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Sunday, August 24, 2014

अनंत बौद्धिकता के मूर्ति को सलाम

जिस शहर को यू आर अनंतमूर्ति ने नया नाम दिया था। बैंगलोर को बेंगलुरू बनाने कीमहिम छेड़ी थी । अपने उसी शहर में कन्नड के महान साहित्यकार अनंतमूर्ति ने अंतिम सांसें ली । यू आर अनंतमूर्ति का मानना था कि बैंगलोर गुलामी का प्रतीक है और इस नाम से औपनिवेशिकता का बोध होता है, लिहाजा उन्होंने लंबे संघर्ष के बाद बेंगलुरू नाम दिलाने में सफलता हासिल की थी । कई सालों से नियमित डायलिसिस पर चल रहे अनंतमूर्ति पिछले कई दिनों से किडनी में तकलीफ की वजह से अस्पताल में थे । शुक्रवार को उनकी तबीयत इतनी बिगड़ी की उनको बचाया नहीं जा सका । यू आर अनंतमूर्ति अपने जीवन के इक्यासी वर्ष पूरे कर चुके थे और दिसंबर में बयासी साल के होनेवाले थे । अनंतमूर्ति का जाना कन्नड साहित्य के अलावा देश के बौद्धिक ताकतों का कमजोर होना भी है । अनंतमूर्ति देश के उन बौद्धिक शख्सियतों में थे जिनकी पूरे देश को प्रभावित करने वाले हर अहम मसले पर राय होती है, लेकिन इन बौद्धिकों में से कम ही लोग अपनी इस राय को सार्वजनिक करते हैं । अनंतमूर्ति उन चंद लोगों में थे जो अपनी राय सार्वजनिक करने में हिचकते नहीं थे । गांधीवादी समाजवादी होने के बावजूद यू आर अनंतमूर्ति किसी विचारधारा या वाद से बंधे हुए नहीं थे । उन्होंने जहां गलत लगा वहां जमकर प्रहार किया । सच कहने के साहस का दुर्लभ गुण उनमें था । जिस तरह से उन्होंने कट्टर हिंदूवादी ताकतों का जमकर विरोध उसी तरह से उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से समाज में जाति प्रथा जैसी कुरीति और समाज में ब्राह्मणवादी वर्चस्व पर प्रहार किया । नतीजा यह हुआ कि कट्टरपंथी हिंदू ताकतें उनसे खफा हो गई और ब्राह्मणों को इस बात की नाराजगी हुई कि उनकी जाति में पैदा हुआ शख्स ही ब्राह्मणवाद पर हमले कर रहा है । विडंबना यह कि मार्क्सवादी लेखक भी उनको अपना नहीं समझते थे । उनकी शिकायत थी कि अनंतमूर्ति नास्तिक नहीं है । इसी बिनाह पर वामपंथी उन्हें खास तवज्जो नहीं देते थे और प्रकारांतर से उनके लेखन को ध्वंस करने में लगे रहते थे । एक साक्षात्कार में अनंतमूर्ति ने जोर देकर कहा था कि उनके लिए आलोचकों से ज्यादा अर्थ पाठकों का प्यार का है । इस सिलसिले में उन्होंने एक उदाहरण देते हुए बताया था कि उर्दू के शायरों के लिए श्रोताओं की एक ‘वाह’ और ‘इरशाद’ आलोचकों की टिप्पणियों से ज्यादा अहमियत रखती है । अपनी इसी बेबाक और बेखौफ शैली की वजह से अनंतमूर्ति इस साल के शुरू में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान विवादों से घिर गए थे । अनंतमूर्ति ने कहा था कि अगर नरेन्द्र मोदी इस देश के प्रधानमंत्री बनते हैं तो वो देश छोड़ देंगे । इस बयान के बाद उनपर चौतरफा हमले शुरू हो गए थे । धमकियां मिलने लगी थी, उन्हें सरकार को सुरक्षा मुहैया करवानी पड़ी थी । बाबवजूद इसके अनंतमूर्ति अपने बयान पर कायम रहे थे । चुनाव नतीजों में नरेन्द्र मोदी को अभूतपूर्व सफलता के बाद अनंतमूर्ति ने कहा था कि उन्होंने भावना में बहकर नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बयान दे दिया था । वो भारत छोड़कर कहीं जा ही नहीं सकते हैं क्योंकि और कहीं वो रह नहीं सकते या रहने का साधन नहीं है । यह थी उनकी साफगोई और सच को स्वीकार करने का साहस । यह गुण हमारे लेखकों में देखने को मिलता नहीं है । भगवा ब्रिगेड चाहे अनंतमूर्ति से लाख खफा हो लेकिन वो इस बात पर हमेशा एतराज जताते थे कि इस तरह के कट्टरपंथियों को भगवा कहना उचित नहीं है । लगभग तीन साल पहले दिल्ली के आईआईसी में एक मुलाकात के दौरान उन्होंने कहा था कि भगवा बहुत ही खूबसूरत रंग है और इस तरह की हरकत करनेवालों को भगवा के साथ जोड़ना उचित नहीं है । यह उनके व्यक्तित्व का ऐसा पहलू था जो कम उभरकर सामने आ सका । अनंतमूर्ति की राजनीति में गहरी रुचि थी और वो चुनाव भी लड़े और पराजित भी हुए । दरअसल अनंतमूर्ति ने बर्मिंघम युनिवर्सिटी से जो शोध किया था उसका विषय था – फिक्शन एंड द राइज ऑफ फासिज्म इन यूरोप इन द थर्टीज । अनंतमूर्ति के पूरे लेखन पर इस विषय की छाया किसी ना किसी रूप में देखी जा सकती है ।
पचास और साठ के दशक में कन्नड साहित्य परंपरा की बेड़ियों से जकड़ा हुआ था । लगभग उसी दौर में यू आर अनंतमूर्ति ने लिखना शुरू किया और अपने लेखन से उन्होंने साहित्य के परंपरागत लेखन और सामाजिक कुरीतियों पर जमकर प्रहार किए । यह वही दौर था जब अपनी कविताओं के माध्यम से पी लंकेश और अपने नाटकों से माध्यम से गिरीश कर्नाड कन्नड समाज को झकझोर रहे थे । इसी दौर में अनंतमूर्ति ने कन्नड साहित्य में नव्य आंदोलन की शुरुआत की । अनंतमूर्ति के उन्नीस सौ छियासठ में छपे उपन्यास ‘संस्कार’ ने कन्नड साहित्य और पाठकों को झटका दिया । इस उपन्यास में अनंतमूर्ति ने जातिप्रथा पर जमकर हमला बोला है । अनंतमूर्ति के इस उपन्यास को भारतीय साहित्य में मील के पत्थर की तरह देखा गया । आलोचकों का मानना है कि इस उपन्यास ने कन्नड साहित्य की धारा मोड़ दी । अनंतमूर्ति ने अनेकों उपन्यास और दर्जनों कहानियां लिखी । उन्हें उनके साहित्यक अवदान के लिए 1994 में भारत के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया । उन्नीस अठानवे में उनको पद्मभूषण से सम्मानित किया गया ।
दिसंबर उन्नीस सौ बत्तीस में कर्नाटक के शिमोगा में पैदा हुए यू आर अनंतमूर्ति ने मैसूर विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम किया फिर बर्मिंघम विश्वविद्यालय से पीएचडी । उन्नीस सौ सत्तर से मैसूर विश्वविद्यालय में अंग्रेजी पढ़ाना शुरू किया। अनंतमूर्ति साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और नेशनल बुक ट्रस्ट के मुखिया भी रहे । इसके अलावा अनंतमूर्ति ने पुणे के मशहूर फिल्म और टेलीविजन संस्थान का दायित्व भी संभाला । कर्नाटक सेंट्रल य़ुनिवर्सिटी के चांसलर भी रहे । देशभर में होनेवाले साहित्यक फेस्टिवल में अनंतमूर्ति की मौजूदगी आवश्यक होती थी । वो भाषणों से वहां होनेवाले विमर्श में सार्थक हस्तक्षेप करते थे । अपनी जिंदगी के अस्सी पड़ाव पार कर लेने के बावजूद वो लगातार लेखन में जुटे थे और अखबारों में नियमित स्तंभ लिख रहे थे । इन दिनों ‘स्वराज और हिंदुत्व’ नाम की किताब पर काम कर रहे थे । इस किताब के शीर्षक से साफ है कि उन्होंने स्वराज को हिंदुत्व के नजरिए से देखने की कोशिश की होगी । ब्राउन विश्वविद्यालय में अंतराष्ट्रीय अध्ययन और समाज विज्ञान के प्रोफेसर आशुतोष वार्ष्णेय ने सही कहा कि यू आर अनंतमूर्ति ज्वाजल्यमान बौद्धिक व्यक्तित्व थे, जिनकी राजनीति में गहरी रुचि थी और हमेशा दूसरों की बातें सुनने को तैयार रहते थे । ऐसे शख्स का जाना ना केवल साहित्य समाज की क्षति है बल्कि समाज में भी एक रिक्ति पैदा करती है । सलाम अनंतमूर्ति ( वो हमेशा ‘जी’ और ‘सर’ कहे जाने के खिलाफ रहते थे ) 

अलविदा अनंतमूर्ति

कन्नड़ के मशहूर साहित्यकार यू आर अनंतमूर्ति का निधन हो गया । अपने प्रशंसकों और साथियों के बीच यूआरए के नाम से जाने जानेवाले यू आर अनंतमूर्ति कन्नड़ के सबसे बड़े साहित्यकारों में से एक थे । उन्होंने पचास और साठ के दशक में कन्नड़ साहित्य को परंपरा की बेड़ियों से मुक्त कर नव्य आंदोलन की शुरुआत की थी । उस दौर में कन्नड साहित्य में गिरीश कर्नाड भी लोकप्रिय हो रहे थे । इस आंदोलन के अगुवा होने की वजह से यू आर अनंतमूर्ति ने उस वक्त तक चली आ रही कन्नड़ लेखन की परंपरा को ध्वस्त कर दिया। बर्मिंघम विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि लेकर भारत लौटे यू आर अनंतमूर्ति कर्नाटक के ही एक कॉलेज में अंग्रेजी के प्राध्यपक हो गए । अनंतमूर्ति के शोध प्रबंध का विषय था उन्नीस सौ तीस के दशक की राजनीति और फासीवाद । यह विषय उनके पूरे लेखन में भी लगातार परिलक्षित होता रहा है । इस साल लोकसभा चुनाव के दौरान अनंतमूर्ति के बयान ने सियासी भूचाल खड़ा कर दिया था । अनंतमूर्ति ने कहा था कि अगर नरेन्द्र मोदी इस देश के प्रधानमंत्री बनते हैं तो वो भारत छोड़ देंगे । इस बयान के बाद उनपर चौतरफा हमले शुरू हो गए थे । धमकियां मिलने लगी थी । बाबवजूद इसके अनंतमूर्ति अपने बयान पर कायम रहे । चुनाव नतीजों में नरेन्द्र मोदी को अभूतपूर्व सफलता के बाद अनंतमूर्ति ने कहा था कि उन्होंने भावना में बहकर नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बयान दे दिया था । वो भारत छोड़कर कहीं जा ही नहीं सकते हैं क्योंकि और कहीं वो रह नहीं सकते या रहने का साधन नहीं है । यू आर अनंतमूर्ति की राजनीति में गहरी दिलचस्पी थी और उन्होंने नामवर सिंह की तरह चुनाव भी लड़ा था और उन्हीं की तरह पराजित भी हो गए थे । अनंतमूर्ति खांटी गांधीवादी समाजवादी थे और यह उनके लेखन में लगातार दिखता रहता था । उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से सामाजिक बुराइयों पर जमकर प्रहार किया था । समाज में ब्राह्मणों के वर्चस्व के खिलाफ उन्होंने जमकर लिखा । नतीजा यह हुआ कि उन्हें ब्राह्मणों की नाराजगी और अपने समाज का तिरस्कार झेलना पड़ा ।

1932 में कर्नाटक के शिमोगा जिले में जन्मे अनंतमूर्ति ने अंग्रेजी में एमए किया था । उन्नीस सौ छियासठ में उनका उपन्यास संस्कार प्रकाशित हुआ जो काफी मशहूर हुआ । इस उपन्यास पर फिल्म भी बनी । अनंतमूर्ति के कई उपन्यासों और कहानियों पर फिल्म बन चुकी है । 1994 में उनको भारत का सबसे प्रतिष्ठित साहित्यक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था । चार साल बाद उनको भारत सरकार ने 1998 में पद्मभूषण से नवाजा था । अनंतमूर्ति महात्मा गांधी विश्वविद्यालय केरल के चासंलर भी रहे । 2013 के मैन बुकर प्राइज के लिए उनका नामांकन भी हुआ था । इसके अलावा यू आर अनंतमूर्ति नेशनल बुक ट्रस्ट के चैयरमैन, फिल्म और टेलीविजन संस्थान पुणे और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष भी रहे । अनंतमूर्ति विदेश के कई विश्वविद्लायों में विजिटिंग प्रोफेसर भी थे । इसके अलावा देश-विदेश में होनेवाले साहित्यक मेलों और लिटरेचर फेस्टिवल में अनंतमूर्ति अपने बेबाक बयानों की वजह से काफी लोकप्रिय थे । अनंतमूर्ति के निधन से हमने एक ऐसे शख्स को खो दिया जिनकी देश को प्रभावित करनेवाले मसलों पर राय होती थी और बेबाकी से उसको सामने रखते थे । एक लोकतांत्रिक देश के लिए इस तरह के शख्स का जाना आवाम की आवाज को कमजोर कर जाने जैसा है । 

Sunday, May 25, 2014

जनवाद की शवसाधना

लोकसभा चुनावों में दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत और वामपंथी दलों की ऐतिहासिक हार के बाद हिंदी साहित्य जगत का एक खेमा सदमे में था । कुछ लेखक खीज मिटाने के चक्कर में इन दिनों फेसबुक जैसे सोशल साइट्स पर अपनी और अपनी विचारधारा की डफली बजाते घूम रहे हैं । उनकी टिप्पणियों में थोड़ा क्षोभ ज्यादा खिसियाहट दिखाई दे रही है । इस बीच खबर आई कि ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ कन्नड़ लेखक यू आर अनंतमूर्ति को कथित हिंदू संगठनों की धमकी के बाद सुरक्षा प्रदान कर दी गई है । इस खबर के सामने आने के बाद जनवाद की शवसाधना कर रही जनवादी लेखक संघ को इसमें संभावना नजर आई और आनन फानन में इस मृतप्राय लेखक संगठन ने एक बयान जारी कर विरोध जता दिया । खबरों के मुताबिक अपने बयान में जनवादी लेखक संघ ने कहा है कि आम चुनावों के परिणाम के आते ही अनंतमूर्ति को डराने धमकाने की जो हरकतें सामने आई हैं वो निंदनीय है । उनके मुताबिक ये हरकतें असहमति के अधिकार के प्रति इन राजनीतिक शक्तियों की असिष्णुता का परिचायक है । असहमति का अधिकार लोकतंत्र के सबसे बुनियादी उसूलों में से एक है । इस अधिकार पर हमला लोकतंत्र की बनियाद पर हमला है । यू आर अनंतमूर्ति जैसे कद्दावर लेखक को किसी भी प्रकार की धमकी या उनको डराने धमाकाने की कोशिशों की ना सिर्फ निंदा की जानी चाहिए बल्कि ऐसी कोशिशों के लिए जिम्मेदार लोगों और संगठनों को सलाखों के पीछे होना चाहिए । इस पूरे विवाद के पीछे अनंतमूर्ति का एक बयान है जो उन्होंने चुनाव के पहले दिया था जिसमें कथित तौर पर उन्होंने कहा था कि अगर मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तो वो देश छोड़ देंगे । हलांकि बाद में उन्होंने सफाई दी थी ।
यू आर अनंतमूर्ति एक बड़े लेखक हैं और उन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था है लिहाजा मोदी की जीत के बाद उन्होंने स्वीकार किया- मेरा मानना है कि मोदी युवाओॆं के बीच खासे लोकप्रिय थे और देश के युवा चीन, अमेरिका की तरह मजबूत राष्ट्र चाहते थे । अनंतमूर्ति के मुताबिक यही राष्ट्रीय भावना मोदी को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने में सहायक रही । अनंतमूर्ति का बुनियादी विरोध मजबूत राष्ट्रवाद से है । उनका मानना है कि राष्ट्रवाद की आड़ में झूठ को फैलाया जा सकता है और यही उनके विरोध की वजह भी है । यू आर अनंतमूर्ति को इसका हक भी है क्योंकि वो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नागरिक हैं और यहां का संविधान उन्हें अपने विचार रखने और उसके पक्ष में खड़ा होने की इजाजत देता है । लेकिन उन लोगों का क्या जिनकी आस्था भारतीय संविधान से ज्यादा लाल किताब में है, एक विचारधारा में है । इस तरह के लोग एक अवसर की तलाश में रहते हैं जिसका फायदा उठाकर वो दुनिया में अपने होने की दुंदुभि बजा सकें । हिंदी के इन बयानवीर लेखक संगठनों को बजाए बायान जारी करने के लेखकों के हितों में कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए । देशभर की अकादमियों में फैली अव्यवस्था के खिलाफ आवाज बुलंद करनी चाहिए । लेखकों-प्रकाशकों के बीच बढ़ती खटास को कम करने से लेकर रायल्टी और करारनामे के मसले पर कदम बढ़ाने चाहिए । यह इनका मूल काम होना चाहिए लेकिन सिर्फ अभिवयक्ति की आजादी के पक्ष में खड़े होने और कागजी विरोध जताने की आदत का त्याग करना होगा । हमारे देश का लोकतंत्र इतना मजबूत है कि कोई भी शख्स हमसे हमारे बुनियादी और संवैधानिक अधिकार नहीं छीन सकता है । इसके लिए बुक्का फाड़ने की जरूरत नहीं है ।