Translate

Showing posts with label दिव्यप्रकाश दूबे. Show all posts
Showing posts with label दिव्यप्रकाश दूबे. Show all posts

Saturday, June 15, 2019

सकारात्मक के साथ सृजन का दौर


पिछले दिनों एक साहित्यिक जमावड़े में आज के लेखकों के आचार-व्यवहार पर चर्चा हो रही थी। बहस इस बात पर हो रही थी कि साहित्य में निंदा-रस का कितना स्थान होना चाहिए। साहित्यकारों के बीच होनेवाले गॉसिप से लेकर एक दूसरे को नीचा दिखाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी चर्चा होने लगी। वहां मौजूद सबलोग इस बात पर लगभग एकमत थे कि साहित्य में नकारात्मकता ने सृजनात्मकता का काफी नुकसान पहुंचाया। साहित् में नकारात्मकता को बढ़ावा देने के लिए फेसबुक को जिम्मेदार ठहरानेवाले भी मुखरता के साथ अपना पक्ष रख रहे थे। दरअसल ये हमेशा से होता आया है कि जब एक जगह कई साहित्यकार मिलते हैं तो गॉसिप और निंदा पुराण का दौर चलता ही है। साहित्यक जमावड़े में रसरंजन की तरह ये भी एक अनिवार्य तत्व है। कई लेखकों ने इस बारे में लिखा भी है लेकिन बहुत कुछ अलिखित रह गया है। हिंदी के मशहूर उपन्यासकार-नाटककार मोहन राकेश ने 19 जुलाई 1964 को अपनी डायरी में लिखा- ‘कल शाम सी सी आई में चले गए, भारती, गिरधारी, राज और मैं। हम लोग पहले गए, राज बाद में आया। भारती के साथ ज्यादा साहित्यिक राजनीति की ही बातें होती रहीं। वात्स्यायन के बंबई आने का किस्सा, जो पहले बार-बार वे लोग सुना चुके हैं, वह फिर से सुनाने लगा, तो उसे याद दिला दिया कि यह माजरा नया नहीं है। ज्यादा बातें हुईं- दिल्ली के छुटभैयों के बारे में, टी-हाउस, कॉफी हाउस के बारे में, उन कहानीकारों के बारे में जिनसे वक्तव्य नहीं मंगवाए गए। उनके बारे में जिन्होंने वक्तव्य नहीं भेजे। एक मजाक हुआ। राज से गिरधारी ने कहा ‘तुम्हारे मुंह से शराब की गंध आती है।‘ ‘तुम्हारे मुंह से तुलसीपत्र की गंध आती है’ राज ने उससे कहा और फिर बोला, और ‘ये जो दो चले जा रहे हैं, उनके मुंह से प्रेमपत्र की गंध आती है।‘ इसपर भारती रुककर बोला ‘क्यों गलत बात कहते हो? राकेश के मुंह से तो हमेशा त्यागपत्र की गंध आती है।’ भारती मतलब धर्मभारती और वात्स्यायन माने अज्ञेय जी। मोहन राकेश की डायरी के इस अंश में कई तरह के संकेत निकल रहे हैं। पहली ही पंक्ति में कहा गया है कि सबसे ज्यादा बात साहित्यिक राजनीति की हुई। इसका मतलब है कि उस दौर में भी साहित्य में खूब राजनीति होती थी। जब राजनीति होगी तभी को बातें होगीं। फिर वात्स्यायन के मुंबई (उस वक्त का बंबई) आने का किस्सा भी फिर शुरू हुआ था। कोई ऐसा किस्सा जरूर रहा होगा जिसको साहित्यिक जमावड़े में बार-बार दोहराया जाता होगा। उस किस्से को इतनी बार दोहराया जा चुका था कि उस दिन उस किस्से को बीच में ही रोक दिया गया। अगर बार-बार दोहराया जाता होगा तो वो होगा भी दिलचस्प। मुंबई में बैठकर दिल्ली के लेखकों के बारे में भी बातें होती रही थीं। जाहिर सी बात है कि जिस अंदाज में उस प्रसंग को लिखा गया है उससे इस बात का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि या तो निंदा पुराण का पाठ हुआ होगा या फिर जमकर गॉसिप।
इसके अलावा एक और चीज जो लेखकों के बीच देखने को मिलती थी वो थी ईर्ष्या। इसके बारे में तो सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं लेकिन मोहन राकेश और राजेन्द्र यादव का उदाहरण देना इस वजह से उचित लगता है कि ये दोनों काफी गहरे मित्र भी थे। हिंदी की नई कहानी त्रयी के दो मजबूत स्तंभ थे। तीसरे कमलेश्वर थे। मोहन राकेश को जब अगस्त, 1959 में उनके नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ के लिए संगीत नाटक अकादमी की ओर से सर्वश्रेष्ठ नाटक का अवॉर्ड देने की घोषणा हुई तो मोहन राकेश ने लिखा कि ‘यादव का व्यवहार फिर कुछ अजीब सा लगा। न जाने क्यों मुझे छोटा बतलाकर या समझकर उसे खुशी होती है।‘ मोहन राकेश साफ-साफ कह रहे हैं कि उनके पुरस्कार मिलने से राजेन्द्र यादव को अच्छा नहीं लगा। बात सिर्फ यादव और राकेश की नहीं है। उपेन्द्र नाथ अश्क और महादेवी के बीच जिस तरह का शीतयुद्ध चलता था वो जगजाहिर है। दिनकर ने भी अपनी डायरी में एक समकालीन कवि-सांसद के ईर्ष्या भाव को उजागर किया ही है। बावजूद इन सबके उस दौर में ज्यादातर रचनाकर अपने समकालीनों पर लिखते भी थे, उनकी अच्छी रचनाओं की तारीफ भी करते थे। राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्वर के बीच चाहे जितनी ईर्ष्या रही हो लेकिन वो तीनों एक दूसरे को काफी प्रमोट करते थे। एक दूसरे के बारे में ग़ॉसिप भी करते थे लेकिन सार्वजनिक मंचों पर एक दूसरे की तारीफ करते थे, लेख लिखकर एक दूसरे की रचनाओं को स्थापित करते थे।
उस वक्त के साहित्यिक माहौल और अब के साहित्यिक माहौल में थोड़ा अंतर आ गया है। ईर्ष्या अब भी है, निंदा-पुराण का पाठ अब भी होता है, लेकिन सार्वजनिक रूप से अपने समकालीनों की तारीफ करने की प्रवृत्ति का ह्रास हुआ है। आज के ज्यादातर लेखक-लेखिकाओं में अपने समकालीनों को लेकर एक अजीब किस्म का भाव देखने को मिलता है जिसका फेसबुक पर बहुधा प्रकटीकरण भी हो जाता है। इसके अलावा गॉसिप में एक आवश्यक दुर्गुण चरित्र हनन का शामिल हो गया है जो कि चिंताजनक है। अगर हम इस पर गंभीरता से विचार करें तो इस तरह की प्रवृत्ति पिछले दस साल में ज्यादा बढ़ी है। आज से दस-पंद्रह साल पहले लेखन की दुनिया में आए रचनाकारों के साथ तकनीक की घुसपैठ भी साहित्य में बढ़ी। फेसबुक साहित्यकारों के बीच लोकप्रिय हुआ। वैसे लेखक जो फेसबुक को एक बुराई के तौर पर देखते थे अब दिनभर वहीं पाए जाने लगे। फेसबुक ने कई लेखकों को अहंकारी बना दिया। उनकी रचनाओं पर सौ पचास लाइक्स और कमेंट आने से वो खुद को प्रेमचंद या मन्नू भंडारी समझने लगे। बढ़ते अहंकार ने उनकी रचनात्मकता को प्रभावित किया। कुछ वाकए तो ऐसे भी सामने आए जिनमें लेखकों या लेखिकाओं ने अपने समकालीन लेखक या लेखिका के चरित्र पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कीचड़ उछाला। फेक आईडी के आधार पर एक दूसरे को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई। फेसबुक ने निंदा-पुराण और गॉसिप के तंत्र को विकसित होने के लिए एक ऐसा मंच दिया जो बेहद उर्वर साबित हुआ। यहां मोहल्ले के छुटभैये दादाओं की तरह साहित्यिक गिरोह बने, उनके सरगना बने और फिर अपने साथियों को निबटाने का खेल खेला गया। अब भी खेला जा रहा है, यह स्थिति साहित्य सृजन के लिए बेहतर नहीं कही जा सकती है। फेसबुक की व्यापक पहुंच की वजह से इस तरह के गिरोहों का आतंक भी बढ़ा। 
अब अगर हम एकदम नई पीढ़ी की बात करें तो उसमें एक खास किस्म की सकारात्मकता दिखाई देती है। सत्य व्यास, दिव्य प्रकाश दूबे, अंकिता, विजयश्री तनवीर की नई वाली हिंदी की टोली से लेकर खुद को गंभीर लेखन की परंपरा के मानने वाले प्रवीण कुमार, उमाशंकर चौधरी जैसे लेखकों के सार्वजनिक व्यवहार से साहित्य में सकारात्मकता का एहसास होता है। ये सभी लोग फेसबुक पर सक्रिय हैं लेकिन वहां एक दूसरे की रचनाओं पर खुश होकर टिप्पणियां करते हैं, चर्चा करते हैं। नई वाली हिंदी की जो टोली सोशल मीडिया पर है वो आपस में खूब चुहलबाजी करती है, मजाक मजाक में ही अपनी और अपनी पीढ़ी के अन्य लेखकों की कृतियों का प्रमोशन भी करती चलती है। इस टोली के किसी सदस्य को कभी नकारात्मक टिप्पणी करते हुए नहीं देखा गया है। यही इस पीढ़ी की ताकत है और इनको अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी से अलग भी करती है। इसी वजह से उनकी व्यापक स्वीकार्यता भी है, ऐसा प्रतीत होता है। इनका एक अपना पाठक वर्ग बना है जो इनके नाम से पुस्तकों की खरीद करता है। पाठकों को इन लेखकों की साहित्येतर टिप्पणियों में जो सृजनात्मकता देखने को मिलती है उसके आधार पर ही वो इनकी कृतियों तक जाने का मन बनाते हैं। नई वाली हिंदी की इस पीढ़ी के ठीक पहले वाली पीढ़ी के कई लेखकों ने नकारात्मकता को अपनी पहचान बनाई। उसकी वजह से पूरी पीढ़ी को नुकसान हुआ। फेसबुक पर हमेशा नकारात्मक बातें, सिद्धांत और विचारधारा की आड़ में गाली-गलौच उनकी पहचान बन गई। उनके व्यक्तित्व के साथ वो नकारात्मक पहचान चिपक गई। अब इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि उदारीकरण के स्थायित्व प्राप्त कर लेने के बाद साहित्य में इस तरह की नकारात्मकता क्यों बढ़ी और फिर उसके बाद की जो पीढ़ी आई उसने खुद को सकारात्मकता के सांचे में डालकर पाठकों के बीच लोकप्रियता हासिल की। हिंदी साहित्य के अध्येताओं के लिए इसके कारणों की तलाश करनी चाहिए। क्या पता कुछ दिलचस्प निष्कर्ष निकल आए।  


Saturday, June 16, 2018

नईवाली हिंदी की चुनौतियां


करीब तीन साल पहले की बात रही होगी,हिंदी प्रकाशन जगत में एक जुमला बहुत तेजी से चला, ‘नई वाली हिंदी’। ‘नई वाली हिंदी’ की इस तरह से ब्रांडिंग की गई जैसे हिंदी नई चाल में ढलने लगी हो। हिंद युग्म प्रकाशऩ ने इसको अपना टैग लाइऩ बनाया। वहां से प्रकाशित होनेवाले उपन्यासों और कहानी संग्रहों को ‘नई वाली हिंदी’ की कृतियां कहकर प्रचारित किया जाने लगा। सोशल मीडिया से लेकर साहित्य उत्सवों तक में इस ‘नई वाली हिंदी’ पर चर्चा शुरू हो गई। इसका एक असर ये हुआ कि पाठकों को लगा कि ‘नई वाली हिंदी’ कुछ नयापन लेकर आई है। इस बीच दैनिक जागरण बेस्टसेलर की सूची आई जिसमें इस ‘नई वाली हिंदी’ के कई लेखकों ने शीर्ष पर जगह बनाई। जागरण की हर तिमाही प्रकाशित बेस्टसेलर की सूची में ‘नई वाली हिंदी’ के लेखकों ने लगातार जगह बनाई। इस सूची में ‘नई वाली हिंदी’ के लेखकों के अलावा नरेन्द्र कोहली, रमेश कुंतल मेघ, गुलजार, जावेद अख्तर, यतीन्द्र मिश्र जैसे लेखकों ने भी जगह बनाई। लेकिन दैनिक जागरण बेस्टसेलर में ‘नई वाली हिंदी’ के लेखकों के लगातार बने रहने से इसपर देशव्यापी चर्चा शुरू हो गई। जब चर्चा जोर पकड़ने लगी तो वो ‘नई वाली हिंदी’ के लेखकों की कृतियों में अंग्रेजी के शब्दों के उपयोग पर चली गई, फिर एकाधिक बार इन कृतियों में रोमन में लिखे वाक्यों को लेकर चर्चा हुई, कभी सकारात्मक तो कभी नकारात्मक लेकिन ‘नई वाली हिंदी’ चर्चा में बनी रही। कुछ लेखकों ने प्रेमचंद से लेकर हिंदी के अन्य लेखकों की कृतियों को उद्धृत करते हुए ये बताया कि उन लोगों ने भी अपनी अपनी रचनाओं में अंग्रेजी के वाक्यों का प्रयोग किया है जो देवनागरी में छपी रचनाओँ के मध्य है। कुछ लोगों ने कहा कि साहित्यिक कृतियों में हिंदी को अपनी शुद्धता के साथ उपस्थित होना चाहिए तो कइयों ने भाषा को लेकर इस तरह की बात को दुराग्रह माना। कुछ लोगों ने बोलचाल की भाषा को अपनाने की वकालत करनी शुरू कर दी। बोलचाल की भाषा में हिंदी लिखने की बात भी नई नहीं है। हिंदी के महत्वपूर्ण कवि भवानी प्रसाद मिश्र की एक कविता है- जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख/और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख। दशकों पहले भवानी बाबू जैसे कवि ने साहित्य में भी बोलचाल की भाषा की वकालत की थी। यह बहस अब भी जारी है, जारी रहनी भी चाहिए। भाषा को लेकर लगातार मंथन होने के अपने फायदे भी हैं। लेकिन इस ‘नई वाली हिंदी’ में ब्राडिंग के अलावा भाषा के स्तर पर नया क्या था ये पाठकों के सामने आना शेष है।
भवानी बाबू बोलचाल की भाषा को साहित्य की भाषा बनाने का आग्रह तो करते हैं लेकिन अगली पंक्ति में वो इससे भी महत्वपूर्ण बात करते हैं जिसको रेखांकित किए जाने की जरूरत है। भवानी प्रसाद मिश्र अपनी इसी कविता में इसी पंक्ति के बाद कहते हैं कि ‘चीज ऐसी दे कि जिसका स्वाद सिर चढ़ जाए/बीज ऐसा बो कि जिसकी बेल बन बढ़ जाए।‘ कहने का मतलब यह है कि वो रचना की स्तरीयता और उसके उत्कृष्ट होने को लेकर भी कवियों और लेखकों को ललकारते हैं। हमें इस ‘नई वाली हिंदी’ के लेखकों की रचनाओं पर विचार करने का वक्त आ गया है। ‘नई वाली हिंदी’ के लेखक सत्य व्यास की किताब ‘बनारस टॉकीज’ जबरदस्त हिट रही, बिकी भी। सत्य व्यास को जमकर शोहरत मिली। बेस्टसेलर की सूची में भी इसने लगातार अपना स्थान बनाए रखा है। अपनी इस किताब में सत्य व्यास ने बनारस हिंदी विश्वविद्यालय को केंद्र में रखा और वहां की कहानी को बेहद दिलचस्प अंदाज में पाठकों के सामने पेश किया। अब तो इस कृति पर फिल्म भी बन रही है। इसके बाद सत्य व्यास का दूसरा उपन्यास आया, ‘दिल्ली दरबार’। अपने इस उपन्यास में लेखक ने दिल्ली विश्वविद्यालय और वहां के छात्र जीवन को केंद्र में रखा। यह पुस्तक भी चर्चित हुई, लेकिन लोकप्रियता और बिक्री में ये ‘बनारस टॉकीज’ को पार नहीं कर सकी। हलांकि सत्य के इस उपन्यास में भी पठनीयता थी, भाषा का प्रवाह भी था लेकिन विषयगत नवीनता नहीं थी। ‘बनारस टॉकीज’ के बाद निखिल सचान का उपन्यास ‘यूपी 65’ आया। निखिल सचान की इसके पहले ‘नमक स्वादानुसार’ और ‘जिंदगी आइस पाइस’ के नाम से दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थी। निखिल का ये पहला उपन्यास था जिसमें बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के आईआईटी के परिवेश में बुनी एक इंजीनियर के इश्क और शिक्षा व्यवस्था से उसके मोहभंग की कहानी है। वही विश्वविद्यालय और वही छात्रों के बीच का जीवन। निखिल के इस उपन्यास को सफलता मिली लेकिन अपेक्षाकृत कम। इसके बाद कई उत्साही युवाओं ने युनिवर्सिटी कैंपस को लेकर उपन्यास लिखे। ऐसा नहीं है कि ‘नई वाली हिंदी’ में सिर्फ उपन्यास लिखे जाने लगे। इसमें कहानियां और व्यंग्य आदि भी लिखे गए। ‘नई वाली हिंदी’ के एक और ब्रांड अंबेसडर बने दिव्य प्रकाश दुबे। उनका कहानी संग्रह ‘मुसाफिर कैफे’ खूब चर्चित हुआ। उनकी और कृतियां ‘मसाला चाय’ और ‘टर्म्स एंड कंडिशंस अप्लाई’ ने भी जमकर चर्चा बटोरी, पाठकों का प्यार भी मिला। इसी समय ये दावा किया गया कि हिंदी साहित्य में एक नई विधा का उदय हुआ है। ये दावा किया गया अजीत भारती के बैचलर व्यंग्य संग्रह ‘बकर पुराण’ में। 2016 में प्रकाशित इस किताब में लेखक ने लिखा- ‘बकर साहित्य हिंदी साहित्य की एक नई विधा है जो सड़के के पास की चाय दुकानों, गोलगप्पे के ठेलों, स्कूल कॉलेज के हॉस्टलों से होते हुए बैचलरों के उस कमरे पर पहुंचता है जहां गालिब है, मोमिन है, ट्रॉटवस्की है, आंद्रे ब्रेतां है और कास्मोपॉलिटन का पुराना-सा इशू भी है।‘ अब ‘बकर साहित्य’ हिंदी साहित्य की नई विधा के तौर पर स्थापित हो पाया या नहीं ये तो समय तय करेगा लेकिन साहित्य की नई विधा स्थापित करने का दावा लप्रेक ने भी किया था जिसका हश्र हिंदी जगत ने देख लिया। तीन-चार लेखकों से आगे नहीं बढ़ पाई वो कथित विधा।  
‘नई वाली हिंदी’ की ब्रैंडिंग के बाहर के लेखक चेतन भगत और पंकज दूबे ने भी युनिवर्सिटी जीवन को केंद्र में रखकर उपन्यास लिखे। पंकज दूबे को भी जो सफलता ‘लूजर कहीं का’ में मिली थी वैसी सफलता उनको बाद के उपन्यासों में नहीं मिल पाई। चेतन को भी नहीं। तो क्या अब ये वक्त आ गया है कि ‘नई वाली हिंदी’ के कई लेखकों को ये समझना होगा कि पाठकों को भाषा के चमत्कार से बहुत देर और दूर तक चमत्कृत नहीं किया जा सकता है। मुझे तो यही लगता है कि ‘नई वाली हिंदी’ के लेखकों को अब नए विषयों की तलाश करनी चाहिए। कॉलेज युनिवर्सिटी की किस्से बहुत हो गए। क्योंकि इनसे अलग हटकर भी जिसने लिखा उनको सफलता मिली। अनु सिंह चौधरी ने इससे अलग हटकर ‘नीला स्कार्फ’ और ‘मम्मा की डायरी’ लिखी। जिसे काफी सराहा गया। इसी तरह से भगवंत अनमोल ने ‘जिंदगी फिफ्टी फिफ्टी’ लिखी जिसको भी खूब पसंद किया गया। प्रियंका ओम की ‘मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है’ को भी लोगों ने सराहा। ‘नई वाली हिंदी’ के युवा लेखकों के सामने अभी पूरी जिंदगी पड़ी है, हिंदी साहित्य जगत को उनसे बहुत उम्मीदें हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य की उस जड़ता को तोडा जो किसी खास तरह की यथार्थवादी रचनाओं को ही श्रेष्ठ मानती थी। उन्होंने हिंदी से उन पाठकों को भी जोड़ा जो इन खास तरह की रचनाओं से उबकर साहित्य से विमुख होने लगे थे। एक योगदान इनका और है कि इन्होंने हिंदी के कई प्रकाशकों को भी इस तरह की कृतियां छापने के लिए उकसाया। इन्होंने अपनी सफलता से अपने आलोचकों का मुंह भी बंद किया जो इस नई वाली हिंदी के लेखकों को खारिज करने के लिए उनको हल्की फुल्की पुस्तकें कहा करते थे और ये भी तर्क देते थे कि इन पुस्तकों का स्थायी महत्व नहीं है। अब इनके सामने यही चुनौती है कि वो कैसे अपने लेखन में विषय का विस्तार करते हैं, अपने अलग अलग अनुभवों को कैसे कथानक में पिरोकर पाठकों के सामने पेश करते हैं। अगर वो ऐसा कर पाते हैं तो फिर उनको साहित्य के केंद्र में स्थापित होने से कोई रोक नहीं सकेगा लेकिन अगर वो अपने लेखन के दायरे का विस्तार नहीं कर पाएंगें तो बहुत संभव है उनकी हालत भी अमिताभ बच्चन के एंग्री यंग मैन के किरदार की तरह हो जाएगी जिसकी शुरुआत तो होती है ‘दीवार’ और ‘त्रिशूल’ जैसी फिल्मों से लेकिन अंत होता है ‘लाल बादशाह’ और ‘तूफान’ जैसी फिल्मों से। अमिताभ को भी तो सफलता के लिए परदे पर अपनी छवि बदलनी ही पड़ी थी।

Saturday, December 10, 2016

भाषा के भंवर से मुक्त साहित्य

भवानी प्रसाद मिश्र की एक कविता हैं जिस तरह हम बोलते हैं /उस तरह तू लिख/और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख/चीज़ ऐसी दे कि जिसका स्वाद सिर चढ़ जाए/ बीज ऐसा बो कि जिसकी बेल बन बढ़ जाए । इस कविता में कवि साफ तौर पर लेखकों को चुनौती देते हुए दिख रहे हैं कि जिस तरह से आप बोलते हैं उसी तरह से लिखें । दरअसल हिंदी साहित्य में ये बड़ी समस्या है कि लेखक जब लिखने बैठते हैं तो वो अलग किस्म की हिंदी लिखते हैं और जब वो बोलते हैं तो अलग किस्म की हिंदी सामने आती है । भवानी प्रसाद मिश्र यही कह रहे हैं कि जिस तरह से लेखक बोलते हैं उसी तरह से लिखें और फिर बड़ा बनकर दिखाएं । लिखने और बोलने की भाषा में फर्क होता है लेकिन चुनौती यही रहती है कि किस तरह से पात्रों और परिवेश के मुताबिक भाषा का इस्तेमाल किया जाए । इस बात पर लंबी बहस की गुंजाइश भी बनती है । एक दिन कहानीकार और उपन्यासकार रत्नेश्वर से इस विषय पर बात हो रही थी तो उन्होंने जो बात कही उसको रेखांकित किया जाना जरूरी है । हमारा तर्क ये था कि पात्र अपने परिवेश के हिसाब से संवाद करें और मैंने अपने तर्क के समर्थन में रेणु के मैला आंचल के पात्रों का उदाहरण दिया । रत्नेश्वर का तर्क था कि परिवेश के हिसाब से भाषा होनी चाहिए लेकिन अगर बिल्कुल ही उसकी भाषा में बात होगी तो फिर पाठकों को समझने में दिक्कत होगी । उन्होंने मैथिली का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर पात्र दरभंगा से है और वो खालिस मैथिली में बात करेगा तो हिंदी के राजस्थान और मध्यप्रदेश के पाठकों को समझने में दिक्कत होगी । उनका कहना था कि पात्रों की बोली वाणी में उसके परिवेश का पुट होना चाहिए लेकिन पूरी तरह से स्थानीय भाषा में लिखकर पाठकों की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए । रत्नेश्वर के तर्कों में दम है लेकिन भवानी प्रसाद मिश्र जिस ओर संकेत कर रहे थे उसका मतलब यह है कि साहित्यक कृतियों में जानबूझकर ऐसे शब्द नहीं ठूंसे जाने  चाहिए जिसको समझने में पाठकों को दिक्कत हो । उससे पाठकों पर लेखक का रौब तो गालिब हो सकता है लेकिन पाठकों का प्यार भी मिल जाए यह आवश्यक नहीं है ।
हिंदी में इन दिनों युवा लेखकों की एक ऐसी पीढ़ी आई है जो अपने आसपास के परिवेश पर इसी बोली वाणी में उपन्यास लिख रही है । अपनी उम्र और अपनी जिंदगी में बोली जानेवाली भाषा को पात्रों के माध्यम से कृतियों में उतार रही है । कई लोगों को इसपर ऐतराज भी है कि इससे भाषा भ्रष्ट हो रही है । भाषा की मर्यादा नष्ट की जा रही है । भाषा के व्यावकरण के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है लेकिन ये पीढ़ी है कि मानने को तैयार नहीं है । इनका तर्क वही है कि पात्र तो वही बोलेगा जो वो असल जिंदगी में बोलता है । बहुत हद तक यह बात सही हो सकती है कि पात्र वही बोलेगा जो वो हकीकत में बोलता है । वो तो इसको यथार्थवादी कृति कहकर शान से हिंदी के मैदान में डटे हैं । इस तरह के उपन्यासों की ऑनलाइन बिक्री के आंकड़ों से उनके हौसले भी बुलंद हैं । दरअसल होता यह है कि सफलता के बाद वो फॉर्मूला मान्य भी हो जाता है । जब कोई फॉर्मूला मान्य होता है तो उसको अपनाने वालों की संख्या भी बढ़ जाती है । कुछ ऐसा ही इस तरह की कृतियों के साथ भी हो रहा है ।
अभी उपन्यासकार सत्य व्यास का दूसरा उपन्यास दिल्ली दरबार छपा है । इसके पहले छपा उनका उपन्यास बनारस टॉकीज भी काफी पढ़ा गया था और उसकी जमकर तारीफ भी हुई थी । उनके नए उपन्यास का नायक राहुल मिश्रा का जो चरित्र है वो छोटे शहरों से दिल्ली में आकर रहनेवाले लड़कों के मनोविज्ञान को बहुत तक सामने लाता है । दिल्ली में किराए का कमरा, मकान मालिक की लड़की से मोहब्बत, मोहब्बत की मुसीबत आदि आदि । लेकिन जो सबसे चौंकानेवाली बात है वो यह है कि इसकी भाषा पूरी तरह से वही है जिसमें विश्वविद्यालय के छात्र आपस में बात करते हैं । भाषा कैसी होगी इस बात के संकेत वो उपन्यास शुरू करते ही दे देते हैं । जरा देखिए- ‘उस रोज दो घटनाएं हुईं । दिन में मोहल्लेवालों ने शुक्ला जी कीटीवी पर रामायण देखा था और रात में महाभारत हो गया था । दिन में सीता जी अपनी कुटिया से गायब हुई थी और रात में गीताजी ( शुक्ला जी की बेटी) अपनी खटिया से । सीता जी जब गायब हुईं तो रावण के पुष्पक विमान पर नजर आईं । गीता जी जब गायब हुई तो पुजारी जी के मचान पर नजर आईं । रावण ने सीताहरण में बलप्रयोग किया था । पुजारी जी के बेटे देवदत्त ने गीतावरण में लव प्रयोग किया था । सीता जी को पुष्पक पर जटायु ने देखा था और उन्हें बचाने की भरपूर कोशिश की थी । गीता जी को पुजारी के मचान पर जटाशंकर चाचा ने देख लिया था और बात फैलाने में कोई कोताही नहीं की थी ।‘ इसके अलावा दो मित्र एक लड़की के बारे में बात करते हैं – ‘क्या हुआ बे । जान बहुत नाराज नजर आई आज ? मैंने कमरे में घुसते ही पूछा । जान के पप्पा की बिग टाइम लंका लगी है । राहुल ने कपड़ा मुंह में ठूंस कर हंसी रोकते हुए कहा ।‘ इस तरह के कई प्रसंग इसी भाषा में इस उपन्यास में हैं । पाठतीयता गजब की है जो पढ़नेवालों को बगैर खत्म किए उठने नहीं देती है । इसी तरह से अगर हम देखें तो दिव्यप्रकाश दुबे की कृतियां मुसाफिर कैफे, मसाला चाय और टर्म्स और कंडीशन अपप्लाई भी पाठकों को खूब भाईं । अनु सिंह चौधरी की मम्मा की डायरी भी अपने फॉर्म और भाषा की वजह से खूब पढ़ी गई और बिकी भी । ऐसे कई और लेखक हैं जो मिलकर एक नई पीढ़ी का निर्माण कर रहे हैं ।

पहले दो चार लेखक इस तरह के उपन्यास लिख रहे थे लेकिन अब तो कई लेखक सामने आ गए हैं और वो हिंदी की स्थापित भाषा को चुनौती दे रहे हैं । इस चुनौती को मान्यता भी मिलनी शुरू हो गई है लेकिन ये देखना दिलचस्प होगा कि इस तरह का लेखन हिंदी साहित्य में स्थापित हो पाता है या फिर वो समय के साथ इतिहास में बिला जाता है । यह आशंका इस वजह से भी है कि करीब दो साल पहले हिंदी में लप्रेक को लेकर खूब शोर शराबा हुआ । दो तीन लप्रेक लेखकों की किताबें छपीं और उनमें से एकाध की बिकी भी, चर्चा भी हुई लेकिन अब उसका शोर थम गया है । लप्रेक यानि लघु प्रेम कथा जो कि सोशल मीडिया आदि पर लिखी जा रही थी । उसके शोर शराबे को देखकर उस वक्त ऐसा लग रहा था जैसे साहित्य में एक नए विधा का जन्म हो रहा है लेकिन वो स्थायी नहीं हो पाया । जैसे अस्सी के दशक में लघुकथा का बहुत शोर मचा था । उस वक्त भी इस तरह की बातें होने लगी थीं कि हिंदी साहित्य में एक नई विधा का आगमन हुआ है और कुछ उत्साही आलोचक उसको साहित्यक क्रांति के तौर पर पेश भी करने लगे थे जैसे कि लप्रेक को लेकर कुछ आलोचकनुमा लेखक बहुत उत्साहित हो गए थे । वो शोर भी वक्त के साथ थम गया और अब बहुत कम लेखक लघुकथा को अपना रहे हैं, नए लेखक तो लगभग ने के बराबर इस विधा में हाथ आजमा रहे हैं   । किसी भी विधा को स्थायित्व मिलने में काफी वक्त लगता है, और उस वक्त का इंतजार किया जाना चाहिए ।

दरअसल साहित्य में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने की हड़बड़ी बहुधा साहित्यक गड़बड़ियों को जन्म देती है । साहित्य में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के पहले ठहरकर, सोच-समझकर किसी निर्णय पर पहुंचना चाहिए । सत्य व्यास, दिव्यप्रकाश दूबे, अनुसिंह चौधरी आदि लेखकों ने जो नया रास्ता अपनाया है उसका स्वागत किया जाना चाहिए, इनका इत्साह भी बढ़ाया जाना चाहिए  लेकिन किसी नतीजे पर पहुंचने के पहले आलोचकों को इंतजार भी करना चाहिए क्योंकि भवानी प्रसाद मिश्र कहते हैं कि चीज़ ऐसी दे कि जिसका स्वाद सिर चढ़ जाए/ बीज ऐसा बो कि जिसकी बेल बन बढ़ जाए ।  अब इस चीज के स्वाद का सिर चढ़ने के लिए तो इंतजार ही करना होगा, इस बीज के बेल बनकर फैलने का भी इंतजार करना होगा क्योंकि साहित्यक चीज और साहित्यक बीज दोनों को फैलने में और अपना प्रभाव छोड़ने में वक्त लगता है ।