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Saturday, September 28, 2024

फिल्मों से गांधी की उदासीनता क्यों ?


कुछ सप्ताह पूर्व मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के सिलसिले में मुंबई जाना हुआ था। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम के परिसर में इस फेस्टिवल का आयोजन था। उसी परिसर में स्थित गुलशन महल में भारतीय सिनेमा के राष्ट्रीय संग्रहालय को जाने और उसको देखने का अवसर प्राप्त हुआ। संग्रहालय में एक जगह गांधी गांधी का पुतला बनाकर उसको कुर्सी पर बिठाया गया है। उनके सामने स्क्रीन पर राम राज्य फिल्म का एक स्टिल लगा हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि महात्मा गांधी राम राज्य फिल्म देख रहे हैं। कहा जाता है कि बापू ने अपने जीवनकाल में एक ही फिल्म देखी थी जिसका नाम है राम राज्य। इस बात का उल्लेख देश-विदेश के कई लेखकों ने किया है। एक बेहद दिलचस्प पुस्तक है ‘द चैलेंजेस आफ सिल्वर स्क्रीन’ जिसमें राम, जीजस और बुद्ध के सिनेमाई चित्रण पर विस्तार से लिखा गया है। इस पुस्तक के लेखक हैं फ्रीक एल बेकर। इस पुस्तक में भी गांधी के राम राज्य देखने की चर्चा की गई है। सिनेमा और संस्कृति पर विपुल लेखन करनेवाली रेचल ड्वायर ने भी अपनी पुस्तक में भी गांधी के राम राज्य देखने का उल्लेख किया है। गांधी और सिनेमा पर लिखी अपनी पुस्तक में इकबाल रिजवी ने विस्तार से और रोचक तरीके से इस प्रसंग पर लिखा है। 

इस पर बाद में चर्चा होगी लेकिन उसके पहले गांधी के फिल्मों और नाटक को लेकर विचार को जानना भी दिलचस्प होगा। फिल्म संग्रहालय में ही कुछ पट्टिकाएं लगी हैं जिनपर कुछ टिप्पणियां प्रकाशित हैं। ऐसी ही एक पट्टिका पर लिखा है, मद्रास (अब चेन्नई) के अत्यंत प्रतिष्ठित वकील बी टी रंगाचार्यार के नेतृत्व में इंडियन सिनेमैटोग्राफ कमेटी रिपोर्ट (आईसीसी) का गठन ब्रिटिश प्राधिकारियों द्वारा सेन्सरशिप विनिमयों में अमेरिकी आयात को रोकने के लिए किया गया था। इस वृहदाकर रिपोर्ट में ब्रिटिश इंडिया के सभी भागों को शामिल किया गया है तथा महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, दादासाहेब फाल्के जैसे सैकड़ों महान हस्तियों के मौखिक एवं लिखित राय शामिल हैं। इसका प्रकाशन 1928 में किया गया। इसके खंड संख्या 4 में पृष्ठ संख्या 56 पर महात्मा गांधी का दिनांक 12 नवंबर 1927 का बयान दर्ज है। जो इस प्रकार है- भले ही मुझे जितना भी बुरा लगा हो मुझे आपके प्रश्नों का उत्तर देना चाहिए। क्योंकि मैंने कभी सिनेमा देखा ही नहीं। लेकिन किसी बाहरी का भी इसने जितना अहित किया है और कर रहा है वो प्रत्यक्ष है। यदि इसने किसी का भला किसी भी रूप में किया है तो इसका प्रमाण मिलना अभी बाकी है। इस टिप्पणी से गांधी की फिल्मों को लेकर राय का स्पष्ट पता चलता है। ऐसा नहीं है कि गांधी जी की फिल्मों को लेकर ये राय अकारण बनी थी। वो जब स्कूली छात्र थे तब नाटक देखा करते थे और उससे प्रभावित भी थे।

संग्रहालय की एक दूसरी पट्टिका पर इसका उल्लेख है, मोहनदास करमचंद गांधी जब स्कूली विद्यार्थी थे उन्होंने एक गुजराती नाटक देखा था, जिसका नाम हरिश्चन्द्र था। इस नाटक का प्रभाव आजीवन उन पर रहा। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है- मैंने किसी ड्रामा कंपनी द्वारा मंचित नाटक को देखने की अनुमति अपने पिता से प्राप्त कर ली थी। हरिश्चन्द्र नामक इस नाटक ने मेरा ह्रदय जीत लिया। मैं इसे देखकर कभी नहीं थकता। लेकिन उसे देखने की अनुमति मैं कितनी बार प्राप्त करता। इसने मुझे परेशान किया और मैं सोचता रहा कि मैंने स्वयं असंख्य बार हरिश्चन्द्र की भूमिका निभाई होती। हम सभी हरिश्चंद्र की भांति सत्यवादी क्यों नहीं होते? यही प्रश्न मुझे दिन रात परेशान किए रखता। हरिश्चन्द्र की भांति सत्य का अनुसरण करना और सारे कष्टों को झेलना एक ऐसा आदर्श था जिसने मुझे प्रेरित किया । मैं पूर्णत: हरिश्चन्द्र की कहानी में विश्वास करने लगा। इन सभी विचारों से बेचैन होकर मैं अक्सर रोने लगता। किशोरावस्था से ही गांधी को ये पता चल गया था कि फिल्मों या नाटकों का मानस पर कितना असर होता है। जब वो स्वाधीनता के संघर्ष के लिए मैदान में उतरे तो उन्होंने कई जगहों पर देखा कि कई युवा पार्सी नाटकों की महिला कलाकारों के चक्कर में घर बार छोड़कर नाटक कंपनी के पीछे चल देते थे। इसको देखकर गांधी के मन में इस माध्यम को लेकर उदासीनता बढ़ने लगी। उसके बाद एक और घटना घटी। मीराबेन की सिफारिश पर गांधी जी ने एक फिल्म देखने की हामी भरी। फिल्म का नाम था मिशन टू मास्को। रिजवी लिखते हैं कि इस फिल्म में तंग कपड़े पहनकर लड़कियां नाच रही थीं। थोड़ी देर तक तो बापू झेलते रहे लेकिन फिर बीच में ही उठकर चले गए। उस दिन उनका मौन व्रत था सो कुछ कहा नहीं। अगले दिन उन्होंने लिखा, ‘मुझे नंगे नाच दिखाने की कैसे सूझी। मैं तो दंग रह गया, मुझे तो कुछ पता ही नहीं था।‘ दरअसल मीराबेन को एक पारसी फोटोग्राफर ने गांधी को फिल्म दिखाने के लिए राजी कर लिया था। सबको इस घटना के बाद काफी अफसोस हुआ। फिल्म राम राज्य देखने के लिए बापू को कनु देसाई ने तैयार किया था। कनु देसाई गांधी की सेवा करते थे। वो विजय भट्ट की फिल्म राम राज्य के कला निदेशक रह चुके थे। उनकी बात बापू ने मान ली और कहा कि एक विदेशी फिल्म देखने की गलती कर चुका हूं इसलिए भारतीय फिल्म देखनी पड़ेगी। बापू की सहयोगी सुशीला नायर ने फिल्म के लिए गांधी के 40 मिनट तय किए थे, लेकिन कहा जाता है कि बापू को ये फिल्म इतनी अच्छी लगी थी कि वो पूरे डेढ़ घंटे तक बैठकर राम राज्य देखते रहे थे। फिर विजय भट्ट की पीठ थपथपाई और निकल गए। 

इन प्रसंगों को जानने के बाद ये लगता है कि बापू फिल्मों के विरोध में नहीं थे बल्कि फिल्मों में दिखाई जानेवाली सामग्री के विरोधी थे। 1927 का उनका बयान इसकी ओर ही संकेत करता है। उनको फिल्मों का जनमानस पर पड़नेवाले असर का अनुमान भी था। वो चाहते थे कि फिल्मों के माध्यम से लोगों को स्वाधीनता के लिए तैयार किया जाए। स्वाधीनता के संघर्ष में गांधी के पदार्पण के बाद कई ऐसी फिल्मों का निर्माण हुआ जिसने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान गांधीवादी विचारों को फैलाने में बड़ा योगदान किया। 1939 में तमिल भाषा में बनी फिल्म त्यागभूमि को उस दौर की सर्वाधिक सफल फिल्मों में माना जाता है। ये फिल्म प्रख्यात तमिल लेखक आर कृष्णमूर्ति की कृति पर आधारित है। इस फिल्म में गांधीवादी विचारों को प्रमुखता से दिखाया गया था। बाद में इसको अंग्रेजों ने प्रतिबंधित कर दिया था। इसी तरह से अगर देखें तो तेलुगु में बनी फिल्म वंदे मातरम ने भी गांधी के विचारों को तेलुगु भाषी जनता के बीच पहुंचाने का बड़ा काम किया। भालजी पेंढारकर ने अपनी मूक फिल्म वंदे मातरम में अंग्रेजों की शिक्षा नीति की आलोचना की थी।  1943 में बनी हिंदी फिल्म किस्मत के गाना दूर हटो ये दुनियावालो हिंदुस्तान हमारा है बेहद लोकप्रिय हुआ था। ऐसा नहीं है कि गांधी को ये पता नहीं होगा कि इस तरह की फिल्में बन रही हैं। वो चाहते होंगे कि फिल्मकार राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को समझें और अपनी फिल्मों के कंटेंट के बारे में निर्णय लें। गांधी जैसा व्यापक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति सिनेमा विरोधी हो ये मानना कठिन है।  


Saturday, March 2, 2024

हिंदी और गांधी के सपनों पर ग्रहण


एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, जिसका नाम है महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय। ये विश्वविद्यालय महाराष्ट्र के वर्धा में स्थित है। इसकी वेबसाइट पर प्रकाशित परिचय में बताया गया है कि वर्ष 1997 में संसद में पारित एक अधिनियम के माध्यम से इसकी स्थापना की गई। इस विश्वविद्यालय के उद्देश्यों में क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी का सम्यक विकास करना, हिंदी को वैश्विक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने के लिए सुसंगत प्रयास करना। हिंदी को रोजगार की भाषा बनाने के लिए प्रयत्न करना, अंतराष्ट्रीय शोध और विमर्श केंद्र के रूप में विवविद्यालय का विकास करना। संसद के पारित अधिनियम के आलोक में कांग्रेस समर्थक अधिकारी अशोक वाजपेयी को विश्वविद्यालय का पहला कुलपति बनाया गया। वो लगभग चार वर्षों तक विश्वविद्यालय को दिल्ली से ही चलाते रहे। कभी कभार वर्धा चले जाते थे। उनके कार्यकाल में कुछ विवाद भी हुए। उनके बाद कई कुलपति नियुक्त हुए लेकिन विश्वविद्यालय अपने उद्देश्यों की तरफ बहुत धीरे-धीरे बढ़ पाया। वर्धा इस स्थित यह विश्वविद्यालय कभी छोटे तो कभी बड़े विवाद में घिरा रहा। तभी नियुक्तियों को लेकर तो कभी निर्माण को लेकर। पिछले वर्ष 14 अगस्त को अप्रिय परिस्थितियों में कुलपति रजनीश कुमार शुक्ल ने कुलपति के पद से इस्तीफा दे दिया। रजनीश शुक्ल का कार्यकाल भी विवादित रहा। जब उन्होंने पद छोड़ा तो विश्वविद्यालय के वरिष्ठतम प्रोफेसर एल कारूण्यकरा को कुलपति का प्रभार दिया। करीब दो महीने तक रजनीश शुक्ल का इस्तीफा स्वीकृत नहीं हुआ और प्रोफेसर कारूण्यकरा विश्वविद्यालय चलाते रहे। शिक्षा मंत्रालय ने जब रजनीश शुक्ल का इस्तीफा स्वीकृत किया तो साथ ही नागपुर के इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट (आईआईएम) के निदेशक को विश्वविद्यालय के कुलपति का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया। इसके बाद प्रोफेसर कारूण्यकरा अदालत चले गए जहां मामला अभी लंबित है। अतिरिक्त प्रभार के रूप में नागपुर आईआईएम के निदेशक विश्वविद्लाय चला रहे हैं। इस बीच नए कुलपति की नियुक्ति के लिए शिक्षा मंत्रालय ने विज्ञापन दे दिया। प्रक्रिया चल रही है। 

इस क्रोनोलाजी को बताने का उद्देश्य ये है कि किस तरह से महात्मा गांधी और हिंदी के नाम पर बना ये केंद्रीय विश्वविद्लाय निरंतर विवादों में रहा। इन विवादों का असर विश्वविद्यालय के कामकाज पर पड़ रहा है। स्थायी कुलपति के इस्तीफे के छह महीने की अवधि बीत जाने के बाद भी कुलपति की नियुक्ति नहीं होने के कारण विश्वविद्यालय के सामने जो बड़े उद्देश्य थे उन पर ब्रेक लग गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से शिक्षा के भारतीयकरण के लक्ष्य को पाना चाह रहे हैं। इसके लिए वो खुद बहुत सक्रिय रहे हैं, अब भी हैं। भारतीय भाषा भी प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय शिक्षा नीति की प्राथमिकता में है। भारतीय भाषा को रोजगार से जोड़ने के लिए भी बड़े स्तर पर कार्य हो रहे हैं। पाठ्यक्रम से लेकर पाठ्य सामग्री तक तैयार करने के लिए पिछले दो वर्षों से हर स्तर पर श्रम हो रहा है । लेकिन जब हिंदी के इस विश्वविद्यालय की स्थिति ऐसी लचर हो तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लक्ष्य को समग्रता में पाने में कठिनाई हो सकती है। इस समय जब  महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, के माध्यम से हिंदी को शक्ति देने का उपक्रम जोर शोर से चलाया जाना चाहिए था तब विश्वविद्यालय केस मुकदमों में उलझा हुआ है। जिनके पास विश्वविद्यालय का अतिरिक्त प्रभार है वो अतिरिक्त दायित्व की तरह ही निर्वाह भी कर रहे हैं। विश्वविद्यालय शिक्षक संघ ने अभी हाल ही में कुलपति को एक पत्र लिखने की बात कही है जिसमें वो ये मांग करेंगे कि प्रशासन विश्वविद्यालय की स्थिति पर एक श्वेत पत्र जारी करे। शिक्षकों को संबोधित उसी पत्र में शिक्षक संघ ने आरोप लगाया है कि विश्वविद्यालय में नियम कानून को दरकिनार कर निर्णय लिए जा रहे हैं। कर्माचरियों और शिक्षकों को परेशान किया जा रहा है आदि आदि। ये आरोप हैं और इनकी जांच होगी तभी सचाई का पता चल पाएगा। 

इन दिनों एक बेहद दिलचस्प बात इस विश्वविद्लय से जुड़ी है वो ये कि इसके रोजमर्रा के निर्णय व्हाट्सएप पर हो रहे हैं। चाहे वो शिक्षकों के अवकाश की स्वीकृति का मामला हो, चाहे किसी के जीपीएस खाते से पैसे निकालने की अनुमति का संदर्भ हो या किसी शिक्षक को किसी कार्यक्रम आदि में भाग लेने की अनुमति का मामला हो। अधिकतर मामलों में कुलपति का अप्रूवल व्हाट्सएप पर हो रहा है। इस प्रवृत्ति के कारण विश्वविद्यालय में ये चर्चा होने लगी है कि महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय अब व्हाट्सएप युनिवर्सिटी बन गया है। अभी तक विमर्श या चर्चा के दौरान जब काल्पनिक बातों को तथ्य बनाकर पेश किया जाता था तो कहा जाता था कि व्हाट्सएप युनिवर्सिटी का ज्ञान मत दो। व्हाट्सएप युनिवर्सिटी का प्रयोग हल्के फुल्के अंदाज में होता था उसको अब महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से जुड़े कुछ लोग अपनी युनिवर्सिटी का मजाक बनाने के लिए प्रयोग करने लगे हैं। यह ऐसी स्थिति है जिसकी कभी कल्पना नहीं की गई थी। अकादमिक परिषद और कार्य परिषद की लंबे समय से बैठक नहीं होने के कारण बड़े निर्णय नहीं लिए जा रहे हें। व्हाट्सएप पर जितने निर्णय हो सकते हैं वो हो रहे हैं। व्हाट्सएप के स्क्रीन शाट के प्रिंट लेकर फाइलों में लगा दिए जाते हैं। 

महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय एक स्वप्न था। एस ऐसा स्वप्न जिसको 1975 में नागपुर में आयोजित पहले विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान देखा गया था। उस सम्मेलन के दौरान प्रस्ताव पारित किया गया था कि वर्धा में हिंदी के एक विश्वविद्यालय की स्थापना हो। 1993 में मारीशस में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान एक अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की आवश्यकता पर चर्चा हुई थी। तब ये भी कहा गया था कि संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने के लिए भी एक ऐसे विश्वविद्यालय की आवश्यकता है। महात्मा गांधी के हिंदी प्रेम को भी इस विश्वविद्लय की स्थापना की आवश्यकता से जोड़ा गया था। तब जाकर 1997 में संसद ने ऐसे विश्वविद्यालय की स्थपना को स्वीकृति दी थी। आज इस विश्वविद्लाय के दो मान्यता प्राप्त केंद्र कोलकाता और प्रयागराज में चल रहे हैं। महाराष्ट्र के अमरावती जिले में भी एक केंद्र कार्यरत है जिसको विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से मान्यता मिलना शेष है। गुवाहाटी में चौथा केंद्र खोलने की कवायद हो रही थी। कोलकाता का केंद्र काफी समय से किराए के मकान में चल रहा है। वहां बहुत कम जगह है। आरोप है कि अगर विश्वविद्यालय प्रशासन किसी को प्रताड़ित या दंडित करना चाहता है तो उसका तबादला कोलकाता केंद्र में कर दिया जाता है। प्रयागराज में विश्वविद्यालय का अपना परिसर है लेकिन वो भी आधारभूत सुविधाओं की बाट जोह रहा है। यह शोध का विषय हो सकता है कि इस केंद्र में जितने कर्मचारी या अध्यापक हैं उस अनुपात में विद्यार्थी रहे हैं या नहीं। अमरावती जिले के केंद्र को जब मान्यता ही प्राप्त नहीं है तो उसकी चर्चा व्यर्थ है। हिंदी के नाम पर बने इस विश्वविद्यालय पर केंद्र सरकार को तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। अगर ऐसा हो पाता है तो इसको एक ऐसे केंद्र के रूप में विकसित किया जाए जो हिंदी पठन पाठन के लिए एक वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित हो सके। विश्व के अन्य देशों के विश्वविद्लायों में हिंदी शिक्षण के समन्वयक के रूप में काम कर सके। वहां के लिए पाठ्यक्रम तैयार कर सके, शिक्षक तैयार कर सके। इस विश्वविद्यालय को उच्च शिक्षा के एक ऐसे वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करना होगा जहां विश्व की अन्य भाषाओं में चल रही गतिविधियों पर विमर्श हो सके, शोध हो सके। अगर ऐसा हो पाता है तो प्रधानमंत्री के विकसित भारत के सोच को भी शक्ति मिल सकती है। अन्यथा व्हाट्सएप युनिवर्सिटी तो चलती ही रहेगी। 


Thursday, July 13, 2023

तथ्यहीन आधार पर नैरेटिव


पिछले दिनों कल्याण पत्रिका चर्चा में रही। गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार की घोषणा हुई थी। कुछ दिनों बाद प्रधानमंत्री अपने गोरखपुर दौरे के समय गीता प्रेस गए। पुरस्कार की घोषणा और प्रधानमंत्री के गीता प्रेस जाने के समय इस बात का बार-बार उल्लेख किया गया कि कल्याण पत्रिका के अंकों में महात्मा गांधी की हत्या पर कुछ भी नहीं प्रकाशित किया गया। ऐसा कहनेवालों ने कल्याण पत्रिका और इसके संपादक को गांधी विरोधी करार दिया। इस तरह की टिप्पणियां की गईं जिसके भ्रम का वातावरण बने कि कल्याण के संपादक हनुमानप्रसाद पोद्दार और बापू के हत्यारे के बीच संबंध थे। उनके ऐसा कहने के पीछे अंग्रेजी में प्रकाशित एक पुस्तक गीता प्रेस एंड द मेकिंग आफ हिंदू इंडिया में उल्लिखित प्रसंग का सहारा लिया गया। इस पुस्तक के लेखक अक्षय मुकुल हैं। उन्होंने अपने पुस्तक के पेज 58 पर लिखा है कि गीता प्रेस ने गांधी की हत्या पर खामोशी ओढ़ ली थी। कल्याण के लिए जिस व्यक्ति का आशीर्वाद और लेखन बेहद महत्वपूर्ण था उसी पत्रिका में अप्रैल 1948 के अंक तक एक बार भी उनका (गांधी) उल्लेख नहीं हुआ। इस अंक में पोद्दार ने गांधी से अपनी विभिन्न मुलाकातों के बारे में लिखा। बाद के अंकों में भी गांधी का लेखन कल्याण में प्रकाशित हुआ। लेकिन अक्षय मुकुल ये प्रश्न उठाते हैं कि फरवरी और मार्च 1948 के अंक में गांधी के बारे में कुछ भी प्रकाशित क्यों नहीं हुआ। अक्षय ने हाल के अपने लेख में भी इस ओर फिर से संकेत किया है। मुकुल इस बात का भी दावा करते हैं कि कल्याण के संपादक हनुमानप्रसाद पोद्दार, महात्मा गांधी के कटु आलोचक थे। इस संबंध में वो कुछ प्रसंगों और पत्रों का हवाला देते हैं जहां पोद्दार गांधी के विचारों की आलोचना करते है। अक्षय मुकुल ने जो व्याख्या की हैं उसमें कई दोष रह गए हैं। 

गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को हुई थी। कल्याण पत्रिका का जनवरी अंक बहुत सारे ग्राहकों को भेजा जा चुका था। कुछ अंक ग्राहकों को नहीं भेजे जा सके थे। गांधी की हत्या का समाचार आते ही बचे हुए अंकों का डिस्पैच रोककर उसमें तीन पन्ने अलग से लगाए गए। एक पूरे पन्ने पर बापू की तस्वीर लगाई गई जिसके ऊपर लिखा गया ‘महाभागवत बापू’ और तस्वीर के नीचे लिखा गया ‘सकल लोक मां सहु ने बंदे’। एक पेज पर राघवदास जी की एक टिप्पणी प्रकाशित है जिसका शीर्षक है ‘महाभागवत पूज्य बापू जी’। उसमें राघवदास जी ने लिखा है कि पूज्य बापू जी कहा करते थे मेरा ह्रदय चीरकर देखो तो उसमें राम-राम लिखा मिलेगा। बहुतों को ये बात समझने में बहुत दिक्कत होती हो, पर जब हम उनको तारीख 30.1.48 को साढे पांच बजे बजे गोली का शिकार होते देखते हैं तो उनके मुंह से हे राम, हे राम यह दो शब्द ही निकलते हैं। मैंने गोली का अभ्यास करनेवालों से बातें की तो उन्होंने मुझे बताया कि गोली लगने पर मुख की आकृति बिगड़ जानी चाहिए, परेशानी चेहरे पर आनी चाहिए पर वैसा नहीं हुआ... कितना सुंदर स्वरूप है इस महाभागवत का। ग्रंथों में संतों के वर्णन पढ़े थे. पर प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर इसी महापुरुष के जीवन में हमें मिला। बोलिए महाभागवत की जय। राघवदास जी की कल्याण में प्रकाशित इस टिप्पणी में गहरी श्रद्धा परिलक्षित होती है।    

अब नजर डाल लेते हैं कल्याण के 1948 के जनवरी अंक में तत्कालीन संपादक हनुमानप्रसाद पोद्दार की टिप्पणी पर। वो लिखते हैं, पूज्य महात्मा जी संत थे, महापुरुष थे मानवमात्र का हित चाहनेवाले थे और विश्व की एक महान विभूति थे। वे धर्म और जाति के भेद से ऊपर उठे हुए थे और सत्य और अहिंसा के सच्चे पुजारी थे। वे मानवता के खरे प्रतीक थे। ईश्वर की प्रार्थना के समय जाते हुए उनकी निर्मम हत्या करके हत्यारे ने अपना तो लौकिक और पारलौकिक महान अहित किया ही, हिंदू जाति पर भी-जो धर्मत: और स्वभावत: अहिंसाप्रिय है- कलंक का अमिट टीका लगा दिया। अगर हनुमानप्रसाद पोद्दार गांधी को नापसंद करते, तो कलंक का अमिट टीका जैसी कठोर टिप्पणी हिंदू जाति पर नहीं करते।  अपनी इस टिप्पणी में हनुमानप्रसाद पोद्दार लिखते हैं कि बापू के साथ उनका पारिवारिक संबंध था। बापू उनको पुत्र के समान मानते और स्नेह करते थे। उनके स्नेह की एक एक बात याद करके दिल भर आता है। इस तरह की टिप्पणियों को पढ़ने के बाद क्या संदेह रह जाता है कि हनुमानप्रसाद पोद्दार गांधी को पसंद नहीं करते थे। वैचारिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन उसको व्यक्तिगत द्वेष की तरह देखना और व्याख्यायित करने में अंतर है। अक्षय मुकुल इस अंतर को समझ नहीं पाए या समझ कर अनदेखी की। एक और बात मुकुल ने जोर देकर पूछी है कि कल्याण पत्रिका के 1948 के फरवरी और मार्च अंक में गांधी का उल्लेख क्यों नहीं है। यहां भी मुकुल की लापरवाही या तथ्यों की अनदेखी दिखाई देती है। प्राथमिक स्त्रोत तक नहीं पहुंचने की लापरवाही या किसी खास कारण से अनदेखी। 1948 के फरवरी अंक में हिंदू विधवा के नाम से बापू की टिप्पणी है, कवर पर भी उल्लेख है। तो क्या ये माना जाए कि लेखक इतना लापरवाह था कि वो बगैर देखे बड़े-बड़े दावे कर रहा था या वो जानबूझकर कुछ तथ्यों को छिपाकर एक नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहा था। अनुत्तरित तो ये प्रश्न है। 1926 से लेकर 1948 तक बापू की कई टिप्पणियां कल्याण के विभिन्न अंकों में प्रकाशित हुईं। 

एक और दोषपूर्ण टिप्पणी अक्षय ने अपनी पुस्तक में की है कि गीता प्रेस के निजी अभिलेखागार में गांधी की हत्या से संबंधित कोई रेफरेंस उपलब्ध नहीं है। पिछले सप्ताह मैं गोरखपुर में था।  गीता प्रेस जाकर कल्याण के उस अंक को स्वयं देखा जिसमें बापू की हत्या पर तीन पृष्ठ हैं। यह अंक उनके अभिलेखागार में उपलब्ध है। कोई भी अनुमति लेकर देख सकता है। मुझे लगता है कि मुकुल ने कल्याण पत्रिका की फाइल देखी ही नहीं। उसने उन विशेषांकों को देखा जो बाद में पुस्तकाकार प्रकाशित हुए। प्रतिवर्ष कल्याण का जनवरी अंक विशेषांक होता है जो बाद में पुस्तकाकार प्रकाशित होता है। जनवरी 1948 का अंक भी विशेषांक था, नारी अंक, जो कालांतर में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ। अब जो नारी अंक बाजार में उपलब्ध है उसमें गांधी की हत्या के प्रसंग पर राघवदास जी, पोद्दार जी की टिप्पणियां नहीं हैं। गांधी का चित्र भी नहीं है। ये तो पुस्तक प्रकाशन जगत की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। जब किसी पत्रिका के विशेषांक को पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाता है तो उसमें तात्कालिक या घटनात्मक टिप्पणियां नहीं रखी जाती हैं। बिना फाइल देखे सिर्फ बाद में प्रकाशित पुस्तक के आकार पर टिप्पणी करना ये दर्शाता है कि लेखक कितनी लापरवाही से तथ्यों को इकट्ठा कर रहा था। प्राथमिक स्त्रोत तक नहीं पहुंच रहा था। लेकिन बड़े बड़े प्रश्न खड़े कर रहा था। 

कल्याण, गांधी और हनुमानप्रसाद पोद्दार के संबंधों को समझने के लिए जो दृष्टि चाहिए वो अक्षय मुकुल के पास नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि अक्षय मुकुल ने एक विशेष नैरेटिव को बल देने के लिए ये पुस्तक लिखी। पुरस्कृत हुए। अब उसी पुस्तक में वर्णित गलत तथ्यों और प्रसंगों को उद्धृत नैरेटिव बनाए जा रहे हैं। इंटरनेट मीडिया के दौर में लोगों के पास किसी भी प्रसंग या घटना को समग्रता में देखने या उसकी पड़ताल करने का धैर्य नहीं है। अगर मैं भी गोरखपुर के गीताप्रेस जाकर इन प्रसंगों को नहीं देखता समझता तो संभव है कि मान लेता कि कल्याण में बापू की हत्या के बाद कुछ नहीं प्रकाशित हुआ। 


Saturday, April 22, 2023

इतिहास से अनभिज्ञ राहुल

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व सांसद राहुल गांधी पिछले कई महीनों से चर्चा में बने हुए हैं। पहले अपनी पैदल यात्रा को लेकर, फिर वीर सावरकर पर की गई टिप्पणियों को लेकर, फिर ब्रिटेन में अलग अलग जगहों पर दिए गए अपने वक्तव्यों को लेकर, और फिर मानहानि के केस में सजा और उसके बाद की घटनाओं को लेकर। पैदल यात्रा खत्म होते ही इसकी चर्चा कम हो गई। वीर सावरकर पर की गई टिप्पणियों पर शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, जो कांग्रेस की सहयोगी पार्टियां हैं, ने आपत्ति जताई। उसके बाद वीर सावरकर पर कोई टिप्पणी नहीं आई है। ब्रिटेन में उन्होंने कई तरह की टिप्पणी की जिनमें से एक थीं भारत के लोकतंत्र को लेकर। वहां उन्होंने जो कहा था उससे ये ध्वनित हो रहा था कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है और लोकतंत्र के रखवाले कहां हैं। उनके इस बात पर पर्याप्त चर्चा हो रही थी फिर सूरत की अदालत का निर्णय आ गया। मानहानि के एक केस में उनको दो साल की सजा हो गई। सजा होते ही संसद से उनकी सदस्यता समाप्त हो गई। फिर कानूनी दांव-पेंच और अब सजा पर रोक की उनकी याचिका खारिज होने के कारण निरंतर चर्चा में बने हुए हैं। इन बातों की चर्चा करने का उद्देश्य केवल इतना है कि भारत में लोकतंत्र को लेकर राहुल गांधी ने जिस तरह से ब्रिटेन की धरती पर अपनी बात रखी और जिस तरह से लोकतंत्र के कथित पहरेदारों को ललकारा उसपर पर्याप्त चर्चा नहीं हो सकी। न्यूज चैनलों की डिबेट में शोरगुल के बीच इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर गंभीर और तथ्यपरक चर्चा की जगह राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप ज्यादा हुआ। 

अब राहुल गांधी के उस अपेक्षा की चर्चा करते हैं जो उन्होंने ब्रिटेन की धरती से विश्व के लोकतांत्रिक देशों से की। उन्होंने कहा कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है, अगर यहां लोकतंत्र का पतन होता है तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। हम तो उसको झेल लेंगे लेकिन उसका असर आप पर भी पड़ेगा। इस चेतावनी में एक भाव ये भी है कि दुनिया के देशों विशेषकर यूरोप और अमेरिका को भारत के लोकतंत्र पर नजर रखनी चाहिए। इसके पतन के आसन्न खतरों को देखते हुए उसको बचाने का प्रयत्न भी करना चाहिए। इस भाव को लेकर जमकर राजनीति हुई लेकिन इस आलेख में इस बात की चर्चा करेंगे कि क्या ब्रिटेन और अमेरिका लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए कार्य करते रहे हैं या फिर लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर दुनियाभर के देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने की जुगत में रहते हैं। अमेरिका ने इराक में लोकतंत्र के नाम पर क्या किया वो जगजाहिर है। इस मसले पर अमेरिका का इतिहास देखे जाने की जरूरत थी। अब जरा ब्रिटेन की भी चर्चा कर लेते हैं। राहुल गांधी को या उनके सलाहकारों को तो ये याद होगा कि ब्रिटेन ने लंबे समय तक हमें गुलाम बनाकर रखा था। उनके नाना और नाना के पिता ने अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन में हिस्सा लिया था। उनकी दादी भी अंग्रेजों के खिलाफ स्वाधीनता आंदोलन में शामिल रही थीं। इंदिरा जी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान अमेरिका और वहां के राष्ट्रपति का बर्ताव कैसा रहा था, इसको देश की जनता ने अभी तक भुलाया नहीं है। 

ब्रिटेन की धरती पर जब लोकतंत्र को लेकर राहुल गांधी चर्चा कर रहे थे तो संभवत: उनको जलियांवाला बाग नरसंहार की याद नहीं रही होगी। वही जलियांवाला बाग जहां सैकड़ों निर्दोष भारतीयों को अंग्रेज सिपाहियों ने गोलियों से भून दिया था। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला नरसंहार हुआ था। इस ब्रितानवी नरसंहार के एक सौ चार वर्ष बाद एक पुस्तक आई है गांधी,जलियांवाला बाग विचार कोश। इसके लेखक हैं कमल किशोर गोयनका। कमल किशोर गोयनका की ख्याति प्रेमचंद के अध्येता के तौर पर रही है और उन्होंने प्रेमचंद के लेखन और उनके व्यक्तित्व के बारे में विपुल लेखन ही नहीं किया है बल्कि प्रेमचंद को लेकर जिस तरह की भ्रांतियां फैलाई गईं थी उसका निषेध भी किया था। अब अपनी इस नई पुस्तक गांधी, जलियांवाला विचार कोश में कमल किशोर गोयनका ने श्रमपूर्वक इस नरसंहार से जुड़े दस्तावेजों पर आधारित ऐतिहासिक तथ्यों को जुटाकर गांधी और के विचारों और योजनाओं की तस्वीर प्रस्तुत की है। कमल किशोर गोयनका ने बरतानवी अधिकारियों और उनके प्रतिनिधियों की रिपोर्ट, उनके आदेश को भी समेटा है। इतना ही नहीं गोयनका ने उस दौर के पत्रकारों, लेखकों और समाजेवियों के लिखे या उनके रिकार्डेड वक्तव्यों को भी आधार बनाया है। इनमें ब्रिटेन की वो मानसिकता स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है जो उनके लोकतंत्र प्रेम को एक्सपोज कर देती है। जलियांवाला बाग की नृशंसता के बाद पंजाब के तत्कालीन गवर्नर सर माइकल ओ डायर ने अपनी गवाही में कहा था कि मेरे निजी अनुभव के अनुसार शांति का अर्थ है जब कोई गोरा आदमी , बड़े साहब से लेकर आर्डिनरी टामी तक, बिना शस्त्र के हिंदुस्तान के किसी भी स्थान पर अकेला सैर कर सके और सुरक्षित रहे। कोई उसे बुरी नजर से न देखें, इस डर से कि उसकी आंखे निकाल ली जाएंगी, हाथापाई करने पर हाथ काट दिए जाएंगे और उपद्रव करनेवालों के गांव जला दिए जाएंगे। प्रकृति का सच है कि ताकतवर राज करते हैं। इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद ब्रिटेन से किसी प्रकार की अपेक्षा शेष नहीं रहती है। आज भी स्थिति बदली नहीं है। इस हत्याकांड के सौ वर्ष बाद ब्रिटेन की संसद में इसपर बहस होती है। इस नरसंहार पर क्षमा मांगने को लेकर चर्चा होती है लेकिन अबतक ऐसा नहीं करके ब्रिटेन ने जता दिया है कि वो एक राष्ट्र के तौर पर अब भी नरसंहार को लेकर न तो शर्मिंदा है और न ही क्षमा मांगना चाहते हैं। इस पुस्तक में ऐसे सैकड़ों दृष्टांत हैं। जलियांवाला को लेकर महात्मा गांधी के विचारों को भी समग्रता में पेश किया गया है जो कि शोधार्थियों को लिए एक नई जमीन तैयार करती है। गांधी की एक नई छवि भी सामने आती है। 

कमल किशोर गोयनका अपनी इस पुस्तक में साबित करते हैं कि ब्रिटेन का शासन नस्ली था, क्रूर था। क्रूर इस वजह से कि जलियांवाला में गोलियां बरसाने के बाद जिस तरह की स्थितियां बनीं वो ब्रिटेन के दामन पर काला धब्बा है। जनरल डायर और माइकल ओ डायर के कृत्यों का जिस तरह से ब्रिटेन में बचाव होता रहा है उससे ये तो साबित होता है कि वहां का मानस कैसा है। ऐसे मानस वाले राष्ट्र से लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए आगे आने की अपेक्षा करना व्यर्थ है। राहुल गांधी जब ब्रिटेन की धरती पर जाकर ऐसी बातें करते हैं तो इतिहास से अनभिज्ञ नजर आते हैं। उनको भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास को ठीक तरह से आत्मसात करना चाहिए क्योंकि वैश्विक मंचों पर वो भारत के प्रमुख विपक्षी दल के नेता के तौर पर बोलते हैं। उनको लोग गंभीरता से सुनते हैं। अगर वो वैश्विक मंचों पर इस तरह की बातें करेंगे तो उनके बारे में अलग राय बनेगी। उनकी पार्टी के नेता तो उनकी प्रशंसा करेंगे ही लेकिन जब समर्थक पत्रकार भी सुर में सुर मिलाने लगते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि उनके समर्थकों का इतिहास बोध कितना कमजोर है। कुछ लोगों को राहुल गांधी के इन वक्तव्यों में उनका गांभीर्य दिखा था,अपने राष्ट्र को लेकर उनकी चिंता दिखी थी। उनके अपने तर्क थे लेकिन ऐतिहासिक तथ्य और घटनाएं तो कुछ अलग ही कहती हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के विपक्ष के नेता से ये अपेक्षा तो की जा सकती है कि वो वैश्विक मंच के अपने भाषण में उठाने वाले बिंदुओं पर बोलने के पहले समग्रता में विचार कर लें।  

Saturday, May 14, 2022

फिल्मों के स्वावलंबन का सफर


आज पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है। अमृत महोत्सव के अवसर पर हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि भारतीय फिल्मों ने स्वाधीनता के बाद जो स्वावलंबन की राह पकड़ी वो कैसी थी, उनमें किस तरह की बाधाएं आ रही थीं। स्वाधीनता के बाद के भारतीय फिल्म के परिदृश्य पर विचार करने से पहले फिल्मों को लेकर दो बयान पर नजर डाले लेते हैं। पहला बयान रूस के कम्युनिस्ट नेता लेनिन का और दूसरा है महात्मा गांधी का। रूस की क्रांति के बाद लेनिन ने कहा था कि ‘हमारे लिए सिनेमा सभी कलाओं से अधिक महत्वपूर्ण है। सिनेमा केवल लोगों के मन बहलाव का नहीं बल्कि सामाजिक शिक्षा, संवाद स्थापित करने तथा हमारी विशाल जनसंख्या को एकसूत्र में बांधने का सशक्त साधन भी है।‘ रूसी क्रांति के दो साल बाद वहां के फिल्म उद्योग का राष्ट्रीयकरण करके उसको एक मंत्रालय के अधीन कर दिया गया था। इसके ठीक दस साल बाद भारत में स्वाधीनता संग्राम तेज हुआ। गांधी इसके सर्वमान्य नेता के तौर पर स्थापित हुए। उस वक्त तक गांधी फिल्म की शक्ति को पहचान नहीं पाए। पहचान तो वो बाद में नहीं पाए। गांधी फिल्मों को एक बुराई की तरह देखते थे। 1929 में वो बर्मा (अब म्यांमार) गए थे। वहां उनको एक नाटक देखना पड़ा। देखना पड़ा इस वजह से क्योंकि वो सोच कर गए थे कि मजदूरों की किसी सभा में जाना पड़ा रहा है। लेकिन जब वहां पहुंचे तो  नाटक का मंचन हो रहा था। गांधी ने वहां एक भाषण दिया जो गांधी वांग्मय में संकलित है। गांधी ने कहा, ‘सार्वजनिक नाटकघरों में जाने के अन्य जो भी परिणाम हो यह तो निश्चित ही है कि नाटकों ने अनेकानेक युवकों का आचरण और चरित्र भ्रष्ट कर दिया है। आप पक्की उम्र के लोग चाहे अपने को नाटकों के दुष्प्रभाव से बिल्कुल बरी मान लें, लेकिन आपको अपने छोटे-छोटे बच्चों का भी खयाल करना चाहिये जिनको आपत्तिजनक नाटकों में ले जाकर आप उनके निर्दोष, निष्पाप मन के साथ कितना बड़ा अनाचार कर रहे हैं।  आप चारों ओर नजर तो डालिये वर्तमान व्यवस्था के कुप्रभाव में पनपने वाले सिनेमा, नाटक, घुड़दौड़, शराबखाने और अफीमघर इत्यादि के रूप में समाज के ये सभी शत्रु चारों और से मुंह बाए हमारी घात में खड़े हैं।‘  सिनेमा को गांधी समाज का शत्रु मानते थे लेकिन लेनिन उसको सामाजिक शिक्षा का माध्यम मानते थे।  एक तरफ सिनेमा को लेकर लेनिन के विचार तो दूसरी तरफ गांधी के। 

स्वतंत्रता के बाद भारतीय फिल्मों की चुनौतियों पर बात करने के पहले गांधी के विचारों का ध्यान ऱखना होगा। 1947 में जब देश स्वाधीन हुआ तो फिल्म उद्योग के लोगों ने महात्मा गांधी को एक कार्यक्रम में आमंत्रित करना चाहा। उस समय गांधी के सचिव ने आयोजकों को उत्तर दिया था कि फिल्म से संबंधित किसी भी कार्यक्रम में गांधी जी को बुलाने के बारे में सोचिए भी नहीं क्योंकि फिल्मों को लेकर बापू की राय अच्छी नहीं है। कई जगह इस बात का उल्लेख मिलता है कि चक्रवर्ती राजगोपालाचारी भी फिल्मों को पाप फैलाने का माध्यम मानते थे और कहा करते थे कि फिल्में पश्चिम के घटिया मूल्यों को भारतीय समाज पर थोपतीं है। ये ठीक है कि दूसरे विश्वयुद्ध के पहले और बाद में भी विदेशी फिल्में बड़ी संख्या में भारत में आ रही थीं। उनका प्रदर्शन भी सफलतापूर्वक होता था। उनमें से कई फिल्मों में नग्नता होती थी। लेकिन ये भी उतना ही सच है कि दर्जनों भारतीय निर्माता निर्देशक अपने पौराणिक चरित्रों और संत महात्माओं को केंद्र में रखकर फिल्में बना रहे थे। जो काफी सफल भी हो रही थी। 1917 में दादा साहब फाल्के ने ‘लंका दहन’ के नाम से एक फिल्म बनाई थी। 1918 में श्रीनाथ पाटणकर ने ‘राम वनवास’ के नाम से एक ऐतिहासिक फिल्म बनाई। पाटणकर ने इसके बाद ‘सीता स्वंयवर’, ‘सती अंजनि’ और ‘वैदेही जनक’ नाम से फिल्में बनाईं थीं। मूक फिल्मों के दौर में तकरीबन हर वर्ष राम कथा पर केंद्रित फिल्में बनती थीं, इनमें से अहिल्या उद्धार, श्रीराम जन्म, लव कुश, राम रावण युद्ध, सीता विवाह, सीता स्वयंवर और सीता हरण आदि प्रमुख फिल्में हैं। बोलती फिल्मों के दौर में भी रामकथा को आधार बनाकर कई फिल्में बनीं। प्रकाश पिक्चर्स ने वाल्मीकि रामयाण पर आधारित चार फिल्में बनाईं, ‘भरत मिलाप’, ‘रामराज्य’, ‘राम वाण’ और ‘सीता स्वयंवर’। इन फिल्मों में राम का किरदार प्रेम अदीब और सीता की भूमिका शोभना समर्थ ने निभाई थी। बावजूद फिल्मों को लेकर गांधी के विचार नहीं बद सके थे। उसका असर प्रत्यक्ष और परोक्ष असर भारत के फिल्म उद्योग पर पड़ा। फिल्मों को लेकर सरदार पटेल और नेहरू के विचार गांधी से अलग थे। गांधी के जीवनकाल में ही पटेल ने मुंबई (तब बांबे) में फिल्म उद्योग के लोगों की एक सभा में उनको भरपूर सहयोग का वादा किया था। गांधी के निधन के बाद नेहरू ने भी फिल्मों को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया था। 

इस पृष्ठभूमि के बावजूद भारतीय फिल्म उद्योग लगातार बढ़ता रहा तो इसके पीछे की वजह फिल्मों को लेकर इससे जुड़े लोगों का इस विधा में विश्वास था। स्वाधीनता के बाद 1948 में एक फिल्म रिलीज हुई थी, जिसका नाम था चंद्रलेखा। इस फिल्म का निर्माण मद्रास की जैमिनी स्टूडियो ने किया था और इसके निर्देशक एस एस वासन थे। ये भव्य फिल्म तीस लाख रुपए की लागत से तैयार हुई थी। सालभर में करीब दो करोड़ रुपए का कारोबार इस फिल्म ने किया था। यहीं से हिंदी फिल्मों को सफलता का एक सूत्र मिला जिसको कई फिल्म निर्माताओं ने अपनाया। ये सूत्र था एक नायिका और उसको चाहनेवाले दो अभिनेता। ये फार्मूला कई सालों तक चलता रहा। अब भी गाहे बगाहे किसी न किसी फिल्म में ये कथानक देखने को मिल जाता है। 1950 के आसपास कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिसने भारतीय फिल्मों के स्वरूप को बहुत हद तक प्रभावित किया। भारत सरकार ने 1949 में एस के पाटिल की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई जिसको फिल्म उद्योग की स्थिति के बारे में आकलन करने और उसमें बेहतकी के लिए सुझाव का जिम्मा सौंपा गया। 1951 में राजकपूर की फिल्म अवारा रिलीज हुई। इस फिल्म को देश के अलावा विदेश खासतौर पर रूस में अपार लोकप्रियता मिली। इसके सालभर बाद 1952 में देश के चार महानगरों में फिल्म फेस्टिवल का आरंभ हुआ। बांबे ( तब मुंबई ), दिल्ली, चेन्नई (तब मद्रास) और कोलकाता (तब कलकत्ता) में भारतीय के साथ साथ विदेशी फिल्मों का प्रदर्शन हुआ। इसने भारतीय फिल्म उद्योग को विदेश की कलात्मक फिल्मों से परिचय करवाया। जापान, रूस और इंगलैंड से फिल्में आईं। इस आयोजन से हमारे देश में फिल्म संस्कृति के विकास की नींव पड़ी। 

स्वाधीनता के पहले जिस स्टूडियो व्यवस्था की नींव पड़ी थी वो आज बहुत सफल है। आज फिल्मों के निर्माण की दर्जन भर से अधिक कंपनियां करोड़ों और कुछ तो अरबों रुपए का कारोबार कर रही हैं। अगर हम स्टूडियो के व्यावसायीकरण की बात करें तो इसका आरंभ स्वाधीनता के पहले ही हो गया था। फरवरी 1934 में हिमांशु राय ने बम्बई टाकीज के लिए पच्चीस लाख रुपए जुटाने के लिए सौ रुपए के पच्चीस हजार शेयर जारी किए थे। देविका रानी ने लिखा था कि ‘1935 में जब हमने बम्बई के मलाड में बम्बई टाकीज स्थापित किया तो तो उसे एक व्यापार की तरह चलाया। हमारी कंपनी के पास श्रेष्ठ उपकरण थे- बेल एंड हावेल कंपनी के कैमरे थे और आरसीए ध्वनि पद्धति थी।‘ इसके पहले भी फिल्म कंपनियां फिल्मों का निर्माण कर रही थीं लेकिन हिमांशु राय ने उसको एक अलग आयाम दिया। आज भारतीय फिल्म उद्योग जगत दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योगों में शामिल हो चुका है और निरंतर मजबूत हो रहा है। 


Friday, February 4, 2022

स्त्रियों की आर्थिक आजादी की पक्षधर


स्वाधीनता आंदोलन में कई ऐसी सेनानी रही हैं जिन्होंने स्वतंत्रता के पहले भी और देश के स्वतंत्र होने के बाद भी अपने कार्यों से भारतीय समाज को प्रभावित किया। ऐसी ही एक सेनानी हैं रमादेवी चौधरी। रमादेवी ने किशोरावस्था में ही अपने पति के साथ देश की स्वाधीनता का स्वप्न देखा और उसको साकार करने में जुट गई। रमादेवी जब 15 वर्ष की थीं तो उनकी शादी हो गई थी। शादी के वक्त उनके पति सरकारी अधिकारी थे। बाद में उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और स्वाधीनता आंदोलन में शामिल हो गए। रमादेवी के स्वाधीनता आंदोलन में शामिल होने की भी बेहद दिलचस्प कहानी है। महात्मा गांधी पूरे देश के दौरे पर थे। उसी क्रम में वो कटक पहुंचे थे और वहां के बिनोद विहारी मंदिर में महिलाओं के साथ उन्होंने एक बैठक की थी। उस बैठक में अन्य महिलाओं के साथ रमादेवी भी शामिल हुई थीं। उस बैठक के बाद उनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और अपने पति के साथ कांग्रेस में शामिल हो गई। 1922 के कांग्रेस के गया अधिवेशन में हिस्सा लिया। इस अधिवेशन में शामिल होकर लौटने के बाद रमादेवी ने अपने इलाके की महिलाओं को संगठित करना आरंभ कर दिया। 

1930 में गांधी ने जब नमक सत्याग्रह का आह्वान किया तो रमादेवी ने अपने क्षेत्र की महिलाओं को संगठित करने के काम में जुट गईं। महिलाओं की भागीदारी से उत्साहित होकर रमादेवी ने महिलाओं को स्वाधीनता आंदोलन में शामिल करने का अभियान आरंभ किया। उनका ये अभियान अंग्रजों को नागवार गुजरा और 1930 के अंत में रमादेवी  को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। 1931 में गांधी-इरविन समझौता हुआ तो उसके कई महीने बाद रमादेवी की रिहाई हुई। जेल से बाहर आने के बाद रमादेवी ने अस्पृश्यता के खिलाफ बड़ा जागरूता आंदोलन चलाया। इसके लिए उन्होंने अस्पृश्यता निवारण संघ बनाया। रमादेवी मानती थीं कि समाज में कोई भी बदलाव बगैर स्त्रियों की सक्रिय भूमिका के संभव नहीं है। इसी समय उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर सेवाघर नाम से एक आश्रम की स्थापना की। इस आश्रम के माध्यम से उन्होंने स्वदेशी को बढ़ावा देना और महिलाओं को शिक्षित करने का भी उपक्रम शुरु किया गया। आश्रम की लोकप्रियता बढ़ने लगी थी और बड़ी संख्या में लोग इससे जुड़ने लगे थे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय फिर रमादेवी को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया और उनके आश्रम को अंग्रेजों ने गैरकानूनी घोषित कर बंद कर दिया। दो वर्ष के बाद रमादेवी जब जेल से बाहर आईं तो उन्होंने महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के काम में लग गईं। 

1947 में जब देश आजाद हुआ तो रमादेवी ने बिनोवा भावे के सर्वोदय आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदारी की। भूमि सुधार के लिए उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर ओडीशा में करीब 4000 किलोमीटर की पदयात्रा भी की थी। स्वतंत्रता के बाद महिलाओं की सार्वजनिक जीवन में भागीदारी कम थी। रमादेवी इसको बढ़ाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होनें उत्कल खादी मंडल की स्थापना की। इसके माध्यम से वो महिलाओं को रोजगार देना चाहती थीं। उन्होंने ओडीशा के आदिवासियों की बेहतरी के लिए भी काम किया। 1951 में जब देश में अकाल पड़ा था तो अपने संगठन के माध्यम से उन्होंने अकाल पीड़ितों की मदद के लिए भी दिन रात एक कर दिया था। इंदिरा गांधी ने जब देश में इमरजेंसी लगाई तो रमादेवी उसके खिलाफ खड़ी हो गईं थीं। उन्होंने मीडिया पर पाबंदी का विरोध किया था। हरेकृष्ण महताब और नीलमणि राउतराय के साथ मिलकर उन्होंने ग्राम सेवक प्रेस के नाम से एक समाचारपत्र निकाला। इस समाचार पत्र को इंदिरा सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया और रमादेवी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। भारत की आजादी के लिए जेल जानेवाली एक सेनानी स्वतंत्र भारत में फिर से जेल में डाल दी गईं। इमरजेंसी के बाद जब जेल से उनकी रिहाई हुई तो वो शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने लगी। बच्चों को शिक्षा मिले इसके लिए उन्होंने शिशु विहार के नाम से स्कूल आरंभ किया। उनकी देखरेख में कटक में एक कैंसर अस्पताल की स्थापना भी की गई। 1985 में अपने निधन के पहले तक वो लगातार भारत की महिलाओं, बच्चों और समाज के निचले पायदान के लोगों की बेहतरी के लिए काम करती रहीं। 


Saturday, October 23, 2021

इतिहास लेखन की सांप्रदायिक प्रविधि


गांधी जयंती के अवसर पर किशोरों के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला। उस कार्यक्रम में महात्मा गांधी से जुड़े कई सत्र आयोजित किए गए थे। एक सत्र में बच्चों को पांच मिनट तक बापू की जिंदगी और उनके सिद्धांतों पर बोलना था। वक्ता आ रहे थे और तय समय में अपनी बात रखकर जा रहे थे। कुछ प्रतिभागी हिंदी में और कुछ अंग्रेजी में अपनी बात रख रहे थे। आखिरी विद्यार्थी ने गांधी की जिंदगी पर बोलना आरंभ किया और उनकी हत्या पर अपनी बात खत्म की। अपने वक्तव्य के अंत में उसने कहा कि गांधी वाज किल्ड बाय ए हिंदू फैनेटिक नाथूराम गोडसे ( गांधी की हत्या एक हिंदू कट्टरपंथी नाथूराम गोडसे ने की)। बात रखने के बाद वो चला गया। सभागार में सबकुछ सामान्य था लेकिन मेरे मन में एक बात चल रही थी कि उसने ‘हिंदू फेनेटिक’ शब्द का उपयोग क्यों किया। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मैं उसके पास गया और उसको लेकर सभागार से बाहर निकला। मैंने उस किशोर से पूछा कि आपने नाथूराम गोडसे को हिंदू कट्टरपंथी क्यों कहा? क्या सिर्फ कट्टरपंथी कहना काफी नहीं था। उसने जो उत्तर दिया उसने एक और बड़ा प्रश्न मेरे सामने खड़ा कर दिया। उसने कहा कि उसको बचपन से ही ये बताया/पढ़ाया जा रहा है कि गांधी कि हत्या एक हिंदू ने की। इस प्रसंग के बाद मैंने कुछ इतिहासकारों की पुस्तकों को टटोलना आरंभ किया। कई जगहों पर गोडसे को हिंदू फेनेटिक या हिंदू कट्टरपंथी कहा गया है। बच्चो को पढ़ाई जानेवाली पुस्तक जिसको भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आनेवाली संस्था राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) तैयार करती है उसमें भी परोक्ष रूप से नाथूराम गोडसे को हिंदू बताया गया है। इस पुस्तक में कहा गया है कि गांधी की हत्या करनेवाला युवक ब्राह्मण था, पुणे का रहनेवाला था और चरमपंथी हिंदू अखबार का संपादक था।   

इन प्रश्नों से जूझ ही रहा था कि एक दूसरा प्रसंग सामने आया। ये प्रसंग अपनी लेखनी से ब्रिटिश साम्राज्यवाद को चुनौती देनेवाले पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या से जुड़ा है। गणेश शंकर विद्यार्थी ने स्वाधीनता संग्राम के दौरन ‘प्रताप’ साप्ताहिक पत्र के माध्यम से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जनमानस तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। उनका एक पांव जेल के अंदर और एक जेल के बाहर रहता था। राष्ट्रवादियों के साथ उनका संपर्क सतत बना रहता था। गांधी की तरह इनकी भी हत्या कर दी गई थी। इनकी हत्या किसने की इस पर जितना लिखा गया उससे अधिक छिपाया गया। ज्यादातर जगहों पर ये उल्लेख मिलता है कि गणेश शंकर विद्यार्थी दंगाइयों के शिकार बन गए। कई जगह तो सिर्फ इतना उल्लेख मिलता है कि विद्यार्थी जब समाज में समरसता स्थापित करने में लगे थे तो उन्मादियों की भीड़ ने उनको मार डाला। इस बात का उल्लेख नहीं मिलता है कि उनकी हत्या करनेवाला कौन था। गांधी के हत्यारे के विपरीत यह नहीं बताया जाता है कि गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या करनेवाला किस पंथ या मजहब से जुड़ा था। उनके हत्यारे की पहचान छिपा ली जाती है। गांधी जयंती समारोह के बाद मन में ये प्रश्न उठा कि इस बात की खोज की जाए कि गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या किसने की। इसको खोजना आरंभ किया। कुछ जगहों पर यह मिला कि अंग्रेज अधिकारियों ने गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या की साजिश रची थी और दंगों की आड़ में उसको अंजाम तक पहुंचा दिया। युगपुरुष गणेश शंकर विद्यार्थी पुस्तक में उनकी हत्या के एक चश्मदीद गनपत सिंह का बयान मिला। इसमें  25 मार्च की दोपहर तीन से चार बजे कानपुर के चौबेगोला के पास की घटना का वर्णन है। ‘इसी समय बकरमंडी के मुसलमानों का दल नई सड़क पहुंच गया और इस प्रकार गणेश जी फिर दो गिरोहों के बीच फंस गए। मैं उनसे पंद्रह गज की दूरी पर खड़ा हुआ था। इतने में एक मुसलमान चिल्लाकर बोला यही गणेश शंकर विद्यार्थी हैं , इसे खत्म कर दो, बचने न पाए। गिरोह में से सबसे पहले दो पठानों ने गणेश जी के साथ एक साथी पर हमला किया। वह व्यक्ति दस मिनट के अंदर वहीं मर गया। इतने में  कुछ मुसलमान गणेश जी पर दौड़ पड़े और एक ने उनपर छुरे से वार कर दिया और दूसरे ने कांते का प्रहार किया। गणेश जी भूमि पर गिर पड़े और कुछ अन्य लोग भी उनपर प्रहार करने लगे।‘  तीन चार दिन बाद विद्यार्थी जी की लाश मिली थी। इस प्रसंग का उल्लेख लखनऊ के लोकोदय प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक अंतर्वेद प्रवर में भी मिलता है। इस पुस्तक में गणेश जी के साथ रहे शंकरराव टाकलीकर का बयान प्रकाशित है। उसमें भी इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या मुसलमानों की भीड़ ने की थी। 

अब गांधी जी की हत्या के प्रसंग को और गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या की घटना और उसपर प्रचलित लेखों की भाषा पर नजर डालें तो आपको पता चल जाएगा कि इतिहास के साथ किस तरह का छल किया गया है। गांधी की हत्या ‘हिंदू कट्टरपंथी’ करता है और विद्यार्थी जी की हत्या ‘उन्मादी भीड़’ करती है। इतिहास लेखन की ये सांप्रदायिक प्रविधि है। इस तरह के लेखन के पीछे की मंशा क्या हो सकती है इपर भी विचार किया जाना आवश्यक है। वामपंथी इतिहासकारों के इस तरह के छल की सूची बहुत लंबी है। इतिहास के नाम पर जिस तरह का लेखन स्वतंत्र भारत में विचारधारा विशेष के इतिहासकारों ने किया वो अक्षम्य अपराध की श्रेणी में आता है। मार्क्सवादियों के बौद्धिक प्रभाव में इस तरह की धारा अकादमिक जगत में चली जिसने कई पीढ़ी के विद्यार्थियों के मन में अपने ही इतिहास को लेकर एक अलग छवि का निर्माण किया। समाज में वैमनस्यता की लकीर गहरी करे में इस तरह का इतिहास लेखन भी जिम्मेदार है। यह सब तब हो रहा था कि जब हमारे देश में साक्षरता दर कम थी और संचार के अन्य माध्यम नहीं थे । जो लिख दिया जाता था उसको अंतिम सत्य मान लिया जाता था। उनके लिखे को चुनौती देनेवालों को अकादमिक जगत में ये स्वीकार ही नहीं करते थे। उनकी उपेक्षा की जाती थी। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की स्थापना के उद्देश्यों और उसपर मार्क्सवादी इतिहासकारों के कब्जे के इतिहास पर नजर डालने से ये सब बहुत स्पष्ट रूप से दिखता है। जब देश स्वतंत्र हुआ था उस समय अगर इतिहास अनुसंधान परिषद में बगैर वैचारिक फिल्टर लगाए इतिहास लेखन का काम हुआ होता तो आज इतिहास को लेकर जो भ्रम है वो नहीं होता। उस वक्त स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े व्यक्तियों के अनुभवों को कलमबद्ध कर उसका प्रकाशन किया जाता तो इतिहार की सूरत अलग होती। लेकिन मार्क्सवादी इतिहासकारों ने ऐसा होने नहीं दिया।  एकांगी इतिहास लेखन का परिणाम यह हुआ कि भारत के बौद्धिक चिंतन कि जो धारा परतंत्रता के दौर में प्रखरता से विदेशी आक्रांताओं का प्रतिकार कर रही थी वो कुंद होने लगी। चिंतन धारा को बाधित कर अपने वैचारिकता को आगे बढ़ाने का जो उपक्रम मार्क्सवादी इतिहासकारों और बौद्धिकों ने किया उसके पीछे का सोच सिर्फ अपनी विचारधारा को पुष्ट करना था। उस विचारधारा के आधार बनाई गई राजनीतिक पार्टियों के लिए वोट पक्का करना था। अपने इस काम में वो कई सालों तक सफल भी रहे लेकिन सत्य को लंबे समय तक रोक पाना बेहद मुश्किल काम है। इतिहास लेखन की मार्क्सवादि पद्धति, जिसको उसके पैरोकार वैज्ञानिक पद्धति करार देते थे, पक्षपाती पद्धति दिख रही है। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में इतिहास लेखन की इस सांप्रदायिक पद्धति को समावेशी बनाने की आवश्यकता है।  

Sunday, August 22, 2021

भगत सिंह की हत्या का बदला


दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद चंपारण की धरती पर गांधी ने जो आंदोलन किया उसकी सफलता ने उनको देशभर में व्याप्ति दी। स्वाधीनता के संघर्ष में चंपारण की धरती से कई क्रांतिवीर निकले लेकिन इतिहासकारों ने गांधी और चंपारण को अपने लेखन में जिस तरह से रेखांकित किया उससे उस धरती के कई क्रांतिकारियों का योगदान धूमिल पड़ गया। आज जब देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है तो ऐसे सपूतों को याद करने का अवसर है जिन्होंने अपनि मातृभूमि के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी। ऐसे ही एक क्रांतिकारी थे बैकुंठ सुकुल।

महात्मा गांधी के चंपारण पहुंचने के पहले मुजफ्फरपुर में एक ऐसी घटना घट चुकी थी जिसने बिहार समेत पूरे देश के मानस को झकझोर दिया था। ये घटना थी खुदीराम बोस को फांसी की। जब खुदीराम बोस को 1908 में मुजफ्फरपुर जेल में फांसी की सजा दी गई तो उसका उस इलाके के युवकों के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। समाचारपत्रों में युवकों ने पढ़ा कि खुदीराम को जब फांसी के लिए तख्ते तक ले जाया जा रहा था तब वो सीना ताने थे और मुस्कुरा रहे थे। इस समाचर ने वहां के युवकों को अपने देश के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा दी। उस दौर में उत्तर बिहार में सक्रिय कुछ युवकों ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के बैनर तले युवकों को जोड़ने का काम आरंभ कर दिया। इस काम में जोगेन्द्र सुकुल, किशोरी प्रसन्न सिंह और बसावन सिंह के साथ एक और युवक था बैकुंठ सुकुल। बैकुंठ सुकुल के अंदर भी अपने देश के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना तब और जोर मारने लगी जब एक दिन उसको पता चला कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के मृत्युदंड का जिम्मेदार शख्स उसी बिहार की धरती पर रह रहा है जहां ये लोग सक्रिय थे। दरअसल भगत सिंह और उनके साथियों को मृत्युदंड मिलने के पीछे फणीन्द्र नाथ घोष की गवाही थी। पहले फणीन्द्र नाथ घोष भी क्रांतिकारियों के साथ थे लेकिन जब लाहौर षडयंत्र केस चला तो वो सरकारी गवाह बन गए। उनकी गवाही की वजह से स्वाधीनता आंदोलन को तगड़ा झटका लगा था क्योंकि घोष ने कई गुप्त जानकारियां अपनी गवाही के दौरान सार्वजनिक कर दी थीं। लाहौर षडयंत्र केस (ताज बनाम सुखदेव तथा अन्य) में सात अगस्त 1930 को फैसला आया। उस फैसले में इस बात का भी उल्लेख है कि मनमोहन बनर्जी तथा ललित मुखर्जी ने भी क्रांतिकारियों के खिलाफ गवाही दी थी। पर उस फैसले को पढ़ने के बाद यह स्पष्ट होता है कि फणीद्र नाथ घोष की गवाही बेहद अहम थी। यह घोष की गवाही ही थी जिसमें बेहद सूक्ष्मता और व्यापकता के साथ भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के क्रांतिकारी मंसूबों को उजागर किया गया था। उसकी गवाही इस वजह से भी इन क्रांतिकारियों की फांसी की सजा की वजह बनी क्योंकि वो पहले इनके साथ ही काम कर रहा था। जब इन तीनों को फांसी दे दी गई तो पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा बढ़ा। 

1932 में पंजाब के क्रांतिकारी साथियों ने बिहार के अपने साथियों को एक संदेश भेजा कि इस कलंक को धोओगे कि ढोओगे? इस संदेश का अर्थ ये था कि जिस घोष की गवाही पर लाहौर में सांडर्स को मारने के जुर्म में भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दी गई वो बिहार के बेतिया का रहनेवाला था और सरकारी सुरक्षा में बेतिया में रह रहा था। पंजाब के क्रांतिकारी साथियों के संदेश के बाद बिहार में स्वाधीनता के लिए छटपटा रहे युवकों की एक बैठक हुई। इस बैठक में बैकुंठ सुकुल, अक्षयवट राय, किशोरी प्रसन्न सिंह आदि शामिल हुए। ये सभी फणीन्द्र नाथ घोष से बदला लेने का काम अपने हाथ में लेना चाहते थे। सभी चाहते थे कि स्वाधीनता के लिए अपनि जान देनेवाले अपने क्रांतिकारी साथियों की शहादत का बदला वो लें। लेकिन बैठक में जब कोई निर्णय नहीं लिया जा सका तो छह युवकों के नाम चिट पर लिखकर लाटरी निकाली गई। बैकुंठ सुकुल भाग्यशाली रहे और उनके नाम की चिट निकल आई और उनको फणीन्द्र नाथ घोष से बदला लेने की जिम्मेदारी मिली। अब बैकुंठ सुकुल ने अपने मित्र चंद्रमा के साथ मिलकर योजना बनाई। वो हाजीपुर से करीब सवा सौ किलोमीटर सायकिल चलाकर दरभंगा पहुंचे। दरभंगा में अपने एक साथी के साथ ठहरे। वहां एक भुजाली का इंतजाम किया और अपने साथी से एक धोती मांगकर मोतिहारी होते हुए बेतिया पहुंचे। 9 नवंबर 1932 की शाम, हल्का अंधेरा होने लगा था। फणीन्द्र घोष बेतिया बाजार में अपने एक दोस्त की दुकान पर बैठे हुए थे। उसी वक्त बैकुंठ सुकुल और चंद्रमा सिंह ने उनपर हमला कर बुरी तरह से जख्मी कर दिया। आठ दिन बाद उसकी मौत हो गई। 

ब्रिटिश हुकूमत लाहौर केस के गवाह पर हुए इस जानलेवा हमले के असर को समझ रही थी। लिहाजा बैकुंठ सुकुल और चंद्रमा सिंह की गिरफ्तारी के लिए चौतरफा घेरे बंदी की गई। करीब आठ महीने की मशक्कत के बाद अंग्रेजों ने चंद्रमा सिंह को कानपुर से और बैकुंठ सुकुल को सोनपुर से गिरफ्तार कर लिया। हमले के बाद जब ये दोनों वहां से गए थे तो अफरातफरी में उनकी गठरी वहीं छूट गई थी। गठरी से मिले सामान के आधार पर इनकी गिरफ्तारी हुई थी। फिर सात महीने केस चला और फरवरी में बैकुंठ सुकुल को फांसी की सजा सुनाई गई और मई 1934 में गया जेल में उनको फांसी दे दी गई। ये पूरा प्रसंग नंदकिशोर शुक्ल की पुस्तक स्वतंत्रता सेनानी बैकुंठ सुकुल का मुकदमा में उल्लिखित है। तमाम दस्तावेजों के आधार पर उन्होंने ये पुस्तक लिखी हैं। 

चंद्रमा सिंह को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। नवंबर 1932 से लेकर बैकुंठ सुकुल की फांसी होने तक इस केस से जुड़ी गतिविधियों ने युवको के अंदर देश के लिए मर मिटने का ज्वार पैदा कर दिया था। बैकुंठ सुकुल ने अपने कृत्य से ये संदेश दे दिया था कि अंग्रजों से मिलने और क्रांतिकारियों से गद्दारी की सजा मौत है। हमारे स्वाधीनता संग्राम के कई ऐसे नायक हैं जिनके देशभक्ति के कृत्य इतिहास की पुस्तकों में दबा दी गई है या उनको वो अहमियत नहीं दी गई जिसके वो अधिकारी थे। बैकुंठ सुकुल उनमें से एक थे। 

Thursday, October 1, 2020

बड़े लक्ष्य के लिए फिल्मों से उदासीनता


गांधी की फिल्मों में कोई रुचि नहीं थी और वो फिल्मों को समाज के लिए बुरा मानते थे। इसके तात्कालिक कारण थे। गांधी जी मनोरंजन को समाज के लिए आवश्यक मानते थे लेकिन मनोरंजन को लेकर उनके अपने कुछ मानक थे। उनका मानना था कि मनोरंजन ऐसा हो जो बेहतर समाजिक मूल्यों को स्थापित करे। फिल्म देखनेवाले में अच्छे संस्कार का बीज डाले या उसके अंदर के अच्छे संस्कार को मजबूत करे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देश की जनता खासकर युवाओं को संगठित करने और उनको भटकने नहीं देने के लिए गांधी प्रतिबद्ध थे। ये वही गांधी हैं जिनकी लंदन में रहने के दौरान संगीत में रुचि जगी थी। मशहूर अमेरिकी पत्रकार जोसेफ लेलीविल्ड ने अपनी पुस्तक ‘ग्रेट सोल, महात्मा गांधी एंड हिज स्ट्रगल विद इंडिया’ में इस बात को रेखांकित भी किया है कि लंदन में गांधी वायलिन बजाना भी सीखने जाते थे। इस बात का उल्लेख भी मिलता है कि गांधी ने पश्चिमी नृत्य सीखने की भी कोशिश की थी। वो क्लबों में जाकर डांस भी किया करते थे। दरअसल जब गांधी भारत लौटे तो यहां की फिल्मों के बारे में उनकी राय पोस्टरों को देखकर या फिल्मों के बारे में लोगों से सुनकर बन रही थी। ये वही दौर भी था जब भारतीय मूक फिल्मों में पौराणिक कहानियों पर बन रही फिल्मों से इतर भी फिल्में बनने लगी थीं। सी ग्रेड अमेरिकी फिल्मों का प्रदर्शन भी शुरू हो गया था जिसमें यौन संबंधों और नग्नता का चित्रण होता था। भारतीय दर्शकों के लिए यह एक अलग ही दुनिया थी जहां स्त्री देह को खुलेपन के साथ दिखाया जाने लगा था। इसका प्रभाव समाज पर पड़ने लगा था। उसी दौर में 1925 में डी एन संपत ने मूक फिल्म ‘सती अनुसूइया’ बनाई तो उसमें अभिनेत्री सकीना बाई ने बगैर कपड़ों के एक सीन किया था। इस तरह की बातें गांधी तक पहुंचती थी और फिल्मों को लेकर उनकी राय नकारात्मक होती जाती थी। 

कहा जाता है कि महात्मा गांधी ने अपने जीवन काल में सिर्फ एक ही फिल्म, रामराज्य, देखी थी जिसके बाद भी उनकी राय बदल नहीं सकी। इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि गांधी ने फिल्मकार विजय भट्ट को बेहद संक्षिप्त मुलाकात में गुजरात के प्रख्यात कवि नरसी मेहता पर फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया था। अपनी किताब ‘महात्मा गांधी और सिने संसार’ में इकबाल रिजवी ने लिखा है कि ‘फिल्मकार विजय भट्ट गांधी के बड़े प्रशंसक थे। गांधी जी एक बार वलसाड प्रवास पर थे तो विजय भट्ट उनसे मिलने पहुंचे। सुबह की सैर की समय गांधी से उनकी बेहद संक्षिप्त भेंट हुई। गांधी ने उनसे पूछा कि आप क्या करते हैं? विजय भट्ट ने कहा कि वो फिल्मकार हैं। गांधी ने फिर एक सवाल दागा ‘क्या कभी आपने नरसी मेहता पर फिल्म बनाने के बारे में सोचा है?‘ विजय भट्ट ने उत्तर दिया कि वो फिल्म बनाने की कोशिश करेंगे। दो सवालों की इस बेहद संक्षिप्त मुलाकात के बाद ही विजय भट्ट ने फिल्म ‘नरसी भगत’ का निर्माण किया था। इस फिल्म में ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ भजन भी शामिल किया गया था। पर जब 1940 में ये फिल्म रिलीज हुई तो इसको भी गांधी अपनी राजनीतिक व्यस्तता की वजह से देख नहीं सके।

गांधी भले ही फिल्मों को उचित माध्यम नहीं मानते थे लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में कई नेता थे जो फिल्मों को समाज को बदलने का एक प्रभावी माध्यम मानते थे। सरदार पटेल तो किशोर साहू की फिल्म ‘वीर कुणाल’ के प्रीमियर के मौके पर मुंबई के नॉवल्टी थिएटर में पहुंचे भी थे। ये आजादी से दो साल पहले की बात है। फिल्म शुरू होने के पहले उन्होंने छोटा सा भाषण भी दिया था। उस भाषण का सार ये था कि कांग्रेस कला और फिल्मों से विमुख नहीं है। उन्होंने तब जोर देकर कहा था कि अगर बरतानिया हुकूमत देश में विदेशी पूंजी से स्टूडियो खोलेगी तो कांग्रेस उसका विरोध करेगी और वो खुद उस विरोध का नेतृत्व करेंगे। इसी तरह से जब 1945 में पृथ्वीराज कपूर और शोभना समर्थ अभिनीत फिल्म ‘वीर अर्जुन’ रिलीज हुई थी तो उसको देखने डॉ राजेन्द्र प्रसाद और श्यामा प्रसाद मुखर्जी पहुंचे थे। कहना ना होगा कि गांधी भले ही मनोरंजन के इस माध्यम फिल्म को पसंद नहीं करते थे लेकिन उन्होंने कभी भी इसकी राह में बाधा बनने की कोशिश नहीं की, बल्कि गांधी और उनके सिद्धांतों ने हिंदी फिल्मों को गहरे तक प्रभावित किया। 

हिंदी फिल्मों को दो थीम ने बहुत गहरे तक प्रभावित किया है। पहली थीम है राम कथा और दूसरी थीम है गांधी का व्यक्तित्व और उनके सिद्धांत। 1948 में बनी फिल्म ‘शहीद’ से लेकर 2006 में बनी फिल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ तक पर अगर सूक्षम्ता से नजर डालते हैं तो ऐसी सैकड़ों फिल्में रेखांकित की जा सकती हैं जिसमें किसी ना किसी रूप में गांधी उपस्थित हैं। गांधी का जो विराट व्यक्तित्व है और उनके सिद्धांतों की जो वैश्विक व्याप्ति है, हिंदी फिल्में उनके प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाई हैं। 

   


Saturday, November 30, 2019

गांधी के गुनहगार कम्युनिस्ट ?


पिछले दिनों दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में एक पुस्तक चर्चा के दौरान बेहद दिलचस्प बातें हुई। पुस्तक थी लेखक इकबाल रिजवी की गांधी और सिने संसार। इस पुस्तक में लेखक ने मोहनदास करमचंद गांधी और फिल्मों के रिश्तों पर रोचक तरीके से लिखा है। इस पुस्तक का प्रकाशन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र ने किया है। पुस्तक विमोचन के बाद उसपर एक चर्चा का आयोजन भी किया गया था जिसमें नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित लेखक शरद दत्त, भारतीय ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक लीलाधर मंडलोई समेत कई अन्य लोग शामिल हुए थे। पुस्तक पर चर्चा के दौरान एक बात बार-बार आ रही थी कि गांधी पर किसी भारतीय निर्माता ने सम्रगता में फिल्म क्यों नहीं बनाई? एक वक्ता ने इसको गांधी के विराट व्यक्तित्व से जोड़ा और कहा कि बापू का जीवन इतना विराट था कि उसको तीन घंटे में समेटना बहुत ही मुश्किल काम है। एक अन्य वक्ता ने कहा कि टुकड़ों-टुकड़ों में गांधी को लेकर कई फिल्में बनीं और उन्होंने इसको कलात्मक स्वतंत्रता से जोड़ा और तर्क दिया कि फिल्मकार अपनी सोच के हिसाब से फिल्में बनाता है किसी शख्सियत को ध्यान में रखकर नहीं। काफी देर तक इस बात पर मंथन होता रहा कि किसी भारतीय निर्माता-निर्देशक ने गांधी पर मुकम्मल फिल्म क्यों नहीं बनाई। नेहरू जी का संसद में दिया गया वो बयान भी सामने आया जिसमें उन्होंने कहा था कि भारतीय निर्माताओं में गांधी पर फिल्म बनाने की क्षमता नहीं है।
सवाल अनुत्तरित रहा कि गांधी पर भारतीय फिल्म निर्माताओं ने फिल्म क्यों नहीं बनाई।घंटे भर की चर्चा में यह संभव भी नहीं था कि इस गंभीर और गूढ़ विषय पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके। अब जरा अगर हम ऐतिहासिक तथ्यों पर गौर करें और वहां से मिल रहे संकेतों को जोड़ें तो शायद निषकर्ष तक पहुंचने का रास्ता मिल सके। जब गांधी जी ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की थी तो कम्युनिस्ट पार्टी ने इसका विरोध किया था। इसके विरोध की वजह स्थानीय राजनीति या गांधी से मतभेद नहीं था, इसकी वजह थी कि कम्युनिस्ट पार्टी को मॉस्को ये इस आंदोलन का विरोध करने का निर्देश प्राप्त हुआ था। जनवरी 1941 में रूस और जर्मनी के बीच व्यापक व्यावसायिक हितों को ध्यान में रखकर समझौता हुआ था। उसके पहले भी नाजी जर्मनी और सोवियत रूस ने युद्ध सामग्री का जमकर आदान-प्रदान किया था। लेकिन जब जून 1941 में हिटर ने अपने पूर्व सहयोगी सोवियत रूस पर हमला कर दिया तो रातों रात नाजियों के खिलाफ संघर्ष को सोवियत रूस ने दूसरा रंग देते हुए उसको जन युद्ध बना दिया। इस रणनीति के तहत सोवियत रूस ने अपने एक विशेष दूत लार्किन को संदेश लेकर भारत भेजा जिसने कम्युनिस्ट पार्टियों को भारत छोड़े आंदोलन का विरोध करने का संदेश दिया। कम्युनिस्ट पार्टी ने ‘पितृभूमि’ से आए संदेश को ग्रहण करते हुए जोरदार तरीके से भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध शुरू कर दिया।
भारत उस वक्त गुलामी के खिलाफ अपनी लड़ाई के अंतिम दौर में प्रवेश कर चुका था और कम्युनिस्ट पार्टी भारत छोड़ो आंदोलन के खिलाफ जुलूस आदि निकालने लगी थी। देश की जनता को कम्युनिस्टों का ये रुख पसंद नहीं आ रहा था। जब कम्युनिस्टों ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध तेज किया तो जनता के सब्र का बांध टूट गया। हालात इतने बदतर हो गए थे और लोगों को गुस्सा इतना बढ़ गया था कि कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता भारत छोड़ो आंदोलन के खिलाफ जुलूस निकालते थे तो लोग छतों से उनपर खौलता हुआ पानी फेंक देते थे। भारत छोड़ो आंदोलन के समय ही कम्युनिस्ट और गांधी आमने सामने थे।
भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध करने की वजह से 1942-43 में कम्युनिस्ट पार्टी की साख बुरी तरह से छीज गई थी। अपनी उसी छीज गई साख को नई पहचान और स्वीकृति देने के लिए कम्युनिस्टों ने भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की स्थापना की। देश आजाद हुआ और कम्युनिस्टों ने देश की आजादी को झूठी आजादी करार दिया। तेलांगना में सशस्त्र क्रांति के मंसूबों के साथ खून बहाया। प्रतिबंधित हुए। इन सबके बीच भारतीय जन नाट्य संघ  से जुड़े लोग हिंदी फिल्म जगत में स्थापित हो चुके थे या माहौल कुछ ऐसा बनाया गया कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्मों से जुड़े लोग इप्टा से जुड़ते चले गए। फिल्म जगत में कम्युनिस्टों का दबदबा बढने लगा था लेकिन कोई गांधी पर समग्रता में फिल्म बनाने की नहीं सोच रहा था। कोशिश भी नहीं हो रही थीं। क्या इससे कोई संकेत निकलता है। क्या कम्युनिस्टों और उनसे संबद्ध संगठनों के कलाकारों ने गांधी की उपेक्षा उस वजह से की।
हिंदी फिल्मों में कम्युनिस्टों के प्रभाव को एक ही उदाहरण से समझा जा सकता है। 1945 में महबूब खान ने एक फिल्म बनाई थी नाम था हुमायूं। इस फिल्म में अशोक कुमार, नर्गिस, वीणा ने अभिनय किया था और इसकी कहानी लिखी थी वाकिफ मुरादाबदी ने। इस फिल्म के शुरुआती फ्रेम को ध्यान से देखने और उसपर विचार करने की आवश्यकता है। सेंसर सर्टिफिकेट और फिल्म में योगदान स्मरण के बाद तीसरे फ्रेम में महबूब प्रोडक्शंस और उसका लोगो है। इस फिल्म कंपनी के लोगो को ध्यान से देखा जाना चाहिए। इसमें हंसिया और हथौड़ा है और उसके बीच में अंग्रेजी का एम लिखा है। एम से दो चीजें हो सकती हैं या तो महबूब या मार्क्स । एम से मार्क्स का अंदाज इस वजह से लगाया जा सकता है कि कम्युनिज्म का अंतराष्ट्रीय निशान हंसिया और हथौड़ा है। जो शख्स कम्युनिस्ट पार्टी से इतना गहरे तक जुड़ा हो उससे क्या ये उम्मीद की जा सकती है कि वो पार्टी के विरोधी के खिलाफ फिल्म बनाए। ये तो गांधी और उनके विचारों की ताकत थी जो महबूब खान की फिल्म मदर इंडिया में उभर कर सामने आती है। मदर इंडिया में महबूब खान गांधी से बचते हैं लेकिन फिल्म को गांधी के प्रभाव से नहीं बचा पाते। इस फिल्म की कहानी नायिका का यौन शोषण और हिंसा के खिलाफ अहिंसक तरीके से प्रतिकार का है। हिंदी फिल्मों में इप्टा के प्रभाव वाले निर्माताओं, निर्देशकों और लेखकों ने भी गांधी का दरकिनार किया और गांधीवाद को अपनाया चाहे वो फिल्म श्री 420 हो, फिल्म नया दौर हो या फिर 1952 में बनी फिल्म आंधियां हो। इन फिल्मों में समाजवाद और मार्क्सवाद को परोक्ष रूप से लाया गया लेकिन यहां भी मार्क्सवाद को गांधी के कंध की जरूरत पड़ी। फिल्म आंधियां में जब गांववाले सूदखोर के खिलाफ विरोध करते हैं तो सिद्धांत तो समाजवादी होता है लेकिन विरोध का औजार गांधीवादी। गांववाले सूदखोरों के खिलाफ सत्याग्रह करते हैं। ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं जहां इप्टा से जुड़े फिल्मकारों ने गांधी का उपयोग किया लेकिन गांधी पर फिल्म नहीं बनाई।
नेहरू ने भी किसी पर भरोसा नहीं किया कि वो गांधी पर फिल्म बना सकें बल्कि उन्होंने तो संसद में कहा कि भारत में किसी में क्षमता नहीं है कि वो गांधी पर फिल्म बना सकें। रिचर्ड अटनबरो जब नेहरू से मिले थे तब गांधी पर फिल्म बनाने की बात बहुत गंभीरता से आगे बढ़ी थी। तब भी नेहरू ने अटनबरो से ये कहा था कि ‘गांधी जी एक महान व्यक्ति थे लेकिन उनके व्यक्तित्व में भी कमजोरियां थीं, उनकी विफलताएं भी थीं। हम हिंदुओं में एक प्रवृत्ति है कि जब हम किसी को महान समझते हैं तो उसको भगवान भी समझने लगते हैं। गांधी जी भी मनुष्य थे. एक जटिल मनुष्य और उनको उसी तरह से देखा जाना चाहिए।‘1958 के बाद नेहरू और अटनबरो की कई बैठकों में से एक बैठक में नेहरू ने उनसे ये भी कहा था कि गांधी पर बनने वाली फिल्म में उनको भगवान या संत नहीं बनाना चाहिए। फिर गांधी के जीवन पर बनने वाली फिल्म में आनेवाले खर्चे को लेकर भी लंबे समय तक भारत सरकार फैसला नहीं ले सकी। अटनबरो चाहते थे कि भारत सरकार गांधी पर फिल्म बनाने के उनके प्रोजेक्ट को धन दे। आखिरकार इंदिरा गांधी ने दस लाख डॉलर का अनुदान दिया और अटनबरो ने फिल्म बनाई। यह आज तक रहस्य बना हुआ है कि किसी भी भारतीय फिल्म निर्माता ने गांधी पर समग्रता में फिल्म क्यों नहीं बनाई। आज जब बॉयोपिक का दौर चल रहा है और मैरी कॉम से लेकर सचिन तेंदुलकर तक पर बयोपिक बन रहे हैं लेकिन अब भी गांधी पर फिल्म बनाने को लेकर किसी तरह की कोई पहल दिखाई नहीं देती। इस बात पर संवाद होना चाहिए, चर्चा होनी चाहिए कि आजादी के बाद के दशकों में किसी भारतीय फिल्म निर्माता ने फिल्म क्यों नहीं बनाई? इस लेख में जिन बिंदुओं की ओर इशारा किया गया है उसपर व्यापक बहस से किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है।          

Thursday, September 26, 2019

फिल्मों पर गांधी का प्रभाव


हिंदी फिल्म के सौ वर्षों से अधिक लंबे इतिहास पर अगर हम नजर डालते हैं तो पाते हैं कि किसी भी हिन्दुस्तानी ने उनपर कोई मुकम्मल फिल्म नहीं बनाई। उनके व्यक्तित्व के हिस्सों, उनके जीवन से जुड़ी घटनाओं और उनके बेटों के साथ संबंधों पर तो फिल्म बनी लेकिन गांधी को केंद्र में रखकर जिस तरह से रिचर्ड अटनबरो ने फिल्म ‘गांधी’ का निर्माण किया उस तरह की कोई फिल्म नहीं बनी। गांधी पर हजारों किताबें लिखी गई, सैकड़ों शोध हुए लेकिन भारतीय निर्माताओं द्वारा उनपर मुकम्मल फिल्म नहीं बनाना, चकित करता है। जवाहरलाल नेहरू ने 1963 में राज्यसभा में अपने एक बयान में कहा था कि ‘भारत सरकार के किसी विभाग के लिए महात्मा गांधी के जीवन पर फिल्म बनाना बेहद कठिन है। सरकारी विभाग इस काम के योग्य नहीं हैं क्योंकि कोई ऐसा सक्षम व्यक्ति सरकार के पास नहीं है।‘ सरकारी विभाग की बात तो समझ में आती है लेकिन फिल्मों से जुड़े इतने महान निर्माता-निर्देशक हिंदी में हुए लेकिन किसी ने इस दिशा में कदम उठाने का साहस नहीं किया। क्या इसके पीछे हिंदी फिल्म के निर्देशकों की गांधी के विराट व्यक्तित्व के फिल्मांकन को लेकर समझ में हिचक थी या वो कारोबार के लिहाज से कोई जोखिम नहीं लेना चाहते थे। या फिर गांधी की फिल्म को लेकर जो उदासीनता या नकारात्मक राय थी उसने हिंदी फिल्म के कर्ताधर्ताओं पर मनोवैज्ञानिक असर डाला। अब जब पूरा देश गांधी के जन्म की एक सौ पचासवीं वर्षगांठ मना रहा है तो एक बार ये प्रश्न फिर ये यक्ष की भांति हिंदी सिनेमा के सामने खड़ा हो गया है।
गांधी पर समग्रता में फिल्म का निर्माण भले ही किसी भारतीय फिल्मकार ने नहीं किया लेकिन गांधी के विचार, उनकी जीवन शैली, उनके प्रयोग, उनके सिद्धांत हिंदी फिल्मों में लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहे। कुछ लोग भले ही ये कहते हों कि हिंदी फिल्मों में गांधी अदालतों और पुलिस थानों में सिर्फ तस्वीरों में ही दिखाई देते हैं लेकिन अगर फिल्मों की कहानियों को विश्लेषित करें तो ऐसी दर्जनों फिल्में हमारे सामने है, जिसमें गांधी किसी ना किसी रूप में उपस्थित हैं। चाहे वो सत्याग्रह हो, अहिंसा हो या फिर गरीबों को विशेष तवज्जो देने की गांधीवादी परिकल्पना हो। हिंदी फिल्म ने शुरू से ही राजनेता गांधी की जगह गांधी के व्यक्तित्व के नैतिक पक्ष को चुना, उनकी नैतिक आभा को उभारने की कोशिश की। अगर हम इस पहलू पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि हिंदी फिल्मों ने नायकत्व तो सुभाषचंद्र बोस को प्रदान किया लेकिन नैतिकता के शीर्ष पर गांधी को बिठाया। इस सिलसिले में 1948 में बनी फिल्म ‘शहीद’ का उदाहरण सटीक होगा। इस फिल्म में नायक नायिका गांधी को बहुत अधिक सम्मान तो देते हैं लेकिन उनको अपना आदर्श नहीं मानते, उनके आदर्श तो सुभाषचंद्र बोस ही हैं। अगर हम हिंदी फिल्मों की सौ साल से अधिक की यात्रा में गांधी की इस भूनिका को तलाशते हैं तो एक फिल्म और ध्यान में आती है 1950 में बनी ‘समाधि’। इसमें नायक सुभाषचंद्र बोस को अपना आदर्श मानता है, उनकी पूजा करता है और गांधी की उपेक्षा करता है। हिंदी फिल्मों में शायद 1954 में बनी फिल्म ‘जागृति’ एकमात्र ऐसी फिल्म है जिसमें गांधी के राजनीतिक पक्ष और स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका को उभारा गया है। इस फिल्म में गांधी को देश को आजाद करवाने के लिए धन्यवाद दिया गया है। इसके गाने भी खूब मशहूर हुए चाहे वो ‘हम लाए हैं तूफान से किश्ती निकाल कर’ हो या ‘साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’। इन दोनों गानों के चित्रांकन में गांधी की मुस्कारती तस्वीरें अब भी दर्शकों को याद हैं।
1948 में बनी फिल्म ‘शहीद’ से लेकर 2006 में बनी फिल्म ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ तक के फिल्मी सफर में से उन फिल्मों की एक लंबी सूची बनाई जा सकती है जिसमें गांधी के विचारों की छाप साफ तौर पर लक्षित की जा सकती है। 1952 में बनी फिल्म ‘आंधियां’ में जब फिल्म का नायक, जो महाजन है और सूद पर पैसे देता है, अपने पैसे की ताकत पर गांव की एक गरीब लड़की से शादी करना चाहता है तो पूरा गांव सत्याग्रह का फैसला लेता है। इसी तरह से फिल्म ‘जोगन’ की नायिका अपनी मर्जी के खिलाफ शादी का प्रतिकार करने के लिए ब्रहम्चर्य का रास्ता अपनाती है। फिल्म ‘नया दौर’ में समाजवाद को लेकर गांधी और नेहरू के बीच के द्वंद्व को बेहतरीन तरीके से चित्रित किया गया है। फिल्म में गांधी की उस उक्ति का इस्तेमाल भी किया गया है जो उन्होंने मशीनों के बारे में कही थी कि ‘वो मजदूरों को विस्थापित कर देगी और कुछ लोगों के हाथों में पूरी ताकत सिमट जाएगी’। मशीन और मजदूर के बीच के संघर्ष को बस और तांगा के माध्यम से दिखाया गया है।
‘मदर इंडिया’ में भी प्रत्यक्ष रूप से गांधी की उपस्थिति नहीं है लेकिन जिस तरह से एक पूरा परिवार एक ताकतवर सूदखोऱ के खिलाफ विरोध करता है और उसमें भी मां और उसका एक बेटा अहिंसक तरीके का सहारा लेते हैं वो परोक्ष रूप से गांधी की याद दिलाते हैं। इसी तरह से अगर हम देखें तो त्याग से आनंद की अनुभूति की कहानी कई फिल्मों में दिखाई देती है। कई फिल्मों में नायक दोस्ती की खातिर अपनी खुशी अपने प्यार को कुर्बान कर देता है। यह भी गांधी का ही प्रभाव है। हिंदू मुस्लिम एकता के गांधी के विचार कई फिल्मों में दिखते हैं, फिल्म अमर अकबर एंथोनी में तीनों बच्चे गांधी की प्रतिमा के नीचे दिखते हैं। इसकी प्रतीकात्मकता और प्रेरणा वही है।
गांधी की फिल्मों में कोई रुचि नहीं थी और वो फिल्मों को समाज के लिए बुराई मानते थे। और कहा जाता है कि उन्होंने सिर्फ एक ही फिल्म, रामराज्य, देखी थी जिसके बाद भी उनकी राय बदल नहीं सकी। गांधी भले ही सिनेमा को पसंद नहीं करते थे लेकिन भारतीय सिनेमा अब भी गांधी के विचारों को बेहद पसंद करता है।

Saturday, September 14, 2019

गांधी, हिंदी और हिन्दुस्तानी


हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर दैनिक जागरण के आयोजन में एक सत्र का विषय था, गांधी और हिंदी। इस सत्र में वक्ताओं ने गांधी के हिंदी प्रेम को रेखांकित किया। इस चर्चा में एक बात सामने आई कि गांधी हिंदी को राष्ट्रभाषा के तौर पर स्थापित करना चाहते थे। दरअसल गांधी शुरुआत में तो ऐसा चाहते थे, कहा भी था लेकिन बाद के दिनों में वो हिन्दुस्तानी की पैरोकारी करने लगे थे। गांधी और हिंदी के संबंधों को समग्रता में समझने के लिए हमें हिंदी के आंदोलनों की ऐतिहासिकता में जाना होगा। पहले गांधी का हिंदी प्रेम और बाद के दिनों में हिन्दुस्तानी प्रेम गांधी के विचारों का ऐसा विचलन है जिसमें राजनीति को देखना होगा। इस विचलन को समझने के लिए हमें हिंदी को लेकर चलाए गए आंदोलनों और प्रयासों को भी देखना होगा। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रयास गांधी के आगमन के बहुत पहले से हो चुका था। 1826 में राममोहन राय ने बंगदूत नाम का एक साप्ताहिक पत्र निकाला था जिसमें हिंदी, अंग्रेजी, बांग्ला और फारसी के लेख छपा करते थे। राममोहन राय हिंदी में लिखते थे और दूसरों को भी हिंदी में लिखने के लिए कहा करते थे। राममोहन राय के बाद ब्राह्म समाज को केशवचंद्र सेन ने संभाला था। केशवचंद्र सेन हिंदी के बड़े हिमायती थी। ठीक से याद नहीं है पर कहीं इस बात का उल्लेख मिलता है कि एक बार स्वामी दयानंद कलकत्ता गए थे को केशवचंद्र सेन के साथ ठहरे थे। उस वक्त वो ‘सत्यार्थ प्रकाश’ लिख रहे थे। केशवचंद्र सेन से इसपर उनकी बातें होने लगीं। जब सेन साहब को पता चला कि स्वामी जी संस्कृत में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना कर रहे हैं तो उन्होंने स्वामी जी को इसको हिंदी में लिखने की सलाह दी थी। केशव जी की सलाह के बाद ही स्वामी जी ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ को हिंदी में लिखा। इस बात के भी पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं कि केशवचंद्र सेन जी ये महसूस करते थे कि भारत की एकता के लिए और इसकी स्वतंत्रता के लिए एक ऐसी भाषा की आवश्यकता है जो पूरे देश की संपर्क भाषा हो। वो इसके लिए हिंदी को सबसे उपयुक्त मानते थे। सेन ने अपनी पत्रिका ‘सुलभ समाचार’ के 1875 के किसी अंक में बंग्ला में इस विषय पर एक लेख भी लिखा था और अपना मत हिंदी के पक्ष में प्रस्तुत किया था।
बंकिमचंद्र चटर्जी ने भी ये भविष्यवाणी की थी कि हिंदी एक दिन इस देश की राष्ट्रभाषा होकर रहेगी क्योंकि इसकी सहायता से ही भारत में एकता स्थापित होगी। डॉ सुनीति कुमार चटर्जी के मुताबिक 1877 में ‘बंगदर्शन’ में एक लेख छपा था जिसके लेखक का नाम नहीं था पर सभी का अनुमान था कि वो लेख बंकिमचंद्र चटर्जी ने लिखा था। उस लेख में भी हिंदी को भारत को जोड़ने वाली भाषा के तौर पर रेखांकित किया गया था। महर्षि अरविंद ने भी साप्ताहिक पत्रिका ‘धर्म’ में लिखा था कि ‘भाषा-भेद से देश की एकता में बाधा नहीं पड़ेगी। सबलोग अपनी मातृभाषा की रक्षा करते हुए,हिंदी को साधारण भाषा के रूप में अपनाकर, इस भेद को खत्म कर देंगे।‘ इस पृष्ठभूमि की चर्चा करने का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि जब 1885 में कांग्रेस की स्थापना हुई उसके पहले से ही देशभर में ये माहौल बना हुआ था कि हिंदी ही इस देश को एक सूत्र में जोड़ने का काम कर सकती है। हिंदी ही वो भाषा है जो इस देश की राष्ट्रभाषा बन सकती है। साफ है कि जब गांधी भारत लौटे तो उस वक्त पूरे देश के मानस में हिंदी को लेकर एक अपनत्व या कहें कि उसके पक्ष में एक खास किस्म का माहौल बना हुआ था। दक्षिण अफ्रीका से गांधी के भारत आने के पहले ही 10 अक्तूबर 1910 को हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की स्थापना हो चुकी थी और पंडित मदन मोहन मालवीय उसके अध्यक्ष और पुरषोत्तमदास टंडन इसके महामंत्री बन चुके थे। अदालतों की भाषा हिंदी हो इसके लिए काम शुरू हो चुका था। गांधी इस बात को भांप गए थे कि हिंदी को भारत की एकता और स्वतंत्रता के लिए उपयोग में लाया जा सकता है।  
अब जरा हिन्दुस्तानी के इतिहास को समझने की कोशिश करनी होगी। अकबर के समय से ही राजकाज की भाषा फारसी चली आ रही थी। बाद में भी ये चलता रहा। 1837 में कंपनी राज ने फारसी को कठिन मानते हुए आम जनता के लिए भारतीय भाषाओं में काम करने का आदेश जारी किया। इस आदेश के बाद बंगला, ओडिया, गुजराती और मराठी में संबंधित भूभाग में काम होने लगा। संयुक्त प्रांत, बिहार और मध्यप्रदेश का जो इलाका है वहां काम करनेवालों ने अंग्रेज अफसरों को ये समझा दिया कि उर्दू ही हिन्दुस्तानी है। इसका परिणाम यह हुआ कि इन प्रांतों में अदालतों की भाषा उर्दू ही रह गई। जब मदन मोहन मालवीय जी ने अदालतों में फारसी की जगह पर नागरी लिपि का आंदोलन शुरू किया और ये जोर पकड़ने लगा तो मुसलमानों की तरफ से इसका विरोध शुरू हुआ। यहीं से भाषा के प्रश्न में संप्रदाय का प्रवेश होता है। हम कह सकते हैं कि भाषाई संप्रदायवाद का बीज ‘कचहरी में नागरी आंदोलन’ के विरोध के दौरान बोया गया जो बाद में फला-फूला। 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों को ये बात समझ आ गई थी कि हिंदू और मुसलमानों के बीच की खाई को और चौड़ा किए उनका राज ज्यादा दिनों तक चलनेवाला नहीं है। इसको भांपते हुए बरतानिया हुकूमत अदालतों में नागरी लिपि की मांग को खारिज करने लगी। लेकिन 1881 में अंग्रेजो को समझ आया कि जनता की भाषा हिंदी और लिपि नागरी है तो अदालतों में फारसी के साथ साथ नागरी के उपयोग की अनुमति भी दे दी गई।
इस स्थिति में गांधी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा कहना शुरू कर दिया था। वो हर जगह इस आशय का भाषण भी देने लगे थे। दक्षिण के लोगों को भी हिंदी सीखने के लिए प्रेरित करने लगे थे। कब ये हिंदी प्रेम हिन्दुस्तानी प्रेम में बदल गया इसको ठीक ठीक चिन्हित करने में कठिऩाई है क्योंकि गांधी एक तरफ हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए काम कर रहे थे तो दूसरी तरफ हिन्दुस्तानी की वकालत करने में लग गए थे। 28 मार्च 1919 के तूतीकोरन में उन्होंने हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बताया था लेकिन 1920 या उससे थोड़ा पहले से गांधी के वक्तव्य गड्डमड्ड होने लगे थे। जब हिंदी को लेकर आंदोलन जोर पकड़ने लगा तब 1925 के कांग्रेस अधिवेशन में एक प्रस्ताव पास होता है कि पार्टी का सारा काम-काज, महासचिवों का काम सब आमतौर पर हिन्दुस्तानी में होगा। फिर 1935 में गांधी ने हिंदी और हिन्दुस्तानी पर अपना मत और स्पष्ट किया और बोले – हिंदी उस भाषा का नाम है जिसे हिंदू और मुसलमान कुदरती तौर पर बगैर प्रयत्न के बोलते हैं। इसी में वो आगे कहते हैं कि हिन्दुस्तानी और उर्दू में कोई फर्क नहीं है। देवनागरी में लिखी जाने पर वो हिंदी और अरबी में लिखी जाने पर उर्दू कही जाती है। हरजिन सेवक के 1 फरवरी 1942 में वो फिर से भ्रम पैदा करते हैं जब अपने लेख में लिखते हैं कि हिंदी और उर्दू के मेल से एक ऐसी जबान तैयार करनी है जो सबके काम आ सके। गांधी धीरे धीरे इसको हिंदू-मुस्लिम एकता के औजार के तौर पर इस्तेमाल करने लगे। देश की एकता के लिए भाषा को राजनीति का औजार गांधी ने बनाया। पहले हिंदी की वकालत करके और फिर उसके बाद हिन्दुस्तानी की वकालत करके। 1915 से लेकर 1947 तक हिंदी और हिन्दुस्तानी को लेकर उनके इतने भ्रमित करनेवाले बयान और लेख उपलब्ध हैं कि उससे किसी निषकर्ष पर पहुंचना बेहद मुश्किल काम है। 1945 तक तो गांधी हिन्दुस्तानी के इतने पक्ष में आ गए थे उनके सर्वमान्य नेता होने के बावजूद उनको साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा। जयपुर के सम्मेलन के खुले अधिवेशन में गांधी के इस्तीफे को रखा गया। रात दो बजे तक इसपर मंथन हुआ और आखिर गांधी का इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया। सदस्यों ने भारी मन से गांधी के इस्तीफे को स्वीकार किया लेकिन इस बात के संकेत मिले कि भाषा के नाम पर वो गांधी से भी दूबर जाने को तैयार थे।
गांधी हिंदी को लेकर आग्रही थे, बहुत काम किया, बहुत लेख लिखे, भाषण दिए लेकिन इतना ही उन्होंने हिन्दुस्तानी के लिए भी किया। गांधी ये कहते भी थे किसी विषय पर अगर उनकी अलग अलग राय है तो उनकी बाद में प्रकट की गई राय ही अंतिम राय होगी। गांधी की हिंदी को लेकर क्या राय रही है इसपर गंभीर मंथन की जरूरत है। मंथन बगैर किसी पूर्वग्रह के, बगैर किसी राजनीति के और बगैर किसी धर्म और संप्रदाय के दबाव के।

Saturday, June 30, 2018

स्थापित उद्धेश्यों से भटकती संस्था

भारत सरकार की एक संस्था है नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएफडीसी)। सूचना और प्रसारण मंत्रालय से संबद्ध इस संस्था की स्थापना उसी वर्ष हुई जिस वर्ष देश में इमरजेंसी लगाई गई थी यानि 1975। ये संस्था पिछले कुछ दिनों से गलत वजहों से चर्चा में है। तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने इस संस्था की चीफ नीना लाठ को भ्रष्टाचार के आरोप में हटा दिया था। बाद में नीना कोर्ट चली गईं और मामला वहां विचाराधीन है। इस कार्रवाई के पहले भी इस संस्था की गड़बड़ियों की खबरें आती रहती थी, कभी किसी फिल्म को वित्तीय सहायता देने को लेकर तो कभी किसी छोटे मोटे आयोजन को लेकर। इसके पहले इस तरह की खबरें भी आईं कि एनएफडीसी, चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी ऑफ इंडिया और अन्य फिल्म से संबंधित संस्थाओं को मिलाकर एक नई संस्था बना दिया जाएगा। चर्चा तो इस बात की भी है कि इस बारे में कैबिनेट नोट भी तैयार हो गया था लेकिन चुनावी वर्ष होने की वजह से अब शायद ही इस पर फैसला हो सके। वैसे यह प्रस्ताव बहुत कुछ मौजूदा सूचना और प्रसारण मंत्री की सोच पर भी निर्भऱ करता है कि वो इसको कितना आगे बढ़ाना चाहते हैं। खैर ये अलहदा मुद्दा है जो कि राज नीति के हिसाब से तय होगी। हम चर्चा इस बात पर करेंगे कि नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन अपनी स्थापना के समय तय किए गए उद्देश्यों की कसौटी पर कितना खड़ा उतर रहा है।एनएफडीसी की बेवसाइट पर इसके मिशन और उद्देश्य दोनों प्रकाशित हैं। मिशन के बारे में लिखा है- एनएफडीसी का लक्ष्य सिनेमा में उत्कृष्टता के लिए के लिए परिवेश निर्मित करना और इसकी विभिन्न भाषाओं में बनी फिल्मों को सहायता और प्रोत्साहन देते हुए भारत की सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देना है। मिशन के अलावा बेवसाइट पर उद्देश्य भी लिखा हुआ है। इस संस्था के मूल्यांकन के पहले इसके उद्देश्यों पर भी गौर करना आवश्यक है। उद्देश्य में उल्लिखित है कि- कौशल का विकास और सभी भाषाओं में निर्माण व सह-निर्माण, पटकथा लेखन का विकास और आवश्यकता आधारित कार्यशालाओं के जरिए भारतीय सिनेमा के विकास को सहायता देना। इसके अलावा दो और उद्देश्य बताए गए हैं, पहला है भारत और विदेश में सिनेमा के जरिए भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देना और दूसरा एक चुस्त और लचीले संगठन का निर्माण जो कि भारतीय फिल्म उद्योग की जरूरतों के प्रति क्रियाशील हो।
इससे भी एक दिलचस्प जानकारी इस संस्था की बेवसाइट के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित है कि इसने पिछले कई वर्षों में भारत के कुछ सबसे सम्मानित फिल्मकारों के साथ काम किया है जिसमें सत्यजीत रे, मीरा नायर, अपर्णा सेन, श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी, मृणाल सेन, रिचर्ड अटनबरो, अदूर गोपालकृष्णन और केतन मेहता शामिल हैं। अब अगर हम इस सूची पर विचार करें तो इसमें मौजूदा दौर के नए निर्देशक कोई नहीं नजर आता है। बेवसाइट की बैनर पर ‘अंग्रेजी में कहते हैं’ का पोस्टर जरूर लगा है कि जोकि मई में रिलिज हुई थी और इसके डायरेक्टर हरीश व्यास हैं। इसके अलावा जयदीप घोष की ‘माया बाजार’, प्रिया कृष्णस्वामी की ‘गंगूबाई’ जैसी फिल्में भी विज्ञापित हैं। इन फिल्मों के आधार पर अगर मिशन और उद्देश्य को देखते हैं तो एक प्रश्न मन में खड़ा होता है कि इन फिल्मों ने किस तरह का कौशल विकास किया, फिल्मों के माध्यम से कैसे भारतीय संस्कृति को मजबूत किया। पिछले कुछ वर्षों में जिन निर्देशकों के नाम यहां विज्ञापित हैं उसके बाद से जिस तरह की फिल्मों का निर्माण करने में एनएफडीसी सहायक रहा है उसने फिल्म संस्कृति को कैसे विकसित किया। संस्था की स्थापना के 43 साल बाद अगर इस संस्था के सहयोग से कमजोर फिल्मों का निर्माण हो रहा है तो ना तो ये संस्था अपने मिशन में ना ही इसके उद्देश्यों को हासिल करने में कामयाब हो रही है। करदाताओं का पैसा किस तरह से उपयोग में लाया जा रहा है, इस बारे में भी सरकार को विचार करने की जरूरत है। इस संस्था को फिल्म संस्कृति के विकास के लिए, सिनेमा में उत्कृषटा के लिए परिवेश निर्मित करना था। फिल्मों से जुड़े लोगों का मानना है कि ये संस्था अपने स्थापित उद्देश्यों से भटक गई है और अच्छी फिल्मों के निर्माण के सहयोग से ज्यादा अब ये सरकार की विज्ञापन एजेंसी हो गई है। सरकार और सार्वजनिक कंपनियों के प्रचार प्रसार में इसकी रुचि ज्यादा है।
पिछले कुछ सालों में एनएफडीसी ने क्या उल्लेखनीय कार्य किया है ये भी ज्ञात नहीं हो पा रहा है। क्या इसने किसी ऐसी कहानी का चुनाव किया या ऐसी फिल्म बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसको बनाने में वॉलीवुड कामयाब नहीं हो पाया। ‘जाने भी दो यारो’ या ‘परिणति’ जैसी कौन सी फिल्म एनएफडीसी के खाते में आई।एक जमाना था जब एनएफडीसी के कर्ताधर्ता उस तरह की कहानियों को तलाशते थे जिसपर मेनस्ट्रीम बॉलीवुड फिल्म नहीं बनाता था या नहबीं बना पाता था। हिंदी के बेहतरीन कथाकार विजयदान देथा की कहानी पर फिल्म बनावाई गई थी। क्या आज ऐसा सोचा भी जा रहा है या सोचा भी जा सकता है। लगता तो नहीं है। आज अगर असमिया की फिल्म ‘विलेज रॉकस्टार’ नेशनल अवॉर्ड जीतती है तो वो अपने बूते पर। कहानी की पहचान कर उसको रूपहले पर्द तक लाने में एनएफडीसी नाकाम रही है। आज सिनेमा निर्माण में तकनीक की बेहद अहम भूमिका है। नए फिल्म निर्माताओं को तकनीकी तौर पर समृद्ध करने के लिए एनएफडीसी कितनी कार्यशालाएं आयोजित करती है, एनिमेशन के बदसते स्वरूप पर विशेषज्ञों के साथ कितने वर्कशॉप हुए। देश के किन हिस्सों, किस किस भाषा के फिल्म निर्माताओं से संपर्क कर कौशल विकास के लिए प्रयास करती है इसको भी बताया जाना चाहिए। एनएफडीसी से अंग्रेजी में एक पत्रिका निकालती थी- सिनेमा इन इंडिया। सिनेमा प्रेमियों को उम्मीद थी कि अंग्रेजी के बाद ये पत्रिका हिंदी और अन्य भाषाओं में निकलेगी लेकिन निकल रही पत्रिका भी बंद हो गई। कौन है इसका जिम्मेदार। पत्रिका को बंद करने के पीछे की वजह को जानने का हक भारत की उस जनता को है जिसके पैसे पर ये संस्था चल रही है।
सिनेमा में उत्कृष्टता के लिए परिवेश निर्माण के लिए जरूरी होता है कि दर्शकों को सिनेमा से जोड़ा जाए। पिछले एक दशक में पूरे देश में सिंगल थिएटर एक एक करके बंद हो गए या उसका स्वरूप बदल गया। मैं बिहार के एक छोटे से शहर जमालपुर में पैदा हुआ और भागलपुर में पढ़ा। जमालपुर और भागलपुर में जितने सिंगल थिएटर थे सब बंद हो गए एक दो को छोड़कर। जमालपुर के अवंतिका सिनेमा हॉल में हमने दर्शकों की जो दीवनगी देखी है या भागलपुर के महादेव टॉकीज में जिस तरह फिल्मों को लेकर छात्रों का हुजूम उमड़ता था वैसा दृश्य अब सिर्फ संस्मरणों में ही है। क्या कभी एनएफडीसी ने इस ओर ध्यान दिया कि सिंगल थिएटर के बंद होने से भारतीय सिनेमा को कितना नुकसान हो रहा है। क्या इस बारे में उन इलाकों में जाकर कोई चर्चा आयोजित की गई, वहां के दर्शकों की राय ली गई। क्या कभी इस बारे में सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सलारह के रूप में कोई कार्ययोजना दी गई। करोडों के बजट वाली इस संस्था के बारे में भारत सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए और सिनेमा के माध्यम से अगर भारतीय संस्कृति को मजबूत करना है तो इसकी चूलें कसनी होंगी। राजनीति और व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर कठोर फैसले लेने होंगे  ताकि करदाताओं की गाढ़ी कमाई का पैसा बर्बाद ना हो।
एनएफडीसी अगर अपने स्थापित उद्देश्यों से भटक गई है तो ये करदाताओं के साथ छल है। उनकी गाढ़ी कमाई को गलत जगह पर गलत तरीके से खर्च करने का अपराध भी। जिसकी सर्वोच्च स्तर पर जांच होकर जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। पिछले कई सालों में इस संस्था के कामकाज को लेकर कई कमेटियों ने ऑडिट आदि किया लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। या संभव है कि नतीजा नहीं निकलने दिया गया हो। संभव है कि इसी गड़बड़झाले की वजह से नीति आयोग ने इस तरह की संस्थाओं को बंद करने का प्रस्ताव किया हो। संस्था बंद होती है या नहीं ये तो सरकार तय करेगी लेकिन फिल्मों के उत्कृष्ट परिवेश को बनाने के लिए और सिनेमा के माध्यम से भारतीय संस्कृति को पूरी दुनिया के सामने पेश करना है तो इस निगम को अकर्मण्यता के दलदल से बाहर निकालना होगा और गतिशील बनाना होगा। इसके लिए वहां के कर्ताधर्ताओं की जिम्मेदारी तय करनी होगी क्योंकि अराजक स्वायत्तता लोकतंत्र में मंजूर नहीं होती है।