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Thursday, October 16, 2025

मासूम आंखों से टपकती मोहब्बत


देश को स्वाधीन हुए एक वर्ष होने को था। स्वाधीनता पूर्व हिमांशु राय और देविका रानी ने जिस बांबे टाकीज की स्थापना की थी उसको चलाने का दायित्व अशोक कुमार ने संभाल लिया था। अशोक कुमार के सामने बांबे टाकीज को फिर से सफल बनाने की चुनौती थी। अशोक कुमार को भूतों के किस्से में काफी रुचि थी। उनके नजदीकी बहुधा अपने साक्षात्कारों में इस बात का उल्लेख करते हैं कि अशोक कुमार को भूतों और पुनर्जन्म में विश्वास था। वो काफी समय से भूत को केंद्रीय थीम लेकर एक फिल्म बनाना चाहते थे। 1948 के मध्य की बात होगी। एक दिन बांबे टाकीज के कुछ कर्मचारी अशोक कुमार के पास पहुंचे और बताया कि परिसर में उन्होंने हिमांशु राय के भूत को देखा है। इसको सुनकर अशोक कुमार की भूत केंद्रित फिल्म बनाने की इच्छा और बलवती हो गई। उसी वर्ष उनके साथ एक और घटना घटी। वे बांबे (अब मुंबई) के निकट एक भूत बंगले के नाम से मशहूर घर में कुछ समय बिताने गए। एक दिन रात में जब वो सोने जा रहे थे तो दरवाजे पर एक महिला ने दस्तक दी। उसने अपनी गाड़ी खराब होने की बात कहकर मदद मांगी। गाड़ी ठीक नहीं की जा सकी। वो गाड़ी वहीं छोड़कर चली गई। देर रात शोर शराबे से अशोक कुमार की नींद खुली। उन्होंने देखा कि वही गाड़ी उनके घर के बाहर खड़ी है। उसमें एक व्यक्ति की लाश पड़ी है। सुबह अशोक कुमार ने अपने नौकर से रात की घटना के बारे में पूछा। नौकर ने उनको बताया कि रात में तो ऐसा कुछ घटा ही नहीं, आप तो आराम से सो रहे थे। वो सपना होगा। घर के बाहर कोई गाड़ी नहीं थी। परेशान अशोक कुमार स्थानीय थाने पहुंचे थे। पुलिसवाले ने पूरी बात सुनने के बाद बताया कि 14 साल पहले इस तरह की एक वारदात वहां हुई थी। एक महिला हत्या करने के बाद लाश गाड़ी में छोड़कर भाग गई थी। भागने के क्रम में दुर्घटना हुई और उसकी मौत हो गई।

अशोक कुमार ने बांबे लौटकर ये पूरा किस्सा कमाल अमरोही को बताया। कमाल अमरोही ने इसके आधार पर एक फिल्मी प्रेम कहानी गढ़ी। इस तरह से आरंभ होती है फिल्म महल। कहानी तैयार होने के बाद बांबे टाकीज के कर्ताधर्ता चाहते थे कि इस फिल्म के लीड रोल में अशोक कुमार के साथ अभिनेत्री सुरैया को लिया जाए। कमाल अमरोही मधुबाला के नाम पर अड़े रहे। अंत में उनकी ही चली क्योंकि वो महल के निर्देशक बनाए जा चुके थे। फिल्म की शूटिंग आरंभ हुई। अक्तूबर 1949 में फिल्म रिलीज की गई। दर्शकों ने इस फिल्म को खूब पसंद किया। इस फिल्म से दो सितारे हिंदी फिल्माकाश पर चमके। मधुबाला और लता मंगेशकर। फिल्म की सफलता ने मधुबाला को शीर्ष अभिनेत्री की पंक्ति में खड़ा कर दिया। लता मंगेशकर का गाया गीत, आएगा आने वाला बेहद लोकप्रिय हुआ। फिल्म में कई बार इस गीत के हिस्से का निर्देशक ने उपयोग किया है। फिल्म की थीम के हिसाब से खेमचंद प्रकाश ने संगीत बनाया। आज भी अगर कोई सस्पेंस सीन दिखाना होता है तो महल का बैकग्राउंड म्यूजिक या उसकी तर्ज पर बनाए गए म्यूजिक का ही उपयोग होता है। खेमचंद प्रकाश जब आएगा, आएगा आनेवाला गीत रिकार्ड कर रहे थे तो लता की आवाज के बावजूद उनके मन-मुताबिक प्रभाव पैदा नहीं हो पा रहा था। लता बार-बार माइक पर गातीं। खेमचंद संतुष्ट नहीं हो रहे थे। वो गीत के आरंभिक को दूर से आई आवाज जैसा रिकार्ड करना चाह रहे थे। अचानक उनके दिमाग में एक आयडिया आया। उन्होंने लता को माइक से दूर जाने को कहा और गाते हुए माइक तक आने को कहा। वो चाहते थे कि गीत की पंक्ति, खामोश है जमाना, चुपचाप हैं नजारे दूर से आती हुई लगे और जैसे ही गायिका आएगा आएगा आनेवाला तक पहुंचे तो वो माइक की समान्य आवाज लगे। लता को माइक से दूर जाकर गाते हुए इस तरह माइक तक आना पड़ता था कि आएगा आएगा माइक पर गा सके। लता मंगेशकर ने अपने एक इंटरव्यू में इस प्रसंग की चर्चा की थी। उन्होंने कहा कि तब तकनीक इतना उन्नत नहीं था और म्यूजिक डायरेक्टर अपने हुनरे से गानों को सजाते थे। कई बार के रिहर्सल के बाद खेमचंद प्रकाश संतुष्ट हुए। आज 75 वर्षों बाद भी ये गाना लोगों की जुबां पर है।

फिल्म में मधुबाला का चरित्र ऐसा गढ़ा गया जिसकी मासूम आंखों से मुहब्बत टपकती थी। चेहरे पर एक भोलापन और प्यार की चमक लिए अभिनेत्री जब पर्दे पर आती तो नायक के साथ दर्शक उसके आकर्षण में बंध जाता। मधुबाला की उम्र भले ही उस समय 16 वर्ष के आसपास थी लेकिन वो एक दर्जन से अधिक फिल्मों में काम कर चुकी थी। अभिनय की बारीकियां उसको पता थीं। इस फिल्म में उसके संवाद अपेक्षाकृत कम हैं। उनकी उपस्थिति और आंखों से बहुत कुछ कह जाना प3भाव छोड़ता है। कमाल अमरोही ने भले ही किस्से का दुखांत रचा, लेकिन जिस तरह के संवाद फिल्म के आखिरी सीन में अशोक कुमार और उनके दोस्त के बीच है वो प्यार की उष्मा से भरपूर है। बिमल राय की एडिटिंग को भी रेखांकित किया जाना चाहिए। कानपुर और इलाहाबाद ( अब प्रयागराज) के बीच चलनेवाली इस हारर मूवी में एक भी हत्या नहीं होती है लेकिन रहस्य और रोमांच भरपूर रूप से बरकरार रहता है।

Sunday, October 13, 2024

देविका रानी के सामने कांपे थे अशोक


सुबह के साढे नौ बजे थे। बांबे टाकीज की एक फिल्म की शूटिंग शुरु होनेवाली थी। बांबे टाकीज के कर्ता-धर्ता हिमांशु राय ने अपनी नई फिल्म में एक नए लड़के को नायक के तौर पर लेने का निर्णय किया था। फिल्म का नाम था जीवन नैया और युवक थे अशोक कुमार। सुबह सुबह जब अशोक शूटिंग के लिए फिल्म के सेट पर पहुंचे तो उनको देखकर हिमांशु राय चौंके। अशोक कुमार ने बेतरतीब तरीके से अपने बाल कटवा लिए थे। हिमांशु राय ने उनसे पूछा कि ये क्या है अशोक? हकलाते हुए अशोक कुछ बोलते इसके पहले ही हिमांशु राय ने हेयर ड्रेसर को बुलाकर कहा कि इनके बाल ठीक करो। विग लगाओ। अशोक ने हिमांशु राय की ओर कातर भाव से देखा, सर कुछ कहना चाहता हूं। हिमांशु राय ने अपने अंदाज में कहा कि बोलो। अशोक ने हिमांशु राय का हाथ पकड़ा और उनको सेट के एक कोने में लेकर जाकर धीरे से बोले कि मैं आपके कहने पर फिल्म में काम तो कर लूंगा पर मुझे नायिका के आलिंगन के लिए मत कहिएगा। वो मुझसे हो नहीं हो पाएगा। क्यों? पूछा हिमांशु राय ने। अशोक चुप रहे तो हिमांशु ने आश्वस्त किया कि ऐसा कोई दृष्य फिल्म में नहीं होगा। उसके बाद मेकअप आर्टिस्ट अशोक को लेकर चली गई। मेकअप और गेटअप ठीक होकर जब अशोक सेट पर पहुंचे तो उनके होश उड़ गए। सामने देविका रानी थीं जिनके साथ उनको पहला ही शाट देना था।

अशोक को निर्देशक ने सीन समझाया। अशोक नर्वस हो रहे थे। हिमांशु राय उनके पास पहुंचे उनके कंधे पर हाथ रखकर बोले कि ये बहुत ही सामान्य बात है कि एक लड़का अपनी प्रेमिका के लिए सोने का हार लाता है और फिर उसके गले में डालता है। तुमको इतना ही करना है। अशोक कुमार हाथ में सोने की चेन लेकर देविका रानी के पास पहुंचते हैं। नायिका के करीब पहुंचते ही वो नर्वस हो जाते हैं और दौड़कर बाथरूम की ओर भाग जाते हैं। थोड़ी देर बाद वापस आते हैं। दृश्यांकन आरेभ होता है। अशोक कांपते हाथों से देविका रानी के गले में हार डालने का प्रयास करते हैं। हार उनकी बालों में उलझ जाता है। फिर से प्रयास करने को कहा जाता है। इस बार निर्देशक शूटिंग नहीं रोकते हैं और अशोक कुमार को कहते हैं कि वो गले में हार डालें। अशोक कुमार ने इतनी जोर से हार पहनाने का प्रयास किया कि देविका रानी के बाल ही खुल गए और फिर निर्देशक ने सर पीट लिया। दरअसल अशोक कुमार दो बातों से बुरी तरह से घबरा रहे थे। एक तो उनके बास की पत्नी नायिका थी, दूसरे उनकी मां ने कह रखा था कि फिल्मों में काम करने जा तो रहे हो लेकिन लड़कियों से दूर ही रहना। आखिरकार ये सीन बाद में शूट करने का निर्णय हुआ। दूसरा सीन कुछ यूं था कि फिल्म का खलनायक अभिनेत्री को छेड़ने की कोशिश करेगा। अशोक कुमार को उसको धक्का देकर गिराना था। निर्देशक ने उनको सीन समझाया। कहा कि वो दस गिनेंगे और जैसे ही दस पूरा होगा धक्का देना था। शाट आरंभ हुआ। निर्देशक ने गिनती आरंभ की। घबराए अशोक कुमार ने दस पूरा होने की प्रतीक्षा नहीं की और खलनायक को धक्का दे दिया। धक्का इतनी जोर का था कि देविका रानी और खलनायक दोनों धड़ाम से फर्श पर गिरे। खलनायक का पांव टूट गया। देविका रानी खिलखिलाते हुए उठ खड़ी हुईं। उस दिन शूटिंग रोकनी पड़ी। 

दरअल अशोक कुमार के जीवन की कहानी बहुत दिलचस्प है। उनका ननिहाल बिहार के भागलपुर में था। उनकी मां ने एक लड़की के साथ उनका रिश्ता तय किया था। लड़की के पिता को जब पता चला कि अशोक कुमार फिल्मों में काम करनेवाले हैं तो उन्होंने रिश्ता तोड़ दिया था। 1934 में अशोक कुमार ने हिमांशु राय की कंपनी बांबे टाकीज में नौकरी आरंभ की थी। हिमांशु राय ने उनको अभिनेता बना दिया। उधर उनकी मां को भी जब पता चला कि उनका बेटा फिल्मों में काम करनेवाला है तो उन्होंने नसीहत दी कि फिल्मी लड़कियों से दूर रहना। 

1938 तक अशोक कुमार की छह फिल्में आ चुकी थीं। फिल्म अछूत कन्या से उनको प्रसिद्धि भी मिल चुकी थी। उधर उनकी मां परेशान थी कि बेटा इतनी लड़कियों के बीच रहता है क्या पता क्या कर ले। वो अपने बेटे की शादी को लेकर चिंतित रहने लगी थी। 1938 के अप्रैल में मुंबई में अशोक कुमार को एक टेलीग्राम मिला जो उके पिता ने भेजा था। उसमें लिखा था जल्द से खंडवा आ जाओ अति आवश्यक है। उस समय अशोक कुमार फिल्म वचन की शूटिंग कर रहे थे। उन्होंने फौरन निर्देशक और निर्माता से बात की खंडवा रवाना हो गए। ट्रेन खंडवा पहुंची। अशोक कुमार ट्रेन से उतरने लगे तो देखा कि उनके पिताजी ट्रेन के अंदर आ रहे हैं। वो रुक गए। पिताजी ने आते ही कहा कि ट्रेन से उतरने की जरूरत नहीं है। हमें आगे कलकत्ता (अब कोलकाता) जाना है। उनको पिताजी से पूछने की हिम्मत नहीं हुई। पिताजी ने ही कहा कि लेडीज डब्बे में जाकर अपनी भाभी से मिल लो। वो भाभी से मिलने पहुंचे तो भाभी मुस्कुरा दीं। अशोक कुमार ने पूछा कि हम कोलकाता क्यों जा रहे हैं। भाभी ने शरारती मुस्कान के साथ कहा कि देवर जी बनो मत, हम तुम्हारी शादी के लिए कलकत्ता जा रहे हैं। अशोक जोर से हंसे और अपने डब्बे में आ गए। कलकत्ता पहुंचे तो उनकी मां और अन्य रिश्तेदार पहले से वहां थे। नाटकीय घटनाक्रम में अशोक कुमार की शादी कर दी जाती है। उनके बहनोई शशधर मुखर्जी भी शादी में नहीं पहुंच पाते हैं। ये दिन था 14 अप्रैल 1938 और अशोक कुमार की पत्नी का नाम था शोभा। अशोक कुमार शादी के बाद वापस मुंबई (तब बांबे) लौटे। शादी के बाद अशोक कुमार की प्रसिद्धि और आय दोनों में बढ़ोतरी हुई। अशोक कुमार की मां निश्चिंत हो गईं कि बेटा फिल्मों में काम करके भी बिगड़ेगा नहीं।  


Saturday, May 13, 2023

वेब सीरीज ने खोली कम्युनिस्टों की पोल


इन दिनों एजेंडा फिल्म की चर्चा हो रही है। फिल्म द केरल स्टोरी को एक विशेष वर्ग के लोग एजेंडा या प्रोपगैंडा फिल्म कहकर प्रचारित कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि द केरल स्टोरी को एजेंडा फिल्म बतानेवालों ने फिल्म नहीं देखी है। दरअसल एक पूरा ईकोसिस्टम है जो वैकल्पिक विमर्श वाली फिल्मों को एजेंडा के तौर पर प्रचारित कर परोक्ष रूप से बहिष्कार करते हैं। कई फिल्में, डाक्यूमेंट्री या वेबसीरीज ईकोसिस्टम की विचारधारा के अनुकूल नहीं होती हैं। उनमें उनकी विचारधारा की करतूतों का पर्दाफाश होता है। ऐसी फिल्मों या वेबसीरीज के उन बिंदुओं को लेकर शोर मचाते हैं जिसमें विचारधारा की आड़ में की गईं करतूतें दब जाती हैं। उनपर जनता या दर्शकों का पर्याप्त ध्यान नहीं जा सके। ऐसी ही एक सीरीज है, जुबली। इस सीरीज में स्वाधीनता के कुछ वर्ष पहले और उसके बाद के चंद वर्षों की हिंदी फिल्मों की कहानी कही गई है। इसमें राय टाकीज के बनने उसके खत्म होने से लेकर नायकों के बनने और नायिकाओं की स्थितियों का चित्रण किया गया है। विक्रमादित्य मोटवानी के निर्देशन में बनी इस सीरीज में उस दौर के कई नायकों और नायिकाओं का चित्रण किया गया है। इस वेब सीरीज को लेकर जो विमर्श हो रहा है वो ये कि इसका नायक मदन कुमार किस हीरो के चरित्र से मेल खाता है।नायिका नीलोफर में किसकी छवि दिखती है। राय टाकीज के मालिक श्रीकांत राय का चरित्र क्या हिमांशु राय से मिलता है या मालकिन का किरदार देविका रानी से। क्या इसका एक और नायक जय खन्ना राज कपूर के व्यक्तित्व से प्रेरित है आदि। इस बात की दबी जुबान में भी चर्चा नहीं हो रही है कि रूसियों ने किस तरह से हिंदी फिल्मों में अपना एजेंडा चलाया। 

विक्रमादित्य मोटवानी ने इस सीरीज में उस दौर में हिंदी फिल्मों में सोवियत रूस और अमेरिका के एजेंडे को सामने लाकर रख दिया है। इस फिल्म के एक संवाद पर नजर डालते हैं। आवाम तक अपनी आवाज पहुंचाने के दो जरिए हैं, सिर्फ दो। सिनेमा और रेडियो। सोवियत संघ और अमेरिका इस समय दोनों भारत सरकार की खुशामद कर रहे हैं, सिनेमा और रेडियो में अपने पैर जमाने के लिए। कोल्ड वार शुरु हो चुका है। दोनों ही मुल्क अपने अपने प्रोपगैंडा के लिए फिल्में बनाना चाहते हैं। और इसी सिलसिले में सोवियत संघ ने अपना खास आदमी ब्लादीमीर यहां भेजा है। इन्होंने प्रोपगैंडा फिल्मों के लिए काफी काम किया है चाइना में। संवाद से स्पष्ट है कि सोवियत संघ हिंदी फिल्मों को लेकर कितना गंभीर था। वो उस दौर के उभरते हुए सितारे मदन कुमार को अपने एजेंडा के लिए काम करवाने के लिए उत्सुक था। उसको प्रोत्साहित करनेवाले राय टाकीज के मालिक श्रीकांत राय से रूस के प्रतिनिधियों की भेंट भी होती है। श्रीकांत राय उनके प्रस्ताव को ठुकरा देते हैं। रूसी उस समय हिंदी फिल्मों  में काफी निवेश करना चाहते थे। उनको कोई भी स्टार नहीं मिल रहा था जिसकी फिल्मों पर पैसा लगाया जा सके। परिस्थितियां इस प्रकार की बनती है कि जय खन्ना अपने फाइनेंसर वालिया को फिल्म बनाने के लिए तैयार करता है। ये दोनों रूसियों के संपर्क में आते हैं। एक बेहतरीन दृश्य है जब वालिया एक फिल्म का पोस्टर तैयार करवाता है। फिल्म का नाम होता है मजदूर। मजदूर की कहानी भी उसके पास नहीं होती है लेकिन वो कमिटमेंट कर देता है। उसके और जय खन्ना के बीच बहस होती है। जय कहता है कि उसके पास कहानी नहीं है तो वालिया उत्तर देता है कि मास्को में ढेर सारी टैरेटरी खुलनेवाली है। रूस का दरवाजा खुलावाना है। रशियन तीन फिल्मों का फाइनेंस करने को तैयार हैं। रशियन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन होगा जिसमें इन फिल्मों को दिखाया जाएगा। आदि आदि। इसलिए मजदूर की कहानी तो लिखनी होगी। उस दौर को याद करिए जिस दौर की बात हो रही है। राज कपूर की कई फिल्में आती हैं, रूस में रिलीज होती हैं। वहां के अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में उनको दिखाया जाता है। राज कपूर की आरंभिक फिल्मों के बारे में कहा गया कि वो समाजवाद से प्रेरित हैं। उसी दौर में भारतीय जन नाट्य संघ या इप्टा लोकप्रिय होने लगा था। फिल्मों में रुचि रखनेवालों को याद होगा कि महबूब खान जिन्होंने मदर इंडिया बनाई उनके प्रोडक्शन हाउस का लोगो हशिया और हथौड़े के निशान के बीच में अंग्रेजी में एम लिखा था। वही हंशिया और हथौड़ा जो कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया का निशान था। प्रश्न यही उठता है कि क्या इन सबके बीच किसी प्रकार का कोई संबंध था। वेब सीरीज जुबली ने इन परिस्थितियों को दस एपिसोड में दर्शकों के सामने पेश कर दिया है। ये सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं है बल्कि ये बताता है कि कम्युनिस्टों ने हिंदी फिल्मों में अपना एजेंडा किस तरह से चलाया। विचार और विचारधारा का प्रोपगैंडा कैसे किया। 

फिल्मकारों को सोवियत रूस के प्रतिनिधि बताते थे कि सिस्टम के खिलाफ लड़नेवाला नायक कैसा होना चाहिए। फिल्मों में सेठ को गाली दी जानी चाहिए। यह बताया जाना चाहिए कि गरीब अपने वेतन पर कपड़ा नहीं खरीद सकता, पूरे परिवार को खाना नहीं खिला सकता। अगर गरीब जाग गया तो सबकी रातों की नींद उड़ा देगा। फिल्मकारों को प्रलोभन दिया जाता था कि अगर उनकी फिल्में रूसियों की विचारधारा का प्रोपगैंडा करेंगी और उनके एजेंडा पर चलेंगी तो उनकी फिल्मों को तत्कालीन सोवियत संघ, तुर्की और यूरोप में प्रदर्शित करवाया जाएगा। फिल्म बनाने के लिए पैसे दिए जाएंगे। एक और बेहद चौंकानेवाला प्रसंग इस सीरीज में है। रूसी हिंदी फिल्मी गानों के विरुद्ध थे। 1952 में तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री ने आकाशवाणी पर हिंदी गानों पर प्रतिबंध लगा दिया। कारण ये दिया गया कि ये गाने भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। रूसी भफी यही कहते थे। प्रश्न ये उठता है कि गाने भारतीय संस्कृति के विरुद्ध थे या रूसी अपनी विचारधारा को गाढ़ा करने के लिए इनपर प्रतिबंध लगवाना चाहते थे। प्रतिबंध के दौर में अमरीकियों ने हिंदी गानों को रेडियो सिलोन पर बजवाने का प्रबंध किया था। राय टाकीज के मालिक जब रूसियों के सामने नहीं झुकते हैं तो उनकी तबाही का षडयंत्र रचा जाता है। उनकी पत्नी सुमित्रा को रूसी अपनी तरफ करते हैं। उनके वित्त विभाग की देखरेख करनेवाले को घूस भी दिया जाता है और वादा भी किया जाता है कि उनके बेटे का दाखिला मास्को के इंजीनियरिंग कालेज में करवा दिया जाएगा। उस दौर में इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई के लिए कई छात्र सोवियत रूस गए थे। गजब समानता है। उस वक्त रूसियों ने फिल्मकारों के फोन टैप करके उनको ब्लैकमेल भी किया था। सरकारें खबरें भी रुकवा देती थीं। कहानी में इन सबका चित्रण है।  

आज जो कम्युनिस्ट या वाम विचारधारा के लोग फिल्मों में एजेंडा और प्रोपगैंडा की बात करते हैं उनको इस वेब सीरीज को देखना चाहिए। किस तरह से भारत की स्वाधीनता के बाद से लेकर सोवियत संघ के विघटन तक हिंदी फिल्मों में रूसियों की विचारधारा का एजेंडा चलता रहा। किस तरह से वर्ग संघर्ष को बढ़ावा दिया गया।। कई फिल्मों में इसको नेहरू के समाजवाद और गांधी की ग्राम-व्यवस्था के बीच के संघर्ष के तौर पर दिखाया गया। उद्देश्य और मंशा तो वामपंथी विचार को बढ़ावा देना था। यह अनायास नहीं था कि इप्टा जैसे संगठन और ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे लेखक लोकप्रिय होने लगे थे। कैफी आजमी से लेकर जावेद अख्तर तक इस तरह का लेखन कर रहे थे जिसमें वर्ग संघर्ष का चित्रण था। दस एपिसोड में विक्रमादित्य मोटवानी ने कुछ ही परतें खोली हैं, संभव है कि दूसरे सीजन में और भी दिलचस्प खुलासे हों।   


Friday, April 8, 2022

विभाजन ने बढ़ाया फिल्मकारों का संघर्ष


स्वाधीनता के पहले कलकत्ता (अब कोलकाता) फिल्म निर्माण का एक बड़ा केंद्र हुआ करता था। इसका बड़ा कारण बड़ा बंगाली दर्शक वर्ग था। उनकी रुचि को ध्यान में रखकर बांग्ला में फिल्में बनती थीं जो बहुत अच्छा बिजनेस किया करती थीं। हीरालाल सेन से लेकर बिमल राय तक एक बेहद समृद्ध परंपरा रही है। प्रथमेश बरुआ, नितिन बोस, देवकी बोस जैसे लोगों ने बंगाल में रहकर ही फिल्म निर्माण का शिखर छुआ था। बिमल राय ने अपना करियर कलकत्ता के न्यू थिएटर के साथ आरंभ किया था और बाद में प्रथमेश बरुआ के साथ उनकी फिल्मों में कैमरापर्सन के तौर पर काम किया। कलकत्ता में बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री बहुत अच्छे तरीके से चल रही थी। फिल्मकारों को अच्छा खासा मुनाफा होता था और वो सभी लोग तकनीक पर निवेश कर रहे थे। अच्छे से अच्छा कैमरा और फिल्म निर्माण से जुड़ी मशीनों के आयात पर खर्च किया जाता था। उधर देश में स्वाधीनता का संग्राम भी अपने चरम पर पहुंचने लगा था। हमें स्वाधीनता मिली लेकिन विभाजन की विभीषिका भी साथ ही मिली। विभाजन के बाद की हिंसा चर्चा के केंद्र में रही है। इस हिंसा पर सैकड़ों लेख लिखे गए लेकिन विभाजन ने समाज के अन्य हिस्सों पर जो प्रभाव छोड़ा उसकी चर्चा कम हुई। हिंसा और आर्थिक नुकसान के अलावा विभाजन ने भारत के फिल्म उद्योग को बुरी तरह से प्रभावित किया था, खास तौर पर बंगाली फिल्मी दुनिया को। 

विभाजन के बाद बंगाल का पूर्वी हिस्सा पाकिस्तान को मिला। इस तरह से बांग्ला फिल्मों का बाजार दो देशों में बंट गया। इसने बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री को बुरी तरह से प्रभावित किया। दर्शक संख्या विभाजित होने की वजह से बांग्ला फिल्मों से होनेवाला मुनाफा कम हो गया। इसकी वजह से कालांतर में बंगाली फिल्मों के निर्माण पर भी असर पड़ा। बांग्ला में कम फिल्में बनने लगीं और फिल्मों से जुड़े लोगों को काम नहीं मिलने लगा। कलकत्ता की उस दौर की फिल्म निर्माण की सफल फिल्म कंपनी न्यू थिएटर पर संकट के बादल छा गए। विभाजन की वजह से आर्थिक संकट इतना बढ़ा कि कंपनी अपने कलाकारों को वेतन तक नहीं दे पा रही थी। नई फिल्मों के बनाने का काम भी बाधित हुआ। न्यू थिएटर से जुड़े सभफी फिल्मकारों के साथ साथ बिमल राय भी आर्थिक संकट से प्रभावित हुए थे। उनको भी अपने परिवार की चिंता सताने लगी थी। इस चिंता के साथ बिमल राय बांबे (अब मुंबई) पहुंचे थे। 

बांबे में वो अपने मित्र हितेन चौधरी से मिले जो उस वक्त मशहूर अभिनेता अशोक कुमार के साथ मिलकर फिल्म निर्माण कंपनी बांबे टाकीज चला रहे थे। बिमल राय ने उनके सामने कलकत्ता में फिल्म से जुड़े लोगों की चिंता और न्यू थिएटर की आर्थिक दिक्कतों को रखा और उनसे ये जानना चाहा कि क्या अगर व बांबे आते हैं तो उनको हिंदी फिल्मों में काम मिलेगा। हितने चौधरी ने उनसे कोई वादा तो नहीं किया लेकिन उनके लिए कुछ करने का भरोसा दिया। बिमल राय कलकत्ता लौट गए थे। एक दिन हितेन चौधरी ने बिमल राय के बारे में अशोक कुमार से चर्चा। अशोक कुमार ने ध्यान से उनकी बात सुनी और हितेन चौधरी से बिमल राय को फौरन बाबे बुलाने को कहा। हितेन चौधरी ने बिमल राय को बांबे बुलाया। बिमल राय अपने चार साथियों के साथ कलकत्ता से बांबे आए थे। ये साथी थे ह्रषिकेश मुखर्जी, असित सेन, नबेंदु घोष और पाल महेन्द्र। बिमल राय को  हिंदी फिल्मों में काम मिला। इन लोगों ने काम करना आरंभ किया और बाद की बातें इतिहास हैं। बिमल राय ने ‘दो बीघा जमीन’ से लेकर ‘परिणीता’ से लेकर ‘देवदास’ और ‘मधुमती’ जैसी कालजयी फिल्में बनाईं। आज जब हम स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो हमें इन महान फिल्मकारों की संघर्ष यात्रा का स्मरण करना चाहिए।   


Monday, September 27, 2021

संघर्ष और समर्पण की सुरगाथा


लता मंगेशकर, एक ऐसा नाम जिसपर हर भारतवासी को गर्व है। संगीत की दुनिया में बेहद सम्मान के साथ इस नाम को लिया जाता है। भारत रत्न लता मंगेशकर की आवाज में जादू है, उनके अंदर ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा है आदि आदि बातें तो हम उनके बारे में सुनते ही रहते हैं लेकिन ऐसा बहुत कम बार होता है कि उनके संघर्ष को रेखांकित किया जाए। लता मंगेशकर ने उस दौर में गाना शुरु किया था जब तकनीक इतना विकसित नहीं था। साउंड रिकार्डिंग और मिक्सिंग के इतने उन्नत यंत्र नहीं थे। महल का गाना ‘आएगा आनेवाला’ ने लता को बहुत प्रसिद्धि दी। बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि इस गाने में ध्वनि का जो उतार चढ़ाव है वो किसी तकनीक के सहारे पैदा नहीं किया गया बल्कि उसकी रिकार्डिंग उस तरह से की गई। अगर आप गाने को याद करें तो अशोक कुमार जब आईने के सामने खड़े हैं और गाना शुरु होता है तो आवाज दूर से आती लगती है, खामोश है जमाना और फिर तीन चार पंक्तियों के बाद पास से आती प्रतीत होती है। तकनीक के सहारे इस तरह का ध्वनि प्रभाव पैदा किया जा सकता है लेकिन उस वक्त इसको करने के लिए गायक को बहुत मेहनत और संतुलन साधना पड़ा था। लता मंगेशकर ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि माइक्रोफोन को कमरे के बीच में रखा गया था और वो कमरे के एक कोने में खड़ी हो गई थीं। पहला छंद खामोश है जमाना गाते हुए लता जी माइक की तरफ बढ़ती जाती और जब माइक के सामने पहुंचती तो आएगा आने वाला शुरु करतीं। ये काम इतना मुश्किल था कि परफेक्शन के लिए इस प्रक्रिया को कई बार दुहराना पड़ा था। खेमचंद प्रकाश ने इस गाने को संगीतबद्ध किया था। रिकार्ड होने के बाद भी इस फिल्म के प्रोड्यूसर सावक वाचा इससे संतुष्ट नहीं थे और उनको लगता था कि ये लोकप्रिय नहीं हो पाएगा, जबकि दूसरे प्रोड्यूसर अशोक कुमार की राय भिन्न थी। इस तरह के दर्जनों उदाहरण हैं जब लता मंगेशकर ने गानों को बेहतर करने के लिए दिन दिन भर प्रयास किए। 1948- 49 वो वर्ष है जब लता मंगेशकर एक दिन में आठ आठ गाने रिकार्ड करती थीं। दो गाने सुबह, दो गाने दोपहर, दो गाने शाम और दो गाने रात में गाती थीं। कई बार ऐसा होता था कि वो सुबह घर से निकलती थीं और देर रात दो तीन बजे तक घर पहुंच पाती थीं। खाने पीने का भी कोई ठिकाना नहीं रहता था। कई बार तो ऐसा होता था कि गाने की रिकार्डिंग हो जाती थी और बाद में बताया जाता था कि रिकार्डिंग ठीक नहीं हो पाई तो फिर से गायक को बुलाया जाता था।

एक संघर्ष तो ये था लेकिन लता मंगेशकर ने वो दौर भी देखा है जब गायकों को उनके गाने का नाम नहीं मिलता था। फिल्मों में भी या बाद में जब रिकार्ड बनने लगे तो उसमें भी आरंभिक दिनों में पार्श्व गायकों को  क्रेडिट नहीं दिया जाता था। यह स्थिति बहुत लंबे समय तक रही। जब आएगा आनेवाला गाने का रिकार्ड बना तो उसपर गायिका के तौर पर कामिनी का नाम छपा । कामिनी फिल्म महल की नायिका का नाम है जिसकी भूमिका में मधुबाला थीं। कल्पना कीजिए तब लता मंगेशकर पर क्या गुजरी होगी जब उन्होंने वो रिकार्ड देखा होगा। इसके पहले जब रेडियो पर ये गाना बजाया जाता था तब इसके गायक का नाम नहीं बताया जाता था। रेडियो स्टेशन में सैकड़ों पत्र सिर्फ ये जानने के लिए आते थे कि इस गाने की गायिका कौन हैं। जब फिल्म बरसात में लता मंगेशकर को गायक के तौर पर क्रेडिट मिला तो वो बहुत खुश हुई थीं। लता मंगेशकर कोई यूं ही नहीं बन जाता। लता मंगेशकर बनने के लिए कई सालों तक तपस्या करनी होती है अपना जीवन समर्पित करना पड़ता है। मुंबई (तब बांबे) के नाना चौक इलाके के दो कमरे के छोटे से फ्लैट में मां और भाई बहनों के साथ रहते हुए लता मंगेशकर ने न दिन देखा और न रात देखी बस एक ही सपना था कि बेहतरीन गाना है। लता मंगेशकर जब भी कोई गाना गातीं तो अपने पिता मास्टर दीनानाथ मंगेशकर की दी वो सीख याद रखतीं जो उन्होंने गायन की शिक्षा आरंभ करते वक्त दी अपनी छोटी सी बेटी को दी थी। उन्होंने तब लता को कहा था कि ‘गाते समय हमेशा ये सोचना कि तुमको अपने पिता या गुरु से बेहतर गाना है।‘  लता मंगेशकर इंटरनेट मीडिया पर सक्रिय रहकर खुद को देश और समाज से जोड़े रखती हैं।


 

Sunday, February 14, 2021

इश्क बागी न हुए, ख्वाब मुकम्मल न हुए

हिंदी फिल्मों में रोमांटिक जोड़ियों की एक लंबी फेहरिश्त है लेकिन उतनी ही लंबी फेहरिश्त रीयल लाइफ रोमांटिक जोड़ियों की भी रही है। उन्नीस सौ पचास के बाद के वर्षों में अगर देखें तो कई ऐसी रोमांटिक जोड़ियां रहीं है जिनके इश्क के किस्से अबतक बॉलीवुड में सुनाई देते हैं। मोतीलाल और शोभना समर्थ के बीच इश्क इतना गाढ़ा था कि एक बार मोतीलाल बीमार पड़े और उनको ऑक्सीजन लगाना पड़ा। शोभना समर्थ उनको देखने अस्पताल पहुंची तो उन्होंने नर्स को इशारा किया कि मास्क हटा दिया जाए। मास्क हटाते ही उन्होंने कहा कि जब शोभना समर्थ उनके आसपास होती हैं तो उनकी सांसें सामान्य रहती हैं। इसी तरह अशोक कुमार और नलिनी जयवंत के बीच प्यार इतना गाढा था कि अशोक कुमार उनको देखेने के लिए बेचैन रहा करते थे। हिंदी फिल्म जगत में ये किस्सा बहुत प्रसिद्ध है कि अशोक कुमार ने अपने घर की छत पर दूरबीन लगा रखी थी जिसके कि वो पड़ोस में रहनेवाली नलिनी को ठीक तरीके से देख सकें। राज कपूर और नर्गिस, देव आनंद और सुरैया के प्रेम के किस्से भी आम हैं। दिलीप कुमार और मधुबाला के बीच अफेयर की भी अलग ही दास्तां है। दिलीप कुमार पहले तो कामिनी कौशल के इश्क में डूबे लेकिन जब उनका प्यार परवान नहीं चढ़ सका तो दिलीप कुमार का दिल मधुबाला पर आ गया। प्यार का रंग गाढा होता चला गया। इनका प्यार अपने अंजाम तक पहुंच पाता इसके पहले मधुबाला के पिता इन दोनों के मोहब्बत के बीच आ गए। 

उस जमाने में नायिकाओं के मुंबई (तब बांबे) से बाहर जाने को लेकर उनके माता-पिता बहुत झंझट किया करते थे। खासतौर पर जब उनको अपनी बेटियों के इश्क के बारे में पता होता था। टी जे एस जॉर्ज ने अपनी किताब द ‘लाइफ एंड टाइम्स ऑफ नर्गिस’ में लिखा है कि राज कपूर फिल्म बरसात की शूटिंग कश्मीर में करना चाहते थे लेकिन नर्गिस की मां जद्दनबाई इस बात पर अड़ गईं थीं कि उनकी बेटी राज कपूर के साथ कश्मीर नहीं जाएंगी। आखिरकार फिल्म के उन दृष्यों को महाबालेश्वर में शूट करना पड़ा था। इसी तरह जब बी आर चोपड़ा अपनी फिल्म ‘नया दौर’ की शूटिंग भोपाल में करना चाहते थे लेकिन मधुबाला के पिता अताउल्लाह खान किसी भी कीमत पर अपनी बेटी को दिलीप कुमार के साथ भोपाल नहीं जाने देने पर अड़े हुए थे। दिलीप कुमार ने मधुबाला से फैसला लेने को कहा लेकिन मधुबाला अपने पिता से बगावत नहीं कर सकी। यहीं से दिलीप कुमार और मधुबाला का इश्क दरक गया। इसके पहले भी कामिनी कौशल ने अपने परिवार की मर्जी बताकर दिलीप कुमार के साथ प्यार को अंजाम तक पहुंचाने से मना कर दिया था। एक बार फिर अपने और अपनी मोहब्बत के बीच परिवार के आने से दिलीप कुमार बेहद खफा थे। अताउल्लाह खान के मधुबाला के भोपाल जाने से मना करने पर बी आर चोपड़ा ने मधुबाला पर केस कर दिया। मधुबाला की बहन मधुर भूषण ने एक इंटरव्यू में कहा था कि ‘नया दौर’ फिल्म से संबंधित कोर्ट केस के दौरान दिलीप कुमार ने बी आर चोपड़ा का साथ दिया था। अदालत में मधुबाला के खिलाफ गवाही दी थी। दिलीप कुमार ने तो कोर्ट में यहां तक कह दिया कि वो मधुबाला से बेहद प्यार करते हैं और अपनी महबूबा के मरने तक उससे प्यार करते रहेंगे। मधुबाला के पिता ने भी अपनी बेटी को इस बात के लिए ताना मारा था कि उसका प्रेमी उसके मरने की कामना कर रहा था। इस केस को बाद में बी आर चोपड़ा ने वापस ले लिया था लेकिन मधुबाला कोर्ट में हुए अपमान को भूल नहीं पाई। वो अंदर से टूट गई थीं। ये अनायास नहीं था कि मधुबाला ने अपनी एक सहेली से कहा था कि उससे शादी मत करना जिससे तुम प्यार करती हो बल्कि उस व्यक्ति से शादी करना जो तुम्हें प्यार करता है। आठ साल की उम्र में फिल्मी दुनिया में कदम, बीस साल में तमाम शोहरत और सत्ताइस साल में फिल्मी दुनिया को अलविदा कहनेवाली मधुबाला को छोटी उम्र मिली लेकिन जीवन भर तो प्यार के लिए तरसती ही रहीं।