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Sunday, December 10, 2017

प्रकाशन जगत में कॉरपोरेट की दस्तक

भारत में प्रकाशन जगत को उद्योग का दर्जा प्राप्त नहीं है, बहुधा हमारे हिंदी के प्रकाशक इस बात को अलग अलग मंचों पर उठाते भी रहते हैं कि प्रकाशन के लिए बैंकों से ऋण नहीं मिलता है। वहीं दूसरी तरफ कई प्रकाशकों का कहना है कि प्रकाशन जगत काराबोर नहीं हो सकता है क्योंकि ये उद्यम साहित्य सेवा है और इसमें लेखक-प्रकाशक परिवार की तरह काम करते हैं। इसका नतीजा यह है कि हिंदी में लगातार नए-नए प्रकाशन गृहों के खुलने के बावजूद ये इस व्यवसाय में लगभग असंगठित क्षेत्र जैसी स्थिति है। पिछले कुछ सालों से जब से भारत में विदेशी प्रकाशन गृहों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है तब से प्रकाशन जगत में भी हलचल शुरू हुई है। विदेशी प्रकाशन गृहों के आगमन के बाद तकनीक के विस्तार के बाद पारंपरिक तरीके से पुस्तकों के प्रकाशन के अलावा ई प्लेटफॉर्म पर पुस्तकों के प्रकाशन ने भी इस व्यवसाय को नए आयाम दिए। ई प्लेटफॉर्म पर पुस्तकों के प्रकाशन की वजह से बाजार की तरह की तरह की संभावनाओं की तलाश भी की जाने लगी। बाजार की संभावनाओं की तलाश में ही कुछ प्रकाशनगृह पूरी तरह से बाजार में उतरने के उपक्रम करने लगे हुए हैं। यहां चर्चा सिर्फ उन प्रकाशकों की हो रही है जिनको साहित्यक पुस्तकों का प्रकाशक माना जाता है। बाजार में उतरने की हिचक लगभग खत्म सी होने लगी है, बाजार की मांग के अनुरूप कुछ प्रकाशकों ने पुस्तकों का प्रकाशन शुरू कर दिया है। यह ठीक है उनको अभी उस तरह की स्वीकार्यता या पहचान नहीं मिली है लेकिन प्रयास को पहचान तो मिली ही है। ये आने वाले समय में तय होगा कि उनकी इस तरह की पहल कितने लंबे समय तक चलती है और साहित्य जगत में किस तरह का प्रभाव छोड़ती है। अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
पिछले दिनों एक खबर ने प्रकाशन जगत से जुड़े लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। टेलीकॉम के क्षेत्र की अग्रणी कंपनी एयरटेल ने डिजीटल प्रकाशक जगरनॉट में हिस्सेदारी खरीदी है । एयरटेल के जगरनॉट में निवेश के बाद इस तरह की खबर आई कि एयरटेल ने ये निवेश डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्तरीय कंटेंट और गैर पारंपरिक लेखन को बढ़ावा देने के लिए किया है। जगरनॉट में पहले भी इंफोसिस से जुड़े नंदन नीलेकणि और बोस्टन कंसलटेंसी ग्रुप के इंडिया सीईओ नीरज अग्रवाल ने निवेश किया था। तब उस निवेश को व्यक्तिगत निवेश की तरह देखा गया था, था भी।
जगरनॉट में एयरटेल का निवेश एक सुखद संकेत की तरह है और इस बात की संभावना बनने लगी है कि प्रकाशन जगत में भी संस्थागत निवेश हो सकता है। हलांकि इस क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि एयरटेल ने अपने फोर जी प्लेटफॉर्म पर कंटेंट उपलब्ध करवाने के लिए जगरनॉट में निवेश किया है । इससे ये हो सकता है कि एयरटेल को अपने पाठकों के लिए कंटेंट उपलब्ध करवाने और उसपर नजर रखने में मदद होगी। अप्रैल दो हजार सोलह में जगरनॉट लॉंच हुआ था और इस वक्त डिजिटल प्लेफॉर्म पर उसके एप का करीब दस लाख डाउनलोड हो चुका है। एंड्रायड और आईओएस दोनों प्लेटफॉर्म पर जगरनॉट मौजूद है। जगरनॉट ने जब हिंदी में अपना एप लॉंच किया था तब उसपर एक महीने तक साहित्यक कृतियां मुफ्त में उपलब्ध करवाई गई थीं। उस वक्त जगरनॉट के इस एप पर मौजूद कृतियों को देखकर इस बात का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि उनकी रणनीति क्या होगी।इस निवेश के बाद जगरनॉट को अपने कंटेंट को बेहतर करने का एक अवसर मिल सकता है।
जगरनॉट, खासतौर पर हिंदी में ज्यादातर उस तरह की रचनाओं को प्रमुखता दे रहा है जिससे पाठकों को अपनी ओर खींचा जा सके। उन रचनाओं की स्तरीयता को लेकर बहस हो सकती है। जिस तरह की कहानियां या छोटे उपन्यास जगरनॉट ने अपने इस एप पर डाले थे उसमें प्रकरांतर से यौन प्रसंगों को प्रमुखता दी गई थी । साहित्यक कृतियों में रीतिकालीन प्रवृतियों को आधुनिकता के छौंक के साथ प्रस्तुत कर पाठकों की बांधने की रणनीति थी जो उसके एप को डाउनलोड करवाने में काफी हद तक सफल भी रही। पता नहीं क्यों इस तरह की स्थिति भारत में खासतौर पर हिंदी में क्यों बन रही है कि यौनिकता को प्रमुखता देनेवालों को इटरनेट पर पाठक मिलते हैं। यह शोध का एक विषय हो सकता है।  
देश में इंटरनेट के बढ़ते घनत्व ने पाठकों तक पहुंचने का एक बड़ा अवसर हिंदी के प्रकाशकों और लेखकों को उपलब्ध करवाया है। पिछले एक दशक में देश में तकनीक का फैलाव काफी तेजी से हुआ है । मोबाइल फोन की क्रांति के बाद देश ने टू जी से लेकर फोर जी तक का सफर देखा और अब तो फाइव जी की बात होने लगी है। इसका फायदा उठाने की कोशिशें भी लगातार परवान चढ़ने लगी हैं । इस वक्त कई तरह के एप हैं जहां से हिंदी साहित्य की पुस्तकें सस्ते में खरीदी और पढ़ी जा सकती हैं। किंडल पर भी हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं की रचनाएं हैं। हिंदी के कई प्रकाशकों ने बेहद गंभीरता से ई प्लेटफॉर्म पर अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई है और लगातार उसको मजबूत कर रहे हैं।
 आज से करीब पांच साल पहले पहले भी प्रकाशन जगत में इसी तरह की एक प्रमुख घटना घटी थी।  विश्व के दो बड़े प्रकाशन संस्थानों- रैंडम हाउस और पेंग्विन का विलय हुआ था। रैंडम हाउस और पेंग्विन विश्व के छह सबसे बड़े प्रकाशन संस्थानों में से एक थे । जब दोनों का विलय हुआ था तब यह माना गया था कि अंग्रेजी पुस्तक व्यवसाय के पच्चीस फीसदी राजस्व पर इनका कब्जा हो जाएगा । अगर हम विश्व के पुस्तक कारोबार खास कर अंग्रेजी पुस्तकों के कारोबार पर नजर डालें तो इसमें मजबूती या कंसॉलिडेशन का दौर काफी पहले से शुरू हो गया था । रैंडम हाउस जो कि जर्मनी की एक मीडिया कंपनी का हिस्सा है उसमें भी पहले नॉफ और पैंथियॉन का विलय हो चुका है । उसके अलावा पेंग्विन, जो कि एडुकेशन पब्लिकेशन हाउस पियरसन का अंग है, ने भी वाइकिंग और ड्यूटन के अलावा अन्य छोटे छोटे प्रकाशनों गृहों को अपने में समाहित किया था। जब पेंगिवन और रैंडम हाउस का विलय हुआ था तब अमेरिका के एक अखबार की टिप्पणी ने की थी- रैंडम हाउस और पेंग्विन में विलय उस तरह की घटना है जब कि एक पति पत्नी अपनी शादी बचाने के लिए बच्चा पैदा करने का फैसला करते हैं । उस वक्त पुस्तकों के कारोबार से जुड़े विशेषज्ञों ने माना था कि अमेजॉन और किंडल पर ई पुस्तकों की लगातार बढ़ रही बिक्री ने पुस्तक विक्रेताओं और प्रकाशकों की नींद उड़ा दी थी। माना गया था कि अमेजॉन के दबदबे से निबटने के लिए रैंडम हाउस और पेंग्विन ने साथ आने का फैसला लिया था। कारोबार का एक बेहद आधारभूत सिद्धांत होता है कि किसी भी तरह के आसन्न खतरे से निबटने के लिए आप अपनी कंपनी का आकार इतना बड़ा कर लें कि प्रतियोगियों को आपसे निबटने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़े । कारोबार के जानकारों के मुताबिक आनेवाले वक्त में पुस्तक कारोबार के और भी कंसोलिडेट होने के आसार हैं । अगर पुस्तकों के कारोबार पर समग्रता से विचार करें तो ई बुक्स की बढ़ती लोकप्रियता से पारंपरिक प्रकाशन पर असर पड़ सकता है। दरअसल जिन इलाकों में इंटरनेट का घनत्व बढ़ेगा उन इलाकों में छपी हुई किताबों के प्रति रुझान कम हो सकता है, ऐसा माना जा रहा है, हलांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि छपी हुई किताबों का अपना एक महत्व है । पाठकों और किताबों के बीच एक भावनात्मक रिश्ता होता है । किताब पढ़ते वक्त उसके स्पर्श मात्र से एक अलग तरह की अनुभूति होती है  
हिंदी प्रकाशन जगत से जुड़े लोगों को समझना होगा कि भारत में भी इंटरनेट का घनत्व लगातार बढ़ता जा रहा है और उसके यूजर्स भी । ऐसे में अगर हिंदी प्रकाशन जगत को प्रोफेशनल तरीके से एक इंडस्ट्री के तौर पर उभरना है तो उसको भी जतन करने होंगे। पाठकों तक पहुंचने के लिए और अपने पाठकों की संख्या को दर्ज करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करना होगा। अगर हिंदी प्रकाशन जगत को संस्थागत पूंजी निवेश की दरकार है तो उसको और व्यवस्थित होना पड़ेगा। आज हिंदी के प्रकाशकों के पास जिस तरह का समृद्ध कंटेंट हैं, उसको लेकर बाजार में उतरने की जरूरत है। जिस तरह का साहित्य उनके पास उसको व्यापक पहुंच की जरूरत है और अगर एक बार ये पहुंच बन गई या व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचने का रास्ता बन गया तो फिर इस कारोबार में निवेश की अपार संभावनाएं हैं।


Saturday, December 2, 2017

विवाद उछालने की नीयत !

अपने एक लेख में मशहूर सांस्कृतिक इतिहासकार लोटमान ने लिखा है कि – चिन्हों और प्रतीकों के जरिए संप्रेषण मानवता की सबसे बड़ी उपलब्धि है लेकिन इसती भी नियति तकनीकी सुधार की तरह ही है। जैसे प्राय: सभी तकनीकी सुधार एक प्रकार से दुधारी तलवार होती है जहां उन्हें सामाजिक प्रगति और जनकल्याण के क्षेत्र में अपनी भूमिका का निर्वाह करना पड़ता है वहां नकारात्मक उद्देश्यों के लिए भी उनका उपयोग चालाकी से किया जाता है। चिन्हों और प्रतीकों के उपयोग का उद्देश्य सही रचना देना होता है लेकिन इसका उपयोग बहुधा गलत रचना देने के लिए किया गया गया है। उनका मानना है कि इस प्रकार के चलन से एक बहुत ही विचित्र किस्म की हठवादी विपरीत अवधारणा का विकास हुआ। इस अवधारणा के तहत यह माना जाने लगा कि एक विषय जो कि असत्य हो सकता है बनाम एक विषय जो कि असत्य नहीं हो सकता है। हाल ही में गोवा में संपन्न हुए अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के दौरान जिस तरह से एस दुर्गा फिल्म को लेकर विवाद उठाने की कोशिश की गई, उसको अगर लोटमान की इन अवधारणाओं के आलोक में देखें तो उसमें भी एक हठवादी अवधारणा की अंतर्धारा दिखाई देती है। फिल्मकार ने पहले सेक्सी दुर्गा के नाम से फिल्म बनाई, बाद में उसको एस दुर्गा कर दिया। फिल्म फेस्टिवल में उसकी स्क्रीनिंग नहीं हो पाई, वो अदालत चले गए वहां से स्क्रीनिंग का आदेश लेकर आए। फिर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने अदालत में अपील की जहां से जूरी को फैसला लेने को कह दिया गया। फिल्म फेस्टिवल के आखिरी दो दिनों तक इस फिल्म को दिखाए जाने पर सस्पेंस बना रहा। इन दो दिनों के दौरान फिल्म सनल शशिधरन ने गोवा में धरना प्रदर्शन आदि की भी कोशिश की लेकिन ज्यादा तवज्जो नहीं मिली। इस पूरे विवाद का पटाक्षेप सेंसर बोर्ड के एक फैसले से हो गया जिसमें उसने इस फिल्म के सर्टिफिकेशन को रद्द कर दिया। हलांकि अगर इस फिल्म को प्रदर्शित किया जाता तो एक गलत परंपरा की शुरुआत होती कि कोई भी अदालत जाकर जूरी के फैसले को चुनौती देता और फिर अदालत के आदेश के बाद फिल्म की स्क्रीनिंग हो जाती। ऐसा होने से जूरी की आजादी पर भी फर्क पड़ता जो कि स्वस्थ सिनेमा के लिए उचित नहीं होता। हलांकि इस तरह के आयोजनों में फिल्मों के प्रदर्शन की अनुमति का अंतिम अधिकार स्थानीय राज्य सरकार के पास होता है।  
इस पूरे विवाद को हवा देने की कोशिश की गई लेकिन इन तथ्यों को छुपा लिया गया कि फिल्मकार ने एस के बाद तीन आयताकार सफेद बॉक्स लगा कर फिल्म को गोवा अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में दिखाने की अर्जी दी थी। सेंसर बोर्ड से जुड़े जानकारों का कहना है कि एस के बाद तीन आयताकार बॉक्स लगाकर उसके बाद दुर्गा लिखने के कई अर्थ हैं। इन आयताकार बॉक्स लगाकर फिल्मकार ये संदेश देने की कोशिश कर रहे हो सकते हैं कि उन्होंने विरोध स्वरूप सेक्सी की तीन अक्षरों दो ढंक दिया। शबाना आजमी जैसी अदाकारा ने गोवा फिल्म फेस्टिवल के बहिष्कार का आह्वान किया था लेकिन उसको फिल्मी दुनिया में ही किसी ने तवज्जो नहीं दी। गोवा फिल्म फेस्टिवल के समापन समारोह में अमिताभ बच्चन, सलमान खान, अक्षय कुमार, कटरीना कैफ से लेकर करण जौहर, पूजा हेगड़े, भूमि पेडनेकर और सुशांत सिंह राजपूत के अलावा कई अन्य सितारे मौजूद थे। दरअसल एक खास विचारधारा के पोषकों को बहिष्कार आदि का रास्ता सबसे आसान लगता है। उससे भी आसान है कि कहीं कुछ हो तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरे में होने की बात उछाल दो। यह एक ऐसा जुमला बन गया है जो हर जगह फिट हो जाता है चाहे वो फिल्म हो, साहित्य हो, पत्रकारिता हो, पेंटिंग हो, कहीं भी।
अगर कहीं कुछ गलत होता लग रहा हो तो उसके लिए संवाद करने की जरूरत है, सरकार या आयोजक से बात की जा सकती है। शबाना आजमी जैसी शख्सियतों को मसलों को सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए ना कि किसी भी विवाद में अपनी राजनीति को चमकाने का अवसर तलाशना चाहिए। एक अभिनेत्री के तौर पर उनका जितना सम्मान है उसका उपयोग उनको बॉलीवुड के सकारात्मक पैरोकारी में करना चाहिए क्योंकि नकारात्मकता का अंत तो नकार से ही होता है। यह ठीक है कि लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने का हक है, विरोध जताने का हक भी है लेकिन जब आप एक मुकाम हासिल कर लेते हैं तो लोगों की आकांक्षा अलग हो जाती है। इस फिल्म फेस्टिवल के समापन समारोह में अमिताभ बच्चन ने एक बेहतरीन बात की। उन्होंने कहा कि फिल्म ही एक ऐसा माध्यम है जहां तीन घंटे तक हमें अपने बगल में बैठे इंसान के जाति, धर्म, विचारधारा आदि के बारे में पता नहीं होता और ना ही उससे कुछ लेना लेना देना होता है।लेकिन अफसोस कि अमिताभ बच्चन की सोच वाले लोग कम हैं यहां तो लोग फिल्म को लेकर भी राजनीति करने से नहीं चूकते।
विवादों से बेअसर गोवा फिल्म फेस्टिवल में इस वर्ष कुछ बेहद सार्थक काम भी हुए। फिल्म फेस्टिवलों में भी अबतक ज्यादातर एकालाप होता था। या तो फिल्मकार की बातें सुनकर फिल्म देखो, या सितारों की स्पीच सुनो, लेकिन अड़तालीस साल बाद अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल ने अपना दायरा बढाया और एकालाप को संलाप में बदलने की कोशिश की गई।
साहित्य और सिनेमा को लेकर पूर्व में बहुत बातें होती रही हैं। खासतौर पर हिंदी में तो साहित्यकारों के सिनेमा को लेकर अनुभव बहुत अच्छे नहीं रहे हैं। प्रेमचंद के सिनेमा से मोहभंग के बारे में रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने संस्मरण में लिखा है- ‘1934 की बात है । बंबई में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था । इन पंक्तियों का लेखक कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने आया। बंबई में हर जगह पोस्टर चिपके हुए थे कि प्रेमचंद जी का ‘मजदूर’ अमुक तारीख से रजतपट पर आ रहा है । ललक हुई, अवश्य देखूं कि अचानक प्रेमचंद जी से भेंट हुई । मैंने ‘मजदूर’ की चर्चा कर दी । बोले ‘यदि तुम मेरी इज्जत करते हो तो ये फिल्म कभी नहीं देखना ।’ यह कहते हुए उनकी आंखें नम हो गईं । और, तब से इस कूचे में आने वाले जिन हिंदी लेखकों से भेंट हुई सबने प्रेमचंद जी के अनुभवों को ही दोहराया है । प्रेमचंद के अलावा अमृत लाल नागर, उपेन्द्र नाथ अश्क, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, गोपाल सिंह नेपाली, सुमित्रानंदन पंत जैसे साहित्यकारों का भी सिनेमा से साथ ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया।
अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में इस वर्ष साहित्य और सिनेमा से लेकर कहानी की ताकत, उसके कहने का अंदाज और बच्चों के सिनेमा जैसे विषयों पर गंभीर मंथन हुआ। वाणी त्रिपाठी टिक्कू द्वारा क्यूरेट किए गए इन विषयों को लेकर श्रोताओं में खासा उत्साह रहा। साहित्यक प्रेरणा, सिनेमा और लिखित शब्द पर पौऱाणिक कथाओं को आधुनिक तरीके से लिखनेवाले लेखक अमीश त्रिपाठी, कवि और संगीत मर्मज्ञ यतीन्द्र मिश्र के अलावा गीतकार और सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने अपने विचार रखे। इसका संचालन वाणी ने किया था। कहानी की ताकत और किस्सागोई पर एक पैनल में बेहद रोचक चर्चा हुई। अगर हम बॉलीवुड को देखें या फिर पूरे भारतीय भाषा की फिल्मों को देखें तो बच्चों की फिल्मों का अनुपात बहुत कम होता है। एक सत्र बच्चों के सिनेमा पर भी केंद्रित था जिसमें प्रसून जोशी और नितेश तिवारी जैसे वक्ता मौजूद थे। चर्चाओं का फलक इतना बड़ा था कि एक पूरा सत्र टैगोर के संसार पर केंद्रित था। आज के जमाने में डिजीटल प्लेटफॉर्म को लेकर बात ना हो तो आयोजन अधूरा सा लगता है। मशहूर फिल्मकार भारतबाला ने इस विषय पर एक सत्र संचालित किया।

दो सत्र बेहद रोचक रहे जिसमें एक तो था अपनी अगली फिल्म कैसे बनाएं जिसमें करण जौहर के अलावा एकता कपूर, सिद्धार्थ रॉय कपूर और स्टार फॉक्स के सीईओ विजय सिंह ने अपनी बातें रखीं। दूसरा सत्र नए यथार्थ से मुठभेड़ पर केंद्रित था। इन दोनों सत्रों में करण जौहर ने बेहद सधे अंदाज में अपनी बात रखी। एकता कपूर हमेशा की तरह संक्षिप्त पर दू द प्वाइंट रहीं। करण जैहर ने एक सत्र में सोशल मीडिया पर फिल्म समीक्षा को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की । उन्होंने कहा कि जिस तरह से इन दिनों ट्वीटर आदि पर फिल्मों की लाइव समीक्षा होती है वो अच्छा संकेत नहीं है। इन सत्रों की परिकल्पना करनेवाली समिति की अध्यक्ष वाणी त्रिपाठी टिक्कू के मुताबिक इस आयोजन का मकसद देश में सिनेमा लिटरेसी को बढ़ावा देना है। इन सत्रों में लोगों की उपस्थिति ने इस बात के संकेत दे दिए हैं कि इस तरह का प्रयोग लोगों को पसंद आया। कुल मिलाकर अगर हम देखें तो बेवजह के विवादों को उठाने की कोशिशों को सकारात्मक पहल ने हाशिए पर पहुंचा दिया।  

Wednesday, November 29, 2017

साहित्योत्सव से संस्कृति निर्माण?

पिछले कई सालों से देशभर में साहित्य, कला और संस्कृति को लेकर एक प्रकार का अनुराग उत्पन्न होता दिखाई दे रहा है। इसकी वजह क्या हो सकती है ये तो ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता है, लेकिन इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि देशभर में आयोजित होनेवाले साहित्योत्सवों या लिटरेचर फेस्टिवल की इसमें एक भूमिका हो सकती है। वर्तमान में देशभर में अलग अलग भाषाओं और शहरों में करीब साढे तीन सौ लिटरेचर फेस्टिवल हो रहे है। छोटे, बड़े और मंझोले शहरों  को मिलाकर। सुदूर तमिलनाडू से लेकर असम तक में लिटरेचर फेस्टिवल हो रहे है। कुछ व्यक्तिगत प्रयासों से तो कुछ सरकारी संस्थानों द्वारा आयोजित। एक के बाद एक इतने लिटरेचर फेस्टिवल हो रहे हैं कि एक ही स्थान पर एक खत्म हो नहीं रहा है कि दूसरा शुरू हो जा रहा है। लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजनों से ऐसा लगने लगा है कि साहित्य में लगातार उत्सव होते हैं । साहित्य और संस्कृति को लेकर अनुराग उत्पन्न होने की बात इस वजह से कि लिटरेचर फेस्टिवलों ने लेखकों और पाठकों के बीच की दूरी को खत्म किया। पाठकों को अपने पसंदीदा लेखकों से मिलने का मंच भी मुहैया करवाया है। इन साहित्य महोत्सवों में पाठकों के पास अपने पसंदीदा लेखकों की हस्ताक्षरयुक्त पुस्तकें खरीदने का अवसर भी मिलता है। लेकिन उनके पास लेखकों से संवाद करने का अवसर नहीं होता है। पाठकों के मन में जो जिज्ञासा होती है वो अनुत्तरित रह जाता है। कई बार यह लगता है कि पाठकों और लेखकों के बीच भी बातचीत का खुला सत्र होना चाहिए जिसमें सूत्रधार ना हों। हो सकता है कि ऐसे सत्रों में अराजकता हो जाए लेकिन लेखकों-पाठकों के बीच सीधा संवाद हो पाएगा।
दरअसल साहित्य में हमेशा से अड्डेबाजी होती रही है। पूरी दुनिया में लेखकों की अड्डेबाजी बहुत मशहूर रही है, कॉफी हाउस में लेखक मिलकर बैठकर साहित्यक मुद्दों से लेकर गॉसिप तक करते रहे हैं। अगर हम भारत की बात करें, तो खास तौर पर हिंदी में साहित्यक अड्डेबाजी लगभग खत्म हो गई थी। लेखकों के साथ-साथ समाज की प्राथमिकताएं बदलने लगी और कॉफी हाउस जैसे साहित्यक अड्डे बंद होने लगे। फेसबुक आदि ने आभासी अड्डे तो बनाए लेकिन वहां के अनुभव भी आभासी ही होते हैं। पहले तो छोटे शहरों में रेलवे स्टेशन की बुक स्टॉल साहित्यकारों की अड्डेबाजी की जगह हुआ करती थी। मुझे याद है कि बिहार के अपने शहर जमालपुर के रेलवे स्टेशन स्थित व्हीलर बुक स्टॉल पर शहर के तमाम साहित्यप्रेमी जुटा करते थे और घंटे दो घंटे की बातचीत के बाद सब अपने अपने घर चले जाते थे। हमारे जैसे नवोदित लोग पीछे खड़े होकर उनकी बातें सुना करते थे, जो कि दिलचस्प हुआ करती थी। वहीं पर बड़े लेखकों से लघु पत्रिकाओं में छपने का प्रोत्साहन भी मिलता था। कमोबेश हर शहर में इस तरह के साहित्यक अड्डे हुआ करते थे। आज के लिटरेचर फेस्टिवल या साहित्योत्सवों को देखें तो वो इन्हीं साहित्यक अड्डों के विस्तार नजर आते हैं ।
खासतौर से हिंदी में ये माना जाने लगा है कि साहित्य के पाठक घट रह हैं। आज से करीब सोलह साल पहले निर्मल वर्मा से एक साक्षात्कार में शंकर शरण ने कथा साहित्य के घटते पाठक को लेकर एक सवाल पूछा था। तब निर्मल जी ने कहा था- पहले तो यह स्थिति है या नहीं, इसके बार में मुझे शंका है। यह हमारे प्रकाशकों की फैलाई बात है, पर पुस्तक मेलों में जिस तरह ले लोग दुकानों पर टूटते हैं, भिन्न भिन्न किस्म की किताबों को खरीदते हैं। एक पइछड़े हुए देश में पुस्तकों के लिए पिपासा स्वाभाविक रूप से होती है, क्योंकि उसे अन्य साधन कम सुलभ होते हैं। पर अच्छी पुस्तकें नहीं पढ़ पाने का एक बड़ा कारण यह है कि वे आसानी से उपलब्ध नहीं होती। फिर कम दामों पर उपलब्ध नहीं हो पाती हैं हमारी लाइब्रेरी की हालत भी बहुत खराब है। यूरोपीय देशों में शहर के हर हिस्से में एक अच्छी लाइब्रेरी मिलेगी। हमारे यहां बड़े बड़े शहरों में दो तीन पुस्तकालय होंगे, वह भी बड़ी खराब अवस्था में। तो अगर आप पुस्तक सस्कृति के विकास के साधन विकसित नहीं करेंगे, तो पुस्तकों के न बिकने का विलाप करना मेरे ख्याल से उचित नहीं है। निर्मल वर्मा ने बिल्कुल सही कहा था कि लाइब्रेरी की हालत खराब है, ज्यादा दूर नहीं जाकर दिल्ली में ही स्थित पुस्तकालयों की हालत पर नजर डालने से बातें साफ हो जाती हैं। अब सवाल उठता है कि क्या साहित्य उत्सवों से हम पुस्तक संस्कृति का निर्माण कर पा रहे हैं। इस बारे में कुछ कहना अभी जल्दबाजी होगी क्योंकि इन लिटरेचर फेस्टिवल में बहुत कम स्थानों पर पुस्तकें उपलब्ध होती हैं। जहां होती भी हैं वहां बहुत कम पुस्तकें होती हैं। पाठकों के सामने विकल्प कम होते हैं। लेकिन इतना अवश्य माना जा सकता है कि इन साहित्य उत्सवों ने पाठकों के बीच पढ़ने की ललक पैदा करने का उपक्रम तो किया ही है। पाठकों को नई पुस्तकों के बारे में जानकारी मिल जाती है।   
मेरे जानते हमारे देश में साहित्योत्सवों की शुरुआत जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजन से हुई थी। जयपुर में पिछले दस साल से आयोजित होनेवाला ये लिटरेचर फेस्टिवल साल दर साल मजबूती से साहित्य की दुनिया में अपने को स्थापित कर चुका है। हलांकि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को लोकप्रिय और चर्चित करने में सितारों और विवादों की खासी भूमिका रही है । वहां फिल्म से जुडे़ जावेद अख्तर, शबाना आजमी, शर्मिला टैगोर, गुलजार आदि किसी ना किसी साल पर किसी ना किसी सेशन में अवश्य मिल जाएंगे । प्रसून जोशी भी । यहां तक कि अमेरिका की मशहूर एंकर ओपरा विनफ्रे भी यहां आ चुकी हैं । इन सेलिब्रिटी की मौजूदगी में बड़े लेखकों की उपस्थिति कई बार दब जाती है । इसको विश्वस्तरीय साहित्यक जमावड़ा बनाने में इसके आयोजकों ने कोई कसर नहीं छोड़ी और वी एस नायपाल से लेकर जोनाथन फ्रेंजन तक की भागीदारी इस लिटरेचर फेस्टिवल में सुनिश्चित की गई । कई नोबेल और बुकर पुरस्कार प्राप्त लेखकों की भागीदारी जयपुर में होती रही है। लेखकों में भी सेलिब्रिटी की हैसियत या फिर मशहूर शख्सियतों की किताबों या फिर उनके लेखन को गंभीर साहित्यकारों या कवियों पर तरजीह दी जाती है। संभव है इसके पीछे लोगों को आयोजन स्थल तक लाने की मंशा रही हो क्योंकि इससे अलग तो कुछ होता दिखता नहीं है।  यह प्रवृत्ति सिर्फ भारत में ही नही है बल्कि पूरी दुनिया में ऐसा किया जाता रहा है । लंदन में तो इन साहित्यक आयोजनों में मशहूर शख्सियतों को लेखकों की बनिस्पत ज्यादा तवज्जो देने पर कई साल पहले खासा विवाद भी हुआ था । यह आवश्यक है कि इस तरह के साहित्यक आयोजनों की निरंतरता के लिए मशहूर शख्सियतों को उससे जोड़ा जाए, क्योंकि विज्ञापनदाता उनके ही नाम पर राशि खर्च करते हैं । विज्ञापनदाताओं को यह लगता है कि जितना बडा नाम कार्यक्रम में शिरकत करेगा उतनी भीड़ वहां जमा होगी और उसके उत्पाद के विज्ञापन को देखेगी, लिहाजा आयोजकों पर इसका भी दबाव होता है ।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजकों ने यह तो बता ही दिया है कि हमारे देश में साहित्य का बहुत बड़ा बाजार है और साहित्य और बाजार साथ साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकते हैं । इन आयोजनों से एक बात यह भी निकल कर आ रही है कि बाजार का विरोध कर नए वैश्विक परिदृश्य में पिछड़ जाने का खतरा भी है। हिंदी में लंबे समय तक बाजार और बाजारबाद का विरोध चलता रहा इसका दुष्परिणाम भी हमने देखा है। जयपुर लिटरेटर फेस्टिवल के विरोधी ये तर्क दे सकते हैं कि यह अंग्रेजी का मेला है लिहाजा इसको प्रायोजक भी मिलते हैं और धन आने से आयोजन सफल होता जाता है । सवाल फिर वही कि हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में हमने कोई गंभीर कोशिश कीबगैर किसी कोशिश के अपनी विचारधारा के आधार पर यह मान लेना कि हिंदी में इस तरह का भव्य आयोजन संभव नहीं है, गलत है । यह भी सही है कि विवादों ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को खासा चर्चित किया । आयोजकों की मंशा विवाद में रही है या नहीं यह तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन इतना तय है कि विवाद ने इस आयोजन को लोकप्रिय बनाया । चाहे वो सलमान रश्दी के कार्यक्रम में आने को लेकर उठा विवाद हो या फिर आशुतोष और आशीष नंदी के बीच का विवाद हो, सबने मिलकर इस फेस्टिवल को साहित्य की चौहद्दी से बाहर निकालकर आम जनता तक पहुंचा दिया। इस बारे में अब सरकारी संस्थाओं को भी गंभीरता से सोचना चाहिए कि इस तरह से मेले छोटे शहरों में लगाए जाएं ताकि साहित्य में उत्सव का माहौल तो बना ही रहे, पाठक संस्कृति के निर्माण की दिशा में भी सकारात्मक और ठोस काम हो ।


Monday, November 20, 2017

अराजक नहीं होती कलात्मक आजादी

गोवा में आयोजित होनेवाले अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के पहले विवाद की चिंगारी भड़काने की कोशिश की गई, जब दो फिल्मों को इंडियन पेमोरमा से बाहर करने पर जूरी के अध्यक्ष सुजय घोष ने इस्तीफा दे दिया। दरअसल पूरा विवाद फिल्म सेक्सी दुर्गा और न्यूड को इंडियन पेनोरमा से बाहर करने पर शुरु हुआ है। जूरी के अध्यक्ष ने इस बिनाह पर इस्तीफा दे दिया कि उनके द्वारा चयनित फिल्म को बाहर कर दिया गया। सेक्सी दुर्गा फिल्म के निर्माता इस पूरे मसले को लेकर केरल हाईकोर्ट पहुंच चुके हैं और उन्होंने आरोप लगाया है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने गैरकानूनी तरीके से उनकी फिल्म के प्रदर्शन को रोका है। लेकिन गोवा में आयोजित होनेवाले फिल्म फेस्टिवल से जुड़े लोगों के मुताबिक कहानी बिल्कुल अलहदा है। उनका कहना है कि जूरी ने बाइस फिल्मों के प्रदर्शन की संस्तुति कर दी जबकि नियम बीस फिल्मों के दिखाने का ही है। इस कारण दो फिल्म को बाहर करना ही था। यहां यह सवाल उठ सकता है कि इन दो फिल्मों को ही क्यों बाहर का रास्ता दिखाया गया। यह संयोग भी हो सकता है और अन्य वजह भी हो सकती है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती है।  
अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के आयोजन से जुड़े लोगों ने एक बेहद दिलचस्प कहानी बताई। उनके मुताबिक सेक्सी दुर्गा को मुंबई के एक फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शन की इजाजत मंत्रालय ने नहीं दी थी और उनका नाम रिजेक्टेड फिल्मों की सूची में रखा गया था। बताया जाता है कि उसके बाद निर्माताओं ने इस फिल्म का नाम एस दुर्गा रख दिया और सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट लिया। जब सेंसर बोर्ड ने फिल्म को सर्टिफिकेट दे दिया तो उसका प्रदर्शन मुंबई के फिल्म फेस्टिवल में हुआ। जब गोवा में आयोजित होनेवाले अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शन की बारी आई तो अनसेंसर्ड फिल्म जूरी के पास भेजी गई। जूरी ने अपने विवेक से फैसला लेते हुए इस फिल्म को इंडियन पेनोरमा में सेलेक्ट कर लिया। जब ये बात खुली तो मंत्रालय ने इसको प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी। इस तरह की कई कहानियां इस फिल्म को लेकर चल रही हैं। अब चूंकि मामला अदालत में है तो सबको अदालत के फैसले का इंतजार करना चाहिए। लेकिन जनता को एस दुर्गा के नाम से फिल्म दिखाने का उपक्रम करना चालाकी ही तो है, पहले प्रचारित करो कि फिल्म का नाम सेक्सी दुर्गा है और फिर उसको एस दुर्गा कर दो। और फिर अपनी सुविधानुसार सरकार, आयोजक या अन्य संगठनों को कठघरे में खड़ा कर दो।
दूसरी फिल्म न्यूड के बारे में कहा जा रहा है कि वो पूरी नहीं थी इसलिए भी उसके प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई। लेकिन फिल्म न्यूड की कहानी को लेकर हिंदी की लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ ने बेहद संगीन इल्जाम लगाया है। मनीषा का आरोप है कि न्यूड फिल्म की कहानी उनकी मशहूर कहानी कालंदी की नकल है। उन्होंने लिखा कि- जिस न्यूड फिल्म की चर्चा हम सुन रहे हैं, उन रवि जाधव जी से मेरा लंवा कम्युनिकेशन हुआ है। उनके स्क्रिप्ट राइटर कोई सचिन हैं। फिल्म की कहानी मेरी कहानी कालंदी की स्टोरी लाइन पर है। जहां मेरी जमना का बेटा का फेमस फोटोग्राफर बनता है, वहां एक बिगड़ैल व्यक्ति बन जाता है। मेरी जमना की मां भी वेश्या है, पर वो वेश्या ना बनकर न्यूड मॉडल बनती है और उसका बेटा शक करता है कि मेरी मां भी किसी गलत धंधे में है। पीछा करता है, स्टूडियो में झांकता है, अपनी मां को न्यूड पोज में देखता है। प्रोफेसर है एक जो जमुना को सपोर्ट करता है। जब ये बना रहे थे तो मुझे पता चल गया था। मैंने रवि जाधव से संपर्क किया था। रवि जाधव पूरी चतुराई से ये बताने लगे कि जे जे आर्ट्स से उनका पुराना रिश्ता है। वो उस गरीब न्यूड मॉडल को जानते हैं। यह उऩकी किसी लक्ष्मी की स्टोरी है. पर ट्रेलर पोल खोल गया। मनीषा के इन आरोपों पर अभी फिल्मकार का पक्ष आना बाकी है। इस मामले का निपटारा भी ऐसा प्रतीत होता है कि अदालत से ही होगा क्योंकि हिंदी लेखिका मनीषा ने भी अदालत जाने का मन बना लिया है।इन दिनों हिंदी साहित्य में चौर्यकर्म पर खुलकर बहस हो रही है।    
ये तो हुई इन फिल्मों से जुड़ी बातें लेकिन इस संबंध में मेरा ध्यान अनायास ही फिल्मों के नाम और उनके पात्रों पर चला जाता है। हमारे देश में अभिव्यक्ति की आजादी है, कलात्मक आजादी भी है लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब कलात्मक आजादी की आड़ में शरारतपूर्ण तरीके से काम किया जाता है। कहा जाता है कि दीपा मेहता की फिल्म फायर मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई की कहानी लिहाफ की जमीन पर बनाई गई है। अब यहां देखें कि लिहाफ के पात्रों का नाम बेगम जान और रब्बो है लेकिन जब फायर फिल्म बनती है तो उनके पात्रों का नाम सीता और राधा हो जाता है। ये है कलात्मक आजादी का नमूना। इस तरह के कई उदाहरण मिल जाते है। अब इसमें अगर एक समुदाय के अनेकों लोगों को शरारत लगता है तो उनकी बात को भी ध्यानपूर्वक तो सुना ही जाना चाहिए।  
ऐसे में यह भी विचार करना चाहिए कि जब भी कोई अपने आपको अभिव्यक्त करने के लिए ज्यादा स्वतंत्रता की अपेक्षा करता है तो स्वत: उससे ज्यादा उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार भी अपेक्षित हो जाता है । मकबूल फिदा हुसैन के उन्नीस सौ सत्तर में बनाए गए सरस्वती और दुर्गा की आपत्तिजनक तस्वीरों के मामले में दो हजार चार में दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस जे डी कपूर ने एक फैसला दिया था। जस्टिस कपूर ने आठ अप्रैल दो हजार चार के अपने फैसले में लिखा- इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि देश के करोड़ो हिंदुओं की इन देवियों में अटूट श्रद्धा है- एक ज्ञान की देवी हैं तो दूसरी शक्ति की । इन देवियों की नंगी तस्वीर पेंट करना इन करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना तो है ही साथ ही उन करोड़ों लोगों की धर्म और उसमें उनकी आस्था का भी अपमान है ।
शब्द, पेंटिंग, रेखाचित्र और भाषण के माध्यम से अभिव्यक्ति की आजादी को संविधान में मौलिक अधिकार का दर्जा हासिल है जो कि हर नागरिक के लिए अमूल्य है । कोई भी कलाकार या पेंटर मानवीय संवेदना और मनोभाव को कई तरीकों से अभिव्यक्त कर सकता है । इन मनोभावों और आइडियाज की अभिव्यक्ति को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है । लेकिन कोई भी इस बात को भुला या विस्मृत नहीं कर सकता कि जितनी ज्यादा स्वतंत्रता होगी उतनी ही ज्यादा जिम्मेदारी भी होती है । अगर किसी को अभिवयक्ति का असीमित अधिकार मिला है तो उससे यह अपेक्षित है कि इस अधिकार का उपयोग अच्छे कार्य के लिए करे ना कि किसी धर्म या धार्मिक प्रतीकों या देवी देवताओं के खिलाफ विद्वेषपूर्ण भावना के साथ उन्हे अपमानित करने के लिए । हो सकता है कि ये धर्मिक प्रतीक या देवी देवता एक मिथक हों लेकिन इन्हें श्रद्धाभाव से देखा जाता है और समय के साथ ये लोगों के दैनिक धर्मिक क्रियाकलापों से इस कदर जुड़ गए हैं कि उनके खिलाफ अगर कुछ छपता है, चित्रित किया जाता है या फिर कहा जाता है तो इससे धार्मिक भावनाएं बेतरह आहत होती है। अपने बारह पन्नों के जजमेंट में विद्वान न्यायाधीश ने और कई बातें कही और अंत में आठ शिकायतकर्ताओं की याचिका खारिज कर दी क्योंकि धार्मिक भावनाओं को भड़काने, दो समुदायों के बीच नफरत फैलाने आदि के संबंध में जो धाराएं (153 ए और 295 ए) लगाई जाती हैं उसमें राज्य या केंद्र सरकार की पू्र्वानुमति आवश्यक होती है, जो कि इस केस में नहीं थी । ( जस्टिस कपूर के जजमेंट के चुनिंदा अंशों के अनुवाद में हो सकता है कोर्ट की भाषा में कोई त्रुटि रह गई हो लेकिन भाव वही हैं )
अब सवाल यही कि जब संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर साफ तौर पर बता दिया गया है तो हर बार उसको लांघने की कोशिश क्यों की जाती है। क्या कलाकार की अभिव्यक्ति की आजादी आम आदमी रो मिले अधिकार से अधिक है। इसपर हमें गंभीरता से विचार करना होगा। ऐसी शरारतों से ही कुछ उपद्रवी तत्वों को बढ़ावा मिलता है कि वो भावनाएं आहत होने के नाम पर बवाल कर सकें। लेकिन जिन फ्रिंज एलिमेंट की गम निंदा करते हैं उनको जमीन देने के लिए कौन जिम्मेदार है इसपर विचार करना भी आवश्यक है। कलात्मक आजादी के नाम पर किसी को भी किसी की धार्मिक भावनाओं के साथ खेलने की इजाजत ना तो संविधान देता है और ना ही कानून तो फिर ऐसा करनेवालों को अगर फिल्म फेस्टिवल से बाहर का रास्ता दिखाया गया है तो गलत क्या है।


Saturday, November 11, 2017

लेखकीय आत्मलज्जा का सवाल

इस स्तंभ में पहले भी कई बार चर्चा की जा चुकी है कि हिंदी साहित्य के लिए फेसबुक और वहां चलनेवाली बहसें काफी महत्वपूर्ण हो गई हैं। महत्वपूर्ण इस वजह कि साहित्य की नई नई प्रवृत्तियों, रचनाओं पर तो संवाद होते ही हैं, साहित्यक विवाद भी अक्सर अब पत्रिकाओं की बजाए फेसबुक पर उठने लगे हैं। कई बार विवाद सिले हुए पटाखे की तरह उठते ही फुस्स हो जाते हैं तो बहुधा वो लंबे समय तक चलते हैं। समय के साथ साथ इन विवादों का दायरा भी विस्तार लेता है। इन दिनों फेसबुक पर साहित्यक चोरियों के आरोपों को लेकर घमासान मचा है। इस वक्त आरोपों के बवंडर में हैं हिंदी की कथाकार रजनी मोरवाल। रजनी मोरवाल पर आरोप है कि उन्होंने फेसबुक पर पोस्ट की गई सामग्रियों का इस्तेमाल हंस पत्रिका में प्रकाशित अपनी कहानी महुआ में किया है। पुराने फेसबुक पोस्ट के साथ साथ हंस पत्रिका में प्रकाशित रजनी मोरवाल की कहानियों के अंश फेसबुक पर पोस्ट किए जा रहे हैं। तमाम तरह की बातें हो रही है, आरोप लगाए जा रहे हैं । थाने, मुकदमे तक की बातें हो रही हैं। बौद्धिक संपदा की चोरी को लेकर कानूनची भी सक्रिय हैं। आरोपों के कोलाहल के बीच एक दिलचस्प मोड़ इस पूरे विवाद में आया। रजनी मोरवाल पर जिस फेसबुक पोस्ट को अपनी कहानी में उपयोग करने का आरोप लगा है उसपर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। फेसबुक पर सक्रिय चंद लोगों ने मूल फेसबुक पोस्ट को  कुबेरनाथ राय जी के निबंध का हिस्सा बताकर पोस्ट करना शुरू कर दिया। स्तंभ लिखे जाने तक इस तरह की बात करनेवाले लोग ये नहीं बता पाए हैं कि वो अंश कुबेरनाथ जी के किस निबंध का हिस्सा है। इसपर खामोशी है। कुछ लोगों का कहना है कि पूर्व में फेसबुक पर पोस्ट की गई साम्रगी और रजनी मोरवाल की कहानी के अंश दोनों गूगल बाबा की कृपा से अवतरित हुए हैं, इस कारण से दोनों में समानता है। अब सत्य क्या है इसबारे में तो आनेवाले दिनों में ही पता चल पाएगा। फिलहाल तो रजनी मोरवाल पर संगीन आरोप हैं और साहित्य जगत में आम धारणा बनती जा रही है कि उन्होंने पूर्व में फेसबुक पर पोस्ट की गई सामग्री का उपयोग बगैर क्रेडिट दिए किया। फेसबुक पर सक्रिय लोग इसको साहित्यिक चोरी कह रहे हैं। इस पूरे प्रकरण पर रजनी मोरवाल जी का पक्ष आना शेष है।   
इस घटना के बाद कुछ उत्साही लोगों ने पुराने मामलों को उछालना शुरू कर दिया, गड़े मुर्दे उखाड़े जाने लगे। रजनी मोरवाल के मुद्दे के सामने आने के बाद जयश्री राय पर को लेकर भी लोगों ने बातें करनी शुरू कर दी। उनपर भी आरोप लगाया जाने लगा कि उन्होंने अपनी कहानियों में विवेक मिश्र की नकल की, अपने उपन्यासों में मनीषा कुलश्रेष्ठ के उपन्यास के अंश का उपयोग कर लिया, कहीं मृदुला गर्ग के उपन्यास की पंक्तियां जस का तस उठाकर रख दी आदि आदि। जयश्री राय को लेकर इस तरह की चर्चा पुरानी रही है। इसके पहले हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश पर भी इस तरह के आरोप लगे थे। आलोचक रविभूषण के लेख से भी विवाद हुआ था। तब भी केस मुकदमे की बातें हुई थीं, लेकिन वो फेसबुक का दौर नहीं था। साहित्यक चोरी को लेकर आजादी के पहले सरस्वती पत्रिका के अंकों में भी लेख आदि छपे थे जो अब इतिहास के पन्नों में दर्ज है ।
अभी दो साल पहले दो हजार पंद्रह में भी साहित्यिक चोरी को लेकर फेसबुक पर काफी हो हल्ला मचा था। उस वक्त भी फेसबुक पर जारी चर्चा के आधार पर मैंने कुछ प्रवृत्तियों को रेखांकित किया था। दरअसल पिछले कुछ सालों में कुछ कवयित्रियां ऐसी आ गईं जो हैं जो पुराने कवियों की कविताओं की तर्ज पर शब्दों को बदलते हुए लोकप्रियता के पायदान पर ऊपर चढ़ना चाहती हैं। हिंदी साहित्य जगत में हमेशा से ऐसे लोग रहे हैं जो इस तरह की प्रतिभाहीन लेखिकाओं की पहचान कर उनकी महात्वाकांक्षाओं को परवान चढ़ाते हैं । इसके कई फायदे होते हैं । उन फायदों की फेहरिश्त यहां गिनाने का कोई अर्थ नहीं है । दो हजार पंद्रह में जब एक कवयित्री को लेकर विवाद उठा था तब भी ये बात आई थी कि हिंदी के वरिष्ठ लेखक क्या कर रहे हैं, वो खामोश क्यों हैं। बयानवीर लेखक संगठन क्या कर रहे हैं। तब भी कुछ नहीं हो पाया था और आशंका है कि इस बार भी शायद ही कोई पहल हो या किसी प्रकार का ठोस कदम उठाया जा सके।  
यहां चर्चा हो रही है हिंदी साहित्य में साहित्यिक चोरी के आरोपों की जो कि एक बार फिर से उभर कर सामने आ गया है और इन दिनों हिंदी साहित्य जगत में विमर्श के केंद्र में है। साहित्यिक चोरी के आरोपों पर फेसबुक पर ही निंदा करके मामला शांत हो जा रहा है। क्या साहित्यिक चोरी का सवाल बड़ा साहित्यिक सवाल नहीं है जिससे टकराने की कोशिश की जानी चाहिए। हद तो तब हो जा रही है जब उन रचनाओं को पुरस्कृत भी कर दिया जा रहा है जिनपर साहित्यिक चोरी का आरोप है। पुरस्कृत कर देने से रचनाओं को एक प्रकार की वैधता तो मिल ही जाती है। रघुवीर सहाय और पवन करण की कविताओं की छाया जिन कविताओं में दिखी थी उनपर बहुत बातें हो चुकी हैं और उनको दोहराने का कोई अर्थ नहीं है। इस तरह की तिकड़म करनेवाले लेखकों और लेखिकाओं को ये सोचना चाहिए कि साहित्य के पाठक इतने सजग हैं कि साहित्यिक चोरी करके कोई बचकर निकल नहीं सकता है । जब साहित्यिक चोरी पकड़ी जाती है तो यह कहकर बचने और बचाने की कोशिश की जाती है कि दोनों रचनाकारों की जमीन एक रही होगी। इसके अलावा यह भी कहा जाने लगा है कि हिंदी में साहित्यिक चोरी के ज्यादतर आरोप लेखिकाओं पर क्यों लगते हैं। ऐसा हाल में देखा जाने लगा है खासकर फेसबुक के लोकप्रिय होने के बाद से। लेकिन अगर बौद्धिक संपदा की चोरी है तो चोरी है उसमें स्त्री पुरुष का भेद नहीं किया जाना चाहिए।
फेसबुक पर जो साहित्य की दुनिया है वो पत्र-पत्रिकाओं की साहित्यिक दुनिया से अलग है। फेसबुक के जरिए प्रसिद्धि हासिल करनेवालों का एक पूरा गिरोह वहां सक्रिय है। फेसबुक ये साहित्यिक गिरोह अपने गैंग के सदस्यों की रचनओं की जमकर वाहवाही करने लग जाता है । लाइक्स और कमेंट की बौछार कर दी जाती है। आम और तटस्थ पाठकों को लगता है कि कोई बहुत ही क्रांतिकारी रचना आई है । फेसबुक पर सक्रिय इस साहित्यिक गिरोह के कर्ताधर्ता ये भूल जाते हैं कि ये आभासी दुनिया है और इसका फैलाव अनंत है । इसके दायरे में जो भी चीज आ जाती है वो बहुत दूर तक जाती है । सुदूर बैठा पाठक जो साहित्य के समीकरणों को नहीं समझता है और जो गंभीरता से साहित्य को घोंटता है वह जब इस तरह की साहित्यक चोरी को देखता है तो प्रमाण के साथ उजागर कर देता है ।
अब अगर हम इस प्रवृत्ति के बढ़ते जाने की वजहों की पड़ताल करते हैं तो सबसे बड़े दोषी के तौर पर मुझे तो गूगल बाबा ही नजर आते हैं। अपनी रचनाओँ में अपने अनुभवों को और अपने ज्ञान को पिरोने की बजाए अब कुछ लेखकों ने शॉर्टकट रास्ता अपनाना शुरू कर दिया है। कहीं से किसी कथा का कोई प्लॉट दिमाग में आत ही सबसे पहले गूगल की शरण में जाते हैं। गूगल पर लगभग हर तरह की सामग्री प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। कई बार स्त्रोत के साथ तो कई बार बगैर किसी स्त्रोत के। लेखकों को अपने प्लॉट के हिसाब से जो सामग्री मिलती है उसको उठा लेते हैं और उसको अपनी रचना में इस्तेमाल कर लेते हैं। जल्दी प्रसिद्धि की चाहत में स्त्रोत आदि की जांच करने या उसका उल्लेख करने का ध्यान नहीं रहता है। जिसका परिणाम यह होता है कि दो तीन लेखकों की रचनाओं  समानता दिखाई देती है। जिसकी पहले छपी होती है उसकी बल्ले बल्ले और जिसकी बाद में छपती है उसपर साहित्यिक चोरी का आरोप।

साहित्यिक चोरी को लेकर हिंदी में गंभीर विमर्श की दरकार है और इसकी पुनरावृत्ति नहीं हो इस बारे में संपादकों को भी सोचने की जरूरत है। जिन लेखकों पर आरोप लग रहे हैं उनको छापना बंद करना चाहिए या उनको अपनी बेगुनाही साबित करने का मौका दिया जाना चाहिए। कायदे से तो हंस पत्रिका में रजनी मोरवाल जी का पक्ष प्रकाशित होना चाहिए और संपादक को भी अपना पक्ष रखना चाहिए। पाठकों को पता तो लगे कि दोषी कौन है और है और दोषी के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई। अन्यथा पत्रिका पर भी पाठकों का भरोसा कम हो सकता है।   

Friday, November 10, 2017

नब्बे पार की लेखिका का सम्मान

उम्र के नब्बे पड़ाव पार कर चुकी लेखिका कृष्णा सोबती जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार देने का एलान किया गया । ज्ञानपीठ सम्मान देनेवाली जूरी के नामवर सिंह अध्यक्ष हैं। यह उनके कार्यकाल का अंतिम वर्ष है । उनके पुरस्कार के एलान के बाद साहित्यक हलके में इस बात को लेकर चर्चा है कि आखिर दो बार इस पुरस्कार के लिए मना करने के बाद कृष्णा जी ने इसको स्वीकार कैसे और क्यों कर लिया गया। साहित्य जगत में हो रही चर्चा के मुताबिक एक बार कृष्णा जी को किसी अन्य भारतीय भाषा के लेखक के साथ संयुक्त रूप से पुरस्कार देने का प्रस्ताव किया गया था जिसे उन्होंने मना कर दिया था। दूसरी बार जब हिंदी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया उसबार भी कृष्णा सोबती को ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की चर्चा चली थी लेकिन उस बार भी उन्होंने मना कर दिया था। साहित्य जगत की इस चर्चा में कितनी सत्यता है ये तो ज्ञानपीठ की जूरी के सदस्य या फिर कृष्णा जी ही बता सकती हैं लेकिन इस बार के उनके स्वीकार के पीछे ज्ञानपीठ के निदेशक और ज्ञानपीठ पुरस्कार के संयोयक लीलाधर मंडलोई की भूमिका या निर्विवाद छवि हो सकती है।
कृष्णा सोबती जी हिंदी की बेहद समादृत लेखिका है लेकिन वो काफी विवादित भी रही हैं। हिंदी में दिए जानेवाले पुरस्कारों को लेकर उनके विवादित बयान को अब भी याद कियी जाता है । कृष्णा जी ने एक बार कहा था कि दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में पुरस्कार आदि तय किए जाते हैं। कहा तो उन्होंने बहुत कुछ था लेकिन उसकी चर्चा इस वक्त उचित नहीं है। यह इसी पृष्ठभूमि का नतीजा है कि फेसबुक और सोशल मीडिया पर कृष्णा जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने को लेकर कई तरह की बातें हो रही है। कोई उनके उम्र को लेकर तंज कस रहा है तो कोई उनके स्वीकार को लेकर हैरान है। दरअसल हिंदी में बड़े पुरस्कारों के साथ यह समस्या है कि वो ज्यादातर लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड की तरह हो गए हैं। ज्ञानपीठ की बात को छोड़ भी दें तो ज्यादातर पुरस्कार अब लेखक की उम्र को देखकर दिए जाते हैं। यहां तक कि साहित्य अकादमी पुरस्कार में लेखन के साथ साथ उम्र को देखा जाने लगा है। कोलकाता की लेखिका अलका सरावगी को साहित्य अकादमी देने के बाद इस पुरस्कार में कोई ऐसा नाम नहीं आया जो कि सिर्फ कृति को ध्यान में रखकक दिया गया हो। ज्यादातर पुरस्कार भूल गलतियों को सुधाने के लिए दिए गए। यही हाल दिल्ली की हिंदी अकादमी के पुरस्कारों की भी है वहां भी उम्र को एक मानक माना जाने लगा है। जबकि पुरस्कार देनेवालों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अगर कोई बेहतरीन कृति आई हो तो उसको पुरस्कृत किया जाए। भगवानदास मोरवाल का उपन्यास काला पहाड़ ऐसी ही एक कृति है लेकिन साहित्य अकादमी उस वक्त उनको पुरस्कृत करने का साहस नहीं दिखा पाई।
यह हिंदी साहित्य के लिए बेहद सौभाग्य की बात है कि नब्बे साल की उम्र के आसपास या उससे पार के कई लेखक अब भी रचनात्मक रूप से सक्रिय हैं और अभी भी अपनी रचनात्मक मौजूदगी और सक्रियता से पूरे परिदृश्य में सार्थक हस्तक्षेप कर रहे हैं । नामवर सिंह तो अब भी गोष्ठियों की शान हैं । रामदरश मिश्र लगातार अपने लेखन से समकालीन साहित्य में सार्थक हस्तक्षेप कर रहे हैं । अभी हाल ही में कृष्णा जी के संस्मरणों की पुस्तक प्रकाशित हुई जिसकी हिंदी जहत में खूब चर्चा हुई। कृष्णा जी ना केवल रचनात्मक रूप से सक्रिय हैं बल्कि राजनीतिक-साहित्यक मोर्चे पर भी बेहद सक्रिय हैं। उनकी ये सक्रियता आश्वस्तिकारक भी है । पिछले दिनों जब पूरे देश में असहिष्णुता के खिलाफ कुछ लेखकों ने आंदोलन और पुरस्कार वापसी का अभियान चलाया था तो उसके बाद दिल्ली में देशभर के लेखकों का एक जमावड़ा हुआ था । कृष्णा सोबती जी उस जमावड़े में पहुंची थीं और अपनी बात उन्होंने रखी थी । उस वक्त देश में कथित तौर पर बढ़ रहे असहिष्णुता के खिलाफ पुरस्कार वापसी अभियान को कृष्णा सोबती की भागीदारी से बल मिला होगा, ऐसा मेरा मानना है । उनकी भागीदारी का जनमानस पर कितना असर हुआ इस पर मतभिन्नता हो सकती है। लेखक के तौर पर उनको अपनी बात कहने का हक है और साहित्य से इतर राजनीति पर भी अपनी राय प्रकट करने का अधिकार । कृष्णा सोबती के इस अधिकार की उनके वैचारिक विरोधियों ने भी सम्मान किया । कथित असहिष्णुता के खिलाफ उनके इस कदम को लेकर खासी चर्चा हुई थी, पक्ष में भी और विपक्ष में भी। लेकिन उसी के आसपास उन्होंने खुद पर लिखी एक किताब के विमोचन को टलवाने के लिए नई लेखिका पर उन्होंने सिर्फ इस लिए दबाव बनाया था कि उनकी विचारधारा से अलग विचार रखनेवाले लोग भी उस मंच पर थे। यह एक किस्म की अस्पृश्यता थी। इसपर भी विस्तार से चर्चा हुई थी और हिंदी के अलावा अंग्रेजी में भी इसपर लेख प्रकाशित हुए थे।   
इसके पहले भी कृष्णा जी और अमृता प्रीतम के बीच केस मुकदमा चले थे। कृष्णा सोबती ने ने अमृता प्रीतम पर उनकी कृति हरदत्त का जिंदगीनामा को लेकर केस किया था । वो केस करीब पच्चीस साल तक चला था और फैसला अमृता प्रीतम के पक्ष में आया था । दरअसल अमृता प्रीतम की किताब हरदत्त का जिंदगीनामा, जब छपा तो कृष्णा जी को लगा कि ये शीर्षक उनके चर्चित उपन्यास जिंदगीनामा से उड़ाया गया है और वो कोर्ट चली गईं । साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कृष्णा सोबती और ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजी गई अमृता प्रीतम के बीच इस साहित्यक विवाद की उस वक्त पूरे देश में खूब चर्चा हुई थी । जब केस का फैसला अमृता जी के पक्ष में आया तबतक अमृता प्रीतम की मौत हो गई थी । केस के फैसले के बाद कृष्णा सोबती ने बौद्धिक संपदा का तर्क देते हुए कहा था कि हार जीत से ज्यादा जरूरी उनके लिए अपनी बौद्धिक संपदा की रक्षा के लिए संघर्ष करना था । अब उस वक्त भी कई लेखकों ने कृष्णा सोबती को याद दिलाया था कि जिंदगीनामा का पहली बार प्रयोग उन्होंने नहीं किया था । कृष्णा सोबती के उपन्यास के पहले फारसी में लिखी दर्जनों किताबें इस शीर्षक के साथ मौजूद हैं । मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने तो उस वक्त भी कहा था कि श्रद्धेय गुरु गोविंद सिंह जी के एक शिष्य़ ने उनकी जीवनी भी जिंदगीनामा के नाम से लिखी थी और ये किताब कृष्णा सोबती के उपन्यास के काफी पहले प्रकाशित हो चुकी थी । जिंदगीनामा को लेकर कैसी बौद्धिक संपदा का गुमान और उसको लेकर कैसा विवाद और केस मुकदमा। लेकिन विवाद तो हुआ ही था।
इसी तरह से जब रवीन्द्र कालिया ने एक संस्मरण लिखा था तब भी कृष्णा जी ने काफी आपत्ति जताई थी और एक तरह से विवाद खड़ा किया था। बेहतर रचानाकरा और विवादप्रियता के अलावा कृष्णा जी में ह्यूमर भी था। मुझे याद पड़ता है कि दिल्ली में लेखक से मिलिए कार्यक्रम में एक बार कृष्णा जी थीं। उस कार्यक्रम में भारत भारद्वाज ने उनसे एक सवाल पूछा था कि कृष्णा जी की नायिकाएं इतनी बोल्ड और बिंदास दिखती हैं, वो आजाद ख्याल भी हैं और अपने कपड़ों आदि में आधुनिक भी। प्रश्नकर्ता ये जानना चाह रहे थे कि जब उनकी नायिकाएं इतनी बोल्ड हैं, बिंदास हैं और अपने ख्यालों औक लिबास को लेकर इतनी आधुनिक हैं तो कृष्णा जी खुद इतना लंबा चोगानुमा ड्रेस क्यों पहनती हैं। कृष्णा जी ने इस प्रश्न को मजाकिया लहजे में टालते हुए उत्तर दिया था कि भारत जी आप देखना क्या चाहते हैं और पूरा हॉल ठहाकों से गूंज गया था। ये उनके व्यक्तित्व का एक अलग पहलू है।
हम वापस लौटते हैं ज्ञानपीठ पुरस्कार पर । दरअसल ज्ञानपीठ की चयन प्रक्रिया बेहद जटिल है। इसकी शुरुआत होती है करीब चार हजार लेखकों और संस्थाओं स प्रस्ताव मंगवाने से लेकर। उन प्रस्तावों को फिर भाषावार छांटा जाता है । फिर तेइस भाषाओं की सलाहकार समिति के पास इन प्रस्तावों को भेजा जाता है जहां से उनसे दस नाम मांगे जाते हैं। उन नामों को फिर जूरी के सदस्यों के सामने रखा जाता है और वो अपनी सम्मति देते हैं। उन सम्मतियों के आधार पर जिस नाम पर सहमति बनती है या जिनको सबसे अधिक जूरी के सदस्य चाहते हैं उनको ये सम्मान दिया जाता है। टाई होने की स्थिति में अध्यक्ष के पास वीटो पॉवर होता है । इसके अलावा जूरी के सदस्यों को आधार सूची से अलग नाम प्रस्तावित करने का भी अधिकार होता है। ऐसे में किसी तरह की सेटिंग की गुंजाइश बहुत कम रहती है। इस बार भी कृष्णा जी के नाम के साथ अमिताभ घोष का नाम भी था। उनके नाम पर भी जूरी में व्यापक चर्चा हुई लेकिन जूरी के पाच सदस्यों ने कृष्णा जी के नाम पर सहमति दी और तीन ने अमिताभ घोष के नाम पर। जाहिर है चयन कृष्णा जी का ही होना था।


साहित्य क्षितिज पर छाए सितारे

अभी पिछले दिनों हेमा मालिनी की प्रामाणिक जीवनी हेमा मालिनी: बियांड द ड्रीम गर्ल की खासी चर्चा रही। इस पुस्तक की भूमिका प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लिखी है। हेमा मालिनी की यह जीवनी पत्रकार और प्रोड्यूसर राम कमल मुखर्जी ने लिखी है। हलांकि इसके पहले भावना सोमैया ने भी ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी की प्रामाणिक जीवनी लिखी थी । इस पुस्तक का नाम हेमा मालिनी था और ये जनवरी दो हजार सात में प्रकाशित हुई थी। पहली प्रामाणिक जीवनी के दस साल बाद दूसरी प्रामाणिक जीवनी का प्रकाशित होना इस बात का संकेत है कि सिनेमा के पाठक लगातार बने हुए हैं। हेमा मालिनी की दूसरी प्रामाणिक जीवनी में पहली वाली से कुछ ही चीजें अधिक हैं, एक तो वो जो पिछले दस सालों में घटित हुआ और दूसरी वो घटनाएं जो पहली में किसी कारणवश रह गई थी। हेमा मालिनी की इस प्रामाणिक जीवनी में उनके डिप्रेशन में जाने का प्रसंग विस्तार से है। इस पुस्तक के लॉंच के मौके पर दीपिका पादुकोण ने इसका संकेत भी किया था। दीपिका ने जहां अपने डिप्रेशन की खुलकर सार्वजनिक चर्चा की वहीं हेमा मालिनी ने उसको लगभग छुपा कर झेला और फिर उससे उबरीं। कई दिलचस्प प्रसंग और होंगे। इस आलेख का उद्देश्य हेमा मालिनी की इस प्रामाणिक जीवनी पर लिखना नहीं है बल्कि इससे इतर और आगे जाकर बात करना है।
दरअसल पिछले तीन चार सालों से फिल्मी कलाकारों और उनपर लिखी जा रही किताबें बड़ी संख्या में बाजार में आ रही हैं । फिल्मी कलाकारों या उनपर लिखी किताबें ज्यादातर अंग्रेजी में आ रही हैं और फिर उसका अनुवाद होकर वो हिंदी के पाठकों के बीच उपलब्ध हो रही हैं । पहले गाहे बगाहे किसी फिल्मी लेखक की जीवनी प्रकाशित होती थी या फिर किसी और अन्य लेखक के साथ मिलकर कोई अभिनेता अपनी जिंदगी के बारे में किताबें लिखता था लेकिन अब परिस्थिति बदल गई है । फिल्मी सितारे खुद ही कलम उठाने लगे हैं। हेमा मालिनी की जीवनी के पहले करण जौहर की आत्मकथानुमा संस्मरणों की किताब एन अनसुटेबल बॉय प्रकाशित हुई जो कि बाद में एक अनोखा लड़का के नाम से हिंदी में अनूदित होकर प्रकाशित हुई। इसमें उनके बचपन से लेकर जुड़वां बेटों के गोद लेने के पहले तक की कहानी है । इस पुस्तक में करण और अभिनेता शाहरुख खान की दोस्ती के किस्से पर तो पूरा अध्याय ही है। करण ने अपनी फिल्मों की तरह अपनी इस किताब में भी इमोशन का तड़का लगाया गया है। लगभग उसी समय ऋषि कपूर की आत्मकथा खुल्लम खुल्ला भी प्रकाशित हुई जो कि दाऊद इब्राहिम के प्रसंग को लेकर और फिल्मफेयर पुरस्कार खरीदने की स्वाकारोक्ति को लेकर खासी चर्चित हुई थी। इसके बाद आशा पारेख की जीवनी प्रकाशित हुई। इसके साल भर पहले राजू भारतन ने आशा भोंसले की सांगीतिक जीवनी लिखी थी। लगभग उसी वक्त सीमा सोनिक अलीमचंद ने दारा सिंह पर दीदारा के नाम से किताब लिखी थी।
अंग्रेजी में फिल्मी शख्सियतों से जुड़ी किताबों की एक लंबी फेहरिश्त है । नसीरुद्दीन शाह की आत्मकथा प्रकाशित हुई थी, दिलीप कुमार साहब की भी। उसके पहले करिश्मा और करीना कपूर की किताबें आई । दो हजार बारह में करीना कपूर की किताब- द स्टाइल डायरी ऑफ द बॉलीवुड दीवा आई जो उन्होंने रोशेल पिंटो के साथ मिलकर लिखी थी । उसके एक साल बाद ही उनकी बड़ी बहन करिश्मा कपूर की किताब- माई यमी मम्मी गाइड प्रकाशित हुई जो उन्होंने माधुरी बनर्जी के साथ मिलकर लिखी ।
इसके पीछे हम पाठकों का एक बड़ा बाजार को देख सकते हैं या बाजार का विस्तार की आहट भी महसूस कर सकते हैं । रूपहले पर्दे के नायक नायिकाओं के बारे में जानने की इच्छा पाठकों के मन में होती है। उनकी निजी जिंदगी कैसी रही, उसका संघर्ष कैसा रहा, उसकी पारिवारिक जिंदगी कैसी रही, उनका क्या किसी से प्रेम संबंध रहा, अगर रहा तो वो कितना रोचक रहा, आदि आदि । हम कह सकते हैं कि भारतीय मानसिकता में हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि उसके पड़ोसी के घर में क्या घट रहा है ये जाने । इसी मानसिकता का विस्तार पाठकों को फिल्मी सितारों तक ले जाता है और अंतत: बड़े पाठक वर्ग में बदल जाता है जो किताबों के लिए एक बड़े बाजार का निर्माण करती है ।
दूसरे फिल्मी सितारों के अंदर एक मनोविज्ञान काम करता है कि अगर वो किताबें लिखेगा तो बॉलीवुड से लेकर पूरे समाज में उनकी छवि गंभीर शख्सियत की बनेगी । नसीरुद्दीन शाह की आत्मकथा को साहित्य जगत में बेहद गंभीरता से लिया गया । शत्रुघ्न सिन्हा की जीवनी जो भारती प्रधान ने लिखी थी उसमें फिल्मों पर कम उनके सामाजिक जीवन पर ज्यादा बातें है । इसी तरह से स्मिता पाटिल पर मैथिली राव की किताब और सलमान खान पर जसिम खान की किताब प्रकाशित हुई थी । जीवनी और आत्मकथा से अलग हिंदी फिल्मों को लेकर कई गंभीर किताबें अंग्रेजी में प्रकाशित हुई हैं । जैसे एम के राघवन की डायरेक्टर्स कट, अनुराधा भट्टाचार्य और बालाजी विट्ठल की पचास हिंदी फिल्मों पर लिखी गई किताब गाता रहे मेरा दिल, प्रकाश आनंद बक्षी की डायरेक्टर्स डायरीज आदि प्रमुख हैं । इन किताबें ने फिल्मी दुनिया की सुनी अनसुनी कहानियों को सामने लाकर आती हैं । पचास फिल्मी गीतों को केंद्र में रखकर लिखी गई किताब में उन गानों के लिखे जाने से लेकर उनकी रिकॉर्डिंग तक की पूरी प्रक्रिया को रोचक अंदाज में लिखा गया है । इसी तरह से डॉयरेर्टर्स डायरी में गोविंद निहलानी, सुभाष घई, अनुराग बसु, प्रकाश झा, विशाल भारद्वाज, तिग्मांशु धूलिया समेत कई निर्देशकों के शुरुआती संघर्षों की दास्तां है ।
इसके बरक्श अगर हम हिंदी में देखें तो फिल्म लेखन में लगभग सन्नाटा दिखाई देता है । कुछ समीक्षकनुमा लेखक फिल्म समीक्षा पर लिखे अपने लेखों को किताब की शक्ल दे देते हैं या फिर कई लेखकों के लेखों को संपादित कर किताबें बाजार में आ जाती है । दरअसल ये दोनों काम गंभीर नहीं हैं और ना ही हिंदी के पाठकों की क्षुधा को शांत कर सकते हैं । पाठक इन किताबों को उसके शीर्षक और लेखक के नाम को देखकर खरीद लेता है लेकिन पढ़ने के बाद खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। इसका परिणाम यह होता है कि हिंदी में छपी फिल्मी किताबें अब कम बिकने लगी हैं।
इसकी क्या वजह है कि हिंदी के लेखक बॉलीवुड सितारों पर कोई मौलिक और मुक्कमल पुस्तक नहीं लिख रहे है या नहीं लिख पा रहे हैं। दरअसल हिंदी के लेखकों ने फिल्म को सृजनात्मक विधा के तौर पर गंभीरता से नहीं लिया और ज्यादातर फिल्म समीक्षा तक ही फंसे रहे। अगर हम इक्का दुक्का पुस्तकों को छोड़ दें तो हिंदी में फिल्म को लेकर, फिल्मी शख्सियतों को लेकर गंभीर काम क्यों नहीं हो रहा है, इस सवाल का उत्तर ढूंढना होगा। हम इस कमी की वजहों की पड़ताल करते हैं तो एक वजह तो ये नजर आती है कि सालों तक हिंदी में फिल्म पर लिखने को दोयम दर्जे का माना जाता रहा । फिल्मों पर लिखने वालों को फिल्मी लेखक कहकर उपहास किया जाता रहा । मुझे याद है कि एक समारोह में अशोक वाजपेयी जी ने फिल्म पर लिखी एक पुस्तक के बारे में कहा कि ये लोकप्रिय गायिका पर लिखी किताब है। लोकप्रिय कहते वक्त दरअसल वो लगभग उपहास की मुद्रा में थे। यह उपहास-भाव लेखक को हतोत्साहित करने के लिए काफी होता है। मैंने अशोक जी का उदाहरण सिर्फ इस वजगह से दिया कि वो अभी चंद दिनों पहले का वाकया है, लेकिन यह प्रवृत्ति हिंदी के आलोचकों और वरिष्ठ लेखकों में बहुत गहरे तक है। मुझे तो याद नहीं पड़ता कि हिंदी में फिल्म पर लिखी किसी किताब पर किसी वरिष्ठ आलोचक का कोई लेख या फिर सिनेमा पर स्वतंत्ररूप से कोई आलोचनात्मक पुस्तक आई हो। हिंदी में इस माहौल ने फिल्म लेखन को बाधित किया। इसके अलावा एक खास विचारधारा में भी फिल्मी लेखन को गंभीरता से नहीं देखा जाता था। फिल्मों को बुर्जुआ वर्ग के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जाता रहा। इस विचारधारा से जुड़े लेखकों ने भी कभी भी फिल्मों पर गंभीरता से नहीं लिखा और ना ही इस विधा पर लिखनेवालों को प्रोत्साहित किया। विचारधारा विशेष की इस उपेक्षा भी एक वजह है। अब जब अंग्रेजी में बहुतायत में पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं तो हिंदी के लेखकों के बीच भी इस तरह के लेखन को लेकर सुगबुगाहट है और कोशिशें शुरू हो गई हैं। यह आवश्यक भी है क्योंकि हिंदी साहित्य में पाठकों को विविधता का लेखन उपलब्ध करवाना होगा ताकि भाषा की चौहद्दी का विस्तार हो सके ।


Sunday, October 22, 2017

फिक्शन और वैचारिकी का द्वंद्व

वर्ष 2017 के लिए जब मैन बुकर प्राइज अमेरिकी लेखक जॉर्ज सांडर्स को उनके उपन्यास लिंकन इन द बार्डो को दिया गया तो एक बार फिर से जूरी के सदस्यों ने पुरस्कार के उच्च मानदंडों को मजबूक किया । पांच लेखक इस पुरस्कार के लिए शॉर्ट लिस्ट थे जिनमें से जॉर्ज सांडर्स को ये पुरस्कार दिया गया। मैन बुकर प्राइज को लेकर पूरी दुनिया में एक उत्सकुता का माहौल रहता है और माना जाता है कि इसकी जूरी उसी कृति का चुनाव करती है जिसने सचमुच साहित्य की दुनिया में नई जमीन तोड़ी है। नया भाषागत प्रयोग, नया फॉर्म, नया विषय या नया ट्रीटमेंट वाले लेखक ही मैन बुकर प्राइज हासिल कर पाते हैं। इस वर्ष के जूरी के सदस्यों ने भी इस परंपरा को कायम रखा और अपने बयान में कहा कि सैंडर्स का उपन्यास उनके सामने एक चुनौती की तरह था। उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा था कि मैन बुकर प्राइज किसी और को दिया जाए। जूरी की अध्यक्ष ने इस कृति तो असाधारण करार दिया। तीन साल पहले इस पुरस्कार को अमेरिकी लेखकों के लिए भी खोला गया था और उसके बाद से दो अमेरिकी लेखकों को ये पुरस्कार मिल चुका है। पॉल बेयटी को भी उनके उपन्यास पर पचास हजार डॉलर का मैन बुकर प्राइज मिल चुका है। अगर हम जॉर्ज सैंडर्स के उपन्यास को देखें तो इसका विषय और उस विषय का ट्रीटमेंट भी अलग है। जॉर्ज सैंडर्स का उपन्यास लिंकन इन द बार्डो एकदम नए विषय और सही घटना पर आधारित है। लिंकन इन द बार्डो में उपन्यासकार ने 1862 में अब्राहम लिंकन के ग्यारह वर्षीय बेटे की मौत के बाद वाशिंगटन डीसी के कब्रिस्तान में दफनाने की घटना से उठाया है। मैन बुकर प्राइज मिलने के बाद सैंडर्स ने बताया कि अब्राहम लिंकन के बेटे के दफनाने की घटना को जब उन्होंने सुना और उनको पता चला कि लिंकन बार बार कब्रगाह जाया करते थे तो उनके जेहन में इस उपन्यास ने आकार लेना शुरू कर दिया था । लेकिन उसको लिखन में काफी वक्त लगा और लंबे अंतराल के बाद जब ये उपन्यास प्रकाशित हुआ तो अपनी विषयगत नवीनता को लेकर पाठकों और आलोचकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। लेखक ने डर को और फिर उस डर से निबटने के मनोविज्ञान और स्थितियों को अपने इस उपन्यास का केंद्रीय थीम बनाया है। पुरस्कार मिलने के बाद उन्होंने स्वीकार भी किया कि हम एक अजीबोगरीब समय में रह रहे हैं जहां डर से छुटकारा पाने के लिए या तो हम हिंसा की ओर जाते हैं या फिर बहिष्कार का रास्ता अपनाते हैं। सैंडर्स को लगता है कि जिस तरह से पहले डर को प्यार से जीतने की कोशिश होती थी वो अब नहीं हो रही है।अपने डर को लोग दूसरों को डराकर या हराकर दूर करना चाहते हैं। तमाम तरह की ऐसी घटनाएं उनके उपन्यास में प्रतिबिंबित होती हैं। लिंकन के बेटे की कब्र से कहानी को उठाकर लेखक बौद्ध धर्म में वर्णित मृत्यु और उसके बाद पुनर्जन्म के बीच के काल को समेटता चलता है। उपन्यास का कालखंड वो है जब अब्राहम लिंकन अमेरिका में अपनी पहचान को लेकर संघर्ष कर रहे थे। लिंकन के समय का संघर्ष भी इस उपन्यास में बार बार लौट कर आता है। लिंकन इन द बार्डो में सांडर्स ने कई पुरानी घटनाओं का, पत्रों का, इतिहास की पुस्तकों का हवाला भी दिया है। यह उपन्यास अमेरिकी साहित्य जगत में मील का पत्थर साबित होगा।
जब गॉड ऑफ स्माल थिंग्स के प्रकाशन के बीस साल बाद अरुंधति का दूसरा उपन्यास द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस। छपा था तब से इस बात की चर्चा शुरू हो गई थी कि उनके नए उपन्यास को मैन बुकर प्राइज मिल सकता है।  अरुंधति राय ने पिछले दो दशकों में अपने एक्टिविज्म से एक अलग ही तरह का वैश्विक पाठक वर्ग तैयार किया है। अरुंधति राय का पहला उपन्यास गॉड ऑफ स्माल थिंग्स उन्नीस सौ सत्तानवे में आया था, जिसपर उन्हें मैन बुकर पुरस्कार मिला था। यह भारत में रहकर लेखन करनेवाले किसी लेखक को पहला बुकर था। पूरी दुनिया में अरुंधति राय के नए उपन्यास का इंतजार था, भारत में भी उनके पाठकों को और उनकी विचारधारा के लोगों को भी। दो उपन्यासों के प्रकाशन के अंतराल के बीच अरुंधति ने कश्मीर समस्या, नक्सल समस्या, भारतीय जनता पार्टी खासकर नरेन्द्र मोदी के उभार पर बहुत मुखरता से अपने विचार रखे थे। उनके इस तेवर को आधार बनाकर ही उनके समर्थकों ने उनको वैश्विक स्तर का विचारक करार दिया। अरुंधति का अपना एक पक्ष है, उनके अपने तर्क हैं, जिससे सहमति या असहमति एक अलहदा मुद्दा है लेकिन वो बहुधा विचारोत्तेजक होते हैं । इस वैचारिक मुखरता की वजह से उनकी एक रचनात्मक लेखक के रूप में उपस्थिति थोड़ी कमजोर पड़ गई । जितनी मुखरता से वो भारत की उपरोक्त समस्याओं पर अपने विचारों को प्रकट करती रही हैं, तो यह लाजमी था कि ये सब विचार किसी ना किसी रूप में उनके उपन्यास में आएं। आए भी हैं। द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस के पात्रों की पृष्ठभूमि इन्हीं इलाकों से है। पात्रों के संवाद के केंद्र में भी बहुधा इन समस्याओं को लेखिका जगह देती चलती हैं।
अरुंधति का यह उपन्यास द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस रोचक तरीके से शुरू होता है । शुरुआत एक लड़के की कहानी से होती है कि किस तरह से उसके अंदर स्त्रैण गुण होता है और अंतत: वो किन्नरों के समूह में शामिल हो जाता है। अगर हम जॉर्ज सैंडर्स की उपन्यास से इस उपन्यास की तुलना करें तो शुरुआत में दोनों में एक मजबूत टक्कर दिखाई देती है, लेकिन जॉर्ज सैंडर्स अपने उपर अपने विचारों को हावी नहीं होने देते हैं, जबकि अब्राहम लिंकन के वक्त अमेरिका में काफी उथल पुथल थी, वैचारिक टकराहट भी जमकर हो रहे थे। लेकिन सैंडर्स की तुलना में अरुंधति ने अपने उपन्यास में वैचारिकी को हावी होने दिया। नतीजा यह हुआ कि अरुंधति का एक्टिविस्ट उनके लेखक पर हावी होता चला गया। किन्नरों के बीच के संवाद में यह कहा जाता है कि दंगे हमारे अंदर हैं, जंग हमारे अंदर है, भारत-पाकिस्तान हमारे अंदर है आदि आदि। अब इस तरह के बिंबों के बगैर भी बात की जा सकती थी, रोचक और दिलचस्प तरीके से किन्नरों के अंदर और बाहर का संघर्ष दिखाया जा सकता था। लेकिन कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती है तो लेखक पर एक्टिविस्ट पूरी तरह से हावी हो जाता है। फिक्शन की आड़ लेकर जब अरुंधति कश्मीर के परिवेश में घुसती हैं तो उनकी भाषा बेहद तल्ख हो जाती है, बहुधा फिक्शन की परिधि को लांघते हुए वो अपने सिद्धांतों को सामने रखती नजर आती हैं। कश्मीर के हालात और कश्मीरियों के दुखों का विवरण देते हुए वो पाठकों को उस भाषा से साक्षात्कार करवाती हैं जिस भाषा से कोफ्त हो सकती है क्योंकि पाठक फिक्शन समझ कर इस पुस्तक को पढ़ रहा होता है। कश्मीर के परिवेश की भयावहता का वर्णन करते हुए वो लिखती हैं मौत हर जगह है, मौत ही सबकुछ है, करियर, इच्छा, कविता, प्यार मोहब्बत सब मौत है। मौत ही जीने की नई राह है । जैसे जैसे कश्मीर में जंग बढ़ रही है वैसे वैसे कब्रगाह भी उसी तरह से बढ़ रहे हैं जैसे महानगरों में मल्टी लेवल पार्किंग बढ़ते जा रहे हैं। इस तरह की भाषा बहुधा वैचारिक पुस्तकों या लेखों में पढ़ने को मिलती है। यहीं आकर जॉर्ज सैंडर्स आगे बढ़ते चले गए और प्राथमिक सूची में आने के बावजूद अरुंधति का उपन्यास अंतिम पांच में भी जगह नहीं बना पाया।
अरुंधति का यह उपन्यास, दरअसल, कई पात्रों की कहानियों का कोलाज है। शुरुआत होती है अंजुम के किन्नर समुदाय में शामिल होने से। उसके बाद कई कहानियां एक के बाद एक पाठकों के सामने खुलती जाती हैं। केरल की महिला तिलोत्तमा की कहानी जो अपनी सीरियन क्रश्चियन मां से अलग होकर दुनिया को अपनी नजरों से देखती है। इस पात्र को देखकर अरुंधति के पहले उपन्यास गॉड ऑफ स्माल थिंग्स की ममाची की याद आ जाती है क्योंकि दोनों पात्र रंगरूप से लेकर हावभाव और परिवेश तक में एक है। अपने उपन्यास में अरुंधति ने ये बहताने की कोशिश की है कि किस तरह परिस्थियों के चलते श्मीरी युवक आतंकवादी बन जाते हैं। यहां पर एक बार फिर से संवाद के जरिए कश्मीर की ऐतिहासिकता को लेकर अरुंधति के विचार प्रबल होने लगते हैं । पाठकों पर जब इस तरह के विचार लादने की कोशिश होती है तो उपन्यास बोझिल होने लगता है, उसके विषय का ट्रीटमेंट गड़बडाने लगता है । एक बार फिर से यह बात पुख्ता हुई कि फिक्शन में ज्यादा वैचारिकी चलती नहीं है। यही हाल हिंदी के भी ज्यादातर उपन्यासों का है जहां वैचारिकी फिक्शन पर हावी होने लगती है।