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Saturday, February 17, 2024

महाकवि निराला का हिंदू मन


नईदिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेला आज समाप्त हो जाएगा। इस वर्ष विश्व पुस्तक मेला में प्रकाशकों और पाठकों की भागीदारी ने पुस्तकों के प्रति आश्वस्ति को गाढा किया। इस बार पुस्तक मेले में श्रीराम साहित्य कई प्रकाशकों के यहां प्रमुखता से प्रदर्शित की गई थी। पाठक उन पुस्तकों को खरीद भी रहे थे। पुस्तक मेला मेरे लिए उन पुस्तकों की खोज और क्रय का अवसर होता है जो सामान्य तौर पर बाजार में नहीं मिलती है। इसी तरह की पुस्तकों की तलाश में जब वाणी प्रकाशन के स्टाल पर पुस्तकें देख रहा था तो नजर सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की पुस्तक रामायण विनय-खण्ड पर पड़ी। इस पुस्तक की मुझे जानकारी नहीं थी। यह पुस्तक तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस के कुछ अंशों का अवधी से हिंदी अनुवाद जैसा है। इसपर बाद में चर्चा होगी। पर इस पुस्तक के बारे में जो जानकारी मिली वो दिलचस्प है। वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी से जब इस पुस्तक के बारे में पूछा तो उन्होंने एक किस्सा बताया। कोरोना महामारी के कुछ वर्षों पहले की बात है। अरुण माहेश्वरी किसी काम से काशी गए हुए थे। काशी के गोदौलिया क्षेत्र में पटरी पर पुस्तकें बेचनेवाले एक व्यक्ति की दुकान पर पहुंचे। वहां उपलब्ध पुस्तकों को उलटने पुलटने लगे। अचानक उनकी नजर पटरी पर लगी दुकान के एक छोर पर गई। वहां कुछ प्रकाशित पन्ने रखे हुए थे। जिज्ञासावश अरुण जी ने उन पन्नों को उठाया तो वो निराला की पुस्तक रामायण, विनय खण्ड के छपे हुए फर्मे थे। जाहिर तौर पर वो बिक्री के लिए रखे गए थे। अरुण जी उन छपे हुए फर्मों को खरीद लिया। काशी में उन्होंने निराला जी की इस पुस्तक के बारे में पूछताछ की। वहां कई तरह की बातें पता चलीं। किसी ने बताया कि ये पुस्तक जिस प्रेस को छपने दी गई थी वो प्रेस बंद हो गया। तबतक पुस्तक के फर्मे छप चुके थे। प्रेस बंद होने के बाद उन फर्मों को रद्दी में बेच दिया गया होगा। आदि । उन छपे हुए पन्नों को लेकर अरुण माहेश्वरी दिल्ली लौट आए। 

दिल्ली में उन्होंने कवि केदारनाथ सिंह, अब स्वर्गीय, से मिलकर उनको वो पन्ने दिखाए। केदारनाथ सिंह ने उन पन्नों को पढ़ने के बाद कहा कि ये निराला जी का ही लिखा है और उन्होंने इस पुस्तक को बचपन में देखा था। उसकी भाषा और डा रामविलास शर्मा का लिखा प्रथम संस्करण की भूमिका स्पष्ट कर रही थी ये निराला की ही पुस्तक है। डा रामविलास शर्मा की भूमिका पर 1 जून 1949 की तिथि अंकित है। फिर इस पुस्तक को पुनर्प्रकाशित करने की योजना बनी। केदारनाथ सिंह ने पुस्तक पर एक टिप्पणी लिखी, निरालाकृत इस काव्यानुवाद को मैंने तब देखा जब मैं बनारस में स्कूल का छात्र था। यह भी याद है कि यह संभव हुआ था त्रिलोचन जी के कारण, जिन्हें इस काव्यानुवाद की प्रर्ति राष्ट्रभाषा विद्यालय, काशी से प्राप्त हुई थी। निराला जी उन दिनों अस्वस्थ थे और विद्यालय के प्रधानाचार्य गंगाधर मिश्र के आवास पर विश्राम कर रहे थे। यह अनुवाद कार्य वहीं संपन्न हुआ था और उस समय काशी के अखबारों में इसकी चर्चा भी हुई थी। निराला जी रामायण (श्रीरामचरितमानस) का खड़ी बोली में भाषांतर कर रहे हैं। इसको लेकर वहां के साहित्यिक जगत में एक उत्सुकता भी थी। प्रतियां कम छपीं थी। इस कारण कम लोगों तक पहुंच सकीं। केदारनाथ सिंह ने ये भी स्पष्ट किया है कि यह पूरी रामायण का अनुवाद नहीं है केवल उसके विनयपरक छंदों का भाषांतरण इस पुस्तक में किया गया है। यहां एक प्रश्न उठता है कि निराला जी ने भाषांतरण के लिए श्रीरामचरितमानस को ही क्यों चुना। इसका उत्तर निराला की टिप्पणी से मिलता है, श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदास जी का रामचरित-मानस या रामायण भारत की सर्वोत्तम काव्यकृति है, इसको इस समय यहां का वेद कहते हैं। इसके संबंध की बहुत सी बातें प्रकाश में नहीं आयीं। काफी अंधेरा है, अधिकार और अधिकारियों का प्रमाद भी।... जिन प्रांतो के विद्यार्थी अवधी नहीं जानते उनके लिए सुविधा हुई है। ऐसे भी नवें दसवें में इसका प्रचलन करने से विद्यार्थियों की खड़ी बोली अधिक पुष्ट हो जाएगी, इसका प्रमाण अधिकारीवर्ग पढ़ते ही समझ जाएंगे। आशा है पाठक पढ़कर राष्ट्रभाषा के विस्तार के प्रयत्न में हमारा उत्साह बढ़ाएंगे। रामविलास शर्मा इस पुस्तक के बारे में कहते हैं कि यह रामचरितमानस तक पहुंचने के लिए ऊंची नीची धरती पर रचे हुए एक नए मार्ग के समान है। इस पुस्तक के लिए निराला को तैयार करनेवाले श्री राष्ट्रभाषा विद्यालय के प्रधानाचार्य गंगाधर मिश्र ने उद्देश्य को और स्पष्ट किया था। उनका मानना था कि निराला श्रीरामचरितमानस के अनुवाद से इस ग्रंथ को सांस्कृतिक शिक्षा का आधार ग्रंथ बनाना चाहते थे। जिससे राष्ट्र की आत्यात्मिक चेतना जागरूक हो सके।  

अगर हमें निराला की रचनाओं पर समग्रता में विचार करें तो महाकवि निराला का मन बार बार हिंदू धर्म और परंपराओं में रमता हुआ दिखता है। उनकी कुछ कविताओं के आधार पर उनको कम्युनिस्ट और जनवाद आदि से जोड़कर हिंदुत्व और भारतीयता से दूर करने का खेल खेला गया। तोड़ती पत्थर कविता को कई बार उद्धृत किया गया। उस कविता में वर्णित गरीबी और मजदूरों की मेहनत को बार-बार रेखांकित करके विचारधारा विशेष का कवि घोषित किया गया। दूसरी तरफ सनातन धर्म और भारतीयता पर लिखे उनके लेखों को पाठकों की नजरों से ओझल करने का षडयंत्र किया गया। निराला जब समन्वय पत्रिका के संपादक थे तब उन्होंने श्रीरामचरितमानस के सातो कांडों की मौलिक व्याख्या करते हुए कई निबंध लिखे थे। रामविलास शर्मा ने माना है कि निराला की काव्य रचना पर तुलसीदास का प्रभाव था। यह प्रभाव भावों और विचारों के अलावा छंद रचना और ध्वनि पर भी दिखता है। इस सबंध में निराला के प्रबंध काव्य तुलसीदास को भी देखा जाना चाहिए। इन रचनाओं और कृतियों पर अकादमिक जगत में कम विचार हुआ। निराला पर काम करनेवाले आलोचकों ने उनके इस पक्ष पर ध्यान नहीं दिया। निराला पर विदेशी लेखकों और रविन्द्रनाथ ठाकुर के प्रभाव की चर्चा मिलती है। उनकी इतनी आलोचना हुई थी कि रामविलास शर्मा को कहना पड़ा था, निराला जो चार लाइनें बेहोशी में लिख देगा, वह चार जनम तुम होश में भी न लिखा पावोगे। उनके निधन के बाद भी उनपर आरोप लगते रहे, जीवनकाल में तो लगे ही थे। इस तरह के मसलों में उलझाकर निराला के लेखन के सनातन भाव तक जाने से पाठकों को रोका गया। निराला के तुलसी या श्रीरामचरितमानस पर लिखे लेखों अथवा गीताप्रेस गोरखपुर से निकलनेवाली पत्रिका कल्याण के उनके लेखों को मिलाकर निराला के हिंदू मन की चर्चा नहीं की गई। निराला तुलसी साहित्य के गहन अध्येता भी थे और उनके लेखों और प्रबंध काव्य में ये दिखता भी है। श्रीरामचरितमानस के विनयपरक छंदों का भाषांतरण करके उसको व्याप्ति दिलाने का प्रयत्न किया था। निराला के हिंदू मन को पाठकों के सामने लाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। यह कार्य कठिन भी नहीं है। पहले तो उनके सनातन और हिंदुत्व  को आधार बनाकर लिखे ग्रंथों और रचनाओं को पुस्तकालयों की धूल से बाहर लाकर पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास हो। अकादमिक जगत में उन रचनाओं पर चर्चा हो, शोधार्थियों को उनपर शोध के लिए प्रेरित किया जाए। निराला रचनावली में अगर उनकी इन रचनाओं का समावेश नहीं है तो उसमें भी इन सारी रचनाओं को डालकर उसका पुनर्प्रकाशन करवाया जाए। निराला की रचनाओं को लेकर जो नैरेटिव गढ़ा गया उसको निगेट करने के लिए यह आवश्यक है कि निराला को समग्रता में पाठकों के सामने पेश कर दिया जाए। पाठकों में स्वयं निर्णय करने की क्षमता विकसित हो चुकी है। अमृतकाल में यह आवश्यक है।   


Saturday, March 12, 2022

प्रश्नों के घेरे में लेखक प्रकाशक संबंध


हिंदी साहित्य में इन दिनों एक बार फिर से विनोद कुमार शुक्ल की चर्चा हो रही है। चर्चा उनकी किसी कृति को लेकर नहीं बल्कि उनके एक बयान को लेकर हो रही है। इंटरनेट मीडिया पर वायरल एक वीडियो में वो अपनी पुस्तकों के प्रकाशकों से नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं। उनको इस बात का मलाल है कि उनके प्रकाशकों ने उनकी पुस्तकों पर रायल्टी कम दी या रायल्टी देने में गड़बड़ी की। इस वीडियो के पहले फिल्मों से जुड़े मानव कौल ने विनोद कुमार शुक्ल को मिलनेवाली रायल्टी के बारे में लिखा था। विनोद कुमार शुक्ल की आयु 85 वर्ष से अधिक हो रही है। इस उम्र में उन्होंने रायल्टी का मुद्दा उठाया, अच्छी बात है। उनकी पुस्तकों के प्रकाशकों, राजकमल और वाणी प्रकाशन, ने भी अपना पक्ष सार्वजनिक रूप से सामने रखा। इन दोनों प्रकाशकों के प्रमुखों ने विनोद जी को सम्मानित लेखक बताया और उनको समय पर रायल्टी देने की बात कही। 1990 के बाद के वर्षों में विनोद कुमार शुक्ल को लेकर अशोक वाजपेयी और उनकी मंडली के लोग खूब चर्चा करते थे। 1994 में अशोक वाजपेयी को जब संस्कृति मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहते साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल गया तो उनकी मंडली ने विनोद कुमार शुक्ल के पक्ष में माहौल बनाना आरंभ किया था। उस वक्त साहित्य जगत में ये चर्चा हुई थी कि कवि विष्णु खरे ने विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ का प्रकाशन अरुण माहेश्वरी से बात करके वाणी प्रकाशन से करवाया था। चर्चा तो इस बात की भी हुई थी कि वाणी प्रकाशन ने उपन्यास लेखक को अग्रिम भुगतान किया था। विनोद जी हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक हैं। उनकी बात को हिंदी जगत में गंभीरता से लिया जाता है। उन्होंने रायल्टी का मसला छेड़ा है तो उनको ये भी बताना चाहिए कि ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ का अनुबंध कब हुआ था और उसकी शर्तें क्या थीं। क्या पुस्तक प्रकाशन के पहले अनुबंध हुआ था या प्रकाशन के बाद, आदि। 

1997 में विनोद कुमार की पुस्तक ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ का प्रकाशन हुआ और दो वर्षों के बाद 1999 में इस पुस्तक पर उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। अकादमी पुरस्कार के बाद विनोद जी की पुस्तकों की बिक्री बढ़ी होगी, ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है। श्रद्धा से मुक्त होकर विचार करना होगा कि क्या विनोद कुमार शुक्ल की पुस्तकें अब भी उतनी ही संख्या में बिकती हैं जितनी बीस वर्ष पहले बिका करती थीं। कोई भी पुस्तक अपने प्रकाशन के दो तीन वर्षों तक अधिक संख्या में बिकती है और उसके बाद धीरे धीरे उसकी बिक्री कम हो जाती है। विनोद कुमार शुक्ल की पुस्तकें इसका अपवाद नहीं हो सकती हैं। किंडल आदि पर तो बिक्री का आंकड़ा पारदर्शी होता है। उसमें तो किसी भी तरह की गड़बड़ी की भी नहीं जा सकती। जितना डाउनलोड होगा उतनी संख्या पता चल जाएगी।  हिंदी साहित्य में इन दिनों एक चिंताजनक प्रवृत्ति देखने को मिल रही है, वो ये कि साहित्य से जुड़े कुछ लोग साहित्यिक मसलों का फेसबुक पर फौरी हल चाहते हैं। इस मामले में भी ऐसा ही  देखने को मिल रहा है। जिनको प्रकाशन जगत की बारीकियों का कुछ भी नहीं पता वो भी क्रांति की पताका लेकर फेसबुक पर विनोद कुमार शुक्ल के पक्ष में नारेबाजी कर रहे हैं। जबकि इस पूरे मसले को समग्रता में देखे जाने की जरूरत है। इस पर विचार करने की भी आवश्यकता है कि विनोद कुमार शुक्ल जैसे सम्मानित लेखक को इस उम्र में ऐसे सवाल क्यों उठाने पड़ रहे हैं। कुछ वर्षों पूर्व निर्मल वर्मा की पुस्तकों की रायल्टी को लेकर विवाद उठा था। निर्मल जी की पत्नी गगन गिल ने तो झुब्ध होकर प्रकाशक बदल दिया था। इन दो लेखकों के अलावा भी लेखकों और प्रकाशकों के बीच रायल्टी को लेकर विवाद होते रहते हैं। दरअसल हिंदी प्रकाशन जगत अनुबंध से अधिक संबंध के आधार पर चलते रहे हैं। पुस्तक प्रकाशन के समय कम ही लेखक अनुबंध पर जोर देते हैं और इससे भी कम लेखक अनुबंध की शर्तों को लेकर प्रकाशक से बातचीत करते हैं। लेखक का जोर तो पुस्तक के प्रकाशन को लेकर रहता है। हिंदी प्रकाशन में कोई मानक अनुबंध नहीं है, अलग अलग प्रकाशकों के अलग अलग अनुबंध पत्र हैं। 

स्वाधीन भारत में पहली बार रायल्टी को लेकर पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने टिप्पणी की थी। 13 मार्च 1954 को साहित्य अकादमी के तत्कालीन सचिव कृष्ण कृपलाणी को नेहरू ने एक पत्र लिखा था। उस पत्र में उन्होंने निराला जी की आर्थिक मदद की बात की। उसी पत्र में नेहरू ने लिखा था प्रकाशकों ने निराला की पुस्तकें बेचकर काफी मुनाफा कमाया लेकिन निराला को बहुत कम राशि मिली। नेहरू ने इसको प्रकाशकों के लेखक के शोषण का शर्मनाक मसला बताया था। उन्होंने अकादमी से कापीराइट एक्ट में बदलाव को लेकर गंभीरता से काम करने की सलाह भी दी थी। कापीराइट एक्ट में बदलाव तो हुए लेकिन रायल्टी का मसला नहीं सुलझ पाया। नेहरू के कालखंड में भी और उसके बाद भी जो लोग साहित्य की दुनिया में प्रभावशाली रहे उन्होंने लेखक प्रकाशक संबंध को लेकर कोई काम नहीं किया। अगर किया होता तो आज विनोद कुमार शुक्ल को ये सब कहने की जरूरत नहीं पड़ती। एक विशेष कालखंड में हिंदी में लेखक संघ प्रभावी रहे हैं। प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच जैसे वाम विचार वाले लेखक संगठनों ने रायल्टी के मुद्दे पर कोई गंभीर पहल तो दूर की बात गंभीर मंथन भी नहीं किया। नामवर सिंह प्रगतिशील लेखक संघ से लंबे समय से जुड़े रहे और वो राजकमल प्रकाशन के भी सलाहकार रहे लेकिन लेखक-प्रकाशक अनुबंध के मानकीकरण की दिशा में कोई काम नहीं किया। साहित्य अकादमी में भी नामवर सिंह और उनके खेमे के लेखकों का दबदबा रहा लेकिन रायल्टी का मसला वहां भी दबा ही रहा। बात बात पर अपील जारी करनेवाले लेखकों ने भी कभी रायल्टी के मुद्दे को अपने एजेंडे में शामिल नहीं किया। कश्मीर समस्या से लेकर साप्रदायिकता पर लेखकों को एकजुट करने का दावा करनेवाले अशोक वाजपेयी ने भी रायल्टी के मसले पर कोई पहल की हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। वामपंथी लेखकों ने भी लेखकीय अधिकार के लिए कभी एकजुट होकर आवाज नहीं उठाई। वामपंथी लेखकों ने प्रकाशकों के साथ मिलकर स्वयं का स्वार्थ साधा और खामोश रहे। 

विनोद कुमार शुक्ल ने अगर अपनी लोकप्रियता के कालखंड में रायल्टी का प्रश्न उठाया होता तो ज्यादा असरदार होता। वाणी प्रकाशन और राजकमल प्रकाशन के बयानों को देखें तो उसमें विनोद कुमार शुक्ल को ज्यादातर समय अग्रिम भुगतान ही होता रहा है। फेसबुक के क्रांतिवीरों को भी ये देखना चाहिए और इसपर भी सवाल खड़े करने चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की है कि रायल्टी के मुद्दे पर ठोस और सकारात्मक पहल हो। लेखकों और प्रकाशकों को अनुबंध के मानकीकरण की दिशा में काम करना होगा। रायल्टी ठीक से और समय पर मिले इसके लिए एक ऐसा तंत्र विकसित करना होगा जिसमें किसी तरह की शंका की गुंजाइश न रहे। पुस्तकों की बिक्री के आंकड़ों का रिकार्ड रखने के लिए भी एक पारदर्शी तंत्र बनाना होगा। लेखकों को भी पुस्तक प्रकाशन के पहले अनुबंध को ध्यान से देखना चाहिए। ‘किसी तरह पुस्तक छप जाए’ की मानसिकता से बाहर निकलना होगा। प्रकाशकों को भी खुले दिल से लेखकों के साथ बैठकर इस समस्या को दूर करना चाहिए। कोरोनाकाल में प्रकाशन जगत संकट के दौर से गुजर रहा है। लेखकों और प्रकाशकों को रायल्टी के साथ साथ पुस्तको की बिक्री बढ़ाने के उपायों पर भी संयुक्त रूप से विचार करना चाहिए। 

Sunday, April 18, 2021

साहित्य का शीर्ष कलश


पिछले दिनों नरेन्द्र कोहली की एक पुस्तक आई थी, ‘समाज जिसमें मैं रहता हूं’। उस पुस्तक की आरंभिक प्रतियों में से एक उन्होंने मुझे भिजवाई थी। ये उनके संस्मरणों और भाषा आदि को लेकर लिखे लेखों का संग्रह है। उनकी इच्छा थी कि मैं इस पुस्तक को पढ़कर उनसे चर्चा करूं। मैंने पुस्तक को तत्काल पढ़कर उनको फोन किया और पुस्तक के बारे में खूब अच्छी अच्छी बातें उनसे कहीं, कई उल्लिखित प्रसंगों पर उनसे चर्चा भी की। बातचीत के दौरान मुझे लगा कि वो अपनी तारीफ से इतर वो कुछ सुनना चाह रहे थे। मेरे पास वो बातें थीं लेकिन मैं कह नहीं पा रहा था। बात आई गई हो गई। इस बीच मैंने उनके प्रकाशक को फोन करके बता दिया कि कोहली जी की उक्त पुस्तक में प्रूफ की अनेक गलतियां हैं जो उनकी प्रतिष्ठा के विपरीत हैं। अभी पांच अप्रैल को उनसे बहुत लंबी बात हुई, देश दुनिया, समाज, राजनीति और साहित्यिक जगत की। उस दौरान भी मेरे दिमाग में ये बात आई कि पुस्तक की खामियों की ओर उनका ध्यान दिला दूं , लेकिन हिम्मत नहीं पड़ी। लेकिन मेरे मन के किसी कोने में अंतरे में ये बात अटकी हुई थी कि कोहली जी को ये तो बताना ही होगा कि उनकी पुस्तक में भी कमियां हैं। ये इस वजह से भी था कि वो हमेशा शब्दों के प्रयोग और उसको लिखने के तरीके को लेकर सचेत रहते थे। अगले दिन उनको व्हाट्सएप पर संदेश भेजा, ‘आपकी पुस्तक में प्रूफ की कई गलतियां हैं जो नहीं होनी चाहिए थीं’। तुरंत जवाबी संदेश आया, ‘तुमने सही प्रतिक्रिया देने में बहुत देर कर दी, पता नहीं क्यों?’ मैंने लिखा, ‘आपसे डरकर’ । उनका उत्तर, ‘सत्य कहने में भय किस बात का और तुम कब से डरकर सत्य बोलने से बचने लगे?’ मैंने हाथ जोड़ लिए। मेरी कोहली जी से ये अंतिम बातचीत थी, लेकिन इस बातचीत ने मुझे बहुत शक्ति दी थी। वो इसी तरह से बातचीत के दौरान और कभी कभार संदेश भेजकर मुझे शब्दों के प्रयोग और मेरे लेख पर प्रतिक्रिया दिया करते थे, ये उनका सिखाने का तरीका था। 

नरेन्द्र कोहली से मेरा परिचय मेरे मित्र और वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी ने करवाया था। वर्ष ठीक से याद नहीं है लेकिन करीब दस साल से अधिक तो हो ही गए होंगे। फिर हम लोगों ने देश-विदेश की कई यात्राएं साथ-साथ कीं। इन यात्राओं के भी कई दिलचस्प किस्से हैं, प्रसंग हैं। कोहली जी की श्रीराम में जबरदस्त आस्था थी। वो हर बात में ये कहा करते थे कि रामजी की यही इच्छा रही होगी। उनकी इस आस्था का प्रकटीकरण तब हुआ जब वो एक कार्यक्रम के सिलसिले में अयोध्या गया। कार्यक्रम की आयोजक मालिनी अवस्थी के सामने उन्होंने शर्त रखी कि वो अयोध्या तभी जाएंगें जब रामलला के दर्शन की व्यवस्था हो पाएगी। आयोजकों ने उनकी बात मानी। वो अयोध्या गए। रामलला के दर्शन भी किए। दर्शन के बाद कोहली जी फफक फफक कर रोने लगे। उन्होंने अपने जीवनकाल में पहली बार अयोध्या में रामलला के दर्शन तक किए जब सुप्रीम कोर्ट का राम जन्मभूमि पर फैसला आ गया। मालिनी अवस्थी और युवा कवि राहुल नील इस पल के गवाह बने थे। बाद में पता चला कि उन्होंने ये तय किया हुआ था कि रामलला के दर्शन करने अयोध्या तभी जाएंगे जब जन्मभूमि के तमाम विवाद समाप्त हो जाएंगे। 

दैनिक जागरण में जब हमने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान का आरंभ किया तो नरेन्द्र कोहली जी पहले कार्यक्रम के अतिथि थे। दैनिक जागरण बेस्टसेलर की जब शुरुआत हुई तो पहली सूची नरेन्द्र कोहली ने जारी की थी। संवादी लखनऊ से लेकर बिहार संवादी तक में कोहली जी की भागीदारी रही थी। अपनी भाषा हिंदी को लेकर उनमें एक जबरदस्त प्रेम था और उनका यह प्रेम बहुधा गोष्ठियों में दिख भी जाता था। उनके निधन से हिंदी को अपूरणीय क्षति हुई है। वो हिंदी साहित्य के शीर्ष कलश थे।  


Thursday, April 2, 2020

ऑनलाइन संवाद से जुड़ रहे लेखक


कोरोना के खतरे को देखते हुए जो लॉकडाउन किया गया है उसने लेखकों, पुस्तकों, प्रकाशकों और पाठकों की श्रृंखला भी प्रभावित हुई है। ना तो पुस्तकें छप पा रही हैं और ना ही वो पाठकों तक पहुंच पा रही हैं। ऐसे माहौल पाठकों और लेखकों के बीच संवाद बाधित होता देख दिल्ली के कई प्रकाशकों ने एक बेहतर पहल की। उन्होंने लेखकों और पाठकों के बीच संवाद करवाने की ठानी। इसके लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म एक ऐसी जगह थी जिसका दायरा भी बड़ा था और जिससे हिंदी का पाठक वर्ग जुड़ा भी था। सभी हिंदी के बड़े प्रकाशक सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हैं और अह उन्होंने सोशल मीडिया का उपयोग लेखकों और पाठकों के बीच संवाद बनाने में किया। हलांकि इसमें एक चुनौती भी थी। हिंदी के वरिष्ठ लेखकों में से अब भी कई ऐसे हैं जो फेसबुक पर तो हैं पर उसके तकनीकी पक्ष से बहुत ज्यादा परिचित नहीं हैं। उनको तकनीक समझाना और लाइव करवाना एक बड़ी चुनौती थी. कहते हैं न कि आवश्यकता सबकुछ करवा लेती है लिहाजा थोड़ी मेहनत के बाद हिंदी के उन वरिष्ठ लेखकों ने भी फेसबुक पर लाइव करना सीख लिया, जो अबतक इसका उपयोग नहीं जानते थे। वाणी प्रकाशन ने ऑनलाइन साहित्य महोत्सव की शुरुआत की थी जिसमें देश-विदेश के लेखक भाग ले रहे हैं लेकिन बाद में इसका नाम बदलकर समय और समाज ऑनलाइन गोष्ठी कर दिया गया। अदिति के मुताबिक ये नाम इस वजह से बदला गया क्योंकि उन्होंने जब दिल्ली से बाहर जानेवालों की भीड़ और उनका दर्द देखा तो उनको लगा कि ऐसे माहौल में किसी तरह का महोत्सव उचित नहीं है, लिहाजा उसको गोष्ठी का नाम दे दिया गया।

ऑनलाइन साहित्य संवाद की पहल करनेवाली वाणी प्रकाशन की युवा निदेशक अदिति माहेश्वरी कहती हैं कि लॉकडाउन शुरू होने के बाद उनके पास लेखकों के फोन आते थे तो कईबार एक निराशा का भाव भी महसूस करती थी। उन्होंने कहा ’मैंने महसूस किया कि एक सवादहीनता की स्थिति बन रही है और मुझे लगा कि कहीं इससे निराशा न व्याप्त हो जाए। फिर मैंने ऑनलाइन साहित्य महोत्सव शुरू करने का फैसला लिया। कई लेखकों को लॉगइन करके लाइव करना सिखाना पड़ा, उनको वाणी प्रकाशन के पेज से लाइव किया। इसके बहुत अच्छे नतीजे रहे। लाइव के वक्त हजारों की संख्या में पाठक जुड़े।‘ अब तो रास्ता खुल गया था और हिंदी के कई प्रकाशकों ने भी लाइव करने शुरू कर दिया। राजपाल एंड संस की कर्ताधर्ता मीरा जौहरी कहती हैं कि ‘लेखकों को फेसबुक पर लाइव करवाने का अनुभव बेहद अच्छा है। इसका एक फायदा यह भी हुआ है कि आप अगर लाइव के दौरान अपने पसंदीदा लेखक की बात नहीं सुन सकते हैं तो आप बाद में भी उसको देख सकते हैं। लेखक का वीडियो और उनकी बातें हमारे फेसबुक पेज पर लगी ही रहती हैं, पाठकों को जब इच्छा होती है तो वो अपनी सुविधानुसार इसके देख सकते हैं। हां, लाइव में एक फायदा ये होता है कि कि कोई पाठक अगर चाहे तो अपने लेखक से सवाल भी पूछ सकता है, उनकी रचनाओं के बारे में बात भी कर सकता है.यह एक बिल्कुल नई शुरुआत है और इसने संवाद को लेकर एक नई उम्मीद जगाई है।‘
लॉकडाउन के इस दौर में जब सबलोग अपने घरों में ही रह रहे हैं और अभी लगभग एक पखवाड़ा तक ये दौर चलेगा उसमें दिल्ली के प्रकाशकों की इस पहल का असर हिंदी साहित्य पर असर डालनेवाला है। जैसे-जैसे इंटरनेट का दायरा बढ़ेगा वैसे-वैसे ये संवाद और भी बढ़ेगा। पश्चिम के देशों में इस प्रवृत्ति के कई लाभ देखने को मिले हैं। कुछ सालों पहले ई एल जेम्स की फिफ्टी शेड्स ट्राएलॉजी प्रकाशित हुई थी जिसने पूरी दुनिया में धूम मचा दी थी। इस उपन्यास का दुनिया की कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। इसपर फिल्म भी बनी। लेखिका को करोड़ों की कमाई हुई थी। ई एल जेम्स ने इस उपन्यास को लिखने के पहले छोटे छोटे अंश लिखकर इंटरनेट पर डाले थे और पाठकों की प्रतिक्रिया मांगी थी। पाठकों की प्रतिक्रिया के आधार पर वो उस अंश को आगे बढ़ाती थी। उन्होंने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था इस उपक्रम से उसको फिफ्टी शेड्स लिखने में काफी मदद मिली थी। कहने का मतलब ये है कि ऑनलाइन इस तरह के संवाद से पाठकों की रुचि जानने में लेखकों को मदद मिल सकती है। अगर पाठकों के फीडबैक को लेखक अपनी रचनाओं में शामिल करते हैं तो हो सकता है कि पाठक उसको अधिक पसंद करें और लेखक की लोकप्रियता बढ़े।

Saturday, May 11, 2013

1000 का बेस्टसेलर ?

हिंदी में साहित्यक किताबों की बिक्री का खूब रोना रोया जाता है । इस बात पर भी जमकर छाती कूटी जाती है कि हिंदी के साहित्यिक पाठक खत्म होते जा रहे हैं । गोष्ठियों और सेमिनारों में इस कमी पर लगातार चिंता व्यक्त की जाती है । गंभीर मंथन भी होता है, लेकिन हालात सुधरने की बजाए बिगड़ते ही चले जा रहे हैं । पहले हिंदी में साहित्यक कृतियों का संस्करण तीन हजार कॉपी का हुआ करता था । राजेन्द्र यादव का कहानी संग्रह- जहां लक्ष्मी कैद है का पहला संस्करण भी तीन हजार प्रतियों का छपा था । थोड़ा पहले जाएं तो ये पांच हजार का भी होता था । प्रेमचंद ने जब- गोदान- लिखा था तो उस वक्त –हंस- पत्रिका में एक विज्ञापन छपा था जिसमें बताया गया था कि इसकी पांच हजार प्रतियां छपी हैं । कालांतर में यह संख्या लगातार कम होती चली गई । लंब समय तक यह हजार और पांच सौ के बीच रही । लेकिन तकनीक के विकास ने इसको और कम कर दिया । कंप्यूटर के बढ़ते प्रयोग से यह संख्या और कम हो गई और यह तीन सौ तक सिमट गई । अब तो यह भी कहा जाता है कि संस्करणों की कोई निश्चित संख्या नहीं होती है जितने का ऑर्डर मिलता है , प्रकाशक उतनी प्रतियां छापकर उपलब्ध करवा देता है । लेखकों का एक बड़ा समुदाय प्रकाशक की पाठकों तक पहुंचने में उदासीन रवैया और सरकारी खरीद में ज्यादा रुचि लेने को इसकी वजह मानते हैं । ऐसा मानने वाले गाहे बगाहे प्रकाशकों पर दिनों दिन अमीर होने और लेखकों के गरीब होने का रोना भी रोते हैं । ऐसा नहीं है कि हिंदी में पाठकों की कमी है । हिंदी के पाठक लगातार बढ़ रहे हैं , यह बात नेशनल रीडरशिप सर्वे से लेकर इंडियन रीडरशिप सर्वे के साल दर साल के आंकड़ों से साबित भी होता है । अखबारों की प्रसार संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है । नए नए शहरों से उनके संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं । लेकिन सवाल यहां हिंदी के पाठकों का नहीं है , सवाल तो साहित्यक पाठकों का है ।
एक तरफ अमेरिका और यूरोप में ई एल जेम्स की -फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे- और गिलियन फ्लिन की -गॉन गर्ल- की संयुक्त बिक्री संख्या एक करोड़ प्रतियों को छूने छूने पर है । वहां की बात अगर छोड़ भी दें तो भारत में भी अनुजा चौहान की -दोज प्राइसी ठाकुर गर्ल- या फिर अद्वैत काला की -ऑलमोस्ट सिंगल- की हजारों प्रतियां बिक चुकी है । हिंदी में अब भी सबसे ज्यादा प्रेमचंद ही बिकते हैं । या फिर देवकी नंदन खत्री की किताब चंद्रकांता संतति या भगवती चरण वर्मा की चित्रलेखा या एक हद तक धर्मवीर भारती की गुनाहों का देवता । एक अनुमान के मुताबिक चंद्रकांता के अब तक अस्सी से ज्यादा संस्करण हो चुके हैं । इसके अलावा हरिवंश राय बच्चन की किताब मधुशाला के भी तकरीबन पचास संस्करण हो चुके हैं । राजेन्द्र यादव का उपन्यास सारा आकाश भी लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं ।  लेकिन ये सारी कृतियां काफी वक्त पहले लिखी गईं और इनके आकड़े एक लंबे कालखंड में उस उंचाई तक पहुंच पाए । हिंदी में साल दो साल पहले कोई ऐसी कृति नहीं आई है जो हजारों में बिक सकें लाखों की बात तो बहुत दूर है । जबकि ई एल जेम्स की फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे और गिलियन फ्लिन की गॉन गर्ल ने तकरीबन साल भर लोकप्रियता का रिकॉर्ड बनाया ।
हिंदी में इसका एक दूसरा पक्ष भी है । दरअसल हिंदी में बेस्ट सेलर की अवधारणा ही नहीं है । हिंदी के कई साहित्यकारों का मानना है कि जो किताबें लोकप्रिय होती हैं उनकी सेल्फ वैल्यू नहीं होती । वो लंबे समय तक एक टाइटिल के रूप में याद नहीं किए जाते हैं । ऐसा दावा करनेवाले विद्वान पश्चिमी देशों का उदाहरण देते हैं और कई किताबों का नाम गिनाते हैं जो धूमकेतु की तरह चमकते हुए गायब हो जाते है  । लेकिन अपने इस उत्साह में वो भूल जाते हैं कि दर्जनों ऐसे बेस्ट सेलर हैं जिनका एक कृति के रूप में स्थायी महत्व भी है । जैसे अभी हाल ही में अमेरिकी लेखक जोनाथन फ्रेंजन का उपन्यास –फ्रीडम- आया था जो बेस्ट सेलर भी रहा और आलोचकों ने भी उसकी जमकर तारीफ की । हिंदी में एक अजीब सी धारणा बना दी गई कि जो कृति लोकप्रिय होती है वो प्रतिष्ठित नहीं होती बल्कि वो अल्पजीवी होती है । आज से तकरीबन सवा सौ साल पहले जब चंद्रकांता का प्रकाशन हुआ था तब उसने गैर हिंदी पाठकों को भी अपनी ओर आकृष्ट किया था । माना तो यह भी जाता है कि चंद्रकांता ने हिंदी का एक विशाल पाठक वर्ग तैयार किया । उस वक्त के सरस्वती पत्रिका के संपादक पदुमलाल पन्नालाल बख्शी ने लिखा था- वह चंद्रकांता का युग था । वर्तमान युग के पाठक उस युग की क्लपना नहीं कर सकते जब देवकीनंदन खत्री के मोहजाल में पड़कर हम लोग निद्रा और क्षुधा छोड़ बैठे थे । इतने व्यापक प्रभाव के बावजूद आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे दिग्गज आलोचक ने चंद्रकांता को तिलिस्म और ऐयारी कहकर खारिज कर दिया था । उसी तरह हिंदी में शिवानी की लोकप्रयता को कभी सम्मान नहीं मिला । गुलशन नंदा से लेकर सुरेन्द्र मोहन पाठक और वेदप्रकाश शर्मा को तो विचार योग्य भी नहीं माना गया । जबकि ये लेखक लाखों में बिकते रहे हैं । वेद प्रकाश शर्मा का उपन्यास -वर्दी वाला गुंडा- तो हिंदी में राजनीतिक हत्या पर लिखा एक बेहतरीन और संभवत एकमात्र उपन्यास है । नतीजा यह हुआ कि हिंदी में बेस्ट सेलर की अवधारणा पनप ही नहीं पाई । हिंदी की साहित्यक पत्रिका हंस के संपादक राजेन्द्र यादव का मानना है कि किसी कृति के आकलन के लिए संख्या स्वस्थ दृष्टि नहीं है क्योंकि अज्ञेय की कृति नदी के द्वीप और धर्मवीर भारती के उपन्यास गुनाहों का देवता की तुलना नहीं हो सकती । हो सकता है कि ये तर्क ठीक हों लेकिन क्या कोई कृति ज्यादा बिकती है इसलिए उसे खारिज कर दिया जाए,यह उचित नहीं है ।  
हिंदी साहित्य के इस घटाटोप अंधेरे भरे वक्त में वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी ने साहस दिखाते हुए युवा और चर्चित लेखिका ज्योति कुमारी के कहानी संग्रह – दस्तखत और अन्य कहानियां को हिंदी के युवा लेखकों के बीच का बेस्ट सेलर घोषित किया । उनका दावा है कि सिर्फ दो महीने में इस कृति की एक हजार प्रतियां बिक गई । इस बात को भी साफ किया गया कि यह सरकारी थोक खरीद नहीं बल्कि व्यक्तिगत पाठकों द्वारा खरीदी गई हैं । यह ऐसे वक्त में हुआ है जब प्रकाशकों पर किताबों की बिक्री के आंकड़ों को छुपाने और रॉयल्टी नहीं देने के संगीन इल्जाम लग रहे हैं । क्या इसे हिंदी साहित्यक प्रकाशन जगत में शुभ संकेत माना जाना चाहिए । इस बात का जवाब आने वाले दिनों में मिलने की उम्मीद है । लेकिन सवाल यह है कि एक हजार प्रतियों पर बेस्ट सेलर हो जाना क्या शर्मिंदगी का सबब नहीं है । साठ करोड़ से ज्यादा हिंदी भाषी के देश में यह संख्या कहां है इसका अंदाजा पाठक लगा सकते हैं । दरअसल हिंदी में बेस्ट सेलर की कोई परंपरा रही नहीं है और ना ही इसको बनाने की कोशिश की गई । गाहे बगाहे ऐसी सूची बनती रही है । उन्नीस सौ चौरानवे में जब अवध नारायण मुदगल के संपादन में भारी भरकम साहित्यक पत्रिका छाया मयूर का प्रकाशन हुआ था तो उसमें भारत भारद्वाज ने बेस्ट सेलर की एक सूची बनाई थी । लेकिन पत्रिका का प्रकाशन बाधित होने की वजह से इसकी निरंतरता भी बाधित हो गई । अंग्रेजी में एक पूरा तंत्र है जो किताबों की बिक्री पर नजर रखता है और उसके आंकड़े जारी करता है जिसके आधार पर बेस्ट सेलर की सूची बनती है । हिंदी में ऐसा कोई तंत्र विकसित ही नहीं हो पाया । हिंदी में तो अब भी बिक्री का आंकड़ा प्रकाशक की मर्जी पर निर्भर करता है । हिंदी में वाणी प्रकाशन ने जिस बेस्ट सेलर की शुरुआत की है उसको आगे बढ़ाने की जरूरत है । अपने तमाम पूर्वग्रहों को छोड़कर । बेस्ट सेलर में भी दो तरह की श्रेणी बनाई जा सकती है – एक लोकप्रिय श्रेणी और एक आलोचकों के मानदंडों पर खरी उतरने वाली कृति । इसका एक मैकेनिज्म बनाना होगा ताकि उसकी विश्वसनीयता भी बने और उसकी व्यापक स्वीकार्यता भी हो । इस तरह के मैकेनिज्म के लिए सभी प्रकाशकों को अपने राग-द्वेष मिटाकर एक मंच पर आना होगा और लेखकों के प्रतिनिधियों के सहयोग लेकर इस परंपरा की शुरुआत करनी होगी ।