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Saturday, October 21, 2023

हिंदी फिल्मों के अच्छे दिन


हम आपके लिए सितारे लेकर आते हैं और आप उनमें चमक भरते हैं। कुछ दिनों पहले सिनेमा हाल के कारोबार की कंपनी पीवीआऱ आईनाक्स ने अपने विज्ञापन में ये भी बताया कि इस वर्ष जुलाई- सितंबर की तिमाही में उसके सिनेमाघरों में चार करोड़ अस्सी लाख दर्शक पहुंचे। । पीवीआर के पास देशभर के 115 शहरों में 1702 स्क्रीन हैं। इस विज्ञापन को देखकर मस्तिष्क में एक बात कौंधी कि अगर तीन महीने में पीवीआर के मल्टीप्लेक्सों में करीब पांच करोड़ दर्शक फिल्म देखने पहुंचे तो अगर इसमें सिंगल थिएटर और अन्य मल्टीप्लेक्स शृंखलाओं के दर्शकों को जोड़ दिया जाए तो आंकड़े कहीं और ऊपर चले जाएंगे। देशभर में सिंगल थिएटरों की संख्या में निरंतर कमी आ रही है। फिल्म फेडरेशन आफ इंडिया की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकडों के मुताबिक देशभर में सिंगल थिएटर 10167 हैं। अगर इन आंकड़ों में कमी भी आई होगी तो छह से सात हजार तक सिंगल थिएटर तो देश में हैं हीं। पीवीआर के आंकड़े संकेत कर रहे हैं कि सिनेमा का दर्शक एक बार फिर से सिनेमाघरों की ओर लौट रहा है। पीवीआर के इन आंकड़ों को देखने के बाद सिनेमाप्रेमी होने के कारण मन में संतोष हुआ लेकिन ये जिज्ञासा भी हुई कि देखा जाए कि किन फिल्मों ने ये चमत्कार किया। खिन फिल्मों के कारण जुलाई-सितंबर की तिमाही में बाक्स आफिस पर खुशी का वातावरण देखने को मिल रहा है। 

जागरण फिल्म फेस्टिवल के दौरान मुंबई में फिल्मकारों से चर्चा हो रही थी। पटकथा लेखक हैदर रिजवी ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी। उन्होंने बताया था कि अब मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में लोगों के चेहरे खिले हुए हैं। लोगों का विश्वास वापस लौटता दिख रहा है। उस समय ये बात आई गई हो गई। अब सोचता हूं तो ऐसा लगता है कि इस बात में कई संकेत छिपे हुए थे। फिल्मों से जुड़े लोगों का विश्वास वापस लौटना और उनके चेहरे के खिलने का सीधा संबंध सिनेमाघरों में दर्शकों की वापसी और मुनाफा से जुड़ा हुआ है। पिछले दिनों ओरमैक्स मीडिया की सिंतबर की बाक्स आफिस रिपोर्ट आई थी। ओरमैक्स मीडिया हर महीने के तीसरे सप्ताह में पिछले महीने की बाक्स आफिस रिपोर्ट जारी करती है जिसमें फिल्मों के कारोबार की जानकारी होती है। ओरमैक्स मीडिया की रिपोर्ट पर फिल्म इंडस्ट्री और उससे जुड़े लोगों का विश्वास है। ऐसा माना और कहा जाता है। सिंतबर की भारत की बाक्स आफिस रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। सितंबर 2023 में प्रदर्शित फिल्मों ने घरेलू बाक्स आफिस पर 1353 करोड़ रुपए का कारोबार किया है। इस वर्ष प्रदर्शित फिल्मों के आंकड़ों पर नजर डालें तो फिल्म के कारोबार की तस्वीर बेहद अच्छी नजर आती है। इस वर्ष अबतक फिल्मों ने 8798 करोड़ रुपए का कारोबार किया है जो पिछले वर्ष से छह प्रतिशत अधिक है। 

दरअसल कोरोना महामारी के दौरान सिनेमाघरों से दर्शक दूर हो गए थे और कई बड़े बजट की फिल्में भी बाक्स आफिस पर अच्छा नहीं कर पाई थीं। इस वर्ष का आरंभ भी काफी अच्छा रहा था। उसके बाद के महीनों में भी प्रदर्शित गदर-2, पठान और जवान ने बाक्स आफिस पर बंपर कमाई की। इन तीनों फिल्मों ने अलग अलग 600 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार किया है। अब भी इनको दर्शक मिल रहे हैं। 66 वर्ष के अभिनेता सनी देओल ने जब लंबे अंतराल के बाद फिल्मों में वापसी की तो गदर 2 में उनका जादू सर चढ़कर बोला। इस फिल्म की सफलता का अनुमान फिल्मों से जुड़े लोग भी नहीं लगा पाए थे। इसी तरह 57 वर्ष के अभिनेता शाह रुख खान को भी दर्शकों ने खूब पसंद किया। उनकी फिल्म पठान 646 करोड़ रुपए तो फिल्म जवान ने 733 करोड़ रुपए का कारोबार किया। इन अधेड़ उम्र के अभिनेताओं के साथ साथ तमिल फिल्मों के सुपर स्टार 72 वर्षीय के रजनीकांत की फिल्म जेलर ने भी भारत में करीब चार सौ करोड़ रुपए का कारोबार करके ये साबित किया कि दक्षिण भारतीय फिल्मों के बास का जलवा अब भी कायम है। इन सबके बीच एक फिल्म आई ओएमजी-2 । इसमें पंकज त्रिपाठी, यामी गौतम के अलावा अक्षय कुमार भी संक्षिप्त भूमिका में हैं। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से काफी दिक्कतों के बाद पास हुई इस फिल्म ने भी भारत में 200 करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस किया। इस फिल्म के निर्देशक अमित राय की जमकर प्रशंसा हुई। फिल्म से जुड़े लोगों का मानना है कि अगर फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने इस फिल्म को वयस्क फिल्म (ए सर्टिफिकेट) की बजाए यूनिवर्सल (यू) प्रमाण पत्र दिया तो इसका कारोबार और भी बेहतर हो सकता था। इस फिल्म ने न केवल अच्छा कारोबार किया बल्कि अक्षय कुमार को लगातार पांच फिल्मों की असफलता के बाद सफलता का स्वाद भी चखाया। तमाम विवादों के बीच भी फिल्म आदिपुरुष ने 331 करोड़ रुपए का और द केरला स्टोरी ने ढाई सौ करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार किया। इन फिल्मों ने दर्शकों को सिनेमाघरों में लौटाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। फिल्मों की इस सफलता में हिंदी फिल्मों की हिस्सेदारी 42 प्रतिशत है जबकि तमिल और तेलुगु फिल्मों की हिस्सेदारी सोलह सत्रह प्रतिशत के करीब है। 

कोरोना महामारी के समय भी और उसके बाद भी फिल्मों को लेकर कई फिल्मी पंडित सशंकित हो गए थे। उनको लगने लगा था कि हिंदी फिल्मों का बाजार खत्म हो गया है। पिछले वर्ष उन्होंने ये भवियवाणी तक कर दी थी कि अब दक्षिण भारतीय फिल्में ही चलेंगी। उस समय भी कार्तिक आर्यन की फिल्म भूल भुलैया-2 ने उम्मीद जगाए रखी थी और ढाई सौ करोड़ रुए से अधिक का कारोबार किया था। अजय देवगन और तब्बू की फिल्म दृश्यम 2 ने और भी अच्छा बिजनेस किया था। उस फिल्म ने बाक्स आफिस पर तीन सौ करोड़ रुपए के करीब अर्जित किया था। इन सभी सफल फिल्मों पर नजर डालें तो इनमें से कई पुरानी फार्मूला वाली फिल्में हैं। जिसमें जबरदस्त एक्शन है, रोमांस है और ऐसे संवाद हैं तो दर्शकों को पसंद आते हैं। लगता है कि दर्शकों को हल्का फुल्का मनोरंजन पसंद आ रहा है। द केरला स्टोरी और ओएमजी 2 में कहानी अलग हटकर है। द केरला स्टोरी और ओएमजी 2 दोनों में यथार्थ बहुत मजबूती के साथ उपस्थित है। अच्छी कहानी और अच्छा मनोरंजन दोनों दर्शकों को पसंद आ रहे हैं। आनेवाले दिनों में सलमान खान की फिल्म टाइगर 3, शाह रुख खान की डंकी और प्रभास की सालार आनेवाली है, जिसको लेकर दर्शकों के बीच उत्सुकता है। अगर इन तीनों फिल्मों ने बहुत अच्छा कारोबार किया तो ये वर्ष भारतीय फिल्मों के लिए बहुत अच्छा वर्ष साबित होगा। फिल्मों के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती है दर्शकों को सिनेमाघरों की तरफ निरंतर आकर्षित करते रहने की। इसके लिए फिल्मों के टिकटों की दरें कम करनी चाहिए। कई बार सिनेमाघर इस तरह के प्रयोग कर भी रहे हैं। जब वहां किसी विशेष दिन टिकटों की दर सौ रुपए के करीब रखा जाता है तो उस दिन दर्शकों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक रहती हैं। सिनेमाघरों में टिकटों के मूल्य के साथ साथ वहां मिलनेवाले खाद्य सामग्रियों और पेयजल के मूल्य पर भी ध्यान देना चाहिए और दर्शकों को उचित मूल्य पर उपलब्ध होना चाहिए। एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति अपने परिवार के साथ फिल्म देखने जाता है तो टिकट और इंटरवल में पापकार्न और चाय काफी के लिए उसे दो हजार रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं। ऐसे में वो सोचता है कि एक दो महीने बाद फिल्म ओटीटी प्लेटफार्म पर आ ही जाएगी, तब देख लेंगे। इस धारणा को कमजोर करना होगा ताकि फिल्मों के प्रति दर्शकों का प्रेम बना रहे।   

Saturday, January 21, 2023

पीएम की नसीहत के बाद बोलती बंद


भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक चल रही थी। बैठक के दूसरे दिन पार्टी के अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का कार्यकाल अगले वर्ष जून तक के लिए बढ़ाया जा चुका था। हर तरफ राजनीतिक बातें हो रही थीं। इस वर्ष नौ राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनाव की संभावनाओं पर कार्यकारिणी के सदस्य आपस में चर्चा कर रहे थे। बैठक समापन की ओर था। सबको प्रधानमंत्री के भाषण की प्रतीक्षा थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बोलने के लिए खड़े हुए। उन्होंने चिरपरिचित अंदाज में उन्होंने अपना भाषण आरंभ किया। राष्ट्र और राजनीति की बातें करते हुए उन्होंने सबको साथ लेकर चलने की बातें की। अचानक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सिनेमा से जुड़ा एक बड़ा संदेश दे दिया। प्रधानमंत्री ने अपने दल के नेताओं को कहा कि प्रतिदिन सिनेमा पर बोलने की आवश्यकता नहीं है। प्रधानमंत्री ने उन नेताओं को भी नसाहत दी जो हर दिन फिल्मों या फिल्मों से जुड़े मसलों पर विवाद खड़े करनेवाले बयान देते रहते हैं। फिल्म पर अपनी बात कहने के बाद प्रधानमंत्री अन्य मुद्दों पर चले गए। प्रधानमंत्री का संदेश ये था कि नेताओं को हर चीज के प्रति संवेदनशील होना चाहिए और आवश्कता पड़ने पर गंभीरता के साथ अपनी बात कहनी चाहिए। प्रधानमंत्री का भाषण समाप्त हुआ। कार्यकारिणी की बैठक भी समाप्त हुई। खबरों में प्रधानमंत्री के भाषण के अन्य बिंदुओं पर जमकर चर्चा हुई। सामाजिक समरसता से लेकर बुद्धिजीवियों तक से पार्टी के नेताओं को संपर्क बढ़ाने की बात पर काफी चर्चा हुई। सिनेमा पर विवादित बयान देनेवाले अपनी पार्टी के नेताओं को दी गई उनकी नसीहत पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कम लोगों का ही ध्यान प्रधानमंत्री के सिनेमा पर दिए गए बयान पर गया। हलांकि हिंदी फिल्म से जुड़े बड़े सितारों को राजनीतिक बातों पर प्रतिक्रिया देने में काफी वक्त लगता है।  

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस बयान के बाद मध्यप्रदेश के मंत्री नरोत्तम मिश्रा का एक बयान जागरण समूह के समाचारपत्र नईदुनिया/नवदुनिया में प्रकाशित हुआ है। प्रकाशित बयान के मुताबिक नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि ‘प्रधानमंत्री ने किसी का नाम नहीं लिया है। प्रधानमंत्री की हर बात हमारे लिए शिरोधार्य है। सारे कार्यकर्ता वहां से प्रेरणा लेकर आए हैं। हमारा आचरण और व्यवहार हमेशा उनके मार्गदर्शन में उर्जा से भरते हैं।‘ नरोत्तम मिश्रा भारतीय जनता पार्टी के उन नेताओं में से हैं जो फिल्मों या वेब सीरीज पर लगातार बयान देते रहते हैं। मध्यप्रदेश के गृहमंत्री होने के कारण कई बार उन्होंने आपत्तिजनक माने जानेवाले दृष्यों को लेकर सिर्फ बयान ही नहीं दिए बल्कि सख्त कदम उठाने की बात भी की थी। अब उनका ये कहना कि नेतृत्व का आदेश शिरोधार्य होगा, इस बात का संकेत दे रहा है कि प्रधानमंत्री का फिल्मों को लेकर दी गई नसीहत का उनकी पार्टी के बयानवीर नेताओं पर असर हुआ है। दरअसल इंटरनेट मीडिया पर शाह रुख खान की फिल्म पठान के बेशर्म रंग गाने के रिलीज होने के बाद उसके बायकाट को लेकर चर्चा हो रही है। पक्ष विपक्ष में ट्वीट हो रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का सिनेमा पर हर दिन बयानबाजी से बचने की सलाह महत्वपूर्ण हो जाती है।

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ फिल्म से जुड़े लोगों की बैठक में अभिनेता सुनील शेट्टी ने योगी जी से फिल्मों के बायकाट की मुहिम को लेकर अपनी बात रखी थी। उन्होंने तब ये भी आग्रह किया था कि वो इंडस्ट्री की भावना को प्रधानमंत्री तक पहुंचा दें। योगी जी ने ये बात प्रधानमंत्री तक पहुंचाई या नहीं ये तो नहीं मालूम लेकिन प्रधानमंत्री ने जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में सिनेमा को लेकर अपनी बात कही उससे लगता है कि प्रधानमंत्री का सूचना तंत्र बेहद सक्रिय है। उनतक हर छोटी बड़ी बात पहुंचती है। फिल्मों की बायकाट की अपील का मसला पिछले कुछ दिनों से काफी बढ़ा है। कई बार ये स्वत:स्फूर्त होता है तो कई बार अभियान चलाया जाता है। कई बार फिल्म के कलाकारों के व्यवहार के कारण दर्शक खिन्न हो जाते हैं और इंटरनेट मीडिया पर उसके खिलाफ अपनी बात कहते लिखते हैं। कई बार अभिनेता, अभिनेत्री या निर्देशक के राजनीतिक बयानों का असर भी फिल्म पर पड़ता है। उनके बयानों से नाराज होकर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता अपना विरोध जताने के लिए उनकी फिल्म का विरोध करते हैं। इसमें कोई गलत बात नहीं है। जब तक विरोध शांतिपूर्ण ढंग से होता है तबतक किसी को इसपर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आप नरेन्द्र मोदी का विरोध भी करेंगे, आप विरोधी दलों के लिए प्रचार भी करेंगे और ये अपेक्षा करेंगे कि मोदी के समर्थक या भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता आपकी फिल्म भी देखें। अब ऐसा संभव नहीं दिखता। अब अगर कोई अभिनेत्री जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आंदोलनकारी छात्रों के साथ जाकर खड़ी होती है तो उसका असर उसकी फिल्म के कारोबार पर पड़ता है। हिंदी फिल्म के कर्ताधर्ताओं को ये बात समझनी होगी। कलाकारों को अगर राजनीति करनी है तो राजनीति के मैदान में आना चाहिए। अब अगर कोई फिल्मकार अपनी फिल्म में राजनीतिक संदेश देता है और अपेक्षा करता है कि उस राजनीतिक संदेश का असर जिस समूह पर पड़ेगा वो उसकी फिल्म देखे तो यह अपेक्षा व्यर्थ है। अब जनता जागरूक हो गई है। वो अपनी पसंद और नापसंद को खुलकर व्यक्त भी करती है। खैर ये अलग मुद्दा है।

बात हो रही थी प्रधानमंत्री के पार्टी नेताओं को दिए गए संदेश और उसके असर की । ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री ने पहली बार इस तरह से सार्वजनिक रूप से अपनी पार्टी के नेताओं को नसीहत दी है। इसके पहले भी पार्टी की संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री ने मध्यप्रदेश के नेता कैलाश विजयवर्गीय का नाम लिए बगैर बेहद कठोर टिप्पणी की थी। दरअसल हुआ ये था कि इंदौर नगर निगम के किसी कर्मचारी को बैट से पीटते हुए कैलाश विजयवनर्गीय के पुत्र आकाश का वीडियो इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित हो गया था। उसके बाद संसदीय दल की एक बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा था कि बेटा किसी का भी ऐसा व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। तब प्रधानमंत्री ने पार्टी की मर्यादा की भी याद दिलाई थी और कहा था कि ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जो पार्टी की प्रतिष्ठा को कम करे। अगर कोई गलत काम करता है तो उसपर कार्रवाई होनी चाहिए। प्रधानमंत्री की उस नसीहत का असर कैलाश विजयवर्गीय और उनके बेटे आकाश विजयवर्गीय पर दिखा। प्रधानमंत्री मोदी का संदेश देने का ये तरीका एक और बैठक में दिखा था। जब उन्होंने अपनी पार्टी के उन बयानवीर नेताओं को चेतावनी दी थी जो हर दिन सुबह टीवी चैनलों के कैमरे पर अपने घर के सामने खड़े होकर किसी भी समस्या पर बयान दे देते थे। छापस रोग से ग्रस्त पार्टी के नेताओं का इलाज उनके एक बयान हो गया था।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का काम करने का अपना तरीका है। वो संचार की उस शैली को अपनाते हैं जिसमें संप्रेषण के साथ असर भी हो। इस बात को लगातार कहा जाता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं की। प्रधानमंत्री मोदी ने भले ही कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं की लेकिन जिस तरह से उन्होंने जनता और दुनिया से संवाद बनाए रखने के लिए इंटरनेट मीडिया का प्रयोग किया है वो उल्लेखनीय है। संचार का मुख्य उद्देश्य यही होता है कि बात सही व्यक्ति तक पहुंच जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने भी पारंपरिक संचार शैली से अलग हटकर अपनी शैली विकसित की है। इस शैली को इंटरनेट मीडिया पर तो देखा ही जा सकता है, उनके वकतव्यों में भी रेखांकित किया जा सकता है। तीन उदाहरण तो ऊपर ही दिए गए हैं।