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Saturday, June 24, 2017

संस्थाओं को खत्म करने की कवायद!

अब से करीब तीन साल पहले मई, दो हजार चौदह में जब केंद्र में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनी थी तो उन्होंने कई प्रयोग किए। कई संस्थाओं के नाम से लेकर उसके काम काज में भी आमूल-चूल परिवर्तन किए गए। ऐसी ही एक संस्था थी योजना आयोग। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने योजना आयोग का पुनर्गठन करते हुए उसका नाम बदलकर नीति आयोग कर दिया और टीम इंडिया की अवधारणा को मजबूत करने के लिहाज से उसके कामकाज में भी बदलाव किए गए। जाहिर सी बात है नीति आयोग की टीम में भी नए चेहरों को जगह दी गई। इस बात पर भी जोर था कि लालफीताशाही को हतोत्साहित किया जाए और देश को मजबूत करने की दिशा में ठोस नीतियां बनाकर उनका किय्रान्वयन किया जाए। यह एक बहुत ही अच्छी सोच थी जिसका अमूमन हर तरफ स्वागत ही हुआ था। शुरुआत में नीति आयोग ने बेहतर तरीके से काम भी किया, अब भी कर रहे होंगे लेकिन हाल के दिनों में नीति आयोग ने कुछ विवादास्पद सुझाव देकर सरकार को बैकफुट पर जाने को मजबूर कर दिया। कुछ दिनों पहले नीति आयोग ने कृषि पर कर लगाने का प्रस्ताव देकर सरकार की किरकिरी करवा दी थी। नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने आयोग की एक बैठक में किसानों को खेती से होनेवाली आय पर टैक्स लगाने का सुझाव दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई नीति आयोग की इस बैठक में बिबेक देबरॉय ने तीन साल की कार्ययोजना को पेश करते समय कृषि से होनेवाली आय को आयकर के दायरे में लाने की वकालत की। बिबेक देबरॉय ने कहा था कि आयकर का दायरा बढ़ाने का यह एक तरीका हो सकता है। बिबेक ने तमाम तरह के आयकर कानूनों का हवाला देते हुए अपना पक्ष रखा था। नीति आयोग के विजन डॉक्यूमेंट में एक हेडर है- इनकम टैक्स ऑन एग्रिकल्चर इनकम जो कहता है कि अभी खेती से होनेवाली आय में हर तरह की ठूट मिली है चाहे किसानों को कितनी भी आय हो। जबकि कृषि से होनेवाली आय में छूट देने का उद्देश्य किसानों को संरक्षण देना था। कभी कभार इस छूट का बेजा इस्तेमाल भी होता है और खेती के अलावा अन्य आय को भी कृषि आय के रूप में दिखाकर टैक्स में छूट हासिल किया जाता है। काले धन की समस्या से निबटने के लिए इस तरह के चोर दरवाजों को बंद करना होगा। नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय के इस बयान के बाहर आते ही पूरे देश में हंगामा मच गया। किसानों का मुद्दा हमेशा से हमारे देश में संवेदनशील रहा है सरकार की किरकिरी होते देख वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्वयं मोर्चा संभाला और साफ कर दिया कि सरकार का कृषि से होनेवाली आय को कर के दायरे में लाने का कोई इरादा नहीं है । वित्त मंत्री अरुण जेटली के बयान के अड़तालीस घंटे भी नहीं बीते थे कि केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने भी खेती पर टैक्स की बात कहकर सरकार को फिर धर्मसंकट में डाल दिया था। खेती से होनेवाली आय पर टैक्स लगाने के नीति आयोग के प्रस्ताव को लेकर घिरी सरकार अभी संभली भी नहीं थी कि नीति आयोग ने एक और सुझाव दे डाला जिसपर सरकार ने अमल करना भी शुरु कर दिया है।
यह सुझाव है कई मंत्रालयों के अंतर्गत काम कर रही स्वायत्त संस्थाओं के अलग अलग संस्थाओं में विलय करने का और कुछ संस्थाओं को कंपनी की तरह बनाने का। नीति आयोग ने कुछ छह सौ उनासी संस्थाओं को चिन्हित किया है जिन्हें चरणबद्ध तरीके से पुनर्गठन के नाम पर अलग अलग संस्थाओं में मिलाकर नई पहचान देने का काम शुरू किया जा चुका है। पहले चरण में उन स्वायत्त संस्थाओं को चिन्हित किया गया है जो सोसाइटीज एक्ट के तहत निबंधित होकर काम करते हैं । सुझाव है कि भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, इंडियन काउंसिल ऑफ फिलॉसफिकल रिसर्च और  इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च को एक साथ मिलाकर एक नई संस्था का गठन किया जाए या फिर इन सबको जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के साथ विलय कर दिया जाए। इसी तरह से सिंधी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए बनी संस्था नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ सिंधी लैंग्वेज को मैसूर से सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ लैंग्लेज के साथ और उर्दू के विकास के लिए गठित नेशनल काउंसिल ऑफ प्रमोशन ऑफ उर्दू को जामिया मीलिया या मौलाना आजाद उर्दू विश्वविद्यालय के साथ जोड़ दिया जाए। अब तक करीब चालीस संस्थाओं के विलय या उसको बंद करने पर काम शुरू हो चुका है। नीति आयोग के सुझावों के मुताबिक पुणे की फिल्म और टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और सत्जित राय फिल्म और टेलीविजन संस्थान को मिलाकर एक कर देने का। इसी तरह से देश की प्रतिष्ठित पत्रकारिता संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन को जामिया मीलिया यूनिवर्सिटी या जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के साथ विलय का प्रस्ताव है। तर्क ये दिए जा रहे हैं कि जिन छह सौ उनासी स्वायत्त संस्थाओं को चिन्हित किया गया है उनपर बहत्तर हजार करोड़ का खर्च हो रहा है । एक तर्क यह भी है कि इनमें से कई संस्थाएं एक ही तरह के काम कर रही हैं, लिहाजा उनका विलय जरूरी है। इस प्रस्ताव पर काफी तेजी से काम हो रहा है और इन संस्थाओं को आपत्तियां भेजने की खानापूरी करने को भी कहा गया है। जब ये संस्थाएं आपत्ति भेज रही हैं तो उनको कहा जा रहा है कि विलय की तैयारी करिए। पुनर्गठन या फिर वित्तीय अनुशासन बहाल करने के नामपर यह प्रस्ताव देखने में अवश्य अच्छा लगता है लेकिन इसके नतीजे बहुत गंभीर होने वाले हैं।
इस वर्ष केंद्र सरकार दीन दयाल उपाध्याय की जन्मशती वर्ष मना रही है और उनके सिद्धातों को, उनके विचारों को फैलाने का काम भी कर रही है। दीनदयाल उपाध्याय जी की पूरी सैद्धांतिकी विकेन्द्रकरण को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बढ़ावा देती है। पंडित जी के जन्मशती वर्ष में बजाए विकेन्द्रीकरण को बढ़ावा देने के ये सरकार केंद्रीकरण को बढ़ावा दे रही है। इसपर ध्यान देने की जरूरत है। आश्चर्य की बात है कि स्वायत्त संस्थाओं को मजबूत करने के नाम पर इनका व्यावसायीकरण करने की योजना परवान चढ़ाई जा रही है और हमारा बौद्धिक वर्ग खामोश है। पहले इस तरह की कई संस्थाओं को अपने खर्च का तीस फीसदी खुद से जुटाने का आदेश दिया गया था और अब उनके सामने अस्तित्व का संकट खड़ा किया जा रहा है।
अब अगर हम एक दो उदाहरण से इस प्रस्ताव की खामियों को समझने की कोशिश करें तो वो खतरे साफ हो जाते हैं। केंद्रीय हिंदी संस्थान को संभवत: इलाहाबाद विश्वविद्यालय या काशी हिंदू विश्वविद्यालय में विलय करने का विकल्प दिया गया है। इस संस्था को कमजोर कर सरकार हिंदी के साथ चाहे अनचाहे अन्याय कर रही है। यह संस्थान हिंदी के विकास और प्रचार प्रसार के लिए गंभीरता से काम कर रही है। यहां प्रतिवर्ष बयालीस देशों के दो सौ छात्र हिंदी सीखते हैं जो अपने अपने देश में जाकर हिंदी का प्रचार प्रसार करने में सहयोग करते हैं। इस संस्थान में गैर हिंदी प्रदेशों के शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाता है। ये संस्था अनुवादकों को तैयार करती है। इसी तरह से एक और संस्थान है, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, यह संस्था भी अपने प्रकाशनों और आयोजनों से हिंदी को समृद्ध कर रही है। अब इनको उन विश्वविद्यालयों के साथ जोड़ने की बात की जा रही है जो खुद जांच के दायरे में है। इनमें से कई विश्वविद्यालयों को मंत्रालय लगभग निकम्मा या बदतर परफार्मेंस करनेवाले की श्रेणी में रखती है। अगर विश्वविद्यालयों के साथ इन संस्थानों को जोड़ दिया तो ये भी उसी तरह की संस्कृति के शिकार हो जाएंगे।

सरकार को अपने लोक कल्याणकारी स्वरूप को नहीं भूलना चाहिए। किसी भी संस्था को बनाना बहुत मुश्किल होता है और उसको खत्म करने में ज्यादा वक्त नहीं लगता है। जब इन संस्थाओं का गठन किया गया था तब से लेकर अबतक इनमें जो काम हुआ है उसका ऑडिट होना चाहिए। उसके बाद ही किसी तरह का फैसला होना चाहिए। अगर इन संस्थाओं में संतोषजनक काम नहीं हुआ तो उसके लिए कोशिश करनी चाहिए। संस्थाओं को खत्म कर देने से कुछ हजार करोड़ रुपए की बचत हो सकती है लेकिन उससे जो भाषा, कला और संस्कृति को नुकसान होगा उसका आंकलन नीति आयोग के अफसर नहीं कर सकते। वैसे भी अगर देखा जाए तो भाषा के लिए काम रही संस्थाओं पर सरकार प्रतिवर्ष, एक अनुमान के मुताबिक, चार सौ करोड़ ही खर्च करती है। इन संस्थाओं को कंपनियों में बदलकर उनसे मुनाफे की अपेक्षा नहीं की जा सकती है क्योंकि ये जो काम कर रही हैं उसको नफे नुकसान के पैमाने पर मापा नहीं जा सकता है। 

Monday, June 19, 2017

राहुल से हो पाएगा क्या?

पिछले तीन चार सालों से नियमित अंतराल पर इस बात के कयास लगते रहे हैं कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को पार्टी की कमान सौंपी जाने वाली है। सोनिया गांधी की बीमारी के बाद कयास का अंतराल कम होता चला गया है। जब भी कांग्रेस के सामने किसी तरह की क्राइसिस या राजनीति का अहम पड़ाव आता है तो इस तरह की खबरें आने लगती हैं कि राहुल गांधी के पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी अमुक वक्त तक हो जाएगी। पर अबतक ऐसा हो नहीं पाया है। अभी हाल ही में राष्ट्रपति चुनाव को लेकर रणनीति बनाने के लिए कांग्रेस के तमाम आला नेता जब सोनिया गांधी की अध्यक्षता में बैठे तो एक बार फिर से इस बात के कयास लगने लगे कि राहुल गांधी को पार्टी की रहनुमाई सौंप दी जाएगी। पिछले साल सात नवंबर को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में इस बात पर जमकर चर्चा हुई थी कि राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी संभालनी चाहिए। कार्यसमिति के ज्यादातर सदस्य इस पक्ष में थे भी लेकिन तब दिग्विजय सिंह ने कहा था कि सोनिया गांधी की अनुपस्थिति में इस तरह का कोई फैसला लेना उचित नहीं था। गौरतलब है कि उस वक्त सोनिया गांधी तबीयत खराब होने की वजह से उक्त बैठक में शामिल नहीं हो पाई थी।
इस साल के अंत तक कांग्रेस पार्टी में संगठनात्मक चुनाव होने हैं। राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष पद सौंपने की एक बार फिर से तैयारी शुरू हो गई है। कयासबाजी भी। अब सवाल यही है कि राहुल गांधी कांग्रेस पद की जिम्मेदारी से भाग रहे हैं या फिर पार्टी में उनकी ताजपोशी को लेकर दो मत हैं। पार्टी से जुड़े कुछ नेताओं का दावा है कि राहुल गांधी लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर पार्टी अध्यक्ष बनना चाहते हैं जबकि ज्यादातर नेता चाहते हैं कि कांग्रेस कार्यसमिति राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष नामित कर दे और फिर उसके बाद राष्ट्रीय अधिवेशन में उनके नाम पर मुहर लग जाए। यह तो वो बातें हैं जो सिद्धांत रूप से सामने आने पर अच्छी लगती हैं लेकिन इसके अलावा भी उनके अध्यक्ष बनने में एक पेंच है। वो पेंच है पार्टी के वो नेता जो सोनिया गांधी की पीढ़ी के हैं। वो चाहते हैं कि मौजूदा व्यवस्था ही चलते रहे जिसते तहत पार्टी के बारे में अंतिम फैसला लेने का हक सोनिया गांधी के हाथ में ही रहे और राहुल गांधी उपाध्यक्ष के तौर पर काम करते रहे। उनके तर्क हैं कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में विपक्ष एकजुट हो सकता है लेकिन नीतीश और ममता बनर्जी जैसे दिग्गजों को राहुल गांधी का नेतृत्व मंजूर ना हो। इस तरह के तर्क देकर राहुल गांधी की ताजपोशी में फच्चर फंसाया जाता रहा है ।

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस इस वक्त उस दौर से गुजर रही है जहां नेतृत्व को लेकर नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक में एक भ्रम और उलझन लक्षित किया जा सकता है । सोनिया के नेपथ्य में रहने की वजह से पुरानी पीढ़ी के नेता स्वत: परिधि पर चले गए थे और राहुल गांधी के आसपास के नेता पार्टी के केंद्र में दिखाई देने लगे थे । यह संसद और उसके बाहर दोनों जगह पर साफ तौर पर देखा जा सकता था । सोनिया के नेपथ्य में जाने के बावजूद उनके इर्दगिर्द के नेता भले ही पृष्ठभूमि में चले गए हों लेकिन उनकी ताकत कम नहीं हुई थी । ये जरूर हुआ कि राहुल गांधी के नजदीकी नेताओं का भाव बढ़ गया । इस परिस्थिति में पार्टी के फैसलों और नेताओं के बयान में एकरूपता नहीं दिखाई देती है । कुछ नेताओं का मानना है कि राहुल गांधी जब नोटबंदी का विरोध कर रहे थे और धीरे-धीरे अन्य विपक्षी दलों के नेता उनके साथ आते दिख रहे थे वैसे में राहुल गांधी बगैर सबको विश्वास में लिए प्रधानमंत्री मिलकर विपक्षी एकता के प्रयासों को झटका दे गया । दरअसल अगर हम देखें तो दो हजार नौ के लोकसभा चुनाव के बाद ही राहुल गांधी को कमान सौपने की मांग के बाद से यह भ्रम की स्थिति बनी हुई है । इस भ्रम ने दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की लुटिया डुबोई थी । सात आठ साल से यह स्थित बनी हुई है और एक के बाद एक चुनाव हारने के बाद यह और बढ़ता चला जा रहा है । नेतृत्व में भ्रम की वजह से पार्टी का कोई सीधा रास्ता नहीं बन पा रहा है जिसपर चला जा सके।
दो हजार उन्नीस का आमचुनाव अब आ ही चला है । एक तरह से देखें तो उसमें डेढ साल का वक्त बचा है क्योंकि छह महीने पहले से तो आचार संहिता आदि लगा दी जाती है। अब वक्त कांग्रेस के हाथ से लगभग निकल चुका है। य़ूपी चुनाव के बाद तो जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री ओमर अबदुल्ला ने कह ही दिया था कि अब दो हजार चौबीस की तैयारी करनी चाहिए। दरअसल अगर कांग्रेस अब भी राहुल गांधी के हाथ में कमान सौंपती है तो उनके अबतक के अप्रोच को देखकर लगता नहीं है कि वो बहुत गंभीरता से इस जिम्मेदारी को निभा ले जाएंगे। पहले ही कई बार कहा जा चुका है कि राजनीति चौबीस घंटे का काम है इसको कैजुअल तरीके से नहीं किया जा सकता है। अब जब देश में किसान अपनी समस्या को लेकर उग्र हो रहे हैं तो राहुल गांधी इटली चले गए हैं और पार्टी में फिर से सभी नेता हो गए हैं। अगर कांग्रेस को 2019 की लड़ाई में बने भी रहना है तो राहुल गांधी को कमान फौरन सौंपनी होगी और राहुल बाबा को भी खालिस राजनेता की भूमिका में उतरना होगा क्योंकि उनका मुकाबला अमित शाह जैसे मेहनती अध्यक्ष से है।


Saturday, June 17, 2017

पाठकीयता के भूगोल का हो विस्तार

इन दिनों हिंदी पर खूब बातें हो रही हैं लेकिन हिंदी को लेकर जितनी गंभीरता से कोशिश होनी चाहिए उतनी कोशिश हो नहीं रही है। छात्रों तक हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए जिस तरह के उद्यम की जरूरत है उतना हो नहीं पा रहा है। स्कूली बोर्ड में हिंदी में फेल होनेवाले छात्रों की संख्या बढ़ रही है। अंग्रेजी स्कूलों में हिंदी को लेकर खास उत्साह नहीं होता है, माता पिता भी चाहते हैं कि उनके बच्चे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलें। इसमें अभिभावकों का भी दोष नहीं है। आजादी के सत्तर साल बाद भी हमारे गणतंत्र में अबतक हिंदी को रोजगार की भाषा नहीं बनाया जा सका है। भाषा को लेकर, उसके संवर्धन को लेकर, उसके भूगोल के विस्तार को लेकर जितना काम होना चाहिए उतना हो नहीं पा रहा है। इसपर से बोलियों को हिंदी से अलग करने की कोशिशें भी शुरू हो गई हैं। कई बोलियां को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का आंदोलन चलाया जा रहा है। बोलियों की अस्मिता जैसे भावनात्मक जुमले गढ़े जा रहे हैं । बोलियों को अलग करने को लेकर चल रही मुहिम ने हिंदी के सामने एक अलग तरह का संकट खड़ा कर दिया है। हिंदी भाषियों को बोलियों के नाम पर बांटने की कोशिशें शुरू हो गई है। ऐसे माहौल में साहित्य में नई वाली हिंदी की बातें जोर पकड़ने लगी है । ऐसी किताबें प्रकाशित की जाने लगी हैं जिसकी मार्केटिंग के लिए इस नई वाली हिंदी का सहारा लिया जा रहा है । इस नई वाली हिंदी में बोलचाल की भाषा को जस का तस रखा गया है । इसका नतीजा यह हुआ है कि कई किताबों में आधे आधे पन्ने अंग्रेजी में लिखे जा रहे हैं और नई वाली हिंदी के नाम पर छप भी रहे हैं। उसपर हिंदी में लहालोट होनेवालों की भी कोई कमी नहीं है लेकिन इस बात पर गंभीरता से विचार होना चाहिए कि इससे भाषा का कितना नुकसान या फायदा हो रहा है।  
इसको कई बार भाषा के विस्तार के तौर पर भी समझ लिया जाता है । एक खास आयुवर्ग के समाज पर लिखते वक्त अगर बोलचाल की भाषा को जस का तस रख दिया जाता है और तर्क यह दिया जाता है कि इससे पाठकीयता बढ़ती है। इस नतीजे पर पता नहीं कैसे पहुंच जाते हैं क्योंकि ऐसा कोई सर्वेक्षण आदि अभी हुआ नहीं है।
दरअसल साहित्य और पाठकीयता,यह विषय बहुत गंभीर है और उतनी ही गंभीर मंथन की मांग करता है । आजादी के पहले हिंदी में दस प्रकाशक भी नहीं थे और इस वक्त एक अनुमान के मुताबिक तीन सौ से ज्यादा प्रकाशक साहित्यक कृतियां छाप रहे हैं । प्रकाशन जगत के जानकारों के मुताबिक हर साल हिंदी की करीब दो से ढाई हजार साहित्यक किताबें छपती हैं । अगर पाठक नहीं हैं तो किताबें छपती क्यों है । यह एक बड़ा सवाल है जिससे टकराने के लिए ना तो लेखक तैयार हैं और ना ही प्रकाशक । क्या लेखक और प्रकाशक ने अपना पाठक वर्ग तैयार करने के लिए कोई उपाय किया । हम साठ से लेकर अस्सी के दशक को देखें तो उस वक्त पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने हमारे देश में एक पाठक वर्ग तैयार करने में अहम भूमिका निभाई । पीपीएच ने उन दिनों एक खास विचारधारा की किताबों को छाप कर सस्ते में बेचना शुरू किया । हर छोटे से लेकर बड़े शहर तक रूस के लेखकों की किताबें सहज, सस्ता और हिंदी में उपलब्ध होती थी । हिंदी के प्रकाशकों को उनसे सीखना चाहिए। उसके इस प्रयास से हिंदी में एक विशाल पाठक वर्ग तैयार हुआ । सोवियत रूस के विघटन के बाद जब पीपीएच की शाखाएं बंद होने लगीं तो ना तो हिंदी के लेखकों ने और ना ही हिंदी के प्रकाशकों ने उस खाली जगह को भरने की कोशिश की । फॉर्मूलाबद्ध रचनाओं ने पाठकों को निराश किया । नई सोच और नए विचार सामने नहीं आ पाए । यह प्रश्न उठ सकता है कि इससे पाठकीयता का क्या लेना देना है । संभव है कि इस प्रसंग का पाठकीयता से प्रत्यक्ष संबंध नहीं हो लेकिन इसने परोक्ष रूप से पाठकीयता के विस्तार को बाधित किया है । अगर किसी ने विचारधारा के दायरे से बाहर जाकर विषय उठाए तो उसे हतोत्साहित किया गया । नतीजा यह हुआ कि साहित्य से नवीन विषय छूटते चले गए और पाठक एक ही विषय को बार बार पढ़कर उबते से चले गए । विषयों की विविधता की कनी ने भी पाठकों को निराश किया। 
दरअसल नए जमाने के पाठक बेहद मुखर और अपनी रुचि को हासिल करने के बेताब हैं । नए पाठक इस बात का भी ख्याल रख रहे हैं कि वो किस प्लेटफॉर्म पर कोई रचना पढ़ेंगे । अगर अब गंभीरता से पाठकों की बदलती आदत पर विचार करें तो पाते हैं कि उनमें काफी बदलाव आया है । पहले पाठक सुबह उठकर अखबार का इंतजार करता था और आते ही उसको पढ़ता था लेकिन अब एक वर् ऐसा है जो अखबार के आने का इंताजर नहीं करता है । खबरें पहले जान लेना चाहता है । खबरों के विस्तार की रुचिवाले पाठक अखबार अवश्य देखते हैं । खबरों को जानने की चाहत उससे इंटरनेट सर्फ करवाता है । इसी तरह से पहले पाठक किताबों का इंतजार करता था । किताबों की दुकानें खत्म होते चले जाने और इंटरनेट पर कृतियों की उपलब्धता बढ़ने से पाठकों ने इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करना शुरू किया । हो सकता है कि अभी किंडल और आई फोन या आई पैड पर पाठकों की संख्या कम दिखाई दे लेकिन जैसे जैसे देश में इंटरनेटका घनत्व बढ़ेगा वैसे वैसे पाठकों की इस प्लेटफॉर्म पर संख्या बढ़ सकती है । हलांलकि विदेशों में ई बुक्स को लेकर होनेवाले सर्वे के नतीजे उत्साहजनक नहीं हैं।
अगर संपूर्णता में विचार करें तो पाठकीयता के बढ़ने घटने के लिए कई कड़ियां जिम्मेदार हैं । पाठकीयता को एक व्यापक संदर्भ में देखें तो इसके लिए कोई एक चीज जिम्मेदार नहीं है इसका एक पूरा ईकोसिस्टम है । जिसमें सरकार, टेलीकॉम, सर्च इंजन, लेखक, डिवाइस मेकर, प्रकाशक, मीडिया सब शामिल हैं । इन सबको मिलाकर पाठकीयता का निर्माण होता है । सरकार, प्रकाशक और लेखक की भूमिका सबको ज्ञात है । टेलीकॉम यानि कि फोन और उसमें लोड सॉफ्टवेयर, सर्च इंजन, जहां जाकर कोई भी अपनी मनपसंद रचना को ढूंढ सकता है भी अहम है। पाठकीयता के निर्माण का एक पहलू डिवाइस मेकर भी हैं । डिवाइस यथा किंडल और आई प्लेटफॉर्म जहां रचनाओं को डाउनलोड करके पढ़ा जा सकता है । प्रकाशक पाठकीयता बढ़ाने और नए पाठकों के लिए अलग अलग प्लेटफॉर्म पर रचनाओं को उपलब्ध करवाने में महती भूमिका निभाता है ।
हिंदी साहित्य को पाठकीयता बढ़ाने के लिए सबसे आवश्यक है कि वो इस ईको सिस्टम के संतुलन को बरकरार रखे । इसके अलावा लेखकों और प्रकाशकों को नए पाठकों को साहित्य की ओर आकर्षित करने के लिए नित नए उपक्रम करने होंगे । पाठकों के साथ लेखकों के बाधित संवाद को बढ़ाना होगा । देश भर के अलग अलग शहरों में हो रहे करीब साढे तीन सौ लिटरेचर फेस्टिवल भी इसको बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं । इसके अलावा लेखकों को इंटरनेट के माध्यम से पाठकों से जुड़ कर संवाद करना चाहिए और अपनी रचनाओं पर फीडबैक भी लें । फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे की लेखिका ई एल जेम्स ने ट्राइलॉजी लिखने के पहले इंटरनेट पर एक सिरीज लिखी थी और बाद में पाठकों की राय पर उसे उपन्यास का रूप दिया । उसकी सफलता अब इतिहास में दर्ज हो चुकी है और उसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है । इन सबसे ऊपर हिंदी के लेखकों को नए नए विषय भी ढूंढने होंगे । जिस तरह से हिंदी साहित्य से प्रेम गायब हो गया है उसको भी वापस लेकर आना होगा । आज भी पूरी दुनिया में प्रेम कहानियों के पाठक सबसे ज्यादा हैं । हिंदी में बेहतरीन प्रेम कथा की बात करने पर धर्मवीर भारती की गुनाहों की देवता और मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास कसप ही याद आता है । इस वर्ष जनवरी में दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में पुस्तक प्रेमों की भारी भीड़ ने एक बार फिर से साबित किया कि लोगों में पढ़ने की भूख है । जरूरत है पाठकों की रुचि को ध्यान में रखकर लिखा जाए और अगर इसपर आपत्ति हो तो पाठकों के अंदर की रुचि का परिष्कार करने का उपक्रम किया जाए ताकि पाठतों में साहित्य पढ़ने का एक संस्कार विकसित हो सके । हिंदी को इस मामले में अन्य भारतीय भाषाओं के साथ मिलकर कदम आगे बढ़ाना चाहिए ।
एक और पहलू है जिसपर हिंदी और हिंदी साहित्य को गंभीरता से विचार करना चाहिए वह है बाल साहित्य। हिंदी में बाल साहित्य की कमी भी पाठकों की कमी का एक कारण हो सकती है। है भी। इस ओर ध्यान देकर गंभीरता से काम होना चाहिए ताकि भविष्य के पाठक तैयार हो सकें । तभी हिंदी का भी विस्तार होगा और हिंदी मजबूत होगी।


Sunday, June 11, 2017

वैचारिक स्वतंत्रता का सम्मान

दो हजार चौदह में, जब से केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार बनी है, उस वक्त से ही साहित्य जगत में इस बात को लेकर काफी शोरगुल मच रहा है कि देश में फासीवाद लगभग आ ही गया है। अभिव्यक्ति की आजादी पर बढ़ रहे खतरे को लेकर भी खूब हो हल्ला मचा, बल्कि यों कहें कि अब भी मच रहा है । उस वक्त इस बात की आशंका भी जताई गई थी कि नई सरकार संस्थाओं का भगवाकरण करने में जुट जाएगी । कालांतर में इस बात को लेकर भी विरोध प्रदर्शन आदि हुए कि सरकार कला, साहित्य, शिक्षा और संस्कृति की स्वायत्त संस्थाओं पर कब्जा करना चाहती है । पुणे के फिल्म संस्थान से लेकर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में हुई नियुक्तियों पर सवाल खड़े होने लगे। सीताराम येचुरी तक ने राम बहादुर राय तक की नियुक्ति पर सवाल उठाया था । इस बात की आशंका भी व्यक्त की जाने लगी थी कि सरकार देश का इतिहास बदलने की मंशा से काम कर रही है। शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की आहट को लेकर भी विरोधी सक्रिय हो गए थे और सरकार पर भगवा एजेंडे को थोपने का आरोप लगने लगा था। इस बीच बिहार विधानसभा चुनाव का एलान हो गया और लगभग उसी वक्त पुरस्कार वापसी का बवंडर उठा। अशोक वाजपेयी की अगुवाई में पुरस्कार वापसी ब्रिगेड ने देश में बढ़ते असहिष्णुता को मुद्दा बनाकर साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटाने शुरू कर दिए। कुछ फिल्मकारों ने भी अपने पुरस्कार वापस किए। इनका एक ही आरोप कि संस्थाओं को सरकार नष्ट कर रही है और अभिव्यक्ति की आजादी से लेकर खाने पीने की आजादी पर अपनी मर्जी थोपना चाहती है। पुरस्कार वापसी अभियान को तबतक हवा दी जाती रही जबतक कि बिहार विधानसभा का चुनाव निबट नहीं गया। बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार के साथ ही पुरस्कार वापसी और असिहुष्णता के खिलाफ अभियान नेपथ्य में चले गए। फिर गाहे बगाहे जब भी इन सांस्कृतिक संस्थाओं में किसी तरह की नियुक्ति होती तो विरोध के सुर उठते हैं, कभी स्वर तीखा तो कभी हल्का। सरकार ने भी धीरे धीरे इन संस्थाओं में नियुक्तियां करनी शुरू कर दीं लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी इन संस्थाओं में सभी नियुक्तियां हो नहीं पाई हैं, हां लगभग सभी संस्थाओं के मुखिया नियुक्त हो गए। यह अलहदा विषय है कि इन संस्थाओं में काम-काज किस तरह से हो रहा है। या इन संस्थाओं के रहनुमाओं को अपने तरीके से काम कर पाने की कितनी सहूलियत मंत्रालय से मिल रही है । इस विषय में पहले भी इस स्तंभ में चर्चा हो चुकी है।
केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार पर यह आरोप लगता रहा है कि साहित्यक,सांस्कृतिक संस्थाओं से लेकर विश्यविद्यालयों तक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मर्जी और सलाह से ही नियुक्तियां होती हैं। लेकिन हाल में जो दो नियक्ति हुई उससे इस आरोप की भी हवा निकल जाती है। विरोधियों के वो आरोप भी धराशायी हो जाते हैं कि संस्थाओं पर सरकार अपनी विचारधारा के लोगों को थोपना चाहती है। या सरकार संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में अपनी मर्जी के लोगों को चुन चुन कर बिठा रही है। कुछ दिनों पहले बिलासपुर विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर सदानंद शाही की नियुक्ति की गई। सदानंद शाही जी केदारनाथ सिंह और गोरखपुर के प्रेमचंद शोध संस्थान से जुड़े रहे हैं। उनकी विचारधारा साहित्य जगत में ज्ञात है। उनकी नियुक्ति के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने कड़ा प्रतिवाद किया और परिषद का आरोप है कि सदानंद शाही पुरस्कार वापसी कर रहे लेखकों के समर्थन में थे और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में उन्होंने नक्सलियों के समर्थक कवि वरवर राव की रचनाओं का पक्ष लिया था। इस नियुक्ति के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने राज्यव्यापी आंदोलन की धमकी दी थी जिसके बाद तकनीकी कारणों से प्रोफेसर सदानंद शाही की नियुक्ति को टाल दिया गया। बार-बार इस बात को भी फैलाया जाता है कि संघ से हरी झंडी के बाद ही नियुक्ति होती है। अब सवाल यही उठता है कि अगर नियुक्तियों में संघ का दखल होता तो प्रोफेसर शाही की नियुक्ति कैसे हो जाती है। सरकार पर इस तरह के आरोप गलत है कि वो सिर्फ अपनी वैचारिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति दे रही है।
केंद्र सरकार पर इस तरह के आरोप किस कदर मिथ्या हैं इसका एक और सबूत है इलाहाबाद के जी बी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक के पद पर प्रोफेसर बदरी नारायण तिवारी की नियुक्ति। प्रो तिवारी जाने माने प्रगतिशील लेखक रहे हैं। दो हजार नौ में प्रकाशित उनकी किताब फैसिनेटिंग हिदुत्वा, सैफ्रन पॉलिटिक्स एंड दलित मोबलाइजेशन का हिंदी अनुवाद दो हजार चौदह में हिंदुत्व का मोहिनी मंत्र के नाम से छपा था। हिदुत्व का मोहिनी मंत्र की प्रस्तावना में बदरी नारायण जी लिखते हैं – दो हजार चौदह के चुनाव परिणाम ने इस पुस्तक के शोध के परिणाम की ओर इशारा कर इस पुस्तक की प्रासंगिकता बढ़ा दी है, जो शायद मैं नहीं चाहता था। वस्तुत: जिस खतरे की ओर इशारा करने के उद्देश्य से यह पुतक लिखी गई थी, उस खतरे को टाला नहीं जा सका। किन्तु, हमारा राजनीतिक वर्ग इस खतरे के प्रति सजग हो दलित समूह के एक वर्ग के भगवाकरण को रोक पाता, ऐसा नहीं हुआ। इस पुस्तक की जो प्रासंगिकता मैं चाहता था, वह ना होकर उल्टा हुआ और हिन्दुत्ववादी शक्तियों के सतत एवं सघन वर्षों के प्रयास से 2014 के चुनाव में दलित समूह का एक वर्ग भाजपा की ओर उन्मुख होता दिखा। यहीं यह लगता है कि अकादमिक शोध किसी खतरे की तरफ सिर्फ इशारा कर सकते हैं, उसे सीधे रोक नहीं सकता। बदरी जी जिस खतरे की ओर इशारा कर रहे हैं वह है भारतीय जनता पार्टी का उभार। तो जो आदमी भारतिय जनता पार्टी के उभार या बहमुत को खतरा मानता हो उसको ही महत्वूपूर्ण पद पर नियुक्त किया जाना सरकार पर लग रहे आरोपों को नकारती है। इसी पुस्तक में एक जगह बदरी नारायण भारतीय जनता पार्टी के बारे में लिखते हैं- अपने जन्म से ही यह पार्टी सांप्रदायिक राजनीति के लिए जानी जाती है। इस तरह की टिप्पणियां इस पुस्तक में कई बार और कई जगह दिखाई देती है।  अब अगर यह सरकार बदले की भावना से काम करती या फिर अपने विरोधियों को हाशिए पर डालती होती तो बदरी नारायण जी को मानव संसाधन विकास मंत्रालय पांच साल के लिए निदेशक के पद पर नियुक्ति कैसे देता। बदरी नारायण जी के प्रतिरोध के स्वर तो पुरस्कार वापसी के दौर से लेकर अखलाक की हत्या के बाद तक बहुत मुखर थे । अगर अपने विरोधियों को नियुक्ति नहीं देने का कोई अघोषित फैसला होता तब भी बदरी जी की नियुक्ति नहीं हो सकती थी। बदरी नारायण की नियुक्ति इस बात का उदाहरण है कि सरकार नियुक्तियों में भेदभाव नहीं करती है ।

अपनी विचारधारा वाले लोगों की नियुक्तियां हर सरकार करती रही हैं। आम आदमी पार्टी ने भी अपनी पार्टी से सहानुभूमि रखनेवालों को हिंदी अकादमी से लेकर हर जगह नियुक्ति दी। सरकारों को इस बात का हक भी है कि वो अपनी विचारधारा को बढ़ावा दे। विचारधारा को मजबूकी देने के लिए यह आवश्यक भी होता है कि अपने से जुड़े लोगों को मजबूत किया जाए। लेकिन मौजूदा केंद्र सरकार इस मायने में थोड़ी अलग है। यह वामपंथियों की तरह अपने विरोधी विचारधारा वालों को भी अस्पृश्य नहीं मानती है। उनसे दूरी नहीं बनाती या सायास उनको हाशिए पर धकेलने के लिए संगठित प्रयास नहीं करती है। ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब भारतीय जनता पार्टी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार से सहमत विद्वानों को सरकारी सस्थाओं में प्रवेश तक नहीं था। उनका मजाक उड़ाया जाता था । फेलोशिप से लेकर तमाम तरह कि नियुक्तियों में प्राथमिक शर्त यह होती थी कि वो उनकी विचारधारा को मानने वाला हो। यहां तक कि गोष्ठियों में भी इस बात का खास ध्यान रखा जाता था कि हिदुत्व की विचारधारा को मानने वाले मंच पर नहीं बैठें। साहित्य अकादमी से लेकर अन्य अकादमियों के पुरस्कारों में विरोधी विचारधारा के विद्वानों के नाम पर पुरस्कारों के लिए विचार ही नहीं होता था। दिन रात फासीवाद-फासीवाद की रट लगानेवालों को इस बात पर गौर करना चाहिए कि पिछले तीन साल में ऐसी स्थिति नहीं है। हर विचारधारा वाले को मंच मिलता है, नियुक्ति मिलती है और अन्य तरह की सहूलियतें भी। सवाल यही उठता है कि जो लोग संघ की आड़ लेकर सरकार पर हमले करते रहे हैं उनको बहुत ध्यान से आरोप लगाने चाहिए अन्यथा इन आरोपों से उनकी ही किरकिरी होती है।   

Tuesday, June 6, 2017

घोटाले की जड़ पर हो प्रहार

इन दिनों सोशल मीडिया पर बिहार में बहार है, टॉपर गिरफ्तार है का जुमला लगातार चल रहा है। इसके अलावा भी तरह तरह के जुमले गढ़े और वायरल किए जा रहे हैं। बिहार की शिक्षा व्यवस्था की पोल एक बार फिर खुली है। यह लगातार दूसरा साल है जब बारहवीं के टॉपर को उसके विषय का ज्ञान ही नहीं है और वो न्यूज चैनलों के कैमरे के सामने अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन करते हुए धरे गए हैं । पिछले साल हाजीपुर की एक लड़की ने टॉप किया था और उसका विषय पॉलिटिकल साइंस था लेकिन उसको अपने विषय का नाम भी पता नहीं था और उसने कैमरे के सामने पॉलिटिकल साइंस को प्राडिकल साइंस कहा था । इस साल भी जिस शख्स ने म्यूजिक को विषय लेकर टॉप किया है उसको संगीत की ए बी सी भी नहीं आती है । इसका सार्वजनिक प्रदर्शन भी हुआ। इकतालीस बयालीस साल का एक शख्स बारहवीं में टॉप करता है और सिस्टम इसको कहीं भी जांच नहीं पाता है। सिस्टम को धोखा देकर या सिस्टम की मदद लेकर टॉप कर जा रहा है। इससे मेधावी छात्रों को नुकसान तो हो ही रहा है लेकिन उससे भी ज्यादा नुकसान बिहार की छवि को हो रहा है जिसको लेकर बिहार के मुख्मंत्री खासे सतर्क रहते हैं । इस बार भी टॉपर पर केस हुआ, गिरफ्तारी हुई लेकिन इस समस्या की जड़ में जाना होगा । पिछले साल भी बिहार के मुख्यमंत्री ने कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिया था । कार्रवाई हुई भी लेकिन लगता है वो नाकाफी था। पिछली बार जो टॉपर घोटाला हुआ था उसके बाद सरकार ने अड़सठ स्कूलों की बारहवीं की मान्यता रद्द कर दी थी और 19 स्कूलों की मान्ता रद्द करने जैसी बड़ी कार्रवाई भी हुई थी लेकिन सिस्टम में इतने झोल और सुराख हैं कि लीकेज को रोक पाना संभव नहीं है । पिछले साल भी टॉपर घोटाले के सामने आने के बाद ताबड़तोड़ छापेमारी हुई थी । पूर्व बोर्ड अध्यक्ष लालकेश्वर प्रसाद आदि पर भी कार्रवाई हुई थी ।
पिछले साल बिहार में बोर्ड परीक्षा के वक्त एक फोटो वायरल हुआ था जिसमें हर खिड़की पर एक शख्स लटका था और बताया जा रहा था कि हर मंडिल पर खिड़कियों पर लटके लोग नकल करवाने में व्यस्त हैं । इस फोटो के सामने आने के बाद उसपर जमकर चर्चा हुई थी और विदेशों तक में बिहार की शिक्षा व्यवस्था को उस फोटो के आधार पर परखा गया था । विदेशी अखबारों ने उस फोटो के आधार पर एडिटोरियल लिखे थे। आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा व्यवस्था को बुनियादी स्तर से ठीक किया जाए। बिहार की शिक्षा व्यवस्था में कमजोरी की जड़ में बहुत हद तक शिक्षकों की कमी का होना है । प्रशासनिक लालफीताशाही में शिक्षकों की नियुक्ति का मामला उलझता रहा है और विभागीय मंत्रियों ने इस ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया । प्राइमरी स्कूल से लेकर कॉलेज तक ये बीमारी व्याप्त है लेकिन इसके इलाज के लिए पिछले दो दशक में कुछ किया गया हो ये दिखाई नहीं देता । चंद सालों पहले जब ठेके पर प्राइमरी शिक्षक रखे गए थे तब उसमें भी गड़बड़झाला हुआ था । बाद में पटना हाईकोर्ट के आदेश के बाद तीन हजार कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों को बर्खास्त करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी क्योंकि जब उनका टेस्ट लिया गया तो वो आधारभूत जानकारी भी नहीं बता पाए । दो हजार बारह में भी एक सौ इक्यावन प्राइमरी शिक्षकों को योग्य नहीं होने के चलते हटा दिया गया था । अब जब शिक्षक ही इस तरह के होंगे तो छात्रों से क्या अपेक्षा की जा सकती है । पिछले साल यह भी चर्चा उठी थी कि देशरत्न डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने छपरा के जिस स्कूल से दसवीं पास की थी उस स्कूल की हालत ये है कि वहां नवीं- दसवीं के लिए एक भी शिक्षक नहीं थे। राजेन्द्र बाबू ने वहां पढ़ाई की थी लिहाजा उसकी ऐतिहासिकता को देखते हुए हाई स्कूल को इंटर कॉलेज बना दिया गया । स्कूल को अपग्रेड तो कर दिया गया लेकिन स्कूल की रीढ़ माने जानेवाले शिक्षक वहां नहीं है । अब जिस स्कूल में कोई शिक्षक नहीं हो और साल दर साल वहां परीक्षा हो तो फिर क्या हो सकता है इसकी कल्पना ही की जा सकती है ।
बिहार मे स्कूली शिक्षा के अलावा कॉलेजों में भी हाल बुरा है । बिहार में कई ऐसे कॉलेज हैं जहां विषय विशेष में कोई भी शिक्षक नहीं है लेकिन वहां हर साल एडमिशन हो रहा है और छात्र पास भी कर रहे हैं । तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के अंतर्गत मुंगेर के एक कॉलेजों में केमिस्ट्री, ज्योग्राफी और संस्कृत में कोई शिक्षक नहीं है लेकिन वहां हर साल इन विषयों में छात्रों का नामांकन हो रहा है । इसी तरह से इसी शहर के एक और कॉलेज में शिक्षकों की संख्या इतनी कम हो गई है कि कॉलेज के जरूरी काम भी संभव नहीं हो पा रहे हैं । पास के खड़गपुर के कॉलेज की भी स्थिति कुछ बेहतर नहीं है । अब यह तो अजूबा है कि किसी कॉलेज में विषय का कोई शिक्षक नहीं हो और वहां से हर साल उसी विषय में छात्र पास कर रहे हों । यहीं से नकल और टॉपर घोटाले की जमीन तैयार होती है । छात्र मजबूर हैं, स्कूल और क़ॉलेज के शिक्षक इस नासूर को रोकने में बेबस । सवाल यही उठता है कि टॉपर घोटाले में मुजरिम तो पकड़े जा सकते हैं लेकिन साल दर साल इस तरह के घोटाले की वजहों को चिन्हित करके उसको दुरुस्त करने का काम जितना जल्द शुरू हो सकते उतना अच्छा है । इस वक्त नीतीश कुमार के सहयोगी दल कांग्रेस के कोटे से शिक्षा मंत्री हैं। कांग्रेस को आगे बढ़कर घोटाले की जमीन पर प्रहार करने की इच्छाशक्ति दिखाना होगा। 

Saturday, June 3, 2017

साहित्य का ‘तू पंत, मैं निराला’ काल

समकालीन साहित्यक परिदृश्य पर अगर नजर डालते हैं तो एक प्रवृत्ति खास तौर पर नजर आती है। यह प्रवृत्ति उन लेखकों के बीच ज्यादा नजर आती है जिनको अपने लेखन पर कम साहित्येतर गतिविधियों पर ज्यादा भरोसा है। यह प्रवृत्ति है एक दूसरे की तारीफ करने की, और एक दूसरे के आलोचकों को ठिकाने लगाने की। तारीफ करना अच्छी बात है लेकिन तू पंत मैं निराला वाली तारीफ आसानी से रेखांकित हो जाती है। इन लेखकों में इस बात का धैर्य भी नहीं है कि वो अपने साथी लेखक की तारीफ के बाद कुछ समय इंतजार करें और फिर उसके बाद उनकी प्रशंसा करें। हाथ के हाथ लेन-देन संपन्न हो जाता है। किसी तरह का उधार नहीं रहता है। आपने मंच से तारीफ की तो उन्होंने फेसबुक पर आपको महान बता दिया। आपने फेसबुक पर लिखा तो उन्होंने फौरन ब्लॉग पर आपकी प्रशंसा कर डाली। मौजूदा साहित्यक परिदृश्य पर नजर रखनेवाले पाठकों को ऐसे लेखकों को पहचानने में जरा भी दिक्कत नहीं होगी। सोशल मीडिया पर ऐसे लेखकों का एक समूह सक्रिय है जो सिर्फ एक दूसरे की तारीफ ही करते रहते हैं। ये ना सिर्फ एक दूसरे की तारीफ करते हैं बल्कि अपने कॉमरेड की कृति की आलोचना का उत्तर भी देते हैं। कृति पर बात करना जरूरी है, और होनी भी चाहिए, लेकिन कृति पर बात करते करते जब कृतिकार पर बात होने लगती है, तब समस्या शुरू हो जाती है। यह जरूरी नहीं है कि कोई कृतिकार अगर विनम्र हो तो उसकी रचना विश्वस्तरीय होगी। यह भी जरूरी नहीं है कि कोई रचनाकार किसी खास समुदाय से आता है, तो उसके लेखन में उस समुदाय के पूरे संघर्ष का चित्रण होता हो या फिर उस खास समुदाय का अंतर्विरोध उसमें मुखर होकर पाठकों तक पहुंचे। अव्वल बात तो सिर्फ रचना पर होनी चाहिए और चर्चा या आलोचना की परिधि से लेखक या लेखक के स्वभाव या समुदाय को बाहर रखा जाना चाहिए, लेकिन समूह गान करनेवाले लोग सबकुछ भूलकर सिर्फ रचना की आलोचना करनेवाले पर टूट पड़ते हैं और येन केन प्रकारेण उनको नीचा दिखाने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं ।आलोचना करनेवालों पर व्यक्तिगत टिप्पणियां ना केवल अवांछित होती हैं बल्कि बहुधा स्तरहीन भी होती हैं। लक्ष्य आलोचक की छवि खराब करने की होती है लेकिन होता इसके उलट है और टिप्पणीकार ही कालांतर में संदिग्ध हो जाता है।
तारीफ समूहों के विचरण और उनकी टिप्पणियों से कभी कभार साहित्यक परिदृश्य मनोरंजक भी हो जाता है क्योंकि गढ़े हुए तर्कों में वो प्रामाणिकता नहीं आ पाती है और टिप्पणीकार खुद को हास्यास्पद बना लेता है। दिसबंर उन्नीस सौ पचपन में रामवृक्ष बेनीपुरी जी ने लिखा था – ज्वार और भाटे का अपना नियम है। आकाश में अनेक बिजली के डंडे टंगवा दीजिए, जो पूर्णचंद्र से भी अधिक रोशनी दे सके, उसमें ज्वार आप ला नहीं सकते। बड़ी से बड़ी नदियों की धाराएं भी उसके जल की सतह में घट-बढ़ ला नहीं सकतीं। मंदराचल की अनेक मथनियों से उसे मथिए, उसके वीचि-विलास में कोई अंतर नहीं आ सकेगा। वह अपने नियम का अनुसरण करेगा। सारे कृत्रिम उपाय व्यर्थ जाएंगे, व्यर्थ जाएंगे। यही नहीं ऐसे उपाय प्राय: ही उल्टा फल लाएंगे।आज से करीब छह दशक पहले बेनीपुरी जी जो लिख रहे थे वो आज के साहित्यिक परिदृश्य पर सटीक बैठता है। उस वक्त फेसबुक आदि नहीं था और प्रशंसा-प्रवृत्ति का इतने जोरशोर से चलन भी नहीं था। कहते हैं कि अच्छा लेखक युगदृष्टा होता है सो बेनीपुरी जी ने इस प्रवृत्ति की आहट को सुन लिया था। ना केवल आहट को सुना था बल्कि अपने लेखन से उन्होंने हिंदी जगत को सचेत भी किया था।
बेनीपुरी जी के कहे पर गौर करें तो यह तो साफ तौर पर समझ में आता है कि किसी भी कमजोर कृति को चाहे कितना भी जोर लगा लिया जाए उसको स्थापित नहीं किया जा सकता है । चाहे उसकी कितनी भई तारीफनुमा समीक्षा प्रकाशित हो जाए वो पाठकों के दिलों में स्थान नहीं बना पाती है, साहित्यक जगत में, पाठकों के बीच स्पंदन पैदा नहीं कर सकती है। किसी कृति के बारे में सोशल मीडिया पर चाहे कितना भी माहौल बनाने की कोशिश कर ली जाए. चाहे उसके नाम को हैशटैग के साथ ट्रेंड की क्यों ना करवा लिया जाए वो स्थायी महत्व हासिल नहीं कर पाता है। तात्कालिकता के शोरगुल में भले ही किताबों की कुछ प्रतियां बिक जाएं, लेखक अपनी प्रायोजित प्रशंसा से खुश हो ले लेकिन रचना दीर्घजीविता हासिल नहीं कर पाती है। बेनीपुरी जी ने सही कहा था कि सारे कृत्रिम उपाय व्यर्थ जाएंगे और इस बात पर गौर करने की जरूरत है कि उन्होंने व्यर्थ जाएंगे दो बार लिखा था, यानि वो इस बात पर खासा जोर दे रहे थे। यह अकारण नहीं है कि आज कोई गुनाहों का देवता या कसप जैसी रचना नहीं आ पाती है । और तो और मुझे चांद चाहिए या आवां या चाक या फिर काला पहाड़ या फिर कैसी आग लगाई जैसी रचनाएं भी सामने नहीं आ पाती हैं। एक तरफ जहां स्तरीय कृतियों का आभाव नजर आता है वहीं दूसरी तरफ फेसबुक आदि पर नजर डालें तो हर दूसरी कृति की महानता के गुण वहां बिखरे नजर आएंगे।
तू पंत, मैं निराला के पैरोकार लेखक बहुधा आलोचकों को भी कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। आलोचना के औजार पुराने पड़ने से लेकर आलोचकों के विवेक आदि पर सवाल खड़े करते रहते हैं। आलोचकों पर व्यक्तिगत रूप से हमले कर उनको अपमानित करने की भी कोशिश होती है। वरिष्ठ आलोचक निर्मला जैन ने कुछ वर्षों पूर्व लिखा भी था कि –इन दिनों किसी कृति पर आलोचनात्मक टिप्पणी करने से बचती हूं क्योंकि कौन कब बुरा मान ले पता नहीं। हलांकि आलोचकों को अपने ऊपर होनेवाले हमलों से घबराना नहीं चाहिए। प्रेमचंद का एक पात्र कहता भी क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहोगी। आलोचकों को बिगाड़ के डर की चिंता नहीं करनी चाहिए। आलोचकों पर हमला, पुरानी प्रवृत्ति है लेकिन उसमें स्तरहीनता का बढ़ता अनुपात चिंता का विषय हो सकता है। कई रचनाकार आलोचना को सर्टिफिकेट देने में लगे रहते हैं वो यह भूल जाते हैं कि अभी आलोचना के इतने बुरे दिन नहीं आए हैं कि उसको रचनाकारों के प्रमाण-पत्र की आवश्यकता पड़े।

तू पंत, मैं निराला की प्रवत्ति के साहित्य जगत पर हावी होने की वजह है साहित्य को विमर्श से जोड़कर उसको विभाजित कर अलग अलग खांचे में डालना । दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श और अब तो पिछड़ों के साहित्य का एक अलग कोष्ठक तैयार करने की तैयारी हो रही है । दरअसल राजेन्द्र यादव ने हिंदी में दलित और स्त्री विमर्श का जो कथा-मैदान तैयार किया उसपर कई रचनाकार खिलाड़ी इन दिनों खेल रहे हैं। राजनीतिक टिप्पणियों को कहानी मानने का दुराग्रह करते इस मैदान पर कुलांचे भरनेवाले तमाम लेखक हिंदी साहित्य में चिन्हित किए जा सकते हैं। स्त्री विमर्श के कोष्ठक में लिखी जानेवाली ज्यादातर कहानियों में स्टेटमेंट होता है और कहानीपन या किस्सागोई की कमी बहुधा पाठकों को महसूस होती है। इसी तरह से अगर दलित विमर्श की कहानियों को देखें तो ज्यादातर कहानियों में समाज की कुरीतियों को पर लिखा जाता रहा है । वहां हर दूसरी कहानी में एक खास तरह की सामाजिक स्थितियां दिखाई देती हैं। दलित लेखन के नाम पर जिस तरह का फॉर्मूलाबद्ध लेखन हो रहा है वह हिंदी कहानी की चौहद्दी का विकास नहीं कर पा रहा है। दलित लेखन में जिस तरह से मराठी के लेखकों ने प्रयोग किए उस तरह का प्रयोग हिंदी में कम ही दिखाई देता है। शरण कुमार लिंबाले से लेकर लक्ष्मण गायकवाड़ तक के लेखन में जो धार दिखाई देती है वह दलित चेतना को एक नई ऊंचाई पर ले जाता है। वहां कहानी के विकास को साफ तौर पर रेखांकित किया जा सकता है।हिंदी में नहीं। विमर्श के अलावा भोगा हुआ यथार्थ का परचम भी भी कई रचनाकर लहराते नजर आ जाते हैं । खासकर अगर हम विमर्श वाले साहित्य की बात करे तो यहां तो भोगा हुआ यथार्थ को लेकर एक खास किस्म का लगाव देखने को मिलता है। अभी दिल्ली में डॉ सच्चिदानंद जोशी के कहानी संग्रह के विमोचन के मौके पर हिंदी में प्रेमचंद साहित्य के अध्येता डॉ कमल किशोर गोयनका ने भोगा हुआ यथार्थ पर बेहद तल्ख टिप्पणी की । दरअसल भोगा हुआ यथार्थ के नाम पर कहानियों में जिस तरह की सपाटबयानी हुई है, उसने कहानी की जमीन को कमजोर किया है। कई कहानियों में कहानी और रिपोर्ट के बीच का फर्क मिट सा गया है । बावजूद इन कमियों के इस तरह के विमर्श वाले कहानीकारों के बीच तू पंत मैं निराला का भाव जोर मारता रहता है। प्रशंसा की डफली बजते रहे लेकिन साथ ही अच्छी बुरी कहानियों पर साहस के साथ बोला या लिखा जाना भी जरूरी है।