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Saturday, February 6, 2021

रचनात्मकता सूखी तो विवाद का सहारा

हिंदी के एक कहानीकार हैं। नाम है उदय प्रकाश। उनकी लंबी कहानी ‘मोहनदास’ को साहित्य अकादमी ने उपन्यास मानते हुए पुरस्कृत किया था। उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी पुरस्कार देनेवाली जूरी में अशोक वाजपेयी भी थे। ये वही अशोक वाजपेयी हैं जिनको कभी उदय प्रकाश ने ‘भारत भवन का अल्सेशियंस’ कहा था। ये वही उदय प्रकाश हैं जिनको योगी आदित्यनाथ ने पहला ‘नरेन्द्र स्मृति सम्मान’ दिया था। जब उनको ये पुरस्कार मिला था तब हिंदी के कई लेखकों ने बयान जारी कर उनकी निंदा की थी। इनमें ‘पहल’ पत्रिका के संपादक ज्ञानरंजन के अतिरिक्त विद्यासागर नौटियाल, विष्णु खरे, भगवत रावत, मैनेजर पांडे, राजेन्द्र कुमार, इब्बर रब्बी, मदन कश्यप और देवी प्रसाद मिश्र जैसे वामपंथी लेखक शामिल थे। उस वक्त खूब विवाद हुआ था। इसके बाद उदय प्रकाश ने 2015 में पुरस्कार वापसी का शिगूफा छेड़ा था। ये अलग बात है कि अभी तक वो अपनी पुस्तकों पर अपने परिचय में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक लिखते हैं। पुरस्कार वापसी का शिगूफा छोड़नेवाले उदय प्रकाश पहले लेखक थे लेकिन बाद में अशोक वाजपेयी और मंगलेश डबराल जैसे लेखकों ने इसको लपक लिया था और वो पुरस्कार वापसी अभियान के अगुआ माने गए थे। उदय प्रकाश इस बात को लेकर अपने वामपंथी साथियों से झुब्ध हुए थे कि पुरस्कार वापसी का पर्याप्त श्रेय उनको नहीं मिल पाया। 

उदय प्रकाश ने लंबे समय से छिटपुट लघु कथाएं और कविताओं को छोड़कर कुछ लिखा नहीं। लेकिन चर्चा में बने रहने की कला में माहिर हैं। कभी रेत माफिया से जान का खतरा तो कभी हिंदी लेखक प्रभात रंजन के साथ इंटरनेट मीडिया पर अनावश्यक विवाद खड़ा करके वो चर्चा में बने रहते हैं। उदय प्रकाश के बारे में इतना लिखने का औचित्य ये है कि वो एक बार फिर से विवादों में हैं। दरअसल पिछले दिनों उदय प्रकाश ने अयोध्या में बन रहे राम मंदिर के लिए चंदा दिया और उसकी रसीद अपने फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट कर दी। इस टिप्पणी के साथ कि ‘आज की दान दक्षिणा’। इसके नीचे कोष्ठक में लिखा ‘अपने विचार अपनी जगह पर सलामत’। उनकी इस पोस्ट के बाद वामपंथी खेमे से विरोध के स्वर उठने लिखे। कई लोगों ने उदय प्रकाश का नाम लेकर तो कइयों ने बगैर नाम लिए उनपर पाला बदलने का आरोप लगाया। उदय प्रकाश के इस कदम को लेकर हिंदी साहित्य के कई लेखक अबतक उबल रहे हैं। कुछ ने तो सारी हदें पार करते हुए राम मंदिर तक पर मर्यादाहीन टिप्पणी कर डाली। इसके बाद राम मंदिर के पक्षधरों ने भी मोर्चा खोल दिया। परिणाम ये हुआ कि उदय प्रकाश एक बार फिर से चर्चा के केंद्र में आ गए।  

उदय प्रकाश हिंदी के एक ऐसे लेखक हैं जिन्होंने किसी जमाने में कुछ अच्छी कहानियां और कविताएं लिखी थीं। बाद में जब रचनात्मकता का सिरा उनके हाथ से छूटा तो वो साहित्येतर क्रियाकलापों से खुद को प्रासंगिक बनाने की जुगत में लग गए। कुछ सालों पहले इस बात की चर्चा हुई थी उदय प्रकाश अपना पहला उपन्यास लिखने जा रहे हैं। खुद लेखक ने भी इस आशय की बातें की थीं। उस वक्त कवि केदारनाथ सिंह जीवित थे, उन्होंने भी अपने एक साक्षात्कार में ये बात बताई थी कि उदय प्रकाश ‘चीना बाबा’ के नाम से एक उपन्यास लिख रहे हैं। साहित्यिक हलकों में तो इस बात की भी चर्चा थी कि उदय प्रकाश ने एक विदेशी प्रकाशन गृह से इसके प्रकाशन के लिए अनुबंध कर लिया है और उनको अग्रिम धनराशि भी मिल गई है। लेकिन सालों बीत जाने के बाद भी अबतक हिंदी साहित्य जगत ‘चीना बाबा’ का इंतजार कर रहा है। इस बीच ‘चीना बाबा’ को लेकर कई तरह की बातें हिंदी प्रकाशन की दुनिया में होती रहीं। कभी किसी प्रकाशन से तो कभी किसी प्रकाशन से उसके प्रकाशित होने की चर्चा होती रही। इस बीच करीब दो साल पहले उनका एक कविता संग्रह ‘अंबर में अबाबील’ प्रकाशित हुआ था। इस कविता संग्रह को ना तो पाठकों ने पसंद किया और ना ही आलोचकों ने। हिंदी साहित्य जगत में तो इसकी चर्चा ही नहीं हुई। पिछले दो साल से ही उनके नए कहानी संग्रह के प्रकाशन की चर्चा सुनाई दे रही है लेकिन वो भी अबतक प्रतीक्षित है। इन सालों में तात्कालिक घटनाओं पर उन्होंने जो खबरनुमा लघु कथाएं लिखी हैं वो भी अबतक इतनी नहीं हो पाई हैं कि जिसको एक संग्रह का रूप दिया जा सके।     

रचनात्मकता के स्तर पर चुक जाने के बाद उदय प्रकाश ने अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए या खुद को चर्चा में बनाए रखने के लिए राम के शरण में जाना तय किया। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए उन्होंने चंदा दिया। राम मंदिर को चंदा देने को वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है। राम को किसी वाद विशेष के अनुयायियों के आराध्य के तौर पर देखनेवालों से इस तरह की गलतियां हो जाती हैं। राम के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करनेवालों से भी अक्सर इस तरह की भूल हो जाती हैं। राम भारतीय संस्कृति में इस तरह से रचे-बसे हैं कि उनके सामने कोई भी वाद अर्थहीन हो जाता है। राम के व्यक्तित्व का जो वैराट्य है वो धर्म,जाति, विचारधारा,तर्क आदि की परिधि से परे है। राम मंदिर निर्माण को किसी संकीर्ण दृष्टि से देखना या उसपर विवाद खड़ा करना अनुचित है। राम मंदिर पर उठने वाले तमाम विवादों को देश की सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले से विराम दे दिया था। उसके बाद ही अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण आरंभ हुआ है। मंदिर का निर्माण पूरे देश की जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप हो रहा है। ऐसे में एक वामपंथी लेखक का प्रभु श्रीराम के अयोध्या में निर्मित हो रहे मंदिर के लिए योगदान करना कोई ऐसी बात नहीं है जिसको लेकर विवाद खड़ा किया जाए। वो उनकी आस्था है। यहां यह याद दिलाना उचित होगा कि अपने जीवन के अंतिम दिनों में नामवर सिंह की ईश्वर में आस्था सार्वजनिक हुई थी। लेकिन उदय प्रकाश ने जिस तरह से मंदिर के लिए दिए गए चंदे की रसीद को सार्वजनिक किया उसको लेकर प्रश्न उठाना सही है। लेकिन वामपंथी लेखक प्रश्न इस बात पर नहीं ख़ड़े कर रहे हैं, उनको आपत्ति इस बात को लेकर है कि उदय प्रकाश ने मंदिर निर्माण के लिए चंदा क्यों दिया? यह अनायास नहीं है कि उदय प्रकाश जैसे विवादाचार्य वामपंथ की इन कमजोरियों का फायदा उठाकर खुद को चर्चा में बनाए रखने का उपक्रम करते हैं। उदय प्रकाश को ये बखूबी पता रहा होगा कि राम मंदिर निर्माण के लिए चंदा देने से वामपंथी नाहक विवाद खड़ा करेंगे। हुआ भी वैसा ही। 

दरअसल भारत के वामपंथी बुद्धिजीवी अबतक ना तो भारत को समझ पाए हैं और ना ही भारतीय मानस को। अगर भारतीय मानस को समझ जाते तो प्रभु श्रीराम के मंदिर निर्माण को लेकर इस तरह की अमर्यादित टिप्पणियां नहीं करते। समझ तो वो भारतीय संस्कृति को भी नहीं पाए, अगर समझ पाते तो राम मंदिर को किसी खास विचारधारा या खास राजनीतिक दल से जोड़कर देखने की गलती नहीं करते। वो बहुधा इस तरह की गलतियां करते रहे हैं और इसी गलत सोच के चलते उनके सारे कदम भारतीय संस्कृति के खिलाफ ही उठते रहे हैं। इन्हीं गलत आकलन के चलते वामपंथ भारत में लगभग अप्रसांगिक हो चुका है। सांस्कृतिक तौर पर भी और राजनीतिक तौर पर भी। आज जब एक बार फिर से पूरा विश्व भारत की ज्ञान परंपरा को, भारतीय संस्कृति को, भारतीय चिकित्सा पद्धति को एक नई उम्मीद के साथ देख रहा है वहीं भारतीय वामपंथी बुद्धिजीवी अब भी विदेशी विचारधारा के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। 


Saturday, March 4, 2017

असहिष्णुता का झंडाबरदार बेनकाब

नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बनी केंद्र सरकार को लेकर एक खास विचारधारा के लेखकों के बीच बेचैनी दिखाई देती है । इस खास विचारधारा के लोगों ने मई दो हजार चौदह के बाद से देश में फासीवाद से लेकर असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की आजादी पर आसन्न खतरे को लेकर खूब छाती कूटी है । पिछले साल कई लेखकों और कलाकारों ने पुरस्कार वापसी समूह में शामिल होकर केंद्र सरकार को घेरने का उपक्रम किया था । पुरस्कार वापसी से किसको क्या फायदा क्या नुकसान हुआ यह तो देश के लोगों ने देखा । लेखकों-कलाकारों की विश्वसनीयता भी सवालों के दायरे में आई । इन दिनों एक बार फिर से दिल्ली युनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज को लेकर पुरस्कार वापसी गैंग सक्रिय हो गया है । जेएनयू के वक्त कन्हैया कुमार इनके नायक थे और इस वक्त गुरमेहर कौर । पुरस्कार वापसी पार्ट वन के दौर में एक हिंदी के लेखक ने खूब सुर्खियां बटोरी थी जिनका नाम था उदय प्रकाश । हिंदी में कहानियां और कविताएं लिखते हैं और उपन्यास की विधा में साहित्य अकादमी पुरस्कार लेने में सफल रहे हैं । यह उदय प्रकाश की प्रतिभा का ही कमाल था कि साहित्य अकादमी ने उनकी लंबी कहानी को उपन्यास मानते हुए उनको पुरस्कृत करने का फैसला किया था । उदय प्रकाश हिंदी साहित्य में अपनी आस्था बदलने के लिए मशहूर रहे हैं । खैर उदय प्रकाश के साहित्यक और गैर साहित्यक कृत्यों पर आगे बात होगी । पिछले दिनों मुंबई में आयोजित लिट ओ फेस्ट में उदय प्रकाश का असली चेहरा देखने को मिला । उदय प्रकाश पिछले दो साल से असहिष्णुता और फासीवाद के विरोध के गढ़े हुए नायक के तौर पर सामने आए हैं । लेकिन जिन लोगों ने उनकी मेहनत के साथ उनकी इस छवि का निर्माण किया उनको या तो उदय प्रकाश के अतीत के बारे में पता नहीं था या विकल्पहीनता के चलते उन्होंने इस तरह का कदम उठाया । यह उस वजह से कह रहा हूं कि उदय प्रकाश अपनी कहानियों के साथ साथ सार्वजनिक जीवन में भी जादुई यथार्थ गढ़ते चलते हैं, वैसा यथार्थ जो उनके सामने मुनाफे के द्वार खोलता चलता है ।
मुंबई लिट-ओ-फेस्ट के दौरान उदय प्रकाश ने खुद का फासीवादी और असहिष्णु चेहरा सामने रखा जब उन्होंने मेरे साथ सत्र में बैठने से इंकार कर दिया । पूरा किस्सा कुछ उस तरह का रहा कि फेस्टिवल शुरू होने के पहले वो मुंबई पहुंचे और वहां पहुंचते ही उनको पता पड़ा कि अन्य वक्ताओं के साथ वो भी उस सत्र में हैं जिसका संचालन उनको करना था । यह पता चलते ही उदय प्रकाश भड़त गए और उन्होंने आसमान सर पर उठा लिया और आयोजकों तक यह संदेश पहुंचाने लगे कि वो वापस लौटना चाहते हैं । होटल के कमरे में पहुंचकर जब उनको यह पता चला कि रसरंजन आदि की व्यवस्था आयोजकों की ओर से नहीं होकर स्वयं करनी है तो गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा । देर रात तक मान मनौव्वल का दौर चलता रहा । आयोजकों की ओर से मुझे ये जानकारी मिल रही थी कि उदय प्रकाश ने सामान पैक कर लिया है और वो वापस लौटना चाहते हैं । आयोजक मुझसे ये जानने की कोशिश कर रहे थे कि दरअसल उदय प्रकाश मुझसे खफा क्यों हैं क्योंकि उदय ने साफ कर दिया था कि वो किसी भी कीमत पर उस सत्र में नहीं बैठने वाले हैं जिसका संचालन मुझे करना था । उदय ने मेरे बारे में कई आपत्तिजनक बातें भी कही । आयोजक पर यह दबाव बनने लगा था कि वो होटल में आकर उदय प्रकाश से मिलें और उनको मनाने की कोशिश करें । इस लिट फेस्ट की आयोजक स्मिता पारिख टस से मस नहीं हो रही थी और वो अतत: उनको मनाने नहीं आईं । मुझे बताया गया कि उन्होंने ये संकेत दे दिया कि  दोनों उनके सम्मानित अतिथि हैं और अगर उदय जी को तकलीफ है तो वो अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हैं । इसके बाद मामला किसी तरह शांत हुआ और उदय प्रकाश अगले दिन शाम को वापस दिल्ली लौट आए । जब से असहिष्णुता का विवाद चला है तब से यह मुझे हवा हवाई मुद्दा लगता था लेकिन पहली बार मेरी मुलाकात असहिष्णुता से हुई और साहित्यक अस्पृश्यता का अनुभव हुआ । असहिष्णुता का प्रतिनिधित्व वो शख्स कर रहा था जिसने पिछले साल साहित्य अकादमी पुरस्कार को वापस करने का एलान कर सुर्खियां बटोरी थी ।
दरअसल उदय की पीड़ा यह रही है कि पुरस्कार वापसी के दौर में भी और उसके पहले भी मैंने उनके दोहरे चरित्र को लगातार उजागर किया है । जब उन्होंने गोरखपुर में गोरक्षपीठ के कर्ताधर्ता और बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ के हाथो पहला 'नरेन्द्र स्मृति सम्मान' लिया था तो उस वक्त भी मैंने अपने इसी स्तंभ में चर्चा की थी । उदय प्रकाश सार्वजनिक जीवन में कई दशकों से वामपंथी आदर्शों की दुहाई देते रहे हैं लेकिन योगी से  सम्मान ग्रहण के बाद उनकी नैतिक आभा निस्तेज हो गई थी । उदय को नजदीक से जानने वालों का दावा है कि उदय प्रकाश हमेशा से अवसरवादी रहे हैं और जब भी, जहां भी मौका मिला है उन्होंने इसे साबित भी किया है । परिस्थितियों के अनुसार उदय प्रकाश अपनी प्राथमिकताएं और प्रतिबद्धताएं तय करते हैं, भले ही उसको कोई नैतिक आवरण में ढंक कर । उदय प्रकाश ने अपनी कृति- सुनो कारीगर- को लगभग दर्जनभर साहित्यकारों को समर्पित किया था।एक साथ दर्जनभर से ज्यादा साहित्यकारों/आलोचकों को साधने की कोशिश । उदय प्रकाश भारत भवन की पत्रिका पूर्वग्रह से भी जुड़े रहे हैं,जब उदय प्रकाश को पूर्वग्रह से बाहर होना पड़ा था तो उदय जी अशोक वाजपेयी और उनकी मित्रमंडली को 'भारत भवन के अल्सेशियंस' तक कह डाला था । उदय प्रकाश अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं और साहित्यक मर्यादा भूलकर अपने विरोधियों पर बिलो द बेल्ट हमला करते हैं । रविभूषण ने जब इनकी कहानियों पर विदेशी लेखकों की छाया की बात की थी तो मामला कानूनी दांव-पेंच में भी उलझा था ।
वर्तमान साहित्य के मई दो हजार एक के अंक में उपेन्द्र कुमार की कहानी 'झूठ का मूठ' छपी थी तो उस वक्त भी विवाद हुआ था कि इस कहानी के केंद्र में उदय हैं । उस कहानी पर सुधीश पचौरी ने लिखा था- अरसे से हिंदी कथा लेखन में एक न्यूरोटिक लेखक कई लेखकों को अपने मनोविक्षिप्त उपहास का पात्र बनाता आ रहा था । पहले उसने एक महत्वपूर्ण कवि की जीवनगत असफलताओं को अपनी एक कहानी में सार्वजनिक मजाक का विषय बनाया । फिर वामपंथी गीतकार की असफल प्रेमकथा का सैडिस्टिक उपहास उड़ाने के लिए कहानी लिखी । किसी ने रोका नहीं तो, तो जोश में कई हिंदी अद्यापकों और आलोचकों के निजी जीवन पर कीचड़ उचालनेवाली शैली में कविताएं भी लिख डाली ।  किसी दीक्षित मनोविक्षिप्त की तरह उसने ये समझा कि उसे सबको शिकार करने का लाइसेंस हासिल हो गया है । उसके शिकारों में से उक्त गीतकार तो आत्महत्या तक कर बैठा ।  हिंदी के कई पाठक उसकी आत्महत्या के पीछे का कारण इस साडिज्म को भी मानते हैं । यह लेखक दरअसल स्वयं एक 'माचोसाडिस्ट' है जो दूसरों को अपने 'मर्दवादी परपीड़क विक्षेप' में जलील करता और सताता आया है । यह पहली कहानी है जिसने एक दुष्ट शिकारी का सरेआम शिकार किया है । शठ को शठता से ही सबक दिया है ।'

उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी पुरस्कार उनकी लंबी कहानी को उपन्यास बताकर दिया गया । पुरस्कार की चयन समिति की बैठक में जो बातें हुई, जो सौदेबाजी हुई उसने पुरस्कार को संदिग्ध बना दिया था । जूरी में अशोक वाजपेयी, चित्रा मुद्गल और मैनेजर पांडे थे । बैठक शुरू होने पर अशोक वाजपेयी ने रमेशचंद्र शाह का नाम प्रस्तावित किया था लेकिन उसपर मैनेजर पांडे और चित्रा मुदगल दोनों ने आपत्ति की । जब शाह के नाम पर सहमति नहीं बनी तो अशोक वाजपेयी ने उदय प्रकाश का नाम प्रस्तावित कर दिया था । मैनेजर पांडे ने जोरदार विरोध किया क्योंकि वो उदय प्रकाश की कहानी पीली छतरी वाली लड़की से आहत थे । मैनेजर पांडे ने मैत्रेयी पुष्पा का नाम अकादमी पुरस्कार के लिए बढाया । अब चित्रा जी के पास अशोक जी का समर्थन करने के अलावा कोई चारा नहीं था । इस तरह उदय प्रकाश को एक के मुकाबले दो मतों से साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला । उदय प्रकाश का हिंदी साहित्य को लेकर अपना एक फ्रस्टेशन है । उनको लगता है कि उनको जितना मिलना चाहिए था उतना साहित्य से मिला नहीं,उनकी प्रतिभा का साहित्य में सही इस्तेमाल नहीं हो पाया । हो सकता है इन्ही वजहों ने मनोवैज्ञानिक रूप से उदय प्रकाश को कमजोर कर दिया हो और वो अपने ध्येय को प्राप्त करने के चक्कर में रास्ते से बार बार फिसलते रहे हों । उदय प्रकाश की उन्हीं फिसलनों और विचलनों में से असहिष्णुता और पुरस्कार वापसी का खेल भी खेला था लेकिन मुंबई लिट ओ फेस्ट के दौरान इस खेल से पर्दा हट गया । 

Sunday, September 6, 2015

पुरस्कार वापसी या प्रचार पिपासा !

कन्नड़ के लेखक प्रोफेसर एम एम कालबुर्गी की हत्या के विरोध में साहित्यक और सांस्कृतिक जगत उद्वेलित है । सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक इस हत्या के विरोध में प्रदर्शन आदि भी हो रहे हैं । हत्यारों को पकड़ने और उसको सजा देने की मांग लगातार जोड़ पकड़ रही है । कर्नाटक में 30 अगस्त को प्रोफेसर एमएम कालबुर्गी की हत्या के बाद धीरे-धीरे विरोध के स्वर तेज होते जा रहे हैं । विरोध का स्वर इस बात को लेकर भी तीखा है कि प्रोफसर कालबुर्गी वामपंथी विचारक लेखक थे और उनकी हत्या का आरोप हिंदूवादी संगठन पर लग रहा है । इस बहाने से वामपंथ के अनुयायियों को हिंदुत्ववादियों पर हमला करने का अवसर मिल गया है । गांधी के इस देश में किसी की भी हत्या का इससे भी तीव्र विरोध होना चाहिए । हत्या के विरोध में सिर्फ किसी खास विचारधारा के लोगों के प्रदर्शन की बजाए पूरे समाज को उठ खड़ा होना चाहिेए । सभ्य समाज में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए । प्रोफसर कालबुर्गी छिहत्तर साल के बुजुर्ग लेखक थे और कर्नाटक के धारवाड़ में सेवानिवृत्ति के बाद अपनी जिंदगी गुजार रहे थे । उन्हें पहले भी कुछ स्वयंभू हिंदू संगठनों से धमकियां मिली थीं क्योंकि वो अपने विचारों से रैशनलिस्ट माने जाते रहे हैं । धर्म आदि पर उनके विचार बहुधा धार्मिकता और अंधविश्वास आदि पर चोट करती थी । दो हजार चौदह में भी प्रोफेसर कालबुर्गी ने मूर्ति पूजा के विरोध में एक बेहद आपत्तिजनक बयान दिया था । तब उन्होंने कहा था कि बचपन में वो भगवान की मूर्तियों पर पेशाब करके ये देखा करते थे कि वहां से कैसी प्रतिक्रिया मिलती है । यह विचार एक ऐसा छोर है जो कि मूर्तिपूजकों की भावनाओं को आहत कर सकता है । भवनाएं आहत होने पर कानून में उसके लिए प्रावधान है, इसका यह मतलब नहीं है कि किसी का कत्ल कर दिया जाए । विचारों की लड़ाई में खूव खराबे या हिंसा को कोई स्थान नहीं होना चाहिए । चंद सिरफिरे लोग ही इस तरह की हरकतें करते हैं । इसके पहले भी लिंगायत समाज के अराध्य बासव और उनकी पत्नी और बेटी के बारे में विवादित लेखन कर कालबुर्गी विवादों में घिरे थे । बाद में उन्होंने लिंगायत समुदाय के तगड़े विरोध के बाद खेद आदि भी जताया था । यह विरोध का लोकतांत्रिक तरीका था और इसका हक हमारा संविधान हमें देता है । अभिव्यक्ति की आजादी की गारंटी संविधान उस वक्त तक ही देता है जबतक कि उस आजादी से किसी अन्य शख्स के अधिकारों का हनन ना हो । दरअसल होता यह है कि कई बार हम अभिव्यक्ति की आजादी के हक को माते हुए अभिव्यक्ति की अराजकता तक जा पहुंचते हैं । विचारों की लड़ाई में बहुधा हम इस महीन सी लाइन के पार भी चले जाते हैं, उसका विरोध भी होता है, मंथन भी होता है, तर्क वितर्क होते हैं । हमें यह मालूम है कि मंथन से विष भी निकलता है लेकिन विचारों के मंथन से जो विष निकलता है वो जानलेवा नहीं होता है । होना भी नहीं चाहिए । जिस दिन विचार मंथन से निकलनेवाला विष जानलेवा हो जाएगा उस दिन ना तो हमारे समाज में विचार के लिए जगह बच पाएगी और ना ही अभिव्यक्ति की आजादी का माहौल रहेगा । हमें इतिहास को नहीं भूलना चाहिए कि किस तरह से सोवियत रूस और चीन में विचारों को लेकर हत्या का खेल खेला गया । किस तरह से विरोधी विचारधारा वाले लेखकों और पत्रकारों को यातनाएं दी गईं, किस तरह से राजसत्ता के द्वारा उनकी या तो हत्या कर दी गई या फिर उनको देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। चीन में तो अब भी यह आजादी हासिल नहीं है ।   
प्रोफेसर कालबुर्गी की हत्या के बाद एक बार फिर से फेसबुकिए वामपंथी चिंतकों ने फासीवाद के आसन्न खतरे पर शोर मचाना शुरू कर दिया । दरअसल हमारे देश में वामपंथ के अनुयायी होने का दंभ भरनेवाले जो लोग चिंतक, विचारक आदि बने घूम रहे हैं उनको लगता है कि इस तरह की बातों से ही उनकी दुकानदारी कायम रह सकती है । पहले भी वो ऐसा कर अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने में कामयाब रहे हैं । इस तरह के फेसबुकिए वामपंथियों को अब हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश में एक नया नायक नजर आने लगा है । दरअसल उदय प्रकाश ने प्रोफेसर कालबुर्गी की हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी पुरस्कार राशि समेत लौटाने का एलान कर दिया है । फेसबुक पर उदय प्रकाश ने लिखा- पिछले समय से हमारे देश में लेखकों, कलाकारों, चिंतकों और बौद्धिकों के प्रति जिस तरह का हिंसक, अपमानजनक, अवमानना पूर्ण व्यवहार लगातार हो रहा है, जिसकी ताज़ा कड़ी प्रख्यात लेखक और विचारक तथा साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ साहित्यकार श्री कलबुर्गी की मतांध हिंदुत्ववादी अपराधियों द्वारा की गई कायराना और दहशतनाक हत्या है, उसने मेरे जैसे अकेले लेखक को भीतर से हिला दिया है।  अब यह चुप रहने का और मुँह सिल कर सुरक्षित कहीं छुप जाने का पल नहीं है। वर्ना ये ख़तरे बढ़ते जायेंगे। मैं साहित्यकार कुलबर्गी जी की हत्या के विरोध मेंमोहन दासनामक कृति पर 2010-11 में प्रदान किये गये साहित्य अकादमी पुरस्कार को विनम्रता लेकिन सुचिंतित दृढ़ता के साथ लौटाता हूँ। अभी गॉंव में हूँ। 7-8 सितंबर तक दिल्ली पहुँचते ही इस संदर्भ में औपचारिक पत्र और राशि भेज दूँगा। मैं उस निर्णायक मंडल के सदस्य, जिनके कारणमोहन दासको यह पुरस्कार मिला, अशोक वाजपेयी और चित्रा मुद्गल के प्रति आभार व्यक्त करते हुए, यह पुरस्कार वापस करता हूँ। आप सभी दोस्तों से अपेक्षा है कि आप मेरे इस निर्णय में मेरे साथ बने
अब जरा विचार कीजिए । उदय प्रकाश जिनकी लंबी कहानी मोहनदास को उपन्यास मानकर अकादमी ने पुरस्कृत कर उपकृत किया, लिहाजा उन्होंने उस वक्त के निर्णायकों का आभार जताया है । दूसरी बात यह है कि कि उन्होंने जिस बिनाह पर साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान किया है वो दरअसल विरोध नहीं बल्कि प्रचार की बुनियाद पर खड़ा है । उनके शब्दों को देखते हैं श्री कालबुर्गी की मतांध हिंदुत्ववादी अपराधियों द्वारा की गई कायराना और दहशतनाक हत्या है, उसने मेरे जैसे अकेले लेखक को भीतर से हिला दिया है। उदय प्रकाश जी इतिहास या अतीत को बेहद सुविधाजनक तरीके से भुला रहे हैं । जब ये मतांध हिंदुवादी शब्द बोलेते हैं तो पूरे हिंदी साहित्य में उनकी वो तस्वीर कौंध जाती है जब वो गोरखपुर के सांसद महंथ आदित्यनाथ के हाथों सम्मानित हो रहे होते हैं । महंथ आदित्यनाथ के हाथों मिले सम्मान को अपने साहित्यक मस्तक पर कलगी की तरह लगाकर घूम रहे उदय प्रकाश जब साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की बात करते हैं तो बात हजम नहीं होती । कम से कम विरोध की वजह तो हल्की हो ही जाती है । बेहतर होता कि उदय जी महंथ आदित्यनाथ के हाथों मिले पुरस्कार को मतांध हिंदीवादी ताकतों के विरोधस्वरूप लौटाते फिर आगे कोई कदम उठाते । साहित्य अकादमी लगभग सरकारी संस्थान है जो करदाताओं के पैसे से चलता है । पुरस्कार आदि भी उसी राशि से प्रदान किए जाते हैं । उदय प्रकाश का सहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटाने का फैसला नीतिगत दोष का भी शिकार है । परंपरा यह रही है कि सरकारी नीतियों आदि के विरोध में सरकारी पुरस्कार लौटाए जाते रहे हैं ।

उदय प्रकाश के इस कदम पर तमाम छोटे-बड़े और मंझोले वामपंथी विचारक लहालोट होकर उनको लाल सलाम कर रहे हैं । उनके साहस की दाद दे रहे हैं । दरअसल वामपंथियों के साथ ये बड़ी दिक्कत है कि वो इतिहास को सुविधानुसार विस्मृत कर देते हैं या फिर उसकी शवसाधना में जुट जाते हैं । दोनों ही स्थिति खतरनाक है । उदय प्रकाश के मामले में भी वामपंथी विचारकों ने अपनी सुविधा के लिए उस तस्वीर को विस्मृत कर दिया या फिर सायास उसको धुंधला करने की कोशिस कर रहे हैं जहां उदय प्रकाश महंथ आदित्यनाथ से पुरस्कृत हो रहे हैं । विचारो की इस लड़ाई में तथ्यों और इतिहास को भुलाने या सुविधानुसार इस्तेमाल करने का यह वामपंथी खेल बेहद खतरनाक है जो लोकतंत्र में जनता को बरगलाती है । जनता को बरगलाने का यह खेल अंतत: लोकतंत्र को कमजोर करता है जो कि वामपंथियों के बड़े डिजाइन का हिस्सा है । लोकतंत्र में उनकी आस्था कभी रही नहीं है । मार्क्स के अनुयायियों ने उनके सिद्धातों को इस तरह से आगे बढ़ाया कि लोगों की आस्था उसमें उत्तरोत्तर कम होती चली गई । वामपंथ जनता की बात तो करता है परंतु जनता को तमाम अधिकारों से वंचित रखने का कुत्सित खेल भी खेलता है । रूस और चीन इसके ज्वलंत उदाहरण हैं । इन दो उदाहरणों के अलावा कुछ कहने की आवश्यकता बचती नहीं है । कालबुर्गी के हत्या के विरोध में खड़े लोगों की मंशा को भी परखने की जरूरत है । हत्या पर राजनीति ना हो , हत्यारों को गिरफ्तार किया जाए और उसको कड़ी से कड़ी सजाय हो, मंशा ये होनी चाहिए ।   

Saturday, January 3, 2015

कविता की राह कहानी

हाल की में संपन्न हुए रायपुर साहित्य महोत्सव के दौरान एक अनौपचारिक बातचीत में हिंदी के वरिष्ठ कथाकार ह्रषिकेश सुलभ जी ने बेहद हल्के फुल्के अंदाज में कहा था कि इन दिनों फेसबुक पर कुछ कवयित्रियां पगली बयार की तरह बउआ रही हैं । मजाक में कही गई ह्रषिकेश सुलभ की इस बात पर कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है । हुई भी । पगली बयार और बउआना दो ऐसे शब्द हैं जो फेसबुकिया साहित्यकारों पर बहुधा सटीक बैठती हैं । फेसबुक पर कविताओं की इन दिनों बाढ़ आई हुई है । फैसबुक ने रचनात्मकता को एक मंच प्रदान किया है । कुछ लेखक, लेखिका तो नियमित रूप से हर दिन कविताएं पोस्ट कर रही हैं । हिंदी के प्रकाशकों का भी इस ओर ध्यान गया है । अभी जयपुर के एक प्रकाशक ने तो फेसबुक के सौ कवियों की कविताओं के संग्रह को छापने का एलान करते हुए एक पोस्टर जारी किया है । कुछ दिनों तक फेसबुक पर यह पोस्टर खूब पोस्ट हुआ । जिनकी कविताएं छप रही हैं उनमें से ज्यादातर ने इसको प्रचारित प्रसारित किया । यह हाल सिर्फ कविता का नहीं है । हिंदी साहित्य में इन दिनों कहानियां भी बहुतायत में लिखी जा रही हैं । मांग के आधार पर कहानियां लिखने का चलन इन दिनों बढ़ा है । जिस तरह से लेख लिखे जाते हैं उसी तरह से इन दिनों कहानियां भी लिखी जा रही हैं । कहानीकारों पर शब्द संख्या में कहानीलिखने का दबाव बढ़ा है । पत्र-पत्रिकाओं की अपनी सीमाएं होती हैं और उनके पाठक लंबी कहानियां पढ़ना नहीं चाहते हैं लिहाजा वहां से छोटी कहानियों की मांग होती है । हजार डेढ हजार शब्दों की कहानी । इसका नुकसान यह हो रहा है कि नई पीढ़ी के कथाकार छोटी कहानियां लिख रहे हैं जो कि विस्तार से स्थितियों और परिस्थितियों के चित्र में नाकाम रही रही हैं । परिस्थिति के विशाल फलक से सिमटती हुई कहानी घटना प्रधान होती जा रही है । कहीं कहीं तो कहानी और घटनाओं के विवरण का भेद भी मिट जा रहा है ।

यह अकारण नहीं है कि हिंदी के कथा प्रदेश में कई कथाकार फॉर्मूलाबद्ध कहानियां लिखकर ख्यात होने की बेचैनी से विचरण कर रहे हैं । इस वक्त हिंदी में कहानीकारों की पांच पीढ़ियां मौजूद हैं । कृष्णा सोबती और शेखर जोशी सबसे वरिष्ठ पीढ़ी के कथाकार हैं । उसके बाद रवीन्द्र कालिया और दूधनाथ सिंह की पीढ़ी, फिर उदय प्रकाश, शिवमूर्ति की पीढ़ी, उसके बाद अखिलेश से लेकर संजय कुंदन की पीढ़ी और इस वक्त बिल्कुल युवा लेखकों की पीढ़ी जिसमें गीताश्री, मनीषा कुलश्रेष्ठ से लेकर बिल्कुल नई कथाकार इंदिरा दांगी और सोनाली सिंह कहानी लिख रही हैं । नई कहानी के दौर में हरिशंकर परसाईं कभी कहा था कि जीवन के अंश को अंकित करनेवाली हर गद्य रचना, जिसमें कथा का तत्व हो, आज कहानी कहलाती है ।  कालांतर में यह और भी विकसित हुआ लेकिन कहानी से कथा तत्व का लगातार ह्रास होते रहा । नये विषयों और नई भाव-भूमि और नए यथार्थ की आड़ में कहानी का रूप बदला लेकिन यह रूप हर जगह एक सा ही लगने लगा । कहानी के इस एकरूपता ने कहानी से किस्सागोई गायब कर दी । घटना प्रधान और विवरणों से भरपूर कहानियां थोक के भाव से लिखी जाने लगीं । आज हम कहानी के परिदृश्य पर नजर डालते हैं तो ज्ञानरंजन की घंटा, रवीन्द्र कालिया की काला रजिस्टर, दूधनाथ सिंह की रक्तपात, अमरकांत की हत्यारे, शेखर जोशी की कहानी कोशी का घटवार, शिवमूर्ति का तिरिया चरित्तर, सृंजय का कामरेड का कोट के अलावा उदय प्रकाश की कहानियों याद आती हैं । इन कहानियों के बरक्श आज की कहानियों को रखकर देखने पर स्थिति उत्साहजनक नहीं दिखाई देती है । कविता की तरह अब कहानी भी थोक के भाव से लिखी जाने लगी है । प्रसिद्धि की भागदौड़ में कहानी पीछे छूट रही है । वजह की तलाश होनी चाहिए । 

Tuesday, July 30, 2013

पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है

हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश प्रसिद्ध कथाकार हैं । उनकी कहानियों का मैं प्रशंसक हूं । उनकी कविताओं को भी पाठकों का एक बड़ा वर्ग पसंद करता है । उदय प्रकाश ने जब भी कोई भी कहानी लिखी उसको साहित्य जगत ने हाथों हाथ लिखा । लेकिन शोहरत के साथ साथ उदय प्रकाश का विवादों से भी गहरा नाता रहा है । जब उन्होंने गोरखपुर में गोरक्षपीठ के कर्ताधर्ता और बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ के हाथो पहला 'नरेन्द्र स्मृति सम्मान' लिया था तो उस वक्त अच्छा खासा बवाल मचा था । पूरे साहित्य जगत में उदय की जमकर आलोचना हुई थी । दरअसल उदय प्रकाश सार्वजनिक जीवन में कई दशकों से वामपंथी आदर्शों की दुहाई देते रहे हैं । लेकिन इस सम्मान ग्रहण के बाद उनके चेहरे का लाल रंग धुधंला होकर भगवा हो गया प्रतीत होता है । दरअसल उदय को नजदीक से जानने वालों का दावा है कि उदय प्रकाश हमेशा से अवसरवादी रहे हैं और जब भी, जहां भी मौका मिला है उन्होंने इसे साबित भी किया है । परिस्थितियों के अनुसार उदय प्रकाश अपनी प्राथमिकताएं और प्रतिबद्धताएं तय करते हैं और एक रणनीति के तहत उसपर अमल भी करते हुए उसका लाभ उठाते हैं ।
अगर मेरी स्मृति मेरा साथ दे रही है तो उदय प्रकाश ने अपने कविता संग्रह- सुनो कारीगर- को लगभग दर्जनभर साहित्यकारों को समर्पित किया था, जिसमें नामवर भी थे और काशीनाथ सिंह भी और नंदकिशोर नवल भी थे और भारत भारद्वाज भी । जाहिर तौर पर ये एक साथ दर्जनभर से ज्यादा साहित्यकारों/आलोचकों को साधने की कोशिश थी ।अपनी रचनाओं को लेकर आलोचकों का ध्यान खीचने की कोशिश भी थी ।  बाद में जब शिवनारायण सिंह संस्कृति मंत्रालय में उच्च पद पर थे तो उनको भी अपना एक कविता संग्रह समर्पित कर दिया था । यह अजीब संयोग था कि उसी वक्त के आसपास उदय प्रकाश को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की फैलोशिप मिल गई । इस बात में कितनी सच्चाई है कि शिवनारायण सिंह ने उदय प्रकाश को फेलोशिप दिलाने में मदद की इसका तो पता नहीं लेकिन उस वक्त दिल्ली के साहित्य जगत के जानकारों दोनों घटनाओं को जोड़ा भी था । 
उदय प्रकाश भारत भवन की पत्रिका पूर्वग्रह से भी जुडे़ रहे हैं, यह उस वक्त की बात थी जब मध्य प्रदेश में साहित्य और संस्कृति की दुनिया में अशोक वाजपेयी का डंका बजा करता था और वो ही साहित्य और संस्कृति के कर्ताधर्ता हुआ करते थे । लेकिन जब किसी वजह से उदय प्रकाश को पूर्वग्रह से बाहर होना पड़ा था तो खबरों के मुताबिक उदय जी ने अशोक वाजपेयी और उनकी मित्रमंडली को 'भारत भवन के अल्सेशियंस' तक कह डाला था । जाहिर है उसके बाद से अशोक वाजपेयी और उदय प्रकाश साहित्य के दो अलग-अलग छोर पर रहे । लेकिन वर्षों बाद उदय प्रकाश को अशोक वाजपेयी में फिर से संभावना नजर आई और उन्होंने अशोक वाजपेयी जी के जन्मदिन पर उदय ने जिस अंदाज में वाजपेयी को शुभाकमनाएं अर्पित की उसके बाद दोनों के बीच जमी  बर्फ पिघली । रिश्तों में आई गर्माहट के बाद साहित्यिक हलके में इस बात की जोरदार चर्चा हुई थी कि अशोक वाजपेयी और उदय प्रकाश के बीच लंबी मुलाकात हुई। यहां भी एक संयोग घटित हुआ । उस मुलाकात के बाद  उदय प्रकाश को लखटकिया वैद सम्मान मिला । बार-बार उदय प्रकाश के साथ जो संयोग घटित होता है उससे लेखकों को ईर्ष्या होती है लेकिन यही हैं उदय प्रकाश  की प्राथमिकताएं और प्रतिबद्धता जिसकी वजह से इस तरह के संयोग घटित होते रहे हैं  ।
बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ के हाथों सम्मान ग्रहण करने के बाद जब उदय पर चौतरफा हमले शुरू हुए तो अपने बचाव में उन्होंने बेहद लचर तर्कों का सहारा लिया । उदय प्रकाश ने कहा कि- एक नियोजित तरीके से मुझ पर आक्रमण करके बदनाम करने की घृणित जातिवादी राजनीति की जा रही है.....दरअसल इस हिंदू जातिवादी समाज में विचारधाराओं से लेकर राजनीति और साहित्य का जैसा छद्म और चतुर खेल खेला गया है, उसके हम सब शिकार हैं । मेरे परिवार में यह सच है कि कि कोई भी एक सदस्य ऐसा नहीं है ( इनमें मेरी पत्नी, बच्ची, बहू और पोता तक शामिल हैं और मेरे मित्र तथा पाठक भी ) जो किसी एक धर्म, क्षेत्र, जाति, नस्ल आदि से जुडे़ हों । लेकिन हिंदी साहित्य और ब्लॉगिंग में सक्रिय सवर्ण हिंदू उसी कट्टर वर्णाश्रम -व्यवस्थावदी माइंडसेट से प्रभावित पूर्व आधुनिक सामंती, अनपढ़ और घटिया लोग हैं -जिनके भीतर जैन, बौद्ध, नाथ, सिद्ध, ईसाइयत, दलित, इस्लाम आदि तमाम आस्थाओं और आइडेंटिटीज़ के प्रति घृणा और द्वेष है इसे वे भरसक ऊपर-ऊपर छिपाए रखने की चतुराई करते रहते हैं । मैंने जीवनभर इनका दंश और जहर झेला है और अभी भी झेल रहा हूं ।' अपनी लंबी सफाई के आखिर में धमकाने के अंदाज में सवर्ण लुटेरों के साम्राज्य को ध्वस्त करने का दावा भी करते हैं । उदय पर पहले भी जब-जब उनकी व्यक्तिवादी कहानियों को लेकर उंगली उठी थी तो किसी को मथुरा का पंडा, तो किसी को घनघोर अनपढ़ घोषित किया तो किसी को अफसर होकर साहित्य की दुनिया में अनाधिकार प्रवेश के लिए लताड़ा ।
इसके पहले जब वर्तमान साहित्य के मई दो हजार एक के अंक में उपेन्द्र कुमार की कहानी 'झूठ का मूठ' छपी थी तो अच्छा खास विवाद खड़ा हो गया था । साहित्य जगत में यह चर्चा जोर पकड़ी थी कि उक्त कहानी के केंद्र में उदय प्रकाश हैं । अब इस बात की तस्दीक तो कहानीकार उपेन्द्र कुमार ही कर सकते हैं कि उनकी कहानी झूठ का मूठ का लेखक कौन था । लेकिन जब उस कहानी पर साहित्य में विवाद हुआ था तो  उस वक्त भी सफाई देते हुए उदय प्रकाश ने कहा था कि- दरअसल ऐसा है कि दिल्ली में गृह मंत्रालय के भ्रष्ट अधिकारियों का एक क्लब है जो नाइट पार्टी का आयोजन करता है । इसमें शराब पी जाती है और अश्लील चर्चा होती है । जो इसमें शामिल नहीं होता है, ये लोग उसपर हमला करते हैं । ये साहित्येतर लोग हैं जो अमेरिकी साम्राज्यवाद का विरोध तो करते हैं मगर गली-मोहल्ले के मवालियों के साथ बैठकर शराब पीते हैं ।' उनका इशारा किन लोगों की ओर था उसे भी अगर खुलकर कहते तो गृह मंत्रालय के भ्रष्ट अधिकारियों से साहित्य जगत का परिचय होता। दरअसल उदय प्रकाश की दिक्कत यही है कि जब भी उनकी आलोचना होती है तो वो अपना आपा खो देते है और साहित्यक मर्यादा भूलकर अपने विरोधियों पर बिलो द बेल्ट हमला करते हैं । रविभूषण ने जब इनकी कहानियों पर विदेशी लेखकों की छाया की बात की थी तो मामला कानूनी दांव-पेंच में भी उलझा था ।
बीजेपी सांसद के हाथों सम्मानित होने के बाद साहित्य में उदय प्रकाश की जमकर आलोचना हुई थी ।  उदय की सफाई के बाद हिंदी के दो दर्जन से ज्यादा महत्वपूर्ण साहित्यकारों ने अपने हस्ताक्षर से एक बयान जारी कर उदय की भर्त्सना की । बयान जारी करनेवालों में प्रमुख नाम थे - ज्ञानरंजन, विद्यासागर नौटियाल, विष्णु खरे, भगवत रावत, मैनेजर पांडे, राजेन्द्र कुमार, इब्बार रब्बी, मदन कश्यप, देवीप्रसाद मिश्र आदि । चौतरफा घिरता देख उदय प्रकाश ने एक बार फिर से अपने ब्लॉग पर एक सफाई लिखी लेकिन ये सफाई कम धमकी ज्यादा है । इसके बाद उदय प्रकाश की ओर से कई व्लॉग चलानेवाले लोगों ने मोर्चा संभला और उदय प्रकाश की दलीलों को आगे बढा़या । उदय के समर्थन में जो तर्क दिए गए वो भी बेहद लचर थे जो साहित्य जगत के गले नहीं उतरा ।
उदय प्रकाश एक बेहतरीन कवि  माने जाते हैं, कई पाठकों का दावा है कि वो कहानियां अच्छी लिखते हैं, लेकिन उनकी कहानियां व्यक्तियों पर केंद्रित होकर लोगों को दुखी करती रही हैं । जब उपेन्द्र कुमार की कहानी 'झूठ का मूठ' छपी थी तो उसपर पटना से प्रकाशित 'प्रभात खबर' में एक लंबी परिचर्चा छपी थी । जिसमें सुधीश पचौरी ने लिखा था- अरसे से हिंदी कथा लेखन में एक न्यूरोटिक लेखक कई लेखकों को अपने मनोविक्षिप्त उपहास का पात्र बनाता आ रहा था । पहले उसने एक महत्वपूर्ण कवि की जीवनगत असफलताओं को अपनी एक कहानी में सार्वजनिक मजाक का विषय बनाया । फिर वामपंथी गीतकार की असफल प्रेमकथा का सैडिस्टिक उपहास उड़ाने के लिए कहानी लिखी । किसी ने रोका नहीं तो, तो जोश में कई हिंदी अद्यापकों और आलोचकों के निजी जीवन पर कीचड़ उचालनेवाली शैली में कविताएं भी लिख डाली ।  किसी दीक्षित मनोविक्षिप्त की तरह उसने ये समझा कि उसे सबको शिकार करने का लाइसेंस हासिल हो गया है । उसके शिकारों में से उक्त गीतकार तो आत्महत्या तक कर बैठा ।  हिंदी के कई पाठक उसकी आत्महत्या के पीछे का कारण इस साडिज्म को भी मानते हैं । यह लेखक दरअसल स्वयं एक 'माचोसाडिस्ट' है जो दूसरों को अपने 'मर्दवादी परपीड़क विक्षेप' में जलील करता और सताता आया है । यह पहली कहानी है जिसने एक दुष्ट शिकारी का सरेआम शिकार किया है । शठ को शठता से ही सबक दिया है ।' उदय प्रकाश की राजनीति और जोड़-तोड़ और दंद-फंद को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है ।

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए अगर बात साहित्य अकादमी पुरस्कार की करें तो जिस वर्ष उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी पुरस्कार यशस्वी कथाकार और कवि उदय प्रकाश को उनके उपन्यास मोहनदास (वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली) के लिए दिया गया । तब भी मैंने यह लिखा था कि उदय प्रकाश साहित्य अकादमी पुरस्कार डिजर्व करते हैं बल्कि उन्हें तो अरुण कमल, राजेश जोशी और ज्ञानेन्द्रपति के पहले ही यह सम्मान मिल जाना चाहिए था । लेकिन जिस तरह से पुरस्कार देने के लिए पुरस्कार के चयन समिति की बैठक में जो बातें हुई, जो सौदेबाजी हुई उसने पुरस्कार को संदिग्ध बना दिया था । उस बार के पुरस्कार के चयन के लिए जो आधार सूची बनी थी उसमें रामदरश मिश्र, विष्णु नागर, नासिरा शर्मा, नीरजा माधव, शंभु बादल, मन्नू भंडारी और बलदेव वंशी के नाम थे । हिंदी के संयोजक विश्वनाथ तिवारी की इच्छा और घेरेबंदी रामदरश मिश्र को अकादमी पुरस्कार दिलवाने की थी । इस बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अशोक वाजपेयी, मैनेजर पांडे और चित्रा मुद्गल का नाम जूरी के सदस्य के रूप में प्रस्तावित किया और अध्यक्ष से स्वीकृति दिलवाई । लेकिन पता नहीं तिवारी जी की रणनीति क्यों फेल हो गई- जब पुरस्कार तय करने के लिए जूरी के सदस्य बैठे तो रामदरश मिश्र के नाम पर चर्चा तक नहीं हुई । बैठक शुरू होने पर अशोक वाजपेयी ने सबसे पहले रमेशचंद्र शाह का नाम प्रस्तावित किया । लेकिन उसपर मैनेजर पांडे और चित्रा मुदगल दोनों ने आपत्ति की । कुछ देर तक बहस चलती रही जब अशोक वाजपेयी को लगा कि रमेशचंद्र शाह के नाम पर सम्मति नहीं बनेगी तो उन्होंने नया दांव चला और उदय प्रकाश का नाम प्रस्तावित कर दिया । जाहिर सी बात है कि मैनेजर पांडे को फिर आपत्ति होनी थी क्योंकि वो उदय प्रकाश की कहानी पीली छतरी वाली लड़की को भुला नहीं पाए थे । उन्होंने उदय के नाम का पुरजोर तरीके से विरोध किया । पांडे जी के मुखर विरोध को देखते हुए उनसे उनकी राय पूछी गई । मैनेजर पांडे ने मैत्रेयी पुष्पा का नाम लिया और उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार देने की वकालत करने लगे । मैनेजर पांडे के इस प्रस्ताव पर अशोक वाजपेयी खामोश रहे और उन्होंने चित्रा मुदग्ल से उनकी राय पूछी । बजाए किसी लेखक पर अपनी राय देने के चित्रा जी ने फटाक से अशोक वाजपेयी की हां में हां मिलाते हुए उदय प्रकाश के नाम पर अपनी सहमति दे दी । इस तरह से अशोक वाजपेयी की पहली पसंद ना होने के बावजूद उदय प्रकाश को एक के मुकाबले दो मतों से साहित्य अकादमी पुरस्कार देना तय किया गया । यहां यह भी बताते चलें कि उदय प्रकाश और रमेशचंद्र शाह दोनों के ही नाम हिंदी की आधार सूची में नहीं थे । लेकिन यहां कुछ गलत नहीं हुआ क्योंकि जूरी के सदस्यों को यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि वो जिस वर्ष पुरस्कार दिए जा रहे हों उसके पहले के एक वर्ष को छोड़कर पिछले तीन वर्षों में प्रकाशित कृति प्रस्तावित कर सकते हैं । उस वर्ष दो हजार छह, सात और आठ में प्रकाशित कृति में से चुनाव होना था । साहित्य अकादमी का यह प्रसंग सिर्फ इस वजह से बता रहा हूं ताकि पुरस्कारों में होनेवाले समझौते और सौदोबाजी को समझा जा सके । उदय जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार बाइ डिफाल्ट मिला जबकि उनकी सारी कृतियां अकादमी पुरस्कारों के लायक है । लेकिन उदय जी हिंदी साहित्य को लेकर अपना एक फ्रस्टेशन है । उनको जितना मिलना चाहिए था उतना साहित्य से मिला नहीं । उनकी प्रतिभा का साहित्य में सही इस्तेमाल नहीं हो पाया । हो सकता है इन्ही वजहों ने मनोवैज्ञानिक रूप से उदय प्रकाश को कमजोर कर दिया हो और वो अपने ध्येय को प्राप्त करने के चक्कर में रास्ते से बार बार फिसलते रहे हों । लेकिन उदय प्रकाश की उन्हीं फिसलनों और विचलनों को देखकर मुक्तिबोध की आत्मा कराहती हुई पूछ रही होगी - पार्टनर ! तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ? 

Saturday, January 1, 2011

उदय प्रकाश नहीं थे पहली पसंद

इस वर्ष के साहित्य अकादमी पुरस्कारों का एलान हो गया है । हिंदी के लिए
इस बार का अकादमी पुरस्कार यशस्वी कथाकार और कवि उदय प्रकाश को उनके
उपन्यास मोहनदास(वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली) के लिए दिया गया । उदय प्रकाश
साहित्य अकादमी पुरस्कार डिजर्व करते हैं बल्कि उन्हें तो अरुण कमल,
राजेश जोशी और ज्ञानेन्द्रपति के पहले ही यह सम्मान मिल जाना चाहिए था ।
जब मैंने पुरस्कार के एलान होने के दो दिन पहले अपने ब्लाग पर इस बारे
में लिखा तो जूरी के सदस्य मुझसे खफा हो गए । मैंने अपने ब्लाग- हाहाकार-
पर पुरस्कार के चयन के लिए हुई बैठक में जो बातें हुई, जो सौदेबाजी हुई
उसपर लिखा था। पहले मैंने तय किया था कि इस विषय पर अब और नहीं लिखूंगा
लेकिन जब मुझे परोक्ष रूप से धमकी मिली तो मैंने तय किया कि और बारीकी से
सौदेबाजी को उजागर करूंगा । जो कि ना केवल अकादमी के हित में होगा बल्कि
हिंदी का भी भला होगा । इस बार के पुरस्कार के चयन के लिए जो आधार सूची
बनी थी उसमें रामदरश मिश्र, विष्णु नागर, नासिरा शर्मा, नीरजा माधव, शंभु
बादल, मन्नू भंडारी और बलदेव वंशी के नाम थे । हिंदी के संयोजक विश्वनाथ
तिवारी की इच्छा और घेरेबंदी रामदरश मिश्र को अकादमी पुरस्कार दिलवाने की
थी । इस बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अशोक वाजपेयी, मैनेजर पांडे
और चित्रा मुद्गल का नाम जूरी के सदस्य के रूप में प्रस्तावित किया और
अध्यक्ष से स्वीकृति दिलवाई । लेकिन पता नहीं तिवारी जी की रणनीति क्यों
फेल हो गई- जब पुरस्कार तय करने के लिए जूरी के सदस्य बैठे तो रामदरश
मिश्र के नाम पर चर्चा तक नहीं हुई । बैठक शुरू होने पर अशोक वाजपेयी ने
सबसे पहले रमेशचंद्र शाह का नाम प्रस्तावित किया । लेकिन उसपर मैनेजर
पांडे और चित्रा मुदगल दोनों ने आपत्ति की । कुछ देर तक बहस चलती रही जब
अशोक वाजपेयी को लगा कि रमेशचंद्र शाह के नाम पर सहमति नहीं बनेगी तो
उन्होंने नया दांव चला और उदय प्रकाश का नाम प्रस्तावित कर दिया । जाहिर
सी बात है कि मैनेजर पांडे को फिर आपत्ति होनी थी क्योंकि वो उदय प्रकाश
की कहानी पीली छतरी वाली लड़की को भुला नहीं पाए थे । उन्होंने उदय के
नाम का पुरजोर तरीके से विरोध किया । पांडे जी के मुखर विरोध को देखते
हुए उनसे उनकी राय पूछी गई । मैनेजर पांडे ने मैत्रेयी पुष्पा का नाम
लिया और उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार देने की वकालत करने लगे । मैनेजर
पांडे के इस प्रस्ताव पर अशोक वाजपेयी खामोश रहे और उन्होंने चित्रा
मुदगल से उनकी राय पूछी । बजाए किसी लेखक पर अपनी राय देने के चित्रा जी
ने फटाक से अशोक वाजपेयी की हां में हां मिलाते हुए उदय प्रकाश के नाम पर
अपनी सहमति दे दी । इस तरह से अशोक वाजपेयी की पहली पसंद ना होने के
बावजूद उदय प्रकाश को एक के मुकाबले दो मतों से साहित्य अकादमी पुरस्कार
देना तय किया गया ।
उधर हिंदी भाषा के संयोजक विश्वनाथ तिवारी का सारा खेल खराब हो गया और
रामदरश मिश्र का नाम आधार सूची में सबसे उपर होने के बावजूद उनको
पुरस्कार नहीं मिल पाया । यहां यह भी बताते चलें कि उदय प्रकाश और
रमेशचंद्र शाह दोनों के ही नाम हिंदी की आधार सूची में नहीं थे । लेकिन
यहां कुछ गलत नहीं हुआ क्योंकि जूरी के सदस्यों को यह विशेषाधिकार
प्राप्त है कि वो जिस वर्ष पुरस्कार दिए जा रहे हों उसके पहले के एक वर्ष
को छोड़कर पिछले तीन वर्षों में प्रकाशित कृति प्रस्तावित कर सकते हैं ।
इस वर्ष दो हजार छह, सात और आठ में प्रकाशित कृति में से चुनाव होना था ।
मैं पिछले कई वर्षों से साहित्य अकादमी के पुरस्कारों में होनेवाले
गड़बडियों और घेरबंदी पर लिखता रहा हूं । वहां कई ऐसे उदाहरण हैं जहां
घेरबंदी कर पुरस्कार दिलवाए गए । जब हिंदी के कवि वीरेन डंगवाल को
उनके कविता संग्रह-दुश्चक्र में स्रष्टा-पर पुरस्कार दिया गया तो उस वक्त
के हिंदी के संयोजक गिरिराज किशोर पर सारे नियम कानून ताक पर रखकर डंगवाल
को पुरस्कृत करने के आरोप लगे थे । गिरिराज किशोर ने वीरेन डंगवाल को
पुरस्कार दिलावने के लिए श्रीलाल शुक्ल, कमलेश्वर और से रा यात्री की
जूरी बनाई । जब नियत समय पर जूरी की बैठक होनी थी उस वक्त कमलेश्वर बीमार
हो गए और श्रीलाल शुक्ल जी को बनारस ( अगर मेरी स्मृति मेरा साथ दे रही
है तो ) से दिल्ली आना था और किन्हीं वजहों से उनका जहाज छूट गया और वो
नहीं आ पाए । पुरस्कार का एलान करवाने की इतनी जल्दी थी कि से रा यात्री
को कमलेश्वर के पास भेजकर अस्पताल से उनकी राय मंगवाई गई । श्रीलाल
जी से फैक्स पर उनकी राय मंगवाई गई और फिर से रा यात्री और गिरिराज किशोर
ने दोनों की सहमति के आधार पर वीरेन डंगवाल का नाम तय कर दिया
यह उठा कि गिरिराज जी की क्या बाध्यता थी कि वो पुरस्कार की इतनी जल्दी घोषणा कर दें
। अगर आप अकादमी के स्वर्ण जयंती के मौके पर प्रकाशित डी एस राव की
किताब- साहित्य अकादमी का इतिहास देखें तो उसमें कई ऐसे प्रसंग हैं जहां
कि पुरस्कार का एलान रोका गया और बाद में उसको घोषित किया गया ।
वीरेन डंगवाल की प्रतिभा पर किसी को शक नहीं था और ना ही है, वो
हिंदी के एक महत्वपूर्ण कवि हैं, लेकिन जिस तरह से जल्दबाजी में जूरी के
दो सदस्यों की अनुपस्थिति में उनका नाम तय किया गया उस वजह से पुरस्कार
संदेहास्पद हो गया । हलांकि उस वक्त विष्णु खरे, भगवत रावत, विजेन्द्र और
ऋतुराज भी दावेदार थे जो किसी भी तरह से वीरेन डंगवाल से कमजोर कवि
नहीं हैं ।
साहित्य अकादमी में सौदेबाजी का एक भरा पूरा इतिहास रहा है । जब गोपीचंद
नारंग का अकादमी के अध्य़क्ष के रूप में कार्यकाल खत्म हुआ तो उनपर दवाब
बना कि वो दूसरी बार चुनाव नहीं लड़ें । चौतरफा दवाब में उन्होंने चुनाव
तो नहीं लड़ा पर अपने कैंडिडेट को अध्यक्ष बनवाने में कामयाब रहे । जब
हिंदी भाषा के संयोजक के चुनाव का वक्त आया तो गोपीचंद नारंग की पसंद विश्वनाथ
तिवारी थे । लेकिन कैलाश वाजपेयी ने उसमें फच्चर फंसा दिया और वो भी
चुनाव लडने को तैयार हो गए । उस वक्त आपसी समझदारी में यह तय हुआ कि
कैलाश वाजपेयी चुनाव नहीं लड़ेंगे बदले में उनको अकादमी का पुरस्कार दिया
जाएगा । उन्हें यह भी समझा दिया गया कि अगर वो भाषा के संयोजक हो जाएंगे
तो उनको पुरस्कार नहीं मिल पाएगा । पुरस्कार मिलने के आश्वासन के बाद
कैलाश वाजपेयी ने चुनाव नहीं लड़ा और विश्वनाथ तिवारी हिंदी भाषा के संयोजक
बन गए । उन्होंने अपने संयोजकत्व में पहला पुरस्कार गोविन्द मिश्र को
दिया और अगले वर्ष कैलाश वाजपेयी को उनकी कृति हवा में हस्ताक्षर के लिए
पुरस्कार मिला ।
अब वक्त आ गया है कि अकादमी के पुरस्कारों में पूरी
पारदर्शिता बरती जाए और जूरी के सदस्यों के नाम के साथ-साथ उनकी राय को
भी सार्वजनिक किया जाए । पहले तो जूरी के सदस्यों का नाम भी गोपनीय रखा
जाता था लेकिन बाद में उसे सार्वजनिक किया जाने लगा । अब तो अकादमी को
जूरी की बैठक की वीडियो रिकॉर्डिंग भी करवानी चाहिए ताकि पारदर्शिता के
उच्च मानदंडों को स्थापित किया जा सके । मुझे याद है कि जब साहित्य
अकादमी का स्वर्ण जयंती समारोह मनाया जा रहा था तो विज्ञान भवन में
प्रधानमंत्री की मौजूदगी में अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष गोपीचंद नारंग
ने अपने भाषण में नेहरू जी को उद्धृत करते हुए कहा था कि - मुझे विश्वास है
कि प्रधानमंत्री अकादमी के कामकाज में दखल नहीं देंगे । नारंग के इस मत
पर प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह ने सहमति जताई थी । उस वजह से ही
अकादमी में तमाम गडबड़ियों के आरोप से घिरे गोपीचंद नारंग अपने कार्यकाल
के आखिर तक ड़टे रहे थे । लेकिन जहां स्वायत्ता आती है वहां जिम्मेदारी
भी साथ साथ आती है । यह अकादमी के कर्ता-धर्ताओं का दायित्व है कि जहां
भी संदेह के बादल छाने लगे उसे तथ्यों को सामने रखककर साफ करें ।
पुरस्कारों के मामले में तो यह तभी हो सकता है जब कि चयन से लेकर जूरी की
मीटिंग और उसकी कार्यवाही पूरी तरह से पारदर्शी हो और जो चाहे वो इस बाबत
अकादमी से सूचना प्राप्त कर सके । तभी देश के इस सबसे बड़े साहित्यिक
संस्था की साख बची रह सकेगी ।

Monday, December 20, 2010

उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी पुरस्कार

खबरों के मुताबिक इस बार का साहित्य अकादमी पुरस्कार हिंदी के यशस्वी कथाकार उदय प्रकाश को देना तय हो गया है । दो दिनों पहले हुई तीन सदस्यीय जूरी की बैठक में दो-एक से उदय प्रकाश के पक्ष में फैसला हो गया । इस बार हिंदी की जूरी में अशोक वाजपेयी, मैनेजर पांडे और चित्रा मुदगल थी । सूत्रों के मुताबिक बैठक में अशोक वाजपेयी ने उदय प्रकाश के नाम का प्रस्ताव किया जिसका मैनेजर पांडे ने विरोध किया । उसके बाद मैनेजर पांडे से उनकी राय पूछी गई तो उन्होंने मैत्रेयी पुष्पा का नाम लिया । मैत्रेयी पुष्पा का नाम आते ही चित्रा मुदगल ने अशोक वाजपेयी की बात मान ली और फिर दो के मुकाबले एक से उदय प्रकाश को पुरस्कार देना तय हो गया । उदय प्रकाश को पुरस्कार दिलवाने में अशोक वाजपेयी की महती भूमिका रही । उदय प्रकाश ने पूर्व में अशोक वाजपेयी की तमाम आलोचनाएं की थी । लेकिन पिछले दिनों दोनों के समीकरण ठीक होने लगे थे । उदय प्रकाश साहित्य अकादमी पुरस्कार डिजर्व करते हैं लेकिन जिस तरह से घेरेबंदी कर अशोक वाजपेयी ने उनको पुरस्कार दिलवाया उससे एक बार फिर से साहित्य अकादमी की कार्यशैली संदेह के घेरे में आ गई है । इस बारे में जैसे-जैेस और जानकारी मिलेगी उसको मैं पोस्ट करूंगा ।