने सार्वजनिक रूप से माना है। उसके पिता ने अपनी बेटी को शाबाशी देते हुए ट्वीट किया कि उनको अपनी बेटी की प्रतिभा पर गर्व है। इसके उत्तर में स्वरा ने लिखा कि ‘डैडी! कृपया इसको उस वक्त नहीं देखें जब मैं आपके आसपास रहूं।‘ अब जरा इस मानसिकता को समझिए कि एक पुत्री अपने पिता को सार्वजनिक रूप से कह रही है कि वो इस वेब सीरीज को अपनी बेटी के आसपास होने पर न देखें और वही प्रसून जोशी को समाज की मानसिकता आदि के बारे में नसीहत देती है और समझाती है कि बच्ची सिर्फ नाच रही है। वैसे भी ये वेब सीरीज इतना फूहड़ और इसके संवाद इतने स्तरहीन हैं कि इसको कोई भी संजीदा व्यक्ति परिवार के आसपास होने पर नहीं देखना पसंद करेगा। प्रसून जोशी ने एक वेब सीरीज में बच्ची के नाच को लेकर जो सवाल खड़ा किया है उसपर हमारे समाज को विचार करना चाहिए। क्या वेब सीरीज की दुनिया अब इतना नीचे गिर जाएगी कि वो यौन प्रसंगों से भी आगे बढ़कर अब बच्चियों को एक आब्जेक्ट के तौर पर पेश करेगी। लाभ कमाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाना कहां तक उचित है? दरअसल ये एक और संकेत है कि ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर कंटेंट को लेकर कितनी अराजकता बढ़ती जा रही है। इन सीरीज पर किसी भी प्रकार का कोई नियमन नहीं होने की वजह से अराजकता अपने चरम पर है। पता नहीं क्यों वेब सीरीज निर्माताओं को ये क्यों लगता है कि अगर इनकी भाषा स्तरहीन रखी जाएगी, यौन प्रसंग होंगे, भयंकर हिंसा होगी तभी इसको दर्शक मिलेंगे। कुछ शुरुआती वेब सीरीज बनानेवाले निर्देशकों की वजह इस तरह की भ्रांति बनी। ‘रसभरी’ भी इसकी शिकार हुई है क्योंकि प्रचारित ये किया जा रहा है ‘रसभरी के जादू से कोई बच नहीं सकता एक बार आजमा कर तो देखो।‘ दो हजार अठारह में ‘वीरे द वेडिंग’ फिल्म में अपनी भूमिका से स्वरा ने जो छवि बनाई उसको ‘रसभरी’ पुष्ट करती है। कई बार इन सीरीज की प्रचार सामग्री से भी इस बात का अंदाज लग जाता है कि इसमें क्या होगा। लेकिन इसके ठीक पहले हॉटस्टार पर रिलीज ‘आर्या’ और उसके पहले प्राइम वीडियो पर रिलीज ‘पंचायत’ ने इस भ्रांति को भी तोड़ा कि जुगुप्साजनक अश्लीलता, नग्नता और हिंसा ही किसी सीरीज को चर्चित बनाती है। ‘आर्या’ में जिस तरह से ड्रग के धंधे को दिखाया गया है उसमें अश्लील दृश्यों को दिखाने की पूरी संभावना थी लेकिन निर्माता उस रास्ते पर नहीं चले। इस सीरीज में सुष्मिता सेन को लेकर या फिर अन्य नायिकाओं की नग्नता का प्रदर्शन किया जा सकता था लेकिन ऐसा किया नहीं गया और बहुत साफ सुथरे तरीके से कहानी आगे बढ़ती चली गई। दर्शक कहानी के सम्मोहन में इसके साथ जुडा रहता है। आज हालत ये है कि ‘आर्या’ किसी भी सीरीज से कम लोकप्रिय नहीं है। सुष्मिता सेन की अदाकारी, कहानी और संवाद का कसावट दर्शकों को अंत तक बांधे रखता है। इसमें भी कहीं-कहीं निर्माता भटकते दिखते हैं लेकिन फौरन संभल जाते हैं।
वेब सीरीज की अराजकता का दायरा धीरे-धीरे बढता जा रहा है। जो किताबें दशकों पहले फुटपाथ पर पीली पन्नियों में छुपाकर बेची जाती थीं, अब उसी स्तर की कहानियां और उसपर बनी फिल्में इन प्लेटफॉर्म पर वेबसीरीज के रूप में मौजूद हैं। ‘मस्तराम’ के नाम की जो किताबें कई सालों पहले किशोर और युवा छुपा कर पढते थे, कभी अपनी कोर्स की किताबों के बीच छुपाकर तो कभी घर के किसी सूने कोने में छिपकर अब उसी मस्तराम के नाम से पूरी की पूरी सीरीज ओटीटी पर उपलब्ध हैं। जिसमें उन किताबों की कहानियों को फिल्मा दिया गया है। इतना ही नहीं ‘कविता भाभी’, ‘लाली भाभी’ जैसी सीरीज भी उपलब्ध हैं। इन सीरीज में जो नग्नता दिखाई जा रही है उसपर समाज को विचार करना चाहिए। देशभर में इसपर चर्चा होनी चाहिए कि क्या इस तरह की नग्नता किसी प्लेटफॉर्म पर दिखाया जाना उचित है। क्या हमारा समाज इस तरह की सामग्री को परोसने की इजाजत दे सकता है। क्या हमारा समाज इतना परिपक्व हो चुका है कि इस तरह की कामोद्दीपक सीरीज को स्वीकार किया जा सके। कुछ लोग ये तर्क दे सकते हैं कि ओटीटी प्लेटफॉर्म फिल्मों से अलग है क्योंकि फिल्में सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शित की जाती हैं, उसको सामूहिक तौर पर देखते हैं और वेब सीरीज को अपने मोबाइल पर व्यक्तिगत तौर पर देखते हैं। यह तर्क अपनी जगह सही हो सकता है लेकिन क्या इन वेब सीरीज पर इतना कंट्रोल है कि जो लोग वयस्क नहीं हैं और किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रख रहे हैं या जिनको अभी यौनिकता की समझ विकसित नहीं हुई है वो इसको देख नहीं सके। वेब सीरीज की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए ऐसा लगता है कि अब समय आ गया है कि सरकार इसके बारे में कुछ सोचे। सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष की तरफ से बच्ची के नाच पर बयान आना क्या इस ओर कोई संकेत कर रहा है या फिर प्रसून जोशी के बयान को सिर्फ उनका व्यक्तिगत बयान माना जाए। तमाम नजरें सूचना प्रसारण मंत्रालय की ओर है।    

Wednesday, June 24, 2020

फिल्मी दुनिया पर इमरजेंसी की गाज


अभिव्यक्ति की आजादी की बात करनेवाले बहुधा ये भूल जाते हैं कि इमरजेंसी के दौरान सिर्फ समाचारपत्रों पर ही दबाव नहीं बनाया गया था बल्कि कलात्मक और रचनात्मक अभिव्यक्ति को भी बाधित किया गया था। दबाव था सरकार को समर्थन देने का, इमरजेंसी को सही ठहराने का। देवानंद अपनी आत्मकथा में विस्तार से इमरजेंसी के दौर के बारे में लिखते हैं। देवानंद के मुताबिक इमरजेंसी के दौर में यूथ कांग्रेस से जुड़ी एक आकर्षक युवा नेत्री मुंबई ( उस वक्त बांबे) आई थीं और बड़े फिल्मी सितारों से मिलकर संजय गांधी की दिल्ली में होनेवाली रैली में बुलाने आईं। वो जब उस नेत्री के आमंत्रण पर दिल्ली पहुंचे तो उनको वहां दिलीप कुमार भी मिले थे। जब वो लोग रैली में पहुंचे तो वहां कांग्रेस के सभी बड़े नेता कांग्रेस संजय गांधी की चमचागिरी कर रहे थे। रैली खत्म होने के बाद जब देवानंद और दिलीप कुमार वहां से बाहर निकल रहे थे तो दोनों को कांग्रेस के एक नेता ने टीवी स्टेशन जाकर यूथ कांग्रेस के समर्थन में बयान रिकॉर्ड करवाने का आदेश दिया। देवानंद को तब लगा था कि कोई फासीवादी प्रोपगंडा मशीनरी संजय गांधी के लिए काम कर रही है। जब देवानंद ने यूथ कांग्रेस के लिए बयान रिकॉर्ड करवाने से मना कर दिया तो सरकार ने दूरदर्शन पर उनकी फिल्मों के प्रदर्शन पर पाबंदी लगा दी। उसके बाद देवानंद ने तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री से बात भी लेकिन कुछ हुआ नहीं। मुंबई वापस लौटने पर देवानंद की मुलाकात नर्गिस से हुई तो उन्होंने देवानंद को यूथ कांग्रेस के पक्ष में टीवी के लिए बयान रिकॉर्ड करवाने की वकालत की। देवानंद लिखते हैं कि वो जानते थे कि नर्गिस, गांधी परिवार की करीबी है लेकिन उनका दिल इस बात के लिए तैयार नहीं था कि वो यूथ कांग्रेस और इमरजेंसी के लिए तत्कालीन सरकार के पक्ष में बयान दें। लिहाजा इमरजेंसी के दौर में उनकी फिल्में टीवी पर नहीं आईं।
इसी तरह का वाकया किशोर कुमार के साथ भी हुआ था। इमरजेंसी के बाद बीस सूत्री कार्यक्रम को प्रचारित करने के लिए हिंदी फिल्मों से जुड़े कलाकारों और सितारों को बुलाकर उनसे प्रचार करवाए जाने की योजना बनी। इसी कड़ी में किशोर कुमार को भी संदेश भेजा गया । सूचना प्रसारण मंत्रालय के उस वक्त के संयुक्त सचिव ने जब किशोर कुमार को फोन किया तो उन्होंने अपनी खराब तबीयत का हवाला देते हुए दिल्ली आने और सरकार के पक्ष में बयान देने से मना कर दिया। इससे खफा होकर मंत्रालय ने किशोर कुमार के गानों को दूरदर्शन और आकाशवाणी पर पाबंदी लगा दी। इतना ही नहीं उनकी फिल्मों पर भी नजर रखने का आदेश हुआ और उनके गाए गानों के ग्रामोफोन की बिक्री की राह में भी रोड़े अटकाए गए। किशोर कुमार को जब इतना तंग किया और दबाव डाला गया तो वो सहयोग को तैयार हो गए लेकिन तब भी सरकार ने कहा कि पाबंदी हटाने के पहले ये देखा जाए कि वो कितनी देर और दूर तक सहयोग करते हैं।

Saturday, June 20, 2020

चमकीली दुनिया का काला यथार्थ


फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने हिंदी फिल्मों की दुनिया की चमकीली छवि के पीछे की कालिख को सामने ला दिया है। कंगना रनौत जिस तरह से हर दिन सामने आकर एक के बाद एक खुलासे कर रही है उससे ये संदेश तो जा ही रहा है कि हिंदी फिल्मों की दुनिया में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। ताजा खुलासे में कंगना ने पटकथा लेखक जावेद अख्तर के साथ के अपने अनुभवों को साझा किया है। ऐसी खबरें हैं कि एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि जावेद अख्तर ने उनको अपने घर बुलाकर कहा था कि रोशन परिवार से समझौता कर लो नहीं तो तुम कहीं की नहीं रहोगी, वो तुमको जेल भिजवा देंगे या तुम आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाओगी। इस बात में अगर सचाई है तो जावेद अख्तर जैसे व्यक्ति से इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा तो नहीं ही की जा सकती है। उनसे तो अपेक्षा ये की जाती है कि अगर दो कलाकारों के बीच किसी तरह की कोई गलतफहमी है तो बड़े होने के नाते वो उसको दूर करें ना कि एक का पक्ष लेकर दूसरे को ये कहें कि समझौता कर लो या जेल जाने के लिए तैयार रहो।  

कंगना रनौत पिछले दो तीन दिनों से काफी आक्रामक हैं। इस बीच 'दबंग' फिल्म के निर्देशक अभिनव सिंह कश्यप ने सलमान खान परिवार पर बेहद संगीन इल्जाम लगाए हैं। जिस तरह की खबरें आ रही हैं उससे तो लगता है कि ये मसले अब अदालतों तक जाएंगें और जो अबतक दबा छुपा था वो सार्वजनिक होगा।  लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये भी है कि क्या सचमुच बॉलीवुड में भाई भतीजावाद (नेपोटिज्म) का बोलबाला है। क्या बॉलीवुड में कोई माफिया काम करता है जो सितारों को बढ़ाने या उसको मिटाने की ठेके उठाता है। जो परिस्थितिजन्य बातें सामने आ रही हैं उससे तो साफ तौर पर ये लगता है कि ऐसा कोई तंत्र वहां काम करता है और ये तंत्र काफी मजबूत भी है। कई ऐसे कलाकार हैं जिनकी फिल्में लगातार फ्लॉप होती रहती हैं लेकिन उनको फिर भी बड़े बैनर की फिल्में मिलती रहती हैं लेकिन कई ऐसे भी कलाकार हैं जो अच्छी फिल्में करते हैं, उनकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर बेहतर करती भी हैं लेकिन उनको अपेक्षाकृत कम फिल्में और प्रचार मिलते हैं। इसमें अगर हम सुशांत सिंह राजपूत का ही उदाहरण लें तो उनकी फिल्म 'छिछोरे' ने करीब ढ़ाई सौ करोड़ रुपए का कोरोबार किया लेकिन उसका इतना शोर नहीं मचा जितना मचना चाहिए था। कहा जाता है कि बॉलीवुड में एक रिच बॉय क्लब है जिसमे बांद्रा से लेकर मालाबार हिल के बीच रहनेवाले कुछ प्रोड्यूसर्स शामिल हैं।  
दरअसल अगर हम देखें तो कैंप तो हमेशा से बॉलीवुड में रहे हैं, पहले निर्देशकों, के अपने अपने कैंप हुआ करते थे। व्ही शांताराम की अपनी पसंद के नायक नायिकाएं हुआ करते थे, अशोक कुमार का अपना खेमा था जिसमें उनकी पसंद के कलाकार होते थे, फिर हिंदी फिल्मों न राज कपूर का खेमा देखा जिसमें उनकी एक खास मंडली होती थी जिसमें गीतकार, संगीतकार से लेकर कलाकार तक हुआ करते थे। कुछ दिनों तक सुभाष घई का कैंप भी चला। बाद में ये कैंप अभिनेताओं के इर्द गिर्द सिमटते गए और अब एक बार फिर से ये निर्देशकों या प्रोड्यूसर्स के कैंपों मे बदल गए हैं। पहले दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन के अलग अलग कैंपों की खबरें आती थीं, फिर अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान के अपने अपने खेमे बने। सलमान खान का अपना एक अलग ही दल होता है। अब धर्मा प्रोडक्शंस के करण जौहर का अपना खेमा है, उनकी अपनी पसंद नापसंद हैं। इसी तरह से यशराज फिल्म्स का अपना खेमा है, अपने कलाकार हैं। यहां तक तो ठीक है कि सभी प्रोडक्शंस हाउस के अपने सितारे हैं। लेकिन जिस ओर कंगना संकेत कर रही है अगर वो बातें सही हैं तो ये बहुत ही खतरनाक है। अपने पसंदीदा कलाकार के करियर को बनाने की कोशिश करना बुरा नहीं है, बुरा तब है जब आप अपने पसंदीदा कलाकार को आगे बढ़ाने के चक्कर में आप किसी प्रतिभाशाली कलाकार को पीछे धकेलने की कोशिश करते हैं।
सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद इस तरह की बातें सामने आ रही हैं कि उनको परेशान किया जा रहा था या वो अपनी उपेक्षा से परेशान थे। इसमें कितनी सच्चाई है ये तो शायद ही कभी सामने आ सकेगा लेकिन जिस तरह से कंगना अपनी आपबीती बता रही है वो बेहद ही हैरान करनेवाला है। ये तो कंगना की हिम्मत है कि ऐसी परिस्थिति में भी वो सामने आकर बेबाकी से अपनी बातें रख रही हैं। अन्यथा जिस तरह से उसको परेशान किया गया या जिस तरह से उसको परेशान किया जा रहा है उसमें तो स्थिति बहुत ही खराब होती है। मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक आत्महत्या करने की कई स्थितियां होती हैं। जब  कोई शख्स आत्महत्या करता है तो उसके लिए बहुत हद तक वो परिस्थितियां जिम्मेदार होती हैं जिनमें वो पले बढ़े और जिनमें वो रह रहे होते हैं। इन्ही परिस्थितियों में पहले वो हेल्पलेस (मजबूर) महसूस करते हैं फिर होपलेस (निराश) हो जाते हैं और उनको लगता है कि उनके सामने अब कोई विकल्प रह नहीं गया है और चरम अवस्था होती है जब व्यक्ति खुद को वर्थलेस (व्यर्थ) समझने लगता है। ये व्यर्थ समझने की स्थिति बेहद खतरनाक होती है। दुनियाभर के मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जब कोई व्यक्ति खुद को वर्थलेस समझने लगता है तो आत्महत्या के करीब पहुंच जाता है। कंगना जिस ओर संकेत कर रही है अगर स्थितियां उतनी हीं भयावह हैं तो कोई भी अपने को वर्थलेस समझने लग सकता है और फिर परिणाम की कल्पना की जा सकती है।
बॉलीवुड में किस हद तक कालिख है उसका संकेत समय समय पर मिलता भी रहा है। दो हजार सोलह में अजय देवगन की फिल्म ‘शिवाय’ और करण जौहर की फिल्म ‘ए दिल है मुश्किल’ को लेकर विवाद हुआ था। तब करण जौहर पर ये आरोप लगा था कि उन्होंने कमाल खान को फिल्म ‘शिवाय’ के खिलाफ प्रचार के काम में लगाया था। तब एक आडियो भी जारी हुआ था जिसमें कथित तौर पर पैसों के लेन देन की बात थी। विवाद इतना बढ़ा था कि करण और काजोल के बीच दोस्ती टूट गई थी। इस विवाद के बाद करण जौहर की आत्मकथा ‘एन अनसूटेबल बॉय छपी’ थी तो उसमें करण ने काजोल से अपनी दोस्ती टूटने की बात का उल्लेख किया था। उसके एक अध्याय में करण ने काजोल के साथ अपने रिश्तों पर लिखा जरूर, तमाम तरह के इशारों में बात की लेकिन साफ तौर पर सिर्फ इतना कहा कि उनका अब काजोल से कोई रिश्ता नहीं है और दोनों की राहें जुदा हो गई है । करण ने माना कि दोनों के बीच कुछ ऐसा हुआ जिसकी वजह से वो बुरी तरह से आहत हैं। करण के मुताबिक दोनों के बीच जो कुछ भी हुआ उसको वो सार्वजनिक नहीं करना चाहते हैं। वो बार बार ये कहते रहे कि पच्चीस सालों का रिश्ता खत्म हो गया । इसके पहले काजोल ने भी इशारों इशारों में करण को कठघरे में खड़ा किया था। खबरें तो इस तरह की भी आई थीं कि अजय देवगन और करण जौहर के बीच फोन पर शिवाय विवाद को लेकर गर्मागर्मी हुई थी। इस तरह के कई वाकए जबतक सामने आते रहते हैं लेकिन अब जिस तरह के कथित आपराधिक गठजोड़ की बातें सामने आ रही हैं वो अच्छे संकेत नहीं हैं। 

   

Saturday, June 13, 2020

साहित्य की नामवरी असावधानी के स्मारक

कोरोना के संकट के दौरान पुस्तकें पढ़कर समय बिताना एक बेहतर विकल्प है। बाजार आदि भले ही खुल गए हैं लेकिन बहुत आवश्यक होने पर ही वहां जाना होता है। लोगों से मिलने-जुलने वाली संस्कृति पर भी फिलहाल विराम लगा हुआ है। पिछले करीब अस्सी दिन में कई किताबें पढ़ने का सुयोग बना। नामवर सिंह की पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ को करीब बीस साल बाद दोबारा पढ़ी। इसी क्रम में नामवर सिंह की ही एक और पुस्तक ‘हिंदी का गद्यपर्व’ पढ़ी। यह किताब नामवर सिंह के जीवित रहते ही 2010 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी और इसका संपादन काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के शिक्षक आशीष त्रिपाठी ने किया है। मैंने इस पुस्तक की पहली आवृत्ति, जो 2011 में प्रकाशित हुई थी, पढ़ी। नामवर सिंह के आलोचनात्मक लेखन के साठ साल पूरे होने के अवसर पर प्रकाशित हुई थी। इसके संपादक आशीष त्रिपाठी ने लिखा है कि ‘यह पुस्तक साक्ष्य है नामवर जी के सक्रिय साठ वर्षों का-एक दस्तावेजी साक्ष्य। इसमें उनका पहला प्रकाशित निबंध है और अभी तक लिखित अंतिम निबंध द्वा सुपर्णा... और पुनर्नवता की प्रतिमूर्ति।‘ संपादक के इन दावों को पढ़कर इस पुस्तक को पढ़ने की रुचि और बढ़ गई।
इस किताब में एक लेख है ‘हिंदी साहित्य के पच्चीस वर्ष’। इस लेख के बारे में बताया गया है कि ‘स्वतंत्रता की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर साहित्य अकादमी ने भारत की विभिन्न भाषाओं में साहित्यिक प्रगति का एक सर्वेक्षण अंग्रेजी में प्रकाशित किया गया था, इंडियन लिटरेर सिंस इंडिपेंडेंस। इस ग्रंथ के लिए हिंदी साहित्य का सर्वेक्षण किया था डॉ नामवर सिंह ने। उस सर्वेक्षण का हिंदी रूप।‘ इस पूरे लेख में कई त्रुटियां हैं। नामवर सिंह जैसी पकी आंखों वाले आलोचक जो तथ्यों को लेकर बहुत सावधान रहते थे उनसे एक लेख में इतनी तथ्यात्मक गलतियां चौंकाती हैं। इस लेख (पृ.71) में उन्होंने निर्मल वर्मा की मशहूर कहानी ‘परिंदे’ का प्रकाशन वर्ष 1960 बताया है। जबकि इस कहानी का प्रकाशन 1957 में हुआ था। प्रेमचंद के स्मृति दिवस 8 अक्तूबर 1957 को ‘हंस’ का साहित्य संकलन-1, प्रकाशित हुआ था, जिसके संपादक बालकृष्ण राव और अमृतराय थे। इस संकलन में पहली बार निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ का प्रकाशन हुआ था। आश्चर्य की बात ये है कि ‘हंस’ के उस संकलन में नामवर सिंह का भी लेख प्रकाशित है। सिर्फ 15 वर्ष के अंतराल में नामवर सिंह से ये चूक हो जाती है। वो भी तब जब नामवर सिंह ने निर्मल की इस कहानी को ‘नई कहानी की पहली कृति’ घोषित करते हुए एक लंबा लेख लिखा था। अगर नामवर सिंह से ये चूक हुई है तो वो एक बेहद असावधान आलोचक थे और अगर अनुवाद और संपादन में ये भूल हुई है तो ये अक्षम्य है। महत्वपूर्ण ये है कि इस पुस्तक का प्रकाशन नामवर सिंह के जीवित रहते हो गया था, लेकिन इस भूल की ओर ध्यान नहीं दिया गया। साहित्य के शोधार्थियों को ध्यान में रखकर अगर विचार किया जाए तो ये गलती बहुत बड़ी नजर आती है। 
इस पुस्तक में सिर्फ एक गलती नहीं है बल्कि अनेक तथ्यात्मक भूलें हैं। अपने इसी लेख में नामवर सिंह लिखते हैं कि ‘रोमांटिक मोह के युग में भी मुक्तिबोध मोहभंग के प्रयास करते रहे। उन्होंने 1953 में यह लिखा था कि ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’।‘  नामवर सिंह अपने जीवनकाल में लगातार मुक्तिबोध की कविताओं पर बोलते-लिखते रहे थे। मुक्तिबोध को वामपंथी विचारधारा के अग्रणी कवि के तौर पर स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील भी रहे। वामपंथी विचारधारा के कवि के तौर पर मुक्तिबोध का रेखांकन करते-करते नामवर सिंह इस कविता का प्रकाशन वर्ष लिखने में चूक कर बैठे। मुक्तिबोध की ये प्रसिद्ध कविता ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ पटना से प्रकाशित काव्य संकलन ‘विविधा’ में छपी थी जिसका प्रकाशन 1956-57 में हुआ था। इस काव्य संकलन के संपादक राजेन्द्र किशोर और रणधीर सिन्हा थे। इस एक तथ्य के आधार पर भी यह कहा जा सकता है कि नामवर सिंह असावधान आलोचक थे। साहित्य के इतिहास में तिथियों का बहुत महत्व होता है और एक भी गलत तिथि का उल्लेख कालखंडों के आकलन के निष्कर्षों को गलत कर सकता है। इसी पुस्तक में एक लेख है ‘एक अन्तर्यात्रा के प्रदेश’ इस लेख की पहली पंक्ति है सन 1884 में भारतेन्दु हरिश्चंद्र का अवसान हुआ और रामचंद्र शुक्ल का उदय। ये तो बहुत ही बड़ी चूक है क्योंकि भारतेन्दु हरिश्चंद्र का निधन 1884 में नहीं बल्कि 1885 में हुआ। इसके आलोक में देखें तो पहली पंक्ति से वो जो स्थापित करना चाहते थे उसकी बुनियाद ही गलत थी। पता नहीं किन परिस्थितियों में नामवर सिंह ने अपने लेख में भारतेन्दु का अवसान उनकी मृत्यु के पहले ही मान लिया था। इसी लेख में ‘हंस’ के आत्मकथा अंक का प्रकाशन वर्ष 1931 बताया गया है जबकि इसका प्रकाशन 1932 में हुआ था। बाद में बनारस के एक प्रकाशक ने भी ‘हंस’ के इस अंक को प्रकाशित किया था। इस पुस्तक में तथ्यात्मक भूलों के अलावा प्रूफ और नाम में भी ढेरों गलतियां हैं, ईश्वरचंद्र को रमेशचंद्र, नागेन्द्र को नरेन्द्र, रामकुमार को राजकुमार कह दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि न तो संपादक ने और न ही प्रकाशक ने तथ्यों के अलावा लेखों में उल्लिखित नामों को जांचने का कष्ट किया। 
2019 में राजकमल प्रकाशन से ही नामवर जी के साक्षात्कारों की एक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसका नाम है ‘आमने सामने’। इस पुस्तक का संकलन संपादन नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह ने किया। इसमें विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा किया गया नामवर सिंह का एक साक्षात्कार प्रकाशित है जिसका शीर्षक है, ‘भैरव का सोंटा’। इसमें एक जगह विश्वनाथ त्रिपाठी साहित्य अकादमी के पुरस्कारों को छोड़ने और न छोड़ने पर उनकी राय पूछते हैं। इसके उत्तर में नामवर सिंह अपनी बात रखते हैं कि ये संस्था लेखकों की है, सरकार से क्या लेना देना। अपनी बात रखने के क्रम में वो बताते हैं कि साहित्य अकादमी का जब गठन हुआ तो कृष्णा कृपलानी इसकी सचिव थीं। इसको पढ़ते हुए स्पष्ट है कि नामवर सिंह ये कह रहे थे कि कृष्णा कृपलानी महिला थीं। जबकि साहित्य अकादमी से प्रकाशित डी एस राव की पुस्तक ‘फाइव डिकेड्स’ में भी और इसके हिंदी अनुवाद में भी इस बात का साफ उल्लेख है उनका नाम कृष्ण कृपलानी था और वो पुरुष थे। भारत सरकार ने 1954 में उनको दो वर्षों के लिए साहित्य अकादमी के पहले सचिव के रूप में नियुक्त किया था। बाद में अकादमी के कार्यकारी मंडल ने उनको कई सेवा विस्तार दिए और वो 1971 तक साहित्य अकादमी के सचिव पद पर बने रहे।  अब ये इतनी हास्यापद बात है कि नामवर सिंह की छवि को देखते हुए इसको स्वीकार कर पाना थोड़ा कठिन है कि नामवर सिंह को ये नहीं पता होगा कि साहित्य अकादमी के पहले सचिव पुरुष थे, महिला नहीं। पता तो इस बात का विश्वनाथ त्रिपाठी को भी होना ही चाहिए। फिर एक संपादक भी हैं जिन्होंने इस तथ्य पर गौर नहीं किया, क्या इतनी असावधानी होनी चाहिए थी ? और सबसे उपर तो प्रकाशक की भी जिम्मेदारी बनती है। एक अच्छा आलोचक वो होता है जिसकी स्मृति बहुत अच्छी हो, वो आलसी न हो और तथ्यों की जांच करने के लिए सिर्फ अपनी स्मृति पर भरोसा न रखे और संदर्भ ग्रंथ देखने के लिए बार बार अपनी मेज से उठे। क्या नामवर इतने सतर्क आलोचक थे? लगता तो नहीं।   


Thursday, June 11, 2020

अंगूठी और समंदर का खामोश अफसाना


कुछ दिनों पहले जब ऋषि कपूर का निधन हुआ था तो मनोरंजन चैनलों पर ऋषि कपूर के पुराने इंटरव्यू सोशल मीडिया पर वायरल हुए। कपिल शर्मा के शो में ऋषि और नीतू सिंह वाला एपिसोड भी खूब चला। उस एपिसोड में जब ऋषि कपूर की प्रेमिकाओं की बात हो रही थी तो कपिल शर्मा ने नीतू सिंह से एक अंगूठी के बारे में पूछा, जब नीतू सिंह ने कहा कि वो उनके पास है तो ऋषि ने कहा कि छोड़ो वो किस्सा यार वो किसी के पास नहीं है वो तो समंदर में है। दरअसल ये बात हो रही थी ऋषि कपूर की उस अंगूठी के बारे में जो उनको उनकी पहली प्रेमिका यासमीन मेहता ने अपने प्रेम की निशानी के तौर पर दी थी। ये एक बेहद साधारण अंगूठी थी लेकिन उसपर एक खास तरह का चिन्ह बना हुआ था। ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा खुल्लम खुल्ला में लिखा है कि जब वो लोग बॉबी फिल्म की शूटिंग कर रहे थे तो डिंपल ने उस अंगूठी को उनकी उंगुली से निकालकर अपनी उंगली में पहन लिया था। फिर डिंपल ने उसको लौटाया नहीं और उस अंगूठी को पहनती रही। बॉबी फिल्म की शूटिंग के दौरान ही राजेश खन्ना ने डिंपल को देखा और उसको अपना दिल दे बैठे। उस समय राजेश खन्ना सुपर स्टार थे और उनकी लोकप्रियता चरम पर थी। राजेश खन्ना ने डिंपल को प्रपोज किया और दोनों शादी के बंधन में बंध गए। लेकिन इस बीच एक बेहद दिलचस्प किस्सा हुआ। जब राजेश खन्ना ने डिंपल को प्रपोज करने के लिए उनका हाथ अपने हाथ में लिया तो उनको वो अंगूठी दिखाई दी जो डिंपल ने ऋषि की उंगली से उतारकर अपनी उंगली में पहन रखा था। राजेश खन्ना को डिंपल की खूसूरत उंगली में वो अंगूठी नहीं भायी और उन्होंने डिंपल के हाथ से उस अंगूठी को उतारकर जूहू के अपने घर के नजदीक समंदर में उछाल दिया। ऋषि कपूर और यासमीन के प्यार की निशानी जो डिंपल की उंगली में चमकती थी वो समंदर के आगोश में समा गई। उस वक्त फिल्मी गॉसिप छापने वाली पत्रिकाओं में छपा भी था, राजेश खन्ना ने ऋषि कपूरी की अंगूठी समंदर में फेंकी। लेकिन ऋषि ने साफ तौर पर कहा है कि उनको डिंपल से कभी प्यार नहीं था, न ही उनको प्रति आकर्षित थे। हां उन्होंने इतना जरूर माना कि वो डिंपल को लेकर थोड़े पजेसिव थे।
बॉलीवुड सितारों की अंगूठी, उनकी मोहब्बत और समंदर का ये रोमांटिक जिक्र पहली बार नहीं हुआ। इसके पहले देवानंद ने भी अपनी आत्मकथा रोमासिंग विद लाइफ में भी किया है। देवानंद और सुरैया का प्रेम परवान चढ़ रहा था लेकिन सुरैया की नानी को ये पसंद नहीं आ रहा था और उन्होंने साफ तौर पर सुरैया को ये संदेश दे दिया था कि अगर ये प्रेम सबंध आगे बढ़ा तो या तो सुरैया रहेगी या उनकी नानी। लेकिन सुरैया की मां अपनी बेटी और देवानंद के प्यार के पक्ष में थी। जब सुरैया के प्यार पर पहरा लगा था तो उनकी मां ने ही देवानंद और सुरैया को रात साढे ग्यारह बजे के बाद अपने अपार्टमेंट की छत पर मिलने का इंतजाम किया था। देवानंद ने अपनी आत्मकथा में बेहद रोचक तरीके से इस मुलाकात का उल्लेख किया है। उसी मुलाकात में सुरैया ने देवानंद से अपने प्रेम का इजहार किया था और उनसे आलिंगबद्ध होकर आई लव यू कहा था। प्यार के इस मोड़ पर देवानंद इतने खुश थे कि उन्होंने अगले ही दिन मुंबई के झवेरी बाजार से सुरैया के लिए एक एक बेहद खूबसूरत अंगूठी खरीदी। अब समस्या ये थी कि सुरैया तक अंगूठी पहुंचे कैसे। देवानंद फोन करें तो सुरैया की नानी उठाएं और ये फोन रख दें। संपर्क का कोई सूत्र नजर नहीं आ रहा था। अचानक देवानंद को अपने सिनेमेटोग्राफर मित्र दिवेचा याद आए। दिवेचा पहले भी देवानंद और सुरैया के बीच प्रेम-पत्रों के आदान प्रदान का माध्यम बन चुके थे। जब दिवेचा को देवानंद ने फोन किया तो उन्होंने पूछा कि क्या फिर से प्रेम-पत्र पहुंचाना है। एक दिन पहले ही सुरैया से मिल चुके देवानंद ने बेहद खुशी के साथ कहा था कि नहीं इस बार इंगेजमेंट रिंग पहुंचाना है। फिर दिवेचा ने देवानंद की वो अंगूठी सुरैया तक पहुंचा दी। अब देवानंद की खुशी सातवें आसमान पर थी और वो ये मानकर बैठे थे कि उनकी इंगेजमेंट हो गई लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। सुरैया की नानी और उनके रिश्तेदारों ने मिलकर सुरैया पर इतना दबाव बनाया कि वो देवानंद से संबंध तोड़ने पर राजी हो गई। सुरैया जब इस बात के लिए राजी हो गई तो एक दिन वो देवानंद की अंगूठी लेकर समदंर के किनारे पहुंची। उसे अपनी उंगली से उतारा और आखिरी बार देखा, देवानंद के साथ के अपने प्यार को याद किया और फिर अंगूठी को सागर की लहरों पर उछाल दिया। उन लहरों ने देवानंद और सुरैया के प्यार की निशानी को अपने आगोश में ले लिया। फिर समंदर शांत हो गया और सुरैया अपने घर लौट आई।

Saturday, June 6, 2020

साहित्य के ‘लाइव काल’ का संकट

कोरोना वायरस के संकट के बीच जब पूर्ण लॉकडाउन चल रहा था और साहित्यिक सभाएं और गोष्ठियां बंद हो गई थीं, तो हिंदी साहित्य से जुड़े लेखकों ने फेसबुक पर एकल गोष्ठियां करनी शुरू कर दीं। कई साहित्यिक संस्थाओं और प्रकाशकों ने भी हिंदी की विभिन्न विधाओं के लेखकों का लाइव करना शुरू किया। धीरे धीरे तो ऐसा लगा कि संपूर्ण हिंदी साहित्य लाइव मोड में ही आ गया है। हर समय किसी ने किसी फेसबुक पेज पर या लोगों के व्यक्तिगत अकाउंट पर लाइव करते लेखक नजर आने लगे। जब भई आप अपने फेसबुक अकाउंट में लॉगइन करें तो आपकी टाइमलाइन पर लाइव होता दिखने लगा। क्या युवा, क्या अधेड़, क्या बुजुर्ग, सभी वय के लेखक फेसबुक पर अपनी मन की बात करते नजर आने लगे। कुछ लेखकों ने तो दिन में दो वक्त लाइव करना शुरू दिया। फेसबुक पर साहित्यिक लाइव की मानो बाढ़ सी आ गई। इस स्थिति को देखते हुए यह भी कहा गया कि आज अगर नामवर सिंह जीवित होते तो बेहद खुश होते क्योंकि जिस वाचिक परंपरा को उन्होंने अपनाया और लेखन को छोड़कर व्याख्यान की ओर गए उसको पल्लवित और पुष्पित होते देखकर वो आनंद से भर उठते। लेकिन कोरोना संकट के इस दौर में लेखकों के लाइव को देखने के बाद एक महत्वूपूर्ण तथ्य को भी रेखांकित किया जाना चाहिए। दरअसल आभासी माध्यम बेहद पारदर्शी है, वो हाथ के हाथ ये बता देता है कि आपको कितने लोग सुन रहे हैं या आपके लाइव का वीडियो कितने लोगों तक पहुंचा। तो हम जिस महत्वपूर्ण तथ्य की बात कह रहे थे वो ये कि बुजुर्ग और वरिष्ठ लेखकों को सुनने के लिए ही ज्यादा श्रोता या दर्शक फेसबुक पर पहुंचे। इनकी तुलना में युवाओं को बहुत ही कम दर्शक या श्रोता मिले। लगभग नगण्य। हिंदी की वरिष्ठ लेखिका ऊषाकिरण खान हों या मैत्रेयी पुष्पा या फिर विनोद कुमार शुक्ल या अशोक वाजपेयी ही क्यों न हों, इनको उन युवा लेखकों के मुकाबले ज्यादा लोगों ने सुना और देखा जो खुद को साहित्य का सितारा मानते हैं। अगर इस संख्या को लोकप्रियता का पैमाना माना जाए तो हमारे वरिष्ठ लेखक अब भी युवाओं पर भारी हैं। हिंदी साहित्य की आभासी दुनिया में जो भी उपस्थिति हो उसको ही पैमाना मानें तो ये बात और स्पष्ट हो जाती है। बहुत कम युवा लेखक ऐसे रहे जिनको सुनने के लिए सौ दर्शक फेसबुक पर लाइव जुड़े या फिर बाद में उनके वीडियो की पहुंच एक हजार लोगों तक हुई। साहित्य के भविष्य के लिए यह बहुत ही चिंता की बात है।
इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि हमारे युवा लेखक जो खुद को साहित्य का सितारा मानते हैं, श्रेष्ठता बोध इतना कि वो अपने आगे न तो रामचंद्र शुक्ल को कुछ मानते हैं और न ही प्रेमचंद को। एक वाक्य बोलकर या लिखकर अपने पूर्वज लेखकों का सब किया धरा लीप-पोत कर रखने की कोशिश करते हैं। हिंदी साहित्य के इसी लाइव काल में फेसबुक पर एक निरर्थक बहस चली जिसमें आचार्य रामचंद्र शुक्ल को लेकर न सिर्फ अनाप-शनाप कहा गया बल्कि उनके योगदान को खारिज करने जैसी बातें भी हुईं। रामचंद्र शुक्ल को खारिज करने के लिए कम से कम उनका लिखा पढ़ना आवश्यक है। बगैर रामचंद्र शुक्ल को पढ़े, सुनी सुनाई बातों के आधार पर और उनके नाम में लगे शुक्ल के आधार पर उनपर हमले किए गए। जिन लोगों ने भी रामचंद्र शुक्ल पर हमले किए या उनके साहित्यिक अवदान को न्यूनतम बताने की कोशिश की उनकी टिप्पणियां बेहद स्तरहीन और मूर्खतापूर्ण थीं। शुक्ल जी को कबीर विरोधी करार देनेवाले फेसबुक वीर अतिउत्साह में शुक्ल जी को ब्राह्मणवादी आलोचक तक करार देने में नहीं हिचके। काशी हिंदू विश्वविद्लय से जब हजारी प्रसाद द्विवेदी जी को जाना पड़ा था तब वो कुछ पंक्तियां कहा करते थे, उनमें से एक पंक्ति क्षमा सहित थोड़े बदलाव के साथ कि ‘वे द्विज और होंगे जो उल्लू के नखों की चोट से घायल हो जाते हैं।‘ 
आचार्य रामचंद्र शुक्ल की स्थापनाओं पर प्रश्न खड़े करने के लिए नामवर सिंह को भी ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जैसी पुस्तक लिखनी पड़ी लेकिन उसमें भी नामवर सिंह ने बहुत संभलकर शुक्ल जी की आलोचना की। उद्धरणों के सहारे ही शुक्ल जी के लेखन पर सवाल उठाए। कई युवा लेखक आत्ममुग्धता में इतने पर भी नहीं रुकते हैं बल्कि वो इस बात में गौरव महसूस करते हैं कि वो हिंदी परंपरा को नहीं जानते हैं। वो बहुत गर्व से कहते हैं कि वो पंत और महादेवी को नहीं जानते या सिर्फ इतना जानते हैं कि वो हिंदी में ‘कुछ’ लिखते थे। इस तरह की टिप्पणियां अहंकारी लग सकती हैं पर दरअसल ये अज्ञान का सार्वजनिक प्रदर्शन है। अस्वीकार का साहस भी उन लेखकों के पास ही होता है जिसे अपनी परंपरा का ज्ञान होता है। नामवर सिंह ने भी दूसरी परंपरा की खोज लिखा था तो उसकी भूमिका में उल्लेख किया था, ‘अनपेक्षित प्रसंग वे कहे जा सकते हैं जहां अन्य विद्वानों की आलोचना है, लेकिन उसके बिना द्विवेदी जी के वैचारिक संघर्ष का संदर्भ अस्पष्ट और अमूर्त रह जाता। इसलिए शिष्टता पर स्पष्टता को तरजीह क्षम्य होनी चाहिए। कहने की आवश्यकता नहीं कि पूर्वपक्ष के ऋषि कुछ कम पूज्य नहीं-यह एहसास मुझमें है। लेकिन इन दिनों तो शिष्टता पर मूर्खता को तरजीह मिल रही है।‘ यह भी एक वजह हो सकती है कि जिससे उन युवा लेखकों को दर्शक या श्रोता नहीं मिल पा रहे हैं जिनको हिंदी साहित्य की परंपरा का ज्ञान नहीं है इसलिए जब वो विषय विशेष को उठाते हैं तो उसमें न तो गंभीरता रहती है और न ही कोई ऐसा रोचक प्रसंग जो दर्शक या श्रोता को समृद्ध कर सके। दरअसल लाइव अपने श्रोताओं से पाठकों से या दर्शकों के समझ जाना और उनको बांधे रखना एक अलग ही किस्म की कला है। या तो आपकी वक्तृत्व कला ऐसी हो जो दर्शकों को बांध सके या फिर आपके कहने में ऐसा कंटेंट हो जिसको सुनने के लिए लोग वक्ता के साथ जुड़े रह सकें। इन दोनों ही कसौटी पर हमारे दौर के वरिष्ठ लेखक युवाओं पर भारी पड़ते हैं।
किसी भी साहित्य में चलने वाले विमर्श, साहित्यकारों के बीच के नोंक-झोंक, हास परिहास और रचनात्मक आक्रमण उसकी जीवंतता को भी इंगित करते हैं लेकिन अगर फेसबुक पर चलनेवाले इन लाइव को हिंदी साहित्य का विमर्श मान लें तो जीवंतता कम आत्ममुग्धता ज्यादा दिखाई देती है। इसके अलावा एक और प्रवृत्ति है जिसको भी रेखांमकित करना आवश्यक है वो है युवा लेखकों में अपनी रचनाओं की कमी के बारे में सुनने का धैर्य नहीं होना। अपनी रचना में कमी या कमजोरी को वो सुनना नगीं चाहते हैं और अगर कोई वरिष्ठ साहित्यकार इस ओर ध्यान दिलाना चाहता है तो वो अपने मित्रों के साथ उनपर ही टूट पड़ते हैं। आलोचना और आलोचक को लेकर एक अजीब किस्म की उदासीनता और उपेक्षा का भाव दिखाई देता है। ज्यादातर युवा लेखक फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को आलोचकों की जगह रखते हैं और इसको लिखकर स्वीकार भी करते हैं। नतीजा यह है कि अभी अभी लिख रही युवा पीढ़ी का कोई अपना आलोचक तैयार नहीं हो सका जो उनकी रचनाओं के अर्थ खोलकर पाठकों तक पहुंचा सके। ऐसी परिस्थिति में अगर कोई युवा लेखक अपनी रचना को लेकर पाठकों के बीच भी जाता है और लाइव करता है तो उसको भी अपेक्षित संख्या नहीं मिल पाती है। इन स्थितियों पर विचार करने से स्थिति स्पष्ट होगी। 

Thursday, June 4, 2020

प्रयोगधर्मा फिल्मकार की कमी खलेगी

बासु भट्टाचार्य जब हिंदी के मशहूर उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु की कृति ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’ पर आधारित फिल्म ‘तीसरी कसम’ का निर्देशन कर रहे थे तो उनके साथ सहायक निर्देशक के रूप में जुड़े थे बासु चटर्जी। जब बासु चटर्जी ने फिल्म बनाने का फैसला लिया तो उन्होंने चुना हिंदी के उपन्यासकार राजेन्द्र यादव की कृति ‘सारा आकाश’ को। यह महज संयोग था एक प्रयोग इसका तो पता नहीं लेकिन बासु चटर्जी की इस फिल्म को मृणाल सेन की फिल्म ‘भुवन शोम’ के साथ समांतर सिनेमा की शुरुआती फिल्म माना जाता है। हिंदी फिल्मों की दुनिया में जब राजेश खन्ना का डंका बज रहा था, राजेश खन्ना की फिल्मों के रोमांस का जादू जब हिंदी के दर्शकों के सर चढ़कर बोल रहा था, लगभग उसी दौर में हिंदी फिल्मों में समांतर सिनेमा का बीज भी बोया जा रहा था। एक तरफ राजेश खन्ना का सपनों की दुनिया में ले जानेवाला रोमांस था तो दूसरी तरफ आम मध्यमवर्गीय परिवारों का अपने संघर्षों के बीच प्रेम का अहसास दिलानेवाली फिल्में। बासु चटर्जी ने अपनी पहली फिल्म सारा आकाश में इस तरह के प्रेम का ही चित्रण किया। जहां प्रेम तो है पर अपने खुरदरे अहसास के साथ। फिल्म ‘सारा आकाश’ को वो राजेन्द्र यादव के उपन्यास के पहले ही भाग पर केंद्रित कर बना रहे थे और राजेन्द्र यादव से लगातार उसपर ही चर्चा करते थे। राजेन्द्र यादव ने तब एक दिन बासु चटर्जी से कहा था कि यार तुम मेरे उपन्यास पर बालिका वधू सा क्या बना रहे हो? दरअसल राजेन्द्र यादव इस बात को लेकर चिंतित थे कि अगर उपन्यास पहले भाग पर केंद्रित रहा तो उनकी पूरी कहानी फिल्म में नहीं आ पाएगी। लेकिन बासु चटर्जी ने उनको समझा लिया था। बासु चटर्जी ने कई फिल्मों की पटकथा खुद ही लिखी थी क्योंकि वो मानते थे कि निर्देशक कहानी को सबसे अच्छे तरीके से समझ सकता है।
बासु चटर्जी ने फिर मन्नू भंडारी की कहानी ‘ये सच है’ पर ‘रजनीगंधा’ फिल्म बनाई जो दर्शकों को खूब पसंद आई। इस फिल्म में ही अमोल पालेकर और दिनेश ठाकुर जैसे आम चेहरे मोहरेवाले नायकों को लीड रोल देने का साहसी कदम बासु चटर्जी ने उठाया था। इस फिल्म से ही विद्या सिन्हा को अभिनेत्री के तौर पर पहचान मिली। फिर तो वो इस तरह के कई अन्य प्रयोग करते रहे। इसके बाद उन्होंने अमोल पालेकर और जरीना बहाव को लेकर ‘चितचोर’ बनाई। एक और प्रयोग बासु चटर्जी ने अपनी फिल्म ‘शौकीन’ में किया। इस फिल्म में तीन बुजुर्ग अशोक कुमार, ए के हंगल और उत्पल दत्त को लेकर उन्होंने बुजुर्ग मन के मनोविज्ञान को बहुत ही कलात्मक और सुंदर तरीके से दर्शकों के सामने पेश किया। शौकीन में बुजुर्ग मन के उस हिस्से को उभारा गया है जहां रोमांस शेष रह जाता है,अपने मन की करने की ललक बची रह जाती है। बासु चटर्जी ने कई कमर्शियल फिल्में भी की जिनमें अमिताभ बच्चन के साथ ‘मंजिल’ और राजेश खन्ना के साथ ‘चक्रव्यूह’ और अनिल कपूर के साथ ‘चमेली की शादी’ जैसी फिल्में भी शामिल हैं। 
एक निर्देशक के तौर पर बासु चटर्जी बहुत ही सख्त माने जाते हैं। सेट पर वो किसी तरह की अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं करते थे। एक फिल्म पत्रिका के संपादक रहे अरविंद कुमार ने बासु चटर्जी के सहायक के हवाले से एक वाकया लिखा है,  ‘दिल्लगी’ की शूटिंग के दिनों की बात है। शिफ़्ट सुबह नौ से चार तक थी। शत्रुघ्न सिन्हा को सुबह आना था वो आए शाम के चार से कुछ पहले। बासु चटर्जी ने किसी तरह अपने को संयमित किया और शत्रुघ्न सिन्हा को बोले “कॉस्ट्यूम पहन आएं।” शत्रुघ्न सिन्हा जबतक तैयार होकर आए इधर बासु चटर्जी और कैमरा निर्देशक मणि कौल में बहस हो रही थी। मणि कह रहे थे, “आधे घंटे में सूरज ढल जाएगा, तो दिन का यह सीन कैसे पूरा कर लेंगे आप?” बासु ने शत्रुघ्न को देखते ही कहा, अब तो पैकअप करना होगा... कल कोशिश करते हैं’ निर्देशक का कठोर और सहज संदेश। अगले दिन शत्रुघ्न सिन्हा ठीक दस बजे सेट पर मौजूद थे। 
बासु चटर्जी ने अपनी दूसरी पारी टीवी के साथ शुरू की थी। अभी हाल ही लॉकडाउन के दौरान जिस सीरियल ‘व्योमकेश बक्षी’ को दर्शकों ने खूब पसंद किया उसे भी बासु दा ने ही बनाया था। इलके अलावा बासु चटर्जी ने ‘रजनी’, ‘दर्पण’ और ‘कक्काजी कहिन’ जैसे टीवी सीरियल का भी निर्माण किया। वो मानते थे कि टी वी का एक्सपोजर बहुत है और उसको बहुत सारे लोग एक साथ देखते हैं। साथ ही वो ये भी कहते थे कि टीवी की इतनी ज्यादा पहुंच है कि कुछ ऐसा बनाना जो एकसाथ इतने सारे लोग को पसंद आए, बड़ी चुनौती है। बासु चटर्जी के निधन से हिंदी सिनेमा ने एक प्रयोगधर्मा वयक्तित्व को खो दिया जिसक जगह की भारपाई जल्दी संभव नहीं। 

Monday, June 1, 2020

न वो राज रहे, न वो राजघाराना

1942 में केदार शर्मा मुंबई के रंजीत स्टूडियोज के लिए एक फिल्म बना रहे थे, विषकन्या, जिसमें पृथ्वीराज कपूर, साधना बोस और सुरेन्द्र नाथ प्रमुख भूमिका में थे। केदार शर्मा और पृथ्वीराज कपूर में कलकत्ता (अब कोलकाता) के दिनों से बहुत दोस्ती थी और दोनों एक दूसरे के सुख-दुख के साथी थे। बाद में दोनों कोलकाता से मुबई आ गए थे। फिल्म विषकन्या की शूटिंग के दौरान केदार शर्मा ने इस बात को नोटिस किया कि पृथ्वीराज कपूर जब भी शूटिंग के लिए सेट पर पहुंचते हैं तो वो बहुत उदास रहते हैं। शूटिंग के पहले और बाद में भी गुमसुम रहते हैं और सेट पर किसी से बातचीत नहीं करते हैं। केदार शर्मा लगातार इस बात को नोट कर रहे थे लेकिन पृथ्वीराज कपूर से पूछ नहीं पा रहे थे। एक दिन अवसर मिल ही गया, पृथ्वीराज कपूर एक शॉट देने के बाद सेट पर एक कोने में जाकर बैठ गए। ये देखकर केदार शर्मा उनके पास पहुंचे उनका हाथ पकड़कर बोले कि अगर इसमें बहुत व्यक्तिगत कुछ नहीं हो तो मैं आपकी उदासी का कारण जानना चाहता हूं। मुझे लगता है कि आप किसी खास वजह से बेहद परेशान हैं। आप मुझपर भरोसा रखकर उदासी की वजह बताइए मैं उसको दूर करने की कोशिश करूंगा। इतना सुनकर पृथ्वीराज कपूर अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सके और जोर से केदार का हाथ पकड़कर बोले, केदार! मैं अपने बेटे राजू को लेकर बहुत चिंतित हूं। किशोरावस्था की उलझनों में वो मुझे भटकता हुआ लग रहा है, मैंने उसको पढ़ने के लिए कॉलेज भेजा लेकिन पर वहां पढ़ाई से ज्यादा वो लड़कियों में खो गया है। इतना बोलकर पृथ्वीराज कपूर चुप हो गए। केदार शर्मा ने पृथ्वीराज कपूर के कंधे पर अपना हाथ रखकर कहा कि अपने बेटे को मुझे सौंप दो लेकिन एक वादा करो कि मेरे और उसके बीच आप दखलअंदाजी नहीं करोगे। मैं उसको रास्ते पर लाऊंगा ठीक उसी तरह जिस तरह से कोई गुरू अपने चेले को लेकर आता है। मैं उसको अपना असिस्टेंट डायरेक्टर बनाने के लिए तैयार हूं। पृथ्वीराज कपूर का दुख कुछ कम हुआ। 
अगले दिन वो अपने बेटे राजू को लेकर केदार शर्मा के पास पहुंचे। कपूर खानदान की परंपरा के मुताबिक राजू ने केदार शर्मा के पांव छूकर आशीर्वाद लिया। केदार शर्मा ने राजू को उनके बचपन के दिनों की याद दिलाई जब वो कोलकाता में रहते थे और अपने पिता के साथ स्टूडियो आया करते थे। एक दिन जब केदार शर्मा रील देख रहे थे तो राजू ने उनसे जानना चाहा था कि रील में कैद चित्र पर्दे पर चलने कैसे लगते हैं। तब केदार शर्मा ने राजू को कहा था कि एक दिन मैं तुम्हें इसका रहस्य बताऊंगा। अब केदार शर्मा ने राजू से कहा कि रील का रहस्य जानने का समय आ गया है। तुम अब मेरे साथ काम करो आज से तुम मेरे असिस्टेंट डायरेक्टर हो। इसके बाद की कहानी बहुचर्चित है कि कैसे केदार शर्मा ने राजू को एक जोरदार थप्पड़ जड़ा था और फिर उसके बाद अपनी फिल्म में काम करने का ऑफर दिया था। जब राजू को केदार शर्मा ने फिल्म का ऑफर दिया था तब राजू ने उनसे कहा था कि हां अंकल! मैं कैमरे के आगे काम करना चाहता हूं और दुनिया को अपनी अभिनय की प्रतिभा दिखाना चाहता हूं। इतना सुनते ही केदार शर्मा ने राजू को गले लगा लिया था। गले लगते ही राजू ने उनकी कान में कहा था, प्लीज अंकल प्लीज मेरे साथ हीरोइन के तौर पर बेबी मुमताज तो रख लेना, वो बेहद खूबसूरत है। इसी बेबी मुमताज को लोगों ने बाद में मधुबाला के नाम से जाना। केदार शर्मा ने वादा तो कर दिया लेकिन बाद में बेबी मुमताज को फिल्म में लेने के लिए उनको अपने पार्टनर की नाराजगी भी झेलनी पड़ी थी। खैर ये अलहदा प्रसंग है जिसकी विस्तार से चर्चा केदार शर्मा ने अपनी आत्मकथा में की है।   
पर कौन जानता था कि जो बालक कोलकाता के स्टूडियो में केदार शर्मा से रील का रहस्य जानना चाहता था, जो किशोरावस्था में कॉलेज में पढ़ाई न करके अन्य सभी बदमाशियां किया करता था, जिसके पिता उसके करियर की चिंता में सेट पर उदास बैठा करते थे, वो रील की इस दुनिया में इतना डूब जाएगा, उसकी बारीकियों को इस कदर समझ लेगा या फिर रील में चलने फिरनेवाले इंसान के व्याकरण को इतना आत्मसात कर लेगा कि पहले अभिनेता राज कपूर के तौर पर और बाद में शोमैन राज कपूर के रूप में उनकी ख्याति पूरे विश्व में फैल जाएगी। आज राज कपूर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन रील की उनकी समझ, रील के रूप में उनकी सृजनात्मकता आज भी लोगों को चमत्कृत करती है।