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Saturday, August 7, 2021

अश्लीलता और मुनाफे का खेल


अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति राज कुंद्रा इन दिनों अश्लील फिल्मों के बवंडर में घिरे हैं। थाना,पुलिस,कचहरी और जेल के चक्कर लगा रहे हैं। उनपर आरोप है कि वो एक एप के जरिए अश्लील फिल्मों का कारोबार करते हैं। यह पहली बार हो रहा है कि एक टॉप की अभिनेत्री के पति अश्लील फिल्मों के कारोबार में फंसे हैं। लेकिन ये पहली बार नहीं है कि शिल्पा के पति विवाद में आए हैं। राज कुंद्रा जब राजस्थान रॉयल्स के मालिकों में से एक थे तब उनपर मैच फिक्सिंग का आरोप लगे थे। उनकी गिरफ्तारी भी हुई थी और वो जेल भी गए थे। उनकी टीम राजस्थान रायल्स के खलने पर प्रतिबंध भी लगा था। उसके पहले जब राज कुंद्रा ने शिल्पा शेट्टी से शादी की थी तो उनकी पहली पत्नी और उनके बहनोई के रिश्तों को लेकर भी आरोप प्रत्यारोप का दौर चला था। इस बार राज कुंद्रा पहले के आरोपों से ज्यादा संगीन इल्जाम में फंसे हैं। उनकी पत्नी शिल्पा शेट्टी से भी पूछताछ की जा चुकी है। शिल्पा शेट्टी ने अपनी निजता को लेकर अपील भी की है, उनकी निजता का सम्मान होना चाहिए लेकिन अगर कहीं कानून तोड़ा गया है तो उसकी चर्चा तो स्वाभाविक है। उसमें निजता आदि की बात बेमानी हो जाती है। दरअसल अश्लील फिल्मों का कारोबार पिछले दस साल में कई गुणा बढ़ा है। तकनीक के फैलाव और इंटरनेट के घनत्व के बढ़ते जाने से अश्लीलता के कोष्ठक में रखी जानेवाली सामग्री का चलन काफी बढ़ गया है। अगर गहराई से इसपर विचार करें तो पाते हैं कि राज कुंद्रा पर जो दो आरोप लगे उन दोनों कारोबार में लागत कम और मुनाफा बहुत अधिक है। मैच फिक्सिंग और अश्लील फिल्मों के कारोबार में बहुत अधिक पैसा कमाया जा सकता है। धंधे में इसको ईजी मनी कहते हैं। अश्लील फिल्मों का कारोबार करना हमारे देश के कई कानून के अंतर्गत अपराध माना जाता है और आरोप सिद्ध होने पर दंड का भी प्राविधान है। 

राज कुंद्रा की गिरफ्तारी के बाद इंटरनेट माध्यमों पर उपलब्ध अश्लील सामग्रियों को लेकर देशव्यापी बहस होनी चाहिए। इंटरनेट पर उपलब्ध अश्लील सामग्री को रोक पाना लगभग असंभव है। भारत समेत दुनिया के कई देशों में अश्लीलता के खिलाफ कानून है। कई देशों में दिशा निर्देश है कि मनोरंजन या यथार्थ के नाम पर आप कितना दिखा सकते हैं और कितना छिपा सकते हैं। अमेरिका में फिल्मों में इतना खुलापन है कि वहां स्त्री-पुरुष के बीच के अंतरंग दृश्यों को दिखाया जाता है और उसपर कोई वैधानिक प्रतिबंध नहीं है। इसी तरह से कई यूरोपीय देशों में खुलापन है लेकिन जापान समेत कई देश फिल्मों में इस तरह के दृश्यों को लेकर सचेत हैं और वहां उन दृश्यों में अंगों को छिपाने का दिशा निर्देश है। हमारे देश में इस तरह से कोई स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं है और ये अदालत या जांच एजेंसी के विवेक पर निर्भर करता है। कामुकता और अश्लीलता के बीच एक बहुत ही बारीक रेखा है। उसको परिभाषित करने की अपनी अपनी दृष्टि है। आज फेसबुक से लेकर कई अन्य इंटरनेट मीडिया माध्यमों पर इस तरह की सामग्रियां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी) पर भी अश्लील सामग्रियों की भरमार है। ओटीटी को लेकर नियमन जारी हो गया, संभव है कि उसको लेकर कार्यवाही भी आरंभ हो गई होगी लेकिन यहां उपलब्ध अश्लील सामग्री पर किसी तरह की रोक दिखाई नहीं देती। जितनी जुगुप्साजनक सामग्री पहले उपलब्ध थी वो अब भी है, बल्कि वो बढ़ ही रही है। 

अश्लील फिल्में या सामग्री दिखानेवाले निर्माता या प्लेटफॉर्म अधिक मुनाफा की चाहत में ऐसा करते हैं। पहले ‘सेक्रेड गेम्स’ में नायिका को टापलेस दिखाया गया, ‘लस्ट स्टोरीज’ में उससे एक कदम आगे बढ़ गए। बाद में आई वेब सीरीज में रति प्रसंगों को दिखाया जाने लगा। वेब सीरीज को लेकर किसी तरह की कोई पाबंदी या दिशा निर्देश नहीं होने की वजह से इन निर्माताओं का हौसला बढ़ता चला गया। अश्लीलता को दिखाने का एक अलग ही पैटर्न है। और कई फिल्म निर्माता इस पैटर्न को अपनाते हैं। पहली बार जितना दिखाया जाता है अगली बार उससे अधिक या आगे दिखाने की प्रवृत्ति काम करती है। ये प्रवृत्ति संक्रामक होती है जो दूसरे फिल्म निर्माताओं को भी अपनी चपेट में ले लेती है। अगर हम भारतीय फिल्मों के उदाहरण से इसको समझें तो ये पैटर्न साफ दिखता है। 1970 के बाद ही फिल्मों को लें तो बलात्कार जैसे दृश्यों को दिखाने के लिए पहले फूलों को मसलने से लेकर गिरगिट के फतंगे को खाने के दृष्य को प्रतीक के तौर पर उपयोग में लाया जाता था। फिर जब ये स्थापित हो गया तो निर्माता थोड़ा और आगे बढ़े और नायिका को जबरन पकड़ने और साड़ी आदि खींचने के दृश्य आ गए। अब तो ये प्रवृत्ति नग्नता तक चली गई है। इसका आधुनिकता और समाज के खुलेपन आदि से कोई लेना देना नहीं है बल्कि ये अश्लीलता का व्याकरण है जो इस नियम का पालन करता है जिसमें थोड़ा और, थोड़ा और करते हुए आगे बढ़ते हैं। 

चतुर निर्माता पहले थोड़ा दिखाते हैं और उन दृश्यों को दर्शकों की स्वीकार्यता की प्रतीक्षा करते हैं। उसको बोल्ड, खुलापन आदि कहकर एक सुंदर सा आवरण चढ़ाते हैं। अगर आप हिंदी फिल्मों में किसिंग सीन के विकास क्रम को देखें या नायिकाओं के बिकिनी या कम कपड़े पहनने के चलन के बारे में विचार करें तो निर्माताओं की चतुराई की प्रवृत्ति स्पष्ट दिखती है। ‘संगम’ फिल्म में वैजयंतीमाला के बिकिनी पहनने से फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ में मंदाकिनी के झरने में झीनी साड़ी में स्नान-दृश्य से लेकर फिल्म ‘जिस्म’ तक के दृश्यों में इसको रेखांकित किया जा सकता है। ये सब कहानी की मांग की आड़ में होता है। नायिकाओं के खुलेपन को दिखाने का भी एक कौशल होता है। राज कपूर की फिल्मों में ये कौशल दृष्टिगोचर होता है। वहां खुलेपन में भी एक कलात्मकता होती है या कह सकते हैं कि उस खुलेपन का एक सौंदर्यशास्त्र होता है। कालांतर में ये कलात्मकता गौण होती चली गई और उसका स्थान नग्नता ने ले लिया। यही हाल हिंसा का भी है। अगर आप 1970 के पहले की फिल्में देखें तो उसमें जिस तरह की हिंसा होती थी अपेक्षाकृत उसके बाद हिंसा बढ़ती चली गई। अब तो हालात ये है कि किसी की हत्या के बाद उसके शरीर को इस बुरी तरह के काटा जाता है कि आप चंद सेकेंड उस दृश्य को नहीं देख सकते। पहले पेट में चाकू मारकर हत्या की जाती थी, फिर गोलियों से भूना जाने लगा अब फाइट सीन के बाद खलनायक को नुकीली चीज पर टांग दिया जाता है या फिर धारदार हथियार से मारकर अंतड़ियां तक निकाल दी जाती हैं। परिवार के साथ बैठकर न तो खुलापन देख सकते हैं न ही हिंसा के दृश्य।  

कुछ निर्माताओं या निर्देशकों के बारे में कहा जाता है कि कई बार वो अपनी फिल्मों में निजी कुंठा का प्रदर्शन करते हैं। आप ओटीटी पर चलनेवाले कुछ वेब सीरीज के निर्माता या निर्देशक का नाम देखेंगे और उनके बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे तो ये और भी स्पष्ट हो जाएगा। मानसिक रूप से बीमार या कुंठित कुछ निर्माता यौनिकता के चित्रण में आनंद प्रात करते हैं। उनको जब दर्शक भी मिल जाते हैं तो उनका ये आनंद बढ़ जाता है। अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति राज कुंद्रा की गिरफ्तारी के बाद एक बार फिर से मनोरंजन के नाम पर अश्लील सामग्री परोसने की या अश्लील फिल्मों के निर्माण को लेकर सख्त नियम बनाने की बात शुरू हो सकती है। इंटरनेट माध्यमों पर उपलब्ध नग्नता को काबू में करने की बात और मांग संभव है।