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Saturday, December 24, 2016

बिछड़े सभी बारी बारी...

वर्ष दो हजार सोलह बीतने को है, विमर्श के कोलाहल के बीच साहित्य, संस्कृति और कला के दिग्गजों के निधन से अपूरणीय क्षति हुई । साल के शुरुआत में ही कथाकार और संपादक रवीन्द्र कालिया का छिहत्तर साल की उम्र में निधन हो गया । कालिया जी की कहानियों ने अपने समय में सार्थक हस्तक्षेप किया था । उनकी किताब ‘गालिब छुटी शराब’ धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों के देवता’ के बाद हिंदी में सबसे ज्यादा बिकनेवाली किताबों में से है । कालिया जी के निधन से साहित्य जगत उबरा भी नहीं था कि निदा फाजली के निधन की खबर आई थी । निदा फाजली ने शायरी को उर्दू और फारसी की गिरफ्त से आजाद कर आम लोगों तक पहुंचाया । ताउम्र निदा हिंदी और उर्दू के बीच की खाई को पाटने में लगे भी रहे । निदा के बाद काल के क्रूर हाथों ने हमसे उर्दू के सबसे बड़े कहानीकारों में एक जोगेन्द्र पॉल को छीन लिया । जोगेन्द्र पॉल के तेरह से अधिक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें खुला, खोदू बाबा का मकबरा और बस्तिआन शामिल हैं । कहानियों के अलावा पॉल ने कई उपन्यास भी लिखे जिनमें से एक बूंद लहू की खासी चर्चित रही है । पॉल की ज्यादातर किताबें हिंदी में भी अनूदित हैं ।
साल 2016 में हिंदी के मशहूर लेखक मुद्राराक्षस का भी निधन हुआ । विचारों से मार्क्सवादी-लेनिनवादी मुद्राराक्षस ताउम्र अपनी विचारधारा को लेकर मजबूती से साहित्य और समाजकी जमीन पर डटे रहे । बांग्ला की प्रख्यात साहित्यकार महाश्वेता देवी भी इस साल अपनी महायात्रा पर निकल गईं । महाश्वेता देवी ने हजार चौरासी की मां, अरण्येर अधिकार, झांसीर रानी, अग्निगर्भा जैसी मशहूर कृतियां रचीं । उनको ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, रोमन मैगसेसे अवॉर्ड के अलावा पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया था । पंजाबी के मशहूर कथाकार गुरदयाल सिंह भी इस वर्ष हमसे जुदा हो गए ।उनका उपन्यास मरही दे दीवा पंजाबी साहित्य में बेहद लोकप्रिय है और इस उपन्यास ने ही उनको उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठा दिलाई । इनके उपन्यासों पर फिल्में भी बनी हैं । गुरदयाल सिंह को उनके लेखन के लिए प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला था ।मलयालम के मशहूर कवि ओ वी एन कुरुप का निधन भी साहित्य के लिए बड़ा झटका था । यशस्वी संपादक और लेखक प्रभाकर श्रोत्रिय भी इस दुनिया को छोड़कर चले गए । प्रभाकर श्रोत्रिय ने अपने संपादन से युवा लेखकों की पहचान कर उनको संस्कारित किया । पूरब के प्रेमचंद कहे जानेवाले विवेकी राय भी इस साल हमसे बिछुड़ गए । उनकी रचनाओं में गांव अपने समग्र परिवेश के साथ उपस्थित रहता था । इनके ललित निबंध हिंदी साहित्य की थाती हैं । विवेकी राय के अलावा हाल ही में उपन्यासकार ह्रदयेश का भी निधन हुआ । ह्दयेश हिंदी के उन चंद लेखकों में थे जो खामोशी के साथ बगैर किसी शोर-शराबे के लेखन में जुटे रहते थे । उनके दस के करीब उपन्यास और दर्जनभर कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं ।
सैयद हैदर रजा के निधन से कला क्षेत्र को बड़ा नुकसान हुआ । सैयद हैदर रजा रंगों के माध्यम से भारतीय मिथकों के प्रतीकों का अपने चित्रों में इस्तेमाल करते हैं । इसी साल मशहूर तबला वादक और गायक लच्छू महाराज भी हमें छोड़कर चले गए । मशहूर कलाकार और पद्मविभूषण से सम्मानित के जी सुब्रह्मण्य भी इस साल हमसे बिछड़ गए । इस साल पत्रकारिता को भी एक बड़ा झटका लगा जब वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर का निधन हो गया । दिलीप उन संपादकों में थे जो इस संस्था की गरिमा और साख बचाने के लिए अंतिम समय तक संघर्षरत रहे ।


Saturday, December 17, 2016

महान विभूतियों का नमन और स्मरण

वर्ष दो हजार सोलह बीतने को है, साहित्य और संस्कृति को लेकर इस बीतते हुए साल में काफी कोलाहल हुआ । आजादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि किसी और विचारधारा ने स्थापित विचारधारा को चुनौती दी । इसके पीछे राजनीतिक और गैर राजनीतिक कारण हो सकते हैं लेकिन इस बीतते हुए वर्ष में विमर्श के कोलाहल के बीच साहित्य, संस्कृति और कला के दिग्गजों के निधन ने अपनी अपनी विधाओं को विपन्न कर दिया । इस साल के शुरुआत में ही हिंदी के यशस्वी कथाकार और बेहतरीन संपादक रवीन्द्र कालिया का छिहत्तर साल की उम्र में निधन हो गया । रवीन्द्र कालिया बेहतर कथाकार थे या बेहतर संपादक ये तय करना मुश्किल है लेकिन एक बात जिसपर पूरे साहित्य में मतैक्य है वो ये कि वो एक बेहतरीन और बेहद जिंदादिल इंसान थे । हंस के संपादक राजेन्द्र यादव के निधन के बाद बोरियत की हद तक गंभीरता का आवरण ओढे दिल्ली की साहित्यक जमात में कालिया जी ही थे जो अपने विट और ह्यूमर से इसको बहुधा तोड़ते रहते थे । कालिया जी ने शिक्षण से अपने करियर की शुरुआत की फिर वो धर्मयुग में  धर्मवीर भारती की सोहबत में पत्रकारिता के तमाम गुर सीखे थे । मुंबई में रहते हुए कालिया जी ने साहित्य और पत्रकारिता को बेहद नजदीक से देखा जो बाद में उनकी कहानी काला रजिस्टर में सामने भी आया । रवीन्द्र कालिया, धर्मवीर भारती के साथ काम करने के पहले मोहन राकेश की नजर में आ गए थे । माना जाता है कि भाषा का जो अनुशासन रवीन्द्र कालिया में दिखाई देता है वो मोहन राकेश की ही सोहबत का असर था । एक अनुमान के मुताबिक उनकी किताब ‘गालिब छुटी शराब’ धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों के देवता’ के बाद हिंदी में सबसे ज्यादा बिकनेवाली किताबों में से है ।  एक बार कालिया जी ने कहा था कि हिंदी साहित्य में कुछ कथाकार एक दूसरे को जलील करने के लिए कहानियां लिख रहे हैं । पात्रों के चयन से ये बात साफ होती भी रही है । आज वो नहीं हैं लेकिन उनकी कही कई बातें आज भी साहित्य में गूंज रही हैं
कालिया जी के निधन से साहित्य जगत उबरा भी नहीं था कि निदा फाजली के निधन ने एक बार फिर से इस दुनिया को हिला दिया । निदा फाजली हिंदी-उर्दू की तरक्कीपसंद अदबी रवायत के प्रतिनिधि शायर थे । मजरूह सुल्तानपुरी के बाद निदा ऐसे शायर थे जिन्होंने शायरी को उर्दू और फारसी की गिरफ्त से आजाद कर आम लोगों तक पहुंचाया । उन्होंने हिंदी-उर्दू की जुबां में शायरी की । कह सकते हैं कि हिन्दुस्तानी उनकी शायरी में बेहतरीन रूप से सामने आई । ताउम्र निदा हिंदी और उर्दू के बीच की खाई को पाटने में लगे भी रहे । वो इस बात के विरोधी थे कि मुशायरों में सिर्फ शायरों को और कवि सम्मेलनों में सिर्फ कवियों को बुलाया जाए । उन्होंने कई मंचों पर गोपाल दास नीरज के साथ साझेदारी में कविताएं पढ़ी थी । उनकी शायरी को देखते हुए ये लगता था कि उन्होंने हिंदू मायथोलॉजी का गहरा अध्ययन किया था । सूरदास और कबीर के पदों से उन्होंने प्रेरणा ली और शायरी की । कबीर की तरह निदा भी कहते हैं - ‘बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान, एक खुदा के पास इतना बड़ा मकान’ या फिर ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें , किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए ।‘ उनकी शायरी के ये स्वर अमर हैं । निदा के बाद काल के क्रूर हाथों ने हमसे उर्दू के सबसे बड़े कहानीकारों में एक जोगेन्द्र पॉल को छीन लिया । जोगेन्द्र पॉल पूरे उपमहाद्वीप में उर्दू पाठकों के बीच बेहद लोकप्रिय थे । जोगेन्द्र पॉल का मानना था कि उर्दू भाषा नहीं बल्कि तहजीब है वो अपना रचनात्मक लेखन एक तहजीब में करते हैं । जोगेन्द्र पॉल ने विपुल लेखन किया है और उनके तेरह से अधिक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें खुला, खोदू बाबा का मकबरा और बस्तिआन शामिल हैं । कहानियों के अलावा पॉल ने कई उपन्यास भी लिखे जिनमें से एक बूंद लहू की खासी चर्चित रही है । पॉल की ज्यादातर किताबें हिंदी में भी अनूदित हैं ।
हिंदी और उर्दू के ये महान विभूति एक एक कर जा रहे थे और साहित्य जगत सदमे में था । लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था । हिंदी के मशहूर लेखक मुद्राराक्षस का भी निधन हुआ ।छोटे कदकाठी के मुद्राराक्षस अंत तक अपने सिद्धांतों पर डिगे ही नहीं रहे बल्कि उसको फैलाने के लिए सक्रिय भी रहे । विचारों से मार्क्सवादी-लेनिनवादी मुद्रा जी ने सामजिक आंदोलनों में भी भागीदारी की । लखनऊ के पास बेहटा में जन्मे मुद्राराक्षस ने रंगमंच की दुनिया में भी अपना लोहा मनवाया । उनका लिखा - आला अफसर – बेहतरीन नाटक है ।
बांग्ला की प्रख्यात साहित्यकार महाश्वेता देवी भी इस साल अपनी महायात्रा पर निकल गईं । महाश्वेता देवी लिखती अवश्य बांग्ला में थीं लेकिन वो पूरे देश में समादृत थीं । महाश्वेता देवी के लेखन में समाज के हाशिए के लोगो की आवाज प्रमुखता से दिखाई देती थीं । महाश्वेता देवी के लेखन में एक खास किस्म का यथार्थ दिखाई देता था जो कि गढ़े हुए यथार्थ से अलग होता था । महाश्वेता देवी जितना साहित्य में सक्रिय थी उतनी ही सक्रियता से वो राजनीति के मसलों पर भी अपनी राय रखती थीं । उन्नीस सौ छब्बीस में ढाका में साहित्यक परिवार में पैदा हुई महाश्वेता के पिता मनीष घटक मशहूर कवि थे और चाचा ऋत्विक घटक मशहूर फिल्मकार । महाश्वेता देवी की हजार चौरासी की मां, अरण्येर अधिकार, झांसीर रानी, अग्निगर्भा आदि मशहूर कृतियां थी । महाश्वेता देवी को ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, रोमन मैगसेसे अवॉर्ड समेत कई सम्मान मिल चुके थे । भारत सरकार ने उनको पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया था ।

महाश्वेता के जाने से साहित्य जगत की जो क्षति हुई है उतना ही बड़ा नुकसान सैयद हैदर रजा के निधन से कला क्षेत्र को हुआ है । रजा साहब की चित्रकारी में अद्वैत दर्शन को साफ तौर पर देखा जा सकता था । वो कहते भी थे कि दिव्य शक्तियों के सहयोग के बिना कला संभव नहीं है । विशेषज्ञों का मानना है कि सैयद हैदर रजा रंगों के माध्यम से भारतीय मिथकों के प्रतीकों का अपने चित्रों में इस्तेमाल करते हैं । इसी साल मशहूर तबला वादक और गायक लच्छू महाराज भी हमें छोड़कर चले गए । स्वभाव से ठेठ बनारसी लच्छू महाराज के जाने से भारतीय तबला वादन परंपरा में एक खास किस्म की खामोशी आई है । पंजाबी के मशहूर कथाकार गुरदयाल सिंह भी इस वर्ष हमसे जुदा हो गए । गुरदयाल सिंह का लेखन पचास सालों से ज्यादा के कालखंड में फैला है । उनका उपन्यास मरही दे दीवा पंजाबी साहित्य में बेहद लोकप्रिय है और इस उपन्यास ने ही उनको उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठा दिलाई । इनके उपन्यासों पर फिल्में भी बनी हैं । गुरदयाल सिंह को उनके लेखन के लिए प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला था । मलयालम के मशहूर कवि ओ वी एन कुरुप का निधन भी साहित्य के लिए बड़ा झटका था । साल दो हजार सोलह अब बीतने को हो रहा था लेकिन समय के गर्भ में क्या छुपा था इसका अंदाज तब लगा जब यशस्वी संपादक और लेखक प्रभाकर श्रोत्रिय भी इस दुनिया को छोड़कर चले गए । प्रभाकर श्रोत्रिय नेअपने लेखन से हिंदी साहित्य को तो समृद्ध किया ही उन्होंने अपने संपादन से युवा लेखकों की पहचानन कर उनको संस्कारित भी किया । यह उनका साहित्य का बड़ा योगदान है । उन्होंने वागर्थ, नया ज्ञानोदय और साहित्य अकादमी की पत्रिकाओं का संपादन किया । पूरब के प्रेमचंद कहे जानेवाले विवेकी राय भी इस साल हमसे बिछुड़ गए । विवेकी राय ने पचास से अधिक किताबें लिखीं । उनकी रचनाओं में भारत का गांव अपने समग्र परिवेश के साथ उपस्थित रहता था । इनके ललित निबंध हिंदी साहित्य की थाती हैं और कहा जाता है कि हजारी प्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र और कुबेरनाथ राय की परंपरा तो विवेकी राय ने काफी आगे बढ़ाया । बनारस और गाजीपुर इलाके में अपना जीवन बिकानेवाले विवेकी राय जी के जाने से साहित्य में गांव की मिट्टी की सोंधी खुशबू कम होगी । विवेकी राय के अलावा हाल ही में उपन्यासकार ह्रदयेश का भी निधन हुआ । ह्दयेश हिंदी के उन चंद लेखकों में थे जो खामोशी के साथ बगैर किसी शोर-शराबे के लेखन में जुटे रहते थे । उनके दस के करीब उपन्यास और दर्जनभर कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । इनकी आत्मकथा को भी हिंदी के पाठकों ने खासा पसंद किया था । मशहूर कलाकार और पद्मविभूषण से सम्मानित के जी सुब्रह्मण्य भी इस साल हमसे बिछड़ गए । इस साल पत्रकारिता को भी एक बड़ा झटका लगा जब वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर का निधन हो गया । दिलीप उन संपादकों में थे जो इस संस्था की गरिमा और साख बचाने के लिए अंतिम समय तक संघर्षरत रहे । इन तमाम विभूतियों की स्मृति को नमन और श्रद्धांजलि ।  

Monday, February 15, 2016

वीराने में टहलती यादों की परछाइयां

निदा फाजली ने अपनी किताब ‘तमाशा मेरे आगे’ की भूमिका में मैडम बॉवेरी को याद करते हुए कहा है कि– ‘काश मेरे पास इतना पैसा होता कि सारी किताबें खरीद लेता और उसको फिर से एक बार लिखता ।‘ उसके बाद निदा साहब कहते हैं...समय का आभाव नहीं होता तो मैं भी ऐसा ही करता । मैडम बॉबेरी के कथन को जेहन में रखते हुए वो अपना एक शेर कहते हैं – ‘कोशिश के बावजूद एक उल्लास रह गया/ हर काम में हमेशा कोई काम रह गया ‘। निदा फाजली के निधन की जब खबर मिली तो मेरी स्मृति में निदा साहब का ये शेर कौंध गया । वो इसलिए कि उनसे जनवरी 2013 में हुई दो बार हुई बातचीत याद आ गई । उसके पहले निदा साहब से मेरा कोई संपर्क नहीं था । हां उनके लिखे फिल्मी गीत – ‘तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है’ और ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता’ मुझे बेहद पसंद हैं । उनकी आत्मकथात्मक उपन्यासों को पढ़कर उनके संघर्षों और विचारों से अवगत था । लेकिन जब दो हजार तेरह में साहित्यक पत्रिका ‘पाखी’ में उनका एक खत पढ़ा तो हैरान रह गया था । उन्हें तुरंत फोन किया था और उनसे काफी लंबी बात हुई थी । दरअसल उन्होंने ‘पाखी’ के संपादक के नाम एक पत्र में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की तुलना मुंबई हमले के गुनहगार आतंकवादी आमिर अजमल कसाब से कर दी थी । दरअसल निदा फाजली पूर्व के अंक में संपादकीय में कहानीकार ज्ञानरंजन की तुलना अमिताभ बच्चन से किए जाने से खफा थे । निदा ने संपादक के नाम खत में लिखा था- ‘दूसरी बात जो आपके संपादकीय मे खटकी वो यह है कि ज्ञानरंजन जैसे साहित्यकार की तुलना सत्तर के दशक के एंग्री यंगमैन अमिताभ बच्चन से की गई है । एंग्री यंगमैन को सत्तर के दशक तक कैसे सीमित किया जा सकता है । क्या 74 वर्षीय अन्ना हजारे को भुलाया जा सकता है । मुझे तो लगता है कि सत्तर के दशक से अधिक गुस्सा तो आज की जरूरत है और फिर अमिताभ को एंग्री यंगमैन की उपाधि से क्यों नवाजा गया । वो तो केवल अजमल आमिर कसाब की तरह गढ़ा हुआ खिलौना है । एक को हाफिज सईद ने बनाया था तो दूसरे को सलीम-जावेद की कलम ने गढ़ा था । आपने भी खिलौने की प्रशंसा की लेकिन खिलौना बनाने वालों को सिरे से भुला दिया । किसी का काम, किसी का नाम कहावत शायद इसलिए गढ़ी गई है ।‘ जब मैंने उनको फोन किया तो वो अपने तर्क और राय पर कायम थे । जब मैंने उनसे सवाल किया कि आप अमिताभ कि तुलना कसाब से कैसे कर सकते हैं तो उन्होंने दो टूक कहा था कि मैंने अपनी राय लिख दी, आप अपनी लिखें । जनवरी में ही मैंने उनकी इस राय के खिलाफ लेख लिखा । लेख छपने के तीन दिन बाद निदा साहब का फोन आया और उन्होंने कहा कि कर ली ना तुमने अपने मन की । फिर काफी बातें हुई लेकिन मुझे उसमें कहीं से तल्खी नहीं महसूस हुई । मुझे लगा कि उनमें अपनी आलोचना को स्पेस देने का माद्दा था ।
उसके बाद मैंने निदा को और पढ़ना शुरू किया तो मुझे यह लगा कि निदा फाजली हिंदी-उर्दू की तरक्कीपसंद अदबी रवायत के प्रतिनिधि शायर थे । मजरूह सुल्तानपुरी के बाद निदा ऐसे शायर थे जिन्होंने शायरी को उर्दू और फारसी की गिरफ्त से आजाद कर आम लोगों तक पहुंचाया । उन्होंने हिंदी-उर्दू की जुबां में शायरी की । कह सकते हैं कि हिन्दुस्तानी उनकी शायरी में बेहतरीन रूप से सामने आई । ताउम्र निदा हिंदी और उर्दू के बीच की खाई को पाटने में लगे भी रहे । वो इस बात के विरोधी थे कि मुशायरों में सिर्फ शायरों को और कवि सम्मेलनों में सिर्फ कवियों को बुलाया जाए । उन्होंने कई मंचों पर गोपाल दास नीरज के साथ साझेदारी में कविताएं पढ़ी थी । उनकी शायरी को देखते हुए ये लगता था कि उन्होंने हिंदू मायथोलॉजी का गहरा अध्ययन किया था । सूरदास और कबीर के पदों से उन्होंने प्रेरणा ली औक शायरी की । निदा बेखौफ होकर अपनी बात कहते थे । जिस तरह से कबीर ने मस्जिदों और मंदिरों को लेकर काफी बेबाकी से लिखा था उसी तरह से निदा ने भी लिखा- ‘बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान, एक खुदा के पास इतना बड़ा मकान’ या फिर ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें , किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए ।‘ उनकी शायरी के ये स्वर लंबे वक्त तक साहित्य में याद किए जाएंगे ।

निदा फाजली का जन्म 12 अक्तूबर 1938 को दिल्ली में हुआ था और वो अपने माता-पिता की तीसरी संतान थे और उनका असली नाम मुक्तदा हसन था । बंटवारे के वक्त उन्होंने पाकिस्तान जाने की बजाए भारत में ही रहना ताय किया था क्योंकि वो दोस्तों से बिछुड़ना नहीं चाहते थे । उनका बचपन ग्वालियर में बीता था जहां उन्होंने उस वक्त के विक्टोरिया कॉलेज से पढ़ाई पूरी की थी । ग्वालियर में रहते हुए उन्होंने उर्दू अदब में अपनी पहचान बना ली थी । उस वक्त ही उन्होंने अपना नाम बदल कर निदा फाजली रख लिया । उनकी कविताओं का पहला संग्रह ‘लफ्जों का पुल’ जब छपा तो उन्हें काफी शोहरत मिली, भारत में भी और पाकिस्तान में भी । बाद में वो मुंबई चले गए और फिर वहीं के होकर रह गए । उनकी शायरी परवान चढ़ी और जगजीत सिंह की आवाज ने उनको लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया । कालांतर में उन्होंने फिल्मों के लिए गीत लिखने शुरू किए जो काफी हिट रहे । ‘आप तो ऐसे ना थे’, ‘रजिया सुल्तान’, ‘सरफरोश’, ‘अहिस्ता-अहिस्ता’, ‘इस रात की सुबह नहीं’ और ‘चोर पुलिस’ में लिखे उनके गीतों ने धूम मचा दी थी । 2013 में निदा फाजली तो भारत सरकार ने पद्मश्री से नवाजा था । इसके अलावा भी उनको दर्जनों पुरस्कार मिले थे । निदा फाजली को 1998 में उनकी कृति ‘खोया हुआ सा कुछ’ के लिए साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित किया गया था । ‘खोया हुआ सा कुछ’ के अलावा ‘सफर में धूप’, ‘आंखों भर आकाश’, ‘मौसम आते जाते हैं’ ‘लफ्जों के फूल’ ‘मोर नाच’ आदि उनकी प्रमुख कृतियां हैं । ‘दीवारों के बीच’ उनकी गद्य रचना थी जो आत्मकथात्मक उपन्यास है । इस उपन्यास में उन्होंने विभाजन से लेकर 1965 तक की घटनाओं को सिलसिलेवार ढंग से पेश किया था । इसके बाद उन्होंने ‘दीवारों के बाहर’ नाम से बाद की घटनाओं को समेटा । फिर ‘तमाशा मेरे आगे’ का पकाशन हुआ जिसमें निदा के छिटपुट लेख संग्रहीत हैं । अंत में निदा की स्मृति को नमन करते हुए उनकी ही एक कविता – ‘हर कविता मुकम्मल होती है, लेकिन वो कलम से कागज पर, जब आती है, थोड़ी सी कमी रह जाती है ।‘ अलविदा निदा साहब ।  

Wednesday, January 16, 2013

अमिताभ से कसाब की तुलना नाजायज

हिंदी की साहित्यिक पत्रिका पाखी पिछले करीब दो महीनों से हिंदी जगत में विवादों के केंद्र में है । पहले तो उसने रांची में रह रहे हिंदी के बुजुर्ग प्रोफेसर और लेखक श्रवण कुमार गोस्वामी का हिंदी की चर्चित लेखिका महुआ माजी के उपन्यास मैं बोरिशाइल्ला के बारे में एक विवादास्पद लेख छाप कर हिंदी जगत में हडकंप मचा दिया । लेखकों के बीच महुआ के पक्ष और विपक्ष की रेखा साफ तौर पर दिखाई दी । कई लोगों को महुआ में कृतघ्नता का बोध दिखा तो कई लेखकों को इसमें महिलाओं को लेकर पुरुषों की मानसिकता का प्रतिबिंब दिखा । बहरहाल उस विवाद से एक बार फिर से अच्छी रचना की कमी झेल रहे हिंदी साहित्य को विवाद के रूप में विमर्श की गरमाहट मिली । लेखकों ने कम से कम इस मसले पर स्टैंड तो लिया । क्योंकि हाल के दिनों में लेखकों ने सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय जाहिर करनी बंद कर दी है ।
अब ताजा विवाद पाखी के जनवरी अंक में मशहूर शायर निदा फाजली के पत्र से उठा है । अपने पत्र में निदा फाजली ने सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की तुलना मुंबई हमले के गुनहगार और पाकिस्तानी आतंकवादी आमिर अजमल कसाब से कर दी है। संपादक के नाम लिखे पत्र में निदा फाजली ने लिखा कि – दूसरी बात जो आपकी संपादकीय में खटकी वह ज्ञानरंजन जैसे साहित्यकार की तुलना सत्तर के दशक के एंग्री यंगमैन अमिताभ बच्चन से की गई है । एंग्री यंग मैन को सत्तर के दशक तक कैसे सीमित किया जा सकता है । क्या 74 वर्षीय अन्ना हजारे को भुलाया जा सकता है । मुझे तो लगता है कि सत्तर के दशक से अधिक गुस्सा तो आज की जरूरत है, और फिर अमिताभ को एंग्री यंगमैन की उपाधि से क्यों नवाजा गया ? वे तो केवल अजमल आमिर कसाब की तरह गढ़ा हुआ खिलौना हैं । एक को हाफिज मुहम्मद सईद ने बनाया था, दूसरे को सलीम जावेद की कलम ने गढ़ा था, खिलौने को फांसी दे दी गई, लेकिन उस खिलौने को बनाने वाले को पाकिस्तान खुलेआम उसकी मौत का नमाज पढ़ने के लिए आजाद छोड़े हुए है । आपने भी खिलौने की प्रशंसा की, लेकिन खिलौना बनाने वाले को सिरे से भुला दिया । ‘किसी का नाम, किसी का काम’ की कहावत शायद इसी लिए गढ़ी गई है ।“  निदा साहब के इस पत्र के बाद साहित्यिक जगत में हलचल मच गई । उनके पक्ष और विपक्ष में लेखकों के बयान आने लगे । बयानों की पड़ताल के पहले हमें निदा फाजली के पत्र का विश्लेषण करना चाहिए । निदा फाजली को इस बात पर आपत्ति है कि कथाकार ज्ञानरंजन को पाखी में एंग्री यंग मैन क्यों बताया गया । दरअसल पिछले साल सितंबर में पाखी ने ज्ञानरंजन पर भारी भरकम विशेषांक निकाला था जिसके संपादकीय में प्रेम भारद्वाज ने लिखा था –ज्ञानरंजन की एक खासियत उनका आक्रोश है । यह आक्रोश उनकी कहानियों के पात्रों में भी दिखाई देता है । इन पंक्तियों के लिखते लिखते सहसा सत्तर दशक के एंग्रीयंगमैन अमिताभ याद आ जाते हैं । कुछ समानताएं और बहुत असमानताएं हैं दोनों दिग्गजों में । फिल्म को हेय मानने वाले कुछ शुद्धतावादियों के लिए यह तुलना असहज लग सकती है । लेकिन किसी चीज को अलग बड़े कैनवास में देखने में बुराई क्या है । मुझे इस तुलना के लिए माफ किया जाए, अगर किया जा सकता है तो । अपने उसी संपादकीय में प्रेम भारद्वाज लिखते हैं कि सुधीश पचौरी ने तो केवल स्टारडम के चलते नामवर सिंह को हिंदी साहित्य का अमिताभ बच्चन तक कह डाला । प्रेम भारद्वाज के इस बात का अंदेशा था कि साहित्य से जुड़े लोग उनकी इस तुलना पर सवाल खड़े कर सकते हैं लिहाजा उन्होंने पहले ही माफी मांग ली थी । लेकिन पाखी संपादक को शायद ही इस बात का इल्म रहा होगा कि साहित्य के अलावा फिल्मों से जुड़ा एक शायर उनकी तुलना पर उंगली उठाते हुए एक भयंकर भूल कर देगा ।
पाखी के इसी संपादकीय पर निदा फाजली को आपत्ति थी और उन्होंने पत्र लिखकर उसे जाहिर किया । लेकिन निदा इतने नाराज हो गए कि उन्हें यह तक याद नहीं रहा कि आमिर अजमल कसाब को भारत पर हमला करने और एक राष्ट्र के खिलाफ युद्ध झेड़ने का दोषी करार देकर उसे फांसी पर लटकाया गया है । एक ऐसे आतंकवादी से अमिताभ बच्चन की तुलना को किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता है । क्या अमिताभ बच्चन के देशप्रेम और उनकी कला पर कोई शक है । लेकिन जिस तरह से बुजुर्ग शायर निदा ने उनकी तुलना की है उससे ये लगता है कि निदा अमिताभ को अपमानित करना चाहते हैं । निदा ने जो लिखा उससे एक और बात ध्वनित होती है कि अमिताभ कुछ नहीं होते अगर सलीम जावेद नहीं होते तो । निदा के इन तर्कों पर बहस हो सकती है कि अमिताभ की सफलता में सलीम जावेद की कहानियों का कितना योगदान है । लेकिन अगर निदा ये मानते हैं कि सिर्फ कहानियों की वजह से ही अमिताभ बच्चन सदी के महानायक बने तो ये उनकी भूल ही नहीं है बल्कि ऐसा कहकर वो फिल्मों से जुड़े निर्देशकों, अन्य साथी कलाकारों, संगीतकारों के योगदान को भुला रहे हैं । किसी भी फिल्म की सफलता में कई सारे लोगों का सामूहिक योगदान होता है । निदा साहब फिल्मों को बहुत करीब से जानते हैं । बावजूद इसके इस तरह की तुलना करना उनकी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं है । अमिताभ बच्चन ने सलीम जावेद की कहानियों के अलावा भी कई ऐसी फिल्में की जो ना केवल यादगार हैं बल्कि क्लासिक्स की श्रेणी में आती हैं । अपनी सफलता की दूसरी पारी में अमिताभ बच्चन ने ब्लैक और पॉ जैसी सार्वकालिक फिल्में की जो ना केवल बॉक्स ऑफिस पर सफल रही बल्कि उसे सराहना भी मिली । लेकिन इन फिल्मों में रानी मुखर्जी और विद्या बालन के किरदार के बगैर सफलता का आकलन नहीं किया जा सकता है । इसके अलावा पॉ फिल्म में अमिताभ बच्चन के बोलने के लिए जिस तकनीक का इस्तेमाल किया गया उसके बिना क्या उस किरदार को निभा पाना संभव होता । हां इतना अवश्य है कि फिल्म और अभिनेता दोनों की सफलता में कहानियों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है ।
कहानीकार ज्ञानरंजन की तुलना अमिताभ बच्चन से करने से निदा फाजली इतने खफा हो गए कि गुस्से में अमिताभ की तुलना कसाब से तो की ही लेकिन इसके अलावा सलीम जावेद की तुलना भी पाकिस्तान में बैठे खूंखार आतंकवादी हाफिज सईद से कर डाली । किसी भी व्यक्तित्व की तुलना का एक अलिखित नियम होता है, एक मर्यादा होती है जिसका पालन करने की अपेक्षा सबों से की जाती है । तुलना करने में परंपराओं लोक मान्यताओं का भी ध्यान रखना आवश्यक माना गया है । हमारे आजादी के आंदोलन के दौरान कई आंदोलनकारियों ने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ बेहद उग्र रुख अपनाया हुआ था लेकिन क्या हम उनको आतंकवादी कह सकते हैं ।क्या भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों की तुलना दो हजार एक में भारतीय संसद पर हमला करनेवाले आतंकवादियों से की जा सकती है । कतई नहीं । उसी तरह अमिताभ बच्चन को चाहे निदा फाजली खिलौना माने लेकिन उन्हें उनकी तुलना कसाब से नहीं करनी चाहिए थी । अगर हम देखें तो पहले भी इस तरह की तुलनाएं हुई हैं जिसे साहित्य जगत ने नकार दिया था । इस लेख का अंत मैं मशहूर कथाकार और नाटककार असगर वजाहत के शब्दों में करना चाहूंगा- इस तरह की अभिव्यक्ति हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण है ।