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Saturday, March 18, 2023

संघ पर आधारहीन आरोप


कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और सांसद राहुल गांधी को जब भी अवसर मिलता है वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हमलावर रहते हैं। कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को लेकर, कभी हिंदुत्व को लेकर, कभी वीर सावरकर को लेकर तो कभी सांप्रदायिकता को लेकर। वो भारतीय जनता पार्टी की सरकार को भी जब घेरने का प्रयास करते हैं तो सायास उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर आ जाते हैं। अभी हाल में विदेश में भी उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना साधा। राहुल गांधी का मानना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत में सभी संस्थाओं पर कबजा कर लिया है। इससे संवाद की प्रक्रिया बाधित हुई है बल्कि आयडिया आफ इंडिया को नुकसान पहुंचा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था तहस नहस हो गई है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि भारत में वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा भी संकट में है। उनको लगता है कि एक संगठन इस मजबूत भारतीय मूल्य को हानि पहुंचाने में सक्षम है। राहुल गांधी राजनेता हैं। राजनीति ही उनका कर्म है। उनके इस बयान पर हलांकि संघ ने बेहद सधी हुई प्रतिक्रिया दी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि राहुल गांधी अपना राजनीतिक एजेंडा चलाते हैं और हमारी उनसे कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। लेकिन साथ ही उन्होंने राहुल गांधी से और जिम्मेदार होने की अपेक्षा भी जताई। राहुल गांधी के साथ-साथ कांग्रेस के नेता और पूर्व वामपंथी बुद्धिजीवी जो इन दिनों कांग्रेस में अपना भविष्य तलाश रहे हैं वो भी निरंतर संघ की आलोचना करते हैं। उनकी आलोचना का आधार होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देश के सभी सांस्कृतिक संस्थाओं पर कब्जा कर लिया। इस कब्ज ने देश में संवाद को बाधित किया है और लोकतांत्रिक व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। 

लगभग दो वर्ष पहले की बात है। दिल्ली में कुछ बुद्धिजीवियों के साथ संघ प्रमुख मोहन भागवत की बैठक थी। दिनभर चली इस बैठक में भोजनावकाश के समय औपचारिक बातें हो रही थी। मोहन भागवत जिस टेबल पर भोजन कर रहे थे वहां एक वरिष्ठ पत्रकार पहुंचे। उन्होंने उनसे किसी नियुक्ति को लेकर बात आरंभ कर दी। संघ प्रमुख भोजन करते रहे। जब वरिष्ठ पत्रकार महोदय लगातार उसी विषय़ पर बोलते रहे तो मोहन जी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कभी भी नियुक्तियों आदि में न तो हस्तक्षेप करता है और न ही सरकार को अपनी पसंद बताता है। संघ का काम है देश हित में जनमानस को तैयार करना। जब समाज का मानस तैयार हो जाता है तो सरकारें स्वत: उसका संज्ञान लेती हैं और उसके अनुकूल कार्य करती हैं। नियुक्ति आदि का काम सरकार का होता है वही इसको देखे तो व्यवस्था बनी रहती है। फिर कुछ हास-परिहास हुआ और बात खत्म हो गई। यहां हंसते हुए मोहन भागवत ने जो बात कही वो बेहद महत्वपूर्ण थी। उसको समझे जाने की जरूरत है। अब जरा वास्तविकता पर भी दृष्टि डाल लेते हैं कि देश में शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में काम करनेवाली संस्थाओं का हाल क्या है। अगर संघ ने सचमुच हर जगह कब्जा कर लिया है तो इन संस्थाओं के प्रमुखों के पद पर तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोग ही पदस्थापित होंगे। 

शिक्षा से आरंभ करते हैं। एक बेहद दिलचस्प उदाहरण है बिहार के मोतिहारी स्थित महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय की। दो फरवरी 2021 को मोतिहारी के केंद्रीय विश्वविद्याल के कुलपति का कार्यकाल समाप्त हो गया। दो साल से अधिक समय बीत चुका है। दो बार वहां के कुलपति की नियुक्ति लिए चयन प्रक्रिया हो चुकी है। बावजूद इसके अबतक वहां किसी कुलपति की नियुक्ति नहीं हो सकी है। विश्वविद्यालय कार्यवाहक कुलपति के भरोसे चल रहा है। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शैक्षणिक संस्थाओं पर कब्जा जमाने में लगा होता तो अबतक तो यहां कुलपति की नियुक्ति करवा चुका होता। ये नया विश्वविद्यालय है और यहां अपने संगठन और विचार के लोगों को भरने की संभावनाएं भी हैं, दो साल से इस केंद्रीय विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति ना होना इस आरोप का निषेध करता है कि संघ योजनाबद्ध तरीके से संस्थाओं पर कब्जा कर रहा है। अब शिक्षकों की नियुक्ति की बात करते हैं। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने बुधवार को संसद में जानकारी दी कि शैक्षणिक संस्थानों में 11050 शिक्षकों के पद खाली हैं। जिनमें से 6028 पद  केंद्रीय विश्वविद्यालयों में, 4526 पद भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थानों में और 496 पद भारतीय प्रबंध संस्थान में रिक्त हैं। अगर संस्थाओं पर कब्जा होता तो इतनी बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद खाली क्यों होते। संघ प्रयासपूर्वक नियुक्तियां करवा रहा होता। शिक्षा मंत्रालय से ही जुड़ी दो और संस्था का उदाहरण सामने है। एक संस्था है केंद्रीय हिंदी निदेशालय जो पिछले कई वर्षों से निदेशक की बाट जोह रहा है। इसी तरह से केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा को भी पिछले ढाई साल से प्रभारी निदेशक चला रही हैं। शिमला के भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में भी नियमित निदेशक की प्रतीक्षा है।    

अब जरा कला और साहित्य से जुड़ी संस्थाओं को देख लेते हैं। दिल्ली स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में पिछले कई वर्षों से निदेशक का पद खाली है। वहां कई शिक्षकों के पद भी खाली हैं। यहां की स्थिति तो और भी दिलचस्प है। विद्यालय में दो कार्यवाहक निदेशक पद संभालकर सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इन दिनों नई दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के प्रोफेसर रमेश गौड़ नाट्य विद्यालय के निदेशक का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे हैं। यहां भी निदेशक के पद के लिए दूसरी बार साक्षात्कार हो चुका है लेकिन अबतक नियुक्ति नहीं हो पाई है। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संस्थाओं पर कब्जा करने में लगा होता तो इस प्रतिष्ठित नाट्य संस्था पर अपनी पसंद का निदेशक तो चयनित करवा चुका होता। निदेशक की नियुक्ति की बात छोड़ भी दें तो विद्यालय परिसर में करीब दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उपहास करते हुए पोस्टर लगाया गया था। संस्थाओं पर अगर कब्जा होता तो क्या ये संभव था कि वहां प्रधानमंत्री का उपहास उड़ाया जाता। संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत ही ललित कला अकादमी है, जहां नियमित सचिव का पद खाली है। कला संस्कृति से जुड़े संस्थानों में खाली पदों की सूची लंबी है। ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष के सलाहकारों ने ठीक से होमवर्क करके उनको जानकारी नहीं दी । अगर वो होमवर्क करते तो उनको पता चलता कि शिक्षा-संस्कृति के संस्थानों की वास्तविक स्थिति क्या है।

2014 में केंद्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने और कांग्रेस के निरंतर कमजोर होते जाने से वामपंथियों को चुनौतियां मिलने लगीं। इन चुनौतियों से जब वो पार नहीं पा सकते हैं तो दुष्प्रचार आरंभ कर देते हैं। दरअसल जो पूर्व वामपंथी बुद्धिजीवी कांग्रेस में अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं वो ही इस तरह की बातें फैलाते रहते हैं। इंदिरा जी के प्रधानमंत्रित्व काल से ही कांग्रेस ने शिक्षा और संस्कृति का क्षेत्र वामपंथियों को आउटसोर्स कर दिया था। विश्वविद्यालयों से लेकर अकादमियों तक में वामपंथियों का बोलबाला था। कुलपति से लेकर अकादमी के चेयरमैन और संस्थानों के निदेशक सभी पदों पर वामपंथी अपने पसंद के लोगों को बिठाते थे। ज्योति बसु की जीवनीकार को कुलपति बना दिया गया था। कांग्रेस और वामदलों के राजनीतिक रूप से कमजोर होने के बाद इन परजीवी किस्म के कथित बुद्धिजीवियों को सत्ता की मलाई मिलने में मुश्किल हो रही है तो वो अनर्गल प्रलाप में जुटे रहते हैं। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के इर्द-गिर्द भी इस विचारधारा के लोगों ने अपना घेरा मजबूत कर लिया है और राहुल गांधी को आगे करके वो अपनी स्वार्थसिद्धि के उपक्रम में जुटे रहते हैं। वो ये नहीं समझा पा रहे कि आरोप अगर तथ्यहीन होते हैं तो प्रभाव नहीं छोड़ते।  

Friday, September 22, 2017

डायनेस्टी कार्ड से खुद की खोली पोल ·

कथा सम्राट प्रेमचंद ने कहा था कि सिर्फ मूर्ख और मृतक अपने विचार नहीं बदलते हैं। भारतीय राजनीति में वंशवाद को लेकर हाल ही में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रेमचंद के इस कथन का साबित भी किया। अमेरिका के कैलिफोर्निया में एक बातचीच में राहुल गांधी ने कहा कि भारत वंशवाद से ही चल रहा है। इसके लिए उन्होंने मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव से लेकर तमिलनाडु के नेता करुणानिधि के बेटे स्टालिन तक तो नाम लिया ही उन्होंने अभिषेक बच्चन को भी वंशवाद के प्रतिनिधि के तौर पर रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पूरा देश ही ऐसे चल रहा है लिहाजा सिर्फ उनको वंशवाद के आधार पर लक्षित करने की जरूरत नहीं है। अब जरा फ्लैशबैक में चलते हैं । दो हजार आठ में उत्तराखंड के जिम कार्बेट में छात्रों से बात करते हुए राहुल गांधी ने कहा था- मैं अगर अपने परिवार से नहीं आता तो यहां नहीं होता। आप अपने परिवार, मित्र या पैसे के बल पर सिस्टम में प्रवेश कर सकते हैं। मेरे पिता राजनीति में थे, मेरी दादी और दादी के पिता राजनीति में थे, इसलिए मेरे लिए राजनीति में आना और पैर जमाना आसान था। ये एक समस्या है और मैं इस समस्या का लक्षण हूं। मैं इसे बदलना चाहता हूं।अपनी राजनीति के शुरुआती दिनों में राहुल गांधी वंशवाद को समस्या मानते रहे थे लेकिन उस वक्त भी जब भी मौका मिलता था अपने परिवार के बारे में अपने वंशजों के बारे में बातें करते थे।
दो हजार सात में ही यूपी में एक रोडशो के दौरान उन्होंने जोर देकर कहा था कि वो एक ऐसे परिवार से आते हैं जो अपने वचन से डिगता नहीं है, अपने वादों से पीछे नहीं हटता है। उस वक्त भी ये बात समझ में आ रही थी एक डायनेस्ट वंशवादी राजनीति के खिलाफ बातें तो कर रहा है लेकिन उसको अपने परिवार पर अपनी विरासत पर गर्व भी है। कांग्रेस में वंशवाद की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी थीं कि उसको डायनेस्टी से मुक्त करवाने की उनकी तमाम कोशिशें, अगर कोई थीं तो, नाकाम रही थीं। जो शख्स दो हजार आठ में वंशवाद को समस्या मान रहा था वही नौ साल बाद उसको भारत की पहचान के तौर पर पेश कर रहा है, तो हुई ना प्रेमचंद की बातें सही। राहुल गांधी ने भी वही तर्क दिए जो चापलूस कांग्रेसी सालों से दे रहे हैं कि नेता की क्षमता पर बात हो उसके परिवार पर नहीं।
अगर हम भारतीय राजनीति के इतिहास पर नजर डालें तो ये साफ तौर पर नजर आता है कि नेहरू-गांधी परिवार ने कायदे से अपने बच्चों को राजनीति में बढ़ावा दिया । आजादी पूर्व 1928 में मोतीलाल नेहरू कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे और उन्होंने अपने बाद अपने बेटे के सर पर कांग्रेस अध्यक्ष का ताज रखने के लिए गांधी जी को 13 जुलाई 1929 को एक पत्र लिखा था जिसमें साफ तौर पर कहा था कि या तो आप या जवाहरलाल कांग्रेस की बागडोर संभालें। बाद में 1929 में जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। जब लाहौर अधिवेशन में मोतीलाल नेहरू ने जवाहरलाल को कांग्रेस अध्यक्ष का चार्ज दिया तो उस वक्त इंदिरा गांधी बारह साल की थी और वहां मौजूद थीं। आजादी के बाद जब नेहरू भारत के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने इंदिरा गांधी को भविष्य की राजनीति के लिए तैयार किया और 1959 में उनको कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाया। अगर उस दौर के नेताओं पर नजर डालें तो तो इंदिरा से ज्यादा काबिल नेता कांग्रेस में थे। लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो वंशवाद खुलकर सामने आ गया। संजय गांधी एक वक्त में काफी ताकतवर थे, उनके निधन के बाद इंदिरा ने राजीव गांधी को अपना उत्तराधिकारी बनाया जो बाद में देश के प्रधानमंत्री भी बने। राजीव की हत्या के बाद सोनिया और उनके बाद राहुल। जो सोनिया गांधी अपने पति की राजनीति में आने के खिलाफ थीं उनको अपने बेटे में संभावनाएं दिखने लगीं। डायेनेस्टिक पॉलिटिक्स भारत में नहीं बल्कि चंद परिवारों में चल रही है।
इसके अलावा राहुल गांधी ने कश्मीर के आतंकवाद से लेकर नोटबंदी और असहिष्णुता पर भी अपनी राय रखी। राहुल गांधी के बयानों पर लहालोट होनेवाली ब्रिगेड को उनके बयानों में अंतर्विरोध नजर नहीं आया। कश्मीर में बढ़ते आतंकवाद पर उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधा और कहा कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में उनलोगों ने घाटी में पसरे आतंकवाद को बेहद कम कर दिया था लेकिन कैसे  नहीं बताया। इसी तरह से नोटबंदी को लेकर भी भारत सरकार पर निशाना साधा लेकिन राहुल गांधी ये भूल गए कि नोटबंदी के बाद यूपी चुनाव में जनता ने बीजेपी को भारी जनादेश दिया था। अब रहती है बात असहिष्णुता की तो इस शब्द का रॉर्ड इतनी बार बज चुका है कि अब जब ये बजता है तो कोई प्रभाव नहीं छोड़ता है। असहिष्णुता की बात करनेवाले राहुल गांधी को कालबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्या में कांग्रेस सरकार के कामकाज पर सवाल उठाने चाहिए। हर चीज में आरएसएस का हाथ बताकर पल्ला झाड़ने से काम नहीं चलनेवाला है। अब वो दौर चला गया कि हर चीज के पीछे विदेशी हाथ बताकर काम चल जाता था। जनता को भरमाना अब आसान नहीं है, जनता अब ठोस कार्रवाई तो चाहती ही है ठोस आरोप भी देखना सुनना चाहती है। अरविंद केजरीवाल की आरोपों की राजनीति के बाद अब जनता का हवा हवाई आरोपों में यकीन रह नहीं गया है। इस बात को राहुल गांधी को समझना होगा और राष्ट्रीय या अंतराष्ट्रीय मंच पर जाकर अपनी बात कहने के पहले होमवर्क भी करना होगा। वरना बार बार प्रेमचंद याद आते रहेंगे।    


Monday, June 19, 2017

राहुल से हो पाएगा क्या?

पिछले तीन चार सालों से नियमित अंतराल पर इस बात के कयास लगते रहे हैं कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को पार्टी की कमान सौंपी जाने वाली है। सोनिया गांधी की बीमारी के बाद कयास का अंतराल कम होता चला गया है। जब भी कांग्रेस के सामने किसी तरह की क्राइसिस या राजनीति का अहम पड़ाव आता है तो इस तरह की खबरें आने लगती हैं कि राहुल गांधी के पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी अमुक वक्त तक हो जाएगी। पर अबतक ऐसा हो नहीं पाया है। अभी हाल ही में राष्ट्रपति चुनाव को लेकर रणनीति बनाने के लिए कांग्रेस के तमाम आला नेता जब सोनिया गांधी की अध्यक्षता में बैठे तो एक बार फिर से इस बात के कयास लगने लगे कि राहुल गांधी को पार्टी की रहनुमाई सौंप दी जाएगी। पिछले साल सात नवंबर को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में इस बात पर जमकर चर्चा हुई थी कि राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी संभालनी चाहिए। कार्यसमिति के ज्यादातर सदस्य इस पक्ष में थे भी लेकिन तब दिग्विजय सिंह ने कहा था कि सोनिया गांधी की अनुपस्थिति में इस तरह का कोई फैसला लेना उचित नहीं था। गौरतलब है कि उस वक्त सोनिया गांधी तबीयत खराब होने की वजह से उक्त बैठक में शामिल नहीं हो पाई थी।
इस साल के अंत तक कांग्रेस पार्टी में संगठनात्मक चुनाव होने हैं। राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष पद सौंपने की एक बार फिर से तैयारी शुरू हो गई है। कयासबाजी भी। अब सवाल यही है कि राहुल गांधी कांग्रेस पद की जिम्मेदारी से भाग रहे हैं या फिर पार्टी में उनकी ताजपोशी को लेकर दो मत हैं। पार्टी से जुड़े कुछ नेताओं का दावा है कि राहुल गांधी लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर पार्टी अध्यक्ष बनना चाहते हैं जबकि ज्यादातर नेता चाहते हैं कि कांग्रेस कार्यसमिति राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष नामित कर दे और फिर उसके बाद राष्ट्रीय अधिवेशन में उनके नाम पर मुहर लग जाए। यह तो वो बातें हैं जो सिद्धांत रूप से सामने आने पर अच्छी लगती हैं लेकिन इसके अलावा भी उनके अध्यक्ष बनने में एक पेंच है। वो पेंच है पार्टी के वो नेता जो सोनिया गांधी की पीढ़ी के हैं। वो चाहते हैं कि मौजूदा व्यवस्था ही चलते रहे जिसते तहत पार्टी के बारे में अंतिम फैसला लेने का हक सोनिया गांधी के हाथ में ही रहे और राहुल गांधी उपाध्यक्ष के तौर पर काम करते रहे। उनके तर्क हैं कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में विपक्ष एकजुट हो सकता है लेकिन नीतीश और ममता बनर्जी जैसे दिग्गजों को राहुल गांधी का नेतृत्व मंजूर ना हो। इस तरह के तर्क देकर राहुल गांधी की ताजपोशी में फच्चर फंसाया जाता रहा है ।

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस इस वक्त उस दौर से गुजर रही है जहां नेतृत्व को लेकर नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक में एक भ्रम और उलझन लक्षित किया जा सकता है । सोनिया के नेपथ्य में रहने की वजह से पुरानी पीढ़ी के नेता स्वत: परिधि पर चले गए थे और राहुल गांधी के आसपास के नेता पार्टी के केंद्र में दिखाई देने लगे थे । यह संसद और उसके बाहर दोनों जगह पर साफ तौर पर देखा जा सकता था । सोनिया के नेपथ्य में जाने के बावजूद उनके इर्दगिर्द के नेता भले ही पृष्ठभूमि में चले गए हों लेकिन उनकी ताकत कम नहीं हुई थी । ये जरूर हुआ कि राहुल गांधी के नजदीकी नेताओं का भाव बढ़ गया । इस परिस्थिति में पार्टी के फैसलों और नेताओं के बयान में एकरूपता नहीं दिखाई देती है । कुछ नेताओं का मानना है कि राहुल गांधी जब नोटबंदी का विरोध कर रहे थे और धीरे-धीरे अन्य विपक्षी दलों के नेता उनके साथ आते दिख रहे थे वैसे में राहुल गांधी बगैर सबको विश्वास में लिए प्रधानमंत्री मिलकर विपक्षी एकता के प्रयासों को झटका दे गया । दरअसल अगर हम देखें तो दो हजार नौ के लोकसभा चुनाव के बाद ही राहुल गांधी को कमान सौपने की मांग के बाद से यह भ्रम की स्थिति बनी हुई है । इस भ्रम ने दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की लुटिया डुबोई थी । सात आठ साल से यह स्थित बनी हुई है और एक के बाद एक चुनाव हारने के बाद यह और बढ़ता चला जा रहा है । नेतृत्व में भ्रम की वजह से पार्टी का कोई सीधा रास्ता नहीं बन पा रहा है जिसपर चला जा सके।
दो हजार उन्नीस का आमचुनाव अब आ ही चला है । एक तरह से देखें तो उसमें डेढ साल का वक्त बचा है क्योंकि छह महीने पहले से तो आचार संहिता आदि लगा दी जाती है। अब वक्त कांग्रेस के हाथ से लगभग निकल चुका है। य़ूपी चुनाव के बाद तो जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री ओमर अबदुल्ला ने कह ही दिया था कि अब दो हजार चौबीस की तैयारी करनी चाहिए। दरअसल अगर कांग्रेस अब भी राहुल गांधी के हाथ में कमान सौंपती है तो उनके अबतक के अप्रोच को देखकर लगता नहीं है कि वो बहुत गंभीरता से इस जिम्मेदारी को निभा ले जाएंगे। पहले ही कई बार कहा जा चुका है कि राजनीति चौबीस घंटे का काम है इसको कैजुअल तरीके से नहीं किया जा सकता है। अब जब देश में किसान अपनी समस्या को लेकर उग्र हो रहे हैं तो राहुल गांधी इटली चले गए हैं और पार्टी में फिर से सभी नेता हो गए हैं। अगर कांग्रेस को 2019 की लड़ाई में बने भी रहना है तो राहुल गांधी को कमान फौरन सौंपनी होगी और राहुल बाबा को भी खालिस राजनेता की भूमिका में उतरना होगा क्योंकि उनका मुकाबला अमित शाह जैसे मेहनती अध्यक्ष से है।