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Saturday, December 19, 2020

कृतियों से गाढ़ी होती आश्वस्ति


वर्ष दो हजार बीस बीतने को आया। चंद दिनों बाद ये वर्ष भी इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह जाएगा। पर दो हजार बीस को कोरोना की वजह से सदियों तक याद किया जाता रहेगा। कोरोना के अलावा भी कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिनको इतिहास याद रखेगा। अगर साहित्य सृजन की दृष्टि से देखें तो ये वर्ष बहुत उत्साहजनक नहीं रहा लेकिन कुछ रचनाएं ऐसी आईं जो सालों तक याद रखी जाएंगी। तीन साल पहले मशहूर और विवादित लेखिका वेंडि डोनिगर की एक किताब आई थी, ‘द रिंग ऑफ ट्रूथ, मिथ्स ऑफ सेक्स एंड जूलरी’ । उस पुस्तक के शोघ का दायरा और पूरी दुनिया के ग्रंथों से संदर्भ लेने की मेहनत पर इस स्तंभ में टिप्पणी की गई थी। तब इस बात पर अफसोस हुआ था कि हिंदी के समकालीन लेखक इस तरह का लेखन क्यों नहीं कर रहे हैं। जबकिं हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में इस तरह के लेखन की एक लंबी परंपरा रही है। वेंडि डोनिगर ने उक्त किताब में इस बात पर शोध किया था कि अंगूठियों का कामेच्छा से क्या संबंध रहा है ? क्यों पति-पत्नी से लेकर प्रेमी-प्रेमिका के लिए अंगूठी इतनी महत्वपूर्ण रही है और है। कभी अंगूठी प्यार का प्रतीक बन जाती है तो कभी इसका उपयोग वशीकरण यंत्र के तौर पर किए जाने की चर्चा मिलती है। कई धर्मग्रंथों और शेक्सपियर से लेकर कालिदास और तुलसीदास के साहित्य से उन्होंने अंगूठी के बारे में सामग्री इकट्ठा कर उसपर विस्तार से लिखा था। 

इसी तरह से इस वर्ष मार्च में पत्रकार क्रिस्टीना लैंब की एक पुस्तक आई थी, ‘ऑवर बॉडीज देयर बैटलफील्ड, व्हाट वॉर डज टू अ वूमन’। करीब तीस साल तक युद्ध और हिंसाग्रस्त इलाके की रिपोर्टिंग करनेवाली पत्रकार क्रिस्टीना ने अपनी इस किताब में कई देशों में सैन्य कार्रवाइयों से लेकर आतंकवादी हिंसा में औरतों पर होनेवाले जुल्मों का दिल दहलानेवाला वर्णन किया है। उन्होंने अपनी किताब में सच्ची घटनाओं और पीड़ितों से बातचीत के आधार पर ये बताया है कि युद्ध और हिंसा के दौरान या फिर आतंकवादी हमले के दौरान बलात्कार को हथियार के तौर इस्तेमाल किया जाता है। जबकि 1919 में ही दुनिया के सभी देशों ने बलात्कार को युद्ध अपराध की श्रेणी में मान लिया था। इस पुस्तक का रेंज व्यापक है और इसका कैनवस ये सोचने को मजबूर करता है कि हिंदी में इस तरह का काम क्यों नहीं हो पा रहा है। 

लेकिन पिछले साल दो ऐसी पुस्तकें आईं जिसने हिंदी में हो रहे काम के प्रति एक आश्वस्ति दी। पहला काम किया है उत्तर प्रदेश के एटा में जन्मे बयासी साल के लेखक महेन्द्र मिश्र ने। उन्होंने सिनेमा पर बहुत श्रमपूर्वक एक पुस्तक लिखी ‘भारतीय सिनेमा’। साढे सात सौ पन्नों की इस पुस्तक में महेन्द्र मिश्र ने विस्तार से भारतीय सिनेमा के बारे में लिखा है। उन्होंने भारतीय भाषाओं में बनने वाले सिनेमा को इसमें समेटा है। जाहिर सी बात है हिंदी फिल्मों पर ज्यादा विस्तार है लेकिन महेन्द्र मिश्र ने मणिपुरी, कर्बी, बोडो, मिजो और मोनपा भाषा कि फिल्मों के बारे में भी बताया है। इसके अलावा तमिल, तेलुगू हरियाणवी, छत्तीसगढ़ी फिल्मों पर भी जानकारियां हैं। लेखक ने लिखा है पुस्तक की भूमिका में लिखा है ‘जब हम सिनेमा की बात करते हैं तो अक्सर यही समझा जाता है कि मुंबई में बनने वाली हिंदी फिल्में ही भारत का सिनेमा है। यह धारणा केवल उत्तर भारत या हिंदी भाषी प्रदेशों में रहनेवालों की नहीं है, देश की बड़ी आबादी वाले कई महानगरों के निवासी भी यही सोचते हैं। देश के अन्य भाषाओं में बननेवाली मुख्यधारा की सैकड़ों फिल्मों के बारे में, खासकर तमिल तेलुगू, मलयालम भाषा की फिल्मों के बारे में कम लोग जानते हैं।‘ महेन्द्र मिश्र ने अपनी इस पुस्तक से इस स्थापित धारणा को तोड़ने की कोशिश की है। अपनी इस पुस्तक में महेन्द्र मिश्र ने सभी भाषाओं की महत्वपूर्ण फिल्मों के को अपने लेखन का आधार बनाया है। हिंदी में अबतक फिल्मों पर समग्रता में बहुत काम नहीं हुआ है। तथाकथित मुख्यधारा के हिंदी साहित्यकारों ने, जो वामपंथ के प्रभाव में रहे, फिल्म अध्ययन को उतना महत्व नहीं दिया जितना मिलना चाहिए था। हिंदी के लोग अब भी नहीं भूले हैं कि जब ज्ञानपीठ पुरस्कार अर्पण समारोह में अमिताभ बच्चन को आमंत्रित किया गया था तो अशोक वाजपेयी समेत कई साहित्यकारों ने इसको मर्यादा के खिलाफ बताया था। महेन्द्र मिश्र की इस पुस्तक से एक उम्मीद जगी है कि भविष्य में भी भारतीय फिल्मों पर गंभीर काम हो सकेगा। 

इसी तरह से उत्तर प्रदेश के ही रामपुर के राजकीय महिला महाविद्यालय में कार्यरत डॉ अलिफ नाजिम ने एक बेहद महत्वपूर्ण काम किया है। उन्होंने उर्दू के महान शायर मुंशी दुर्गा सहाय सुरूर जहानाबादी की कविताओं को एक जगह जमा करके उनके समग्र का संपादन किया। कई बार इस बात को लेकर भ्रम हो जाता है कि सुरूर जहानाबादी बिहार के कवि थे और इनका जन्म बिहार के जहानाबाद में हुआ था। लेकिन सचाई तो ये है कि सुरूर जहानाबादी का बिहार के जहानाबाद से कोई लेना देना नहीं है। अलिफ नाजिम साहब लिखते हैं कि ‘जो जहानाबाद दुर्गा सहाय सुरूर के उपनाम का हिस्सा बनकर साहित्य की दुनिया में अमर हो गया है उसका संबंध बिहार से नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश से है।‘ ये पीलीभीत जिले का एक कस्बा है। अपनी जिंदगी के शुरुआती दिन जहानाबाद में बिताने के बाद रोजगार की तलाश में दुर्गा सहाय मेरठ आ गए और यहां विद्या प्रकाशन में सहायक संपादक की नौकरी कर ली। अलिफ नाजिम के मुताबिक दुर्गा सहाय ने यहीं अपने नाम के साथ सुरूर लगाना शुरू किया। सुरूर को सैंतीस साल की उम्र मिली। इतनी छोटी उम्र में उनकी पत्नी और बेटे का निधन हो गया। पत्नी की मृत्यु के सदमे से उबरे तो ‘दुनिया की उजड़ी गुई दुल्हन’ जैसी कविता लिखकर अपनी चुप्पी तोड़ी। बेटे की मौत पर ‘दिले-बेकरार सोजा’ जैसी रचना लिखी जिसको पढ़कर किसी का भी ह्रदय द्रवित हो सकता है। इतनी छोटी उम्र में ही सुरूर को बेहद प्रसिद्धि मिली थी। अल्लामा इकबाल से सुरूर के संबंध बहुत अच्छे थे और इकबाल उनकी बहुत इज्जत करते थे। इकबाल ने एक दौर में अपने आप को शायरी से अलग कर लिया था। तब सुरूर ने एक कविता लिखी जिसका शीर्षक था, ‘फिजा-ए-बरशगाल और प्रोफेसर इकबाल’। ये कविता 1906 में लाहौर से प्रकाशित होनेवाले अखबार ‘मखजन’ में प्रकाशित हुई। इसको पढ़कर इकबाल ने तुरंत एक नई कविता लिखकर संपादक को भेज दी। संपादक को लिखे अपने पत्र में इकबाल ने लिखा कि ‘सुरूर मेरी खामोशी तोड़ना चाहते हैं, वो कहीं खफा न हो जाएं इसलिए ये गजल भेज रहा हूं।‘ इससे सुरूर की महत्ता समझी जा सकती है। आज भी देश के जिन भी विश्वविद्यालयों में उर्दू पढ़ाई जाती है लगभग सभी में सुरूर की कविताएं पढ़ाई जाती हैं। अलिफ नाजिम ने देशभर के अलग अलग पुस्तकालायों से खोजकर सुरूर की कविताओं को समग्र में संग्रहीत कर बड़ा काम किया है। 

एक बात जो रेखांकित करने योग्य है वो ये कि ‘भारतीय सिनेमा’ और ‘सुरूर जहानाबादी समग्र’ दोनों का प्रकाशन दिल्ली से नहीं हुआ, दोनों के लेखक दिल्ली में नहीं रहते। एक का प्रकाशन प्रयागराज से हुआ है तो दूसरे का प्रकाशन बठिंडा, पंजाब से हुआ है। ये सिर्फ इस वजह से कह रहा हूं कि दिल्ली में हो रहे लेखन को ज्यादा महत्व न देकर हमें अपने देश के अलग अलग हिस्सों के विद्वानों के कामों को रेखांकित करना चाहिए। इससे हिंदी के बारे में बन रही गलत राय का भी निषेध हो सकेगा।   


Sunday, August 13, 2017

शोध से दूर हिंदी की रचनात्मकता

आजादी के आज सत्तर साल होने को आए हैं और सत्तर साल की वय किसी के भी मूल्यांकन का बेहतर मौका तो होता ही है। हिंदी की रचनात्मकता की बात करें तो सत्तर साल के सफर पर बात करने से हमें बहुत आशाजनक तस्वीर नजर नहीं आती है। हिंदी में आजादी के पूर्व और आजादी के कुछ दिनों बाद जिस तरह की रटनाएं आ रही थीं धीरे धीरे उसका ह्रास होता चला गया। हम तो अपने व्याकरण. पुरातत्व, वैदिक और पौराणिक वांग्मय, संस्कृत काव्य को नए सिरे से व्याख्यायित करने की ओर भी ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। भारतीय धर्म शास्त्रों को नए सिरे से उद्घाटित करने का उपक्रम भी नहीं दीखता है। वेद और पुराणों को लेकर शोध भी लगभग नहीं के बराबर हो रहे हैं, यह जानने की कोशिश भी नहीं हो रही है कि कि जिस वेदव्यास ने महाभारत की रचना की थी उसी ने वेदव्यास ने पुराणों की रचना की थी। यह प्रश्न भी हिंदी के शोधार्थियों को नहीं मथता है कि अकेले वेदव्यास सभी पुराणों के रचियता कैसे हो सकते हैं। पुराणों के रूप में जो करीब चार लाख श्लोकों का विशाल साहित्. मौजूद है उससे मुठभेड़ का साहस लेखक क्यों नहीं कर पाता है। भारतीय धर्म के ज्ञानकोष वेद को लेकर भी हमारे साहित्यकार उत्साहित नजर नहीं आते हैं । वासुदेव शरण अग्रवाल जैसा विभिन्न विषयों पर विपुल लेखन करनेवाला लेखक भी हिंदी में इस समय कोई नजर नहीं आता है। अगर कोई है तो हिंदी समाज का दायित्व है कि ऐसे लेखक को विशाल हिंदी पाठक वर्ग से जोड़ने का उपक्रम किया जाए। पौराणिक चरित्रों को लेकर जिस तरह से लेखन किया जा रहा है वो युवा वर्ग के पाठकों के बीच लोकप्रिय भी हो रहा है वह भी भ्रम पैदा करता है। राम-सीता और कृष्ण के चरित्रों के साथ जिस तरह से छेड़छाड़ किया जा रहा है उसपर भी कहीं से किसी तरह की गंभीर लेखकीय आपत्ति का नहीं आना भी खेदजनक है।
उधर विदेशों में पौराणिक भारतीय साहित्य को लेकर बेहद उत्साहजनक रचनात्मकता दिखाई देती है। अमेरिका से लेकर जर्मनी तक में भारतीय पौराणिक साहित्य से मुठभेड़ करते विद्वान नजर आते हैं। संभऴ है कि उनमें से कई लेखकों की राय पर अन्य लोगों को आपत्ति हो लेकिन वो काम तो कर रहे हैं। ऐसी ही एक छिहत्तर साल की लेखिका हैं- वेंडी डोनिगर। इतिहास और धर्म की प्रोफेसर रहीं वेंडी डोनिगर की किताब- ‘द हिंदूज,एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री’ को लेकर भारत में काफी विरोध हुआ था। विरोध के बाद प्रकाशक ने उसको वापस लिया फिर किसी अन्य प्रकाशक ने उसको छापा। दरअसल हिंदू धर्म और उसका धार्मिक इतिहास वेंडी डोनिगर की रुचि के केंद्र में रहे हैं। ऋगवेद, मनुस्मृति और कामसूत्र का उन्होंने अनुवाद किया है। इसके अलावा शिवा, द इरोटिक एसेटिक, द ओरिजन ऑफ एविल इन हिंदू मायथोलॉजी जैसी विचारोत्तेजक कृतियां भी वेंडी डोनिगर के खाते में है। ‘द हिंदूज,एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री’ में वेंडी डोनिगर ने हिंदू धर्म की अवधारणाओं और प्रस्थापनाओं को पश्चिमी मानकों और कसौटी पर कसा है। वेंडी डोनिगर के मुताबिक हिंदू धर्म की खूबसूरती उसकी जीवंतता और विविधता है जो हर काल में अपने दर्शन पर डिबेट की चुनौती पेश करता है।हिंदू धर्म पर प्रचुर लेखन करने के बाद अब उनकी एक और दिलचस्प किताब आई है ‘द रिंग ऑफ ट्रुथ, मिथ ऑफ सेक्स एंड जूलरी’। अपनी इस किताब में डोनिगर जूलरी का बिजनेस करनेवाले अपने मामा के अनुभवों के आधार पर कई सिरों को जोड़कर उसकी व्याख्या की है। वेंडि डोनिगर ने माना है कि उन्होंने अंगूठियों और गहनों पर करीब दो सौ लेख लिखे हैं और कई लेक्चर में उन्होंने इसको विषय बनाया है। वेंडी के मुताबिक जब भी वो इस विषय पर कोई लेक्चर देती थीं तो कोई ना कोई उनके पास आता था और अपनी रिंग फिंगर को दिखाकर उससे जुड़ी कोई कहानी सुनाता था। सबकी अपनी अपनी कहानी थी। इसके बाद जब उन्होंने जब ग्रीक और संस्कृत साहित्य पढ़ना और पढ़ाना शुरू किया तो उन्हें इस विषय पर इतने उदाहरण मिले कि वो चकित रह गईं। और उन्होंने उसको सहेजना और जोड़ना प्रारंभ कर दिया था। हमारे प्राचीन और पौराणिक ग्रंथों में अंगूठी को लेकर बहुत कुछ कहा गया है। राजा जब खुश होता था तो अंगूठू उतारकर दे देता था, राजा के हाथ में जो अंगूठी होती थी वो उसके राजा होने की जानकारी भी देती थी आदि आदि।
अपनी इस कृति में वेंडि इस सवाल का जवाब तलाशती हैं कि अंगूठियों का कामेच्छा से क्या संबंध रहा है और स्त्री पुरुष संबंधों में उसकी इतनी महत्ता क्यों रही है। क्यों पति-पत्नी से लेकर प्रेमी-प्रेमिका और विवाहेत्तर संबंधों में अंगूठी इतनी महत्वपूर्ण हो जाती है। अंगूठी प्यार का प्रतीक तो है इसके मार्फत वशीकरण की कहानी भी जुड़ती चली जाती है। बहुधा यह ताकत के प्रतीक के अलावा पहचान के चौर पर भी देखी जाती रही है।
इस पुस्तक में यह देखना बेहद दिलचस्प है कि किस तरह से वेंडी डोनिगर पूरी दुनिया के धर्मग्रंथों से लेकर शेक्सपियर, कालिदास और तुलसीदास तक की कालजयी रचनाओं में अंगूठी के उल्लेख को जोड़ती चलती हैं । ग्रीक और रोमन इतिहास में भी अंगूठियों को स्त्री-पुरुष के प्रेम से जोड़कर देखा गया है। चर्च ने भी अंगूठी को वैवाहिक बंधन के चिन्ह के रूप में मान्यता दी थी। वो इस बारे में पंद्रह सौ उनसठ के बुक ऑफ कॉमन प्रेयर का जिक्र करती हैं। वो बताती है कि किस तरह से सोलहवीं शताब्दी में इटली में पुरुष जो अंगूठियां पहनते थे उसमें लगे पत्थरों में नग्न स्त्रियों के चित्र उकेरे जाते थे। माना जाता था कि इस तरह की अंगूठी को पहनने वाले स्त्रियों को अपने वश में कर लेते थे। अंगूठी और संबंधों के बारे में मिथकों में क्या कहा गया है, अपनी इस खोज के सिलसिले में लेखिका ने जितना शोध किया है वो आश्चर्यजनक है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों से उसने इतना कुछ उद्धृत किया है कि पाठक चमत्कृत रह जाते हैं और उनके मन में यह सवाल भी कौंधता है कि हिंदी में इस तरह की किताबें क्यों नहीं लिखी जाती हैं।
वेंडि डोनिगर के मुताबिक करीब हजारों साल पहले जब सभ्यता की शुरुआत हुई थी तभी से कविताओं में गहनों का जिक्र मिलता है । उन कविताओं में स्त्री के अंगों की तुलना बेशकीमती पत्थरों की गई थी। जब नायिका के बालों को सोने जैसा बताया गया था। वेंडि डोनिगर इस क्रम में जब भारत के मिथकीय और ऐतिहासिक चरित्रों की ओर आती हैं तो वो सीता का उदाहरण देती हैं। इस संदर्भ में ये भी कहती हैं कि अपने पति की अनुपस्थिति में गहने पहननेवाली औरतों को उस वक्त के समाज में अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता था। सीता चूंकि राजकुमारी थीं, इसलिए गहने उनके परिधान का आवश्यक अंग थे, इसलिए अपने पति से अलग निर्वासन में रहने पर भी सीता के गहने पहनने पर किसी तरह का सवाल नहीं उठा था। सीता के अलावा वो दुश्यंत का भी उदाहरण देती हैं कि कैसे उसको अंगूठी को देखकर अपनी पत्नी शकुंतला की याद आती है। तो आप देखें कि किस तरह से एक शोध के सिलसिले में कालिदास से लेकर तुलसीदास की रचनाओं का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा लेखिका जिस कालखंड में विचरण करती हैं वो कितना बड़ा है। इतने बड़े कालखंड़ को अपने लेखन में साधने के लिए कितने कौशल और ज्ञान की जरूरत होती है इसका सहज अंदाज लगाया जा सकता है।

इन दिनो मिथ पर इतना अधिक लिख जा रहा है और जनश्रुतियों और लोककथाओं के आधार पर उपन्यास पर उपन्यास लिख जा रहे हैं उससे यह लगता है कि मिथक लेखन के पाठक बहुत हैं। हाल में जिस तरह से भारतीय अंग्रेजी लेखकों ने मिथकों पर लिखा है उससे यह प्रतीत होने लगा है कि मिथ को अपने तरीके तोड़ने मरोड़ने की छूट वो लेते हैं और फिर संभाल नहीं पाते हैं। वेंडी डोनिगर की यह किताब बताती है कि मिथकों और मिथकीय पात्रों और परिस्थितियों पर लिखने के लिए कितनी मेहनत की आवश्यकता होती है। अपने तर्कों के समर्थन में कितने उदाहरण देने पड़ते हैं। जिस तरह से वेंडि डोनिगर ने अपनी इस किताब में मेसोपोटामिया की सभ्यता से लेकर हिंदी, जैन, बौद्ध, ईसाई और इस्लाम धर्म के लेखन से तथ्यों को उठाया है और उसको व्याख्यायित किया है वो अद्धभुत है। आजादी के सत्तर साल बाद आज हम हिंदी के लोगों को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा कि हिंदी मे स्तरीय शोध आधारित लेखन को कैसे बढ़ावा दिया जाए। 

Saturday, September 24, 2016

अभिव्यक्ति की आजादी के अर्धसत्य

पीईएन इंटरनेशनल, कवियों, लेखकों और उपन्यासकारों की एक वैश्विक संस्था, जिसका दावा है कि वो पूरी दुनिया में साहित्य और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए काम करती है । उन्नीस सौ इक्कीस में स्थापित इस संस्था का ये भी दावा है कि भारत समेत पूरी दुनिया के सौ से ज्यादा देशों में इसकी शाखाएं काम कर रही हैं । पेन इंटरनेशनल के नाम से मशहूर इस संस्था ने अभी अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की है – इमपोजिंग साइलेंस, द यूज ऑफ इंडियाज लॉज टू सप्रेस फ्री स्पीच । पेन कनाडा, पेन इंडिया और यूनिवर्सिटी ऑफ टोरेंटो के फैकल्टी ऑफ लॉ ने संयुक्त रूप से इस अध्ययन को अंजाम दिया है । हाल ही में इसका प्रकाशन हुआ है जिसमें कई बातें इस तरह से पेश की गई हैं जैसे लगता है कि हमारे देश में अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर स्थिति बेहद विकट है । इस रिपोर्ट के अपने आधार हैं लेकिन रिपोर्ट की शुरुआती पंक्ति से ही शोधकर्ताओं के मंसूबे साफ दिखते हैं । शोध के नतीजे की पहली लाइन है – भारत में इन दिनों असहमत होनेवालों को खामोश कर देना बहुत आसान है । इसी रिपोर्ट में लिखा है कि दुनिया की सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए ये स्थिति बेहद शर्मनाक है । अपनी इस रिपोर्ट में कई उदाहरण दिए गए हैं और कुछ भारतीय लेखकों ने भी अपनी राय रखी है । रिपोर्ट के मुताबिक भारत में धर्म पर लिखना मुश्किल होता जा रहा है । इस संबध में वेंडी जोनिगर की किताब द हिंदूज, एम अल्टरनेटिव हिस्ट्री का उदाहरण दिया गया है । यह ठीक है कि वेंडी डोनिगर की किताब को लेकर एक संगठन ने प्रकाशक को कानूनी नोटिस आदि दिया था । लेकिन बात आगे बढ़ती इसके पहले ही पेंग्विन ने इस किताब को बाजार से वापस बुला लिया और आगे नहीं छापने का एलन कर दिया । अब अगर हम इस पूरे वाकए को यहीं तक देखेंगे तो यह लगेगा कि एक संगठन ने एक लेखक की अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का हरण कर लिया । संगठन की कानूनी प्रक्रिया की धमकी की वजह से वेंडी दोनिगर की किताब पाठकों तक पहुंचने से रुक गई । अब जरा इसके बाद की कहानी सुनिए। पेंग्विन के वेंडी डोनिगर की किताब छापने से मना करने के बाद देशभर में इसपर बहस हुई और तमाम लोगों ने इसके पक्ष विपक्ष में लिखा । उसके बाद एक अन्य प्रकाशक ने वेंडी डोनिगर की इस किताब का प्रकाशन किया और ये अब भी खुले बाजार में बिक रही है लेकिन पीईएन के शोधकर्ताओं को अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर भारत के कानून में खामी दिखाई देती है लेकिन ये नहीं दिखाई देता है कि वेंडी डोनिगर की किताब पर किसी तरह की कोई रोक काम नहीं कर पाई । अब अगर लोकतंत्र में किसी संविधान ने अपने नागरिकों को कोई हक दे रखा है तो वो उसका इस्तेमाल करने के लिए आजाद है । यह अदालत के विवेक पर निर्भर करता है कि वो देखे कि एक नागरिक के या एक संगठन की आपत्तियों में तिततना दम है । और भारत की अदालतों ने वक्त वक्त पर इसको साबित भी किया है । जैसे पेरुमल मुरुगन के मामले में मद्रास हाईकोर्ट से जो फैसला आया वो लेखक को पुर्नजीवन देनेवाला था । हाईकोर्ट के उस फैसले पर आपत्तियां हो सकती हैं, हुई भी लेकिन कमोबेश उस फैसले ने वन पार्ट वूमन के प्रकाशन और वितरण में आ रही तमाम बाधाओं को दूर कर दिया । पेरुमल मुरुगन के मामले को इस रिपोर्ट में प्रमुखता मिली है । यह सही है कि पेरुमल मुरुगन को अपने उपन्यास की वजह से काफी झेलना पड़ा लेकिन अतत; जीत उनकी ही हुई और उनके सभी अधिकार प्रतिष्ठापूर्व बहाल कर दिए गए । लेकिन आप देखें कि पेरुमल मुरुगन एक मामला है लेकिन लेखकों ने उसी तरह के मुद्दे पर विपुल लेखन भी किया । जैसे मराठी लेखक भालचंद्रन नेमाडे की किताब हिंदू, जीने का समृद्ध कबाड़ प्रकाशित होकर धड़ल्ले से बाजार में बिक रहा है । इसमें कितनी आपत्तिजनक बातें हैं इसका अंदाज शायद पेन इंटरनेशनल के शोधकर्ताओं को नहीं होगा लेकिन फिर भी ये किताब बाजार में मौजूद है । ये भारतीय संविधान की ताकत है ।  
साहित्य के प्रचार प्रसार के लिए काम करनेवाली लेखकों और कलाकरों की इस अंतराष्ट्रीय संस्था ने भारत में आमिर खान की फिल्म पी के लोकर विरोध को भी अपने तर्कों के पक्ष में इस्तेमाल किया गया है । भारत जैसे विशाल देश में अगर छिटपुट विरोध होता भी है तो इससे पूरी व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाना कितना उचित है। रिपोर्ट में प्रकाशित लेखों में फिल्मों को लेकर सेंसर बोर्ड के रुख पर भी आपत्ति जताई गई है । सवाल यही है कि क्या शोधकर्ताओं को भारत की विशालता और बहुलतावादी संस्कृति का अंदाजा नहीं है । पी के फिल्म का चंद लोगों का विरोध और यो यो हनीसिंह पर एक शख्स के नागपुर में केस कर देने जैसे उदाहरणों से अगर अभिव्यक्ति की आजादी का आंकलन किया जाएगा तो पीईएऩ जैसी संस्था की साख पर सवाल खड़ा होगा ।

भारत जैसे विशाल देश के बारे में साहित्य, कला और संस्कृति के बरक्श अभिव्यक्ति की आजादी को परखने के लिए शोधकर्ताओं को बाहर निकलना होगा । फाइव स्टार लेखक और पत्रकारों के लेखों के आधार पर बनाई गई रिपोर्ट से सच्ची तस्वीर नहीं उभर सकती है । इस रिपोर्ट को साहित्य और कला तक ही सीमित रखा जाना चाहिए था लेकिन ग्रीन पीस इंटरनेशनल पर पाबंदी को भी इसमें शामिल करके शोधकर्ताओं ने खुद ही इसकी विश्वसनीयता को सवालों के घेरे में ला दिया । इस बात पर बहस हो सकती है कि भारत में कुछ ऐसे तत्व मौजूद हैं जो लेखकों और कलाकारों को डराने का काम करते हैं लेकिन उनकी संख्या लगभग नगण्य है । कर्नाटक के कालबुर्गी की हत्या के मामले पर इतना शोर शराबा हुआ लेकिन अब जब जांच पने मुकाम तक पहुंच रही है तो उसको लेकर कोई विमर्श क्यों नहीं हो रहा है । यह एक खास किस्म की मानसिकता है जो भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश को इस तरह के अनर्गल आरोपों के आधार पर बदनाम करने की कोशिश की जाती है । भारत में साहित्य सृजन का जो वातावरण है वो विश्व के कई देशों के मुकाबले बेहतर है । पीईएन की इस रिपोर्ट की खामियों पर विस्तार से बहस होनी चाहिए ताकि कोई भी कुछ भी कहकर निकलने नहीं पाए