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Saturday, December 17, 2022

समग्रता में प्रश्न उठाने से चूके बच्चन


कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह का मंच सजा था। मंच पर बंगाल की मुख्यमंत्री और राज्यपाल के अलावा सुपरस्टार अमिताभ बच्चन, शाह रुख खान, अभिनेत्री रानी मुखर्जी, निर्देशक महेश भट्ट, पूर्व क्रिकेटर सौरभ गांगुली समेत अन्य फिल्मी सितारे बैठे थे। भव्य आयोजन था। इन दिनों शाह रुख खान अपनी फिल्म पठान को लेकर चर्चा में हैं। उनकी फिल्म के एक गाने बेशरम रंग में नायिका दीपिका पादुकोण के वस्त्र के रंग पर विवाद है। ट्विटर पर बायकाट पठान हैशटैग बेहद प्रचलित होकर कई घंटों तक ट्रेंड हो चुका है। भारतीय फिल्मों के संवाद और फिल्मांकन को लेकर इस वर्ष विवाद उठते रहे हैं। सबको उम्मीद थी कि शाह रुख खान अपनी फिल्म पठान पर उठे विवाद पर अवश्य बोलेंगे। वो बोले भी। उन्होंने इंटरनेट मीडिया की नकारात्मकता को रेखांकित किया। अपने वक्तव्य के अंत में कहा कि कोई कुछ भी कर ले लेकिन आप और हम सब जिंदा हैं। शाह रुख से इस तरह की बात की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन जब बच्चन साहब मंच पर आए तो उन्होंने सेंसरशिप, मानवाधिकार, काल्पनिक कट्टर राष्ट्रवाद, मोरल पुलिसिंग आदि पर बात करके सबको चौंका दिया। 

अमिताभ बच्चन के बोलने के पहले उनकी पत्नी और समाजवादी पार्टी से राज्यसभा की सदस्य जया बच्चन ने बेहद संक्षिप्त वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि उनको पता है कि बच्चन साहब पिछले तीन साल से जिन बातों पर मंथन कर रहे हैं या जो बातें सोच रहे हैं उसको आज सबके सामने रखनेवाले हैं। इतना कहने के बाद जया बच्चन ने ममता बनर्जी की ओर देखकर कहा कि वो हमेशा उनके साथ हैं। ये बताने के पीछे उद्देश्य सिर्फ इतना है कि अमिताभ बच्चन ने बहुत सोच समझकर अपनी बातें कोलकाता इंटरनेश्नल फिल्म फेस्टिवल के मंच से कही। बच्चन साहब को कई बार सुनने का अवसर मिला है। लेकिन जिस तरह से कोलकाता में वो लिखित भाषण पढ़ रहे थे वो उनके पूर्व की भाषण शैली से अलग था। ऐसा लग रहा था कि उनका भाषण श्रमपूर्वक तैयार किया गया था, जिसमें शब्दों के चयन को लेकर सावधानी बरती गई थी। उन्होंने अंग्रेजों के जमाने के सेंसरशिप पर बात की। स्वाधीनता पूर्व किस तरह से भारतीय फिल्मकारों को प्रताड़ित किया जाता था, विस्तार से उसकी क्रोनोलाजी बताई। सेंसरशिप पर क्रोनोलाजी बताते हुए वो भारत की स्वाधीनता तक पहुंचे। बताया कि 1952 में सिनेमेटोग्राफी एक्ट बना दिया गया। इसके बाद उन्होंने जो कहा उसपर विचार करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज भी नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं। ये कहने के क्रम में उन्होंने कहा कि मंच पर बैठे महानुभाव उनकी बात से सहमत होंगे। इसके बाद बच्चन साहब फिल्मों के कंटेंट पर चले गए और उसकी विविधता का कालखंड गिना दिया। कंटेंट की विविधता की बात करते हुए काल्पनिक कट्टर राष्ट्रवाद और मोरल पुलिसिंग पर जा पहुंचे।

बच्चन साहब को आज देश में नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्न खड़े होते हुए दिख रहे हैं। लेकिन जब वो स्वाधीनता के बाद के परिदृष्य पर पहुंचे तो उससके बाद वो फिल्मों के विषयों पर चले गए। स्वाधीन देश में फिल्मकारों पर लगाई जानेवाली पाबंदियों पर बोलने से बचकर निकल गए। भारत में जब फिल्मों के सेंसरशिप पर बात होगी और जब उसकी क्रोनोलाजी बताई जाएगी तो क्या इमरजेंसी के दौर में हुई ज्यादतियों पर बात नहीं होगी? क्या जब नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बात होगी तो इमरजेंसी के दौर में हुई घटनाओं से बचकर निकला जा सकता है? बच्चन साहब ने देश की आजादी के पहले के दौर की फिल्म भक्त विदुर पर अंग्रेजों की पाबंदी पर विस्तार से बताया कि कैसे और किन दृष्यों की वजह से उस फिल्म को मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। बच्चन साहब ने वी शांताराम की फिल्म स्वराज्य पर लगी पाबंदी के कारणों को गिनाया। ये भी बताया कि किस तरह से दबाव डालकर इस फिल्म का नाम बदलकर उदय काल करवाया गया था। इसके बाद वो आज के नागरिक स्वतंत्रता के प्रश्नों की बात करने लगे। क्या पिछले तीन साल से इन विषयों पर मंथन करनेवाले अमिताभ बच्चन को फिल्म आंधी और उसके निर्माताओं के साथ जो हुआ उसकी याद नहीं आई। किस तरह से फिल्म आंधी की रील को मुंबई के स्टूडियो से उठाकर नष्ट करवा दिया गया था। किस तरह से इमरजेंसी के दौरान देवानंद को धमकाया गया था, किशोर कुमार के गानों के आकाशवाणी पर बजाए जाने पर प्रतिबंध लगाया गया था। नेहरू के खिलाफ लिखने पर किस तरह से मजरूह सुल्तानपुरी को प्रताड़ित किया गया था। 

अगर हम नागरिक स्वतंत्रता की बात करें तो स्वाधीनता के बाद क्या पहली बार अब नागरिक अधिकारों का हनन हो रहा है? क्या पहली बार मानवाधिकार की हनन हो रहा है। अमिताभ बच्चन जिस बंगाल की जमीन पर खड़े होकर मानवाधिकार और नागरिकता स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह की बात कर रहे थे उसी जमीन पर 1967 से लेकर 1972 तक  क्या हुआ था। इसकी याद उनको नहीं आई। अमिताभ बच्चन तो 1912 तक चले गए थे लेकिन उनको 1970 की याद नहीं आई जब बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगा था। उस वक्त कांग्रेस की सरकार ने औपनिवेशिक काल के बंगाल सप्रेशन आफ टेररिस्ट आउटरेजस एक्ट 1932 को लागू कर दिया था। तब नागरिक स्वतंत्रता का हनन हुआ था। ऐसे कई उदाहरण हैं जो अमिताभ बच्चन को याद नहीं आए। बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद किस तरह की घटनाएं हुईं वो पूरी दुनिया को पता हैं। क्या उसमें किसी प्रकार का मानवाधिकार हनन हुआ था। अमिताभ बच्चन को शायद पता हो। 

अमिताभ 1984 में लोकसभा के लिए कांग्रेस के टिकट पर चुने गए थे। कुछ वर्षों के बाद उन्होंने राजनीति छोड़ दी थी। तब से अबतक वो विवादित मुद्दों से बचते रहे थे। उनकी पत्नी जया बच्चन गाहे-बगाहे राजनीतिक बयान देकर विवादों में घिरती रही हैं लेकिन अमिताभ इससे अलग रहते हैं। अमिताभ बच्चन के राजनीति से दूर रहने की वजह से एक प्रतिष्ठा रही है। जब उनको दादा साहब फाल्के अवार्ड देने कि घोषणा की गई थी तो वो पुरस्कार ग्रहण के लिए विज्ञान भवन के समारोह में नहीं आए थे। उनके लिए सरकार ने अलग से राष्ट्रपति भवन में पुरस्कार अर्पण समारोह आयोजित किया था। तब भी किसी ने समानता के सिद्धांत का प्रश्न नहीं उठाया था। इस तरह के न जाने कितने प्रश्न हैं जो अमिताभ बच्चन की वरिष्ठता को ध्यान में रखकर कभी नहीं उठे। जया बच्चन का फिल्म समारोह के मंच से ममता बनर्जी को उनके साथ रहने का आश्वसान देना और उसके बाद अमिताभ बच्चन का सधे हुए अंदाज में परोक्ष रूप से राजनीतिक भाषण देना क्या संकेत करता है। अमिताभ बच्चन ने जिस दिन ये बोला उसके एक या दो दिन पहले केरल के फिल्मकार अदूर गोपालकृष्णन ने भी सुपर सेंसरशिप का मुद्दा उठाया था। उन्होंने भी कहा था कि सरकारी सेंसर के बाद इंटरनेट मीडिया का अदृष्य इकोसिस्टम फिल्मों को सेंसर करता है। ऐसा करनेवाले लोग असामाजिक हैं। क्या अदूर और अमिताभ बच्चन के बयानों में लगभग समानता एक संयोग है या फिर प्रयोग है। ये तो आनेवाले दिनों में ही स्ष्ट हो पाएगा। लेकिन इतना तय है कि अमिताभ बच्चन जैसे श्रेष्ठ और वरिष्ठ कलाकार को किसी भी कलामंच से इस तरह की बातें करने के पहले काफी सोच विचार करना चाहिए। उनके कहे गए शब्दों के क्या मायने निकाले जाएंगे और उसका असर कितना गहरा होगा। राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मंचों पर उसको कैसे विश्लेषित किया जाएगा, आदि। प्रतीत होता है कि अमिताभ बच्चन ने अपने वक्तव्य के शब्दों के बारे में गंभीरता से मंथन नहीं किया। 

Saturday, March 6, 2021

हिंदू नवजागरण के अनुत्तरित प्रश्न


पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद सभी राजनीतिक दल एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के सामने भारतीय जनता पार्टी एक बड़ी चुनौती लेकर खड़ी है। कांग्रेस और वामपंथियों का गठबंधन अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संघर्षरत दिखाई दे रहे हैं। पश्चिम बंगाल का चुनाव देश के अन्य राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव से थोड़ा अलग हटकर है। यहां बंगाल की संस्कृति और बंगाली अस्मिता भी प्रमुख चुनावी मुद्दा बनते हैं। भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस लगातार वहां की संस्कृति की बात कर रही है। तृणमूल कांग्रेस खुद को बंगाल की संस्कृति का ध्वजवाहक बताते हुए चुनाव मैदान में है। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के कई नेता लेखकों, कलाकारों और फिल्म अभिनेताओं के संपर्क में हैं। उधर भारतीय जनता पार्टी के नेता भी सोनार बांगला के नारे के अंतर्गत बंगाल की खोई हुई अस्मिता को वापस लाने की बात करते हुए लगातार बुद्धिजीवियों के संपर्क में हैं। जब ममता बनर्जी बंगाल में वामपंथियों के खिलाफ पहली बार चुनाव लड़ रही थीं तब कोलकाता की सड़कों पर कई होर्डिंग लगे थे जिसमें महाश्वेता देवी समेत कई लेखकों कलाकारों के चित्र लगे थे और उसमें बांग्ला में लिखा था ‘परिवर्तन’। तब ये माना गया था कि इन होर्डिंग्स का मतदताओं पर असर पड़ा था। पश्चिम बंगाल में अब भी लेखकों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों को गंभीरता से लिया जाता है और लोग उनका आदर भी करते हैं। इस आदर की ऐतिहासिक वजहें हैं। माना जाता है कि बंगाल के महापुरुषों ने सबसे पहले एक राष्ट्र का स्वप्न देखा था। भारतीयता के अराधक राजा राममोहन राय बंगाल की धरती पर पैदा हुए थे। राजा राममोहन राय से लेकर रवीन्द्रनाथ ठाकुर तक जो परंपरा चली जिसे नवजागरण के नाम से जानते हैं उसमें केंद्र में भी भारत और भारतीयता है। इस नवजागरण का जब विश्लेषण किया जाता है तो इस बात को छोड़ दिया जाता है कि दरअसल ये नवजागरण, हिंदू नवजागरण था। इस राष्ट्रवादी चेतना के उत्थान के सूत्र राजा राममोहन राय से लेकर गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के लेखन और उनके कार्यों में स्पष्ट रूप में दिखाई देते हैं।

जब राममोहन राय बंगाल में सक्रिय हो रहे थे तो उनका उद्देश्य हिंदू धर्म के यथार्थ और वास्तविक स्वरूप से बंगाल की जनता का परिचय करवाना था। हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों और कर्मकांडों के विरोध में उन्होंने बड़ा अभियान चलाया, उनको सफलता भी मिली। बंगाल में इस हिंदू नवजागरण का आरंभ करनेवाले राममोहन राय को समाज सुधारक के तौर पर पेश कर उनकी इसी छवि को मजबूत किया गया। उनके कृतित्व का वो पक्ष सायास ओझल कर दिया जिसमें वो हिंदू धर्म को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे। उनको हिंदू धर्म से इतना लगाव था कि वो धर्म के नाम पर हो रहे विचलन को दूर करने के लिए लगातार कोशिश कर रहे थे। अपनी लेखनी के माध्यम से हिंदू धर्म के सामने उपस्थित खतरों को लेकर जनता को सावधान कर रहे थे। उन्होंने न केवल वेद और उपनिषदों को आधार बनाकर विपुल लेखन किया बल्कि 1820 में उनकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई ‘हिंदू धर्म की रक्षा’। अपनी इस पुस्तक में राममोहन राय ने हिंदू धर्म को लेकर अपनी सोच और इसको मजबूती प्रदान करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों की चर्चा की थी। राममोहन राय के अलावा अगर हम बंकिमचंद्र के लेखन को देखें तो उसमें भी हिंदू धर्म को लेकर एक चिंता दिखाई देती है। उनकी रचना वंदे मातरम और उपन्यास ‘आनंदमठ’ की तो खूब चर्चा होती है, इन रचनाओं में व्याप्त देशभक्ति की भावना को लेकर भी बहुत कुछ लिखा गया है। परंतु बंकिमचंद्र के उपन्यास ‘सीताराम’ की इतनी चर्चा नहीं होती है। बंकिम की इस रचना के बिना उनका समग्र मूल्यांकन संभव नहीं है। इस उपन्यास में बंकिम ने मुस्लिम आक्रांताओं के बारे में विस्तार से लिखकर इस बात के संकेत दिए थे कि हिंदूओं को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। कहना ना होगा कि बाद के दिनों में बंकिम के इस उपन्यास पर इसलिए अधिक चर्चा नहीं की गई क्योंकि इसमें हिंदुओं पर आक्रांताओं के अत्याचार और फिर उसके प्रतिकार की कहानी है। अगर समग्रता में बंकिम के लेखन पर विचार हो तो उनको राष्ट्रीयता का ऋषि कहने में कोई संकोच नहीं होगा। बंकिम की परंपरा में ही केशवचंद्र सेन जैसे हिंदू धर्म और दर्शन के विद्वान को भी रखना होगा। बंगाल की धरती पर कई ऐसे सपूत पैदा हुए या उस धरती को अपनी कर्मभूमि बनाया, जिन्होंने हिंदू धर्म और दर्शन की चिंता की जिनमें रमेशचंद्र दत्त, माइकल मधुसूदन दत्त, दीनबंधु मित्र, भूदेव मुखोपाध्याय से लेकर विवेकानंद और रवीन्द्रनाथ ठाकुर प्रमुख हैं।इस हिंदू नवजागरण की चर्चा तब तक पूर्ण नहीं होती जबतक कि हम 1867 में स्थापित ‘हिंदू मेला’ नामक संस्था की चर्चा नहीं करते। इसकी स्थापना गणेन्द्रनाथ ठाकुर ने की थी। इस संस्था का उद्देश्य अंग्रेजों के सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का प्रतिकार तो था ही, भारतीयता को मजबूती के साथ स्थापित करना था। ‘हिंदू मेला’ ने ही भारत में स्वदेशी आंदोलन के लिए जमीन भी तैयार की थी।

आज पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव के समय एक बार फिर से वही हिंदू अस्मिता विमर्श के केंद्र में है। यह अनायास नहीं है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक अनिर्वाण गांगुली पिछले कई महीनों से बंगाल के कोने कोने में जाकर स्थानीय स्तर के लेखकों, कलाकारों, शिक्षकों आदि के साथ संवाद कर रहे हैं। ममता बनर्जी के लिए भी कई सांस्कृतिक संस्थाओं के साथ कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। कई जगहों पर उन्होंने भाषा और कला को लेकर भी अपनी बात रखी। दरअसल स्वतंत्रता के कई वर्षों बाद जब बंगाल में वामपंथियों का शासन आरंभ हुआ तो इस हिंदू नवजागरण की परंपरा थोड़ी धूमिल पड़ने लगी। सायास नवजागरण के दौर के लेखकों की उन रचनाओं को भुलाने की कोशिशें तेज हो गईं जिनमें हिंदू अस्मिता की चर्चा थी या उन पुस्तकों को ओझल करने का खेल शुरू हुआ जिनमें हिंदू धर्म और उसपर होनेवाले प्रहारों का उल्लेख था या इस पृष्ठभूमि पर लिखा गया था। यह अनायास नहीं है कि जब ज्योति बसु बंगाल के मुख्यमंत्री थे तो 28 अप्रैल 1989 को पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने पत्रांक एसवाईएल/89/1 के जरिए एक निर्देश जारी किया। इस पत्र में सभी माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्यों को निर्देश दिया गया था कि ‘मुस्लिम काल की कोई निंदा या आलोचना नहीं होनी चाहिए, मुस्लिम शासकों और आक्रमणकारियों द्वारा मंदिर तोड़े जाने का जिक्र कभी नहीं किया जाना चाहिए।‘ इसके साथ ही यह भी कहा गया था कि इतिहास की पुस्तकों से क्या क्या हटाया जाना है। स्पष्ट है कि वामपंथी शासन की मंशा क्या रही होगी। वामपंथियों ने पश्चिम बंगाल में चौंतीस साल तक शासन किया और उसके बाद से ममता बनर्जी वहां की मुख्यमंत्री हैं। क्या अब ये प्रश्न नहीं पूछा जाना चाहिए कि हिंदू नवजागरण के नायकों की स्मृति को मिटाने या उनको विस्मृत करने या उसको नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सार्थक कार्य क्यों नहीं किया गया? क्यों वामपंथी शासनकाल में हुई गलतियों को पिछले दस साल में ठीक करने की कोशिशें नहीं की गईं। क्या बंगाल के सांस्कृतिक नायकों का स्मरण सिर्फ चुनावों के समय किया जाएगा या फिर उस धरती के जिन राष्ट्रवादी मनीषियों ने जो स्वप्न देखा था उसको पूरा करने का उपक्रम भी किया जाएगा। लोकतंत्र में चुनाव एक ऐसा ही अवसर होता है जब जनता इन प्रश्नों को पूछ सकती है। बंगाल की जनता जरूर इन प्रश्नों के उत्तर मतदान के दिन तलाशेगी भी और उम्मीद की जानी चाहिए कि जिन्होंने गलतियां की उनको सबक भी सिखाएगी।

Friday, March 31, 2017

मुजीब की प्रतिमा पर धर्म का साया

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की सात अप्रैल से भारत यात्रा के पहले पश्चिम बंगाल में एक अजीबोगरीब मांग उठी है । ये मांग है कोलकाता के बाकर गवर्नमेंट हॉस्टल में लगी बंगबंधु शेख मुजीबुर्हमान की मूर्ति हटाने की । बाकर हॉस्टल में मुजीब की इस मूर्ति को साल दो हजार ग्यारह में बांग्लादेश की सरकार ने लगवाया था । अब उसके छह साल बाद उसको हटाने की मांग, उसकी वजह और उसकी टाइमिंग को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं । ऑल बंगाल माइनेरिटी यूथ फेडरेशन की अगुवाई में अनाम अनाम से पंद्रह इस्लामिक संगठनों ने ये मांग उठाई है । उनका तर्क है कि बाकर हॉस्टल में लगी शेख मुजीब की यह मूर्ति इस्लाम के खिलाफ है और इनसे उनकी धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं । वो तो यहां तक कह रहे हैं कि ये भारतीय मुसलमानों और बांग्लादेशी सरकार के बीच का झगड़ा है । पत्र को ऐसे लिखा गया है गोया ये संगठन भारत के मुसलमानों की रहनुमाई करता हो । ऑल बंगाल माइनेरिटी यूथ फेडरेशन की अगुवाई वाले इस मोर्चे ने बांग्लादेश की प्रधानमंत्री, भारत की विदेश मंत्री और बंगाल की मुख्यमंत्री को खत लिखकर कहा है कि मुजीब की प्रतिमा का बाकर हॉस्टल जैसी इस्लामिक संस्था में होना गलत है क्योंकि वहां मस्जिद भी है । उनका दावा है कि इस प्रतिमा से उस इलाके का धार्मिक वातावरण प्रदूषित होता है और पवित्रता नष्ट होती है । सवाल यही है कि पिछले छह साल से इस मूर्ति का कोई विरोध नहीं हुआ और जब उनकी बेटी और बांग्लादेश की मौजूदा प्रधानमंत्री का भारत दौरा करीब आया तो इसका विरोध शुरू हो गया, और धर्म की आड़ ली जाने लगी । धर्म की आड़ में सियासत करना और लोगों की भावनाएं भड़काने के इस खेल को बेनकाब करना बेहद आवश्यक है । मुजीब की प्रतिमा के विरोध के पीछे कई वजहें हैं जिसपर विस्तार से बात होगी पर पहले बताते चलें कि 1940 में शेख मुजीब कोलकाता के इस्लामिया कॉलेज के छात्र थे । इस क़लेज का नाम बदलकर बाद में मौलाना आजाद कॉलेज कर दिया गया था । छात्र जीवन के बाद भी शेख मुजीब का भारत खासकर कोलकाता से गहरा नाता रहा था और उसी रिश्ते को सम्मानित करने के लिए बाकर हॉस्टल में मुजीब की प्रतिमा लगाई गई थी । 
बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार ने जब इस्लामिक कट्टरपंथियों पर लगाम लगाना शुरू किया तब से इस्लाम के नाम पर उनका विरोध शुरू हो गया था । सालों से बांग्लादेश की धरती का इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों के लिए किया जाता रहा था । इस्लामिक आतंकवादी संगठन हरकत इल जिहाद अल इस्लामी बांग्लादेश और जमातउल मुजाहीदीन बांग्लादेश दोनों देशों में तबाही मचाने की योजना पर काम करती रही है । शेख हसीना ने जब दो हजार नौ में बांग्लादेश की सत्ता संभाली तो उन्होंने इस्लामिक आतंकवादी संगठनों से लेकर कट्टरपंथी संगठनों को ठिकाने लगाना शुरू कर दिया और भारत को भी ये संदेश दे दिया कि उनकी धरती से भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा । शेख हसीना सरकार की इस कड़ाई के बाद इस्लामिक कट्टरपंथियों ने बंगाल में अपना आधार बनाना शुरू कर दिया। इसका पता तब चला जब दो हजार चौदह में बर्धवान में बम ब्लास्ट हुआ था । उसकी जांच के बाद यह सामने आया कि जमातउल मुजाहीदीन बांग्लादेश ने पश्चिम बंगाल में अपना नेटवर्क काफी फैला लिया है ।
पश्चिम बंगाल में जिस तरह से अल्पसंख्यकों को सरकार की तरफ से छूट आदि जी जा रही है उसने भी इस्लामिक कट्टरपंथियों को पनपने का मौका दिया । ढाका के कैफे में आतंकी हमले का आरोपी इदरीस अली की कोलकाता से गिरफ्तारी से सुरक्षा बलों के कान खड़े हो गए थे । ममता सरकार के सॉफ्ट अप्रोच ने इस्लामिक कट्टरपंथियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं हो पा रही है । संभव है कि इससे वोट बैंक की राजनीति में ममता बनर्जी को लाभ हो लेकिन भविष्य में यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है । अभी हाल ही में ये खबर भी आई थी कि बांग्लादेश सरकार ने भारत सरकार को जानकारी दी है कि हुजी और जमातउल मुजाहीदीन बांग्लादेश ने घुसपैठियों को काफी मदद की है लेकिन बंगाल सरकार इस चेतावनी को गंभीरता से लेने की बात तो दूर इसको मानने को तैयार नहीं ।
अभी कुछ महीने पहले कोलकाता के एक मस्जिद के कथित शाही इमाम बरकती ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ फतवा जारी किया था । बरकती ने जिस प्रेस कांफ्रेंस में अपमानजनक फतवा जारी किया जिसके पीछे बैनर पर ममता बनर्जी की बड़ी सी तस्वीर लगी थी । लेकिन पुलिस ने बरकती के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की । बरकती और ममता बनर्जी की सियासी नजदीकियां जगजाहिर हैं और अपने इस राजनीतिक संबध को बरकती सार्वजनिक रूप से जाहिर भी कर चुके हैं । पश्चिम बंगाल में करीब अट्ठाइस-तीस फीसदी मुसलमानों के वोट हैं । इन्हीं वोटों को चक्कर में पश्चिम बंगाल में बरकती जैसी शख्सियतों को बढ़ावा दिया जाता है । इन्हीं मुस्लिम वोट बैंक के चक्कर में वामपंथी सरकारों से लेकर ममत बनर्जी सरकार तक तस्लीमा नसरीन को कोलकाता से निर्वासित कर देती है । तुष्टीकरण की इस नीति के खिलाफ भी कभी सहिष्णु बुद्धिजीवियों ने कुछ बोला, लिखा हो ज्ञात नहीं है । अब मुजीब की प्रतिमा हटाने की मांग के खिलाफ भी मुसलमानों की प्रोग्रेसिव जमात की तरफ से विरोध नहीं उठना चिंताजनक है । उससे भी ज्यादा चिंताजनक है हमारे देश के बौद्धिकों की खामोशी । इसका असर हमारे समाज पर तो पड़ ही रहा है अब इसने अंतराष्ट्रीय संबंधों पर भी इसर डालने की कोशिश शुरू कर दी है । अगर शेख हसीना के दौरे के वक्त मुजीब की प्रतिमा को लेकर कोई अप्रिय घटना घटती है तो इससे बहुत गलत संदेश जाएगा और संभव है कि दोनों देशों के संबंधों पर उसका असर पड़े । इस आशंका के मद्देनजर केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल सरकार को इन अनाम धार्मिक संगठनों से सख्ती निपटने की सलाह दी है। बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल दोनों स्थानों पर जिस तरह से इस्लाम के नाम पर कट्टरता को बढ़ाने का कुत्सित खेल खेला जा रहा है उससे सख्ती से निबटने की जरूरत है । शेख हसीना ने तो तमाम खतरे उठाते हुए कई कड़े कदम उठाए हैं अब आवश्यकता इस बात की है कि ममता बनर्जी भी वोटबैंक की राजनीति से उपर उठकर राष्ट्रहित में कदम उठाएं ।   


Tuesday, January 10, 2017

बरकती, ममता और फतवे की सियासत

कोलकाता के एक मस्जिद के कथित शाही इमाम बरकती ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ फतवा जारी किया । बरकती ने बकायदा एक प्रेस कांफ्रेंस में अपमानजनक फतवा जारी किया जिसके पीछे बैनर पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की बड़ी सी तस्वीर लगी थी । बरकती ने हिंदी और अंग्रेजी में अपमानजनक फतवा जारी किया । यह मानना मेरे लिए मुमकिन नहीं है कि इस मसले की जानकारी पुलिस को नहीं होगी या जिस वक्त देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ फतवा जारी किया जा रहा था उस वक्त वहां पुलिस मौजूद नहीं रही होगी । अगर ऐसा था तो पुलिस ने उसी वक्त बरकती के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की । अगर किसी कारणवश उस वक्त कार्रवाई नहीं हो पाई तो क्या बाद में कोई कार्रवाई की गई । अबतक तो ज्ञात नहीं है । तो क्या ये मान लिया जाए कि बरकती ने वो फतवा राज्याश्रय के तहत किया । प्रत्यक्ष ना सही परोक्ष रूप से बरकती के उस कदम को सूबे की सरकार का समर्थन हासिल था । बरकती और ममता बनर्जी की सियासी नजदीकियां जगजाहिर हैं और अपने इस राजनीतिक संबध को बरकती सार्वजनिक रूप से जाहिर भी कर चुके हैं । इससे इस बात का अंदेशा तो बढ़ता ही है कि ममता बनर्जी के इशारे पर बरकती ने ये काम किया है । अगर उनके इशारे पर नहीं भी किया तो जिस तरह से पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की उससे तो ये साफ पता चलता है कि कहीं ना कहीं से बरकती इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि प्रधानमंत्री के खिलाफ फतवा देने के बाद भी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी । इस्लाम में किसी फैसले या फरमान को  फतवा कहते हैं । इसकी एक प्रक्रिया होती है कि कोई भी मुसलमान अपने मजहबी मसले को लेकर हाकिम के सामने पेश होता है और वो मजहबी हाकिम उसपर अपना फैसला सुनाता है । बरकती के फतवे के मसले में भी ये जानना दिलचस्प होगा कि प्रधानमंत्री मोदी को लेकर क्या मजहबी विवाद था या फिर किसने फतवे की अर्जी दी थी । शाही इमाम बरकती को इस मसले को साफ करना चाहिए । इस मसले की मांग तो मुस्लिम बुद्धिजीवी की तरफ से भी की जानी चाहिए कि बरकती ने किस मजहबी विवाद को सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ फतवा जारी किया क्योंकि इस्लाम में फतवे की बड़ी भूमिका है वो और वो संचित होते रहते हैं ताकि भविष्य में इस तरह के मसलों पर राय दी जा सके । फतवे जो हैं वो मुस्लिम उम्मते के लिए लिटरेचर बन जाते हैं जिसका उपयोग स्थनीय स्तर तक किया जाता है । जब भी मुस्लिम समुदाय के बीच किसी तरह का विवाद होता है तो लोग स्थनीय मौलवी के पास जाते हैं इस वक्त वो मौलवी मजहबी हाकिम के फतवों का सहारा लेकर विवाद सुलझाने की कोशिश करता है । इस संदर्भ में यह जानना और जरूरी है कि बरकती ने किसकी शंका पर फतवा जारी किया । तीन तलाक के मुद्दों पर जिस तरह से कुछ मुस्लिम संगठन विरोध कर रहे हैं उनका आधार ये फतवे ही हैं । तीन तलाक को लेकर तरह तरह के फतवे दिए गए हैं जो विरोधाभसी हैं ।
बरकती के इस फतवे से कई सवाल खड़े होते हैं । पहला सवाल तो राज्य सरकार पर ही खड़ा होता है जिसकी चर्चा उपर की जा चुकी है । दूसरा सवाल खड़ा होता है कि इस तरह के धर्मगुरुओं को सियासत में सीधे पर उतरना चाहिए । किसी मस्जिद के सदर को प्रधानमंत्री के खिलाफ उकसाने का हक किसने दिया । तीसरा सवाल उठता है उन बुद्धिजीवियों पर जो हर बात पर छाती कूटते रहते हैं । उन बुद्धिजीवियों पर जो भारतीय जनता पार्टी के सांसद साक्षी महाराज जैसे लोगों के बयान पर तो शोर शराबा करते हैं लेकिन बरकती जैसों की इन हरकतों पर खामोश रह जाते हैं । जिन बुद्धिजीवियों को तमिलनाडू से लेकर केरल तक, महाराष्ट्र से लेकर गुजरात तक ये लगता है कि लेखकों की अभिव्यक्ति की आजादी पर पहरा लगा दिया गया है वो बुद्धिजीवि बरकती के फतवे पर खामोश हैं । साध्वी प्राची जैसी महिला जो भारतीय जनता पार्टी से नहीं जुड़ी है उसके बयान के आधार पर प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा लोग इस वक्त खामोश क्यों हैं, असहिष्णुता के मुद्दे पर डंडा-झंडा लेकर शोरगुल करनेवाले लोग इस वक्त कहां हैं । अब अगर हम सवाल दर सवाल इनके जवाब ढूंढने की कोशिश करते हैं तो चौंकानेवाली तस्वीर सामने आती है । अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने धर्म के आधार पर वोट मांगने को लेकर सख्त निर्णय दिया है । बरकती के इस फतवे के बाद सुप्रीम कोर्ट के उक्त फैसले को व्याख्यित करने की जरूरत है । क्या धर्म के नाम पर प्रत्यक्ष रूप से वोट मांगना ही गलत है या फिर परोक्ष रूप से भी सियासी फायदा लेना गलत है । पश्चिम बंगाल में करीब अट्ठाइस फीसदी मुसलमानों के वोट हैं । इन्हींवोटों को चक्कर में पश्चिम बंगाल में बरकती जैसी शख्सियतों को बढ़ावा दिया जाता है । इन्हीं मुस्लिम वोट बैंक के चक्कर में वामपंथी सरकारों से लेकर ममत बनर्जी सरकार तक तस्लीमा नसरीन को कोलकाता से निर्वासित कर देती है । तुष्टीकरण की इस नीति के खिलाफ भी कभी सहिष्णु बुद्धिजीवियों ने कुछ बोला, लिखा हो ज्ञात नहीं है । वामपंथ में आस्था रखनेवाले बौद्धिकों का ये दोहरा चरित्र बेहद खतरनाक है क्योंकि इसका असर सियासत पर तो पड़ता ही है , साहित्य को भी ये गहरे तक प्रभावित करता है । पाठकों को लगता है कि उसका नायक, जो लेखक होता है, ईमानदार नहीं है । जब पाठक इस तरह की प्रवृत्ति को लक्षित करता है तो उसका भरोसा लेखकों से उठने लगता है जो आगे चलकर साहित्य को भी प्रभावित करता है ।


Friday, June 17, 2016

लाभ के पद को लेकर भ्रम

दिल्ली विधानसभा चुनाव में जब आम आदमी पार्टी ने सत्तर में से सड़सठ सीटें जीती थीं तब ना तो पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल को और ना ही उनके इक्कीस विधायकों को ये अंदाज रहा होगा कि उनको पांच साल के पहले एक बार फिर से चुनाव मैदान में जाना पड़ेगा । अब इस बात के आसार बन रहे हैं कि सड़सठ में से इक्कीस विधायकों को पांच साल के पहले ही जनता की अदालत में जाना पड़े । दरअसल ये पूरा मामला लाभ के पद से जुड़ा है । केजरीवाल को दिल्ली की जनता ने 70 में से 67 सीटें जिताकर विराट बहुमत दिया था । इस विराट बहुमत और जनता की अन्य राजनीतिक दलों से नाराजगी की वजह से केजरीवाल सरकार ने केंद्र से दो दो हाथ करने की ठान ली थी । लंबे समय तक उपराज्यपाल से उनकी ठनी हुई है ।  दिल्ली की स्थिति देश के अन्य राज्यों से अलग है और यहां के नियम कायदे भी अलग हैं । केजरीवाल ने कई नियमों को चुनौती देने का जोखिम उठाना शुरू कर दिया । संविधान और कानून की व्याख्या अलग अलग तरीके से होने लगी । केजरीवाल सरकार ने कई नियमों को अदालत में तो कई को मीडिया के मंचों के पर चुनौती दी । इसी कोलाहल के बीच केजरीवाल सरकार ने अपने इक्कीस विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त कर दिया और अलग अलग मंत्रालयों से उनको अटैच कर दिया गया । उस वक्त तक दिल्ली में एक संसदीय सचिव नियुक्त करने का प्रावधान था । इस बारे में भी भ्रम की स्थिति है कि एक संसदीय सचिव भी लाभ के पद के दायरे में आता है या नहीं । बीजेपी के शासनकाल के दौरान नंदकिशोर गर्ग मुख्यमंत्री के संसदीय सचिव बनाए गए थे लेकिन जब बाद में उसपर विवाद हुआ को उन्होंने पद छोड़ दिया था । इसी तरह से इस वक्त के दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष अजय माकन भी शीला दीक्षित के संसदीय सचिव रह चुके हैं । तब लाभ के पद का मामला नहीं उछला था । लेकिन जब केजरीवाल ने अपने इक्कीस विधायकों को संसदीय सचिव बनाया तो इसको लाभ का पद मानते हुए एक शख्स ने चुनाव आयोग के समक्ष याचिका दायर कर दी । विवाद बढ़ता देख दिल्ली सरकार ने विधानसभा में एक बिल पास करवाया जिसमें संसदीय सचिवों को लाभ के पद के दायरे से बाहर करते हुए इसको भूतलक्षी ( रेट्रोस्पेक्टिव) प्रभाव से लागू कर दिया ताकि उनके विधायकों पर कोई आंच नहीं आए । लेकिन इस बिल को राष्ट्रपति ने मंजूरी देने से इंकार कर दिया ।

राष्ट्रपति के इंकार करने के बाद दिल्ली की आम आदमी पार्टी और उसके सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल आगबबूला हैं और प्रधानमंत्री मोदी पर अपनी सरकार को अस्थिर करने का आरोप लगा रहे हैं । बीजेपी और आम आदमी पार्टी दोनों एक दूसरे पर बयानों की तीरंदाजी कर रहे हैं । आम आदमी पार्टी को लग रहा है कि उनके इक्कीस विधायक गंभीर संकट में फंस गए हैं तो वो इसका भी राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं । हर बार की तरह इस बार भी उनके निशाने पर सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं ।  दरअसल इस मसले पर. ऐसा लगता है कि, आम आदमी पार्टी से गलती हो गई है लेकिन अपनी गलती को छुपाने के लिए अब इस तरह की दलीलें भी दी जा रही हैं कि उनके विधायकों ने किसी प्रकार का कोई धनालाभ या अन्य आर्थिक लाभ सरकार से नहीं लिया । कहा तो यहां तक जा रहा है कि उनके विधायकों ने संसदीय सचिव के लिए बने दफ्तरों का इस्तेमाल भी नहीं किया । लेकिन इस मामले में शिकायतकर्ता का दावा है कि उनके पास एक आरटीआई का जवाब है जिसमें बताया गया है कि विधानसभा परिसर में इन सभी इक्कीस संसदीय सचिवों को दफ्तर के लिए कमरे अलॉट किए गए थे । ये सारा मामला अब चुनाव आयोग के समक्ष है और वो सभी विधायकों का पक्ष सुनने के बाद अपना फैसला सुनाएगा । विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव आयोग को फैसला लेने में करीब छह माह का समय लग सकता है । तबतक राजनीति की बिसात पर शह और मात का खेल चलता रहेगा । लेकिन यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि दो हजार छह में सोनिया गांधी ने जब राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के अध्यक्ष का पद संभाला था तब उनको लेकर भी सवाल खड़े हुए थे और उन्होंने रायबरेली के सांसद के तौर पर इस्तीफा देकर फिर से चुनाव लड़ा था । इसी तरह से समाजवादी पार्टी की राज्यसभा सांसद जया बच्चन भी जब यूपी फिल्म विकास निगम की अध्यक्ष नियुक्त की गई थी तब उनकी सदस्यता भी गई थी । बाद में वो फिर से चुनकर आई थी । इसलिए यह माना जाना चाहिए कि दिल्ली में इक्कीस सीटों पर फिर से चुनाव होना लगभग तय है, वक्त चाहे जितना लगे । दरअसल संसदीय सचिवों को लेकर हर राज्य में अलग अलग कायदे कानून हैं । पूर्वोत्तर के कई राज्यों में जहां साठ विधायकों वाली विधानसभा है वहां भी अठारह संसदीय सचिव हैं लेकिन जब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने दो हजार तेरह में तेरह संसदीय सचिवों की नियुक्ति की तो कलकत्ता हाईकोर्ट ने उसको जून दो हजार पंद्रह में रद्द कर दिया जबकि ये नियुक्तियां दो हजार बारह के एक कानून के तहत की गई थी । कई राज्यों के हाईकोर्ट ने संसदीय सचिवों की नियुक्तियों को रद्द कर दिया है जिसके खिलाफ राज्यों की कई अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित है । हिमाचल प्रदेश का मामला तो 2005 से सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है । इस मामले में अलग अलग राज्यों में भ्रम की स्थिति होने से अब वक्त आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट संविधान की उचित व्याख्या कर स्थिति को साफ करे ।     

Monday, April 6, 2015

कट्टरपंथियों पर हल्ला बोलना होगा

कोलकाता में एक बार फिर से धर्म के नाम पर हिंसा का खेल खेला गया । एक मदरसे के हेडमास्टर पर उसके स्कूल में घुसकर जानलेवा हमला किया गया । चिंता की बात तो ये है कि पुलिस की मौजूदगी में मासूम अख्तर नाम के इस शख्स पर हमला होता रहा और बंगाल पुलिस खामोशी के साथ असहाय खड़ी रही । मासूम अख्तर का दोष सिर्फ इतना है कि उसने बर्धवान धमाके को लेकर एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने यह संकेत दिया था कि अगर किसी मदरसे से आतंकवाद की घटनाओं को अंजाम दिया जाता है या फिर मदरसे में आतंकवाद को पनाह दिया जाता है तो उसको भंग कर दिया जाना चाहिए । यह बात इस्लामी कट्टरपंथियों के गले नहीं उतरी और इस लेख के बाद मासूम अख्तर को धमकियां मिलने लगीं । फिर बहाना मिला ईशनिंदा का । अपने एक क्लास में मासूम अख्तर मे ऐतिहासिक संदर्भ में पैगंबर मोहम्मद की शिक्षा को लेकर टिप्पणी की । वह टिप्पणी इस संदर्भ में थी बगैर किसी औपचारिक शिक्षा के पैगंबर ने दुनिया में ज्ञान का प्रकाश फैलाया । लेकिन कट्टरपंथियों ने क्लास में दिए मासूम के वक्तव्य को इस तरह से पेश कर दिया कि उसने पैगंबर की शिक्षा पर सवाल खड़े किए । यह बात जंगल में आग की तरह फैली और फिर मासूम अख्तर के स्कूल में घुसकर कट्टरपंथियों ने उनपर लाठी और सरिए से वार किया । अस्पताल में इलाज करा कर घर लौटे मासूम अख्तर को अब भी जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं । वो सरकार से गुहार लगा रहे हैं, उनको कार्रवाई का भरोसा मिल रहा है लेकिन स्तंभ लिखे जाने तक हमलावर आजाद घूम रहे हैं । मासूम अख्तर को इस बात का डर है कि उनका हश्र भी बांग्लादेश के उन ब्लागरों जैसा ना हो । पिछले दिनों बांग्लादेश में दो ब्लागरों को कट्टरपंथियों ने मौत के घाट उतार दिया । इसके पहले भी ईशनिंदा के आरोप में पाकिस्तान के सूबे के गवर्नर को भी गोली मार दी गई थी । सलमान रश्दी पर भी यही आरोप है, तस्मीमा पर भी । मासूम अख्तर को भी यही धमकी मिल रही है कि तुम सलमान रश्दी बनना चाहते हो तो सुधर जाओ वर्ना अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहो । क्या यह अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला नहीं है । हमारा संविधान किसी भी नागरिक को अपनी बात कहने का हक देता है । इस हक की सीमा वहां तक है जहां कि किसी को नुकसान ना पहुंचे या उसकी प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आए । अभी हाल के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की धारा 66 ए को खत्म करते हुए भी कहा था कि संविधान में मिली अभिव्यक्ति की आजादी से कोई समझौता नहीं किया जा सकता है । सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि आईटी एक्ट की धारा 66 ए से अभिव्यक्ति की आजादी बाधित होती है लिहाजा उस धारा को रद्द कर दिया । एक तरफ जहां सुप्रीम कोर्ट अभियक्ति की आजादी की रक्षा के लिए भारत सरकार के कानून को रद्द कर दे रहा है वहीं दूसरी ओर एक शख्स अपने इस अधिकार की रक्षा के लिए दर बदर भटक रहा है । बंगाल की ममता सरकार की चुप्पी मासूम के लिए जानलेवा साबिकत हो सकती है ।  उसकी जान खतरे में है लेकिन कोई देखनेवाला नहीं, कोई सुनने वाला नहीं, कोई कानून सम्मत काम करने के लिए आगे आना वाला नहीं । हमारे मजबूत होते लोकतंत्र के लिए यह बहुत ही चिंता का विषय है ।
अब हम मासूम अख्तर के बहाने से अगर इस बात की पड़ताल करें कि क्यों ममता सरकार इस पर सख्ती से पेश नहीं आ रही है । क्यों बंगाल पुलिस त्वरित कार्रवाई कर मासूम के जान की गारंटी नहीं दे पा रही है  । क्यों हमलावरों को गिरफ्तार नहीं किया जा रहा है ? क्यों हमलावरों की खुलेआम पैरोकारी करने वाले इमाम की गिरफ्तारी नहीं हो रही है ? क्यों मासूम अख्तर को सुरक्षा नहीं दी जा रही है ? अगर हम इन सवालों से मुठभेड़ करते हैं तो नतीजे पर पहुंचते हैं कि इसके पीछे सियासी और वोट बैंक की राजनीति है । पश्चिम बंगाल की आबादी में से करीब छब्बीस फीसदी हिस्सा मुसलमानों का है। कई लोकसभा और विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं को मत निर्णायक होता है । अब इसी चुनावी गणित की वजह से बंगाल का में राजनीतिक दल कट्टरपंथियों के खिलाफ मुंह खोलने की हिमाकत नहीं कर पाते हैं । पश्चिम बंगाल वामपंथियों का गढ़ रहा है । वामपंथी हमेशा से अपने आपको अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकार के तौर पर पेश करते रहे हैं । मकबूल फिदा हुसैन के चित्रों को लेकर जब विवाद उठा था तो इन वामपंथियों ने आसमान सर पर उठा लिया था । लेकिन यही वामपंथी नेता, विचारक, लेखक उस वक्त खामोश रहे जब पश्चिम बंगाल की सरकार ने बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन को वहां से निकाल दिया । वही वामपंथी नेता इलस वक्त भी खामोश हैं जब मासूम अख्तर अपनिी जान बचाने के लिए भागा भागा फिर रहा है ।  उस वक्त आसमान सर पर उठा लेने वाली ममता बनर्जी जब सूबे की मुख्यमंत्री  बनी तो वो तस्लीमा के मसले पर खामोश रहीं । तस्मीमा को अब भी बंगाल में कदम रखवे की इजाजत नहीं है, उसकी किताबों को कोलकाता पुस्तक मेले में बेचे जाने पर अघोषित रोक है । अगर गलती से कोई प्रकाशक तस्मीमा की किताब बेचने लगता है तो वहां हंगामा होता है या हंगामे की कोशिश होती है । तस्लीमा को बंगाल से बाहर करने को लेकर एक मौलाना खुलेआम गरजते हैं कि हां उन्होंने बाहर किया तस्मीमा को लेकिन ना तो वामपंथी नेता और ना ही ममता बनर्जी उसका विरोध करती है, कार्रवाई की बात तो दूर  । वामपंथियों के इसी चुनिंदा विरोध की वजह से उनकी साख रसातल में चली गई । राजनीति में उनके घटते समर्थन का असर साहित्य पर भी दिखा और साहित्य में वामपंथियों की गिरोहबंदी कमजोर पड़ती नजर आने लगी । खैर यह एक अवांतर प्रसंग है जिसपर कई फिर विस्तर से चर्चा होगी ।
मासूम अख्तर के बहाने से एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है वह है देश में अभिव्यक्ति की आजादी का । क्या किसी भी शख्स को वाजिब सवाल उठाने पर जान से मार देने की धमकी मिलेगी या फिर उसे जान से मार दिया जाएगा । क्या भारत में भी कट्टरपंथियों के हौसले इतने बुलंद हो जाएंगे कि उनको कानून का खौफ नहीं रहेगा । क्या वोटबैंक की इस राजनीति को लोकतंत्र को कमजोर करने की इजाजत दी जा सकती है । इन सवालों के आलोक में देशभर में बहस होनी चाहिए । हमारा मानना है कि इस्लाम को मानने वाले सभी कट्टरपंथी नहीं हो सकते हैं । मासूम अख्तर जैसे विवादित मसलों पर मुसलिम इंटलैक्चुअल को सामने आना होगा और उनको सही तस्वीर पेश करनी होगी । अपनिी राय से देश को अवगत करवाना होगा । इस तरह के मसलों पर मुस्लिम बौद्धिक का खामोश रहना कट्टरपंथियों को मौन समर्थन देने जैसा है । इससे यह भी संदेश जाता है कि इस्लाम में कट्टरपंथ है जबकि ऐसा है नहीं । अव्वल तो सभी लोगों को इस तरह के कदमों का और इस तरह की राजनीति का विरोध करना होगा लेकिन अगर इसी धर्म को मानने वाले लोग अंदर से अपनी बात कहेंगे तो उसका दूसरा असर होगा । देश के सियासतदां को लगेगा कि मुसलमानों के बीच भी अलहदा सोच रखनेवाले लोग हैं । इससे उनको यह भी संदेश जाएगा कि वोट बंट सकते हैं । इस संकेत को बाद संभव है कि वो कोई कार्रवाई कर सकें या कम से कम इस दिशा में कोई कदम तो उठा सकें ।

जिस तरह से मुस्लिम बैद्धिकों से अपेक्षा की जाती है कि वो कट्टरपंथियों के खिलाफ बोलें, उठ खड़े हों , उसी तरह से सभी बौद्धिकों को समान रूप से इस तरह की घटनाओं के विरोध में लिखना चाहिए याजिस भी तरीके से हो सके विरोध जताना चाहिए । यह खतरा उठाना होगा । दरअसल हमारे देश के बौद्धिक जगत में वामपंथी विचारधारा के दबदबे ने इस तरह का माहौल बना दिया है कि अगर मुसलमानों के कट्टरपंथ के बारे में लिखोगे तो संघी करार दिया जाएगा । आपकी धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़े होने लगेंगे । इसी माहौल की वजह से लेखक विचारक इस मसले पर बोलने से कतराते हैं । हिंदी के मशहूर लेखक राजेन्द्र यादव तो हमेशा कहते थे कि मुसलमानों के मसले पर हम क्यों बोलें वो खुद अपने मसलों पर बोलें । दरअसल हमें इस सोच को बदलने की आवश्यकता है । सच को सच कहना ही होगा । वर्ना मासूम अख्तर जैसे शख्स दर बदर भटकते हुए किसी दिन मार दिए जाएंगे और कट्टरपंथियों के हौसले बुलंद होंगे और सियासतदां उनकी कब्र पर वोट की लहलहाती फसल देख कर खुश होते रहेंगे ।       

Wednesday, January 15, 2014

बलात्कार, मीडिया और समाज

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने से लेकर उसके मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बंगले और मंत्रियों की गाड़ी पर मचे कोलाहल और शोरगुल के बीच राष्ट्रीय मीडिया ने कई बड़ी खबरों की या तो अनदेखी कर दी या फिर उस आवेग से उसको नहीं उठाया जिसकी वो खबरें हकदार थी । राष्ट्रीय मीडिया की अनदेखी की शिकार हुई पश्चिम बंगाल के मध्यमग्राम में नाबालिग से बलात्कार और उसे जिंदा जलाकर मार डालने मौत की दिल दहला देने वाली खबर । दिसंबर दो हजार बारह में जब दिल्ली में एक मेडिकल की छात्रा के साथ गैंगरेप हुआ था तो पूरे देश में बलात्कार जैसी घिनौनी वारदात के खिलाफ माहौल बनाने में मीडिया ने अहम भूमिका निभाई थी और लगातार कवरेज की वजह से सरकार बलात्कार के खिलाफ कडे कानून बनाने को मजबूर हुई थी । सोनिया गांधी से लेकर प्रधानमंत्री तक बयान देने को मजबूर हुए थे । अब मीडिया को आम आदमी पार्टी के उत्थान में ऐसी क्रांति दिखी कि बाकी सभी खबरें उससे छूटती चली गई । पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से चंद किलोमीटर दूर मध्यमग्राम में बिहार की एक सोलह साल की लड़की को अगवा कर गैंगरेप की वारदात को अंजाम दिया जाता है । अपराधियों के हौसले इतने बुलंद थे कि पीड़ित लड़की जब अपने परिजनों के साथ थाने में केस दर्ज करवा कर लौट रही थी उसके साथ दोबार रेप किया और उसे जिंदा जला दिया । पुलिस आरोपियों को पकड़ने की बजाए पीड़ित परिवार को कठघरे में खड़ा कर रही है । यह कोई मामूली घटना नहीं थी जिसे पुलिस रुटीन अपराध की तरह से लेती तफ्तीश करती । यह एक असाधारण अपराध था जिसमें पुलिस को असाधारण तरीके से कहर बनकर अपराधियों पर टूट पड़ना चाहिए था । वारदात और उसके दोहराव ने यह साबित कर दिया कि अपराधियों के मन में राज्यसत्ता, पुलिस और कानून का कोई भय नहीं था । पश्चिम बंगाल में पिछले दिनों औरतों के खिलाफ अपराध में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है । दरअसल अपराध पर होनेवाली राजनीति इसकी वजह हैं । बढ़ते अपराध को रोकने में नाकाम रही ममता सरकार इसके लिए विरोधी दलों को जिम्मेदार ठहराती रही है । आरोप प्रत्यारोप के खेल में पुलिस की नाकामी पर पर्दा पड़ता है पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाता है । बंगाल के मध्यमग्राम बलात्कार कांड को भी सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने राजनीतिक रंग देकर अपनी नाकामी और अकर्मण्यता छुपाने की जोरदार कोशिश की है । ममता बनर्जी के सिपहसालार मकुल रॉय विपक्ष पर हमलावर दिखे और उनपर बलात्कार के बहाने सूबे की छवि खराब करने का आरोप लगाते हैं । मुकुल रॉय को यह बात समझनी होगी कि एक भी बलात्कार समाज पर धब्बा तो है ही सरकार के निकम्मेपन का भी प्रमाण है । एक ऐसे सूबे का जहां कि मुख्यमंत्री महिला हो वहां महिलाओं के खिलाफ होनेवाले अपराध में इजाफा चिंता का विषय है । चिंता का सबब तो कड़े बलात्कार के कानून के बावजूद ऐसे अपराधों पर अंकुश नहीं लग पाना भी है। दरअसल अगर हम गहराई में विचार करें तो बलात्कार हमारे समाज का एक ऐसा नासूर है जिसका इलाज कड़े कानून के अलावा हमारे रहनुमाओं की इससे निबटने की प्रबल इच्छा शक्ति भी है।
बलात्कार से निबटने के लिए समाज के रहनुमाओं की इच्छा शक्ति तो दूर की बात है जरा महिलाओं को लेकर उनके विचार देखिए । शिया धर्म गुरु कल्बे जव्वाद कहते हैं – लीडर बनना औरतों का काम नहीं है, उनका काम लीडर पैदा करना है ष कुदरत ने अल्लाह ने उन्हें इसलिए बनाया हैवो घर संभाले और अच्छी नस्ल के बच्चे पैदा करें । रामजन्मभूमि न्यास के महंथ नृत्यगोपाल दास की बात सुनिए- महिलाओं को अकेले मठ, मंदिर और देवालय में नहीं जाना चाहिए । अगर वो मंदिर, मठ या देवालय जाती हैं तो उन्हें पति, पुत्र या भाई के साथ ही जाना चाहिए नहीं तो उनकी सुरक्षा को खतरा है । ये तो थी धर्म गुरुओं की बात । जरा महिलाओं को लेकर राजनेताओं के विचार जान लेते हैं- लंबे समय तक गोवा के मुख्यमंत्री रह चुके कांग्रेस नेता दिगंबर कामत ने कहा था- महिलाओं को राजनीति में नहीं आना चाहिए क्योंकि इससे समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । राजनीति महिलाओं को क्रेजी बना देती है । समाज के बदलाव में महिलाओं कीमहती भूमिका है और उन्हें आनेवाली पीढ़ी का ध्यान रखना चाहिए । समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह का बयान- अगर संसद में महिलाओं को आरक्षण मिला और वो संसद में आईं तो वहां सीटियां बजेंगी । इस वक्त के केंद्रीय मंत्री ने तो सारी हदें तोड़ते हुए कहा था कि – बीबी जब पुरानी हो जाती है तो मजा नहीं देती है । इन बयानों को देखकर ऐसा लगता है कि महिलाओं के प्रति हमारे समाज की जो सोच है वो धर्म, जाति, संप्रदाय से उपर उठकर तकरीबन एक है और ही सोच महिलाओं के प्रति होनेवाले अपराध की जड़ में है । धर्मगुरुओं और नेताओं के इस तरह के बयान से समाज के कम जागरूक लोगों में यह बात घर कर जाती है कि महिलाएं तो मजा देने के लिए हैं या मजा की वस्तु हैं । इस तरह के कुत्सित विचार जब मन में बढ़ते हैं तो वो महिलाओं के प्रति अपराध की ओर प्रवृत्त करते हैं । उन्हें इस बात से बल मिलता है कि उनके नेता या गुरु तो महिलाओं को बराबरी का दर्जा देते ही नहीं हैं । जरूरत इस बात कि है कि समाज के जो आदर्श होते हैं ।

सुप्रीम कोर्ट भी समय समय पर बलात्कार के खिलाफ अपनी चिंता जता चुका है । कुछ वक्त पहले ही सर्वोच्च अदालत ने ये जानना चाहा था कि क्या समाज और सिस्टम में कोई खामी आ गई है या सामाजिक मूल्यों में गिरावट आती जा रही है या पर्याप्त कानून नहीं होने की वजह से ऐसा हो रहा है या फिर कानून को लागू करनेवाले इसे ठीक से लागू नहीं कर पा रहे हैं । पश्चिम बंगाल की घटना के मामले में तो साफ है कि कानून को लागू करनेवाले इसे ठीक से लागू नहीं कर पा रहे हैं । थाने से वारदात की शिकायत कर घर लौटते वक्त अगवा कर फिर से गैंगरेप और अभी तक सरकार की तरफ से लीपापोती की कोशिश- ममता सरकार के लिए शर्मिंदगी का सबब है।  बंगाल सरकार के प्रतिनिधि मामले को दबाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं । उन्हें इस बात का तो दुख है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पीड़ित लड़की से मिलने के लिए अपने पुलिस अफसर को क्यों भेजा, नीतीश ने आर्थिक सहायता क्यों दी आदि आदि । बंगाल सरकार को अपनी छवि खराब होवे की फिक्र है लेकिन उस परिवार की सुध लेने की नहीं जिसकी नाबालिग बेटी के साथ दो बार गैंगरेप हुआ। सवाल तो उन लोगों पर भी उठेंगे जो हाथों में मोमबत्तियां लेकर इंडिया गेट पर खड़े होकर न्याय की मांग करते रहे हैं । क्या जबतक टीवी कैमरे नहीं पहुंचेगें मोमबत्तियां नहीं जलेंगी । अगर हमारा समाज इसी तरह से चुनिंदा होकर जगेगा तो फिर तो इतिहास इस नवजागरण को ही संदेह की दृष्टि से देखेगा  और आने वाली पीढियां हमें माफ नहीं करेंगी । 

Thursday, April 19, 2012

ममता का तुगलकी रवैया

पश्चिम बंगाल की जनता ने बड़ी उम्मीदों से ममता बनर्जी का साथ दिया था और उसी उम्मीद पर सवार होकर ममता ने बंगाल में लेफ्ट पार्टियों का डब्बा गोल कर दिया था । अब तो विश्व की प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम ने भी ममता बनर्जी को सौ ताकतवर शख्सियतों में शुमार कर लिया है । जनता के विशाल बहुमत मिलने से नेताओं के बेअंदाज होने का जो खतरा होता है ममता बनर्जी उसकी शिकार हो गई । जब से ममता बनर्जी सत्ता में आई हैं उनसे अपनी और अपनी नीतियों की आलोचना बर्दाश्त नहीं हो पा रही है । वह अपने और अपनी नीतियों की आलोचना करनेवालों के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रही हैं । पहले सरकारी सहायता प्राप्त पुस्तकालयों में सिर्फ आठ अखबारों की खरीद को मंजूरी और बाकी सभी अखबारों पर पाबंदी लगा कर अखबरों को यह संदेश देने की कोशिश की गई कि सरकार के खिलाफ लिखना बंद करें । ममता बनर्जी की सरकार पर आरोप यह लगे कि उन अखबारों की सरकारी खरीद पर पाबंदी लगाई गई जो लगातार ममता और उनकी नीतियों के खिलाफ लिख रहे थे । जब देशभर में ममता बनर्जी के इस कदम की जमकर आलोचना हुई तो चंद अखबारों को और खरीद की सूची में जोड़ककर उसे संतुलित करने की कोशिश करने का दिखावा किया गया । पिछले दिनों ममता और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का कार्टून बनाने वाले को जेल की हवा खिलाकर ममता बनर्जी ने अपनी फासीवादी छवि और चमका ली है । जाधवपुर विश्वविद्यालय के विज्ञान के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्रा पर आरोप है कि उन्होंने ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं के कार्टून ईमेल पर सर्कुलेट किए । उन कार्टून में ममता बनर्जी और रेल मंत्री मकुल रॉय के बीच दिनेश त्रिवेदी से निपटने की मंत्रणा है जो कि ममता को नागवार गुजरी । प्रोफेसर महापात्रा पर अन्य धाराओं के अलावा आउटरेजिंग द मॉडेस्टी ऑफ वुमेन लगा दी गई है, जिसमें साल भर की सजा का प्रावधान है। लेकिन ममता बनर्जी पुलिस की कार्रवाई को जायज ठहरा रही है। उनकी पार्टी के नेता कोलकाता पुलिस के कदम को उचित करार दे रहे हैं ।
विधानसभा और लोकसभा चुनावों में जीत और बार बार केंद्र सरकार से अपनी बात मनवा लेने से ममता के हौसले सातवें आसमान पर हैं । उन्हें लगता है कि वो बहुत बड़ी नेता हो गई हैं, हो भी गई हैं लेकिन अभी वो बड़े नेता के बड़प्पन को हासिल नहीं कर पाई है । उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि बड़ा नेता वह होता है जिसमें अपनी आलोचनाओं को सुनने और सामना करने का माद्दा होता है । इस संबंध में 1939 का एक वाकया याद आता है । गांधी जी ट्रेन य़ात्रा कर रहे थे, उनके साथ उनके सहयोगी महादेव देसाई भी थे । अचानक महात्मा गांधी के डब्बे में एक युवक आया उसके हाथ में गोंविंद दास कौंसुल की किताब महात्मा गांधी -द ग्रेट रोग(Rogue) ऑफ इंडिया थी । वह युवक उस किताब पर गांधी जी की सम्मति लेना चाहता था । जब वो किताब लेकर गांधी की ओर बढ़ा तो महादेव देसाई ने उसके हाथ से किताब झटक ली और उसका शीर्षक देखकर वो उसे फेंकने ही वाले थे कि इतने में गांधीजी की नजर उस पर पड़ गई । उन्होंने महादेव देसाई से लेकर वह किताब देखी और उस युवक को अपने पास बुलाकर उससे उसकी इच्छा पूछी । युवक जिसका नाम रणजीत था उसने पुस्तक लेखक का पत्र देकर गांधी जी से उस किताब पर उनकी राय पूछी । बगैर क्रोधित हुए गांधी ने किताब को उलटा पलटा और फिर उस पर लिखा- मैंने किताब को उलटा पुलटा और इस नतीजे पर पहुंचा कि शीर्षक से मुझे कोई आपत्ति नहीं है । लेखक जो भी उचित समझे उसे लिखने की छूट होनी चाहिए । ये गांधी थे जो अपनी आलोतना से जरा भी नहीं विचलित होते थे और आलोचना करने वाले को भी अभिवयक्ति की छूट देते थे ।
लेकिन गांधी के ही देश में आज एक नेता का कार्टून बनाने पर एक प्रोफेसर को जेल की हवा खानी पड़ती है । लगता है कि ममता बनर्जी कार्टून के माध्यम को दरअसल समझ नहीं पाई, उनके कदमों से ऐसा ही प्रतीत होता है । दरअसल कार्टूनिस्ट उन्हीं राजनेताओं के कार्टून बनाते हैं जिनकी शख्सियत में कुछ खास बात होती है । आम राजनेताओं के कार्टून कम ही बनते हैं । पूर् विश्व में कार्टून एक ऐसा माध्यम है जिसके सहारे कभी कभी तो पूरी व्यवस्था पर तल्ख टिप्पणी की जाती है जो लोगों को गुदगुदाते हुए अपनी बात कहती है और बहुधा किसी राजनेता या समाज के अहम लोगों के क्रियाकलापों को परखते हैं । आज ममता बनर्जी जैसी नेत्री कार्टून जैसे माध्यम की भावना को समझे बगैर कलाकार को जेल भिजवाने जैसा काम कर रही है उससे उनका कद राजनीति में छोटा ही हो रहा है । किसी प्रोफेसर को झुग्गी झोपड़ी वालों का समर्थन करने पर जेल जाना पड़ता है। उनकी पार्टी के नेता अपेन विरोधियों के साथ वयक्तिगत संबंध नहीं बनाने की वकालत करते हैं । उनकी पार्टी के सांसद खुलेआम यह ऐलान करते हैं कि संसद के सेंट्रल हॉल में वो लेफ् के नेताओं के साथ नहीं बैठ सकते । इस तरह की राजनीतिक छुआछूत का माहौल इस देश में पहले कभी नहीं बना था । यह सही है कि लेफ्ट के शासन काल में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर जमकर अत्याचार हुए । टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन का आरोप है कि लेफ्ट के इशारे पर तृणमूल के कई कार्यकर्ताओं की हत्या भी की गई। लेकिन इन तमाम बातों को आदार बनाकर जिस तरह से ममता विरोधियों की आवाज दबाने का प्रयास किया जा रहा है वह घोर निंदनीय है । ममता बनर्जी को याद होगा कि जब वो लेफ्ट के खिलाफ लड़ाई लड़ रही थी तो उस वक्त बंगाल के बुद्धिजीवियों ने उनका खुलकर साथ दिया था । अब वही बुद्धिजीवी ममता के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं । बंगाल में अभिव्यक्ति की आजादी को बचाने के लिए सड़क पर उतरे लोगों के साथ भी पुलिस ने बदतमीजी की लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। अब वक्त आ गया है कि ममता बनर्जी को भारतीय राजनीति में अपनी गंभीर छवि के बारे में शिद्दत से सोचना चाहिए नहीं तो उनके लिए इतिहास के अंधेरे में गुम होने का खतरा पैदा हो जाएगा । क्योंकि वो किसी पार्टी की मुख्मंत्री नहीं बल्कि पूरे बंगाल की सीएम हैं । लेफ्ट को भी बंगाल ने कई बार भारी बहमनुत से जिताया था लेकिन जब सूबे की आवाम को लगा कि जिसको वो शासन की बागडोर सौंप रहे हैं उस पार्टी में और उस पार्टी के नेताओं में शासन में आने के बाद तटस्थता नहीं रहती है तो उसे भी उखाड़ फेंका । लेफ्ट ने भी वोट बैंक की खातिर तसलीमा नसरीन को बंगाल से निकालने की गलती की थी । जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा । अब ममता भी वही गलती दोहरा रही हैं । क्या इतिहास से वो कोई सबक नहीं लेना चाहती ।