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Saturday, August 1, 2026

परंपरा में गालियों का सौंदर्यशास्त्र


जंतर मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद आंदोलन में शामिल हुए युवक और युवतियों की भाषा और गालियों पर चर्चा हो रही है। साहित्य जगत इससे अछूता नहीं है। साहित्य जगत में भी गालियों पर खूब चर्चा हुई। प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से ऐसी भाषा का उपयोग किया गया जो साहित्यकारों और लेखक/लेखिकाओं से अपेक्षित नहीं थी। राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर गालियों की पैरोकारी की गई। कुछ उत्साही लेखकों ने तो गाली को साहित्य का अभिन्न अंग बता दिया। राही मासूम रजा से लेकर काशीनाथ सिंह के उपन्यासों में गालियों की बात कर अपने तर्कों में वजन डालने का प्रयत्न किया गया। अति उत्साह में वैसी रचनाएं खोजी गईं जिनको गालियों के पक्ष में उद्धूत किया जा सके। पर वहां ये नहीं बताया जा सका कि गालियों में प्रयुक्त शब्दावली कैसी थी और उसका किस संदर्भ में प्रयोग किया गया था। चूंकि ये विवाद साहित्यकारों, लेखकों और कुलेखकों के बीच था इस कारण हमें उन कृतियों पर भी विचार करना चाहिए जिसमें गालियों की भरमार है। विचार तो उसपर भी किया जाना चाहिए कि गालियों का संदर्भ क्या रहा है। किन पात्रों और परिवेश में गालियां दी जाती रही हैं। इस संबंध में राही मासूम रजा के उपन्यास आधा गांव का उदाहरण कई लोगों ने दिया। राही ने अपने उपन्यास आधा गांव में जिन पात्रों के मुंह से गालियां दिलवाई हैं उनका परिवेश और उन परिस्थितियों को भी देखा जाना चाहिए। उसको देखने से ये स्पष्ट हो जाता है कि गालियों का उपयोग लेखक ने कथा को प्रामाणिक बनाने के लिए किया। किसी को अपमानित करने या उसको नीचा दिखाने के लिए नहीं। कटेंट का इटेंट देखना सबसे आवश्यक है। यही स्थिति काशीनाथ सिंह के यहां भी दिखाई देती है। 

जिन लेखकों ने अपने उपन्यासों में गालियों को अश्लीलता के साथ प्रस्तुत किया उनपर भी विचार किया जाना चाहिए। हिंदी में एक उपन्यासकार हुए कृष्ण बलदेव वैद। उनका एक उपन्यास है विमल उर्फ जाएं तो जाएं कहां। इस उपन्यास में अश्लीलता की पराकाष्ठा है। उनकी ये कृति जब प्रकाशित होकर आई थी तो उसकी भाषा को लेकर,स्थितियों के चित्रण में अश्लीलता को लेकर चर्चा हुई थी। आमतौर पर इस तरह की कृतियों के साथ जो होता है वही उनके इस उपन्यास के साथ भी हुआ। समय बीतने के साथ इसकी चर्चा कम होती चली गई। अब तो गाहे बगाहे ही इस उपन्यास का नाम सुनाई देता है। वैद का एक और उपन्यास है उसका बचपन। इस औपन्यासिक कृति को संवेदनशील बचपन की आंख से देखी गई एक बड़ी दुनिया की कथा कहा गया। इसकी भाषा भी अश्लील ही थी। प्रकाशन के बाद इसकी चर्चा हुई लेकिन धीरे-धीरे चर्चा तो खत्म हुई ही ये कृति पाठकों की दृष्टि से ओझल भी हो गई। कहना ना होगा कि कटेंट का इंटेंट बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। वैद ने कभी कहा था कि ये हिंदी साहित्य में उनके खिलाफ साजिश है। उनको ये भी विचार करना चाहिए था कि किस कारण से उनके उपन्यास फौरी तौर पर चर्चित होते थे और फिर नेपथ्य में चले जाते थे। दूसरी तरफ निर्मल वर्मा हैं जो उनके ही समकालीन थे। उनके उपन्यासों में भी ऐसी परिस्थियां बनती थीं कि वो अश्लील हो सकते थे। गालियों और स्त्री देह का वर्णन कर सकते थे। उन्होंने अपने भाषा कौशल से उन स्थितियों को अश्लील होने से बचाया। याद पड़ता है उनका एक उपन्यास लाल टीन की छत। इस उपन्यास में निर्मल ने अपने पात्र काया के माध्यम से कथा को आगे बढ़ाया है। काया इस उपन्यास में बचपन और किशोरावस्था के संधिकाल में थी। यहां भी देह के यथार्थ से पात्र का मुठभेड़ होता है। लेखक बेहद संवेदनशील तरीके से उसका बगैर अश्लील हुए पात्र की मन:स्थिति का सफलतापूर्वक चित्रण कर ले जाते हैं। ये उपन्यास भी खूब चर्चित हुआ। अब भी ये हिंदी के पाठकों के साथ साथ गैर-हिंदी पाठकों को अपने शिल्प और भाषाई सौष्ठव के कारण लुभाता है। कंटेंट का इंटेंट साफ है। निर्मल कई बार विसंगतियों को रेखांकित करते हैं लेकिन अर्थहीन नहीं होते। 

कई लोगों ने प्रेमचंद और अमृतलाल नागर के उपन्यासों का नाम लेकर भी गालियों को या अश्लीलता के सार्वजनिक प्रदर्शन को उचित ठहराने का प्रयत्न किया। ऐसे लोगों की हालत भी वैद साहब जैसी होकर रह गई। चर्चा तो मिली लेकिन तर्कों को स्थायित्व नहीं। इंटरनेट मीडिया के जमाने में किसको स्थायित्व की चिंता है। हो भी क्यों ? यहां तो तुरंता प्रसिद्धि के फेर में लोग साहित्यकार बने फिरते हैं। किसी भी चर्चा में छूट ना जें इसलिए उलजलूल लिखकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। उपन्यासकारों के बाद अशोक वाजपेयी की बात कर लेते हैं। आयोजनधर्मी होने के बावजूद आज भी अशोक वाजपेयी को कवि के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। रतिक्रीड़ा की कविताएं लिखनेवाले अशोक वाजपेयी को देह और गेह का कवि ही माना गया। अपनी कविताओं में बाद के दिनों में अशोक वाजपेयी ने मोहक गद्य लिखना आरंभ किया लेकिन कवि के तौर पर पहचान और कविताओं को लोक में स्वीकृति नहीं मिल पाई है। उनकी तुलना में कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह ना केवल कवि के रूप में स्थापित हुए बल्कि कविताओं में वैचारिकी और सिद्धांत के कारण हिंदी साहित्य समाज में समादृत भी हुए। कुंवर जी कविता है- अबकी बार लौटा तो। उसकी कुछ पंक्तियां हैं- अबकी बार लौटा तो/ वृह्तर लौटूंगा। अबकी बार लौटूंगा तो मनुष्यतर लौटूंगा। अबकी बार लौटा तो/ हताहत नहीं/सबके हिताहित को सोचता/ पूर्णतर लौटूंगा। इन पंक्तियों में भारत है। भारत का दर्शन है । अशोक वाजपेयी की तरह पाश्चात्य पांडित्य को भारतीय परिवेश में ढालने की फूहड़ कोशिश नहीं। केदारनाथ सिंह की कविता है घास। इस कविता की आखिरी पंक्ति है कभी भी.../ कहीं से उग आने की/ एक जिद है वह। इस तरह की कई पंक्तियां पाठकों को याद हैं। अशोक वाजपेयी की शायद ही कोई ऐसी कविता हो जो पाठकों को या काव्य रसिकों को याद हो। यह है कंटेंट का इटेंट। इंटेंट अगर फौरी चर्चा है तो वो तो गालियों से मिल सकती है लेकिन कालजयी नहीं हो सकते। 

कुछ लोगों ने विवाहोत्सव में बारातियों के स्वागत में गाई जानेवाली गालियों और  नकटौरा के संवादों में अश्लीलता की बात की। दोनों बातें सही हैं। गालियां दी जाती हैं लेकिन उसका अपना एक सौंदर्यशास्त्र है। विवाहोत्सव के दौरान गाई जानेवाली गालियां शारदा सिन्हा ने खूब गाईं। बिहार में उसको गारी कहते हैं। उसको सुनकर कभी भी उबकाई नहीं आई। विवाहोत्सव और नकटौरा की गालियों में एक रस होता है। वैसा रस जो शब्दों में घुलकर सुननेवाले को आनंद देता है। नकटौरा तो बिल्कुल ही निजी आयोजन होता है। इसके मनोविज्ञान को समझना चाहिए। ये महिलाओं को अपनी बात, अपनी भावनाएं सामने रखने का एक निजी मंच है। इसलिए जंतर मंतर पर दी गई गालियों का गारी और नकटौरा से तुलना हास्यास्पद है। जो अंतर सेंसुअलिटी और सेक्सुअलिटी में है वही जंतर मंतर की गालियों और गारी में है। गालियों को लेकर फेसबुक आदि पर लिखी टिप्पणियों से कई लेखकनुमा जीवों का अज्ञान सामने आ गया।   


Saturday, August 9, 2025

अश्लीलता अस्वीकार


हाल ही में सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने 25 ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म के प्रसारण पर रोक लगा दी। इनमें उल्लू जैसे प्लेटफार्म भी हैं जहां लगभग अश्लील साम्रगी दिखाई जाती थी। इसके अलावा आल्ट और देसीफ्लिक्स जैसे फ्लेटफार्म्स पर भी पाबंदी लगाई गई है। इन प्लेटफार्म पर बच्चों और महिलाओं से संबंधित अश्लील सामग्री परोसी जा रही थीं। लड़कियों या छोटी बच्चियों को आब्जेक्टिफाई करने का खेल भी इस देश ने देखा है। कुछ वर्षों पहले एक वेबसीरीज आई थी रसभरी। उसमें एक बच्ची को उत्तेजक नृत्य करते हुए दिखाया गया था। इतना ही नहीं इन प्लेटफार्म पर इस तरह की लगभग अश्लील सामग्री में वीडियो के साथ जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया जा रहा था वो द्विअर्थी था। रसभरी वेब सरीज का एक संवाद है जो छोटी बच्ची के उत्तेजक नृत्य के दौरान आता है। बच्ची से उत्तजेक गाने पर नृत्य करवाने की कहानी या कहानी में जो पृष्ठभूमि या संवाद है उससे ही मंशा का पता चलता था। बच्ची के डांस के पहले एक महिला का ये कहना कि, ‘थोड़ा बहुत नाच गाना लड़कियों को आना चाहिए, कल को अपने पति को रिझाए रखेगी’। गाना देखकर वही महिला कहती है कि ‘तेरी बेटी के लक्षण ठीक नहीं लग रहे’ तो दूसरी महिला खास अदा के साथ कहती है कि ‘ये सिर्फ अपने पति को नहीं बल्कि पूरे मुहल्ले को रिझाएगी।‘  अब इस पर विचार करना चाहिए कि ये कैसे संवाद हैं। आमतौर पर इन विषयों पर नहीं बोलने वाले केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के चेयरमैन प्रसून जोशी ने तब इस वेबसीरीज को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज की थी। दृष्य के साथ अगर संवाद भी लगभग अश्लील या द्विअर्थी हो तो वो दर्शकों को अधिक खींचता है। इन प्लेटफार्म का उद्देश्य ही अधिक से अधिक हिट्स हासिल करना होता है। इसके लिए ही इस तरह की सामग्री परोसने में इनको किसी प्रकार का गुरेज नहीं होता है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने बहुत सोच विचार के बाद और काफी समय देने के बाद इन प्लेटफार्म्स पर पाबंदी लगाई। यहां तो बरसों से इस तरह की अश्लील सामग्री दिखाई जा रही थी। उल्लू की बेवसाइट पर जाकर तो सहज ही अनुमान हो जाता था कि वहां किस तरह की सामग्री पेश की जाती रही होगी। ऑल्ट एप का गूगल पर दिखाई देनेवाला पेज याद आ रहा है। जब आल्ट आरंभ हुआ था तब गूगल पर ऑल्ट सर्च करने से जो पेज खुलता था उसमें ये बताया जाता था कि ये प्लेटफॉर्म मुख्यधारा की मनोरंजन का विकल्प है। उसके नीचे लिखा होता था रागिनी एमएमएस, गेट हॉट विद रागिनी। फिर एक पंक्ति होती थी हॉट, वाइल्ड एंड लस्टफुल बैयल (सुंदरी)। इसके आगे कहने को कुछ रह नहीं जाता है। इससे मंशा साफ हो जाती है कि प्लेटफॉर्म अपने दर्शकों को क्या दिखाना चाहता है। इस प्लेटफार्म पर अन्य सामग्रियां भी उपलब्ध थीं लेकिन इस तरह की सामग्री भी थी। 

ओटीटी प्लेटफार्म्स पर रेगुलेशन या प्रमाणन की बात लंबे समय से चल रही है। प्रकाश जावड़ेकर जब सूचना प्रसारण मंत्री थे तब भी ये बात उठी थी। उनके कार्यकाल में सूचना और प्रसारण मंत्रालय और इलेक्ट्रानिक्स और सूचना प्रोद्यौगिकी मंत्रालय के मंत्रियों ने संयुक्त पत्रकार वार्ता में ओटीटी के नियमन को लेकर कई तरह की बातें की थीं। उसके बाद जब अनुराग ठाकुर सूचना और प्रसारण मंत्री बने तो उस समय भी ओटीटी प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों के साथ उनकी कई दौर की बातचीत हुई थी। इन प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों ने तब स्वनियमन पर जोर दिया था। उन बैठकों के बाद एक त्रिस्तरीय व्यवस्था बनी थी जिससे स्वनियमन के तंत्र को प्रभावी बनाया जा सके। प्रतीत होता है कि स्वनियमन का तंत्र ब दिखाने के दांत बनकर रह गया है। ओटीटी प्लेटफार्म्स पर अब भी नग्नता और यौनिकता से भरपूर सामग्री मनोरंजन के नाम पर परोसी जा रही हैं। यथार्थ के नाम पर इन बेवसीरीज में गालियों की भरमार रहती है। इस तरह के सीरीज के निर्माताओं का तर्क होता है कि समाज में भी लोग आपसी बोलचाल में गालियों का प्रयोग करते हैं। उनकी कहानी की मांग है कि वो गालियां बकते हुए पात्रों को दिखाएं। उनको लगता है कि हर कहानी में गालियों का प्रयोग करनेवाला संवाद लेखक राही मासूम रजा हो जाएगा। इन तर्कों की आड़ में वेबसीरीज निर्माता बचकर निकलना चाहते हैं। मनोरंजन के एक और विकल्प फिल्म पर बात कर लेते हैं। फिल्मों में गाली हो तो उस अंश को बीप करना होता है क्योंकि वहां प्रमाणन की व्यवस्था है। फिल्मों को रेगुलेट करने के लिए सिनेमैटोग्राफी एक्ट है। चूंकि वेबसीरीज पर किसी प्रकार का कोई नियमन या नियंत्रण नहीं है लिहाजा वहां गालियों की भरमार होती है। फिल्मों में लंबे चुंबन दृष्यों पर कैंची और वेब सीरीज में रति प्रसंगों को फिल्माने की छूट। फिल्मों में विकृत हिंसा के दृष्यों को संपादित करने का नियम तो बेव सीरीज में हिंसा के जुगुप्साजनक दृष्यों की भरमार। 

वेबसीरीज में कहानी की मांग के नाम पर अश्लील दृश्य दिखाने वाले निर्माताओं या प्लेटाफार्मस के कर्ताधर्ताओं का



तर्क होता है कि इंटरनेट पर भी पोर्न साइट उपलब्ध है । जिनको इस तरह के दृष्य देखने होंगे वो वहां बहुत आसानी से देख सकते हैं। इस तरह के तर्क देनेवालों को यह सोचना चाहिए कि इंटरनेट पर मौजूद पोर्न सामग्री और इस तरह के वैध प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध पोर्न को देखने में फर्क है। यहां इसको कहानी की शक्ल में दिखाया जाता है। वो कहानी जिसको भारतीय समाज का चित्रण बाताया जाता है। देखनेवाले को लगता है कि इस तरह की चीजें सामान्य हो सकती हैं। विशेषकर अगर दर्शक अपरिपक्व है तो उसके मस्तिष्क पर इसका प्रभाव गहरा हो सकता है। दूसरा तर्क ये दिया जाता है कि इन प्लेटफॉर्म्स पर वेबसीरीज देखने लोग जानते हैं कि वो क्या देख रहे हैं। इनकी सदस्यता लेते हैं। शुल्क अदा करते हैं और उसके बाद वेबसीरीज देखते हैं। किसी को भी क्या सामग्री देखनी है ये चयन करने का अधिकार तो होना ही चाहिए। यह बात सामान्य तौर पर ठीक लग सकती है कि हर किसी को अपनी रुचि की सामग्री देखने का अधिकार होना चाहिए। यहां प्रश्न खड़ा होता है कि अपरिपक्व दिमाग वाले किशोरों का क्या जिनके हाथ में बड़ी संख्या में स्मार्टफोन है। उसमें इंटरनेट कनेक्शन भी है। इतने पैसे तो हैं कि वो इन ‘ओवर द टॉप’ प्लेटफॉर्म की सदस्यता ले सके। इंटरनेट पर किशोरों के लिए स्वस्थ सामग्री भी है। डिजीटल युग में शिक्षा के कई प्रकल्प इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। छात्रों या किशोरों से ये अपेक्षा की जाती है कि वो एडुकेशन एप का उपयोग करें। जब उसके हाथ में आठ इंच का मोबाइल फोन है तो उसके मन में मनोरंजन को लेकर सहज जिज्ञासा उत्पन्न होती है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि किशोर मन में कुछ भी नया देखने जानने की उत्सुकता अपेक्षाकृत अधिक होती है। किशोर मन अगर कुछ नया देखता है तो बिना उसके अच्छाई बुराई के बारे में विचार किए वो उसके बारे में जानने को उत्सुक हो जाता है। वेबसीरीज के पोस्टर या प्रचार सामग्री में अर्धनग्न तस्वीरें देखता है तो किशोर मन उस बारे में अधिक से अधिक जानने को उत्सुक हो जाता है। यही मन उसको अश्लील सामग्री देखने की ओर ले जाता है। वेबसीरीज एक नेविगेशन का काम करती है। किशोर मन वहां से संतुष्ट नहीं होता है और पोर्न साइट्स की ओर जाता है। वहां उसकी उत्सुकता समाप्त होती है। क्या ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर सामग्री देनेवाली संस्थाएं ये चाहती हैं कि हमारे देश के किशोर मन को अपरिपक्वता की स्थिति से ही इस तरह से मोड़ दिया जाए कि आगे चलकर इस तररह की सामग्री को देखनेवाला एक बड़ा उपभोक्ता वर्ग तैयार हो सके। इसके अलावा जो एक और खतरनाक बात यहां दिखाई देती हैं वो ये कि इन प्लेटफॉर्म्स पर कई तरह के विदेशी सीरीज भी उपलब्ध हैं जहां पूर्ण नग्नता परोसी जाती है। ऐसी हिंसा दिखाई जाती है जिसमें मानव शरीर को काटकर उसकी अंतड़ियां निकाल कर प्रदर्शित की जाती हैं। जिस कंटेंट को भारतीय सिनेमाघरों में नहीं दिखाया जा सकता है उस तरह के कंटेंट वहां आसानी से उपलब्ध हैं। चूंकि वेब सीरीज के लिए किसी तरह का कोई नियमन नहीं है लिहाजा वहां स्वतंत्र नग्नता का प्रदर्शन होता है। बगैर ये सोचे समझे कि क्या भारतीय दर्शकों का मानस इस तरह  सामग्री को देखकर सामान्य व्यवहार कर सकता है। आज इस तरह के समाचार आते रहते हैं कि दुश्कर्म के पहले बलात्कारियों ने या तो इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री देखी। बच्चियों का यौन शोषण करनेवाले अधिकतर अपराधी पीडिता को भी पोर्न दिखाकर अपराध करता है। 

जब भी भारत में ओटीटी पर नियमन की बात होती है तो एक विशेष इकोसिटम से जुड़े लोग शोर मचाने लगते हैं। तत्काल संविधान की दुहाई देने लगते हैं। तर्क ये दिया जाता है कि अभियक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करने का प्रयास किया जा रहा है। ये कहकर एक भ्रम का वातावरण बनाया जाता है। अगर हम देखें तो हमारे संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात तो है लेकिन उसकी सीमा भी तय की गई हैं। संविधान के अनुच्छेद 19 (1) ए अभिय्क्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इस अनुच्चेद की आड़ लेनेवाले अधिकतर समय अर्धसत्य ही बताते/बोलते हैं। संविधान के ही अनुच्छेद 19 (2) में सरकार को ये अधिकार है कि वो समाज हित में इस स्वतंत्रता की सीमा तय करे। अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता तो ठीक है लेकिन जब अभिव्यक्ति अराजक होने लगे तो सरकार को दखल देना ही चाहिए। ऐसा नहीं है कि अगर ओटीटी को लेकर कोई नियमन बनाया जाता है तो भारत ऐसा करनेवाले विश्व का पहला देश होगा। कई देशों में ओटीटी के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश हैं। सिंगापुर में एक प्राधिकरण है। सभी सेवा प्रदताओं को ब्राडकास्टिंग एक्ट के अंतर्गत इस प्राधिकरण से लाइसेंस लेना पड़ता है। ओटीटी, वीडियो ऑन डिमांड और विशेष सेवाओं के लिए एक विशेष कंटेंट कोड है। इसमें सामग्रियों के वर्गीकरण की स्पष्ट व्यवस्था है। सिंगापुर की इस संस्था के पास अधिकार है कि अगर ओटीटी प्लेटऑर्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री कानून सम्मत नहीं है तो उसका प्रसारण रोक सके। जुर्माना लगाने का भी प्रविधान है। ऑस्ट्रेलिया में तो इन प्लेटऑर्म्स पर नजर रखने के लिए ई सेफ्टी कमिश्नर हैं। उनका दायित्व है वो डिजीटल मीडिया पर चलनेवाली सामग्रियों पर नजर रखें। वहां तो विनियमन इस हद तक है कि ई सेफ्टी कमिश्नर दंड के तौर पर सानमग्री के प्रसारण को प्रतिबंधित कर सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया में ओटीटी पर चलनेवाली सामग्री की शिकायत मिलने पर उसके निस्तारण की एक तय प्रक्रिया है। इसके अलावा भी दुनिया के कई देशों में किसी न किसी तरह के दिशा निर्देश लागू हैं। 


केंद्र सरकार को इस बारे में कोई फैसला लेना होगा। स्वनियम की व्यवस्था संतुलित नहीं हो पा रही है। जिस तरह का ट्रेंड देखा जा रहा है उसमें ओटीटी कंटेंट के प्रमाणन की व्यवस्था बनाने की दिशा में सरकार को निर्णय लेना होगा। इस व्यवस्था को लागू करने के लिए वृहद संसाधान की आवश्यकता होगी लेकिन आज नहीं तो कल सरकार को इसपर निर्णय लेना ही होगा। इस मसले को अब और नहीं टाला जा सकता है। इस तरह की कोई ऐसी स्वायत्त संस्था बनाने पर भी विचार किया जा सकता है जो वेब सीरीज पर दिखाए जानेवाले कंटेंट की शिकायत मिलने पर विचार करे और निर्णय ले। इस संस्था को इतना अधिकार देना होगा कि उसके निर्णयों का सम्मान हो। उसको लागू करवाने के लिए उसके पास वैध अधिकार हों।



Saturday, August 7, 2021

अश्लीलता और मुनाफे का खेल


अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति राज कुंद्रा इन दिनों अश्लील फिल्मों के बवंडर में घिरे हैं। थाना,पुलिस,कचहरी और जेल के चक्कर लगा रहे हैं। उनपर आरोप है कि वो एक एप के जरिए अश्लील फिल्मों का कारोबार करते हैं। यह पहली बार हो रहा है कि एक टॉप की अभिनेत्री के पति अश्लील फिल्मों के कारोबार में फंसे हैं। लेकिन ये पहली बार नहीं है कि शिल्पा के पति विवाद में आए हैं। राज कुंद्रा जब राजस्थान रॉयल्स के मालिकों में से एक थे तब उनपर मैच फिक्सिंग का आरोप लगे थे। उनकी गिरफ्तारी भी हुई थी और वो जेल भी गए थे। उनकी टीम राजस्थान रायल्स के खलने पर प्रतिबंध भी लगा था। उसके पहले जब राज कुंद्रा ने शिल्पा शेट्टी से शादी की थी तो उनकी पहली पत्नी और उनके बहनोई के रिश्तों को लेकर भी आरोप प्रत्यारोप का दौर चला था। इस बार राज कुंद्रा पहले के आरोपों से ज्यादा संगीन इल्जाम में फंसे हैं। उनकी पत्नी शिल्पा शेट्टी से भी पूछताछ की जा चुकी है। शिल्पा शेट्टी ने अपनी निजता को लेकर अपील भी की है, उनकी निजता का सम्मान होना चाहिए लेकिन अगर कहीं कानून तोड़ा गया है तो उसकी चर्चा तो स्वाभाविक है। उसमें निजता आदि की बात बेमानी हो जाती है। दरअसल अश्लील फिल्मों का कारोबार पिछले दस साल में कई गुणा बढ़ा है। तकनीक के फैलाव और इंटरनेट के घनत्व के बढ़ते जाने से अश्लीलता के कोष्ठक में रखी जानेवाली सामग्री का चलन काफी बढ़ गया है। अगर गहराई से इसपर विचार करें तो पाते हैं कि राज कुंद्रा पर जो दो आरोप लगे उन दोनों कारोबार में लागत कम और मुनाफा बहुत अधिक है। मैच फिक्सिंग और अश्लील फिल्मों के कारोबार में बहुत अधिक पैसा कमाया जा सकता है। धंधे में इसको ईजी मनी कहते हैं। अश्लील फिल्मों का कारोबार करना हमारे देश के कई कानून के अंतर्गत अपराध माना जाता है और आरोप सिद्ध होने पर दंड का भी प्राविधान है। 

राज कुंद्रा की गिरफ्तारी के बाद इंटरनेट माध्यमों पर उपलब्ध अश्लील सामग्रियों को लेकर देशव्यापी बहस होनी चाहिए। इंटरनेट पर उपलब्ध अश्लील सामग्री को रोक पाना लगभग असंभव है। भारत समेत दुनिया के कई देशों में अश्लीलता के खिलाफ कानून है। कई देशों में दिशा निर्देश है कि मनोरंजन या यथार्थ के नाम पर आप कितना दिखा सकते हैं और कितना छिपा सकते हैं। अमेरिका में फिल्मों में इतना खुलापन है कि वहां स्त्री-पुरुष के बीच के अंतरंग दृश्यों को दिखाया जाता है और उसपर कोई वैधानिक प्रतिबंध नहीं है। इसी तरह से कई यूरोपीय देशों में खुलापन है लेकिन जापान समेत कई देश फिल्मों में इस तरह के दृश्यों को लेकर सचेत हैं और वहां उन दृश्यों में अंगों को छिपाने का दिशा निर्देश है। हमारे देश में इस तरह से कोई स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं है और ये अदालत या जांच एजेंसी के विवेक पर निर्भर करता है। कामुकता और अश्लीलता के बीच एक बहुत ही बारीक रेखा है। उसको परिभाषित करने की अपनी अपनी दृष्टि है। आज फेसबुक से लेकर कई अन्य इंटरनेट मीडिया माध्यमों पर इस तरह की सामग्रियां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी) पर भी अश्लील सामग्रियों की भरमार है। ओटीटी को लेकर नियमन जारी हो गया, संभव है कि उसको लेकर कार्यवाही भी आरंभ हो गई होगी लेकिन यहां उपलब्ध अश्लील सामग्री पर किसी तरह की रोक दिखाई नहीं देती। जितनी जुगुप्साजनक सामग्री पहले उपलब्ध थी वो अब भी है, बल्कि वो बढ़ ही रही है। 

अश्लील फिल्में या सामग्री दिखानेवाले निर्माता या प्लेटफॉर्म अधिक मुनाफा की चाहत में ऐसा करते हैं। पहले ‘सेक्रेड गेम्स’ में नायिका को टापलेस दिखाया गया, ‘लस्ट स्टोरीज’ में उससे एक कदम आगे बढ़ गए। बाद में आई वेब सीरीज में रति प्रसंगों को दिखाया जाने लगा। वेब सीरीज को लेकर किसी तरह की कोई पाबंदी या दिशा निर्देश नहीं होने की वजह से इन निर्माताओं का हौसला बढ़ता चला गया। अश्लीलता को दिखाने का एक अलग ही पैटर्न है। और कई फिल्म निर्माता इस पैटर्न को अपनाते हैं। पहली बार जितना दिखाया जाता है अगली बार उससे अधिक या आगे दिखाने की प्रवृत्ति काम करती है। ये प्रवृत्ति संक्रामक होती है जो दूसरे फिल्म निर्माताओं को भी अपनी चपेट में ले लेती है। अगर हम भारतीय फिल्मों के उदाहरण से इसको समझें तो ये पैटर्न साफ दिखता है। 1970 के बाद ही फिल्मों को लें तो बलात्कार जैसे दृश्यों को दिखाने के लिए पहले फूलों को मसलने से लेकर गिरगिट के फतंगे को खाने के दृष्य को प्रतीक के तौर पर उपयोग में लाया जाता था। फिर जब ये स्थापित हो गया तो निर्माता थोड़ा और आगे बढ़े और नायिका को जबरन पकड़ने और साड़ी आदि खींचने के दृश्य आ गए। अब तो ये प्रवृत्ति नग्नता तक चली गई है। इसका आधुनिकता और समाज के खुलेपन आदि से कोई लेना देना नहीं है बल्कि ये अश्लीलता का व्याकरण है जो इस नियम का पालन करता है जिसमें थोड़ा और, थोड़ा और करते हुए आगे बढ़ते हैं। 

चतुर निर्माता पहले थोड़ा दिखाते हैं और उन दृश्यों को दर्शकों की स्वीकार्यता की प्रतीक्षा करते हैं। उसको बोल्ड, खुलापन आदि कहकर एक सुंदर सा आवरण चढ़ाते हैं। अगर आप हिंदी फिल्मों में किसिंग सीन के विकास क्रम को देखें या नायिकाओं के बिकिनी या कम कपड़े पहनने के चलन के बारे में विचार करें तो निर्माताओं की चतुराई की प्रवृत्ति स्पष्ट दिखती है। ‘संगम’ फिल्म में वैजयंतीमाला के बिकिनी पहनने से फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ में मंदाकिनी के झरने में झीनी साड़ी में स्नान-दृश्य से लेकर फिल्म ‘जिस्म’ तक के दृश्यों में इसको रेखांकित किया जा सकता है। ये सब कहानी की मांग की आड़ में होता है। नायिकाओं के खुलेपन को दिखाने का भी एक कौशल होता है। राज कपूर की फिल्मों में ये कौशल दृष्टिगोचर होता है। वहां खुलेपन में भी एक कलात्मकता होती है या कह सकते हैं कि उस खुलेपन का एक सौंदर्यशास्त्र होता है। कालांतर में ये कलात्मकता गौण होती चली गई और उसका स्थान नग्नता ने ले लिया। यही हाल हिंसा का भी है। अगर आप 1970 के पहले की फिल्में देखें तो उसमें जिस तरह की हिंसा होती थी अपेक्षाकृत उसके बाद हिंसा बढ़ती चली गई। अब तो हालात ये है कि किसी की हत्या के बाद उसके शरीर को इस बुरी तरह के काटा जाता है कि आप चंद सेकेंड उस दृश्य को नहीं देख सकते। पहले पेट में चाकू मारकर हत्या की जाती थी, फिर गोलियों से भूना जाने लगा अब फाइट सीन के बाद खलनायक को नुकीली चीज पर टांग दिया जाता है या फिर धारदार हथियार से मारकर अंतड़ियां तक निकाल दी जाती हैं। परिवार के साथ बैठकर न तो खुलापन देख सकते हैं न ही हिंसा के दृश्य।  

कुछ निर्माताओं या निर्देशकों के बारे में कहा जाता है कि कई बार वो अपनी फिल्मों में निजी कुंठा का प्रदर्शन करते हैं। आप ओटीटी पर चलनेवाले कुछ वेब सीरीज के निर्माता या निर्देशक का नाम देखेंगे और उनके बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे तो ये और भी स्पष्ट हो जाएगा। मानसिक रूप से बीमार या कुंठित कुछ निर्माता यौनिकता के चित्रण में आनंद प्रात करते हैं। उनको जब दर्शक भी मिल जाते हैं तो उनका ये आनंद बढ़ जाता है। अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति राज कुंद्रा की गिरफ्तारी के बाद एक बार फिर से मनोरंजन के नाम पर अश्लील सामग्री परोसने की या अश्लील फिल्मों के निर्माण को लेकर सख्त नियम बनाने की बात शुरू हो सकती है। इंटरनेट माध्यमों पर उपलब्ध नग्नता को काबू में करने की बात और मांग संभव है।   

Saturday, March 20, 2021

लोककलाओं के नाम पर मुनाफे का खेल


कुछ दिनों पहले बिहार पुलिस ने अश्लील भोजपुरी गाने की रचना करने और उसको प्रचारित प्रसारित करने के आरोप में गायक अजीत बिहारी के खिलाफ केस दर्ज करके उनको गिरफ्तार किया। इसके पहले बिहार सरकार ने गानों के माध्यम से अश्लीलता फैलाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया था। दरअसल इंटरनेट मीडिया के फैलाव के बाद कला के नाम पर अराजकता बहुत अधिक बढ़ गई है। ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर चलनेवाले वेब सीरीज को लेकर भी इस तरह की बातें सामने आ रही थीं। काफी दिनों तक चले विमर्श और हाल के दिनों में मचे बवाल के बाद सरकार ने वेब सीरीज या ओटीटी प्लेटफॉर्म पर चलनेवाले कार्यक्रमों को लेकर दिशा निर्देश जारी किए थे। इन दिशा निर्देशों को सर्वोच्च न्यायालय ने नख-दंत विहीन बताया था और उसको और अधिक प्रभावी बनाने की अपेक्षा की थी। इस पर कार्य चल रहा है। अब जब बिहार सरकार ने इंटरनेट मीडिया पर अश्लील सामग्री को लेकर कार्रवाई की है तो इस बात पर बहस होनी चाहिए कि कला के नाम पर इंटरनेट पर चल रहे विभिन्न प्लेटफॉर्म पर किस हद तक छूट मिलनी चाहिए। सिनेमा और गानों के नाम पर इन माध्यमों पर अश्लीलता परोसने को लेकर सरकार को नए सिरे से दिशा निर्देश जारी करने की भी जरूरत है। विचार इस बात पर भी किया जाना चाहिए कि वीडियो प्लेटफॉर्म्स पर लोड किए जानेवाले वीडियो में इसके निर्माता किस हद तक जा सकते हैं। असीमित आजादी बहुधा अराजकता को जन्म देती है। 

विचार भोजपुरी फिल्मों और गानों से जुड़े लोगों को भी करना चाहिए कि आज भोजपुरी सिनेमा किस राह पर चल रही है। भोजपुरी सिनेमा का एक समृद्ध इतिहास रहा है। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने एक जलसे के दौरान भोजपुरी में फिल्म निर्माण की बात की थी। नकी प्रेरणा से ही भोजपुरी में पहली फिल्म बनी थी जिसका नाम था गंगा ‘मैया तोहे पियरी चढ़ैबो’। इस फिल्म में भोजपुरी की संस्कृति जीवंत हो उठी थी। इस फिल्म का निर्माण नाजिर हुसैन ने विश्वनाथ शाहाबादी के साथ मिलकर किया था। ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ैबो’ में लोक संस्कृति के विविध आयाम दिखाई देते हैं।कालांतर में भोजपुरी सिनेमा अश्लीलता का पर्याय बन कर रह गई। भोजपुरी फिल्मों में लोक संस्कृति को इतना विकृत कर दिया गया कि कई बार गैर-भोजपुरी लोग ये सवाल पूछने लगे कि भोजपुरी की संस्कृति में इस तरह की बातें होती हैं क्या? लोक संस्कृति के नाम पर भद्दे और द्विअर्थी संवाद लिखे जाने लगे, गानों में भी इसी तरह की प्रविधि अपनाई गई। संबंधों की गरिमा को भी भोजपुरी फिल्मों में तार-तार कर दिया गया। भाभी और देवर का संबंध इतना पवित्र होता है कि लोक में भाभी को मां समान दर्जा प्राप्त है। भाभी और देवर के बीच मजाक या हंसी-ठट्ठा के प्रसंग लोकगाथाओं में मिलते हैं लेकिन उसको अश्लीलता की छौंक लगाकर बदनाम कर दिया गया। आज भी बिहार की लोक संस्कृति में गाली का रिवाज है। विवाह के अवसर पर ‘गारी’ गाई जाती है, लेकिन जब ‘गारी’ यानि गालियों से भरे गीत गाए जाते हैं तो उससे अश्लीलता का एहसास नहीं होता। जब इन्हीं गालियों को सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए और मुनाफा कमाने के लिए अश्लील दृश्यों के साथ पेश किया जाता है तो लोक संस्कृति विकृत रूप में सामने आती है। 

अंग्रेजी में एक जुमला बार बार कहा जाता है कि कंटेंट (सामग्री) और उसको पेश करने के इंटेंट (मंशा) को साथ मिलाकर ही किसी कला का मूल्यांकन किया जाता है। जब ऐसा होता है तभी किसी कला की वैसी तस्वीर उभर कर सामने आती है जो समग्र मूल्यांकन का आधार बनती है। यहां इंटेंट मुनाफा कमाना है, कला तो कहीं आती ही नहीं है। लोक में व्याप्त रीति-रिवाजों को विकृत करके मुनाफा कमाना कितना उचित है, इसपर बहुत गंभीरता से विचार करना चाहिए। देशभर में लोक कला और संस्कृति के लिए काम करनेवाली कई संस्थाएं और संगठन हैं। इनके कर्ताधर्ताओं को इस बात को लेकर उद्वेलित होना चाहिए कि भोजपुरी जैसी महान संस्कृति को भ्रष्ट करने का ये उपक्रम क्यों चल रहा है। कलात्मक आजादी की वकालत करनेवालों ने कला के नाम पर अश्लीलता और फूहड़ता को बढावा देनेवाले इस तरह के गानों और फिल्मों पर कभी चिंता प्रकट की हो, ज्ञात नहीं हो सका। 

फिल्मों के अलावा जब इंटरनेट का विस्तार हुआ और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर चलनेवाले चैनलों को हिट्स के हिसाब के पैसे मिलने लगे तो इस अश्लीलता और फूहड़ता को पंख लग गए। यौनिकता को फिल्मी आवरण या अश्लीलता को परंपरा का बाना पहनाकर बेचना आसान हो गया था। चूंकि इस माध्यम पर किसी तरह का कोई प्रतिबंध या नियम नहीं है लिहाजा ये प्रवृत्ति और बढ़ती चली गई। एक जमाना था जब लता मंगेशकर और रफी जैसे समर्थ गायक भोजपुरी के गाने गाते थे और शैलेन्द्र और मजरूह जैसे गीतकार भोजपुरी के गाने लिखा करते थे।1965 में एक फिल्म आई थी जिसका नाम था ‘भौजी’ । इसका एक गीत मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा था जिसके बोल थे, ‘ए चंदा मामा आरे आबा पारे आबा नदिया किनारे आबा’ जिसको स्वर दिया था लता मंगेशकर ने। ये गाना बेहद खूबसूरती के साथ फिल्माया गया है। लता मंगेशकर ने संगीत निर्देशक चंद्रगुप्त के साथ कई बेहतरीन भोजपुरी गाने गाए हैं। 

हर देश की हर समाज की अपनी मान्यताएं और परंपराएं होती हैं, पहली जिम्मेदारी तो लोगों की होती है कि वो अपनी परंपराओं और विरासत को बचाकर रखें लेकिन अगर ये नहीं हो पाता है तो सरकार की भूमिका शुरू होती है। कानून बनाने की जरूरत तभी होती है जबकि अपराध बढ़ने लगता है। इस माध्यम पर कला के नाम पर फैल रही अश्लीलता को रोकने के लिए फिल्मों और मनोरंजन उद्योग से जुड़े लोगों को भी आगे आना होगा। अश्लीलता बेचकर मुनाफा कमाने की प्रवृत्तिवाले लोगों की पहचान करके उनको रोकने के लिए उनपर दबाव भी बनाना होगा। अन्यथा फिल्म और गीत संगीत के नाम पर जारी ये खेल लोक संस्कृति को इतना नुकसान पहुंचा देगा कि इसकी भारपाई संभव नहीं हो पाएगी। 

Saturday, February 7, 2015

कहानी पर अश्लीलता के आरोप


जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में स्त्री शक्ति के सत्र में बहुत गर्मागर्मी रही थी । हिंदी की तीन कथाकार उसमें हिस्सा ले रही थी और संचालन कर रहे थे जनसत्ता के संपादक ओम थानवी । कहानी पर बात होते होते इस चर्चा में हिस्सा लेते हुए कथा लेखिका मृदुला बिहारी ने कहा कि इन दिनों स्त्री विमर्श के नाम पर देह विमर्श हो रहा है और कुछ नई लेखिकाएं अपनी रचनाओं में देह का वर्णन करती हैं जो कि काफी अश्लील होता है । स्त्री के नाम पर देह विमर्श की बात बहुत पुरानी है । राजेन्द्र यादव ने जब हंस पत्रिका के माध्यम से स्त्री विमर्श को उठाया था तब भी उनके उपर और पूरे विमर्श के उपर देह विमर्श का आरोप लगता था । कालांतर में कई बार राजेन्द्र यादव को इस तर्क की बिनाह पर घेरने की कोशिश भी की गई । लेकिन मृदुला बिहारी ने देह विमर्श से आगे जाकर नई पीढ़ी की कहानी पर अश्लील होने का आरोप जड़ा । जाहिर है वहां मौजूद युवा दर्शकों को उनका यह कहना नहीं भाया और उन्होंने विरोध दर्ज करवाया । वहां मौजूद कहानीकार गीताश्री ने मृदुला बिहारी को कठघरे में खड़ा करते हुए उनसे अश्लील लेखन करनेवाली लेखिकाओं के नाम पूछे लेकिन बवाल बढ़ता देख संचालक महोदय ने बहस को अन्य दिशा में मोड़ दिया । दरअसल मृदुला बिहारी ने जो कहा या जो आरोप नई पीढ़ी के लेखकों पर लगाया वह और भी कई लोग लगा चुके हैं । अब वक्त आ गया है कि हिंदी साहित्य में अश्लीलता को परिभाषित किया जाना चाहिए । दरअसल सेक्सुअल और सेंसुअल के बीच में हिंदी के लोग फर्क नहीं कर पाते हैं । आजतक कालिदास पर अपनी कृतियों में अश्लील होने का आरोप नहीं लगा और ना ही विद्यापति पर । दोनों ने अपनी रचनाओं में स्त्री पुरुष संबंधों को उठाया है । हिंदी के आलोचक या कुछ लेखक रचनाओं में शुद्धतावाद की पैरवी करते नजर आते हैं । उन्हें लगता है कि स्त्री पुरुष के संबंधों के वर्णन की एक सीमा होनी चाहिए । जो भी उस लक्ष्मण रेखा के करीब जाता है उसपर अश्लीलता का आरोप लगने लगता है । इसी तरह के शुद्धतावादियों ने मंटो की कहानियों पर भी अश्लीलता के आरोप लगाए थे । दरअसल कहानी में वर्णित चरित्रों के चित्रण और उसके बात व्यवहार को लेकर आपत्ति जताई जताई जाती है । इन आपत्तियों को सुनने और कहानी के अश्लील औप बुरे होने के कोलाहल में मुझे 1961 में मोहन राकेश की एक और जिंदगी की भूमिका में लिखे शब्द याद आ रहे हैं ष मोहन राकेश ने लिखा था – कहानी की अच्छाई और बुराई का संबंध इस बात से कदापि नहीं है कि जिन चरित्रों को कहानी में चित्रित किया गया है वे भले हैं या बुरे –अपना सरपत काटकर किसी को दे आते हैं या नहीं । यदि चरित्र की उद्दात्तता ही कहानी की कसौटी है तो गुंडों, जुआरियों , वेश्याओं और घूसखोर अफसरों को लेकर लिखी गई संसार की कहानियां रद्दी हैं । चरित्र की श्रेष्ठता ही,कहानी की श्रेष्ठता है तो संसार की सर्वश्रेष्ठ कहानियां आज से हजार साल पहले लिखी जा चुकी है । मोहन राकेश जो बात साठ के दशक में कह रहे थे वो अब भी मौजूं हैं । कहानियों पर अश्लीलता का आरोप लगानेवालों को इस पर विचार तो करना ही चाहिए कि जब वो नई दृष्टि नई चेतना आदि की बात करते हैं तो उसमें अश्लीलता की बात ना जोड़ें । दरअसल अगर हम विचार करते हैं तो यह पाते हैं कि यह नए कथाकारों और पुराने कथाकारों की सोच और पीढ़ियों में अंतर की वजह से ऐसे आरोप लगते हैं । आज से बीस साल पहले का समाज और आज के समाज में बहुत फर्क है । पहले कहानियों में सहजीवन जैसा विषय विरले ही देखने को मिलते थे लेकिन अब कथाकार बहुत बोल्ड होकर इस तरह के विषयों को अपनी कहानी में उठाते हैं । इससे पुरानी पीढ़ी के लेखकों के मन को ठेस पहुंचती है । अश्लीलता का आरोप तो मृदुला गर्ग के उपन्यास कठगुलाब और मैत्रेयी पुष्पा के दो तीन उपन्यासों पर भी लगा था । इन दोनों लेखिकाओं ने अपनी कलम से स्थापित मान्यताओं की धज्जियां उड़ा दी थी लिहाजा यथास्थितिवादियों के पेट में उस वक्त भी दर्द हुआ था और अब भी हो रहा है । आज की जो पीढ़ी है वह अपने मनोभावों और भावभूमि के आधार पर रचनाएं लिखती हैं । उनकी भाषा उत्तर आधुनिक से भी आगे की भाषा है । अश्लीलता का आरोप दरअसल कुंठा और अज्ञानता की उपज है ।  
आज की कहानी को लेकर जो चिंता है वो यह है कि कहानी की कई फैक्ट्रियां खुल गई हैं । इन दिनों हिंदी साहित्य में कहानियां भी बहुतायत में लिखी जा रही हैं । मांग के आधार पर कहानियां लिखने का चलन काफी भढ़ा है । जिस तरह से लेख लिखे जाते हैं उसी तरह से इन दिनों कहानियां भी लिखी जा रही हैं । कहानीकारों पर शब्द संख्या में कहानी लिखने का दबाव बढ़ा है । पत्र-पत्रिकाओं की अपनी सीमाएं होती हैं और उनके पाठक लंबी कहानियां पढ़ना नहीं चाहते हैं लिहाजा वहां से छोटी कहानियों की मांग होती है । हजार डेढ हजार शब्दों की कहानी । इसका नुकसान यह हो रहा है कि नई पीढ़ी के कथाकार छोटी कहानियां लिख रहे हैं जो कि विस्तार से स्थितियों और परिस्थितियों के चित्रण में नाकाम हो जा रही हैं । पात्रों के मनोभावों को उभारने का ना तो वक्त है और ना ही जगह । परिस्थिति के विशाल फलक से सिमटती हुई कहानी घटना प्रधान होती जा रही है । कहीं कहीं तो कहानी और घटनाओं के विवरण का भेद भी मिट जा रहा है । कहानी से कहानीपन ही गायब होता जा रहा है । यह अकारण नहीं है कि हिंदी के कथा प्रदेश में कई कथाकार फॉर्मूलाबद्ध कहानियां लिखकर ख्यात होने की बेचैनी से विचरण कर रहे हैं । इस वक्त हिंदी में कहानीकारों की पांच पीढ़ियां मौजूद हैं । कृष्णा सोबती और शेखर जोशी सबसे वरिष्ठ पीढ़ी के कथाकार हैं । उसके बाद रवीन्द्र कालिया और दूधनाथ सिंह की पीढ़ी, फिर उदय प्रकाश, शिवमूर्ति की पीढ़ी, उसके बाद अखिलेश से लेकर संजय कुंदन की पीढ़ी और इस वक्त युवा लेखकों की पीढ़ी जिसमें गीताश्री, मनीषा कुलश्रेष्ठ से लेकर बिल्कुल नई कथाकार इंदिरा दांगी और सोनाली सिंह कहानी लिख रही हैं । नई कहानी के दौर में हरिशंकर परसाईं ने कभी कहा था कि जीवन के अंश को अंकित करनेवाली हर गद्य रचना, जिसमें कथा का तत्व हो, आज कहानी कहलाती है ।  कालांतर में यह और भी विकसित हुआ लेकिन कहानी से कथा तत्व का लगातार ह्रास होते रहा । नये विषयों और नई भाव-भूमि और नए यथार्थ की आड़ में कहानी का रूप बदला लेकिन यह रूप हर जगह एक सा ही लगने लगा । कहानी के इस एकरूपता ने कहानी से किस्सागोई गायब कर दी । घटना प्रधान और विवरणों से भरपूर कहानियां थोक के भाव से लिखी जाने लगीं । आज हम कहानी के परिदृश्य पर नजर डालते हैं तो ज्ञानरंजन की घंटा, रवीन्द्र कालिया की काला रजिस्टर, दूधनाथ सिंह की रक्तपात, अमरकांत की हत्यारे, शेखर जोशी की कहानी कोशी का घटवार, शिवमूर्ति का तिरिया चरित्तर, सृंजय का कामरेड का कोट के अलावा उदय प्रकाश की कहानियों याद आती हैं । इन कहानियों के बरक्श आज की कहानियों को रखकर देखने पर स्थिति उत्साहजनक नहीं दिखाई देती है । कविता की तरह अब कहानी भी थोक के भाव से लिखी जाने लगी है । प्रसिद्धि की भागदौड़ में कहानी पीछे छूट रही है । वजह की तलाश होनी चाहिए ।
कहानीकारों से नए की मांग भी उनको कुछ भी उलजलूल करने को बाध्य कर देता है । मोहन राकेश ने अपने उसी लेख में कहा था कि कहानी की नवीनता का संबंध अगर वस्तु और चरित्र की नवीनता के साथ जो़ दिया जाए तो संसार में जितनी कहानियां लिखी जा रही हैं उनमें से एक भी नयी कहानी ढूंढ लेना कठिन काम होगा । उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि कहानी की सार्थकता इस बात में नहीं है कि वह किस नये अजायबघर से कौन सा अजूबा लाकर हमारे सामने पेश करती है । तो कहानी का जो दूसरा नुकसान हो रहा है वह है नए विषय की मांग और उसका दुराग्रह । होना यह चाहिए कि आज की कहानी पर उसके हल्के होते चले जाने और बिल्कुल सपाट तरीके से कह देने पर विमर्श होना चाहिए । उसपर सवाल खड़े करने चाहिए जबकि हो यह रहा है कि कहानी या कहानीकार पर अश्लीलता का आरोप चस्पां कर उसको खारिज किया जा रहा है । मूल चिंता यह है ही नहीं । मूल चिंता तो है कहानियों के पाछक का कम होना ।कहानियों से मानवीय पक्ष और हमारे जीवन की बिडंबनाओं के संकेत का खत्म होना । उसका सपाट होना । कहानीकारों के अनुभूतियों का विस्तार हुआ है लेकिन उन अनुभूतियों को जल्दबाजी में पिरोने से हल्का होने का खतरा बढ़ा है । अब भी वक्त है हिंदी कहानी के संभलने का नहीं तो उसे कविता की गति प्राप्त होते देर नहीं लगेगी ।