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Saturday, November 24, 2018

विरोधियों को मदद करती सरकार


साहित्य, कला और संस्कृति को लेकर इस देश में बहुधा विवाद होते रहते हैं। कोई कार्यक्रम हो जाए तो विवाद, कोई कार्यक्रम टल जाए तो विवाद। कोई नियुक्ति हो जाए तो विवाद, कोई नियुक्ति ना हो पाए तो विवाद। किसी संस्थान में कोई अध्यक्ष चुन लिया जाए तो विवाद और ना चुना जाए तो विवाद। इन विवादों में ज्यादातर तर्क आरोप की शक्ल में सामने आते हैं। दो हजार चौदह में जब से नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तब से साहित्य-संस्कृति के विवादों में आरोपों को विचारधारा से भी जोड़ा जाने लगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडा को बढ़ाने का आरोप लगना भी तेज हो गया। इसके पहले जब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने थे तब भी इस तरह की बात हुआ करती थी। अब तो हालत ये हो गई है कि कोई भी छोटा-मोटा विवाद भी हो तो उसमें प्रधानमंत्री को घसीट लिया जाता है। कोई कार्यक्रम चाहे किसी भी वजह से स्थगित हो उसकी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री पर डाल दी जाती है। बात इतने पर ही नहीं रुकती है, आरोप लगाने वाले इसको फासीवाद से जोड़ देते है। कोई इसको अघोषित इमरजेंसी बता देता है। मतलब हालात यह है कि जिसके मन में जिस तरह की बात आती है उसी तरह के आरोप लगा देता है, तथ्य, आधार और स्तर की परवाह किए बगैर।
जबकि साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र पर नजर डालें तो मौजूदा केंद्र सरकार बेहद उदार दिखाई देती है। अब अगर हम कृष्णा और सोनल मानसिंह के कार्यक्रम रद्द होने के मसले को ही देखें तो स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। इन लोगों के कार्यक्रम की आयोजक स्पिक मैके नाम की एक संस्था थी। ये संस्था सालों से भारतीय शास्त्रीय संगीत और कला के क्षेत्र में काम कर रही है। इस ताजा विवाद के बाद इस संस्था पर भी सवाल उठे। इनको केंद्र सरकार और इनके उपक्रमों से मिलनेवाली आर्थिक मदद को लेकर भी प्रश्न खड़े किए गए। कुछ लोगों की राय इस तरह की भी सामने आई कि इस पूरे विवाद में स्पिक मैके की परोक्ष भूमिका थी, लिहाजा केंद्र सरकार को उनको आर्थिक मदद देने पर पुनर्विचार करना चाहिए। इस विचार को संस्कृति मंत्रालय ने बिल्कुल तवज्जो नहीं दिया। बताया जा रहा है कि कुंभ के सिलसिले में कार्यक्रम करने के लिए इस संस्था को डेढ़ करोड़ से अधिक की राशि देने का फैसला किया गया है।संस्कृति मंत्रालय इतनी उदार है कि उनको अपने क्षेत्रीय सांस्कृति केंद्रों से ज्यादा भरोसा स्पिक मैके पर है। देशभर में सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक कार्यलय हैं, संगीन नाटक अकादमी है, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र है, कई अन्य संस्थान हैं लेकिन निजी संस्थान स्पिक मैके पर ही संस्कृति मंत्रालय को भरोसा है। इस भरोसे की क्या वजह है वो साफ नहीं है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में भारतीय रूपंकर कला के इतने बेहतरीन कार्यक्रम आयोजित होते हैं और वो भी नियमित होते हैं लेकिन कला केंद्र से भी स्पिक मैके को तीन साल में एक करोड़ चालीस लाख रुपए दिए गए हैं। इतना ही नहीं बल्कि स्पिक मैके को कार्यक्रमों के आयोजन के लिए विभिन्न मंत्रालयों और सार्वजविक उपक्रमों से लाखों का अनुदान मिलता है। अगर मौजूदा सरकार बदले की भावना से काम करती या अगर इस सरकार की नीतियां अपनी विचारधारा से इतर विचारवालों को तंग करना होता तो इतनी उदारता से स्पिक मैके को अनुदान नहीं दिया जाता। स्पिक मैके के मंच पर तो मोदी सरकार से विरोध रखनेवाले कलाकारों को आमंत्रित किया ही जाता रहा है। दरअसल ये सरकार कलाकार को कलाकार की नजर से देखती है।
संस्कृति मंत्रालय तो इस मामले में बेहद उदार है। वो पहले भी साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ के आयोजनों को आर्थिक मदद करती रही है जहां मंच पर घोषित मोदी विरोधी लोग बैठते थे और सरकार को कोसते थे। वो दृष्य कितना मनोहारी और समावेशी होता है जब वक्ता के पीछे बोर्ड पर लिखा होता है, संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से आयोजित, और वक्ता उस बोर्ड के आगे खड़े होकर नरेन्द्र मोदी और फासीवाद को कोसते हैं। देश में इमरजेंसी जैसे हालात को लेकर गरजते हैं। पर यह कितनी हास्यास्पद बात है कि संस्कृति मंत्रालय के आर्थिक सहयोग से सजे मंच पर खडे होकर आप कह रहे हैं कि देश में इमरजेंसी जैसे हालात हैं। दरअसल इस तरह के आरोप लगानेवालों को इमरजेंसी जैसे हालात का अंदाज ही नहीं होता है। अगर इमरजेंसी जैसे हालात होते तो सरकारी मदद वाले मंच से सरकार के विरोध के बोल नहीं गूंजते। इमरजेंसी के दौर में अनुदान देने के पहले मंच पर बैठनेवालों की सूची मांगी जाती थी। सूची से संतुष्ट होने के बाद ही धन जारी किया जाता था। सूचना के अधिकार के तहत संस्कृति मंत्रालय से प्रश्न पूछकर यह पता लगाया जा सकता है कि क्या कभी इस मंत्रालय ने वक्ताओं या मंच पर परफॉर्म करनेवाले कलाकारों के नाम को देखकर धन दिया। शुरुआत में तो संस्कृति मंत्रालय ने कई ऐसे कार्यक्रमों को आर्थिक मदद दी जिसमें धुर वामपंथी शामिल होते रहे हैं। मोदी सरकार पर इस तरह के आरोप लगानेवालों को संस्कृति मंत्रालय के कामकाज को देखना चाहिए।
संस्कृति मंत्रालय तो इतनी उदार है कि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और आमसभा के सदस्यों के चुनाव के समय भी सिर्फ अपनी राय ही दे पाई। आम सभा के सदस्यों ने तो सस्कृति मंत्रालय की राय को ठुकरा दिया। संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव ने मंत्रालय की तरफ से एक उम्मीदवार को नामित किया था और आमसभा से उनको वोट देने को कहा था लेकिन उस उम्मीदवार की हार हो गई। मंत्रालय ने कुछ नहीं किया, साहित्य अकादमी के कामकाज में किसी तरह की बाधा खड़ी नहीं की। अगर किसी तरह की असहिष्णुता होती तो यहां उसका असर तो दिखता। साहित्य अकादमी ही क्यों अगर हम संगीत नाटक अकादमी की बात करें तो वहां भी समावेशी माहौल है। संगीत नाटक अकादमी की जो समिति है उसमें कम्युनिस्ट पार्टी के कार्ड होल्डर को इसी सरकार ने नामित किया। नक्सली होने का आरोप झेल रहे एक शख्स के रिश्तेदार को संगीत नाटक अकादमी ने पुरस्कृत किया। कहीं कोई विरोध या कहीं किसी तरह की हलचल तक नहीं हुई। इसी तरह से आरोप लगता है कि नियुक्तियों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इशारे पर नियुक्तियां होती हैं। यह भी मिथ्या आरोप है। ऐसे ऐस शख्सियतों को सरकार ने अहम जिम्मेदारी दी है जो घोषित तौर पर मोदी और संघ के विरोधी रहे हैं। इस स्तंभ में समय समय पर ऐसे लोगो के बारे में लिखा जाता रहा है, जिसको दोहराने का कोई अर्थ नहीं है।
असहिष्णु तो मोदी के पहले की सरकारें थीं। यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि जब 2004 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा और कांग्रेस की अगुवाई में वामपंथियों के समर्थन से सरकार बनी तो साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में क्या हुआ था। 2005 में संगीत नाटक अकादमी के अद्यक्ष के पद से सोनल मानसिंह को बर्खास्त कर दिया गया था। यह पहली बार हुआ था कि राष्ट्रपति के आदेश से संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष को पद से हटाया गया। उस दौर के अखबारों को देखकर इस बात का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि सोनल मानसिंह को वामपंथी दलों के दबाव में हटाया गया था। इसी तरह से तत्कालीन सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष अनुपम खेर को हटा दिया गया था। तब पार्टी के पत्र पीपल्स डेमोक्रेसी में हरकिशन सिंह सुरजीत ने लेख लिखकर अनुपम खेर को हटाने की बात की थी और खेर को संघ का आदमी करार दिया था। इस तरह के कई वाकए उस दौर में हुए थे लेकिन तब की सरकार को किसी ने असहिष्णु नहीं कहा था। इस वक्त की यूपीए सरकार पर किसी कोने अंतरे से फासीवाद को बढ़ावा देने का आरोप नहीं लगाया गया था। जब आप कोई काम करें और उसके लिए आपको जिम्मेदार ना ठहराया जाए और जब आप वो काम ना करें तो उसके लिए आपको जिम्मेदार ठहराया जाए। यह किस तरह का मैनेजमेंट है इसको समझने की जरूरत है। दरअसल ये पूरा खेल अर्थ से जुड़ा है। जब तक अनुदान मिलता रहता है वामपंथ से जुड़े संगठन या उस विचारधारा के खुद को करीब माननेवाले खामोश रहते हैं और जहां आर्थिक मदद में कटौती होने की आशंका दिखाई देती है तो फासीवाद का शोर मचने लगता है ताकि सरकार पर दबाव बने और इस तरह के आरोपों से बचने के लिए आर्थिक मदद में कटौती नहीं हो सके। आजाद भारत की ये इकलौती और पहली सरकार है जो उन संगठनों को मदद करती है जिसके मंच पर से उसके सबसे बड़े नेता की व्यक्तिगत और वैचारिक दोनों आलोचना की जाती है।

Saturday, November 17, 2018

राजनीति का औजार बनती कला


साहित्य और कला को राजनीति का औजार नहीं बनाया जाना चाहिए लेकिन हमारे देश में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। हमारे यहां साहित्य और कला को दशकों से राजनीति के औजार के तौर इस्तेमाल किया जाता रहा है। होता यह है कि जब किसी राजनीतिक दल की साख छीजती है तो उसको किसी सहारे की जरूरत होती है तो वो साहित्य कला की ओर देखने लगता है। साहित्य और कला से मजबूत सहारा और क्या हो सकता है? इससे साख कायम होती है। इसके सैकड़ों उदाहरण हिंदी साहित्य और भारतीय कला जगत में मौजूद हैं जब कला को राजनीति औजार के तौर परर इस्तेमाल किया गया। हाल ही में संगीत से जुड़े एक और मसले पर जमकर राजनीति हुई। कर्नाटक संगीत के गायक टी एम कृष्णा इस राजनीति के औजार बने या उन्होंने इस राजनीति को आगे बढ़ाने में मदद की इसपर बात करना बहुत आवश्यक है। आवश्यक यह भी है कि कला के नाम पर अपनी राजनीति करनेवालों से सवाल पूछे जाएं।
दरअसल ये पूरा मामला दिल्ली में एक आयोजन से जुड़ा है। दिल्ली के इस आयोजन में टी एम कृष्णा के साथ सोनल मानसिंह का भी कार्यक्रम तय और विज्ञापित किया गया था। इस कार्यक्रम की आयोजक स्पिक मैके नाम की संस्था थी और प्रायोजक एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया था। जब ये कार्यक्रम विज्ञापित हुआ तो इसको लेकर सोशल मीडिया पर विमानन मंत्रालय की आलोचना शुरू हो गई। आलोचना का आधार यह था कि मोदी विरोधी को एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया कैसे प्रोयजित कर रही है। इस आलोचना को वाम दलों से सहानुभूति रखने या खुद को उस विचारधारा के करीब पानेवाले लोगों ने दक्षिणपंथी ट्रोल का हमला करार दिया। विरोध करने का हक सबको है, उसको ट्रोल कह देना अन्यायपूर्ण है। यह सब चल ही रहा था कि एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने इस कार्यक्रम से अपना हाथ खींच लिया।
एयरपोर्ट अथॉरिटी के इस कदम के बाद अभिव्यक्ति की आजादी के चंद झंडाबरदारों को इसमें एक अवसर नजर आया। अवसर अपनी राजनीति चमकाने का, अवसर अपने राजनीतिक आकाओं को राजनीति की जमीन और औजार देने का। अब जिस तरह के ट्वीट को लेकर इन लोगों ने कार्यक्रम के विरोधियों को दक्षिणपंथी ट्रोल करार दिया था उससे ज्यादा आक्रामक तरीके से सरकार पर कुछ लोगों ने हमले करने शुरू कर दिए पर मैं अपने इस लेख में उनको वामपंथी ट्रोल नहीं कहूंगा। क्योंकि संवाद में या लेखन में शब्दों के चयन में बहुत सावधान रहने की जरूरत होती है। शब्द लेखक की मानसिकता को उजागर करते चलते हैं। इस पूरे मसले पर स्तंभकार रामचंद्र गुहा भी अति उत्साह में ऐसे शब्दों का प्रयोग कर बैठे जो उनके इतिहासकार होने के दावे पर ही प्रश्नचिन्ह लगा गया। रामचंद्र गुहा ने अपने लेख में यह लिखा दिया कि कृष्णा को दिल्ली में गाने से रोकना असभ्य दुनिया का परिचायक है। रामचंद्र गुहा के ट्वीटर हैंडल पर उन्होंने अपने परिचय में खुद को लोकतंत्र का इतिहासकार बताया है। अब वो कैसे इतिहासकार हैं इसको उनके उपरोक्त शब्दों के चयन से समझा जा सकता है। एक कार्यक्रम के रद्द होने से दुनिया को असभ्य करार देना अतिवाद है। आगे भी अपने उस लेख में गुहा ने कृष्णा को अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर महान संगीतज्ञ करार दिया है। हो सकता है कृष्णा उतने ही महान हों, जितना राम गुहा उनको साबित करने में लगे हैं। लेकिन मुझे याद है कि कुछ अरसा पहले कृष्णा ने एक पत्रिका में महान गायिका सुबुलक्ष्मी के बारे में एक लेख लिखा था। उस लेख में कृष्णा ने लक्ष्मी के बारे में अनर्गल, आधारहीन बातें की थीं और उनपर घटिया व्यक्तिगत लांछन भी लगाए थे। कृष्णा ने वो लेख तब लिखा था जब सुबुलक्ष्मी का निधन हो चुका था और आरोपों पर सफाई देनेवाला कोई था नहीं।
गुहा को कृष्णा महान कलाकार लगते हैं, इसी तरह कुछ लोगों को कृष्णा की महानता पर तब शक हुआ था जब वो मुंबई हमले के गुनहगार आतंकवादी अजमल कसाब के मानवाधिकार को लेकर चिंतित हुए थे। दरअसल गुहा जैसे इतिहासकार लगातार अपना गोलपोस्ट बदलते रहते हैं, जब जैसी बहे बयार, पीठ तब वैसी कीजिए के सिद्धांत पर चलते रहते हैं। इस वजह से प्रचुर मात्रा में लेखन करने के बावजूद उनको एक इतिहासकार के रूप में मान्यता मिलना शेष है। अब भी स्थापित इतिहासकार गुहा को कोशकार ही कहते हैं। साख के लिए शब्दों के चयन में सावधान रहना बेहद आवश्यक है।
कृष्णा का मोदी विरोध जगजाहिर है, वो राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के खिलाफ भी लगातार बोलते लिखते रहे हैं। उनकी प्राथमिकताएं भी जगजाहिर हैं। अब अगर उनकी इस विचारधारा के आधार पर उनका कार्यक्रम स्थगित किया जाता तो चंद महीने पहले राजस्थान में उनका कार्यक्रम कैसे हो पाता। वहां भी तो भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी और प्रायोजक भी संभवत: सरकार ही थी। हिंदी में तमाम ऐसी प्रत्रिकाएं छपती हैं जिनमें भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकारों के बड़े बड़े विज्ञापन होते हैं और उसके संपादकीय में मोदी सरकार की धज्जियां उड़ाई जाती हैं। संस्कृति मंत्रालय ने कई ऐसे कार्यक्रमों को प्रोयजित किया है और उनको आर्थिक मदद दी है, जहां मंच से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जमकर आलोचना की गई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देश को बांटने वाला संगठन तक करार दिया गया। अगर सरकार किसी कार्यक्रम को इस आधार पर रोकती तो इस तरह के आयोजनों को या इन पत्रिकाओं को कोई आर्थिक मदद नहीं मिल पाती। कृष्णा का कार्यक्रम राजस्थान में नहीं हो पाता।दूसरी बात यह कि दिल्ली का कार्यक्रम सिर्फ कृष्णा का नहीं था, इसमें अन्य कलाकार भी थे। उसमें से एक कलाकार सोनल मानसिंह भी थीं जिनको कि मोदी सरकार ने राज्यसभा में मनोनीत किया है।
स्पिक मैके के कार्यक्रम के रद्द होने में दिल्ली की केजरीवाल सरकार को एक अवसर नजर आया। ये अवसर भी राजनीति का भी था और अपनी सरकार को अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकार के तौर पर स्थापित करने का भी। आनन फानन में यह तय किया गया कि कृष्णा का कार्यक्रम उसी तिथि को दिल्ली में आयोजित किया जाएगा जिस तिथि का कार्यक्रम रद्द हुआ। उसके बड़े बड़े विज्ञापन छपे और कार्यक्रम को ‘आवाम की आवाज’ का नाम दिया गया। विज्ञापनों में कृष्णा की तस्वीर के साथ दिल्ली के उपमुख्यमंत्री की भी बड़ी सी तस्वीर छपी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी जनता से इस कार्यक्रम में आने का अपील की। लेकिन इसमें भी राजनीति हो गई क्योंकि दिल्ली सरकार ने सिर्फ कृष्णा को आमंत्रित किया और सोनल मानसिंह और अन्य कलाकारों को छोड़ दिया। क्या सोनल और अन्य कलाकारों ने कोई गुनाह किया था। या कला भी अब राजनीति के खांचे में बंटकर प्रदर्शित की जाएगी। कला के राजनीति का पिछलग्गू बनने का यही सबसे बड़ा नुकसान दिखाई देता है।
इस मसले पर जो राजनीति हो रही है उसमें देश के प्रधानमंत्री तक को घसीट लिया गया है। दरअसल चार राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं और चंद महीनों के बाद लोकसभा के चुनाव होने हैं। अब आने वाले दिनों में इस तरह के मसलों को और हवा देकर मौजूदा मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश होगी। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले जिस तरह से असहिष्णुता के मुद्दे पर पुरसाकर वापसी का अभियान चालाया गया था, उसी की तर्ज पर कुछ करने की कोशिश होगी। इस बात के पुख्ता संकेत एक डेढ़ साल पहले से मिलने शुरू हो गए, जब दिल्ली में एक खास विचारधारा के लेखकों और संस्कृतिकर्मियों का जमावड़ा हुआ था और ये घोषणा की गई थी कि पूरे देशभर में गोष्ठियों और कार्यक्रम किए जाएंगे ताकि कथित तौर पर सांप्रदायिक शक्तियों को मात दी जा सके। ‘जुटान’ के नाम से दिल्ली में आयोजित इस गोष्ठी में जिस तरह के भाषण इत्यादि हुए थे उसने भी उनके इरादे साफ कर दिए थे।दरअसल अगर हम देखें तो वामपंथी विचारधारा के लेखक हमेशा से ये काम करते रहे हैं। लेखक संगठनों की भमिका उनकी स्थापना के बाद से इस तरह से बदलती चली गई कि वो अपने राजनीतिक दलों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह से काम करने लगे। साहित्यिक लेखन भी राजनीति दलों की उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाने लगा। हिंदी कविता इस तरह से नारेबाजी की शक्ल में लिखी जाने लगी कि पाठक उससे दूर होने लगे। मशहूर अमेरिकी कवि गिंसबर्ग ने कहा भी था कि ‘कविता कभी भी पार्टी लाइन को अभिव्यक्त करने का माध्यम नहीं हो सकती है। रात को सोते समय जब कोई शख्स अपनी निजी सोच को सार्वजनिक करने के बारे में सोचता है तो कविता आकार लेने लगती है। अमूमन कवि से अपेक्षा भी यही की जाती है।‘ लेकिन ज्यादातर हिंदी कविता इसके उलट पार्टी लाइन पर चलती रही और पाठकों से दूर होती चली गई। कला को राजनीति के औजार के तौर पर इस्तेमाल करनेवालों को चिन्हित करना जनता को बताना बेहद आवष्यक है।