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Saturday, August 19, 2017

एक्ट में बदलाव से बदलेगी सूरत

हाल ही में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड जिसे आमतौर पर लोग सेंसर बोर्ड के नाम से जानते हैं, का पुर्नगठन किया गया और अध्यक्ष समेत कई सदस्यों को बदला गया। हटाए गए अध्यक्ष पहलाज निहलानी के कार्यकाल में फिल्मों के सेंसरशिप को लेकर काफी हो हल्ला मचता रहा। उनके विवादास्पद बयानों ने भी उनके विरोधियों को काफी मसाला दे दिया। बोर्ड के अंदर ही सदस्यों के बीच मतभेद शुरू हो गए थे। दरअसल पहलाज निहलानी ने सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष बनते ही ऐसे काम शुरू कर दिए किए कि बोर्ड तो को संस्कारी बोर्ड कहा जाने लगा था। सेंसर बोर्ड ने जब जेम्स बांड की फिल्म में कांट-छांट की थी तो संस्कारी बोर्ड हैश टैग के साथ कई दिनों तक वो मसला ट्विटर पर ट्रेंड करता रहा था । फिल्म में चुंबन के दृश्य पर सेंसर बोर्ड की कैंची चली थी । उस वक्त पहलाज निहलानी का तर्क था कि भारतीय समाज के लिए लंबे किसिंग सीन उचित नहीं हैं और उन्होंने आधे से ज्यादा इस तरह के सीन को हटवा दिया था । बांड की फिल्म में कट लगाने के बाद पूरी दुनिया में सेंसर बोर्ड और उसके अध्यक्ष की फजीहत हुई थी । अभी हाल ही में प्रकाश झा की फिल्म लिपस्टिक अंडर बुर्का को लेकर भी काफी विवाद हुआ। विवादित फिल्मों की काफी लंबी सूची है। अब जब सेंसर बोर्ड का नए सिरे से गठन किया गया है और प्रसून जोशी को उसका अध्यक्ष बनाया गया है तो फिल्मकारों को उम्मीद जगी है कि अब उनका काम आसान होगा। पर क्या सच में यह इतना आसान है। क्या फिल्मों पर कैंची चलनी रुक जाएगी। शायद नहीं।
नवगठित बोर्ड में दोबारा नामित वाणी त्रिपाठी के बयानों से लगता है कि जबतक सिनेमेटोग्राफी एक्ट में बदलाव नहीं किया जाएगा तो बहुत कुछ बदलने वाला नहीं है। वाणी त्रिपाठी जिस ओर इशारा कर रही हैं उसपर विचार करना बहुत आवश्यक है । सिनेमेटोग्राफी एक्ट की धारा 5 बी (1) को देखे जाने की जरूरत है। इस धारा के अंतर्गत बोर्ड के सदस्यों को यह छूट मिलती है कि वो शब्दों को अपने तरीके से व्याख्यायित कर सकें । इस धारा के मुताबिक - किसी फिल्म को रिलीज करने का प्रमाण पत्र तभी दिया जा सकता है जब कि उससे भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता पर कोई आंच ना आए । मित्र राष्ट्रों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी ना हो । इसके अलावा तीन और शब्द हैं पब्लिक ऑर्डर, शालीनता और नैतिकता का पालन होना चाहिए । अब इसमें सार्वजनिक शांति या कानून व्यवस्था तक तो ठीक है लेकिन शालीनता और नैतिकता की व्याख्या अलग अलग तरीके से की जाती रही है । अब नए बोर्ड में ही अगर हम देखें तो प्रसून और वाणी के लिए शालीनता और नैतिकता की परिभाषा अलग हो सकती है वहीं नरेन्द्र कोहली की व्य़ाख्या इनसे अलग हो सकती है। और यहीं से मतभेद और विवाद की शुरुआत होती है।
इस एक्ट के तहत सालों से विवाद होते रहे हैं । उन्नीस सौ तेहत्तर में बी के आदर्श की फिल्म गुप्त ज्ञान को लेकर काफी बवाल मचा था । तत्कालीन बोर्ड के कई सदस्यों को लग रहा था कि ये जनता की यौन भावनाओं को भड़का कर पैसा कमाने के लिए बनाई गई फिल्म है जबकि निर्माताओं का तर्क था था वो समाज को शिक्षित करना चाहते हैं । लंबी बहस के बाद गुप्त ज्ञान को बगैर किसी काट छांट के प्रदर्शन की इजाजत तो दी गई थी।  फिल्म के प्रदर्शन के बाद उसके अंतरंग दृष्यों को लेकर इतनी आलोचना हुई कि चंद महीने में ही उसको सिनेमाघरों से वापस लेना पड़ा था । उन्नीस सौ चौरानवे में दस्यु सुंदरी फूलन देवी की जिंदगी पर बनी फिल्म बैंडिट क्वीन में भी स्त्री देह की नग्नता को लॉंग शॉट में ही दिखाने की इजाजत दी गई थी । फिल्म फायर से लेकर डर्टी पिक्चर तक पर अच्छा खासा विवाद हुआ लेकिन सेंसर बोर्ड ने अपनी बात मनवा कर ही दम लिया था । फिल्म 12 इयर्स अ स्लेव में गुलामों के अत्याचार के नाम पर नग्नतापूर्ण दृश्यों की इजाजत देना हैरान करनेवाला था । जब दो हजार में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सीईओ घूसखोरी के आरोप में सीबीआई के हत्थे चढ़े तो स्थितियां साफ होने लगी थीं कि किस वजह से मानदंड को अलग अलग तरीके से किसी के हक में इस्तेमाल किया जाता है। सीईओ की गिरफ्तारी के बाद कई सुपरस्टार्स और निर्देशकों ने इस बात के पर्याप्त संकेत दिए थे कि उनको अपनी फिल्मों में गानों को पास करवाने के लिए घूस देना पड़ा था । एक सेंसर बोर्ड सैफ अली की फिल्म ओमकारा में गालियों के प्रयोग की इजाजत देता है तो दूसरा सेंसर बोर्ड प्रकाश झा की फिल्म में गाली हटाने को कहता है ।फिल्म प्रमाणन बोर्ड में जिस तरह से एडल्ट और यू ए फिल्म को श्रेणीबद्ध करने की गाइडलाइंस है उसको लेकर भी बेहद भ्रम है । फिल्मों को सर्टिफिकेट देने की गड़बड़ी शुरू होती है क्षेत्रीय स्तर की कमेटियों से जहां वैसे लोगों का चयन होता है जिनको सिनेमा की गहरी समझ नहीं होती है । इसके बाद फिल्म प्रमाणन बोर्ड में भी कई स्तर होते हैं और एक्ट के शब्दों को अपनी तरह से व्याख्यित कर अध्यक्ष अपनी मनमानी चलाते हैं ।
वाणी त्रिपाठी इस बात को जोर देकर कहती हैं कि फिल्म प्रमाणन बोर्ड में सुधार के लिए श्याम बेनेगल समिति की सिफारिशों को जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए। अरुण जेटली जब सूचना और प्रसारण मंत्री थे तब श्याम बेनेगल की अध्क्षता में एक समिति बनाई थी। इस समिति में राकेश ओमप्रकाश मेहरा और पियूष पाडें सदस्य थे। सीबीएफसी में सुधारों को लेकर इस समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी लेकिन उसको लागू नहीं किया जा सका है।जहां तक ज्ञात हुआ है कि श्याम बेनेगल समिति ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सेंसर बोर्ड के कामकाज के अलावा फिल्मों को दिए जानेवाले सर्टिफिकेट की प्रक्रिया में बदलाव की सिफारिश की थी । यह भी कहा जा रहा है कि बेनेगल कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक अब इस संस्था को सिर्फ फिल्मों के वर्गीकरण का अधिकार रहना चाहिए । वो फिल्म को देखे और उसको किस तरह के यू , ए या फिर यूए सर्टिफिकेट दिया जाना चाहिए, इसका फैसला करे । इस सिफारिश को अगर मान लिया जाता है तो फिल्म सेंसर के इतिहास में बदलाव की शुरुआत हो सकेगी। सूचना और प्रसारण मंत्रालय संभालने के बाद जिस तरह से स्मृति ईरानी ने फिल्म प्रमाणन बोर्ड से लेकर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की आयोजन से जुड़ी समितियों में बदलाव किया है उससे उम्मीद जगी है कि बेनेगल समिति की सिफारिशों को लागू किया जा सकेगा। फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सदस्य ही बेनेगल समिति की सिफारिशों को लेकर उत्साहित हैं तो संभव है कि उसको लागू करने का प्रक्रिया में तेजी आए। बेनेगल कमेटी की सिफारिशों को लागू करते हुए यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उसमें भी सिनेमेटोग्राफिक एक्ट की धारा 5 बी(1) का ख्याल रखने की सलाह दी गई है। सारी समस्या की जड़ में तो यही धारा है ।
यह भी ज्ञात हुआ है कि बेनेगल समिति की सिफारिशों के मुताबिक फिल्मकारों के लिए ये बताना जरूरी होगा कि वो किस श्रेणी की फिल्म बनाकर लाए हैं और उन्हें किस श्रेणी में सर्टिफिकेट चाहिए । उसके बाद सीबीएफसी के सदस्य फिल्म को देखकर तय करेंगे कि फिल्मकार का आवेदन सही है या उनके वर्गीकरण में बदलाव की गुंजाइश है । उसके आधार पर ही फिल्म को सर्टिफिकेट मिलेगा । बेनेगल कमेटी ने अपनी सिफारिशों में फिल्मों के वर्गीकरण का दायरा और बढा दिया गया है । यू के अलावा यूए श्रेणी को दो हिस्सों में बांटने की सलाह दी गई है । पहली यूए + 12 और यूए +15 । इसी तरह से ए कैटेगरी को भी दो हिस्सों में बांटा गया है । ए और ए सी । ए सी यानि कि एडल्ट विद कॉशन । इसके अलावा कमेटी ने बोर्ड के कामकाज में सुधार के लिए भी सिफारिश की है । उन्होंने सुझाया है कि बोर्ड के चेयरमैन समेत सभी सदस्य फिल्म प्रमाणन के दैनिक कामकाज से खुद को अलग रखेंगे और इस काम की रहनुमाई करेंगे । पहलाज निहलानी के साथ एक दिक्कत यह भी थी कि वो रोजाना बोर्ड के दफ्तर में बैठते थे और हर छोटे बड़े फैसलों को लेकर बयान देने के लिए उपलब्ध रहते थे। अबतक की छवि के मुताबिक प्रसून जोशी बेहद संजीदगी से काम करते हैं और विवादों से दूर रहते हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि उनके कार्यकाल में विवादित बयान कम आएंगे लेकिन फिल्मों पर कैंची चलनी कम हो जाएगी यह उम्मीद तबतक बेमानी है जबतक कि बेनेगल कमेटी की सिफारिशों को सुधारों के साथ लागू नहीं कर दिया जाता है ।

Sunday, August 13, 2017

शोध से दूर हिंदी की रचनात्मकता

आजादी के आज सत्तर साल होने को आए हैं और सत्तर साल की वय किसी के भी मूल्यांकन का बेहतर मौका तो होता ही है। हिंदी की रचनात्मकता की बात करें तो सत्तर साल के सफर पर बात करने से हमें बहुत आशाजनक तस्वीर नजर नहीं आती है। हिंदी में आजादी के पूर्व और आजादी के कुछ दिनों बाद जिस तरह की रटनाएं आ रही थीं धीरे धीरे उसका ह्रास होता चला गया। हम तो अपने व्याकरण. पुरातत्व, वैदिक और पौराणिक वांग्मय, संस्कृत काव्य को नए सिरे से व्याख्यायित करने की ओर भी ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। भारतीय धर्म शास्त्रों को नए सिरे से उद्घाटित करने का उपक्रम भी नहीं दीखता है। वेद और पुराणों को लेकर शोध भी लगभग नहीं के बराबर हो रहे हैं, यह जानने की कोशिश भी नहीं हो रही है कि कि जिस वेदव्यास ने महाभारत की रचना की थी उसी ने वेदव्यास ने पुराणों की रचना की थी। यह प्रश्न भी हिंदी के शोधार्थियों को नहीं मथता है कि अकेले वेदव्यास सभी पुराणों के रचियता कैसे हो सकते हैं। पुराणों के रूप में जो करीब चार लाख श्लोकों का विशाल साहित्. मौजूद है उससे मुठभेड़ का साहस लेखक क्यों नहीं कर पाता है। भारतीय धर्म के ज्ञानकोष वेद को लेकर भी हमारे साहित्यकार उत्साहित नजर नहीं आते हैं । वासुदेव शरण अग्रवाल जैसा विभिन्न विषयों पर विपुल लेखन करनेवाला लेखक भी हिंदी में इस समय कोई नजर नहीं आता है। अगर कोई है तो हिंदी समाज का दायित्व है कि ऐसे लेखक को विशाल हिंदी पाठक वर्ग से जोड़ने का उपक्रम किया जाए। पौराणिक चरित्रों को लेकर जिस तरह से लेखन किया जा रहा है वो युवा वर्ग के पाठकों के बीच लोकप्रिय भी हो रहा है वह भी भ्रम पैदा करता है। राम-सीता और कृष्ण के चरित्रों के साथ जिस तरह से छेड़छाड़ किया जा रहा है उसपर भी कहीं से किसी तरह की गंभीर लेखकीय आपत्ति का नहीं आना भी खेदजनक है।
उधर विदेशों में पौराणिक भारतीय साहित्य को लेकर बेहद उत्साहजनक रचनात्मकता दिखाई देती है। अमेरिका से लेकर जर्मनी तक में भारतीय पौराणिक साहित्य से मुठभेड़ करते विद्वान नजर आते हैं। संभऴ है कि उनमें से कई लेखकों की राय पर अन्य लोगों को आपत्ति हो लेकिन वो काम तो कर रहे हैं। ऐसी ही एक छिहत्तर साल की लेखिका हैं- वेंडी डोनिगर। इतिहास और धर्म की प्रोफेसर रहीं वेंडी डोनिगर की किताब- हिंदूज,एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री को लेकर भारत में काफी विरोध हुआ था। विरोध के बाद प्रकाशक ने उसको वापस लिया फिर किसी अन्य प्रकाशक ने उसको छापा। दरअसल हिंदू धर्म और उसका धार्मिक इतिहास वेंडी डोनिगर की रुचि के केंद्र में रहे हैं। ऋगवेद, मनुस्मृति और कामसूत्र का उन्होंने अनुवाद किया है। इसके अलावा शिवा, द इरोटिक एसेटिक, द ओरिजन ऑफ एविल इन हिंदू मायथोलॉजी जैसी विचारोत्तेजक कृतियां भी वेंडी डोनिगर के खाते में है। हिंदूज,एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री में वेंडी डोनिगर ने हिंदू धर्म की अवधारणाओं और प्रस्थापनाओं को पश्चिमी मानकों और कसौटी पर कसा है। वेंडी डोनिगर के मुताबिक हिंदू धर्म की खूबसूरती उसकी जीवंतता और विविधता है जो हर काल में अपने दर्शन पर डिबेट की चुनौती पेश करता है।हिंदू धर्म पर प्रचुर लेखन करने के बाद अब उनकी एक और दिलचस्प किताब आई है द रिंग ऑफ ट्रुथ, मिथ ऑफ सेक्स एंड जूलरी। अपनी इस किताब में डोनिगर जूलरी का बिजनेस करनेवाले अपने मामा के अनुभवों के आधार पर कई सिरों को जोड़कर उसकी व्याख्या की है। वेंडि डोनिगर ने माना है कि उन्होंने अंगूठियों और गहनों पर करीब दो सौ लेख लिखे हैं और कई लेक्चर में उन्होंने इसको विषय बनाया है। वेंडी के मुताबिक जब भी वो इस विषय पर कोई लेक्चर देती थीं तो कोई ना कोई उनके पास आता था और अपनी रिंग फिंगर को दिखाकर उससे जुड़ी कोई कहानी सुनाता था। सबकी अपनी अपनी कहानी थी। इसके बाद जब उन्होंने जब ग्रीक और संस्कृत साहित्य पढ़ना और पढ़ाना शुरू किया तो उन्हें इस विषय पर इतने उदाहरण मिले कि वो चकित रह गईं। और उन्होंने उसको सहेजना और जोड़ना प्रारंभ कर दिया था। हमारे प्राचीन और पौराणिक ग्रंथों में अंगूठी को लेकर बहुत कुछ कहा गया है। राजा जब खुश होता था तो अंगूठू उतारकर दे देता था, राजा के हाथ में जो अंगूठी होती थी वो उसके राजा होने की जानकारी भी देती थी आदि आदि।
अपनी इस कृति में वेंडि इस सवाल का जवाब तलाशती हैं कि अंगूठियों का कामेच्छा से क्या संबंध रहा है और स्त्री पुरुष संबंधों में उसकी इतनी महत्ता क्यों रही है। क्यों पति-पत्नी से लेकर प्रेमी-प्रेमिका और विवाहेत्तर संबंधों में अंगूठी इतनी महत्वपूर्ण हो जाती है। अंगूठी प्यार का प्रतीक तो है इसके मार्फत वशीकरण की कहानी भी जुड़ती चली जाती है। बहुधा यह ताकत के प्रतीक के अलावा पहचान के चौर पर भी देखी जाती रही है।
इस पुस्तक में यह देखना बेहद दिलचस्प है कि किस तरह से वेंडी डोनिगर पूरी दुनिया के धर्मग्रंथों से लेकर शेक्सपियर, कालिदास और तुलसीदास तक की कालजयी रचनाओं में अंगूठी के उल्लेख को जोड़ती चलती हैं । ग्रीक और रोमन इतिहास में भी अंगूठियों को स्त्री-पुरुष के प्रेम से जोड़कर देखा गया है। चर्च ने भी अंगूठी को वैवाहिक बंधन के चिन्ह के रूप में मान्यता दी थी। वो इस बारे में पंद्रह सौ उनसठ के बुक ऑफ कॉमन प्रेयर का जिक्र करती हैं। वो बताती है कि किस तरह से सोलहवीं शताब्दी में इटली में पुरुष जो अंगूठियां पहनते थे उसमें लगे पत्थरों में नग्न स्त्रियों के चित्र उकेरे जाते थे। माना जाता था कि इस तरह की अंगूठी को पहनने वाले स्त्रियों को अपने वश में कर लेते थे। अंगूठी और संबंधों के बारे में मिथकों में क्या कहा गया है, अपनी इस खोज के सिलसिले में लेखिका ने जितना शोध किया है वो आश्चर्यजनक है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों से उसने इतना कुछ उद्धृत किया है कि पाठक चमत्कृत रह जाते हैं और उनके मन में यह सवाल भी कौंधता है कि हिंदी में इस तरह की किताबें क्यों नहीं लिखी जाती हैं।
वेंडि डोनिगर के मुताबिक करीब हजारों साल पहले जब सभ्यता की शुरुआत हुई थी तभी से कविताओं में गहनों का जिक्र मिलता है । उन कविताओं में स्त्री के अंगों की तुलना बेशकीमती पत्थरों की गई थी। जब नायिका के बालों को सोने जैसा बताया गया था। वेंडि डोनिगर इस क्रम में जब भारत के मिथकीय और ऐतिहासिक चरित्रों की ओर आती हैं तो वो सीता का उदाहरण देती हैं। इस संदर्भ में ये भी कहती हैं कि अपने पति की अनुपस्थिति में गहने पहननेवाली औरतों को उस वक्त के समाज में अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता था। सीता चूंकि राजकुमारी थीं, इसलिए गहने उनके परिधान का आवश्यक अंग थे, इसलिए अपने पति से अलग निर्वासन में रहने पर भी सीता के गहने पहनने पर किसी तरह का सवाल नहीं उठा था। सीता के अलावा वो दुश्यंत का भी उदाहरण देती हैं कि कैसे उसको अंगूठी को देखकर अपनी पत्नी शकुंतला की याद आती है। तो आप देखें कि किस तरह से एक शोध के सिलसिले में कालिदास से लेकर तुलसीदास की रचनाओं का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा लेखिका जिस कालखंड में विचरण करती हैं वो कितना बड़ा है। इतने बड़े कालखंड़ को अपने लेखन में साधने के लिए कितने कौशल और ज्ञान की जरूरत होती है इसका सहज अंदाज लगाया जा सकता है।

इन दिनो मिथ पर इतना अधिक लिख जा रहा है और जनश्रुतियों और लोककथाओं के आधार पर उपन्यास पर उपन्यास लिख जा रहे हैं उससे यह लगता है कि मिथक लेखन के पाठक बहुत हैं। हाल में जिस तरह से भारतीय अंग्रेजी लेखकों ने मिथकों पर लिखा है उससे यह प्रतीत होने लगा है कि मिथ को अपने तरीके तोड़ने मरोड़ने की छूट वो लेते हैं और फिर संभाल नहीं पाते हैं। वेंडी डोनिगर की यह किताब बताती है कि मिथकों और मिथकीय पात्रों और परिस्थितियों पर लिखने के लिए कितनी मेहनत की आवश्यकता होती है। अपने तर्कों के समर्थन में कितने उदाहरण देने पड़ते हैं। जिस तरह से वेंडि डोनिगर ने अपनी इस किताब में मेसोपोटामिया की सभ्यता से लेकर हिंदी, जैन, बौद्ध, ईसाई और इस्लाम धर्म के लेखन से तथ्यों को उठाया है और उसको व्याख्यायित किया है वो अद्धभुत है। आजादी के सत्तर साल बाद आज हम हिंदी के लोगों को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा कि हिंदी मे स्तरीय शोध आधारित लेखन को कैसे बढ़ावा दिया जाए। 

Saturday, August 12, 2017

कांग्रेस में संघर्ष होगा तेज

अभी हाल ही में कांग्रेस पार्टी में दो अहम घटनाएं हुईं। बहुचर्चित राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल गुजरात से निर्वाचित हुए। निर्वाचन के पहले हाई वोल्टेज ड्रामा हुआ और मेरे जानते हाल के दशकों में किसी राज्यसभा चुनाव को मीडिया में इतनी कवरेज नहीं मिली थी। अहमद पटेल के राज्यसभा चुनाव को कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था लेकिन पटेल के लिए तो यह चुनाव करो या मरो की स्थिति के जैसा था। पिछले करीब एक दशक से अहमद पटेल कांग्रेस में सोनिया गांधी के बाद सबसे ताकतवर नेता के तौर पर स्थापित थे। कहा जाता था कि पटेल की मर्जी के बगैर पार्टी में पत्ता भी नहीं हिलता है। ऐसे में जब बीजेपी ने कांग्रेस के इस कद्दावर नेता को राज्यसभा चुनाव के चक्रव्यूह में घेरा तो अहमद पटेल के सामने अपने अस्तित्व का संकट पैदा हो गया। पटेल ने अपने रणनीतिक कौशल से इस चुनाव के नतीजे को अपने पक्ष में कर लिया और पार्टी में अपनी अहमियत भी साबित कर दी। राज्यसभा चुनाव के नतीजे के पहले पार्टी में एक और बेहद अहम घटना हुई। कांग्रेस के महासचिव और राहुल गांधी कैंप के माने जानेवाले दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस आलाकमान को खत लिखकर पार्टी की सभी जिम्मेदारियों से मुक्त करने की मांग की ताकि तीर्थयात्रानुमा जर्नी पर जा सकें। इसके पहले दिग्विजय सिंह को गोवा और कर्नाटक के बाद तेलांगना के प्रभार से पार्टी ने मुक्त कर दिया था। पार्टी के अंदर गोवा में सरकार नहीं बनने के लिए दिग्विजय सिंह को ही जिम्मेदार माना गया था। तेलगांना का प्रभार लिए जाने के बाद दिग्विजय ने खत लिखा था।
पहली घटना ने तो मीडिया में जमकर सुर्खियां बटोरी लेकिन दिग्विजय सिंह के कदम को उस तरह से सुर्खियां हासिल नहीं हुईं। अब इन दोनों घटनाओं को मिलाकर देखने पर कांग्रेस में एक नए तरह के समीकरण का आभास होता है। पटेल की जीत से एक बात तो तय मानी जा रही है कि पार्टी में अब राहुल गांधी के कैंप के नेताओं पर सोनिया की पीढ़ी के नेता और उनके सहयोगी हावी होने की कोशिश करेंगे। अहमद पटेल की मजबूती को इस रूप में देखा जा रहा है । यह भी संभव है कि अब इस तरह की मांग उठे कि दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव तक सोनिया गांधी के हाथों में ही पार्टी की कमान रहे। राहुल गांधी पार्टी के उपाध्यक्ष के तौर पर अपनी भूमिका का निर्वाह करते रहे। अगर इस तरह की मांग मान ली जाती है तो 2019 तक अहमद पटेल की पार्टी में अहमियत और केंद्रीय भूमिका बनी रह सकती है।
कांग्रेस में संगठनात्मक चुनाव होने वाले हैं और जिस तरह से एक नियमित अंतराल पर राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने की खबरें आम होती हैं उसी तरह से एक बार फिर से कयास लगाए जा रहे हैं कि अक्तूबर में राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन सकते हैं। अहमद पटेल की जीत के बाद यह तो तय हो गया है कि अगर राहुल गांधी पार्टी के अध्यक्ष बनते भी हैं तो उनके लिए अहमद पटेल को दरकिनार कर अपनी मर्जी चलाना आसान नहीं होगा। दिग्विजय सिंह की खुद को पार्टी की जिम्मेदारियों से मुक्त करने के अनुरोध को कुछ लोग कांग्रेस के पुराने कामराज फॉर्मूले की तरह देख रहे है। यह कहां तक व्यावहारिक है ये तो आने वाले वक्त में ही पता चल पाएगा।
दरअसल मौजूदा कांग्रेस पार्टी में सोनिया के कैंप के नेताओं और राहुल गांधी के करीबी नेताओं के बीच एक तरह की रस्साकशी लंबे समय से चल रही है। राहुल गांधी चाहते हैं कि वो तब अध्यक्ष बनें जब पार्टी के सभी पदाधिकारी उनकी मर्जी के हों। वो अपनी टीम खुद बना सकें। लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाता है। राहुल कैंप के कई नेताओं का मानना है कि इसमें अहमद पटेल सबसे बड़ी बाधा हैं और वो चाहते हैं कि पार्टी नए और पुराने नेताओं के बीच समन्वय बनाकर चले ताकि पार्टी को अनुभव और ऊर्जा दोनों का साथ मिल सके। अहमद पटेल ने राज्यसभा चुनाव में जीत हासिल कर अपने अनुभव और ऊर्जा के समन्वय के सिद्धांत को साबित भी कर दिया, लिहाजा ये माना जा रहा है कि सोनिया गांधी का इस सिद्धांत में भरोसा बढ़ेगा। सोनिया गांधी जितना ही अनुभव और ऊर्जा के समन्वय की बात करेंगी उतनी ही राहुल गांधी को दिक्कत होगी। राहुल कैंप के नेता चाहते हैं कि जब वो राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष बनें तो उनकी राह में किसी तरह की बाधा ना हो। उनकी टीम में सभी नेता ऐसे हों जिनकी आस्था सिर्फ उनमें हो। अहमद पटेल की राज्यसभा की जीत ने पार्टी के अंदर के इस द्वंद को बढ़ा दिया है।

राहुल गांधी कैंप के नेताओं और अहमद पटेल के बीच संबंध कैसे हैं इसकी बानगी ट्वीटर पर भी देखने को मिल सकती है। अहमद पटेल की जीत के बाद जब पार्टी के सभी नेता अहमद पटेल को बधाई दे रहे थे तो वो सभी उनको टैग कर रहे थे और पटेल भी लगभग सबको नाम लेकर धन्यवाद दे रहे थे। दिग्विजय सिंह ने जो ट्वीट किया उसमें लिखा- बधाई हो अहमद भाई। जवाब में पटेल ने लिखा- बहुत धन्यवाद जी। औपचारिक बधाई का बेहद औपचारिक धन्यवाद। इस ट्वीटर संवाद से ही संकेत मिल रहे हैं। पटेल की जीत के बाद अब पार्टी में एक बार फिर से पीढ़ियों का संघर्ष बढ़ सकता है, इसके संकेत तो मिलने शुरू हो ही गए हैं। अब यह सोनिया के राजनीतिक कौशल पर निर्भऱ करता है कि वो इस संघर्ष से पार्टी को कैसे उबारती हैं।    

Saturday, August 5, 2017

टिप्पणी से कठघरे में कवि

भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार के एलान के साथ ही हिंदी साहित्य में एक उबाल सा उठा है। पुरस्कार के लिए चयनित युवा कवि अच्युतानंद मिश्र की कविताओं पर बात होने के बजाए विमर्श गैर-साहित्यक मसले पर शुरू हो गया। भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार हर वर्ष हिंदी के पैंतीस साल तक की उम्र के कवि को दिया जाता है। प्रक्रिया के मुताबिक निर्णायक मंडल का एक सदस्य अपनी बारी आने पर कवि का चयन करता है । इस वर्ष चयन की बारी हिंदी की वरिष्ठ कवयित्री अनामिका की थी। उन्होंने अच्युतानंद मिश्र की कविता बच्चे धर्मयुद्ध लड़ रहे हैं के लिए ये पुरस्कार देने का फैसला किया। यहां तक तो सबकुछ सामान्य लग रहा था। एलान भी हो गया।  अच्युतानंद को बधाई आदि का दौर शुरू ही हुआ था कि अचानक फेसबुक पर एक कवि अवतरित हुए और उन्होंने अनामिका पर बेहद अमर्यादित टिप्पणी कर दी। फेसबुक पर इस टिप्पणी के आते ही बवाल मच गया। लगभग चरित्रहनन करते इस पोस्ट को लेकर हिंदी की कई लेखिकाओं ने अपना विरोध जताना शुरू कर दिया। बाद में कवि जी ने अनामिका पर की गई अपनी टिप्पणी को हटा दिया, लेकिन तबतक जो नुकसान होना था वह हो गया। कवि महोदय की पोस्ट वायरल हो चुकी थी। स्क्रीन शॉट साझा किए जा रहे थे। पक्ष-विपक्ष में लोग अपनी बातें कहने लगे थे। कुछ लेखिका खुद को निष्पक्ष दिखने-दिखाने के चक्कर में नापतौल कर पोस्ट लिख रही थीं। मसला ये कि कई लोग खुलकर विरोध करने से बचते रहे थे। कवि जी की पोस्ट को लेकर एक नया नया ललबबुआ ने तो पीरी लेखिका बिरादरी को ही कूढ़मगज करार दे दिया। ललबबुआ की परेशानी यह बताई जा रही है कि उसको उम्मीद थी कि इस वर्ष का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार उसको मिलेगा लेकिन अच्युतानंद को देकर अनामिका ने उसका सपना तोड़ दिया। कोई भी शख्स जब सपने को सच माने बैठा हो और जब उसके सच होने का समय आए और सपना चूट जाए तो बौखलाहट स्वाभाविक है। बौखलाहट में साहित्य के खर पतवारों में भी हलचल होनो लगी और मर्यादा तार-तार होने लगी। इस साहित्यक घटना को बताने का मकसद समकालीन हिंदी साहित्य में विमर्श के गिरते स्तर की ओर इशारा करना था। हिंदी के एक वरिष्ठ आलोचक हमेशा अपनी बातचीत में हमेशा कहा करते हैं कि समकालीन हिंदी साहित्य इस वक्त बजबजा रहा है। उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए ये कहा जा सकता है कि साहित्यक परिदृश्य ना केवल बजबजा रहा है बल्कि गुड़ की राब की तरह खदबदा रहा है। यह मसला सिर्फ साहित्यक विमर्श के गिरते स्तर तक नहीं पहुंचता है बल्कि इस घटना के कई छोर हैं जिनपर साहित्य से जुड़े लोगों को गंभीरता से विचार करना होगा।
लेखिकाओं के बारे में अमर्यादित और अश्लील टिप्पणी करने का मंच फेसबुक बना । फेसबुक इस वक्त हिंदी साहित्य में एक अनिवार्य उपस्थिति की तरह है। लगभग हर तरह के मसले फेसबुक पर ही सबसे पहले नमूदार होते हैं, सूचनाओ से लेकर विवाद तक, गंभीर विमर्श से लेकर हल्की फुल्की बातों तक। यहां तक कि लेखकों के व्यक्तिगत मामले भी फेसबुक पर सार्वजनिक होते रहते हैं । फेसबुक लेखकों के लिए पाठकों से जुड़ने का एक बेहद उपयोगी मंच है। नई ऩई रचनाएं और विचार, जिनको पत्र-पत्रिकाओं में जगह नहीं मिल पाती हैं, उनको फेसबुक पर स्थान तो मिलता ही है, एक पाठकवर्ग भी मिलता है। लेकिन फेसबुक पर कुछ भी लिखने की जो आजादी है वो इस मंच को कई बार एक अराजक मंच भी बना देता है। यह अराजकता फेसबुक की सबसे बड़ी खामी है । इस अराजक आजादी का फायदा कुछ लोग उठाते हैं एक दूसरे को नीचा दिखाने और अपमानित करने के लिए। फेसबुक पर मौजूद साहित्य से जुड़े लोगों को इस अराजकता से निपटने के उपायों पर विचार करना चाहिए। दूसरी बात जो इस प्रकरण में उभर कर सामने आई वो ये कि लेखिकाओं पर हो रहे हमलों को अलग अलग लेखिकाओं ने अपने अपने नजरिए से देखने की कोशिश की। किसी ने सिर्फ अफसोस जाहिर किया तो किसी को आश्चर्य हुआ। अफसोस और आश्चर्य के बीच विरोध गुम हो गया। लानत मलामत तो दूर की बात।
आज समाज में जिस तरह की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है उसका भी प्रकटीकरण इस पूरे मसले में हुआ है। आज हमारी संवेदनाएं इतनी कम या खत्म हो गई हैं वो सिर्फ समाज में ही नहीं दिखता। कई बार ऐसी खबरें आती हैं कि दुर्घटना का शिकार व्यक्ति बीच सड़क पर तड़पता रहा लेकिन उसकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया । पूरे देश ने टीवी पर ऐसी कई तस्वीरें देखी हैं। ऐसी ही संवेदनहीनता साहित्य की दुनिया में भी दिखाई देने लगी है कि कोई अमुक को गाली गलौच कर रहा है तो हम उस पचड़े में क्यों पड़ें। इस प्रवृत्ति के बढ़ने से हमलावरों के हौसले बुलंद होते रहते हैं और वो जब चाहें, जिसे चाहें अपमानित करते रहते हैं और जब दबाव बनने लगता है तो पोस्ट डिलीट कर अपनी शराफत का ढिंढोरा पीटना शुरू हो जाते हैं। साहित्य में बढ़ रही इस संवेदनहीनता पर भी साहित्य से जुड़े लोगों को विचार और मंथन करना चाहिए। क्या साहित्य समाज स्त्री विरोधी मानसिकता वाले ऐसे लोगों को चिन्हित कर उसके सामूहिक बहिष्कार आदि के बारे में विचार नहीं कर सकता है। कम से कम फेसबुक पर तो बहिष्कार की पहल हो।
इस पूरे घटनाक्रम से लेखक संगठनों का भी महिलाओं को लेकर रवैया एक बार फिर उजागर हो गया। अनामिका के अपमान के मसले पर प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच के तरफ से स्तंभ लिखे जाने तक कोई बयान सामने नहीं आया। इतने समय तक लेखक संगठनों की चुप्पी उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है। बयानवीर जनवादी लेखक संघ का इस मसले पर कोई प्रेस रिलीज जारी नहीं करना भी उनको कठघरे में खड़ा कर गया। अब सवाल यही उठता है कि लेखक संगठन क्यों चुप हैं? दरअसल ये लेखक संगठन कोई भी स्टैंड लेने के पहले अपने अपने पैतृक राजनीतिक दलों का मुंह जोहते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस मसले पर इन लेखक संगठनों के राजनीतित आकाओं की अबतक कोई राय बन नहीं पाई लिहाजा उनकी तरफ से किसी भी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। बात-बात में अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरा देखनेवाले इन लेखक संगठनों को अपनी ही जमात की एक वरिष्ठ लेखिका पर हुई वाचिक हिंसा से किसी प्रकार का कोई खतरा नहीं दिखना इनके दोहरे रवैये को उजागर करता है। दरअसल इस मसले में इनका भी कोई दोष नहीं है, इस विचारधारा के जो भी नायक रहे हैं उनकी महिलाओं को लेकर क्या राय या कारनामे रहे हैं, ये जगजाहिर है। चाहे वो माओ हों, चाहे स्टालिन या लेनिन या फिर क्यूबा के कम्युनिस्ट तानाशाह फिडेल कास्त्रो। लेकिन ये लेखक संगठन इस बात को भूल जाते हैं कि ये भारत है जहां महिलाओं का सम्मान सर्वोच्च प्राथमिकता रही है। इन लेखक संगठनों के अप्रासंगिक होने की वजह भी इन प्राथमिकताओं को नहीं समझ पाना रहा है।

भारतीय लेखन में ज्यादा पीछे नहीं जाकर अगर हम जयशंकर प्रसाद की कामायनी को ही देखें तो उन्होंने अपनी रचनाओं में स्त्री को भरपूर सम्मान दिया है। कामायनी की मूल आत्मा में मनुष्यता की चिंता है। वहां जब देव संस्कृति की बात होती है तो यह बताया जाता है कि उस संस्कृति में विलासिता की वजह से, स्त्री की अवमानना की वजह से या फिर कह सकते हैं कि स्त्री को सिर्फ विलासिता की वस्तु समझने की वजह से देवों को दंडित करने के लिए उस संस्कृति को लगभग समाप्त कर दिया। कामायनी का जो चित्रण हुआ है वो अद्भुत है, वह विलासिता की देवी के रूप में नहीं बल्कि ममता की प्रतिमूर्ति के रूप में, करुणा से भरी हुई श्रद्धा के रूप में सामने आती है। अनामिका जी का अपमान करनेवाले कवि हैं, उनको अपनी परंपरा का तो ज्ञान होगा ही, लेखक संगठनों को ना हो क्योंकि उनका रिमोट कंट्रोल तो कहीं और होता है। प्रसाद जी ने तो अपने नाटक ध्रुवस्वामिनी में भी स्त्री अस्मिता का प्रश्न उठाया था। यह सिलसिला आगे भी चलता रहा लेकिन कवि जी को ना तो अपनी परंपरा की फिक्र है ना ही लेखिकाओं की। इसके पहले भी वो एक अन्य कवयित्री को लेकर अनाप शनाप टिप्पणी कर चुके हैं। अगर हम देखें तो साहित्य में महिलाओं को लेकर इस तरह की घटनाएं होती रही हैं लेकिन मजबूती के साथ प्रतिरोध नहीं होता है। लेखिकाओं को एकजुट होकर स्टैंड लेना होगा, रचनाओं से आगे जाकर व्यवहार में भी।    

Saturday, July 29, 2017

इवेंट मैनेजमेंट कंपनी बनती सांस्कृतिक संस्थाएं

चंद दिनों पहले कला से जुड़ी केंद्रीय संस्था के मुखिया ने बताया था कि उनके पहले जो लोग उस संस्था को संभाल रहे थे उन्होंने शासी निकाय के माध्यम से दो हजार बाइस तक के कार्यक्रम तय कर दिए थे। उनका कहना था कि इस निर्णय को बदलने का अधिकार मौजूदा शासी निकाय को है, लेकिन मौजूदा समिति के सदस्य पूर्ववर्ती फैसलों में बदलाव कर कोई बखेड़ा खड़ा नहीं करना चाहते हैं। नतीजा यह हो रहा है कि मोदी सरकार के तीन साल से ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद भी उस संस्था की कार्यप्रणाली में कोई बदलाव लक्षित नहीं किया जा सकता है। या फिर मौजूदा मुखिया के पास अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का ज्यादा अवसर भी नहीं बचा है।यह स्थिति सिर्फ एक संस्था की है या देशभर की अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं में भी यही हाल है, इसको जानने के लिए पर्याप्त शोध करने की जरूरत है। एक चीज जो सतह पर दिखाई देती है वह यह है कि इन सरकारी साहित्यक संस्थाओं की कार्यप्रणाली में कोई आमूल चूल बदलाव नहीं दिखाई पड़ता है। केंद्र में नरेन्द्र मोदी सरकार के तीन साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद संस्कृति के क्षेत्र में कोई क्रांतिकारी काम हुआ हो, यह विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता है। हां, साहित्य कला और संस्कृति से जुड़ी इन संस्थाओं ने तीन सालों में खुद को एक बेहतर इवेंट मैनेजमेंट कंपनी के तौर पर स्थापित कर लिया है। जब भी इनके कर्ताधर्ताओं से सांस्कृतिक मोर्चे पर सक्रियता की बात करिए तो वो अपने द्वारा आयोजित कार्यक्रमों को गिनाना शुरू कर देते हैं। कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए लेकिन सिर्फ कार्यक्रमों को आयोजित कर क्या सांस्कृतिक मोर्चे पर बदलाव किया जा सकता है। क्या हम अतीत की गलतियों को इन कार्यक्रमों के जरिए सुधार सकते हैं । क्या हम इन कार्यक्रमों के जरिए भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने में योदगान कर सकते हैं.
हम जिस भारतीय ज्ञान परंपरा के बाधित किए जाने को लेकर लगातार आयातित विचारधारा को जिम्मेदार ठहराते हैं, उस ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने का क्या उपक्रम किया गया इसपर ध्यान देने की जरूरत है। जिन संस्थाओं पर इसकी जिम्मेदारी थी वो भी इवेंट मैनेजमेंट के काम में लगी है। प्रधानमंत्री पर एक पुस्तक को लेकर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में दिनभर का कार्यक्रम होता है। पोस्टरों और बैनरों पर प्रधानमंत्री की भव्य तस्वीर लगी होती है। ऐसा करके हम क्या और किसको संदेश देना चाहते हैं। इस बात पर भी गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है कि प्रधानमंत्री पर प्रकाशित उस पुस्तक से किस तरह से संस्कृति या साहित्य पर असर पड़ रहा है। उस पुस्तक की गुणवत्ता से लेकर उसके व्यापक प्रभाव पर अलग से बात हो सकती है, होनी भी चाहिए। इंदिरा गांधी कला केंद्र में पुस्तकों और लेखकों को लेकर पुस्तकालय में एक मासिक कार्यक्रम होता रहा है ऐसे में प्रधानमंत्री पर प्रकाशित पुस्तक पर अलग से कार्यक्रम का औचित्य समझ में नहीं आता है। यह ठीक है कि इस तरह के कार्यक्रम कभी कभार हो सकते हैं लेकिन अन्य कार्यक्रमों को लेकर भी उतनी ही संजीदगी दिखनी चाहिए।
कला, साहित्य और संस्कृति के विकास और उसको मजबूती प्रदान करने के उद्देश्य से बनाई गई इन संस्थाओं में एक और नई प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। यह प्रवृत्ति दिखती है वक्ताओं के चयन में। कला और संस्कृति से जिनका दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है उन वक्ताओं को भी इस तरह के कार्यक्रमों में आमंत्रित कर संपर्क सुधर सकते हैं लेकिन श्रोताओं का किसी नई दृष्टि से साक्षात्कार नहीं हो पाता है। सरकार और संगठन से जुड़े लोगों को बतौर वक्ता आमंत्रित कर इन संस्थाओं के कर्ताधर्ता अपनी कुर्सी भले ही सुरक्षित कर लें लेकिन वो भारतीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के मूल काम से भटकते नजर आते हैं। कला साहित्य और संस्कृति के विकास में इन इवेंट्स का क्या योगदान हो सकता है इसका मूल्यांकन भी होना चाहिए। परिवर्तन की इस रफ्तार को ना तो सुधार कह सकते हैं, ना ही बदलाव और क्रांति तक तो पहुंचना ही मुमकिन नहीं है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के एक कार्यक्रम का सिर्फ उदाहरण दिया गया है कमोबेश हर संस्था यही रास्ता अपना रही है। रामधारी सिंह दिनकर ने सालों पहले लिखा था- दिल्ली में संस्कृति शब्द का का अर्थ नाच गान और नाटक तक सीमित होता जा रहा है। नृत्य संगीत और नाटक संस्कृति के अंग हैं किन्तु,संस्कृति उन्हीं तक सीमित नहीं हैं।दिनकर के इन विचारों से सालों बाद भी असहमत होने की कोई वजह दिखाई नहीं देती है। 
इस तरह के इवेंट्स में वेद, उपनिषद, पुराण आदि पर जमकर बातें होती है। कुछ विद्वान वक्ता अपने वक्तव्यों में इन ग्रंथों से पंक्तियां भी उद्धृत करते हैं लेकिन आज इन ग्रंथों की जो हालत है उसको देखकर क्या हम ये उम्मीद कर सकते हैं कि नए पाठक या हमारे देश का युवा इनको पढ़ेगा। आज बाजार में मौजूद वेदों की छपाई या उसके हिंदी भाष्य को उठाकर देख लें तो यह बात साफ तौर पर समझ में आती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि इन ग्रंथों की बेहतर छपाई हो और सामान्य, सरल और समकालीन हिंदी में उसकी टीका पर काम करवाकर उसको प्रकाशित किया जाए। लेकिन वेद, पुराण और उपनिषद पर काम करवाने में इन संस्थाओं में कोई उत्साह नहीं दिखाई देता है। उत्साह में इस कमी की वजह है कि यहां मौजूद लोग वामपंथियों से आक्रांत हैं। कहीं ना कहीं उनके अवचेतन मन में यह चलता है कि इन ग्रंथों पर काम शुरू करवाने से वो वामपंथियों के निशाने पर आ जाएंगे। वो इस बखेड़े में पड़े बिना सुरक्षित तरीके से काम करते हुए अपना कार्यकाल पूरा करना चाहते हैं। जबकि सांस्कृतिक बदलाव हमेशा क्रांति से ही संभव हुई है। रामधारी सिंह दिनकर ने कहा भी था कि हम जैसे विचारों में विश्वास करते हैं, हमारे कर्म वैसे ही हो जाते हैं। निवृत्ति की माला जपते जपते हम गुलाम हो गए और प्रवृत्ति की आराधना का आरम्भ करते ही हमारी गुलामी चली गई। किन्तु, संस्कृति न तो केवल निवृत्ति है, न केवल प्रवृत्ति।‘  इस बात को समझने की जरूरत है।
इन संस्थाओं के कर्ताधर्ताओं में एक और अन्य अहम बात जो दिखाई देती है कि वो काम तो अपनी विचारधारा के आधार पर करना चाहते हैं लेकिन उनकी ख्वाहिश होती है कि उसको इस तरह के किया जाए कि वामपंथी विचारधारा वाले मित्रों की भी उसमें रजामंदी रहे। यह ख्वाहिश भी सांस्कृतिक बदलाव में सबसे बड़ी बाधा है। वामपंथी विचारधारा वालों से स्वीकृति की चाहत बहुधा सांस्कृतिक बदलाव की योजना को रोक देती है। इन कला साहित्य और सांस्कृतिक संगठनों के क्रियाकलापों पर बारीकी से नजर डालने पर यह हिचक साफ साफ दिखाई देती है। नई संस्कृति का निर्माण कभी भी हिचक के साथ नहीं किया जा सकता है। निर्माण की बात अगर छोड़ भी दें तो किसी भी विचारधारा को संस्कृति के केंद्र में लाने का काम भी हिचक की प्रवृत्ति के साथ संभव नहीं है। एक बार फिर दिनकर याद आते हैं जब वो कहते हैं कि – जातियों का सांस्कृतिक विनाश तब होता है जब वे अपनी परंपराओं को भूलकर दूसरों की परंपराओं का अनुसरण करने लगती है...जब वे मन ही मन अपने को हीन और दूसरों को श्रेष्ठ मानकर मानसिक दासता को स्वेच्छया स्वीकार कर लेती है। इस हिचक पीछे कहीं ना कहीं ये भाव भी होता है जिसकी ओर दिनकर इशारा कर रहे हैं।

विरोधी खेमे से स्वीकृति की चाहत का लाभ भी वामपंथी बुद्धिजीवी बेहतर तरीके से उठा रहे हैं। इन संगठनों के इवेंट्स में वामपंथी मित्रों की सहभागिता इस बात की चीख चीख कर गवाही दे रहा है। वो कवि लेखक जिन्होंने केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के खिलाफ साहित्य अकादमी का पुरस्कार वापस किया था, वो अब लगातार साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों में नजर आते हैं। ना सिर्फ नजर आते हैं बल्कि खुद को साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कथाकार, कवि कहकर पुकारे जाने पर गौरवान्वित भी महसूस करते हैं। किसी भी कार्यक्रम में वो खुद को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक कहे जाने पर यह वहीं कह पाते हैं कि उन्होंने पुरस्कार वापस कर दिया था। आज जरूरत इस बात की है कि इन सांस्कृतिक संस्थाओं के कर्ताधर्ता भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास के लिए काम करें चाहे उनको जोखिम भी क्यों ना उठाना पड़े। अगर वो ऐसा कर पाते हैं तो इतिहास में दर्ज में हो जाएंगे वर्ना इतिहास का बियावान उनके इंतजार में है।    

Saturday, July 22, 2017

भाषा और बोलियों का बेजा विवाद

इस वक्त हमारे देश में भाषा को लेकर एक बार फिर से सियासी सेनाएं सजाई जा रही हैं। अलग अलग पक्ष के लोग सरकार से मिलकर अपनी मांगें रख रहे हैं। तर्क पुराने हैं कि हिन्दी के बढ़ने से वो अन्य भारतीय भाषाओं को दबा देगी। यह तर्क वर्षों से दिया जा रहा है और जब भी हिंदी को मजबूत करने की कोशिश होती है तो इस तर्क को झाड़-पोंछकर फिर से निकाल लिया जाता है। इस झाड़ पोंछ में अंग्रेजी के लोग अन्य भारतीय भाषाओं के मददगार के तौर पर खड़े दिखने की कोशिश करते हैं, कम से कम हिंदी के विरोध के खिलाफ खड़े तो दिखते ही हैं। जब उन्होंने देखा कि हिंदी के विरोध में अन्य भारतीय भाषाएं खड़ी नहीं हो रही हैं तो उन्होंने अंग्रेजी का गुणगान शुरू कर दिया और उसको रोजगार की भाषा आदि कर कर प्रचारित करना शुरू कर दिया था। अब एक नया औजार ढूंढा गया है जो भाषा के नाम पर एक बेहद खतरनाक प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहा है। वह है हिंदी को उसकी बोलियों से अलग करने की कोशिश। इन दिनों एक बार फिर से भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मुहिम जोर पकड़ने लगी है। भोजपुरी को लेकर काफी पहले से बातें हो रही थीं लेकिन अब जिस तरह से हिंदी के बढ़ने को इस मांग की वजह बनाया जा रहा है वह बिल्कुल ही एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। हिंदी तो हमेशा से अपनी बोलियों का एक समुच्चय रही है। उसकी बोलियां उसकी प्राण रही हैं। हिंदी को उसकी बोलियों से अलग करने का प्रयत्न शरीर से प्राण को अलग करने जैसा कृत्य है।
भोजपुरी और राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में डालने की मांग करने के पहले इन दोनों बोलियों के लिए काम करने की जरूरत है। किसी भी भाषा का आधार उसका व्याकरण, उसकी लिपि होती है। क्या भोजपुरी और राजस्थानी का कोई मानक व्याकरण है? क्या इनकी कोई अलग लिपि है? संभवत: नहीं। क्योंकि जितनी भी रचनाएं भोजपुरी और राजस्थानी में सामने आती हैं वो सभी देवनागरी लिपि में और हिंदी के व्याकरण का अनुकरण करती हुई लिखी जाती रही हैं। भाषा के इन आधारभूत संकल्पों को पूरा किए बगैर भाषा मान लेने का आग्रह करना व्यर्थ है। इसके अलावा एक और बात जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए वो ये कि किसी भी बोली या भाषा का विकास उसको संविधान की आठवीं अनुसूची में डाल देने से संभव है। क्या सिर्फ सरकारी आशीर्वाद मिल जाने से कोई फलने फूलने लग जाता है। यहां यह सवाल उठाना उचित है कि जो लोग आज भोजपुरी और राजस्थानी की पैरोकारी कर रहे हैं उनमें से कितने लेखक इसको अपने लेखन में अपनाते हैं? ऐसे कितने पाठक हैं जो इनको पढ़ने के लिए उत्सुक ना भी हों कम से कम संस्कारित तो हों? इससे भी आगे जाकर यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि इन भाषा में कितने प्रकाशक पुस्तकें प्रकाशित करने के लिए आतुर हैं या फिर इन भाषाओं में पुस्तकें छापकर वो व्यावसायिक रूप से अपना कारोबार सफलतापूर्वक संचालित कर सकते हैं
अब अगर हम इसको दूसरे तरीके से देखें तो हिन्दी का बेहतरीन साहित्य उसकी उपभाषाओं में ही है, चाहे वो अवधी में हो चाहे ब्रज भाषा में।  इन उपभाषाओं का हिन्दी के साथ एक रागात्मक संबंध रहा है। और कभी भी दोनों में टकराहट देखने को नहीं मिली है।विश्व के भाषाई इतिहास पर अगर हम नजर डालें तो यह एक अद्भुत सांमजस्य है। इस सामंजस्य को तोड़ने से किसको लाभ होगा, यह साफ है। बल्कि होना तो यह चाहिए कि हिंदी में इन तमाम बोलियों और उपभाषाओं में प्रयोग किए जानेवाले मुहावरों, कहावतों और शब्दों के प्रयोग को बढ़ाना चाहिए। इसका एक लाभ यह होगा कि जो नई हिंदी बनेगी या हिंदी को जो दायरा बनेगा वो लोगों के और नजदीक पहुंचेगी। भोजपुरी, अंगिका, मैथिली,अवधी, बुंदेलखंडी, राजस्थानी आदि के शब्दों को हिंदी में मिलाकर उसके उपयोग को बढ़ाने की कोशिश होनी चाहिए। साहित्यकारों और लेखकों पर भी जिम्मेदारी है कि वो इस तरह के शब्दों को अपनी रचनाओं में लेकर आएं। रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है कि – चौदहवीं शताब्दी में कवि विद्यापति ने अपनी पदावली में जिस भाषा का प्रयोग किया वह उत्तर में सर्वत्र समझी जाती थी और उसी भाषा के अनुकरण से ब्रजबुलि (ब्रजबोली) का जन्म हुआ, जिसके कवि बंगाल, असम और ओड़ीस्सा में उत्पन्न हुए। बल्कि कहना यह चाहिए कि ब्रजबुलि का जन्म ब्रजभाषा और मैथिली के मिश्रण से हुआ था। अतएव, ब्रजबुलि को लेकर एक समय शूरसेन से लेकर असम तक की भक्ति कविता की भाषा प्राय: एक ही थी।यह इस वक्त समय की मांग है कि इस तरह की रचनाएं रची जाएं जिससे भाषा और उसकी उपभाषा के बीच संबंध और प्रगाढ़ हों और हिंदी की उपभाषा को हिंदी के खिलाफ खड़ा करने की कोशिशें परवान नहीं चढ़ सके।
दरअसल अगर हम देखें तो भाषा के मामले में भी ऐतिहासिक भूलें हुई हैं। संविधान सभा में तय किया गया था और जिसे भारतीय संविधान में रखा भी गया था कि संविधान के लागू होने के अगले पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी चलती रहेगी और अगर 15 वर्ष के बाद भी संसद की यह राय हो कि विशिष्ट विषयों के लिए अंग्रेजी आवश्यक हो तो संसद में कानून बनाकर उन विषयों के लिए अंग्रेजी को जारी रख सकती थी। बाद में हिंदी के प्रचार विकास और ठोस जमीन तैयार करने के लिए सुझाव देने के लिए राष्ट्रपति ने बालाजी खेर की अध्यक्षता में राजभाषा आयोग की स्थापना की जिसने 1956 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। उसके आधार पर राष्ट्रपति ने कई आदेश जारी किए थे जिसमें एक था वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग का गठन। समय बीतता जा रहा था लेकिन हिन्दी को लेकर ठोस काम नहीं हो पा रहा था। गैर हिंदी प्रांतों से हिंदी विरोध की जैसी आवाजें उठ रही थीं उससे 1963 तक ये साफ हो गया था दो साल बाद यानि 1965 में अंग्रजी को हटाकर हिन्दी को शासन का माध्यम बनाना मुमकिन नहीं है। ऐसे माहौल में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में ये ऐलान कर दिया कि जबतक अहिन्दी भाषी भारतीय अंग्रेजी को चलाना चाहेंगे, तबतक केंद्र में भी हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी चलती रहेगी। गड़बड़ी यहीं से शुरू हुई। संविधान में ये तय किया गया था कि इसके लागू होने के पंद्रह साल के बाद अंग्रेजी विशिष्ट कार्यों के लिए ही प्रयोग में लाई जाएगी लेकिन जो भाषा अधिनियम बना वो संविधान की उस मूल आशय के विरुद्ध था। 1965 के जनवरी महीने में जब मद्रास में हिंदी विरोधी आंदोलन शुरू हुआ तो लालबहादुर शास्त्री ने ऐलान कर दिया कि नेहरू की भावनाओं का सम्मान होगा और वही हुआ और 1967 में कानून पास हो गया। गांधी भी शासन की भाषा के तौर पर अंग्रेजी को हटाना चाहते थे लेकिन वो भी नहीं हो सका। उस वक्त जिस तरह से अन्य भारतीय भाषाओं और हिंदी के बीच माहौल बना उसमें अंग्रेजी को अपने लिए संभावनाएं दिखी और उस भाषा के पैरोकारों ने वो तमाम कार्य किए जिससे हिंदी और अन्य भारतीय भाषा एक दूसरे के खिलाफ लड़ती रहें।

इस युक्ति से लगभग चार दशक निकल गए और पिछले एक दशक में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं बेहद करीब आने लगीं तो अंग्रेजी के लोगों ने एक नया रास्ता तलाशा कि हिंदी और उसकी उपभाषा या बोलियों को एक दूसरे से लड़ाया जाए। इस युक्ति के तहत ही भोजपुरी और राजस्थानी आदि स्वतंत्र भाषा के तौर पर मान्यता की मांग करने लगे। अब इस बात की कल्पना करिए कि अगर भोजपुरी के साथ साथ अंगिका, वज्जिका, मैथिली, मगही आदि को भी हिंदी से अलग करने की मांग उठने लगे तो फिर हिंदी का क्या होगा।हिंदी के कुछ लोगों ने उस स्थिति की कल्पना करते हुए अब सरकार से ये मांग करनी शूरू कर दी है कि भोजपुरी और राजस्थानी को आठनीं अनुसूची में शामिल नहीं किया जाए। एक तरह से देखें तो टकराहट की स्थिति दिखाई दे रही है। होना यह चाहिए कि हिंदी और उसकी बोलियों के लोगों को साथ बिठाकर बातचीत होनी चाहिए और उनकी शंकाओं को दूर करना चाहिए। उनको यह बताया जाना चाहिए कि हिंदी कहीं से भी भोजपुरी या राजस्थानी का हक नहीं मार रही है। राजस्थानी और भोजपुरी को समृद्ध करने की भी तमाम कोशिशें होनी चाहिए। हिंदी और उसकी उपभाषाओं के लेखकों को साथ बैठकर इन सवालों , मुठभेड़ करना होगा। इससे सबका भला होगा । अंग्रेजी के बिछाए जाल में फंसने से बेहतर है कि भारत हिंदी को मजबूत किया जाए ताकि उनकी उपभाषाएं या बोलियां भी मजबूत हों। 

Saturday, July 15, 2017

साहित्यकार, सिनेमा और संशय

इस वक्त साहित्यक हलके में यह खबर आम हो रही है कि मशहूर अंग्रेजी लेखक अमिष त्रिपाठी की बेस्टसेलर किताब द इमोर्टल्स ऑफ मेलुहा पर फिल्म बनने जा रही है। ये कोई पहली बार नहीं है कि इस तरह की बात फैली है। इसके पहले भी ये खबर आई थी कि करण जौहर ने अमिष त्रिपाठी की इस किताब पर फिल्म बनाने का फैसला लिया है। उस दौर में तो यहां तक चर्चा हुई थी कि अमीष के उपन्यास के आधार पर बनने वाली फिल्म में शिव की भूमिका के लिए करण जौहर ने ऋतिक रौशन, सलमान खान जैसे बड़े सितारों से बात की थी। पर जैसा कि आमतौर पर होता है कि फिल्मों के नहीं बन पाने की कोई ठोस वजह सामने नहीं आती है, उसी तरह से करण जौहर की फिल्म फ्लोर पर क्यों नहीं जा पाई, उसका भी पता नहीं लग पाया। अब इस तरह की चर्चा चल पड़ी है कि अमिष त्रिपाठी की इस बेस्टसेलर पुस्तक पर फिल्म बनाने का अधिकार करण जौहर के पास से संजय लीला भंसाली के पास आ गया है। इस फिल्म में शिव की भूमिका के लिए संजय लीला भंसाली ने ऋतिक रोशन को तय किया है। अगर इन बातों में दम है तो यह साहित्य के लिए बेहतर स्थिति है। अमिष त्रिपाठी को शिवा ट्रायलॉजी की इस किताब ने पर्याप्त यश और धन दोनों दिलवाया था। दुनियाभऱ में अमिष के लेखन को लेकर एक उत्सकुता भी बनी थी । उसके बाद अमिष त्रिपाठी ने कई किताबें लिखीं जिसको दुनियाभर के पाठकों ने हाथों हाथ लिया। अब अगर उस किताब पर फिल्म बनती है तो लेखक की लोकप्रियता में एक नया आयाम जुड़ेगा।
हिंदी फिल्मों का साहित्य से बड़ा गहरा और पुराना नाता रहा है। कई लेखक साहित्य के रास्ते फिल्मी दुनिया पहुंचे थे। प्रेमचंद से लेकर विजयदान देथा की कृतियों पर फिल्में बनीं। कइयों को शानदार सफलता और प्रसिद्धि मिली तो ज्यादातर बहुत निराश होकर लौटे । प्रेमचंद, अमृत लाल नागर, उपेन्द्र नाथ अश्क, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, गोपाल सिंह नेपाली, सुमित्रानंदन पंत जैसे साहित्यकार भी फिल्मों से जुड़ने को आगे बढ़े थे, लेकिन जल्द ही उनका मोहभंग हुआ और वो वापस साहित्य की दुनिया में लौट आए । प्रेमचंद के सिनेमा से मोहभंग को रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने संस्मरण में लिखा है- 1934 की बात है । बंबई में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था । इन पंक्तियों का लेखक कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने आया ।  बंबई में हर जगह पोस्टर चिपके हुए थे कि प्रेमचंद जी का मजदूर अमुक तारीख से रजतपट पर आ रहा है । ललक हुई, अवश्य देखूं कि अचानक प्रेमचंद जी से भेंट हुई । मैंने मजदूर की चर्चा कर दी । बोले यदि तुम मेरी इज्जत करते हो तो ये फिल्म कभी नहीं देखना । यह कहते हुए उनकी आंखें नम हो गईं । और, तब से इस कूचे में आने वाले जिन हिंदी लेखकों से भेंट हुई सबने प्रेमचंद जी के अनुभवों को ही दोहराया है ।अब ऐसा क्यों कर हुआ कि हमारे हिंदी साहित्य के हिरामन फिल्मों से इस कदर आहत हो गए । क्यों सुमित्रानंदन पंत जैसे महान कवि के लिखे गीतों को फिल्मों में सफलता नहीं मिल पाई, क्यों गोपाल सिंह नेपाली जैसे ओज के कवि को फिल्मों में आंशिक सफलता मिली । क्यों राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी जैसे शब्दों के जादूगर फिल्मों में अपनी सफलता का डंका बजाते हुए लंबे वक्त तक कायम नहीं रह सके । राजेन्द्र यादव की जिस कृतिसारा आकाश पर उसी नाम से बनी फिल्म को समांतर हिंदी सिनेमा की शुरुआती फिल्मों में शुमार किया जाता है वो राजेन्द्र यादव बाद के दिनों में फिल्म से विमुख क्यों हो गए ।
यहां यह समझना होगा कि फिल्म लेखन साहित्य से बिल्कुल अलग है। इसकी मुख्य वजह जो समझ में आती है वो ये कि साहित्यकार की आजाद ख्याली या उसकी स्वछंद मानसिकता फिल्म लेखन की सफलता में बाधा बनकर खड़ी हो जाती है । अपनी साहित्यक कृतियों में लेखक अंतिम होता है और उसकी ही मर्जी चलती है, वो अपने हिसाब से कथानक को लेकर आगे बढ़ता है और जहां उसे उचित लगता है उसको खत्म कर देता है । लेकिन फिल्मों में उसके साथ ये संभव नहीं होता है । फिल्मों में निर्देशक और नायक पर बहुत कुछ निर्भर करता है और फिल्म लेखन एक टीम की कृति के तौर सामने आती है वहीं साहित्यक लेखन एक व्यक्ति का होता है। दिक्कत यहीं से शुरू होती है।
प्रेमचंद के जिस दर्द को रामवृक्ष बेनीपुरी जी ने अपने संस्मरणों में जाहिर किया है उससे तो कम से कम यही संकेत मिलते हैं । कुछ तो वजह रही होगी, कोई यूं ही बेवफा नहीं होता । प्रेमचंद जैसा लेखक ये कहने को मजबूर हो गया कि अगर तुम मेरी इज्जत करते हो तो इस फिल्म को कभी मत देखना । संकेत यही है कि कथानक से उनकी मर्जी के विपरीत खिलवाड़ किया गया होगा। कहा यह जाता है कि कि जिस तरह से बेहतरीन सृजन के लिए साहित्यकार का उच्च कोटि का होना आवश्यक है उसी तरह से बेहतरीन कृतियों के साथ न्याय कर पाने की क्षमता के लिए फिल्मकार का भी समर्थ होना आवश्यक है। लेकिन प्रेमचंद की कृतियों के साथ तो ऋषि मुखर्जी और सत्यजित राय जैसे महान फिल्मकार भी न्याय नहीं कर सके। एम भावनानी और नानूभाई वकील और त्रिलोक जेटली तो नहीं ही कर पाए। गुरुवर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने 1929 में शिशिर कुमार भादुड़ी के भाई मुरारी को एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने सिनेमा और साहित्य पर अपने विचार प्रकट किए थे। टैगोर ने लिखा था- कला का स्वरूप अभिव्यक्ति के मीडियम के अनुरूप बदलता चलता है। मेरा मानना है कि फिल्म के रूप में जिस नई कला का विकास हो रहा है वो अभी तक रूपायित नहीं हो पाई है। हर कला अपनी अभिव्यक्ति की स्वाधीन शैली अपने रचना जगत में तलाश लेती है। सिनेमा के लिए सृजनशीलता ही काफी नहीं है उसेक लिए पूंजी भी आवश्यक है और सिनेमा में बिंबों के प्रभाव के माध्यम से अभिव्यक्ति को पूर्णता प्राप्त होती है।टैगोर की राय से काफी कुछ स्पष्ट हो जाता है।
सिनेमा के सौ बरस पुस्तक में लिखे अपने लेख मैंने तो तौबा कर ली में मस्तराम कपूर भी कहते हैं– ‘ मैंने महसूस किया कि फिल्मों की जरूरतों को ध्यान में रखकर लिखी गई रचना सही मायने में साहित्यक रचना नहीं बनती है । मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि फिल्म और टी वी का माध्यम साहित्य के अनुकूल नहीं है । फिल्म और टी वी के लिए लिखी गई रचना बाजार की मांग को ध्यान में रखकर लिखी जाती है जबकि साहित्यक रचना अपने अंधकार और अपने बंधनों से लड़ने की प्रक्रिया से निकलती है ।‘ प्रेमचंद के दर्द और मस्तराम कपूर के अनुभवों से साहित्यकारों के फिल्मों में ज्यादा लंबा नहीं चल पाने की वजह के संकेत तो मिलते ही हैं ।

यह तो सैद्धांतिक बातें हुई लेकिन बॉलीवुड में कुछ व्यावहारिक दिक्कतें भी हैं। ये दिक्कतें हैं बाजार और मांग के हिसाब से लेखन करना या फिर लिखे गए में निर्देशकों की मर्जी से बदलाव करना। साहित्य में जो लेखन होता है वह दृश्यों को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि कथा के प्रवाह को ध्यान में रखकर होता है। हिंदी के ज्यादातर साहित्यकार हिंदी सिनेमा के साथ समन्वय नहीं बैठा पाए और सिनेमा की दुनिया से निराश होकर ही लौटे। यह आज की दिक्कत नहीं है, प्रेमचंद की कहानी शतरंज के खिलाड़ी पर जब सत्यजित राय फिल्म बना रहे थे तब उनपर भी आरोप लगे थे कि उन्होंने प्रेमचंद की कहानी के साथ छेड़ छाड़ किया। शाहरुख खान ने जब विजयदान देथा की कहानी पहेली पर फिल्म बनाई तब भी उसमें काफई बदलाव किया गया था। यह होता रहा है लेकिन अब इसने सांस्थानिक रूप ले लिया है। अब निर्देशक कहानी में काफी बदलाव चाहते हैं या वो चाहते हैं कि घटनाओं और स्थितियों के हिसाब से कहानियां लिखी जाएं। ऐसे माहौल में साहित्यकारों का मोहभंग होना लाजिमी है। वो इस माहौल में अपने को फिट नहीं पाते हैं । उधर बॉलीवुड में प्रोफेशनल लेखकों की एक पूरी फौज तैयार है जो घटनाओं और स्थितियों के आधार पर लेखन करने को तैयार हैं । अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अमिष त्रिपाठी की कृति पर बनने वाली फिल्म में कथानक से छेड़छाड़ की जाती है या नहीं। बगैर विवाद के अगर ये फिल्म बनती है तो साहित्य के लिए बेहतर होगा।   

बीमार सरकारी कंपनियों का इलाज जरूरी

आज से सत्तर साल पहले जब देश आजाद हुआ था तब नए राष्ट्र के सामने अपनी आर्थिक व्यवस्था बनाने की सबसे बड़ी चुनौती थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नियंत्रित अर्थव्यवस्था का विकल्प चुना। देश उसी रास्ते पर चल निकला। उनके बाद इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री बनीं तो सरकार का नियंत्रण और बढ़ा। बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ और अनेक क्षेत्रों में सार्वजनिक उपक्रम की स्थापना की गई। सर्विस सेक्टर में भी सरकारी कंपनियों की स्थापना की गई। यहां तक कि सरकारी अफसरों की यात्रा के लिए टिकट बनवाने तक के लिए भी एक पब्लिक सेक्टर कंपनी को जिम्मा सौंपा गया। उस वक्त के लिए इस तरह के निर्णय सही हो सकते हैं लेकिन बदलते वक्त में बाजार का विस्तार होने और देश की जनता की परचेजिंग पॉवर में बढ़ोतरी के बाद कई सेवाओं के निजीकरण की बात शुरू हो गई, निजीकरण भी हुआ। दरअसल खुले बाजार की खुली अर्थव्यवस्था के अपने कायदे होते हैं, और वो कायदा कहता है कि सरकार को कम से कम क्षेत्रों में दखल देना चाहिए। बाजार की अपेक्षा तो ये है कि सरकार सिर्फ तीन-चार सेक्टर यानि देश की रक्षा, इंफ्रास्ट्रक्टर और नीतियों के निर्माण तक अपने को सीमित कर ले । उन्नीस सौ इक्यानवे में देश ने खुली अर्थव्यवस्था की राह पर चलने का फैसला किया और ढाई दशकों में हम उस राह पर काफी आगे बढ़ चुके हैं । इस पृष्ठभूमि में कई सरकारी कंपनियों का विनिवेश आवश्यक हो गया है।
केंद्र सरकार ने करीब पचपन हजार करोड़ के कर्ज में डूबे और बावन हजार करोड़ रुपए के कुल घाटे में में चल रही एयर इंडिया के विनिवेश को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। एयर इंडिया का कितना हिस्सा बेचा जाएगा और कैसे बेचा जाएगा इस बारे में फैसला करने के लिए वित्त मंत्री अरुण जेटली की अगुवाई में केंद्रीय मंत्रियों एक कमेटी बनाई गई है जिसमें नितिन गडकरी, पियूष गोयल, सुरेश प्रभु और अशोक गजपति राजू शामिल हैं। दरअसल नीति आयोग ने एयर इंडिया के पूर्ण विनिवेश का प्रस्ताव दिया था। आयोग की सलाह के मुताबिक इस कंपनी से सरकार को पूरी तरह से बाहर हो जाना चाहिए। नीति आयोग की सलाह उचित भी लगती है। साल दर साल एयर इंडिया का घाटा बढ़ता ही जा रहा है। करदाताओं की गाढ़ी कमाई का पैसा लगातार घाटे में जा रही कंपनी की भारपाई में क्यों बर्बाद किया जाए। दो हजार सात में कंपनी को मजबूत करने के लिए एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस का विलय हुआ था लेकिन उसका भी कोई लाभ नहीं मिल पाया। श्रीलंका से लेकर न्यूजीलैंड तक में विमानन कंपनियों के परिचालन से सरकार ने हाथ खींच लिया और उसके बाद इन कंपनियों की हालात काफी बेहतर हुई ।
अब सरकार के सामने कई तरह के विकल्प हैं जिसका चुनाव मंत्रियो की कमेटी को करना है। सबसे उचित विकल्प तो यही होगा कि इसका पूरी तरह से विनिवेश कर दिया जाए और सरकार अपने पास एक गोल्डन शेयर रखे जिसके तहत उसके पास प्रत्ययी जिम्मेदारी (फिडूसियरी रेसपांसिबिलिटी) हो। ब्रिटेन की सरकार ने हीथ्रो एयरपोर्ट के संदर्भ में इसी तरह का फॉर्मूला अपनाया था जहां सरकार के पास आखिरी फैसला लेने का अधिकार तो रहता है लेकिन उसको किसी तरह का डिविडेंड नहीं मिलता है। दरअसल सरकार एयर इंडिया में जितना कम दखल देने का अधिकार अपने पास रखेगी उतना ज्यादा पैसा एयर इंडिया को बेच कर हासिल होगा। अगर सरकार एयर इंडिया के मौजूदा कर्मचारियों को रखने या ना रखने का विकल्प भी खरीदार को मिले तो विनिवेश करनेवाली कंपनियों का रुख सकारात्मक हो सकता है।

एयर इंडिया को बेचने के लिए तीन तरह के विकल्प सरकार के सामने है। एयर इंडिया को तीन हिस्सों में बांट कर, मुनाफा वाली सहयोगी कंपनियों को अलग करके बेचा जाए। एयर इंडिया एक्सप्रेस,जो लो कॉस्ट एयरलाइंस है, एयर इंडिया कार्गो जो माल ढुलाई का काम करता है और तीसरा एयर इंडिया सर्विसेज, जिसके पास तमाम संपत्ति है। इसके अलावा लैंडिंग स्लॉट्स की बिक्री भी नीलामी के जरिए किया जाना चाहिए ताकि उचित मूल्य मिल सके। एयर इंडिया के पास देश विदेश में काफी संपत्ति है, जिसमें मुंबई के मरीन ड्राइव का इसका मुख्यालय ही हजारों करोड़ का है। इसके अलावा विदेशों में भी इसकी संपत्तियां हैं।
दो हजार एक में भी एक बार एयर इंडिया में विनिवेश की कोशिश हुई थी लेकिन तब वो परवान नहीं चढ़ पाई थी। उसके बाद सरकारी मदद से किसी तरह से एयर इंडिया चलती रही, घाटा लगातार बढ़ता चला गया। इसी तरह की कई अन्य पब्लिक सेक्टर कंपनियां हैं जिनके या तो पुर्नगठन की जरूरत है या फिर उनको पूरी तरह से निजी हाथों में सौंप देने की आवश्यकता है। लोकसभा में एक लिखित जवाब में सरकार ने बताया था कि 78 पब्लिक सेक्टर कंपनियों का 2015-16 का कुल घाटा अट्ठाइस हजार सात सौ छप्पन करोड़ रुपए है। इन कंपनियों को मिलाकर हर दिन लगभग औसत अस्सी करोड़ का घाटा हो रहा है। ये घाटा पिछले साल की तुलना में पचपन फीसदी अधिक है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक चार सबसे बड़ी घाटे में चलनेवाली कंपनी स्टील अथॉरिटी, बीएसएनएल, एयर इंडिया और हिन्दुस्तान फोटो फिल्मस है। अब सवाल यही है कि सरकार स्टील का उत्पादन क्यों करे, टेलीफोन सेवा क्यों दे। इन सब क्षेत्रों में निजी कंपनियां बेहतर सहूलियतें और सेवा दे रही हैं तो फिर सरकार का इसमें करदाताओं का पैसा लगाकर घाटा अर्जित करने से बचना चाहिए। सरकार को मौजूदा परिस्थियों का आंकलन करते हुए इन सफेद हाथियों से जल्द से जल्द पिंड छुडाने की कोशिश करनी चाहिए।



Saturday, July 8, 2017

संस्मरणों के बहाने घेरेबंदी

हिदीं साहित्य में कविता, कहानी और उपन्यास के बाद जिस एक विधा ने पाठकों को अपने साथ सबसे अधिक जोड़ा उनमें आत्मकथा और संस्मरण का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। हिंदी में आत्मकथाओं की लंबी परंपरा रही है लेकिन इनमें से ज्यादातर आत्मकथाओं में लेखक खुद को कसौटी पर कस नहीं पाते हैं। हिंदी में ज्यादातर आत्मकथाओं में लेखक आसपास के परिवेश और परिचितों पर तो निर्ममतापूर्वक अपनी लेखनी चलाते हैं लेकिन खुद को बचाकर चलते हुए एक ऐसी छवि पेश करता या करती है जो उसको आदर्श के रूप में मजबूती से स्थापित करने में सहायक हो सके। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपनी तारीफ करता है। बहुधा ऐसा होता है कि जब लेखक के सामने अपनी असहज या अप्रिय परिस्थियों को लिखने की चुनौती आती है तो वहां से कन्नी काटकर निकल जाता या जाती है। कमोबेश यही स्थिति संस्मरण लेखन में भी दिखाई देती है। कई बार तो संस्मरणों के जरिए दूसरों को निबटाने का खेल भी खेला जाता है। कई बार नाम लेकर तो कई बार इशारों में अपनी बात कहकर। इस तरह के सैकड़ों उदाहरण हिंदी साहित्य में मौजूद हैं।  मशहूर अंग्रेजी लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने कहा भी है कि वही आत्मकथा विश्वसनीय होती है जो जिंदगी के लज्जाजनक और घृणित कृत्यों को उजागर करता हो- दिख जाए तो ये पूत के पांव पालने में दिखने जैसा हो।
पिछले दिनों हिंदी की वरिष्ठ लेखिका और उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा की संस्मरण की किताब को लेकर हिंदी साहित्य में विवाद खड़ा करने की कोशिश की गई, मैत्रेयी की खामोशी से विवाद बढ़ नहीं सका। मैत्रेयी पुष्पा के संस्मरणों की पुस्तक वह सफर था कि मुकाम था के केंद्र में राजेन्द्र यादव हैं। राजेन्द्र यादव हिंदी के सबसे विवादास्पद और विवादप्रिय लेखक थे, लिहाजा उनके निधन के बाद आई इस किताब को लेकर भी विवाद होना तय ही था । वह सफर था कि मुकाम था नाम की इस किताब में मैत्रेयी पुष्पा ने राजेन्द्र यादव को लेकर अपने संबंधों के बारे में लिखा है। राजेन्द्र यादव और मैत्रेयी पुष्पा के संबंधों को लेकर साहित्य जगत में लंबे समय से अटकलें चलती रही हैं, कभी अच्छी तो कभी बुरी। मैत्रेयी पुष्पा ने भी कई बार इस संबंध को मिथकीय पात्रों के आधार परपरिभाषित करने की कोशिश की । उन्होंने अपनी आत्मकथा में इस संबंध पर विस्तार से लिखा भी है। मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा में जो सब छपा था कमोबेश उसका ही संक्षिप्त रूप या कहें कि राजेन्द्र यादव को केंद्र में रखकर यह किताब बनाई गई है। यह किताब उन पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गई है जो संक्षेप में मैत्रेयी की नजर से राजेन्द्र यादव को देखना चाहते हैं। कह सकते हैं कि ये पतली सी पुस्तक मैत्रैया पुष्पा की दो खंडों की आत्मकथा की टीका है।  इस किताब में ऐसा नया कुछ भी नहीं है जो पहले मैत्रेयी पुष्पा ने लिखा ना हो या साहित्य जगत को ज्ञात नहीं हो। राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी के अलग होने की वजहों को लेकर भी समय समय पर विवाद उठता रहा है। ओमा शर्मा के चर्चित इंटरव्यू से लेकर गाहे बगाहे यादव जी के वक्तव्यों तो लेकर भी इस अलगाव पर बात होती रही है। खुद राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी भी इस विषय पर बहुत बार बहुत कुछ चुके हैं ।
इस पुस्तक के प्रकाशन के बाद साहित्य में चाहे अनचाहे इस तरह का माहौल बना कि राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी में अलगाव मैत्रेयी पुष्पा की वजह से हुआ। यादव जी के पारिवारिक मित्र और उनके करीबी इस तथ्य को जानते हैं कि जब यादव जी ने मन्नू भंडारी का घर छोड़ा था तब वजह कोई और थी। ना तो मीता थी और ना ही मैत्रेयी। इस प्रसंग को उठाकर साहित्य से जुड़े लोग क्या हासिल करना चाहते हैं, यह समझ से परे है। यह पूरा मसला व्यक्तिगत था और साहित्य में इसकी चर्चा व्यर्थ है। राजेन्द्र यादव को जिन भी परिस्थितियों में मन्नू जी से अलग होना पड़ा था उससे साहित्य जगत का क्या लेना देना। पाठकों को इस बात से क्या लेना देना कि यादव जी और मन्नू भंडारी के बीच कैसे रिश्ते थे और अंत तक वो रिश्ते कैसे रहे। दोनों की कृतियों पर बात होनी चाहिए, दोनों के साहित्यक अवदानों पर विमर्श होना चाहिए। वैसे इन दोनों के संबंधों पर राजेन्द्र यादव के मित्र रहे मनमोहन ठाकौर ने पतली सी किताब लिखी थी। वह पुस्तक इन दोनों को जानने के लिए प्रकाशित अबतक की सबसे अच्छी कृति है।
मैत्रेयी पुष्पा के आत्मकथा का जब पहला खंड कस्तूरी कुंडल बसै आया था तो वो इस वाक्य पर खत्म होता है- घर का कारागार टूट रहा है।इससे वो क्या संदेश दे रही थीं इसको समझने की जरूरत है। यादव जी के जीवन काल में भी मैत्रेयी पुष्पा और राजेन्द्र यादव के बारे में इतना ज्यादा लिखा गया था कि मैत्रेयी की आत्मकथा की उत्सुकता से प्रतीक्षा करनेवाले पाठकों की रुचि ये जानने में भी थी कि मैत्रेयी, राजेन्द्र यादव के साथ अपने संबंधों को वो कितना खोलती हैं । मैत्रेयी पुष्पा और राजेन्द्र यादव के संबंधों में सिमोन और सार्त्र जैसे संबंध की खुलासे की उम्मीद लगाए बैठे आलोचकों और पाठकों को निराशा हाथ लगी थी । हद तो तब हो जाती है जब राजेन्द्र यादव राखी बंधवाने मैत्रेयी जी के घर पहुंच जाते हैं, हलांकि मैत्रेयी पुष्पा राखी बांधने से इंकार कर देती हैं। राजेन्द्र यादव को लेकर मैत्रेयी को अपने पति डॉक्टर शर्मा की नाराजगी और फिर जबरदस्त गुस्से का शिकार भी होना पड़ता है।लेकिन शरीफ डॉक्टर गुस्से और नापसंदगी के बावजूद राजेन्द्र यादव की मदद के लिए हमेशा तत्पर दिखाई देते हैं, संभवत: अपनी पत्नी की इच्छाओं के सम्मान की वजह से। लेखिका ने अपने इस संबंध पर कितनी ईमानदारी बरती है, ये कह पाना तो मुश्किल है,लेकिन सिर्फ टी एस इलियट के एक वाक्य के साथ इसे खत्म करना उचित होगाभोगनेवाले प्राणी और सृजन करने वाले कलाकार में सदा एक अंतर रहता है और जितना बड़ा वो कलाकार होता है वो अंतर उतना ही बड़ा होता है। मैत्रेयी पुष्पा के आत्मकथा का दूसरा खंड- गुड़िया भीतर गुड़िया यशराज फिल्मस की उस फिल्म की तरह है, जिसमें संवेदना है, संघर्ष है, किस्सागोई है, रोमांस है, भव्य माहौल है और अंत में नायिका की जीत भी - जब राजेन्द्र यादव अस्पताल के बिस्तर पर पड़े हैं और मैत्रेयी को फोन करते हैं तो डॉक्टर शर्मा की प्रतिक्रिया क्या बुड्ढा अस्पताल में भी तुम्हें बुला रहा है?’
लेकिन वही डॉ. शर्मा कुछ देर बाद यादव जी के आपरेशन के कंसेंट फॉर्म पर दस्तखत कर रहे होते हैं ।

अब इस बात पर भी विवाद खड़ा किया जा रहा है कि यादव जी जब अस्पताल में भर्ती हुए थे तो उनके अस्पताल के दाखिला फॉर्म पर किसने दस्तखत किए थे। कई दावेदार उठ खड़े हुए हैं लेकिन यादव जी के जीवन काल में कोई भी दावेदार सामने नहीं आया था। उस वक्त अस्पताल ले जाने और डॉ शर्मा के उनके कंसेंट फॉर्म पर दस्तखत करने की बात मैत्रेयी ने अपनी आत्मकथा में लिख दी थी । उसके इतने सालों बाद इस विवाद को उठाने का उद्देश्य क्या हो सकता है या फिर मंशा क्या हो सकती है, यह तो पता नहीं पर इस पूरे प्रसंग पर यादव जी के जीवन काल में किसी ने बात नहीं की। यह तथ्य है कि यादव जी को अस्पताल में भर्ती करवाने से लेकर उनके इलाज की सारी व्यवस्था मैत्रेयी पुष्पा और उनकी बेटी-दामाद करते रहे थे। चाहे वो एम्स में भर्ती करवाने का मसला ही क्यों ना हो। दरअसल फेसबुक पर लिखने की आजादी हर किसी को कुछ भी कह डालने का एक अवसर प्रदान करता है जिसका उपयोग हर तरह के लेखक- कुलेखक कर सकते हैं। मैत्रेयी पुष्पा की इस वह सफर था कि मुकाम था किताब पर नाहक विवाद उठाने की कोशिश की गई। इस किताब के प्रकाशन पर सवाल खड़े होने चाहिए थे कि आपने इसमें नया क्या दिया है। क्यों आपने अपनी आत्मकथा का संक्षिप्त रूप पेश किया ? पाठकों को क्यों इस किताब को पढ़ना चाहिए, आदि आदि। इससे साहित्य का भी भला होता और पाठकों का भी । मैत्रेयी पुष्पा की इस किताब वह सफर था कि मुकाम था में इस्तेमाल किए गए अपाहिज जैसे चंद शब्दों पर आपत्ति जायज हो सकती है। अगर मैत्रेयी पुष्पा ने इस किताब में कुछ गलत तथ्य पेश किए हैं तो अवश्य उन पात्रों को सामने आकर उनका खंडन करना चाहिए, लेकिन बगैर नाम लिए हवा में बातें करने से कुछ हासिल नहीं होगा। तथ्यों को ठीक करवा देना चाहिए, ताकि भविष्य में शोधार्थियों के सामने भ्रम की स्थिति ना हो। साहित्य और पाठक के व्यापक हित को ध्यान में रखा जाना चाहिए। 

Saturday, July 1, 2017

‘पुरस्कार वापसी’ के पुरस्कार से परहेज कहां?

हाल ही में बिहार सरकार के कला, संस्कृति और युवा विभाग के सांस्कृतिक कार्य निदेशालय ने दो हजार सत्रह अठारह के लिए अपना सांस्कृतिक कैलेंडर जारी किया। इस कैलेंडर में विभाग द्वारा आयोजित तमाम सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम, उसको आवंटित राशि, संभावित बजट, स्थान, माह के अलावा नोडल एजेंसी के नाम का उल्लेख है। इस कैलेंडर में क्रमांक सैंतीस पर लिखा है सत्याग्रह विश्व कविता समारोह। आयोजन स्थल पटना। संभावित बजट तीन करोड़ साठ लाख रुपए और नोडल एजेंसी के तौर पर विभाग और बिहार संगीत नाटक अकादमी का नाम उल्लिखित है। ऐसा प्रतीत होता है कि भूलवश आयोजन का माह जनवरी दो हजार सत्रह छप गया है। दरअसल इस आयोजन को होना जनवरी दो हजार अठारह में है। इस पूरे कैलेंडर में इस आयोजन का संभावित बजट सबसे अधिक है। अगर जोड़ा जाए तो पूरे बजट का करीब पांचवां हिस्सा सिर्फ एक आयोजन के लिए आवंटित किया गया है। बिहार सरकार के इस संस्कृतिक कैलेंडर के जारी होते ही विश्व कविता समारोह को लेकर एक बार फिर से सुगबुगाहट शुरू हो गई। पाठकों को यह याद होगा कि इस स्तंभ में ही सबसे पहले इस बात की चर्चा की गई थी कि हिंदी के वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी बिहार सरकार के सहयोग से विश्व कविता सम्मेलन करना चाहते हैं। उस वक्त यह बात सामने आई थी कि अशोक जी ये आयोजन दिल्ली में करवाना चाहते हैं, आयोजन को कॉर्डिनेट करने के लिए अशोक वाजपेयी को दिल्ली में स्टाफ और दफ्तर बिहार सरकार की तरफ से मुहैया करवाया जाएगा आदि आदि। पहली बाठक में इन विषयों पर बातचीत हुई भी थी।
अब बिहार सरकार ने इस विश्व कविता समारोह को पटना में सत्याग्रह विश्व कविता के नाम से आयोजित करने का फैसला लिया है। जाहिर सी बात है कि अशोक वाजपेयी इस योजना से शुरू से जुड़े रहे हैं लिहाजा इस बात की चर्चा एक बार फिर से शुरू हो गई है कि अशोक वाजपेयी को ही पटना में आयोजित होनेवाले विश्व कविता समारोह का जिम्मा सौंपा जा रहा है। बिहार के वरिष्ठ रचनाकार उषाकिरण खान और कर्मेन्दु शिशिर ने फेसबुक पर ये लिखा भी है कि अशोक वाजपेयी को ही ये जिम्मा दिया जा रहा है। उषा किरण खान जी ने तो साफ तौर पर लिखा कि बिहार सरकार के कला संस्कृति विभाग ने अशोक वाजपेयी जी को जिम्मा सौंपा है विश्व कविता सम्मेलन करने के लिए। कर्मेन्दु शिशिर जी ने लिखा कि नीतीश जी जब दिल्ली गए थे तो अशोक वाजपेयी और मंगलेश डबराल वगैरह उनसे मिलने गए थे। पहले तो वो नहीं मिले। के सी त्यागी जी तक ही रहा। मगर बाद में मिले। पवन वर्मा जी की भी भूमिका रही। बाद में उन्होंने लिखा कि ऐसा उनको किसी ने बताया। इस मुलाकात के बारे में कितनी सचाई है ये तो पता नहीं लेकिन इन टिप्पणियों से ये हुआ कि विश्व कविता सम्मेलन के संयोजक के तौर पर अशोक वाजपेयी का नाम खुल गया।
दरअसल अशोक वाजपेयी ने भारत सरकार को 2014 में भी विश्व कविता सम्मेलन के आयोजन का प्रस्ताव दिया था जो परवान नहीं चढ़ सका था । दरअसल उस वक्त की सरकार ने अशोक वाजपेयी के उस प्रस्ताव को साहित्य अकादमी के पास भेज दिया था जिसे साहित्य अकादमी ने ठुकरा दिया था । साहित्य अकादमी ने अशोक वाजपेयी के प्रस्ताव को नकारते हुए साफ कर दिया था कि वो किसी से साथ साझीदारी में इतना बड़ा आयोजन करने के बजाए खुद इस तरह का आयोजन कर सकती है । साहित्य अकादमी ने विश्व कविता समारोह का आयोजन किया भी था । उसके बाद केंद्र में सरकार बदली। बिहार में विधानसभा चुनाव हुए। चुनाव के दौरान असहिष्णुता को लेकर देश में माहौल बनाया गया। पुरस्कार वापसी अभियान को संगठित तरीके से चलाया गया। बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के गठबंधन की जीत हुई। उसके बाद अशोक वाजपेयी ने बिहार सरकार को विश्व कविता समारोह का प्रस्ताव दिया। लंबे समय तक सरकारी प्रक्रिया और बैठकों के बाद बिहार सरकार ने विश्व कविता समारोह के लिए तीन करोड़ साठ लाख का बजट आवंटित कर दिया है । आयोजन का जिम्मा बिहार संगीत नाटक अकादमी को सौंपा गया है लेकिन समिति में अशोक वाजपेयी हैं।
अशोक वाजपेयी ने विश्व कविता सम्मेलन के बारे में कहा था कि उन्होंने एक समारोह में मुख्मंत्री को सुझाव को इस आयोजन का सुझाव दिया था। संभव है कि बिहार के मुख्मंत्री समारोह में दिए गए सुझावों पर अमल करवा देते हों । लेकिन बाद में इस आयोजन को लेकर बैठक हुई तो वहां अशोक वाजपेयी की तरफ से औपचारिक प्रसातव पर विचार किया गया। वाजपेयी उस बैठक में शामिल होने पटना गए। बैठक में उनके अलावा आलोक धन्वा, अरुण कमल और आरजेडी के नेता दीवाना भी शामिल हुए थे। उस बैठक में तय हुआ था कि समारोह पटना और बिहार के किसी एक और शहर में आयोजित की जाएगी। उस बैठक के बाद विश्व कविता समारोह के आयोजन में अशोक वाजपेयी की भूमिका को पुरस्कार वापसी के पुरस्कार के तौर पर देखा गया था। अशोक वाजपेयी ने भी लेख लिखकर इसका खंडन किया था और कहा था कि इस समारोह का पुरस्कार वापसी से कोई लेना देना नहीं है।
संभव है अशोक जी की बातें सही हों लेकिन अगर कर्मेन्दु शिशिर की उपरोक्त बातों में सचाई है तो अशोक वाजपेयी के साथ मंगलेश डबराल भी इस आयोजन को सुनिश्चित करवाने के लिए नीतीश कुमार से मिले थे। गौरतलब है कि मंगलेश डबराल भी पुरस्कार वापसी समूह में शामिल थे। यह अलहदा बात है कि इन दिनों मंगलेश डबराल साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों में शिरकत करते नजर आ रहे हैं। विरोध का ये वामपंथी तरीका है, जहां आप प्रचार और लाभ हासिल करने के लिए नैतिकता आदि की आड़ लेते हैं लेकिन जैसे ही आपको किसी लाभ का प्रस्ताव मिलता है तो आप अपना विरोध त्यागकर उसे स्वीकार कर लेते हैं। पुरस्कार वापसी करने वाले लेखकों के साथ यही हो रहा है। अगर बिहार सरकार का सत्याग्रह विश्व कविता सम्मेलन पुरस्कार वापसी का पुरस्कार नहीं है तो फिर क्या है? अशोक वाजपेयी चाहे लाख सफाई दें लेकिन यह सचाई है। फेसबुक और सोशल मीडिया पर हो रही चर्चा इस बात को पुष्ट भी करती हैं। जब संस्कृति विभाग का कैलेंडर जारी हुआ तो यह बात भी प्रकरांतर से सामने आने लगी कि अशोक वाजपेयी ने विश्व कविता समारोह को लेकर उनपर हो रहे हमलों से आहत होकर इससे अलग होने का मन बना लिया है। इस तरह की बात भी सामने आई कि उन्होंने महीने भर पहले इस आयोजन को खुद से अलग कर लिया है। बिहार सरकार के संस्कृति विभाग के आला अफसरों से बात करने पर पता चला कि उन्हें अशोक वाजपेयी के इस समारोह से अलग होने की अबतक कोई जानकारी नहीं है। बल्कि विभागीय अफसरों ने इस बात को स्पष्ट किया कि विश्व कविता समारोह का मूल प्रस्ताव अशोक वाजपेयी का ही था और विभाग चाहता है कि अशोक वाजपेयी को ही इस आयोजन का जिम्मा मिले। सारी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं बस शासन के सर्वोच्च स्तर से उसपर अप्रूवल मिलना शेष है। अशोक वाजपेयी के इस समारोह से अलग होने की बात अबतक बिहार सरकार के संस्कृति मंत्रालय तक पहुंची नहीं है। ना ही उऩका कोई पत्र पहुंचा है।
पुरस्कार वापसी के पुरस्कार से भी बड़ा मुद्दा है कि विभाग के अन्य आयोजनों को पर्याप्त धनराशि का नहीं दिया जाना। इसके अलावा जो दूसरी बात है वो कि बिहार में तमाम सांस्कृतिक, साहित्यक संस्थाएं बदहाल हैं, उनके कर्मचारियों के सामने बहुधा वेतन तक का संकट पैदा हो जाता है। विश्व कविता सम्मेलन के आयोजन का जिम्मा जिस संगीत नाटक अकादमी को मिला है उसके अध्यक्ष तक नहीं हैं। इस बात पर गंभईरता से विचार करना होगा कि जबतक कला और संस्कृति के लिए इंफ्रास्ट्रक्टर नहीं विकसित किया जाएगा, स्थानीय प्रतिभाओं को अपने अपने क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर उपलब्ध नहीं करवाया जाएगा तबतक इस तरह के महंगे आयोजनों का कोई अर्थ नहीं है। साहित्य अकादमी ने दिल्ली में विश्व कविता समारोह का आयोजन किया था उसमें साहित्यक लोगों की भी भागीदारी नगण्य थी। वैश्विक स्तर पर अलग अलग भाषाओं के कवियों ने अपनी भाषा में कविताएं पढ़ीं थीं, जिसको लेकर किसी तरह का उत्साह नहीं दिखा था। बिहार का संस्कृति विभाग अगर सच में साहित्य, कला संस्कृति के विकास और अंतराष्ट्रीय स्तर पर उसकी पहचान बनाने के लिए प्रतिबद्ध है तो उसको इस तरह के व्यक्तिगत महात्वाकांक्षी प्रस्तावों पर विचार करने के पहले स्थानीय स्तर पर उसकी स्वीकार्यता और आयोजन से स्थानीय प्रतिभाओं को होनेवाले लाभ का आंकलन भी करना चाहिए। अन्यथा होगा ये कि इस तरह के आयोजन एक साल होकर, व्यक्ति या संस्था विशेष को लाभ पहुंचाकर बंद हो जाएंगे