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Saturday, October 31, 2026

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव पर नजर


दो दिन बाद अमेरिका में मध्यावधि चुनाव है। पूरे विश्व की निगाहें इसपर लगी हैं। चुनाव का परिणाम का असर अमेरिका के राष्ट्रपति की कुर्सी पर नहीं पडेगा। ट्रंप अपने पूरे कार्यकाल तक राष्ट्रपति बने रहेंगे लेकिन अगर परिणाम उनकी पार्टी के विरुद्ध आया तो उनको कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। अमेरिका में होनेवाला मध्यावधि चुनाव ये तय करता है कि वहां की संसद (कांग्रेस) में किसको कितनी सीटें मिलेंगी। इस कारण वैश्विक चर्चा है कि अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी का कांग्रेस पर दबदबा रहेगा या फिर डेमोक्रैट्स का कब्जा होगा। अगर ट्रंप की पार्टी का कांग्रेस में बहुमत नहीं होता है तो संसदीय समितियों के माध्यम से ट्रंप प्रशासन के फैसलों की समीक्षा आरंभ हो जाएगी। अगर रिपब्लिकन को मध्यावधि चुनाव में जीत नहीं मिलती है तो उसको ट्रंप के काम काज पर जनता का निर्णय माना जा सकता है। नैरेटिव की लड़ाई में राष्ट्रपति ट्रंप कमजोर पड़ सकते हैं और डेमोक्रैट्स ये माहौल बनाने का प्रयास करेंगे कि जनता राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों से खुश नहीं है। संभव है कि इसका असर 2028 में होनेवाले राष्ट्रपति चुनाव पर पड़े। 

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में कई सारे मुद्दे हैं। मतदान के दो दिन पहले ट्रंप के समर्थक अरबपति उदयोगपति एलन मस्क ने अपने एक बयान से कई प्रकार की चर्चा को जन्म दे दिया। एलन मस्क ने एक्स पर पोस्ट किया कि डेमोक्रैट्स अमेरिका में जीते तो अमेरिका का खेल ही खत्म हो सकता है। मस्क का मानना है कि अगर डेमोक्रैट्स 2028 के चुनाव में प्रतिनिधि सभा, सीनेट और राष्ट्रपति पद पर जीत जाते है तो अमेरिका की व्यवस्था में भारी परिवर्तन हो सकता है। उनका दावा है कि सत्ता में आने पर डेमोक्रैट्स वाशिंगटन डीसी और प्यूर्टो रिको को राज्य का दर्जा दे सकते हैं ताकि सीनेट में उनकी संख्या बढ़ सके। इसके अलावा अवैध प्रवासियों को मान्यता देने जैसे कदम भी उठा सकते हैं। इसका लाभ ये हो सकता है कि उनको स्थायी मतदाता मिल जाए। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाकर अपने पक्ष में कर सकते हैं। एलन मस्क यहां तक कह जाते हैं कि रिपब्लिकन की हार का मतलब होगा अमेरिका में एक दलीय व्यवस्था की ओर बढ़ना जिससे कि लोकतंत्र का अर्थ ही समाप्त हो जाएगा। हमें इसपर विचार करना होगा कि एलन मस्क ऐसा क्यों कह रहे हैं। मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (मागा) जैसे नारे के पीछे एलन मस्क की सहमति मानी जाती रही है। वो डेमोक्रैट्स को विभाजन और नफरत की पार्टी मानते हैं। वो लेफ्ट के विरोधी हैं और कहते रहे हैं कि लेफ्ट के जीतने से अमेरिका बर्बाद हो जाएगा। ऐसे में अगर ट्रंप की पार्टी हारती है तो एलन भी कमजोर हो सकते हैं। एलन मस्क के पास अकूत संपत्ति है और डेमोत्रैट्स को उनका समर्थन बहुत मायने रखता है। अमेरिका विशेषकर रिपब्लकिन की राजनीति में एनल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि वो राजनीतिक चंदे के रूप में एक बड़ी राशि डेमोकैट्स को देते हैं। दूसरी तरफ जार्ज सोरोस और अन्य धनवान समर्थक हैं। अमेरिकी मीडिया के अनुसार एलन मस्क अबतक चुनाव में करीब 3700 करोड़ रुपए खर्च कर चुके हैं या चंदा के रूप में अपनी पसंदीदा पार्टी को दे चुके हैं। इतनी बड़ी धनराशि देनेवाला व्यक्ति अगर कुछ कहता है तो राजनीति उसपर विचार अवश्य करती है। 

एलन मस्क के उक्त बयान के पहले अमेरिका का मध्यावधि चुनाव मुख्य रूप से ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के फैसलों, नागरिकों के जीवनयापन पर बढ़ते खर्च, अप्रवासी नीतियों, स्वास्थ्य सेवा, तकनीकी कंपनियों का समाज पर बढ़ते प्रभाव आदि पर केंद्रित था। चर्चा ट्रंप के निर्णयों पर होती थी। पिछले महीने के मध्य में ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग करीब 31 प्रतिशत रही थी। उसके बाद से चर्चा का बाजार गर्म हो रहा था। मुद्दों पर चर्चा करने से पहले हमें ये समझ लेना चाहिए कि अमेरिका के मध्यावधि चुनाव होते कैसे हैं। अमेरिका में शासन व्यवस्था के तीन प्रमुख अंग हैं। पहला कांग्रेस (संसद) जिसमें हाउस आफ रिप्रजेंटेटिव और सीनेट दो सदन होते हैं। ये दोनों सदन मिलकर संघीय कानून बनाते हैं। दूसरा राष्ट्रपति और तीसरा सुप्रीम कोर्ट। अमेरिकी व्यवस्था में इन तीनों शाखाओं की संरचना इस तरह से की गई है कि कोई भी एक अंग अराजक नहीं हो सके। अब मध्यावधि चुनाव को समझने के लिए हाउस आफ रिप्रजेंटेटिव और सीनेट की संरचना को समझना होगा। हाउस आफ रिप्रजेंटेटिव में 435 सदस्य होते हैं जो दो वर्षों के लिए चुने जाते हैं। किस राज्य से कितने सदस्य हाउस आफ रिप्रजेंटेटिव में होंगे ये उनकी जनसंख्या के आधार पर तय होता है। इसी तरह से सीनेट में कुछ 100 सदस्य होते हैं। प्रत्येक राज्य से दो सदस्य। इनका कार्यकाल छह वर्षों का होता है लेकिन एक तिहाई सदस्यों का चुनाव हर दो वर्ष पर होता है। 

2026 के मध्यावधि चुनाव में मोटे तौर पर तीन तरह की संभावना बनती है। पहली ये कि रिपब्लिकन का दोनों सदनों में बहुमत हो जाए। ट्रंप के लिए ये आदर्श स्थिति होगी क्योंकि अगर ऐसा होता है तो वो अपने एजेंडे को बिना किसी बाधा के आगे बढ़ा सकेंगे। दूसरी स्थिति ये हो सकती है कि डेमोक्रैट्स का हाउस आफ रिप्रजेंटेटिव में बहुमत हो लेकिन रिपब्लिकन सीनेट में बहुमत में रहें। इस स्थिति में हाउस आफ रिप्रजेंटेटिव किसी मसले की जांच कर सकती है, सुनवाई कर सकती है और राष्ट्रपति के फैसलों को चुनौती दे सकती है। सीनेट में बहुमत नहीं होने से कानून पास करना कठिन होगा। तीसरी स्थिति ये हो सकती है कि डेमोक्रैट्स को दोनों सदनों में बहुमत मिल जाए। इस स्थिति में राष्ट्रपति ट्रंप के लिए विधायी बाधाएं चुनौती बनकर खड़ी रहेंगी। उनको अपने निर्णयों को क्रियान्वयित करने में देरी हो सकती है। एक अन्य मुद्दा तकनीकी कंपनों का बढ़ता वर्चस्व भी चर्चा में हैं। बड़ी तकनीकी कंपनियां, डाटा सेंटर और एआई को लेकर वहां चुनावी बहस छिड़ी हुई है। बड़े डाटा सेंटर में बड़े बड़े सर्वर लगे हैं जो सूचनाओं को संचित करते हैं, उसको प्रोसेस करते हैं और क्लाउट कंप्यूटिंग और आनलाइन प्लेटफार्म्स को सेवाएं देते हैं। एआई के बढ़ते चलन के कारण बड़े डाटा सेंटर्स की मांग बढ़ रही है। इन डाटा सेंटर्स को लेकर चिंता भी बढ़ रही हैं। इनको चलाने के लिए बिजली की मांग में बेतहाशा वृद्धि हो सकती है। बिजली के अलावा इन डाटा सेंटर्स के तापमान को नियंत्रित रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। इसका पर्यावरण पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। 


दैनंदिन जीवन में तकनीक का प्रभाव बढ़ रहा है। व्यक्तिगत आदतों से लेकर रुचियां तक उन कंपनियों को मालूम पड़ जा रही हैं। इसका उपयोग राजनीतिक कैंपेन से लेकर कसेंट बनाने तक में किया जा रहा है। इसको लेकर भी अमेरिकी वोटर सशंकित हैं। तकनीक के बढ़ते चलन के साथ साथ चुनाव में बड़ी मात्रा में धन के खर्च होने पर भी चिंता जताई जा रही है। कुल मिलाकर पूरी दुनिया की निगाहें अमेरिका के मध्यावधि चुनाव के परिणाम पर टिकी हैं। मध्यावधि चुनाव के परिणाम से वैश्विक परिजृष्य पर भी फर्क पड़ेगा विशेषकर युद्ध वाले क्षेत्रों पर। 


Saturday, June 27, 2026

कम्युनिस्ट खतरों से आगाह करते ट्रंप


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों की वैश्विक स्तर पर चर्चा होती ही रहती है। लेकिन उनका एक बयान इन दिनों अमेरिका में खूब चर्चा बटोर रहा है। इंटरनेट मीडिया पर उसके पक्ष विपक्ष में लगातार टिप्पणियां प्रकाशित हो रही हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने एक सार्वजनिक भाषण में कम्युनिस्टों के आसन्न खतरे के बारे में बेहद कठोर बातें की हैं। उन्होंने कहा कि ‘कम्युनिस्ट एक बार फिर से क्रिश्चियन और चर्च के विरुद्ध युद्ध आरंभ करना चाहते हैं। वो सरकार और चर्च को अलग करके देखने की वकालत करते रहते हैं। आपने देखा कि किस तरह से कम्युनिस्टों ने एकजुट होकर न्यूयार्क में चुनाव जीता। वो पूरी तरह से अमेरिकी जीवन पद्धति को समाप्त करना चाहते हैं। कम्युनिज्म को फैलाना बहुत आसान है पर जो इसकी चपेट में आता है वो गंदगी में जीवन जीने को मजबूर होता है। न तो खाना मिलता है, न ही आवास की व्यवस्ता हो पाती है, न ही सेना होती है और ना ही कानून व्यवस्था बन पाती है। वहां कुछ भी नहीं होता है और तीसरी दुनिया के देशों की तरह हो जाते हैं जहां सभी पीड़ित होते हैं या मरने के लिए अभिशप्त।‘  दरअसल अमरिका में क्रिश्चियनिटी और चर्च पर लगातार हो रहे प्रहारों को ध्यान में रखते हुए ट्रंप प्रशासन ने रिलीजस लिबर्टी कमीशन बनाया था। उसके चेयरमैन ने अपने अध्ययन के आधार पर कहा कि ‘वे (कम्युनिस्ट) अमेरिका से गाड  (भगवान) को हटाना चाहते हैं, चर्चों को बंद करना चाहते हैं और आस्थावान अमेरिकियों को दंडित करना चाहते हैं। अमेरिका की कट्टरपंथी ताकतें अमेरिका से गाड को मिटाना चाहती हैं, लेकिन ऐसा होने नहीं देंगे। अमेरिका फर्स्ट का अर्थ है गाड फर्स्ट।‘ उन्होंने अमेरिकी जनता का आह्वान किया कि वो देश में मौजूद कट्टरपंथी ताकतों के विरुद्ध खड़े हों और अपनी रिलीजस लिबर्टी के लिए अंतिम सांस तक लडें। रिलीजस लिबर्टी कमेटी के चेयरमैन ने राष्ट्रपति ट्रंप के सामने ही अपनी बातें कही। उनके इन निष्कर्षों के सार्वजनिक होने करने के बाद अमेरिका में क्रिश्चियनिटी पर आसन्न खतरे को लेकर बहस आरंभ हो गई है। 

रिलीजस लिबर्टी और कम्युनिस्टों की प्रविधि की इस बहस में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार जीतने वाले रूसी लेखक सोल्झेत्सिन का लिखा एक वाक्य अमेरिका में इंटरनेट मीडिया पर जमकर उद्धृत किया जा रहा है। सोल्झेत्सिन ने रूस में राजनीतिक उत्पीड़न पर लिखकर पूरी दुनिया को बताया था। सोल्झेत्सिन ने लिखा था कि ‘कम्युनिस्ट सिस्टम में अपराधियों को बख्श दिया जाता है और राजनीतिक विरोधियों को अपराधी बना दिया जाता है।‘ दरअसल अमेरिकी प्रशासन इस समय क्रिश्चियनिटी के प्रति अनुरागी लोगों की संख्या कम होने को लेकर चिंतित है। एक अनुमान के मुताबिक इस समय अमेरिका के शहर न्यूयार्क में 40 प्रतिशत लोग गैर क्रिश्चियन हैं। वहां इस बात पर बहस हो रही है कि क्या प्रवासियों के कारण देश की अस्मिता और वहां का रिलीजन संकट में है। अमेरिका में जिस तरह से हैती और सीरियन समुदाय के लोगों की संख्या बढ़ रही है उसके विरुद्ध जनमानस तैयार करने का प्रयास ट्रंप और उनके सहयोगी कर रहे हैं। अब तो इसपर भी बात होने लगी है कि जिस धर्म को माननेवाले आतंकवादियों ने वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हमला किया और अमेरिका को चुनौती दी उसी समुदाय के लोग एक बार फिर इकट्ठा होकर क्रश्चियनिटी को चुनौती देते प्रतीत हो रहे हैं। उस समुदाय को कम्युनिस्टों का प्रत्यक्ष समर्थन भी मिल रहा है। अमेरिकियों का एक पढ़ा लिखा तबका भी उनके समर्थन में दिखता है। स्वतंत्रता के नाम पर जिस तरह से तुष्टीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है उसको लेकर ट्रंप और उनकी पार्टी के लोग अमरिका में चिंता का माहौल बनाने का प्रयास करते दिख रहे हैं। 

भारत में कम्युनिस्टों की स्थिति को देखें तो ऊपरी तौर पर ये लगता है कि चुनावों में उनकी निरंतर हार के बाद वो अपने सबसे बुरे दौर में हैं। कम्युनिस्ट भले ही कमजोर प्रतीक हो रहे हों लेकिन जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस पार्टी को समर्थन करना आरंभ किया है उसको रेखांकित करना आवश्यक है। कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी पार्टी के हैदराबाद प्लेनरी सेशन में स्पष्ट रूप से ये माना था कि पार्टी की हिंदुत्व के कारण नहीं बल्कि अपनी संगठन की कमजोरी से जूझ रही है। वही राहुल गांधी कालांतर में कम्युनिस्टों के एजेंडे पर आते दिखे। आज कांग्रेस पार्टी की नीतियों में कम्युनिस्ट विचारों की छाप स्पष्ट दिखती है। हिंदुत्व पर आक्रमण अब पार्टी के केंद्र में है। इसके अलावा अकादमिक जगत में अब भी कम्युनिस्टों के प्रभाव को महसूस किया जा सकता है। विशेषकर भाषा और संस्कृति के विषयों में जिस तरह की पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं उनमें वामपंथी विचार और उसके पैरोकारों की बहुलता है। अब भी कई विश्वविद्यासयों में कल्चरल स्टडीज के पाठ्यक्रम में वाम विचार की प्रधानता है। ये वही विचार है जो भारत और भारतीयता के विषयों और सिद्धांतों का निषेध करने के लिए विदेशी और आयातित विचारों को लेकर आते हैं। विदेशी विचारों के आधार पर अकादमिक जगत में विमर्श होते हैं। अमेरिका में भी पढ़े लिखे लोगों के एक वर्ग के कम्युनिस्ट विचार को आगे बढ़ाने वाले के तौर पर पहचान की गई है। भारत में तो स्वाधीनता के बाद लंबे समय तक उनको ही पढ़ा लिखा माना जाता रहा जो कम्युनिस्ट थे या फिर मार्क्स के अनुयायी थे। कहना ना होगा कि अब भी यह प्रवृत्ति अकादमिक जगत में है कि वहां कोई पढ़ा लिखा या विद्वान तभी समझा जाता है जब उसकी आत्मा लेफ्ट की तरफ झुकी हो। सुविचारित तरीके से ये बात फैलाई गई कि दक्षिणपंथ में प्रतिभा की कमी है। 

यह अनायास नहीं है कि अमेरिका अपने देश और धर्म को सांस्कृतिक मार्क्सवाद से बचाकर रखना चाहता है। वहां चिंता इस बात पर है कि संस्कृतिक मार्क्सवाद पहले परिवार नाम की संस्था को नुकसान पहुंचाता है। फिर धर्म को निशाना बनाता है और निजी संपत्ति को लेकर विरोध का माहौल बनाता है। इन सब लक्ष्यों को पूरा करके वो राष्ट्र को नुकसान पहुंचाने के लक्ष्य की ओर बढ़ता है। हमारे देश में भी स्वादीनता के बाद सांस्कृतिक मार्क्सवाद के दुष्परिणामों को देखा जा सकता है। किस तरह से संयुक्त परिवार की अवधारणा को एकल परिवार की तरफ मोड़ दिया गया। धर्म की तुलना अफीम से करके नास्तिकता को बढ़ावा दिया गया। जो लोग धार्मिक प्रतीक चिन्हों को धारण करते थे उनको पोंगापंथी या दकियानूसी करार दिए जाते सबने देखा है। पिछले लोककसभा चुनाव में निजी संपत्ति के स्कैनिंग करवाने जैसे बयान भी सुने गए थे। इसके बाद राष्ट्र की अवधारणा को प्रश्नांकित कर उसको कमजोर करने के मंसूबे भी स्पष्ट ही हैं। सांस्कृतिक मार्क्सवाद की इस राह की सबसे बड़ी बाधा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके विचार हैं। सभ्यतागत मूल्यों की पुनर्स्थापना के प्रयत्नों से नरेन्द्र मोदी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जड़ें मजबूत कर रहे हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि अमेरिका की तरह भारत में कम्युनिस्टों के विरोध में निरंतर बोला और लिखा जाना चाहिए। महत्वपूर्ण यह भी है कि अकादमिक जगत में उनके वर्चस्व को चुनौती देने का संगठित प्रयास हो। 


Saturday, June 20, 2026

सफल राजनय का फार्मूला मोदीनामिक्स


विश्व के सात उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों के समूह जी 7 की बैठक फ्रांस के शहर एवियन में हुई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस सम्मेलन में भाग लेने का समाचार आया तो सबकी निगाहें प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप की वहां होनेवाली मुलाकात पर टिक गई। सम्मेलन संपन्न हुआ। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच भेंट हुई। मोदी विरोधियों को उम्मीद थी कि राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के बीच कुछ ऐसा घटित होगा जिससे कि मोदी को घेरा जा सकेगा। हुआ इसके ठीक विपरीत। प्रधानमंत्री जब सम्मेलन कक्ष में पहुंचे तो राष्ट्रपति ट्रंप अपनी कुर्सी से उठकर उनसे गर्मजोशी से मिले। द्विपक्षीय वार्ता के बाद साझा प्रेस कांफ्रेंस में राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी की भूरि-भूरि प्रशंसा की। प्रशंसा पर व्यापक चर्चा हो चुकी है इस कारण दुहराने का अर्थ नहीं। राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत में मोदी विरोधियों की आशाओं पर पानी फेर दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान-अमेरिका संघर्ष के दौरान तीन भारतीय नाविकों की मौत का मुद्दा भी राष्ट्रपति ट्रंप के सामने उठाया। मजबूती के साथ अपनी बात रखी। इस पूरी प्रेस कांफ्रेस में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप बहुत सहज दिखे।

इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ की। जब उनसे महान नेता की परिभाषा पूछी गई तो उन्होंने कहा प्रधानमंत्री मोदी जो 12 वर्ष से प्रधानमंत्री हैं और बहुत सालिड हैं। वो काम बहुत शांति से करते हैं लेकिन बहुत सख्त हैं। ये मैं बहुत अच्छे से जानता हूं। वो 150 करोड़ आबादी वाले देश के नेता है और निरंतर बने हुए है। जब ट्रंप बार-बार प्रधानमंत्री मोदी के लिए शांत लेकिन सख्त शब्द का प्रयोग कर रहे हैं तो इसका विश्लेषण करना चाहिए। पिछले वर्ष अप्रैल में पहलगाम में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने 26 भारतीयों की धर्म पूछकर हत्या की थी। उस आतंकी वारदात के बाद भारत ने पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों को ध्वस्त करने के लिए आपरेशन सिंदूर आरंभ किया। पाकिस्तान ने भारत पर ही हमला कर दिया जिसका बारतीय सेना ने मुंहतोड़ जबाव दिया। 10 मई को संघर्ष विराम हुआ। तब से कई महीनों तक जब भी राष्ट्रपति ट्रंप को अवसर मिलता वो इस बात को कहते थे कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम उन्होंने ही करवाया। इस बात को उन्होंने पचास से अधिक बार दुहराया। जब भी डोनाल्ड ट्रंप ये बात कहते तो यहां विपक्षी दलों के नेता प्रधानमंत्री को घेरने का प्रयत्न करते। उनकी विदेश नीति को लेकर प्रश्न खड़े करने लगते। उसी समय अमेरिका ने एकतरफा टैरिफ बढ़ाने की घोषणा कर दी थी। उस दौर में राष्ट्रपति ट्रंप भारत को लेकर सकारात्मक टिप्पणी नहीं करते थे। एक बार तो उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के डेड (मृत) होने की बात तक कह डाली थी। उनके बयानों पर यहां मोदी विरोधी सक्रिय हो जाते। ये सिलसिला कई महीनों तक चला। इस बीच प्रधानमंत्री कनाडा के दौरे पर गए थे। उनकी और ट्रंप की फोन पर बातचीत हुई। ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी से वाशिंगटन होते हुए भारत लौटने का निमंत्रण दिया। राष्ट्रपति ट्रंप के उस अनुरोध को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों का हवाला देकर टाल दिया था। इसको अंतराष्ट्रीय कूटनीति में एक बड़े कदम के तौर पर देखा गया था। ट्रंप की बयानबाजियों का मोदी ने कोई नोटिस ही नहीं लिया। कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दी। मोदी की इस उदासीनता के भाव ने अमेरिका के साथ कूटनीतिक संबंधों को नया आयाम दे दिया।

खाड़ी संकट के दौरान हार्मूज जलडमरूमध्य के बंद होने पर जब कच्चे तेल का संकट हुआ तो भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से कच्चे तेल का आयात जारी रखा। अमेरिका ने रूस से तेल खरीद पर प्रतिबंध लगाया था पर भारत-रूस संबंध पर उसका असर नहीं पड़ा। अमेरिका ने एकतरफा प्रतिबंध लगाया था और अपनी तरफ से ही एक महीने की छूट दी। वो छूट भी खत्म हो गई लेकिन उसके बारे में फिर कोई बयान नहीं आया। इस वर्ष जून में जिस मात्रा में भारत रूस से कच्चा तेल आयात कर रहा है वो एक नया कीर्तिमान बनने की ओर बढ़ रहा है। शिप ट्रैकिंग डाटा के अनुसार भारत अपनी जरूरतों के 50 प्रतिशत से अधिक तेल रूस से आयात कर रहा है। बिना किसी शोर शराबे के और बयानबाजी के ये काम निर्बाध गति से चलता रहा। ये प्रधानमंत्री मोदी का अपना इकोनामिक्स है जिसको अंतराष्ट्रीय राजनय में मोदीनामिक्स कहा जाने लगा है। दरअसल जब राष्ट्रपति ट्रंप मोदी को टफ निगोशिएटर कहते हैं तो उसके पीछे मोदी की खामोश पर दृढ़ निर्णयों की पृष्ठभूमि है। राहुल गांधी भले ही प्रधानमंत्री मोदी को कंप्रोमाइज्ड प्राइम मिनिस्टर कहें लेकिन अंतराष्ट्रीय मंचों पर प्रधानमंत्री की जो स्थिति है वो इस बयान को बचकाना बयान साबित करता है। फ्रांस में जी 7 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने जितने भी वैश्विक नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं वो सब इस बात की गवाही देने के लिए पर्याप्त है कि मोदोनामिक्स कैसे काम कर रहा है। आज अंतराष्ट्रीय राजनय में मोदी ने वैश्विक नेताओं के साथ जिस तरह का रैपो बनाया है या कहें कि जिस तरह के व्यक्तिगत संबंध बनाए हैं उसका लाभ देश को हो रहा है। इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने भले ही मजाक में कहा हो कि वो और मोदी वायरल कपल हैं लेकिन इससे दोनों देशों के संबंधों में एक निकटता झलकती है। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने जिस तरह से हिंदी में बोलकर प्रधानमंत्री का स्वागत किया और भारत-फांस मैत्री के अमर रहने की बात की वो दोनों देशों की निकटता को दर्शाता है।

इतना ही नहीं खाड़ी संकट के दौरान प्रधानमंत्री ने खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंधों को मजबूत किया वो भी अंतराष्ट्रीय राजनय में एक मिसाल है। इतने लंबे संघर्ष के दौरान उन देशों में रहनेवाले भारतीयों की सुरक्षा को अहम स्थान मिला। दरअसल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत के बाजार की ताकत को ना केवल पहचानते हैं बल्कि अपनी इस ताकत का उपयोग अंतराष्ट्रीय राजनय में बहुत बेहतर तरीके से करते हैं। बगैर आक्रामक दिखे दृढता से देशहित के लिए कदम उठाते रहते हैं।  150 करोड़ भारतवासियों की ताकत और राजनय में प्रधानमंत्री का गांभीर्य मोदीनामिक्स को विशिष्टता प्रदान करता है। यह अनायास नहीं है कि अमेरिकी राष्ट्रपति कहता है कि अगर भारत पर संकट आया तो वो साथ खड़ा रहेगा। अगली ही पंक्ति में ये भी कह देता है कि जबतक मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। अगर खाड़ी संकट नहीं आता और देश की अर्थव्यवस्था पर उसका असर नहीं पड़ता तो भारत ने विकास की जो रफ्तार पकड़ी थी वो कायम रहती। खाड़ी संकट के दौरान ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भारत ने जिस तरह की रणनीति अपनाई उसके कारण ही जनता पर बहुत अधिक बोझ नहीं पड़ा। जिस तरह से ऊर्जा चुनौतियों का सामना भारत ने किया और नई जगहों से अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया वो एक केस स्टडी है। आनेवाले समय में प्रधानमंत्री मोदी के 12 वर्षों के कार्यकाल में जब उपलब्धियों और चुनौतियों पर शोधादि होंगे तो मोदीनामिक्स उसके केंद्र में होगा।   


Saturday, November 1, 2025

धर्मांतरण की जुगत में उपराष्ट्रपति


भारत में आमतौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान पर चर्चा होती है। कभी टैरिफ पर उनके बयान तो कभी आपरेशन सिंदूर रुकवाने के उनके दावे तो कभी प्रधानमंत्री मोदी को मित्र बताने पर तरह तरह की चर्चा होती है। पिछले दिनों अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे डी वेंस ने मिसीसिपी विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में अपनी पत्नी ऊषा वेंस के धर्म पर बयान दिया जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई। एक प्रश्न के उत्तर में उपराष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही उनकी पत्नी ऊषा वेंस ईसाई धर्म अपना लेंगी। जे डी वेंस की पत्नी ऊषा भारतीय मूल की हिंदू हैं। विवाह के बाद भी उन्होंने अपना धर्म नहीं बदला। उपराष्ट्रपति बनने के बाद वेंस जब अपनी पत्नी और बच्चों के साथ भारत आए थे तो पति-पत्नी अक्षरधाम मंदिर गए थे। अमेरिका में भी वेंस और ऊषा के हिंदू रीति-रिवाजों को निभाते फोटो दिखते रहते हैं। विश्वविद्यालय में वेंस के इस बयान के बाद उनके कंजरवेटिव समर्थकों ने जमकर तालियां बजाईं। बाद में इंटरनेट मीडिया पर वेंस के इस बयान की आलोचना आरंभ हो गई। एक व्यक्ति ने तो उनको एक्स पर टैग करते हुए लिखा कि ये अफसोस की बात है कि आप अपनी पत्नी के धर्म को सार्वजनिक रूप से बस के नीचे फेंक कर कुचलना चाहते हैं। जब आलोचना बढ़ी तो उपराष्ट्रपति को सफाई देनी पड़ी। उन्होंने कहा कि फिलहाल ऊषा के धर्म परिवर्तन की कोई योजना नहीं है। साथ ही उम्मीद भी जता दी कि जिस तरह से वो चर्च की ओर प्रेरित हुए उसी तरह से एक दिन उनकी पत्नी भी चर्च की ओर जाने की राह पर बढ़ेंगी। आपको बताते चलें विवाह के पूर्व वेंस नास्तिक थे। दरअसल अमेरिका में अंतर-धार्मिक विवाह को लेकर हमेशा से बहस चलती रही है। जब से ट्रंप राष्ट्रपति बने हैं और मेक अमेरिका ग्रेट अगेन का नारा दिया है, तब से ये बहस और तेज है। वर्तमान सरकार के कई सदस्य प्रवासियों से ये अपेक्षा करते हैं कि वो अमेरिका और ईसाई धर्म से प्यार करें। 

अमेरिका कई बार भारत को धर्म और कथित धार्मिक कट्टरता को लेकर नसीहत देता रहता है। धार्मिक कट्टरता पर तो कई रिपोर्ट प्रकाशित कर अंतराष्ट्रीय स्तर पर जारी भी करता रहा है। ट्रंप तो राष्ट्रपति चुनाव के समय से ही ईसाई धर्म और बाइबिल को लेकर लगातार श्रद्धापूर्वक अपनी रैली में बोलते रहे हैं। यहां ये भी याद दिलाता चलूं कि जब अमरिका में राष्ट्रपति चुनाव के लिए प्रचार हो रहा था तो ट्रंप की रैलियों और सभाओं में लार्ड जीजस और जीजस इज किंग के नारे गूंजते थे। ट्रंप, एलन मस्क और जे डी वेंस ने अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के समय परिवार, शादी, बच्चे और ईसाई धर्म को आगे रखा था। उनके इस प्रचार ने अमेरिकी वोटरों को अपनी ओर खींचा था और कमला हैरिस परास्त हो गई थीं। ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद इसको और बल मिला। चर्च और ईसाई धर्म से जुड़े लोग महत्व पाने लगे। मेक अमेरिका ग्रेट अगेन को उन्होंने प्राथमिकता देनी शुरु की। चार्ली किर्क ट्रंप के पारंपरिक वोटरों से संवाद करनेवाले महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। ईसाई धर्म और अमेरिकी माटी को लेकर आक्रामक तरीके से भाषण देते थे और लोगों को एकजुट करते थे। पिछले दिनों चार्ली किर्क की हत्या हो गई। चार्ली  हत्या के बाद ट्रंप के इस एजेंडे को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाने वाला कोई बचा नहीं। कुछ दिनों पूर्व चार्ली किर्क की विधवा का बयान आया था। वो कह रही थीं कि चार्ली को रिप्लेस करनेवाला उनको कोई दिखाई नहीं देता लेकिन चार्ली और जे डी वेंस में कई समानताएं हैं। बहुत संभव है कि चार्ली के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए ट्रंप ने वेंस को चुना हो। अगले राष्ट्रपति चुनाव में जे डी वेंस स्वाभाविक रूप से रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार हो सकते हैं। ऐसे में उनकी ईसाई धर्म समर्थक की छवि बनाने से लाभ होगा। उस समय उनके सामने उनकी पत्नी के धर्म को लेकर प्रश्न ना खड़े हों इस कारण से वेंस अभी से एक माहौल बनाना चाहते हैं। पिछले राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम से ये बात साबित भी हो गई कि अमेरिकी राजनीति में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है। 

इस पूरे प्रकरण से एक और बात सामने आती है वो ये कि भारत को नसीहत देनेवाले अमेरिका के नेता धर्म को लेकर किस तरह का व्यवहार करते हैं। अब अगर हम भारत की बात कर लें तो स्थिति बिल्कुल भिन्न नजर आती है।  भारत में तो कभी भी ना तो किसी राजनेता की पत्नी के धर्म के बारे में चर्चा होती है, ना ही जिज्ञासा और ना ही वोटरों को फर्क पड़ता है। राजीव गांधी ने सोनिया गांधी से शादी की कभी किसी ने कोई आपत्ति उठाई हो या कभी राजीव गांधी ने उनपर हिंदू धर्म स्वीकार करने का दबाव बनाया हो, ऐसा सार्वजनिक तो नहीं हुआ। राजीव गांधी के निधन के बाद सोनिया गांधी का विदेशी मूल भले ही मुद्दा बना लेकिन तब भी किसी ने ये नहीं पूछा कि वो हिंदू हैं या अब भी ईसाई ही हैं। जिस तरह से वेंस ने सार्वजनिक रूप से अपनी पत्मी के धर्म परिवर्तन की बात कही वैसा तो भारत में सुना नहीं गया। विदेश मंत्री जयशंकर की पत्नी विदेशी मूल की हैं लेकिन उनके धर्म के बारे में ना तो किसी को कोई रुचि है और ना ही कोई जानना चाहता है। भारत के राष्ट्रपति रहे के आर नारायणन की पत्नी भी विदेशी रहीं, उन्होंने अपना नाम अवश्य बदला लेकिन उनके धर्म को लेकर भारत की जनता को कभी कोई आपत्ति हुई हो ऐसा ज्ञात नहीं है। अमेरिका खुद को बहुत आधुनिक और खुले विचारों वाला देश कहता है लेकिन धर्म को लेकर वहां के नेताओं के विचार बेहद संकुचित हैं। चुनाव में भी जिस तरह से धर्म का खुलेआम उपयोग वहां होता है वो भी देखनेवाली बात है। लेकिन जब दूसरे देशों को नसीहत देने की बात होती है तो सभी एकजुट हो जाते हैं।  

हम अमेरिकी समाज को देखें तो वहां आधुनिकता के नाम पर इस तरह की वितृतियां घर कर गई हैं कि वहां के मूल निवासी अब वापस अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहते हैं। ये अनायास नहीं है कि ट्रंप ने शादी और बच्चों का मसला उठाया और उसको लोगों ने पसंद किया। ट्रंप और उनकी टीम लगातार परिवार व्यवस्था की बात करते रहते हैं और अमेरिकी उनकी बातों को ध्यान से सुनते हैं। अमेरिका में नास्तिकता की बातें बहुत पुरानी है और इसकी जड़े उन्नीसवीं शताब्दी में जाती हैं। जब पूरी दुनिया में कम्युनिस्टों की विचारधारा लोकप्रिय हो रही थी तब अमेरिका में भी चार्ल्स ली स्मिथ जैसे लोगों ने खुले विचारों के नाम पर नास्तिकता को बढ़ावा देने के लिए योजनाबद्ध तरीके से कार्य आरंभ किया। वहां की युवा पीढ़ी इसकी ओर आकर्षित भी हुई। इक्कसीवीं शताब्दी तक आते आते फिर से धर्म की ओर लोगों का रुझान बढ़ने लगा है। अब भी अमेरिका में नास्तिकता को बढ़ावा देनेवाले संगठन हैं लेकिन कमजोर हैं। हिंदू धर्म और उनके अनुयायियों जैसा सहिष्णु कहीं और नहीं है ये अमेरिकियों को समझना होगा। 

Saturday, February 22, 2025

भारत और हिंदुत्व के विरुद्ध आर्थिक मदद


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया है। ट्रंप ने कहा कि भारत में लोकसभा चुनाव 2024 के समय मतदाताओं की संख्या बढ़ाने के लिए अमेरिका की तरफ से करोड़ों डालर दिए गए। उन्होंने ये भी प्रश्न उठाया कि क्या ये धन भारत में सत्ता परिवर्तन के लिए भेजा गया था। राष्ट्रपति ट्रंप के बयान के बाद इस बात की फैक्ट चेकिंग भी आरंभ हो गई है कि अमेरिका से धन भारत भेजा गया या नहीं। दरअसल अमेरिका की एक एजेंसी है यूनाइटेड स्टेटस एजेंसी फार इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूएसएआईडी) जो दुनिया के देशों को अलग अलग कारणों से आर्थिक मदद करता है। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, लोकतंत्र को मजबूत करने आदि के नाम पर धन दिया जाता है। अधिकतर मामलों में ये आर्थिक मदद स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से की जाती है। कई बार सरकारों को भी धन दिया जाता है कि ताकि वो किसी विशेष कार्यक्रम को चला सकें। प्रश्न ये नहीं है कि अमेरिका से लोकसभा चुनाव के समय धन आया कि नहीं प्रश्न तो ये है कि भारत की जिन संस्थाओं को पूर्व में अमेरिका की एजेंसी यूएसएआईडी के माध्यम से धन मिला उनका इतिहास कैसा है। क्या वो भारत में किसी खास विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए काम करते रहे हैं। क्या वो किसी धर्म विशेष के प्रचार प्रसार में लगी संस्थाएं हैं। जिन गैर सरकारी संगठनों को अमेरिका से पूर्व में धन मिला था क्या उन संगठनों के कर्ताधर्ता किसी राजनीतिक दल से जुड़े हुए हैं। जब भारत में चुनाव के पहले मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा था और ये नैरेटिव गढा जा रहा था कि मोदी सरकार फासिस्ट है तो इस पूरी व्यवस्था के साथ जो लोग थे उनसे जुड़ी संस्थाओं को यूएसएआईडी से कितना धन मिला था। अगर इन बातों की पड़ताल करेंगे तो पूरी तस्वीर साफ हो जाएगी। 

भारतीय चुनव के फंडिंग के पहले हमें जरा वैश्विक राजनीति के विभिन्न कोणों को समझना होगा। 2024 में पूरी दुनिया के 60 देशों में चुनाव होनेवाले थे लेकिन मतदाताओं की संख्या के हिसाब से भारत में सबसे बड़ा चुनाव होने जा रहा था। वैश्विक मंच पर भारत एक शक्ति के रूप में उभर रहा है और भूरणनीति और भूराजनीति की परिधि से केंद्र की ओर बढ़ रहा है। रूस यूक्रेन युद्ध या इजरायल हमास संघर्ष के दौरान भारत ने जिस प्रकार का स्टैंड लिया उससे पूरी दुनिया की निगाहें भारत पर टिकीं। राजनीति में भारत के महत्व बढ़ने और आर्थिक रूप से संपन्न होने से वैश्विक समीकरणों पर असर पड़ा। भारत के लोकसभा चुनाव को लेकर दुनिया के देशों में उत्सुकता थी। भी जानना चाहते थे कि सरकार किसकी बनेगी। मोदी सरकार की विदेश नीति कई विकसित देशों को असहज कर रही थी। भारत ने अपने हितों को आगे रखना आरंभ कर दिया था। चुनाव में अगर जनता किसी अन्य दल को चुनती तो इसका असर वैश्विक भूरणनीति और भूराजनीति पर पड़ता। जी 20 सम्मेलन के दौरान जिस प्रकार से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत को मदर आप डेमोक्रेसी कहा और उसको वैश्विक मंच पर मजबूती से रखा उसने भी लोकतंत्र के रक्षक होने का दावा करनेवाले अमेरिका को असहज किया था। अमेरिका के कुछ धनकुबेर भारत में मोदी सरकार को हटाना चाहते थे। उन्होंने सार्वजनिक रूप से भी इस तरह का बयान भी दिया था। कई संस्थाएं इस कार्य में लग गई थीं। वैश्विक स्तर पर मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव बनाने में जुटी । आपको याद दिलाते चलें कि 2021 के सितंबर में अमेरिका में एक आनलाइन सम्मेलन हुआ था जिसको डिसमैंटलिंग हिदुत्व का नाम दिया गया था। इस सम्मेलन में भारत से जिन वक्ताओं का नाम था उनमें से अधिकतर 2015 में असहिष्णुता के मुद्दे पर पुरस्कार वापसी का षडयंत्र भी रचा था। इनमें से जुड़े कई लोगों की संस्थाओं या वो जिन संस्थाओं से जुड़े हैं उसको अमेरिका से फंडिंग मिलने की बात सामने आ रही है। इस तरह के कई कार्यक्रम वैश्विक स्तर पर चलाए जिसके उद्देश्य मोदी सरकार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निशाने पर लेना था। 

यूएसएआईडी ने उन संस्थाओं को भी मदद की जो भारत में मतांतरण के कार्य में लगे हैं। झारखंड, छत्तीसगढ़ और यहां तक कि मणिपुर में भी सक्रिय हैं। मणिपुर में जिस तरह हिंसा हुई और जिस तरह से वैश्विक स्तर पर भारत को बदनाम करने के लिए एक नैरेटिव बनाया गया उसके पीछे की मंशा को भी समझना चाहिए। ये सब लोकसभा चुनाव के आसपास हो रहा था। कांग्रेस से जुड़ी रहीं एक महिला ने महिलाओं के विकास के नाम पर संस्था बनाई। उनको पद्मभूषण से सम्मानित भी किया गया और कांग्रेस की तरफ से राज्यसभा की सदस्यता भी दी गई। उस संस्था को यूएसएआईडी ने आर्थिक मदद की थी। बाद में उनको मैगासेसे सम्मान भी मिला। उस फाउंडेशन को भी मदद दी गई जो कश्मीर को विवादित क्षेत्र बताता रहा है। इस नैरेटिव को वैश्विक मंच प्रदान करता रहा है। एशिया में काम करने के नाम पर इस फाउंडेशन को करोडो डालर की मदद दी गई। तरह तरह की संस्थाएं भी बनाई गईं। कोई भारत में चुनाव सुधार के नाम पर तो कोई मतदाताओं को बढ़ाने के नाम पर आर्थिक मदद लेते रहे। जार्जजटाउन विश्वविदयालय को भी मदद दी गई। ये विश्वविद्यालय भारत और हिंदुत्व के खिलाफ नैरेटिव बनाने में लगा रहा है। इस विश्वविद्यालय का ब्रिज इनेशिएटिव नाम से चलनेवाले कार्यक्रम को अगर ध्यान से देखा जाए तो आपको उस नैरेटिव की सचाई नजर आ जाएगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अर्धसैनिक संगठन बताने का नैरेटिव यहीं गढ़ा गया। इसको अमेरिकी थिंक टैंक और खुफिया एजेंसियों का समर्थन भी बताया जाता है। अब यहीं से संयोगों का आरंभ भी होता है। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी अमेरिका जाते हैं तो इस विश्वविद्यालय से संबद्ध संस्था ना सिर्फ उनका कार्यक्रम करवाती है बल्कि भारत में लोकतंत्र को लेकर विवादित बयान भी वहीं से आता है। ये विश्वविद्यालय घोषणा करता है कि उसके यहां से ग्रेजुएट करनेवाले छात्र अमेरिकी खुफिया एजेंसी के लिए काम करते हैं। अमेरिका में इसको स्पाई फैक्ट्री के नाम भी जाना जाता है। धर्मिक स्वतंत्रता के नाम पर इस विश्वविद्यालय से जुड़े प्रो नुरुद्दीन ने चुनाव के पहले मणिपुर और भारत में इस्लामोफोबिया के नाम से एक रिपोर्ट जारी की थी। इसके अलावा मोदी मिराज, न्यू स्टडी इंडीकेट्स डिक्लाइन इन इंडियाज ग्लोबल रेपुटशन अंडर बीजेपी नाम से एक रिपोर्ट का सहलेखन भी नुरुद्दीन ने किया। इस रिपोर्ट को लोकसभा चुनाव को प्रभावित करनेवाली रिपोर्ट के तौर पर देखा गया था। बताया जाता है कि इस रिपोर्ट को फ्रेंड्स आफ डेमोक्रेसी ने स्पांसर किया था। इस संस्था को भी यूएसएआईडी से आर्थिक मदद मिलती है। यूएसएआईडी की फंडिंग का ऐसा मकड़जाल है जिसको समझने और समझाने के लिए पूरी किताब लिखी जा सकती है। अब समय आ गया है कि भारत सरकार इस तरह के प्रकल्पों पर नजर रखे और समय समय पर उसको उजागर भी करते रहे। जिन व्यक्तियों या संस्थाओं को लोकतंत्र या धार्मिक सहिष्णुता के नाम पर मदद मिलती है उनपर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।    

Saturday, January 25, 2025

धर्म ध्वजा के वैश्विक वाहक राजनेता


अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह में कई बातें अलक्षित रह गईं। शपथ ग्रहण के पहले एक्जूक्यिटिव आर्डर्स की इतनी चर्चा हो गई कि कुछ बातें नेपथ्य में चली गईं। दूसरा कारण ये रहा कि हमारे देश में खास विचारधारा के बुद्धिजीवियों ने वर्षों से उन मुद्दों को चर्चा के लायक नहीं समझे जाने का जन मानस बनाने का काम किया। ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह को देखें तो पता चलता है कि वहां धर्म का कितना उपयोग था। दुनिया का सबसे विकसित और आधुनिक राष्ट्र अमेरिका में धर्म की कितनी महत्ता है। ट्रंप को शपथ दिलवाने के पहले ईश्वर की प्रार्थना की गई। ट्रंप ने शपथ के दौरान दो बाइबल का उपयोग किया और कहा कि ईश्वर मेरी मदद करें (सो हेल्प मी गाड)। शपथ ग्रहण के ओपनिंग इनवोकेशन के लिए न्यूयार्क के आर्क बिशप और प्रमुख कैथोलिक नेता टिमोथी डोलन ने बुक आफ विजडम से प्रार्थना की। बाइबिल और ईसा में आस्था रखने वाले ईवैनजैलिकल लीडर फ्रैंकलिन ग्राहम ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। इतना ही नहीं समारोह में बैनेडिक्शन (आशीर्वाद) के लिए भी तीन प्रमुख धर्मगुरु वहां उपस्थित थे। न्यूयार्क के रब्बी अरि बमन ने अपनी प्रार्थना में राष्ट्रीय एकता और अखंडता की बात की। डेट्रोएट के 180 चर्चों के वरिष्ठ पेस्टर लारेंजो सीवैल और ब्रुकलिन के कैथोलिक पुजारी भी वहां थे। सीवैले ने तो ट्रंप के कैंपेन के दौरान कैथोलिक मतदाताओं को उनकी प्राथमिकताओं के बारे में बताया भी था। 

ये बताना आवश्यक है कि मिशिगन के कर्बला इस्लामिक एडुकेशन सेंटर से जुड़े इमाम हुसैन अल-हुसैनी का नाम ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह के आमंत्रितों की सूची में था। वो समारोह में नहीं थे। उनकी अनुपस्थिति के जमकर कयास लगे क्योंकि उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप का समर्थन किया था। शपथ ग्रहण के बाद ट्रंप ने जोरदार भाषण दिया। उस भाषण में ट्रंप ने दर्जन भर से अधिक बार भगवान (गाड) को ना सिर्फ याद किया बल्कि नियमित अंतराल पर ईश्वर से काम करने की शक्ति भी मांगी। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति का धर्म और ईश्वर के नाम पर काम करने की मंशा सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट करना। आप पूरे अमेरिकी चुनाव को याद करिए जब खुलेआम चर्च और जीजस को याद किया जाता रहा। पराजित उम्मीदवार कमला हैरिस ने जब अपनी एक रैली में जीजस इज किंग का नारा लगानेवाले को कहा था कि आप गलत रैली में आ गए हैं। उनके इस बयान के मतदाताओं पर नकारात्मक प्रभाव की काफी चर्चा हुई थी। अगर ट्रंप के भाषण को विश्लेषित करें तो उन्होंने साफ तौर पर अमेरिका फर्स्ट का ना सिर्फ उद्घोष किया बल्कि उसके आधार पर ही नीतियां बनाने की घोषणा की। अब जरा हम अपने देश लौटते हैं। नरेन्द्र मोदी जब चुनाव प्रचार के दौरान प्रसून जोशी के लिखे गीत देश नहीं झुकने दूंगा की बात करते थे तो उनके आलोचक इसको भावना का ज्वार उभारनेवाले नारे के तौर पर देखते थे। ट्रंप ने तो खुलेआम राष्ट्रपति बनने के बाद संदेश दिया कि वो अमेरिका को किसी हाल में झुकने नहीं देंगे। 

याद करिए कि जब पिछले वर्ष जनवरी में राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में नरेन्द्र मोदी परंपरागत हिंदू वेशभूषा में पूजा की थाल लेकर मंदिर में प्रवेश कर रहे थे तो कई विश्लेषक इसको चुनाव जीतने का उपक्रम करार दे रहे थे। राजनीति में धर्म के उपयोग को लेकर उनकी तीखी आलोचना हो रही थी। जो लोग मोदी की तब आलोचना कर रहे थे उनको अब ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह में धर्म का उफयोग नहीं दिखाई दे रहा है। उनके मुंह सिले हुए हैं। जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्र सर्वप्रथम की बात करता है तो लोग संघ की इस सोच का आलोचना करते हैं । कई राजनीतिक दल तो यहां तक कहते हैं कि उनके लिए संविधान सर्वप्रथम है। ऐसा कहनेवाले ये भूल जाते हैं कि जब देश रहेगा तभी संविधान रहेगा। राष्ट्र को मजबूत करने के लिए संविधान बनाया गया है जहां सबको साथ लेकर समान अधिकार की बात की गई है। नरेन्द्र मोदी अगर किसी मंदिर में चले जाते हैं तो ये कहकर शोर मचाया जाता है कि वो हिंदू वोटरों को लुभाने या प्रभावित करने के लिए ऐसा कर रहे हैं। अमेरिका में तो खुलेआम राष्ट्रपति पद के उम्मीदावर चर्चों में जाते हैं, प्रमुख धर्मगुरुओं का समर्थन लेने का प्रयास करते हैं। धर्म को राजनीति से अलग करने का जो विचार है वो दोषपूर्ण है। धर्म को अफीम कहकर प्रचारित करना और लोकतंत्र को धर्म विहीन बनाने की चेष्टा करना भी अनुचित है। अगर ऐसा उचित होता तो हमारे संविधान के निर्माताओं ने संविधान की मूल प्रति में धार्मिक प्रतीकों के अंकन की अनुमति नहीं देते। संविधान सभा के विद्वान सदस्य धर्म की महत्ता को समझते थे। इस कारण कई संवैधानिक संस्थाओं के ध्येय वाक्य भी धर्म से जुड़े हुए हैं। 

स्वाधीनता मिलने के बाद जवाहरलाल नेहरू के संरक्षण में धर्मविहीन राजनीति या धर्म को अफीम कहनेवाली विचारधारा ने जोर पकड़ा। धर्म की गलत व्याख्या करके जनता के मन में संदेह का बीजारोपण किया गया। जो अब वृक्ष बन चुका है। स्वाधीनता के संघर्ष के दौरान ऐसी स्थिति नहीं थी। तब धर्म और राजनीति को लेकर नेताओं के मन में किसी तरह का संशय नहीं था। अरविंदो घोष ने 1908 में लिखा था, राष्ट्रवाद एक ऐसा धर्म है जो सीधे ईश्वर से आया है। अगर आप राष्ट्रवादी बनने जा रहे हैं, राष्ट्रवादी विचार को स्वीकार करते हैं तो आपको इसके धार्मिक स्वरूप को ही अंगीकार करना होगा। आपको ये याद रखना होगा कि आप ईश्वर के कार्य करने का माध्यम हैं। वो इतने पर ही नहीं रुके थे। 30 मई 1909 को उत्तरपाड़ा के अपने प्रसिद्ध उद्बोधन में अरविंदो ने कहा था कि, मैं ये नहीं कहता कि राष्ट्रवाद एक धर्म है, एक विश्वास है, बल्कि मैं तो ये कहता हूं कि सनातन धर्म ही हमारे लिए राष्ट्रवाद है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने भी राजनीति में हिंदू धर्म प्रतीकों के उपयोग को सही करार दिया था। बंकिम ने भी अपने लेखों में हिंदू धर्म की बात की। लाला लाजपत राय से लेकप बिपिन चंद्र पाल ने भी धर्म को राजनीति से अलग करके नहीं देखा। अरविंदो घोष से लेकर पाल तक ने अपने भाषण और लेखन में हिंदू धर्म प्रतीकों का उल्लेख करके भारत की जनता को एकजुट होने का संदेश दिया था। इतिहासकार बिपान चंद्र ने अपनी पुस्तक कम्युनिलज्म इन मार्डन इंडिया में देश के स्वाधीनता सेनानियों के बारे में लिखा है, ‘आरंभिक दिनों में क्रांतिकारी उग्रवादी गीता और काली की शपथ लेते थे और हिंदू विचार को क्रांतिकारी समझते थे।‘ ये पुस्तक लंबे समय से रेफरेंस पुस्तक के तौर पर पढ़ी जा रही है। इसको पढकर छात्र प्रशासनिक अफसर बन रहे हैं।  बिपान चंद्रा ये नहीं बता पाए कि इसमें गलत क्या था। इंटलैक्चुअल रोहिंग्याओं को ये भी बताना चाहिए कि इसमें गलत क्या है कि प्रधानमंत्री मोदी धर्म को राष्ट्रीयता से जोड़कर देखते हैं। इस पर तो देशव्यापी बहस होनी चाहिए। ट्रंप के शपथ ग्रहण ने तो इस बहस का आधार भी दे दिया है। 


Saturday, November 2, 2024

हिंदुओं की वैश्विक व्याप्ति और समाज


महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा के लिए चुनाव में प्रचार चरम पर है। इन दोनों राज्यों में चुनाव प्रचार के बीच उत्तर प्रदेश की नौ विधानसभा सीटों पर होनेवाले उपचुनाव को लेकर भी राजनीतिक सरगर्मी तेज है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बंटेंगे तो कटेंगे वाले बयान की काट ढूंढने में विपक्ष परेशान प्रतीत हो रहा है। कभी जीतेंगे तो पिटेंगे जैसा बयान आते हैं तो कभी जुड़ेंगे तो जीतेंगे जैसे नारे होर्डिंग पर लगते हैं। पूरे चुनाव प्रचार में हिंदू और सनातन की ही चर्चा हो रही है। योगी आदित्यनाथ ने तो रामभक्त ही राष्ट्रभक्त का नारा भी दे दिया है। इसपर पलटवार करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि उनका नारा निराशा और नाकामी का प्रतीक है। अखिलेश यादव ने आदर्श राज्य की कल्पना की बात की। यहां वो राम राज्य कहने से बच गए, लेकिन पूरे पोस्ट से भाव यही निकल रहा है। उनके दल के प्रवक्ता भी श्रीरामचरितमानस की चौपाइयां सुना रहे हैं। हिंदू विमर्श और पौराणिक चरित्र विधानसभा चुनाव प्रचार का केंद्रीय विमर्श है। कुछ लोगों को हिंदू और श्रीराम नाम लेने में कष्ट होता है। वो इशारों में अपनी बात कहते हैं। हिंदुओं की एकजुटता और हिंदू वोटरों को अपने पाले में करने के लिए सभी राजनीतिक दल बेचैन हैं। कोई जाति कार्ड खेल रहा है तो कोई जाति जनगणना की बात को हवा दे रहा है। 

हिंदुओं की चिंता सिर्फ विधानसभा चुनावों में नहीं हो रही है बल्कि वैश्विक स्तर पर भी इसको लेकर चर्चा हो रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव प्रचार में भी हिंदुओं को लेकर दोनों दल सतर्क हैं। रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने तो हिंदुओं पर बंगलादेश में हो रहे अत्याचार पर एक लंबी पोस्ट ही लिख डाली। ट्रंप ने लिखा कि वो बंगलादेश में हिंदुओं, ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यों पर होने वाले बर्बर हिंसा की निंदा करते हैं। उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी कमला हैरिस और अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन पर आरोप लगाया कि दोनों ने मिलकर अमेरिका और पूरे विश्व में हिंदुओं की अनदेखी की। ट्रंप ने स्पष्ट रूप से ये घोषणा की है कि धर्म के विरुद्ध रैडिकल लेफ्ट के एजेंडा से अमेरिकन हिंदुओं के अधिकारों की रक्षा के लिए वो प्रतिबद्ध हैं। हिंदुओं की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करेंगे। भारत और अपने मित्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ बेहतर समन्वय बनाकर चलेंगे। इसके बाद उन्होंने हिंदुओं को दीवाली की शुभकामनाएं दी और कहा कि ये ये पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। उधर डेमोक्रैट पार्टी की उम्मीदवार और अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने भी दीवाली मनाई। दीवाली मनाते हुए उनका वीडियो उनकी टीम ने इंटरनेट मीडिया पर साझा किया। जो बाइडेन ने भी व्हाइट हाउस में अपने परिवार के साथ दीवाली मनाई। जिस तरह से अमेरिका के चुनाव में हिंदुओं की बात हो रही है उतना खुलकर तो यहां भी हिंदुओं और हिंदू धर्म की चर्चा नहीं होती है। पिछले दिनों जब ब्रिटेन में चुनाव हुआ था तो वहां भी प्रधानमंत्री पद के दोनों उम्मीदवारों ने मंदिरों में जाकर पूजा आदि की थी। ऋषि सुनक ने तो खुलकर हिंदू देवी देवताओं के बारे में श्रद्धापूर्वक बात की थी। 

एक तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बंगलादेश में हिंदुओं पर होनेवाले अत्याचार पर खुलकर बोल और लिख रहे हैं वहीं दूसरी तरफ हमारे देश में कई दलों के नेता इस मुद्दे पर खामोशी ओढे हुए हैं। जब भी बंगलादेश में हिंदुओं पर होनेवाले अत्याचार की चर्चा होती है और इन दलों के नेताओं या प्रवक्ताओं से इस बाबत प्रश्न पूछा जाता है तो वो अपने उत्तर के साथ साथ फिलस्तीन का मुद्दा भी उठा देते हैं। वो ये भूल जाते हैं कि फिलिस्तीनी आतंकवादियों ने इजरायल में घुसकर ना केवल नरसंहार किया बल्कि सैकड़ों बच्चों और महिलाओं को बंधक भी बना लिया था। इस क्रिया की प्रतिक्रिया में फिलस्तीन पर इजरायल हमले कर रहा है। इससे उलट बंगलादेश में तो हिंदुओं ने किसी प्रकार की कोई हिंसा नहीं की। उनपर तो वहां के बहुसंख्यकों ने अकारण हमले किए। हिंदुओं की हत्या की गई। मंदिरों को तोड़ा गया। जब भारत के सभी राजनीतिक दलों को इस हमले के खिलाफ एक स्वर में बोलना चाहिए था उस वक्त ये किंतु परंतु में अटके रहे। अब भी हैं। इसका कारण क्या हो सकता है। एक वजह है वोटबैंक की राजनीति। जो दल अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों की राजनीति करते हैं उनको लगता है कि बंगलादेश में हिदुओं पर हो रहे हमलों का विरोध करने से उनका वोटबैंक दरक सकता है। इस कारण वो हिंदुओं पर होनेवाले हमले को लेकर तटस्थ हो जाते हैं। धर्म और राजनीति के घालमेल की आड़ लेते हैं। तर्क होता है कि धर्म को राजनीति से अलग रखना चाहिए। इस तर्क को इकोचैंबर में बैठे तथाकथित बुद्धिजीवी हवा देते हैं। ऐसा माहौल बनाते हैं कि राजनीति से धर्म को अलग रखना चाहिए। दरअसल इकोचैंबर वाले बुद्धिजीवी ये नहीं समझ पाते कि मार्क्स ने जिस धर्म की बात की थी और जो भारत का धर्म है वो दोनों बिल्कुल अलग हैं। 

आज पूरी दुनिया हिंदुओं की ओर देख रही है। वो सनातन धर्म को समझना चाहती है। हिंदुओं की उस जीवन शैली को समझना चाहती है जिसकी इकाई परिवार है। एकल परिवार से ऊब चुकी दुनिया भारतीय परिवारों और उनके बीच के लगाव को समझना चाहती है। संस्कारों के बारे में जानने को उत्सुक है। हिंदू धर्म और अध्यात्म को लेकर वैश्विक स्तर पर एक रुझान देखा जा रहा है। ऐसे में अपने देश में हिंदुओं और उनके ग्रंथों को लेकर और सनातन पर अपमानजनक टिप्पणियां करनेवालों को पुनर्विचार करना चाहिए। जब पूरी दुनिया हिंदुओं की ओर देख रही है ऐसे में अपने ही देश में हिंदुओं को लेकर घृणा भाव बहुत दिनों तक चलनेवाला नहीं है। हिंदू धर्म में जो भी कुरीतियां हों उसको दूर करने का सामूहिक प्रयास किया जाना चाहिए। ऐसा पहले होता भी रहा है। हिंदू समाज के अंदर से ही कोई ना कोई सुधारक आता है जो कुरीतियों पर प्रहार करता है और वृहत्तर हिंदू समाज उसको स्वीकार करता है। कुरीतियों और रूढ़ियों के आधार पर हिंदू समाज को बांटने का जो षडयंत्र चल रहा है उसका निषेध हिंदू समाज ही करेगा। अगर कोई सोचता है कि हिंदू समाज को अपमानित करके अपने वोटबैंक को मजबूत कर लेगा तो वो गलतफहमी में है। हिंदू एकता पर पहले भी बातें होती रही हैं, साहित्य में भी इसके उदाहरण मिलते हैं और इतिहास में भी। रामचंद्र शुक्ल से लेकर शिवपूजन सहाय और रामवृक्ष बेनीपुरी के लेखन में हिंदुओं को संगठित होने की अपेक्षा की गई है। यह अकारण नहीं है कि आज प्रबुद्ध हिंदू समाज भी इस ओर सोचने लगा है। सहिष्णुता हिंदुओं का एक दुर्लभ गुण है लेकिन सहिष्णुता को अगर निरंतर छेड़ा या कोंचा जाएगा तो एक दिन उसकी प्रतिक्रिया तो होगी ही। स्वाधीनता के बाद से ही विचारधारा विशेष के लोगों ने हिंदुओं को अपमानित करने का योजनाबद्ध तरीके से लेकिन परोक्ष रूप से उपक्रम चलाया। ऐसा करनेवाले अब परिधि पर हैं और हिंदू केंद्र में। 


Saturday, October 26, 2024

अमेरिकी चुनाव में धर्म की राजनीति


अपने देश में राजनीति में धर्म के उपयोग की खूब चर्चा होती है। एक विशेष वैचारिक ईकोचैंबर में बैठे कथित विचारक और विश्लेषक इस बात पर चुनाव के समय शोर मचाते हैं। वो राजनीति में धर्म के उपयोग के लिए भारतीय जनता पार्टी को आज से नहीं बल्कि बल्कि इसके गठन के बाद से ही दिम्मेदार ठहराते आ रहे हैं। किसी प्रकार का तर्क नहीं सूझता तो इस तरह के विश्लेषक राम मंदिर मुक्ति के लिए चलाए गए आंदोलन को भी धर्म से जोड़कर कर भारतीय जनता पार्टी पर प्रहार करने से नहीं चूकते। मंदिरों के भव्य और नव्य स्वरूप को देखकर भी इनको धर्म और राजनीति की याद आती है। धर्म के राजनीति में घालमेल को लेकर इसस ईकोचैंबर में बैठे लोग नेतों के मंदिरों में जाने से लेकर टीका लगाने पर टिप्पणी करते हैं। इस संदर्भ में वो अमेरिका और ब्रिटेन का उदाहरण देते हुए सलाह देते हैं कि भारत के राजनेताओं को अमेरिका से सीखना चाहिए। राजनीति में धर्म के कथित घालमेल को ऐसे लोग देश के सामाजिक तानेबाने के लिए खतरा मानते हैं। कई बार तो धर्मनिरपेक्षता को भी इस तरह परिभाषित करते हैं जैसे उसका अर्थ नास्तिकता हो। ईकोचैंबर में बैठे इस तरह के कथित विद्वान या विश्लेषक धर्म को समझने में चूक जाते हैं। संभव है कि समझकर भी ईकोचैंबर को प्राणवायु देनेवाली शक्तियों के प्रति स्वामिभक्ति के कारण गलत व्याख्या करते हों। इस तरह के कथित विद्वान आपको कई देशों में मिलेंगे जो भारतीय मूल के होते हुए भी धर्म को लेकर भ्रमित हैं या भ्रमित होने का दिखावा करते हैं। 

अब जरा अमेरिका चलते हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव प्रचार हो रहे हैं। डेमोक्रैट्स और रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवारों डोनाल्ड ट्रंप और कमला हैरिस के बीच बेहद कड़ा मुकाबला है। कई तरह के सर्वे आ रहे हैं जो इस कड़े मुकाबले में ट्रंप की स्थिति थोड़ी बेहतर दिखा रहे हैं। जो लोग भारत में धर्म के राजनीति में घालमेल को लेकर विलाप करते रहते हैं उनको अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव को देखना चाहिए। वहां किस प्रकार से चुनाव में जीजस क्राइस्ट और क्रिश्चियन धर्म की चर्चा होती है। चुनावी रैलियों में धर्म और आस्तिकता को जोर शोर से उठाया जाता है। राष्ट्रपति पद के दोनों उम्मीदवारों की रैली में बार-बार लार्ड जीजस का नाम गूंजता रहता है। इस समय अमेरिका के राजनेता इंटरनेट मीडिया पर निरंतर आस्था और आस्तिकता को लेकर पोस्ट लिख रहे हैं। अपनी रैलियों में बोल रहे हैं। वहां के समाचारपत्रों में भी उम्मीदवारों के जीजस को लेकर रैलियों में दिए गए बयानों की चर्चा हो रही है। अमेरिका के समाज में धर्म को लेकर जिस प्रकार की बातें की जाती हैं या जिस प्रकार से वहां जीजस और बाइबिल को लेकर श्रद्धा और उसका सार्वजनिक प्रकटीकरण होता है उसको भी देखना चाहिए। चुनावी रैलियों में क्राइस्ट इज किंग और जीजस इज लार्ड जैसे नारे उछाले जा रहे हैं। क्रिश्चियन आबादी में इसको लेकर एक अलग ही तरह का माहैल देखने को मिल रहा है। अमेरिका में जेन जी की बहुत चर्चा है। जो युवा इस चुनाव में वहां पहली बार वोट डालने जा रहे हैं उनमें से कई ने इंटरनेट मीडिया पर लिखा है कि मैं एक प्राउड क्रिश्चियन हूं। पहली बार वोट डालने को लेकर उत्साहित हूं। मैं डोनाल्ड ट्रंप को वोट डालूंगा। इस टिप्पणी में गौर करनेवाली बात ये नहीं है कि वो डोनाल्ड ट्रंप को वोट डालेगा। इस बात को देखा जानिए कि किस तरह वो अपने धर्म को लेकर गौरवान्वित है। जो अमेरिका भारत और भारतीयों को धर्म और कट्टरता पर ज्ञान देता है उस देश के युवा खुलेआम धर्म के आधार पर वोट डालने की बात कर रहा है। लेकिन भारत में वैचारिक ईकोचैंबर में बैठे लोगों को ये नहीं दिखता है। अमेरिकी ज्ञान को लेकर यहां शोर मचाने में लग जाते हैं। हमेशा से भारत के बाहर के विचार को लेकर यहां आरोपित करनेवाले इन कथित बौद्धिकों को ये सोचना चाहिए कि इस देश में आयातित विचार लंबे समय तक नहीं चल सकता है। मार्क्सवाद को लेकर भी एक जमाने में रोमांटिसिज्म दिखता था लेकिन समय के साथ वो रोमांटिसिज्म खत्म हो गया। इसका कारण ये रहा कि मार्क्सवादी भारत और भारतीय विचारों को समझ नहीं सके। 

अगर भारतीय जनता पार्टी का नेता अपने चुनाव प्रचार के समय किसी मंदिर में चले जाएं तो उसकी ये कहकर आलोचना होने लगती है कि वो हिंदुओं को आकर्षित करने के लिए ऐसा कर रहे हैं। अमेरिका में खुलेआम राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार प्रार्थना करते हैं और जीजस के नाम पर लोग उम्मीदवार को आशीर्वाद देते हैं। यहां अगर इस तरह से किसी नेता के लिए प्रार्थना की जाए और उसको धर्म से जोड़ा जाए तो जोड़नेवाले को भक्त या अंध भक्त कहकर उपहास किया जाता है। अपेक्षा ये की जाती है कि धर्म को लेकर हमारी राजनीति उदासीन रहे। क्यों? इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। अगर उत्तर होता भी है तो वो ये कि इससे अल्पसंख्यकों की भावनाओं को ठेस पहुंच सकती है। संविधान का हवाला दिया जाने लगता है। क्या भारतीय समाज धर्म के बिना चल सकता है? उत्तर होगा नहीं। मुझे कई बार ये प्रसंग याद आता है। उस प्रसंग को बताने के पहले नेहरू के बारे में आधुनिक भारत के इतिहासकारों की राय देखते हैं। इतिहासकारों ने इस बात पर बल दिया है कि नेहरू धर्म को शासन से अलग रखना चाहते थे। इतिहासकारों से इस आकलन में चूक हुई। नेहरू को जब लगता था कि सत्ता के लिए धर्म का उपयोग आवश्यक है तो वो बिल्कुल नहीं हिचकते थे। अब उस प्रसंग की चर्चा। 14 अगस्त 1947। शाम के समय दिल्ली में डा राजेन्द्र प्रसाद के घर हवन-पूजा का आयोजन किया गया था। हवन के लिए पुरोहितों को बुलाया गया था। भारत की नदियों से जल मंगवाए गए थे। डा राजेन्द्र प्रसाद और नेहरू हवन कुंड के सामने बैठे। महिलाओं ने दोनों के माथे पर तिलक लगाया। फिर नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद ने हवन किया। पूजा और हवन के पहले नेहरू ने सार्वजनिक रूप से ये स्टैंड लिया था कि उनको ये सब पसंद नहीं है। तब उनके कई मित्रों ने समझाया था कि सत्ता प्राप्त करने का ये हिंदू तरीका है। नेहरू इस हिंदू तरीके को अपनाने को तैयार हो गए थे। इसका उल्लेख ‘आफ्टरमाथ आफ पार्टिशन इन साउथ एशिया’ नाम की पुस्तक में मिलता है। इंदिरा गांधी तो निरंतर मंदिरों में जाती रही हैं। चुनाव हारने के बाद भी और चुनाव के समय भी। कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख है। लेकिन जब से सोनिया गांधी और उसके बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस को संभाला तो धर्म पर ज्यादा ही कोलाहल होने लगा। अब कांग्रेस को अमेरिका में बैठे कुछ लोगों से ज्ञान और योजनाएं मिलने लगी हैं तो ये नैरेटिव और गाढ़ा होने लगा है। पर अब ये समझना होगा कि देश की जनता जागरूक हो चुकी है और धर्म को धारण करने में उनको कोई परेशानी भी नहीं। 


Saturday, August 10, 2024

लोकतंत्र की आड़ में हित साधती शक्तियां


हमारे पड़ोसी देश बंगलादेश में हिंसक आंदोलन के बाद वहां की प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा। ये सबकुछ एक के बाद एक घटना की परिणति रहा। उसके बाद जिस तरह से नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता और बैंकर मोहम्मद यूनुस की अगुवाई में सरकार बनी उससे कई प्रश्न खड़े हो गए। जब शेख हसीना ने देश छोड़ा था, तब सभी विशेषज्ञ इस मत के थे कि बंगलादेश में सेना ही सत्ता सेना संभालेगी। लोकतंत्र को फिर से स्थापित करने में समय लगेगा। उनके अनुमानों के विपरीत मोहम्मद यूनुस की अगुवाई में कार्यवाहक सरकार का गठन हो गया। मंत्री बन गए। सबने शपथ ले ली। कार्य आरंभ हो गया। क्या सबकुछ इतना आसान था। क्या इसकी बिसात पहले से नहीं बिछाई गई थी। बंगलादेश में कट्टरपंथी काफी समय से सक्रिय थे और जमात ए इस्लामी इसकी अगुवाई कर रहा था। पहले तो जमात के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा और फिर इस संगठन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया। आरोप शेख हसीना पर लगे और कहा जाने लगा कि वो तानाशाह हो गई है। वो विरोधियों को जेल भेज देती है। आज जो मोहम्मद यूनुस सरकार के कार्यवाहक प्रमुख हैं उनपर भी बंगलादेश में कई मुकदमे चल रहे हैं। एक मामले में तो उनको छह महीने की सजा भी हो चुकी है। इन सब मामलों को लेकर शेख हसीना सरकार के खिलाफ वातावरण बनाया गया। वातावरण बनाने में विदेश से सक्रिय संगठनों और इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म की बड़ी भूमिका रही। खास तौर पर उन संस्थाओं और संगठनों की जो अमेरिका से अपना कारोबार चलाते हैं। बंगलादेश में जिस तरह से माहौल बनाया गया उसी तरह का माडल कई अन्य देशों में भी देखा जा चुका है। इस माडल में होता ये है कि अगर उनकी पसंद की सरकार नहीं बनी तो उसको बदलने के लिए ये संस्थाएं अपना अलगोरिदम बदल देती हैं। सरकार के विरोध वाली पोस्ट अधिक दिखती हैं और समर्थन वाली पोस्ट को बाधित कर देते हैं। किसी एक छोटी घटना को इतना बड़ा कर दिया जाता है कि जनमत सरकार के विरोध में हो जाती है। पर ये तो किसी के हाथ के औजार भर हैं। 

योजना इस तरह से बनाई जाती है कि पहले इंटरनेट मीडिया के माध्यम से देश में सत्ता विरोधी माहौल बनाया जाए। माहौल बनाने के लिए चौतरफा व्यूह रचना की जाती है। किसी छोटे केस को इतना प्रचारित करवाया जाए कि लगे देश के सामने वही सबसे बड़ा मुद्दा है। फिर किसी नेता से उस घटना के विरोध में बयान दिलवाया जाता है। शासक को तानाशाह बताकर उसकी छवि गढ़ने का प्रयत्न किया जाता है। डिजीटल के माध्यम से इस तरह के बयानों को प्रसारित और प्रचलित करवा कर इस छवि को गाढ़ा करवाया जाता है। लोकतंत्र को बचाने की आड़ में ये सारा खेल खेला जाता है। अंतत:  इस तरह की कथित क्रांतियों से लोकतंत्र कमजोर ही होता है। हमें अरब स्प्रिंग को याद करना चाहिए। 2010 के आसपास मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका के देशों में अरब स्प्रिंग का खेल हुआ। इस क्षेत्र में कुछ देशों की सरकारों के मुखिया को तानाशाह बताकर डिजीटल के माध्यम से उनको गिराने की व्यूह रचना कि गई। 17 दिसंबर 2010 में ट्यूनीशिया में हुई घटना को याद करने की आवश्यकता है। एक ठेलेवाले के साथ हुए व्यवहार के कारण विरोध का स्वर उठा और पूरे देश में इतनी तेजी से फैला कि वहां के राष्ट्रपति को 14 जनवरी 2011 को देश छोड़कर भागना पड़ा। उसके बाद देश में लोकतंत्र की स्थापना के नाम पर तरह तरह की बातें होती रही। कभी कोई कार्यवाहक बना तो कभी कोई। सालभर तक ये सब चला रहा और फिर एक मानवाधिकार कार्यकर्ता को राष्ट्रपति बनाया गया। फिर वहां इस्लामिक कट्टरपंथियों, कथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों और अरब स्प्रिंग के पहले के राष्ट्रपति के समर्थकों में संघर्ष आरंभ हुआ। अबतक चल रहा है। कभी समय पर चुनाव हो जा रहे हैं कभी नहीं। लोकतंत्र स्थापित करने के नाम पर जो हुआ वो सबके सामने है। 

ये सिर्फ ट्यूनीशिया की कहानी नहीं है। ऐसा कई देशों में हुआ। सब जगह सत्ता परिवर्तन की स्क्रिप्ट एक जैसी है। हमार देश में 2024 के चुनाव में जिस तरह से चुनाव प्रचार के दौरान इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स ने अपना अलगोरिथम बदला, जिस तरह से मोदी विरोधियों को प्रमुखता मिली वो एक अलग शोध की मांग करता है। डिजीटल और सोशल सेक्टर को साथ लेकर जिस तरह से सरकार बनाने और गिराने का अंतराष्ट्रीय खेल खेला जाता है उसके बारे में सार्वजनिक रूप से चर्चा होनी चाहिए। रूस-यूक्रेन युद्ध के आरंभ होने क बाद पश्चिमी देशों को और दुनिया की महाशक्ति होने का दावा करनेवाले देशों को भारत का स्थायित्व और उसकी वैश्विक मंच पर बढ़ती धमक गले नहीं उतर रही थी। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि भारत का विदेश मंत्री पश्चिम को कहे कि यूरोप की समस्या पूरी दुनिया की समस्या नहीं हो सकती। भारत अपने निर्णय के लिए अपनी जनता का हित देखने लगा था, पश्चिम का मुंह जोहना छोड़ दिया था। परिणाम 2024 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला। नरेन्द्र मोदी को तानाशाह बताया गया। नागरिक अधिकारों की कटौती औक संविधान बदलने जैसे विमर्श आरंभ हुए। मोदी भले ही बहुमत से दूर रह गए लेकिन सरकार बदलने का मंसुबा पाले बैठी वैश्विक ताकतों को मुंह की खानी पड़ी। अभी अमेरिकी चुनाव को देख लीजिए तो वहां कमला हैरिस जिस तरह के बयान दे रही हैं उससे मिलते जुलते बयान यहां भी लोकसभा चुनाव के समय सुनाई देते थे। 

ऐसा नहीं है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ये वैश्विक ताकतें निष्क्रिय हो गई हैं। हमारे देश में वो अब भी सक्रिय हैं। सरकार विरोधी माहौल बनाने में जुटी हैं। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। इन वैश्विक ताकतों को लगता है कि भारत को कमजोर करने का यही तरीका है कि चुनी हुई सरकार के खिलाफ जनता में आक्रोश पैदा करो। इसके लिए वो छात्रों का, अदालतों का, नीति निर्धारकों का सहारा लेते हैं। अभी बंगलादेश में मोहम्मद यूनुस को स्थापित करने के लिए अमेरिका के सामाजिक कार्यकर्ता, कुछ सीनेटर और विचारक एक्स पर अपनी राय रख रहे हैं। उनकी पोस्ट को पढ़ने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि मोहम्मद यूनुस बंगलादेश के उद्धारक हैं। दरअसल अमेरिका और अन्य वैश्विक ताकतों को दुनिया के अन्य देशों में अपनी चौधराहट स्थापित करने के लिए ये सब करना पड़ता है। वो चाहते हैं कि अन्य देशों की सरकार उनके मुताबिक चले। उनके व्यापारिक और सामरिक हितों की रक्षा होती रहे। किसी देश में अंदरुनी गड़बड़ी होगी तो उनको दखल देने का अवसर मिलेगा। चाहे वो इराक हो, लीबिया हो,सुडान हो या अन्य देश। पाकिस्तान चूंकि अब उनके किसी काम नहीं रहा तो इन शक्तियों ने बंगलादेश को अपना नया ठिकाना बनाने की योजना पर कार्य किया। लोकतंत्र के नाम पर चलनेवाले इन कथित आंदोलनों के अगुवा इन वैश्विक शक्तियों के हाथों की कठपुतली मात्र हैं। कठपुतलियां वही करती हैं जो उनकी डोर थामनेवाला चाहता है। बंगलादेश से लेकर भारतीय राजनीति में इस तरह की कई कठपुतलियां दिख रही हैं। 


Saturday, June 22, 2024

लोकतंत्र को कमजोर करने की रणनीति


लोकसभा चुनाव संपन्न होने के बाद अब पूरे देश की निगाहें संसद के आगामी सत्र पर है। अपनी आंशिक सफलता के उत्साहित विपक्ष सरकार को घेरने के लिए कमर कस चुका है। उधर मोदी के नेतृत्व में बनी सरकार अपने निर्णयों से ये आभास देने की भरपूर कोशिश कर रही है कि भले ही सरकार गठबंधन की हो लेकिन सबकुछ मोदी स्टाइल में ही हो रहा है। चुनाव संपन्न के होने के बाद से विपक्ष निरंतर नए नए मुद्दे उठाकर सरकार को घेरने का प्रयत्न कर रही है। 4 जून को चुनाव के नतीजे आए थे तब विपक्ष के किसी नेता ने ईवीएम को लेकर प्रश्न नहीं उठाए थे। नरेन्द्र मोदी ने ही सांसदों की बैठक में व्यंग्य किया था कि बेचारी ईवीएम बच गई। मोदी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 240 सीटें मिली हैं। इस बात को याद रखा जाना चाहिए कि पिछले दस वर्षों में से देश में मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार चल रही थी। चुनाव संपन्न होने के बाद कुछ ऐसे बिंदु हैं जिसपर विचार किया जाना आवश्यक है। चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने संकेत किया था कि विदेशी ताकतें चुनाव को प्रभावित करने के लिए सक्रिय हैं। तब मोदी के उस वक्तव्य पर पर्याप्त चर्चा नहीं हुई थी। अब जबकि देश में सरकार बन चुकी है, मंत्रिमंडल का गठन हो चुका है तो चुनाव के दौरान की कुछ घटनाओं और उसके पहले की पृष्ठभूमि की चर्चा करना उचित प्रतीत होता है। देश में चुनाव के पहले अमेरिकी खरबपति जार्ज सोरोस के बयान को याद किया जाना चाहिए। 2020 में उसने मोदी को तनाशाही व्यवस्था का प्रतीक बताया था। फिर अदाणी को लेकर उसने मोदी पर हमला किया था और कहा था कि ये मुद्दा भारत में लोकतांत्रिक परुवर्तन का कारण बनेगा। इसके बाद भी कई तरह की खबरें इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित हुईं जिसमें कहा कि जार्ज सोरोस भारत में होनेवाले लोकसभा चुनाव को प्रभावित करने का प्रयास कर रहा है। निवेश भी। अमेरिका जिस तरह की राजनीति करता है उसमें वो वैश्विक स्तर पर अपने प्रभाव और दबदबे को कायम रखने के लिए हर देश में परोक्ष रूप से दखल देता रहता है।

अमेरिकी नेतृत्व चाहता है कि दुनिया में किसी भी देश में कमजोर सरकार बने ताकि वो देश अमेरिका की मदद पाने के लिए जतन करता रहे। कूटनीतिक कदमों से लेकर रणनीतिक निर्णय लेने के पहले अमेरिका से चर्चा करे। ऐसी स्थिति में अमेरिका को अपने देश और व्यापारिक हितों की रक्षा करने में सहूलियत होती है। 2014 में मोदी सरकार के बनने और 2019 में अधिक मजबूती से वापस आने के बाद नरेन्द्र मोदी ने वैश्विक मंच पर भारत के हितों को प्राथमिकता पर रखना आरंभ कर दिया। मोदी ने भारतीय प्रवासियों की शक्ति को भी देशहित में उपयोग करना आरंभ कर दिया। ये बातें अमेरिका को नागवार गुजरने लगीं। 2019 के सितंबर में प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका के ह्यूस्टन में हाउडी मोदी नाम के एक कार्यक्रम में भाग लिया था। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी उस कार्यक्रम में आए थे। वहां अबकी बार ट्रंप सरकार का नारा लगा था। उस नारे के बाद अमेरिकियों के कान खड़े हो गए थे। उनको लगने लगा था कि जो काम आजतक परोक्ष रूप से अमेरिका करता था वही काम भारत उनके देश में सरेआम कर रहा है। अमेरिका में प्रवासी भारतीयों की संख्या काफी अधिक है और उनमें से अधिकतर प्रधानमंत्री मोदी के समर्थक माने जाते हैं। प्रवासी भारतीय अमेरिकी चुनाव में कई सीटों पर परिणाम को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। 

वैश्विक राजनीति पर नजर रखनेवाले विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप की हार के बाद जब जो बिडेन राष्ट्रपति बने तो भारत की राजनीति एजेंसियों की प्राथमिकता पर आ गया। वहां की एजेंसियां कारोबारियों और स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से दूसरे देशों की गतिविधियों में निवेश करती है और अपने मनमुताबिक नैरेटिव चलाती है, काम करवाती है। ऐसे कई अमेरिकी फाउंडेशन हैं जो शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत में स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से निवेश करती रही हैं जो परोक्ष रूप से आंदोलन और नैरेटिव बनाती हैं। मोदी सरकार ने पिछले दस वर्षों के अपने कार्यकाल में ऐसे सरोगेट निवेश पर अंकुश लगाया। इस कारण कई वैश्विक संस्थाएं मोदी विरोध में आ गईं। जिस तरह के किसान आंदोलन के समय विदेशी सेलिब्रेटी इसके समर्थन में उतरीं, जिस तरह से शाहीन बाग धरने को सेलेब्रिटी के जरिए चर्चित बनाने का कार्य किया गया, उसको रेखांकित किया जाना चाहिए। अगर इस क्रोनोलाजी को देखते हैं तो एक और चीज नजर आती है कि 2019 के बाद से अमेरिकी इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स ने ऐसा एलगोरिथम बनाया जिसमें मोदी विरोधी नैरेटिव व्यापक स्तर पर फैल सके। ये अब भी चल रहा है।  

अब एक ऐसी दिलचस्प घटना की चर्चा कर लेते हैं जो राहुल गांधी से जुड़ी हुई है। राहुल गांधी रायबरेली से चुनाव लड़ेंगे या अमेठी से इसको लेकर कयास का दौर चल रहा था। इस बीच कांग्रेस पार्टी ने 30 अप्रैल को एक्स पर एक वीडियो लांच किया जिसमें बताया गया कि शतरंज और राजनीति में विरोधियों की चाल में भी संभावना होती है। तीन मई को दोपहर राहुल गांधी रायबरेली से नामांकन करते हैं। तीन मई को ही एक्स पर एक व्यक्ति ने तंज करते हुए गैरी कास्परोव को टैग किया। इसपर गैरी कास्परोव ने उत्तर दिया कि पारंपरिक तरीका तो यही कहता है कि पहले आप रायबरेली से चुनाव जीतें फिर शीर्ष को चुनौती दें। उसके एक दिन बाद फिर से गैरी कास्परोव ने कोट करते हुए एक्स पर लिखा कि उनके पोस्ट को किसी की वकालत न समझा जाए लेकिन मेरे जैसे 1000 आंखों वाला शैतान, जैसा मेरे बारे में कहा जाता है, बगैर गंभीर हुए मेरे खेल में हाथ न आजमाने की सलाह देता है । चार जून को रायबरेली का चुनाव परिणाम आया। राहुल गांधी वहां से जीते। थोड़े दिनों बाद रायबरेली से ही सांसद बने रहने की घोषणा कर दी। तीन मई की टिप्पणी के बाद से गैरी कास्परोव ने आजतक भारतीय राजनीति पर कोई टिप्पणी नहीं की। तीन मई को कैस्परोव के ट्वीट के बाद एक नैरेटिव बना कि पहले रायबरेली जीतो फिर शीर्ष को चुनौती देना। रायबरेली जीत कर शीर्ष याने मोदी को चुनौती देने का प्रयास कर रहे हैं। 

चुनाव समाप्त होने के बाद राहुल गांधी ने अयोध्या में भारतीय जनता पार्टी की हार और वाराणसी में मोदी की जीत का अंतर कम होने पर एक उत्सवी बयान दिया। अयोध्या-फैजाबाद लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी की पराजय को हिंदुत्व की पराजय के तौर पर दिखाने का प्रयास किया जा रहा है। अयोध्या की हार हिदुत्व की नहीं बल्कि स्थानीय कारकों के कारण हुई। तमाम वैश्विक कारस्तानियों के बावजूद मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी होकर उभरी। मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। आज जब हमारे देश का लोकतंत्र मजबूत हो रहा है। संविधान बदलने का नैरेटिव चलाकर फिर से समाज को समूह में बांटने का काम किया जा रहा है। तो एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से खड़ा होता है कि समाज को बांटकर देश को कमजोर करने में किसका हित सधेगा। 


Saturday, July 11, 2020

पत्र और पुस्तक से चुनावी दांव


नवंबर में अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव होना है। वहां चुनाव की सरगर्मियां बहुत तेज हो रही हैं। कोरोना के भयावह संकट से जूझ रहे देश में भी राजनीति के दांव-पेंच तो अपनी गति से चल ही रहे हैं लेकिन राजनीति से इतर वो गतिविधियां तेज हो गई हैं जो राजनीति को प्रभावित करती हैं। राष्ट्रपति के चुनाव के पहले उम्मीदवारों के बारे में पुस्तकें प्रकाशित होने का चलन रहा है। कभी किसी के पक्ष में तो कभी किसी को ध्वस्त करने की मंशा से पुस्तकें लिखी जाती रही हैं। चुनाव के मौसम में इस तरह की पुस्तकें बिकती भी हैं। पुस्तकों की बिक्री से प्रकाशक भी उत्साहित होते हैं और वो भी चुनाव के वक्त ऐसे लेखकों की तलाश में रहते हैं जो राष्ट्रपति के उम्मीदवार के करीब हों और उनके बारे में कुछ विस्फोटक लिख सकें। इसके अलावा पिछले दो तीन दशकों से वहां के चुनाव में लेखकों की आड़ में भी राजनीति शुरू हुई है। अमेरिका में डेमोक्रैट और रिपब्लिकन के समर्थक लेखक अपने-अपने उम्मीदवारों के समर्थन में प्रत्यक्ष या परोक्ष अपील भी जारी करते रहे हैं। अब जब इसी वर्ष नवंबर में अमेरिका में राष्ट्रपति पद का चुनाव होना है तो वहां पुस्तकें भी छपने लगी हैं और अपील भी जारी होने लगे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका का राष्ट्रपति बने लगभग चार साल होने को आए लेकिन इसके पहले वहां के बुद्धिजीवियों को ये याद नहीं आया था कि पूरी दुनिया में अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदी लगाई जा रही है या स्वतंत्र राय व्यक्त करने पर सत्ता द्वारा परेशान किया जाने लगा है।

कुछ दिनों पहले अमेरिका और वहां की संस्थाओं से संबद्ध डेढ सौ बुद्धिजीवियों, स्तंभकारों, नाटककारों, लेखकों ने एक पत्र जारी किया। उन्होंने पूरी दुनिया में स्वतंत्र राय रखनेवालों को हो रही मुश्किलों पर चिंता जताते हुए उदारवादी शक्तियों पर अनुदारवादी ताकतों के प्रबल होते जाने के खतरे को रेखांकित किया है। इस पत्र पर हस्ताक्षऱ करनेवालों में हैरी पॉटर सीरीज की लेखिका जे के रॉलिंग से लेकर बुकर पुरस्कार प्राप्त उपन्यासकार, कहानीकार और कवयित्री के रूप में पूरी दुनिया के साहित्य जगत में समादृत मार्गेट अटवुड, वामपंथियों के ‘परम श्रद्धेय’ विचारक नोम चोमस्की, विवादास्पद लेखक सलमान रशदी के अलावा भी कई नामचीन हस्तियां शामिल हैं। इन सबलोगों की चिंता ये है कि पूरी दुनिया में स्वतंत्र विचारों का विनिमय बाधित किया जा रहा है ।ये मानते हैं कि स्वतंत्र विचारों का विनिमय उदारवादी समाज की प्राणवायु है और इसपर प्रतिबंध लगाने की परोक्ष कोशिशों से अनुदारवादी समाज की तरफ बढ़ रहे हैं। इस पत्र में असहिष्णुता का मुद्दा भी उठाया गया है और अमेरिकी समाज में बढ़ती असहिष्णुता को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है। इस अपील के बाद अमेरिका में सोशल मीडिया पर इसको लेकर घमासान छिड़ गया। कुछ लोगों ने अमेरिका में ‘स्थगित संस्कृति’ का जुमला उछाला। हलांकि इस पत्र पर हस्ताक्षर करनेवाले चंद लोगों ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जेनिफर बॉयलेन ने तो ट्वीट करके कहा कि वो नहीं जानती कि उनके अलावा और किसने इसपर हस्ताक्षर का है, वो तो ये समझ रही थीं कि ये अपील इंटरनेट पर होनेवाले दुर्व्यवहार के विरोध में है। इतिहासकार केरी ग्रीनिज तो इससे भी एक कदम आगे चली गईं और साफ किया कि वो हार्पर पत्रिका में छपे पत्र से सहमत नहीं हैं। केरी ग्रनिज के इस विरोध के बाद हार्पर ने उनका नाम इस पत्र से हटा भी दिया। दरअसल ये वामपंथी रुझानवाले लेखकों और बुद्धिजीवियों की अपनी विचारधारा वाले राजनीति दल को समर्थन करने का एक औजार मात्र है। इसमें वो समाज में अपनी साख का उपयोग अपनी विचारधारा को मजबूत करने और उस विचारधारा के आधार पर चलनेवाले राजनीतिक दलों को फायदा पहुंचाने के लिए करते हैं। हमारे देश ने भी चुनाव के समय बुद्धिजीवियों, नाटककारों, फिल्मकारों के कई ऐसे पत्र या अपील देखे हैं।
अमेरिका में जो पत्र जारी किया है उसमें वैश्विक स्तर पर अनुदारवादी विचार के मजबूत होने को लेकर चिंता जताई गई है। लेकिन नोम चोमस्की जैसे लोग भी ये भूल जाते हैं कि रूस के राष्ट्रपति पुतीन ने अब से कुछ दिनों पहले ही ही कहा था कि ‘उदारवादी विचार को जनता ने नकारना शुरू कर दिया है। अब वो दौर आ गया है कि उदारवादी किसी को भी किसी भी समय इस अवधारणा की आड़ में कुछ भी करने को मजबूर नहीं कर सकते हैं। पिछले कई दशकों के दौरान उदारवाद के नाम पर लोगों को तरह तरह के आदेश देकर सत्ता से अपने हिसाब से काम करवाया। उदारवाद के नाम पर अराजकता की इजाजत कतई नहीं दी जा सकती है। पुतीन का मानना है कि उदारवाद का सिद्धांत किसी भी देश के बहुमत के अधिकारों के खिलाफ जाता है, लिहाजा अब वो अर्थहीन हो चुका है।‘   पुतीन ने तब उदारवादी व्यवस्था की कमियों को लेकर बेहद आक्रामक तरीके से अपनी बातें रखी थीं। इस आलोक में अगर इन बुद्धिजीवियों की चिंता को देखें तो वो महज एक चुनावी दांव ही नजर आता है। 
अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के पहले पुस्तकों का प्रकाशन भी शुरू हो गया है। चंद दिनों पहले ही राष्ट्रपति ट्रंप की भांजी मैरी एल ट्रंप की एक पुस्तक आई है, ‘टू मच एंड नेवर एनफ, हाउ माई फैमिली क्रिएटेड द वर्ल्ड्स मोस्टडेंजरस मैन’ जिसमें ट्रंप के कई राज खोलने का दावा किया गया है। मैरी ट्रंप ने अपनी इस पुस्तक में अपने पारिवारिक झगड़ों और रिश्तों के बनने-बिगड़ने की कथा लिखी है। किताब खूब बिक भी रही है। इसके विवादास्पद अंश भी अमेरिका समेत पूरी दुनिया के अखबारों में छप रहे हैं। जैसा की पुस्तक के नाम से ही जाहिर है कि लेखिका ने किताब में क्या लिखा होगा। इस पुस्तक के विवादास्पद अंशों को लेकर अमेरिका में राजनीतिक बयानबाजी भी हो रही है। अमेरिका के चुनावी इतिहास को देखते हुए इस बात की संभावना है कि इस तरह की कई किताबें नवंबर के पहले प्रकाशित होंगी।
जब से हमारे देश में चुनाव लड़वाने वालों की पूछ बढ़ी है, जो आंकड़ों के अलावा चुनावी माहौल बनाने का वैज्ञानिक तंत्र खड़ा करने का दावा करते हैं, तब से यहां भी चुनाव के पहले पुस्तकों का प्रकाशन या बुद्धिजीवियों, फिल्मकारों या नाटककारों से अपील करवाने का चलन बढ़ा है। मतलब कि अमेरिका की तर्ज पर उन चुनावी औजारों का यहां भी उपयोग होने लगा है। हमारे देश में भी चुनावों के पहले असहिष्णुता का मुद्दा एक बार अवश्य उठता है। 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले तो चुनाव को ध्यान में रखकर किताबें भी लिखी भी गईं और प्रकाशित भी हुईं। चुनाव के पहले ‘व्हाई आई एम अ हिंदू” से लेकर ‘व्हाई आई एम अ लिबरल’ जैसी पुस्तकें प्रकाशित हुईं। उदारवादियों ने 2014 के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार अनुदारवादी है। दो हजार चौदह से लेकर दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव तक ये भी कहा जाता रहा कि सरकार में अनुवादरवादी शक्तियां प्रबल हैं। केंद्र सरकार पर तानाशाही से लेकर फासिज्म तक के आरोप जड़े जाते रहे। लेकिन चुनाव लड़वाने वाले और जितवाने वाले चाहे जितना दावा करें लेकिन जनता के मानस को समझने की जो दृष्टि जमीन से जुड़े नेताओं में होती है वो इन चुनावी मैनेजरों के पास नहीं होती। इसलिए न तो अमेरिका के चुनाव में अपील और किताबों के प्रकाशन का बहुत असर दिखता है और न ही भारत दो आम चुनाव में दिखा।

Tuesday, November 24, 2015

चुनिंदा खामोशी, नपुंसक कलम

अभी हाल में कई खबरें आई जिसपर हमारे देश के प्रगतिशील साहित्यकारों का ध्यान लगभग नहीं के बराबर गया । चीन के एक विश्वविद्यालय ने अपने छात्रों के लिए एक फरमान जारी किया । इस फरमान के मुताबिक कैंपस में कोई लड़का या लड़की एक दूसरे के हाथ में हाथ डालकर नहीं चल सकते हैं । इसी फरमान में ये भी आदेश दिया गया कि लड़का-लड़की एक दूसरे के कंधे पर हाथ भी नहीं रख सकते हैं और उनको एक दूसरे को खाना खिलाने पर भी पाबंदी लगाई गई । इसके अलावा भी इस फरमान में कई ऐसी बातें हैं जो बालिग छात्र-छात्राओं के फैसले लेने पर बाधा बनती है । चीन के एक विश्वविद्यालय का ये फैसला एक खबर की तरह आया और चला गया । देश में हर बात पर प्रगतिशीलता को गले में मैडल की तरह जाल कर घूमने वाले बुद्धिजीवी या लेखक संगठनों के मुंह से चूं तक नहीं निकली । किसी को निजता का हनन नजर नहीं आया । प्रगतिशील जमात में से किसी ने चीनी विश्वविद्यालय के इस फैसले पर विरोध नहीं जताया, बयान जारी करने तक की औपचारिकता नहीं निभाई गई । दूसरा मसला भी चीन का ही था । चीन के कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमेटी ने एक बार फिर से अजीबोगरीब फरमान जारी कर पूरी दुनिया को चौंका दिया है । वहां के शासक दल के नए हुक्मनामे के मुताबिक पार्टी कॉडर के गोल्फ खेलने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है । तर्क यह दिया गया है कि इससे भ्रष्टाचार को रोकने में मदद मिलेगी । चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमिटी के नए फरमान के मुताबिक पार्टी के करीब पौने नौ करोड़ सदस्यों के लिए जिस आठ सूत्रीय नैतिक फॉर्मूले को जारी किया गया है उसमें गोल्फ के अलावा होटलों में अधिक खाने पीने की मनाही तो है ही विवाहेत्तर संबंधों पर रोक भी लगा दी गई है । गोल्फ से तो कम्युनिल्ट पार्टी का पुराना बैर रहा है । माओ ने इसको बुर्जुआ खेल मानते हुए इसपर पाबंदी लगाई थी । उसके बाद देंग के शासनकाल में गोल्फ को अनुमति मिली थी लेकिन लगातार इस खेल के खिलाफ चीन में मुहिम चलती रही । चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के इस नए निर्देशों के बाद पूरी दुनिया में मानवाधिकार को लेकर सचेत लोगों ने विरोध के स्वर तेज कर दिए हैं लेकिन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को मानवाधिकार की कहां फिक्र है । सेंट्रल कमटेी ने अपने कॉडर से साफ तौर पर कहा है कि वो व्यक्तिगत बातों को पार्टी के साथ साझा करें और फैसले की जिम्मेदारी पार्टी पर छोड़े । कार्यकर्ताओं की रुचि से लेकर उसकी व्यक्तिगत जिंदगी तक तो पार्टी के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है । ‘उनका चेयरमैन हमारा चेयरमैन’ का नारा लगानेवाली प्रगतिशील जमात चीन के इस कदम पर खामोश है । ये दोनों मसले चीन के थे में लिहाजा उनके मुंह पर ताला लग गया । जहां से वैचारिक ऊर्जा मिलती हो वहां की हुकूमत के फैसले के खिलाफ कैसे मुंह खुल सकता है । आस्था से लेकर प्रतिबद्धता का सवाल जो ठहरा । प्रतिबद्धता के बौद्धिक गुलामों से ये अपेक्षा भी नहीं की जानी चाहिए कि वो चीन के किसी फैसले के खिलाफ कोई आवाज उठाएंगे । यही फैसला अगर बीजेपी शासित किसी राज्य में हो जाता तो अब तक ये जमात उस राज्य के मुख्यमंत्री समेत देश के प्रधानंमत्री से जवाब तलब कर रहे होते । देश में निजता के दखल को लेकर छाती कूट रहे होते । इस तरह की चुनिंदा प्रतिरोध से ही प्रगतिशील जमात के विरोध को देश की जनता ने गंभीरता से लेना छोड़ दिया । बिहार चुनाव में तमाम वामपंथी दलों ने एकजुट होकर चुनाव लड़ा लेकिन सिर्फ तीन सीटों पर संतोष करना पड़ा । लोकतंत्र में जब साख छीजती है तो जनता की अदालत में यही हश्र होता है ।
अब जरा एक और खबर की ओर नजर डाल लेते हैं । अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में एक नाटक में भारतीय चरित्र के लिए श्वेत अमेरिकी लड़कों के चुनाव के बाद हंगामा मच गया । पश्चिमी पेनसिलवेनिया के एक सरकारी संस्थान में होनेवाले इस लॉयड सुह के इस नाटक को रद्द कर दिया गया । अपने नाटक के मंचन का अधिकार लेखक ने नहीं दिया क्योंकि उनका कहना था कि ये नाटक की मूल भावना के खिलाफ होगा कि श्वेत शख्सियत के चरित्र को कोई अश्वेत निभाए । । उसके बाद पूरे विश्वविद्यालय में नस्लवाद पर बहस शुरू हो गई है । नाटककार लॉयड ने अपने इस नाटक – जीजस इन इंडिया- के रद्द होने को जायज ठहराते हुए कहा कि दक्षिण एशिया के लोगों के चरित्र में गोरे लोगों को दिखाना उचित नहीं होगा । उन्होंने कहा कि ये नाटककार की जिम्मेदारी है कि वो अपने नाटक में जिल रंग के चरित्र को गढ़ता है उसके मंचन के वक्त उसी रंग या नस्ल का कलाकार उस चरित्र को निभाए । नाटक को रद्द करने का फैसला लेने के पहले लॉयड ने विश्वविद्यालय के छात्रों से अभिनय कर रहे छात्रों को बदलने को कहा । बातचीत के बाद नाटकककार लॉयड ने जब यह कह दिया कि श्वेत चरित्र को अश्वेत कलाकार से अभिनय करवाना नाटक के साथ अन्याय होगा । इसके बाद बातचीत टूट गई और नाटक का मंचन रद्द करना पड़ा । इस नाटक के निर्देशक मार्लियो मिशेल ने लेख लिखा और नाटककार को करारा जवाब देते हुए कहा कि ये निर्देशक का फैसला होता है कि वो अपने किस चरित्र में किस अभिनेता से अभिनय करवाए । विश्नविद्यालय ने भी नाटककार के फैसले पर दुख जताते हुए कहा कि इससे छात्रों का दिल टूट गया है और अब वो लॉयड के साथ किसी तरह की बातचीत नहीं करना चाहते हैं । ये खबर भी भारत के अखबारों में छपी लेकिन नस्लभेद की इस संगीन घटना पर हमारे यहां किसी भी कोने अंतरे से आवाज नहीं आई । क्या साहित्य जगत में इस तरह की बातों पर विमर्श नहीं होना चाहिए । क्या दुनिया के किसी कोने में भारत के लोगों के साथ इस तरह का बर्ताव हो तो हमारे देश के बुद्धिजीवियों को खामोश रहना चाहिए ।

भारत में बढ़ते असहिष्णुता का आरोप लगाकर उसके खिलाफ अमेरिका से अपील करनेवालों ने भी नस्लभेद की इस गंभीर घटना पर कुछ नहीं कहा । बात बात पर संयुक्त राष्ट्र में जाने की बात करनेवाले हमारे सियासतदां ने भी इस खबर को गंभीरता से नहीं लिया । भारत में बढ़ रही कथित असहिष्णुकता पर अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के एक बयान को उद्धृत करनेवाले भी खामोश हैं । ये खामोशी बहुत परेशान करनेवाली है । इसी तरह का एक विवाद दो हजार ग्यारह में लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स में पंकज मिश्रा और नील फरग्युसन के बीच हुआ था । दोनों के बीटच नस्लवादी लेखन पर कई अंकों में लेख-प्रतिलेख छपे थे । नील परग्युसन की  किताब- सिविलाइजेशन, द वेस्ट एंड द रेस्ट पर पंकज मिश्रा ने लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स में समीक्षा लिखी थी जिसको लेकर विवाद शुरू हुआ था । उस वक्त भी भारत के लेखक खामोश रहे थे । हमें इन खामोशियों का मतलब समझ नहीं आता है । अगर आप बौद्धिक रूप से ईमानदार हैं, अगर आप किसी विचारधारा की बेड़ियों में जकड़े हुए नहीं हैं तो साहित्यक और सामाजिक मुद्दों पर आपकी कलम वस्तुनिष्ठ होकर चलनी चाहिए । यही कलम जब वस्तुनिष्ठ नहीं रहती है और चुनिंदा प्रतिक्रिया देती है तब पाठकों का विश्वास लेखक से डिगता है । चीन से लेकर अमेरिका से लेकर लंदन तक मे घटी घटनाओं पर लाल कलम पता नहीं क्यों नपुंसक हो जाती है । कलम में वो धार होनी चाहिए वो तेज होनी चाहिए जो कि एक न्यायप्रिय शासक के पास हुआ करती थी । जो बगैर धारा, विचारधारा, संगठन, स्वार्थ, जाति समुदाय आदि को देखे न्याय करता था । कलम को अगर हम किसी खास विचारधारा का गुलाम बनाएंगे या फिर कलम की धार किसी खास समुदाय के समर्थन में उठा करेगी तो समय के साथ उस कलम पर से पाठकों का विश्वास  उठता चला जाएगा । भारत के ज्यादातर प्रगतिशील लेखकों के साथ यही हुआ है । उनकी कलम चुनिंदा मसलों पर चलती रही है । एम एफ हुसैन पर वो बोलते रहे लेकिन तसलीमा पर साजिशन खामोश रहे । हिंदुओं के बीच बढ़ रहे कथित कट्टरता पर उन्होंने जोरदार प्रतिवाद किया लेकिन जब मुस्लिम कट्टरपन की बात आए तो एक अजीब तरह की खामोशी या उदासीनता देखने को मिली । यह दोहरा रवैया प्रगतिशीलों ने जानबूझकर रखा इस बात के तो प्रमाण नहीं हें लेकिन जब कई मसलों पर ऐसा हुआ तो लगा कि इसके पीछे कुछ है । अब वक्त आ गया है कि प्रगतिशील जमात अपने पूर्व के कारनामों पर सफाई दे और ये साफ करे कि उनकी प्रतिक्रिया किन मसलों पर नहीं आई । यह उनके भविष्य के लिए भी अच्छा होगा और लोकतंत्र की मजबूती के लिए भी क्योंकि विचारों का प्रवाह लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करता है । 

Saturday, July 7, 2012

फिडेल का फरेब ?

क्यूबा-फिडेल कास्ट्रो और अमेरिका –जॉन एफ कैनेडी – ये दो ऐसे विषय हैं जिनपर अबतक सैकड़ो किताबें लिखी जा चुकी हैं, हजारों लेख लिखे जा चुके हैं । लेकिन क्यूबा और अमेरिका में शह और मात के खेल में साठ के दशक में जो चालें चली गई हैं अब जाकर उनपर से धीरे-धीरे पर्दा हटने लगा है । अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की हत्या पर भी सैकड़ों लेखकों ने लिखा, कई फिल्में बनीं, अपराध कथा लेखकों ने राष्ट्रपति की हत्या पर उपन्यास लिखे, टीवी निर्माताओं ने कैनेडी की हत्या और कैनेडी-कास्ट्रो संबंधों पर डॉक्यूमेंट्री बनाईं । कैनेडी की हत्या के चालीस साल बाद भी ये एक ऐसा विषय है जो अब भी लेखकों को झकझकोरते हुए चुनौती देता है । कैनेडी की मर्जर मिस्ट्री को लोग दुनिया की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री करार दे चुके हैं । नतीजा यह है कि इस विषय पर हर साल कई नई किताबें आती है जिसका लेखक शोध का दावा करते हुए कुछ नया अन्वेषण का ऐलान करता है । अब अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए में लंबे समय तक लैटिन अमेरिका मामलों के आला खुफिया अधिकारी ब्रायन लैटल की नई किताब- कास्ट्रो’ज सीक्रेट्स : द सीआईए एंड क्यूबा’ज इंटेलिजेंस मशीन- में कई सनसनीखेज खुलासे हुए हैं । ब्रायन का दावा है उन्होंने इस किताब को लिखने के लिए तकरीबन पांच साल तक शोध किया और हजारों दस्तावेज खंगाले । इसके अलावा अमेरिका और क्यूबा के खुफिया एजेंसी के अफसरों से बात की । इस किताब में लेखक का दावा है कि क्यूबा के राष्ट्रपति फिडेल कास्ट्रो को अमेरिका के राष्ट्रपति जे एफ कैनेडी के कत्ल के बारे में पता था और उन्होंने 22 नवंबर 1963 को कैनेडी के कत्ल के बाद झूठ बोला था कि उन्हें इस कत्ल की ना तो कोई जानकारी थी और ना ही आभास । कास्ट्रो ने ये बयान कैनेडी के कत्ल के एक दिन बाद दिया था जिसे उन्होंने अलग अलग जगहों पर कई बार दोहराया भी है । कास्ट्रो ने इस बात से भी इंकार किया था कि कैनेडी के कातिल ओसवाल्ड को वो जानते हैं ।

इस किताब के लेखक ब्रायन ने क्यूबा के पूर्व खुफिया अधिकारी और उसके राजदूतावास में उस वक्त तैनात रहे अफसरों के हवाले से कास्ट्रो के दोनों बयानों को झूठा ठहराया है । ब्रायन ने एक वक्त क्यूबा के डीजीआई इंटेलिजेंस सर्विस के अहम अधिकारी रहे और 1987 में क्यूबा छोड़कर अमेरिका में शरण लेनेवाले फ्लोरेन्टिनो लोम्बार्ड के हवाले से बताया है कि कास्ट्रो को कत्ल की जानकारी थी । लोम्बार्ड के मुताबिक जिस दिन कैनेडी का कत्ल हुआ उस दिन उसको आदेश मिला था कि वो अमेरिका के रेडियो तरंग को पकड़ने के लिए हवाना में लगे एंटिना का रुख मियामी से हटाकर टैक्सास की तरफ कर दें और वहां की हर छोटी बड़ी सूचना से तुरंत ही देश के सर्वोच्च नेता को अवगत कराया जाए। हुक्म देने वाले ने जोर देकर कहा था कि टैक्सास में घटित होनेवाली हर छोटी से छोटी घटना को भी नजरअंदाज नहीं किया जाए । इस हुक्म के चंद घंटों के भीतर ही टैक्सास में अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी को ओसवाल्ड ने गोलियों से भून दिया । लेखक का दावा है कि फ्लोरेन्टिनो लोम्बार्ड ने उन्हें यह भी बताया था कि कास्ट्रो को इस बात की पहले से जानकारी थी कि ओसवाल्ड कैनेडी को गोली मारेगा । इसके अलावा लैटेल ने जो दूसरा परिस्थितिजन्य सबूत पेश किया है वो यह है कि ओसवाल्ड के कैनेडी को मारने के इरादे का भी पता कास्ट्रो को था और क्यूबा का राष्ट्रपति उस शख्स को जानता भी था । कैनेडी के कत्ल के पहले ओसवाल्ड ने क्यूबा के मैक्सिको स्थित दूतावास में क्यूबा जाने के लिए वीजा का आवेदन दिया था जिसे दूतावास ने खारिज कर दिया था । वीजा खारिज होने से खफा ओसवाल्ड ने चिल्लाते हुए कहा था कि मैं कैनेडी को मारने जा रहा हूं और कास्ट्रो के समर्थन में नारे लगाए थे । ये बातें कास्ट्रो को उनके दूतावास अधिकारियों ने बताई थी । बाद में कास्ट्रो ने भी एक डबल एजेंट से हुई बातचीत में इस बात को स्वीकार भी किया था ।

इस किताब में इन दो बातों के आधार पर ये साबित करने की कोशिश की गई है कि कास्ट्रो ने कैनेडी के कत्ल की पहले से जानकारी नहीं होने के बारें में झूठ बोला था । लेकिन लेखक इस बात को लेकर बेहद सावधान हैं कि इस किताब से यह ध्वनित नहीं हो कि कैनेडी के कत्ल की साजिश रचने में कास्ट्रो की कोई प्रत्यक्ष भूमिका थी । ब्रायन ने यह स्वीकार किया है कि - उन्हें नहीं मालूम कि फिडेल कास्ट्रो ने कत्ल का हुक्म दिया था । उन्हें यह भी नहीं मालूम कि कातिल ओसवाल्ड कास्ट्रो के इशारे पर काम कर रहा था । ब्रायन के मुताबिक ये मुमकिन हो सकता है कि ओसवाल्ड कास्ट्रो के इशारे पर काम कर रहा हो लेकिन उन्हें अपने शोध के दौरान इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला । उन्होंने ये साबित करने की कोशिश की है कि फिडेल कास्ट्रो को कैनेडी से अपनी जान का खतरा था । इतिहास में इस बात के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं हैं बगैर अमेरिकी जनता की जानकारी और अमेरिकी कांग्रेस को विश्वास में लिए जॉन और रॉबर्ट कैनेडी ने आठ बार फिडेल के कत्ल की साजिश रची और आठों बार नाकाम रहे । दरअसल फिडेल कास्ट्रो की खुफिया जानकारियां और रणनीति अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और उनकी रणीनित से बेहतर थी । इस वजह से अमेरिका तमाम कोशिशों को बावजूद क्यूबा को झुका नहीं पाया ।
लेकिन ब्रायन लैटल ने की नई किताब - कास्ट्रो’ज सीक्रेट्स : द सीआईए एंड क्यूबा’ज इंटेलिजेंस मशीन में जो बातें क्यूबा के कम्युनिस्ट नेता फिडेल कास्ट्रो के बारे में लिखी गई हैं उसका जिक्र कैनेडी हत्याकांड की जांच कर रही किसी एजेंसी ने नहीं किया । कैनेडी की हत्या की जांच करनेवाली वॉरेन कमीशन, द हाउस असेसिनेशन कमेटी और द चर्च कमेटी ने अपनी जांच के दौरान इन तथ्यों को क्यों नजरअंदाज कर दिया । यह एक बड़ा सवाल है । कैनेडी की हत्या पर अमेरिका में वर्षों से शोध हो रहे हैं।  सरकरी कमीशनों और खुफिया एजेंसियों ने इस हत्याकांड और उसे जुड़े तथ्यों को करीब पचास लाख पन्नों में दर्ज कियया है लेकिन उन पचास लाख पन्नों में इन दो तथ्यों का उल्लेख नहीं होना हैरान करनेवाला है । हो सकता है कि कई सालों बाद जब कुछ और वर्गीकृत सूचनाएं सार्वजनिक हों तो इस बात का खुलासा हो लेकिन फिलहाल ब्रायन की इस किताब ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है कि क्या कैनेडी के कत्ल के मामले में फिडेल कास्ट्रो ने झूठ बोला था ।