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Sunday, July 10, 2016

साहित्य के चुनावी हथकंडे

सांप्रदायिकता- ये एक ऐसा विषय है जो हमारे पढ़े लिखे समाज के एक वर्ग को हमेशा से मथता रहता है । हमारे इस बौद्धिक वर्ग को सांप्रदायिकता के खिलाफ बार-बार खड़ा भी होना पड़ता है । होना भी चाहिए ।  हमारे समाज का ये कथित बौद्धिक वर्ग सांप्रदायिकता को लेकर तब और भी उद्वेलित होने लगता है जब राज्यों या केंद्र में मनमाफिक सरकारें ना हों । एक विचारधारा विशेष के आवरण में लिपटे ये लोग सांप्रदायिकता तो कई बार असहिष्णुता तो कभी अभिवयक्ति की आजादी पर आसन्न खतरे को लेकर व्याकुल नजर आते हैं । इनकी ये व्याकुलता नाटकों, लेखों से लेकर पुरस्कार वापसी तक में नजर आती है । सांप्रदायिकता के इन चैंपियनों को ये विषय तब और परेशान करने लगता है जब देश के किसी हिस्से में चुनाव आदि की आहट सुनाई देने लगती है । ताजा मामला सामने आ रहा है कर्नाटक से जहां से खबर आ रही है कि थिएटर एक्टिविस्ट प्रसन्ना महात्मा गांधी की उन्नीस सौ नौ में लिखी किताब हिंद स्वराज के आधार पर एक नाटक तैयार किया है जिसका मंचन पूरे कर्नाटक में किया जाएगा । योजना के मुताबिक अलग अलग गांवों के अलावा इसका मंचन स्कूल और कॉलेजों में भी किया जाएगा । इस नाटक का उद्देश्य सांप्रदायिकता के खतरों से लोगों को आगाह करना है । हिंद स्वराज गांधी की ऐतिहासिक किताब है जिस पर पहले ब्रिटिश शासकों ने प्रतिबंध लगा दिया था । मूल रूप से गुजराती में लिखी गई इस किताब का बाद में अंग्रेजी में अनुवाद हुआ और फिर कई अन्य भाषाओं में अनुदित होकर छपा और लोगों को गांधी के इस विचार को जानने  समझने का मौका मिला ।
इस किताब के आधार पर तैयार किए गए नाटक को प्रसन्ना ने संपादित कर आधुनिक रूप देने की कोशिश की है । प्रसन्ना ने तो ये भी दावा किया है कि कुछ अंशों को जस का तस रखा गया है जैसा बापू ने लिखा था । इस नाटक में गांधी एक जगह कहते हैं – गाय को बचाने के लिए क्या मुझे किसी मुसलमान से लड़ना चाहिए या उसकी हत्या कर देनी चाहिए ? अगर हमने ऐसा किया तो हम मुसलमानों के दुश्मन बन जाएंगे और गायके भी । गाय संरक्षण का एकमात्र तरीका जो मैं जानता हूं, वह यह है कि मैं अपने मुसलमान भाइयों से हाथ जोड़कर अनुरोध करूं । अगर वो मेरी बात नहीं सुनते हैं तो मुझे गाय को छोड़ देना चाहिए, यह मानकर कि ये मामला मेरे वश का नहीं है । अब यहीं से चुनिंदा जानकारी देने का खेल शुरू होता है । मोहनदास करमचंद गांधी एक ऐसी शख्सियत थे जो अपने विचारों को लगातार परिमार्जित करते रहते थे । सत्य और अहिंसा दो ही ऐसी अवधारणा दिखाई देती है जिसका परिमार्जन बापू के लेखन में नहीं दिखाई देता है अन्यथा वो अपने विचारों को लगातार अपडेट करते रहे हैं । मैं जो कह रहा हूं वो अपने अध्ययन के आधार पर कह रहा हूं । बापू ने विपुल लेखन किया है औप उसको पूरा पढ़ने का दावा कम ही लोग कर सकते हैं ।
गोरक्षा पर बापू के विचार उन्नीस सौ नौ में जो थे उससे किसी को इंकार नहीं है । किसी भी स्तर पर किसी भी तरह की हिंसा अक्षम्य है और हिंसा करनेवाले को कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए । लेकिन बापू ने छह अक्तूबर उन्नीस सौ इक्कीस में यंग इंडिया में गोरक्षा पर क्या लिखा ये देखने की जरूरत है – हिन्दु धर्म की मुख्य वस्तु है गोरक्षा । गोरक्षा मुझे मनुय के सारे विकासक्रम में सबसे अलौकिक वस्तु मालूम हुई है । ...हिन्दुस्तान में गाय ही मनुष्य का सबसे सच्चा साथी, सबसे बड़ा आधार था । यही हिन्दुस्तान की कामधेनु थी । वह सिर्फ दूध ही नहीं देती थी, बल्कि सारी खेती का आधार स्तंभ थी । गाय दया धर्म की मूर्तिमंत कविता है । इस गरीब और शरीफ जानवर में हम केवल दया ही उमड़ती देखते हैं । यह लाखों करोड़ों हिन्दुस्तानियों को पालनेवाली माता है । इस गाय की रक्षा करना ईश्वर की सारी मूक सृष्टि की रक्षा करना है । जिस अज्ञात ऋषि या द्रष्टा ने गोपूजा चलाई उसने गाय से शुरुआत की । इसके सिवा कोई और ध्येय हो ही नहीं सकता है । गोरक्षा हिन्दू धर्म की दुनिया को दी हुई एक कीमती भेंट है । और हिंदू धर्म भी तभी तक रहेगा, जबतक गाय की रक्षा करनेवाले हिन्दू हैं ।‘  आखिरी पंक्ति पर ध्यान देने की जरूरत है । ईमानदारी तो यही होती कि गोरक्षा पर गांधी के विचारों को समग्रता में जनता के सामने रखा जाता । गांधी ने इसके बाद भी समय समय पर काल और परिस्थिति के हिसाब से गोरक्षा पर अपने विचार रखे हैं जो यंग इंडिया के सात जुलाई उन्नीस सौ सत्ताइस और हरिजन सेवक के इक्कीस सितंबर उन्नीस सौ चालीस के अंक में प्रकाशित हैं । सवाल फिर वहीं आकर खड़ा हो जाता है कि हम चुनिंदा तरीके से किसी बात को पेश करके हासिल क्या करना चाहते हैं । क्या ये बौद्धिक बेइमानी नहीं है । या फिर किसी खास मकसद से नहीं किया जा रहा है
कर्नाटक में दो हजार अठारह में विधानसभा चुनाव हैं । इलस वक्त वहां कांग्रेस की सरकार है और बीजेपी ने येदियुरप्पा को वहां की कमान सौंप कर अपने इरादे साफ कर दिए हैं । कर्नाटक में कांग्रेसी मुख्यमंत्री की कार्यशैली को लेकर उनकी खुद की ही पार्टी के लोग उको कठघरे में खड़े कर चुके हैं । देवगौडा की पार्टी जेडीएस अभी आंतरिक संघर्षों से ही जूझ रही है । ऐसे माहौल में हिंद स्वाराज का गांव-गांव में जाकर मंचन और सांप्रदायिकता के खिलाफ लोगो के जागरण के मंसूबों के एलान राजनीति के आंगन का नाच दिखाई देता है । इन नाटकों का मंचन कन्नड़ और अंग्रेजीमें होगा और एक कैंपेन की तरह से किया जाएगा ताकि कर्नाटक में संप्रदायिकता के खिलाफ लोग जागृत हो सकें । इल कैंपेन से जुड़े लोग जिस तरह की बोली बोल रहे हैं वो भी उनकी प्रतिबद्धता को साफ करते हैं । हिटलर, नाजी शासन आदि शब्दावली का उपयोग धड़ल्ले से हो रहा है । एक बार फिर से सवाल वही कि चुनाव के वक्त क्यों । क्या कर्नाटक में सांप्रदायिकता इस वक्त का मुद्दा है । क्या उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिकता कोई मुद्दा नहीं है जहां दोनों पक्ष के लोग इस मसले को हवा देकर सियासी फसल काटने की कोशिश में जुटे हैं । यहां की सरकार को लेकर हमारे बौद्धिकों का एक वर्ग कमोबेश खामोश रहता है ।
पाठकों को याद होगा कि बिहार चुनाव के वक्त किस तरह से पुरस्कार वापसी को लेकर माहौल बनाने की कोशिश की गई थी । छोटे मोटे धरने आदि भी असहिष्णुता के खिलाफ दिए गए थे । मुंह पर काली पट्टी बांधे चंद लेखकों का साहित्य अकादमी के बाहर जमावड़ा भी हुआ था लेकिन चुनाव में बीजेपी की पराजय के बाद सब शांत हो गया । क्या देश की स्थिति, अगर खराब थी तो , ठीक हो गई । क्या असहिष्णुता समाप्त हो गई । क्या सांप्रदायिकता की जगह सांप्रदिक सौहार्द ने ले ली । नहीं । स्थिति कमोबेश वैसी ही है । मीडिया में इस तरह की भी खबरें हैं कि पुरस्कार वापसी के कुछ अगुवा बिहार सरकार से पद आदि की ख्वाहिश भी जता चुके हैं । खैर ये अवांतर प्रसंग होगा जिसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी । पानसरे, दाभोलकर और कालबुर्गी हत्याकांड की जांच की प्रगति को देखें तो येसाफ हो जाएगा कि कौन सी सरकार कितना आगे बढ़ा पाई है ।
दरअसल साहित्य, कला और संस्कृति को भी हमारे विचारधारा से सराबोर लेखकों ने राजनीति का अखाड़ा बना दिया है । इसके लिए बहुत हद तक लेखक संगठन जिम्मेदार हैं जो विभिन्न कम्युनिस्ट पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम करते रहे । नतीजा यह हुआ कि इन संगठन से जुडे लेखक उस राजनीतिक दल के कार्यकर्ता बनकर रह गए । मुझे याद है कि अस्सी के दशक में साहित्यक कार्यक्रमों में इस बात का उल्लेख किया जाता था कि अमुक लेखक सीपीआई का होल टाइमर या कार्ड होल्डर रहा है । और ये बात साहित्यक मंच पर बेहद गर्व से बताई जाती थी और हम जैसे नए लोगों से ये अपेक्षा की जाती थी कि उन होल टाइमर को बड़ा लेखक मानें । साहित्य को समाज के आगे चलनेवाली मशाल से राजनीति का पिछलग्गू बना देने की जिम्मेदारी इन लेखक संगठनों और इनके कर्ताधर्ताओं पर है । अब जब ये लेखक संगठन कमजोर हो गए हैं तो अलग अलग तरीके से व्यक्तिगत प्रयासों से राजनीति की जा रही है । कर्नाटक में सांप्रदायिकता के खिलाफ माहौल बनाना एक अच्छी पहल है । इसका स्वागत होना चाहिए लेकिन जिस तरीके से गांधी के गोरक्षा पर विचारों को समग्रता में पेश नहीं किया जा रहा है वो खतरनाक और चिंता की बात है । और यही बात उनकी मंशा को भी संदेहास्पद बनाती है ।    


Wednesday, February 24, 2016

हिंदी की स्वीकार्यता से उपजी कुंठा ·

अदूर गोपालकृष्णन का नाम फिल्म जगत में बेहद आदर के साथ लिया जाता है । उन्होंने अपनी कला प्रतिभा के बल पर मलयालम सिनेमा में क्रांतिकारी परिवर्तन किया जिसकी पूरी दुनिया में सराहना हुई । अदूर ने उन्नीस सौ बहत्तर में अपनी फिल्म स्वयंवरम के माध्यम से मलयाली फिल्मों में नए युग की शुरुआत की थी । लेकिन हाल ही में अदूर ने हिंदी भाषा को लेकर एक ऐसा बयान दिया जो उनकी सोच पर सवाल खड़े कर देती है । अदूर ने कहा कि हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है और वो हो भी नहीं सकती है । अदूर के मुताबिक कोई भी भाषा, राष्ट्रभाषा तब हो सकती है जब वो देश के सभी लोगों द्वारा बोली जाए ।  उन्होंने इस बात को जोर देकर कहा कि हिंदी एक क्षेत्रीय भाषा है और उसको उसके साथ उसी तरह का बर्ताव किया जाना चाहिए । अदूर एक बेहतरीन फिल्मकार हैं लेकिन भाषा को लेकर उनकी समझ इतनी हल्की है इस बात का अंदाज देश को नहीं था । सवाल हिंदी को थोपने का भी नहीं है उसकी स्वीकार्यता बढ़ाने का है । गांधी जी ने राष्ट्रभाषा की जो अपेक्षा बताई थी उसके मुताबिक उस भाषा को भारत के ज्यादातर लोग बोलते हों, वह भाषा राष्ट्र के लिए आसान हो, उस भाषा से भारत का आपसी धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक काम-काज हो सकना चाहिए और उस भाषा का विचार करते समय क्षणिक या कुछ समय तक रहनेवाली स्थिति पर जोर न दिया जाए । गांधी जी के बताए इन लक्षणों पर हिंदी भाषा पूरे तौर पर खरी उतरती है । गांधी ने खुद माना था कि हिंदी भाषा में ये सारे लक्षण मौजूद हैं और इससे होड़ लेनेवाली दूसरी भाषा भारत में नहीं है । 20 अक्तूबर 1917 को भरुच में गुजरात शिक्षा परिषद के अध्यक्ष पद के अपने भाषण में गांधी ने कहा था कि यह कहना ठीक नहीं है कि मद्रास और दक्षिण के प्रांतों में अंग्रेजी के बिना काम नहीं चलता है । गांधी के मुताबिक ठेठ द्रविड़ प्रांत में भी हिंदी की आवाज सुनाई देती है । इसमें ये जोड़ा जा सकता है कि अब तो और मजबूती से सुनाई देती है ।

दरअसल अदूर गोपालकृष्णन जैसे विद्वान लोग जब हिंदी को क्षेत्रीय भाषा करार देकर उसको अन्य भारतीय भाषाओं के साथ कोष्ठक में रखना चाहते हैं तब उसकी पृष्ठभूमि में एक भय रहता है । भय हिंदी के उनकी भाषा पर आक्रमण के और उसकी अस्मिता और पहचान के खो जाने की । अदूर जैसे विद्वान को यह समझना होगा कि हिंदी की स्वीकार्यता से किसी अन्य भाषा को कोई खतरा नहीं है । दक्षिण भारत की भाषाएं जिस तरह से आधुनिक काल में संस्कृत के शब्दों को अपनाकर अपनी जरूरतों को पूरा कर रही हैं, साथ ही भाषा की अस्मिता और पहचान भी बचाकर चल रही हैं, उसी तरह से हिंदी भी उनकी सहोदर भाषा के रूप में कंधे से कंधा मिलाकर चलने को तैयार है । दूसरी बात यह है कि जब हम हिंदी का विरोध करते हैं तो बेवजह भारतीय भाषाओं के बीच एक कटुता पैदा कर देते हैं । इस कटुता का फायदा अंग्रेजी के लोग उठाते हैं । अंग्रेजी के खैरख्वाहों का यह पुराना फॉर्मूला है कि भारतीय भाषाओं के बीच कटुता पैदा करो और फिर अंग्रेजी को संपर्क भाषा के रूप में मजबूत करो । लेकिन नब्बे के दशक में जब से बाजार खुला है तो हिंदी का भी व्यापक रूप से प्रसार प्रचार हुआ है । अब चेन्नई और केरल में भी हिंदी एक संपर्क भाषा के रूप में मजबूती से अपने को स्थापित कर चुकी है । आज चेन्नई और बेंगलुरू और त्रिवेनद्रम में टैक्सी और होटल वाले हिंदी समझते और बोलते हैं । हिंदी फिल्मों और सीरियल के अलावा इंटरनेट के फैलाव ने भी इस प्रवृत्ति को मजबूत किया । इसलिए जब अदूर गोपालकृष्णन जैसे लोग हिंदी के खिलाफ सार्वजनिक मंचों पर बोलते हैं तो उसमें उनकी कुंठा परिलक्षित होती है जो हिंदी की बढती स्वीकार्यता से उपजती है । 

Sunday, May 17, 2015

दूरगामी असर का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान में मिली अभिव्यक्ति की आजादी पर अपने ताजा ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि किसी भी व्यक्ति को इस मसले पर पूर्ण आजादी नहीं है । अदालत के मुताबिक संविधान ने इस आजादी के साथ कुछ सीमाएं भी निर्धारित की हैं । अदालत के मुताबिक धारा 19(1) और 19(2) को एक साथ मिलाकर देखने पर स्थिति साफ होती है । सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले में कहा कि कलात्मक अजादी के नाम पर लेखकों और कलाकारों को भी अपने माहापुरुषों के बारे में अभद्र और अश्लील टिप्पणी की छूट नहीं मिल सकती । लेखकों को भी शालीनता के समसामयिक सामुदायिक मापदंडों की सीमा लांघने की अनुमति नहीं दी जा सकती । दरअसल ये पूरा मामला 1994 में महात्मा गांधी पर छपी एक कविता को लेकर उठे विवाद पर दिया गया है । सुप्रीम कोर्ट के महात्मा गांधी पर लिखी एक कविता के ताजा फैसले के संदर्भ में मराठी के मशहूर लेखक श्रीपाद जोशी की आत्मकथा का 1939 का एक प्रसंग याद आ रहा है । एक अक्तूबर 1939 को महात्मा गांधी ग्रैंड ट्रंक एक्सप्रेस से वर्धा से दिल्ली जा रहे थे । उनके डिब्बे में अचानक एक युवक पहुंचता है  जिसके हाथ में गोविंद दास कौंसुल की अंग्रेजी में लिखी एक किताब महात्मा गांधी, द ग्रेट रोग ( Rogue) ऑफ इंडिया थी । वो गांधी जी से अपने गुरू कौंसुल की किताब पर प्रतिक्रिया लेना चाहता था । गांधी के साथ बैठे महादेव देसाई ने जब किताब का शीर्ष देखा तो गुस्सा हो गए और उसे भगाने लगे । शोरगुल होता देख बापू ने उस युवक को अपने पा बुलाया और उसके हाथ से वो किताब ले ली और पूथा कि आप क्या चाहते हैं । युवक ने गांधी जी को बताया कि वो इस किताब पर उनका अभिप्राय लेना चाहता है । गांधी जी ने कुछ देर तक उस किताब को उलटा पुलटा और फिर उसपर लिखा- मैंने इस किताब को पांच मिनट उलट पुलटा है, अभी इस किताब पर निश्चित रूप से पर कुछ पाना संभव नहीं है । लेकिन आपको अपनी बात अपने तरीके से कहने का पूरा हक है । उसके बाद उन्होंने किताब पर दस्तखत किया और उसको वापस कर दिया। ठीक इसी तरह से जब 1927 में अमेरिकन लेखक कैथरीन मेयो ने मदर इंडिया लिखी और उसमें भारत के बारे में बेहद अपमानजनक टिप्पणी की तब भी गांधी जी ने उस किताब पर प्रतिबंध लगाने की मांग का समर्थन नहीं किया था । गांधी जी ने उस किताब की विस्तृत समीक्षा लिखकर मेयो के तर्कों को खारिज किया था और अपना विरोध जताया था । उसी वर्ष अंग्रेजों ने भारतीय दंड संहिता में सेक्शन 295 ए जोड़ा तो उसको अभिव्यक्ति की आजादी पर कुठाराघात के तौर पर देखा गया था और उसका जमकर विरोध हुआ था । लाला लाजपत राय ने पुरजोर तरीके से इसका विरोध करते हुए कहा था कि यह धारा आगे चलकर अकादमिक कार्यों में बाधा बनेगी और सरकारें इसका दुरुपयोग कर सकती हैं ।
दरअसल अगर हम देखें तो लाला लाजपत राय की बातें आगे चलकर सही साबित हुईं । संविधान के पहले संशोधन, जिसमें अभिव्यक्ति की आजादी के दुरुपयोग की बात जोड़ी गई, के वक्त उसको लेकर जोरदार बहस हुई थी । तमाम बुद्धिजीवियों के विरोध के बावजूद उस वक्त वो संशोधन पास हो गया था । अब हालात यह हो गई है कि संविधान के पहले संशोधन और 295 ए मिलकर अभिव्यक्ति की आजादी की राह में एक बड़ी बाधा बन गई है । इन दोनों को मिलाकर किसी भी किताब या रचना पर पाबंदी लगाने का चलन ही चल पड़ा है । हमारे यहां लोगों की भावनाएं इस कदर आहत होने लगीं कि हम रिपब्लिग ऑफ हर्ट सेंटिमेंट की तरफ कदम बढ़ाते दिखने लगे । अब सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से देश के महापुरुषों को लेकर टिप्पणी करने को गलत ठहराया है उससे और बड़ी समस्या खड़ी होनेवाली है । एक पूरा वर्ग अब इस फैसले की आड़ में मिथकीय चरित्रों या देवी देवताओं पर टिप्पणी, उनके चरित्रों के काल्पनिक विश्लेषण की लेखकीय आजादी पर हमलावर हो सकता है । संविधान सभा की बहस के दौरान बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि उदारतावादी गणतंत्र बनाने के सपने के अपने खतरे हैं । उन्होंने उस वक्त कहा था कि अगर हम इस तरह का गणतंत्र चाहते हैं तो सामाजिक पूर्वग्रहों के उपर हमें संवैधानिक मूल्यों को तरजीह देनी होगी । सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले के बाद एक बार फिर से सवाल खड़ा हो गया है कि क्या संविधान की व्याख्या करते वक्त सामाजिक मानदंडों का ध्यान रखना जरूरी है ।


Saturday, September 14, 2013

हिंदी की उपेक्षा क्यों ?

आज हिंदी के लेखकों में इस बात को लेकर खासा क्षोभ दिखाई देता है कि उनको मीडिया, खासकर अंग्रेजी मीडिया में जगह नहीं मिलती । हालात यह है कि बड़े से बड़ा हिंदी का कवि या लेखक बड़े से बड़ा पुरस्कार पा जाए , उसकी नई कृति आ जाए और वो हिंदी समाज में चर्चित हो जाए या फिर किसी स्थापित लेखक या बुजुर्ग लेखक का निधन हो जाए । अंग्रेजी के अखबार या न्यूज चैनल उसकी नोटिस ही नहीं लेते हैं । अव्वल तो खबर नहीं ली जाती या फिर अगर ली भी जाती है तो उसको ऐसी जगह दी जाती है जो एकदम से महत्वहीन होती है और पाठकों की नजर वहां तक पहुंच ही नहीं पाती है । हां अगर लेखक फिल्मों से जुडा़ हो या फिर उसकी कोई साहित्येत्तर पहचान हो तो अंग्रेजी मीडिया उसको जमकर तवज्जो देते हैं । कमलेश्वर जी के निधन के बाद अंग्रेजी के अखबारों ने उनपर श्रद्धांजलि के लेख इस वजह से छापे कि वो हिंदी के साहित्यकार के अलावा फिल्म लेखन और दूरदर्शन के शुरुआती दौर से जुड़े थे । थोड़ा बहुत श्रीलाल जी के निधन पर भी अंग्रेजी अखबारों ने छापा । क्या इनको अंग्रेजी अखबारों में जितनी जगह दी गई वह काफी था । कतई नहीं वो इससे ज्यादा के हकदार थे । हम कह सकते हैं कि यह स्थिति अचानक से पैदा नहीं हुई । आजादी के बाद से हिंदी साहित्य के बारे में, हिंदी उपन्यासों के बारे में , हिंदी कवियों और लेखकों के बारे में अंग्रेजी के अखबारों में लगातार लेख छपते रहे हैं । हिंदी साहित्य में यह माना जाता है कि फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यास मैला आंचल की पहली समीक्षा नलिन विलोचन शर्मा ने लिखी थी । लेकिन यह तथ्य नहीं है । फणीश्वर नाथ रेणु के मैला आंचल की पहली समीक्षा 15 जुलाई 1955 के एक अंग्रेजी अखबार में अ नॉवेल ऑफ रूरल बिहार के शीर्षक से छपी थी और उसे शामलाल ने लिखा था । उसी लेख से यह भी पता चलता है कि फणीश्वर नाथ रेणु का यह उपन्यास पहले समता प्रकाशन, पटना ने छापा था और बाद में वो राजकमल प्रकाशन से छपा । इसकी भी एक लंबी कहानी है लेकिन वो विषयांतर हो जाएगा ।
आजादी के बाद के कई दशक तक अंग्रेजी के अखबारों में हिंदी लेखकों की किताबों पर गंभीर लेख छपा करते थे । स्वयं शाम लाल जैसे अंग्रेजी के संपादक ने प्रेमचंद, जैनेन्द्र, मुक्तिबोध और निर्मल वर्मा की किताबों पर विस्तार से लिखा, साथ ही उस दौर के कवि और कविताओं पर भी गंभीर लेख लिखा था । शामलाल तो हिंदी कवियों पर कविता की नई प्रवृतियों पर अस्सी के दशक तक लिखते रहे । उन्होंने भोपाल की एक कवि गोष्ठी के बहाने से पहला सप्तक से लेकर उस वक्त तक की कविताओं पर एक आलोनात्मनक लेख अंग्रेजी में लिखा था । उस लेख को पढ़कर गैर हिंदी भाषी लोग भी हिंदी कवि नेमिचंद्र जैन से लेकर श्रीकांत वर्मा से लेकर विजयदेव नारायण साही से लेकर रघुवीर सहाय की कविताओं से परिचित हो सकते हैं ।  शामलाल के अलावा अन्य अंग्रेजी अखबारों के संपादक और वरिष्ठ पत्रकारों ने भी श्रीकांत वर्मा से लेकर अज्ञेय की किताबों और उनके रचनाकर्म पर गंभीरता से विमर्श किया है । वह दौर था जब हिंदी के आयोजनों में अंग्रेजी के संपादकों और लेखकों को आमंत्रित किया जाता था । लेकिन सत्तर के दशक के मध्य से अंग्रेजी का हिंदी के प्रति भाव उदासीन होने लगा । अंग्रेजी अखबारों में हिंदी के लेखकों, कवियों और उपन्यासकारों और उनके रचनाकर्म पर छपना कम होता चला गया ।  जिन अखबारों में मुक्ति बोध की मृत्यु की खबर मुखपृष्ठ पर फोटो के साथ छपी थी उसी अखबार ने श्रीलाल शुक्ल की मौत की खबर को अंदर के पन्नों पर छोटी सी जगह दी । जो अंग्रजी के लेखक हिंदी की किताबों पर लिखते थे उन्होंने कन्नी काटनी शुरू कर दी । यह एक बहुत गंभीर सवाल है । आज हम साहित्य के पाठकों की कमी के लिए छाती कूटते हैं लेकिन उस कमी के मूल कारण में नहीं जाते हैं । आज हम कोई ऐसा उपक्रम नहीं कर रहे हैं जिससे नया पाठक वर्ग संस्कारित हो सके । इसके पीछे के कारणों को ढूंढना होगा । आज अगर आप अपनी भाषा और संस्कृति की बात करेंगे तो आपको फौरन से पेशतर संघी करार दे दिया जाएगा और वो भी इस तरह से कि आपको लगेगा कि कोई जुर्म हो गया । गोया कि अपनी भाषा और संस्कृति के विकास की बात करना और उसपर गर्व करना गुनाह हो । हुआ यह कि हमने अपनी भाषा और उसकी ताकत पर गर्व करना छोड़ दिया । इसका नतीजा यह हुआ कि दूसरी भाषा के लोगों को लगने लगा कि हिंदी और हिंदुस्तान की संस्कृति की बात कहने से उनपर भी एक खास किस्म का ठप्पा लग जाएगा । लिहाजा अंग्रेजी के लोगों ने हिंदी से किनारा करना शुरू कर दिया । हमने भी अपनी भाषा का दामन छोड़ दिया और अंग्रेजी के पीछे भागने लगे । आजादी के कई साल बाद तक हिंदी के लोग गर्व से ये कहते थे कि वो हिंदी भाषी हैं और उन्हें अंग्रेजी नहीं आती । गर्व से अंग्रेजी नहीं आने की बात सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने का जो साहस था उससे हिंदी को एक मजबूती मिलती थी । महात्मा गांधी ने भी 15 अगस्त 1947 को बीबीसी को दिए एक संदेश में साफ तौर पर इसकी ओर इशारा किया था- समाज की जो हम सबसे बड़ी सेवा कर सकते हैं, वह यह है कि हमने अंग्रेजी भाषा की शिक्षा के प्रति जो अन्धविश्वासपूर्ण सम्मान करना सीखा है, उससे स्वयं मुक्त हों और समाज को मुक्त करें । लेकिन हिंदी समाज ने गांधी की इस बात को नहीं माना और अंग्रेजी के प्रति लगातार हमारा अंधविश्वासपूर्ण सम्मान बढ़ता चला गया । नतीजा यह हुआ कि हम अपनी भाषा को छोड़कर एक विदेशी भाषा में प्रतिष्ठा तलाशने लगे । अंग्रेजी को लेकर हिंदी के लोगों में एक खास किस्म की हीन भावना घर कर गई । धड़ल्ले से हिंदी बोलनेवाले लोग भी जब किसी मॉल की भव्य दुकान के अंदर जाते हैं तो वहां घुसते ही एक्सक्यूज मी का जयकारा लगाते हैं । शानदार हिंदी बोलनेवाले भी टूटी फूटी अंग्रेजी बोलकर अपने को धन्य समझते हैं । इस तरह के वातावरण को देखकर अंग्रेजी वालों के मन में हिंदीवालों के प्रति एक उपहास का माहौल बना जो कालांतर में उनको हिंदी साहित्य से दूर लेकर चला गया ।  इस मानसिकता को प्रोफोसर यदुनाथ सरकार बेहतरीन तरीके से व्यक्त किया हमारे अंग्रेजी बोलने और सोचने से हमारे दिमाग पर इतना बोझ पड़ता है कि हम उससे कभी पूरी तौर पर मुक्त नहीं हो पाते हैं ।
हिंदी में कुछ शुद्धतावादी लेखक भी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं । जब भी जहां भी मौका मिलता है वो हिंदी के नाश के लिए अंग्रेजी को जिम्मेदार ठहराने लगते हैं । उन्हें लगता है कि अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग से हिंदी का नाश हो जाएगा । उनकी ये चिंता जायज हो सकती है लेकिन हिंदी के प्रयोग के आग्रह में वो इतने उत्साहित हो जाते हैं कि अंग्रेजी को दुश्मन की तरह पेश करने में जुट जाते हैं । जोश में होश खोते हुए अंग्रेजी भगाओ तक का नारा देने में जुट जाते हैं । अंग्रेजी के साइनबोर्ड तक पर कालिख पोतने का दौर चलाने लग जाते हैं । इससे नफरत का माहौल बनता है । इस तरह की बात अंग्रेजी के लोगों तक पहुंचेंगी तो उनकी स्वाभावित प्रतिक्रिया हिंदी को शांति से दरकिनार करने की होगी । आज अगर अंग्रेजी के लोग हिंदी को लेकर तटस्थ हैं तो उसके पीछे यह भी एक बड़ी वजह है । आज वक्त आ गया है कि हिंदी को मजबूत करने के साथ साथ हमें अंग्रेजी के प्रति दुश्मनी के भाव को त्यागना होगा । हिंदी साहित्य के मूर्धन्यों को अंग्रेजी के प्रति घृणा का भाव त्यागना होगा । साथ ही अपनी भाषा और संस्कृति पर हमें गर्व करना ही होगा । हमें दूसरों को इस बात के लिए मजबूर करना होगा कि हिंदी पर लिखे बिना तुम्हारा काम चलनेवाला नहीं है । अपनी रचनात्मक विस्फोट से उनका ध्यान खींचना होगा । हिंदी के लिए यह जरूरी है कि वो किसी भाषा से नफरत ना करे और ना ही उसके प्रति अंधविश्वासपूर्ण सम्मान प्रदर्शित करें ।

Wednesday, January 18, 2012

बार-बार वर्धा

दस ग्यारह महीने बाद एक बार फिर से वर्धा जाने का मौका मिला । वर्धा के महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के छात्रों से बात करने का मौका था । दो छात्रों - हिमांशु नारायण और दीप्ति दाधीच के शोध को सुनने का अवसर मिला । महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में यह एक अच्छी परंपरा है कि पीएच डी के लिए किए गए शोध को जमा करने के पहले छात्रों, शिक्षकों और विशेषज्ञों के सामने प्रेजेंटेशन देना पड़ता है । कई विश्वविद्यालयों में जाने और वहां की प्रक्रिया को देखने-जानने के बाद मेरी यह धारणा बनी थी विश्वविद्यालयों में शोध प्रबंध बेहद जटिल और शास्त्रीय तरीके से पुराने विषयों पर ही किए जाते हैं । मेरी यह धारणा साहित्य के विषयों के इर्द-गिर्द बनी थी । जब महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के छात्रों से मिलने और उनके शोध को सुनने का मौका मिला तो मेरी यह धारणा थोड़ी बदली । हिमांशु नारायण के शोध का विषय भारतीय फीचर फिल्म और शिक्षा से जुड़ा था जबकि दीप्ति ने इंडिया टीवी और एनडीटीवी का तुलनात्मक अध्ययन किया था । दोनों के अध्ययन में कई बेहतरीन निष्कर्ष देखने को मिले । हिमांशु ने तारे जमीं पर और थ्री इडियट जैसी फिल्मों के आधार पर श्रमपूर्वक कई बातें कहीं जिसपर गौर किया जाना चाहिए । हिमांशु ने पांच सौ से ज्यादा लोगों से बात कर उनकी राय को अपने शोद प्रबंध में शामिल किया है जो उसे प्रामाणिकता प्रदान करती है । उसके शोध के प्रेजेंटेशन के समय कई सवाल खड़े हुए । यह देखना बेहद दिलचस्प था कि दूसरे विषय के छात्र या फिर उसके ही विभाग के छात्र भी पूरी तैयारी के साथ आए थे ताकि शोध करनेवाले अपने साथी छात्रों को घेरा जाए । सुझाव और सलाह के नाम पर जब छात्र खड़े हुए तो फिर शुरू हुआ ग्रीलिंग का सिलसिला जिसे विभागाध्यक्ष प्रोपेसर अनिल राय अंकित ने रोका । दीप्ति का शोध बेहद दिलचस्प था । एनडीटीवी और इंडिया टीवी की तुलना ही अपने आप में दिलचस्प विषय है। खबरों को पेश करने का दोनों चैनलों को बेहद ही अलहदा अंदाज है । लेकिन दो साल के अपने शोध के दौरान दीप्ति ने यह निष्कर्ष दिया किस समाचार में कमी आई है और न्यूज चैनलों पर मनोरंजन बढ़ा है । दोनों चैनलों की कई हजार मिनटों की रिकॉर्डिग को विश्लेषण करने के बाद उसके निष्कर्ष दिलचस्प थे । चौंकानेवाले भी । वर्धा
जाकर एक बार फिर से बापू की कुटी या आश्रम में जाने का मन करने लगा था । दूसरे दिन सुबह सुबह वर्धा के ही गांधी आश्रम पहुंच गया जो विश्वविद्यालय से आधे घंटे की दूरी पर स्थित है । वहां पहुंचकर एक अजीब तरह की अनुभूति होती है । वातावरण इस तरह का है कि लगता है कि आप वहां घंटों बैठ सकते हैं । तकरीबन दस महीने पहले जब वर्धा गया था तो भी गांधी आश्रम गया था । वहां गांधी के कई सामान रखे हैं । गांधी का बाथ टब, उनका मालिश टेबल, उनकी चक्की आदि आदि । उनके बैठने का स्थान भी सुरक्षित रखा हुआ है । पिछली बार जब गया था तो वहां बंदिशें कम थी । लेकिन इस बार पाबंदियां इस वजह से ज्यादा थी कुछ महीनों पहले वहां रखा बापू का ऐनक चोरी चला गया था । बापू के चश्मे के चोरी हो जाने के बाद वहां रहनेवाले कार्यकर्ताओं ने थोड़ी ज्यादा सख्ती शुरू कर दी थी । गांधी जिस कमरे में बैठते थे वहां बैठने के बाद आप उनके सिद्धांतों को महसूस कर सकते हैं । एक अजीब सा अहसास । गांधी आश्रम में हम चार लोग गए थे । मैं था, अनिल राय जी थे, विश्वविद्यालय के ही शिक्षक मनोज राय थे और इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के शिक्षक प्रोफेसर सी पी सिंह थे । वहां इस बार मेरी मुलाकात गांधी जी के वक्त से आश्रम में रह रही कुसुम लता ताई से हुई । वो गांधी जी के कमरे के बाहर बैठी थी । वहां हम इनके साथ बैठे । बतियाए । हम एक ऐसी महिला के साथ बैठे थे जिन्होंने गांधी को न सिर्फ देखा था बल्कि उनके आश्रम में कई साल तक उनके साथ रही थी । बातचीत के क्रम में मैने उनसे गांधी जी के बारे में पूछा । गांधी कैसे थे । वो कैसे रहा करते थे, आदि आदि । गांधी, कस्तूरबा और जय प्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती के बारे में उन्होंने कई बातें बताई । उनसे प्रभावती देवी और जयप्रकाश के बारे में बात करते हुए मुझे गोपाल कृष्ण गांधी की कुछ बातें याद आ गई जो उन्होंने अपनी किताब- ऑफ अ सर्टेन एज- की याद आ गई । गोपाल कृष्ण गांधी ने लिखा है- जयप्रकाश नारायण को गांधी जी जमाई राजा मानते थे क्योंकि उच्च शिक्षा के लिए जयप्रकाश के अमेरिका चले जाने के बाद प्रभावती जी गांधी के साथ वर्धा में ही रहने लगी थी और बा और बापू दोनों उन्हें पुत्रीवत स्नेह देते थे । दरअसल जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद के भाई की लड़की थी । वर्धा के आश्रम में रहने के दौरान बापू और कस्तूरबा दोनों उन्हें अपनी बेटी की तरह मानने लगे । भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गांधी जी और कस्तूरबा को पुणे के आगा खान पैलेस में कैद कर लिया गया । वहां बा की तबीयत बिगड़ गई तो गांधी ने 6 जनवरी 1944 ने अधिकारियों को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि दरभंगा जेल में बंद प्रभावती देवी को पुणे जेल में स्थानांतरित किया जाए ताकि कस्तूरबा की उचित देखभाल हो सके । उस पत्र में गांधी ने लिखा कि प्रभावती उनकी बेटी की तरह हैं । यह बातें कुसुम लता ताई ने भी बताई । उन्होंने कहा कि बा और बापू दोनों प्रभावती देवी को बेटी की तरह मानते थे । गोपाल
कृष्ण गांधी ने गांधी और जयप्रकाश के बीच की पहली मुलाकात का दिलचस्प वर्णन किया है । उनके मुताबिक तकरीबन सात साल बाद जब जयप्रकाश नारायण अमेरिका में अपनी पढ़ाई खत्म कर भारत लौटे तो तो अपनी पत्नी से मिलने वर्धा गए जहां वो गांधी के सानिध्य में रह रही थी । पहली मुलाकात में गांधी ने जयप्रकाश से देश में चल रहे आजादी के आंदोलन के बारे में कोई बात नहीं कि बल्कि उन्हें ब्रह्मचर्य पर लंबा उपदेश दिया । बताते हैं कि गांधी जी ने प्रभावती जी के कहने पर ही ऐसा किया क्योंकि प्रभावती जी शादी तो कायम रखना चाहती थी लेकिन ब्रह्मचर्य के व्रत के साथ । जयप्रकाश नरायण ने अपनी पत्नी की इस इच्छा का आजीवन सम्मान किया । तभी तो गांधी जी ने एक बार लिखा- मैं जयप्रकाश की पूजा करता हूं । गांधी जी की ये राय 25 जून 1946 के एक दैनिक में प्रकाशित भी हुई थी। गांधी से जयप्रकाश का मतभेद भी था, गांधी जयप्रकाश के वयक्तित्व में एक प्रकार की अधीरता भी देखते थे लेकिन बावजूद इसके वो कहते थे कि जयप्रकाश एक फकीर हैं जो अपने सपनों में खोए रहते हैं । कुसुम लता ताई ने भी जयप्रकाश और प्रभावती के बारे में कई दिलचस्प किस्से सुनाए । इसके अलावा देश की वर्तमान हालत और राजनीति के बारे में कुसुम ताई से लंबी बात हुई । उसके
बाद हमलोग वापस विश्वविद्यालय लौटे । वहां भी कुलपति विभूति नारायण राय की पहल पर गांधी हिल्स बना है । गांधी हिल्स पर बापू का ऐनक, उनकी बकरी, उनकी चप्पल और उनकी कुटी बनाई गई है । आप वहां घंटों बैठकर गांधी के दर्शन के बारे में मनन कर सकते हैं बगैर उबे । महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्विविद्यालय में गांधी के बाद अब कबीर हिल्स बन रहा है जहां कबीर से जुड़ी यादें ताजा होंगी । बार बार वर्धा जाना और गांधी से जुड़ी चीजों को देखना पढ़ना चर्चा करना अपने आप में एक ऐसा अनुभव है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है बयां नहीं ।

Tuesday, May 17, 2011

गांधी को भुनाने की कोशिश

कुछ दिनों पहले ही हिंदी-अंग्रेजी में एक साथ प्रकाशित बेवसाइट फेस एंड फैक्ट्स के प्रबंध संपादक जय प्रकाश पांडे का बेहद गुस्से में फोन आया । उन्होंने बताया कि न्यूयॉर्क टाइम्स के पूर्व कार्यकारी संपादक जोसेफे लेलीवेल्ड ने महात्मा गांधी का अपमान करते हुए एक किताब लिखी है -ग्रेट सोल- महात्मा गांधी एंड हिज स्ट्रगल विद इंडिया- जिसमें गांधी को समलैंगिक करार दिया है । जब मैंने उनसे पूछा कि उन्हें यह बात कहां से पता चली तो उन्होंने कहा कि ब्रिटेन के अखबार डेली मेल ने एक लेख छापा है जिसका शीर्षक है - गांधी लेफ्ट हिज वाइफ टू लिव विद मेल लवर । यह लेख जोसेफ लेलीवेल्ड की नई किताब के हवाले से छापी गई थी । उन्होंने तत्काल मुझसे प्रतिक्रिया मांगी ताकि उसको प्रकाशित किया जा सके । चूंकि मैंने ना तो किताब पढ़ी थी और ना ही डेली मेल का लेख पढ़ा था इसलिए मैंने गांधी से जुड़ी एक कहानी सुना दी-एक बार गांधी जी ट्रेन से सफर कर रहे थे, किसी स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी तो गांधी ने देखा कि एक आदमी उनसे मिलने की कोशिश कर रहा है और उनके समर्थक उसे रोक रहे हैं वो लगातार मिन्नतें कर रहा था लेकिन लोग उनको गांधी तक पहुंचने नहीं दे रहे थे । गांधी ने जब यह देखा तो उन्होंने अपने पास के लोगों से मामले की जानकारी चाही । गांधी को बताया गया कि जो आदमी उनसे मिलने की जिद कर रहा है, दरअसल वह एक लेखक है और उसने गांधी को केंद्र में रखकर एक किताब- ROGUE OF INDIA - लिखी है । वह उस किताब पर गांधी जी के दस्तखत चाहता है । लोगों को लग रहा था जिस किताब का शीर्ष की इतना अपमानित करनेवाला है उसमें भीतर तो और भी विषवमन होगा । इस वजह से उसे गांधी से मिलने से रोका जा रहा था । गांधी को जब पूरी बात पता चली तो उन्होंने उस वयक्ति को अपने पास बुलाया, प्यार से बिठाया और हाल-चाल पूछने के बाद उसकी लिखी किताब पर अपने हस्ताक्षर कर उसको वापस लौटा दिया । उसके जाने के बाद गुस्साए गांधी के समर्थकों ने बापू से पूछा कि उन्होंने उस वयक्ति की किताब पर हस्ताक्षर क्यों किए जो आपको ROGUE OF INDIA बता रहा है । गांधी जी ने मुस्कुराते हुए जबाव दिया कि सबको अपनी राय बनाने और उसे व्यक्त करने का हक है । यह कहानी सुनाकर तो मैं उस वक्त निकल गया लेकिन मेरे मन में गांधी पर लिखी लेलीवेल्ड की किताब पढ़ने की इच्छा बढ़ने लगी । दो तीन किताब की दुकानों पर फोन करने पर पता चला कि यह किताब अभी भारत में उपलब्ध नहीं है । फिर मैंने डेली मेल का लेख पढ़ा । उसको पढ़ने के बाद पूरा तो नहीं लेकिन माजरा कुछ-कुछ समझ में आने लगा । इस बीच मुंबई के एक अखबार ने डेली मेल के लेख के हवाले से यह खबर छाप दी कि एक जर्मन व्यक्ति गांधी का 'सेक्रेट लव' था । इस लेख के छपने के बाद बवाल मचना था सो मचा । बगैर पढ़े-देखे आनन-फानन में गुजरात विधानसभा ने सूबे में किताब पर पाबंदी लगाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी । महाराष्ट्र में भी ऐसी ही मांग उठी कि लेलीवेल्ड की किताब पर बैन लगा दिया जाए । केंद्र सरकार के मंत्री भी इसमें राष्ट्रपिता का अपमान देखने लगे । यह सबकुछ सिर्फ एक लेख की बिना पर होने लगा, बगैर किताब पढ़े । लेकिन अब यह किताब भारत में उपलब्ध है । मुझे लग रहा था कि गांधी के बारे में इस किताब में कुछ नया खुलासा होगा लेकिन पढ़ने के बाद निराशा हुई और लगा कि डेली मेल का लेख बेहद सनसनीखेज और सत्य से परे था । दरअसल पश्चिमी देशों में किताब को हिट कराने का यह घिसा पिटा फॉर्मूला है । किताब के बाजार में आते ही उसके बारे में उत्सुकता का एक ऐसा वातावरण तैयार किया गया और प्रकाशक या फिर लेखक के रणनीतिकारों ने बिक्री बढ़ाने के लिए गांधी की इस जीवनी के कुछ चुनिंदा अंश लीक किए ताकि मीडिया में खबर बन सके और वो लोग ऐसा करने में कामयाब भी हो गए । गांधी और हरमन कैलेनबाख के संबंध के बारे में गांधी के कुछ पत्रों को इस तरह से प्रचारित किया गया कि लेखक लेलीवेल्ड ने कुछ महान खोज कर डाली हो । गांधी के बारे में कुछ ऐसा सत्य उद्घाटित कर दिया हो जो पहले से ज्ञात नहीं था । जबकि गांधी के जिन पत्रों को आधार बनाकर लेलीवेल्ड ने कुछ बातें की है वो पत्र सालों से राष्ट्रीय अभिलेखागार में और साबरमती आश्रम में मौजूद हैं । जब गांधी और कैलेनबाख के संबंधों को आधार बनाकर अखबारों में लेख और समीक्षाएं छपी तो दुनियाभर में गांधी के प्रशंसको ने इसका विरोध शुरू कर दिया । यह विरोध जितना तीव्र होता गया किताब की बिक्री उतनी ही ज्यादा बढ़ती चली गई ।
आधुनिक भारत के इतिहास में या यों कहें कि बीसवीं शताब्दी के विश्व इतिहास में महात्मा गांधी एक ऐसी शख्सियत है जिसके व्यक्तित्व की गुत्थी सुलझाना विद्वानों के लिए एक बड़ी चुनौती है । महात्मा गांधी के व्यक्तित्व के इतने आयाम हैं कि एक को पकड़ो तो दूसरा छूट जाता है । गांधी विश्व के इकलौते ऐसे शख्स हैं जिनकी मृत्यु के साठ साल बाद भी उनपर और उनके विचारों और लेखन पर लगातार शोध और लेखन हो रहा है । न्यूयॉर्क टाइम्स के पूर्व कार्यकारी संपादक ने भी गांधी और उनके व्यक्तित्व को अपने तरीके से उद्धाटित करने का असफल प्रयास किया है । साठ के दशक में लेलीवेल्ड भारत में न्यूयॉर्क टाइम्स के प्रतिनिधि थे । चूंकि वो भारत को नजदीक से देख समझ चुके थे इसलिए उनसे गांधी को और उनके पत्रों के आधार पर इस तरह के सनसनीखेज निष्कर्षों की उम्मीद नहीं थी । अब हम जोसेफ लेलीवेल्ड की किताबों के कुछ अंश पर नजर डालते हैं जिससे लेखक की मंसा साफ हो जाती है -गांधी अगर प्रेम में नहीं थे तो भी वो आर्किटेक्ट हरमन कैलेनबाख के प्रति आकर्षित थे । 1909 में लंदन से भेजे एक पत्र में गांधी ने कैलेनबाख को लिखा था- तुम्हारी तस्वीर मेरे शयनकक्ष में मैंटलपीस पर रखी है जो मेरे बिस्तर के ठीक सामने है । फिर वो आगे लिखते हैं कि रुई के फाहे और वैसलीन नियमित तौर पर याद दिलाते हैं । इसके आगे गांधी ने लिखा कि मुद्दा तुम्हें और मुझे यह दिखाने का है कि तुमने कितनी पूर्णता से मेरे शरीऱ पर कब्जा कर लिया है, यह एक प्रतिशोधपूर्ण गुलामी है (पृ-89)” अब हम कब्जा शब्द का क्या अर्थ निकालें या फिर पेट्रोलियम जेली के इस्तेमाल का क्या अर्थ निकालें जो आज की तरह उस वक्त भी किसी भी काम के लिए मरहम के तौर पर उपयोग में आता था । विश्वसनीय अनुमान तो यह हो सकता है कि लंदन के होटल के कमरे में वैसलीन एनीमा के लिए रही होगी जो गांधी की नियमित दिनचर्या में शामिल था या फिर फिर यह किसी और उमंग के पहले की छाया रहा हो जो उत्साह गांधी ने बूढे होने पर मालिश के लिए दिखाया था । मालिश के प्रति गांधी का लगाव सर्वज्ञात था और देश भर के दौरों के बीच वो महिलाओं से मालिश करवाने में रुचि रखते थे । मालिश की भी उनके जीवनकाल में काफी चर्चा होती थी और वह चर्चा कभी खत्म नहीं हुई ।
तकरीबन दो बर्ष बाद विनोदी स्वभाव के गांधी ने अपने दोस्त से समझौते के लिए एक अर्ध-सहमति पत्र बनाया था जिसमें वैसे नामों का प्रयोग किया गया था जिसे हम मजाकिया कह सकते हैं । उम्र में अपने से दो वर्ष छोटे कैलेनबाख को लोअर हाउस और खुद को अपर हाउस कहते थे ।.....कैलेनबाख के यूरोप दौरे के पहले 29 जुलाई 1911 को आपसी सहमति पत्र में अपर हाउस ने लोअर हाउस से यह वादा करवाया था कि उनकी गैरहाजिरी में कोई विवाह नहीं करेगा और ना ही किसी महिला की ओर ललचाई नजरों से देखेगा । इसके बाद दोनों हाउसों ने आपस में ज्यादा प्रेम और फिर और ज्यादा प्रेम का वादा किया । यह उस वक्त की बात है जब 1908 में गांधी की जेल यात्राओं और 1909 में उनकी लंदन यात्रा की अवधि को छोड़कर साथ रहते हुए तकरीबन तीन बर्ष बीत चुके थे । यहां यह बात स्मरणीय है कि हमारे पास सिर्फ गांधी के पत्र हैं जो हमेशा से डियर लोअर हाउस से शुरू होते हैं । हम अगर गांधी के पत्रों में लिखे गए अन्य संदर्भों और घटनाओं को छोड़ दें तो उससे ही दोनों के बीच के प्रेम के सूत्र निकलते हैं । पत्रों की व्याख्या हमेशा से दो तरह से की जा सकती है - एक तो हम अनुमानों के समंदर में डूब उतरा सकते हैं और दूसरा तरीका यह हो सकता है कि यह देखें कि दो व्यक्ति अपनी यौन इच्छाओं ते दमन के लिए अपने प्रयासों के बारे में क्या कहते सोचते हैं ।
जोसेफ लेलीवेल्ड ने इन्हीं पत्रों को आधार बनाकर गांधी के सेक्स जीवन के बारे में लिखा है लेकिन लिखते वक्त लेलीवेल्ड यह भूल गए कि गांधी में अपनी कामुकता को लेकर सार्वजनिक रूप से बात करने का अद्वितीय साहस था । 1906 में गांधी ने बह्मचर्य को अपना लिया था और उसके बाद से वो अपनी कामेच्छाओं के बारे में खुलकर लिखते बोलते थे और अपनी निजता का त्याग कर चुके थे । मालिश कराने के उनके शौक को लेलीविल्ड ने कामेच्छा से जोड़ने की कोशिश की है । लेकिन उन्हें यह याद दिलाने की जरूरत है कि मालिश कराना और एनीमा लेना गांधी की दिनचर्या में उनकी जिंदगी के आखिर तक बना रहा । सिर्फ इन बातों को आधार बनाकर गांधी के सेक्स जीवन की इस गलीज व्याख्या के लिए जोसेफ लेलीवेल्ड को जीवनी लिखने की जरूरत नहीं थी । अगर गांधी पर लिखी जीवनियों से इस किताब की तुलना करें तो यह एक बेहद कमजोर कृति है । दरअसल यह कृति गांधी की सही मायने में जीवनी भी नहीं है और ना ही गांधी के बारे में जानने की इच्छा रखनेवाले शुरुआती पाठकों के लिए उपयोगी किताब है । इस पूरी किताब में पढ़ते वक्त यह महसूस होता है कि लेखक यह मानकर चल रहा है कि पाठक को गांधी के बारे में उनके क्रियाकलापों के बारे में जानकारी है और अपनी इसी आग्रह के बिनाह पर किताब चलती रहती है । अंत में सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि जोसेफ लेलीवेल्ड ने अपने तरीके से गांधी के पुरुष मित्रों के संबंध को व्याख्यायित किया है और इसका उन्हें हक भी है । किताब पर पाबंदी लगाने या देश भर इसे प्रतिबंधित करने की कोई आवश्यकता नहीं है । खुद गांधी भी अगर जीवित होते तो इसपर पाबंदी के खिलाफ होते ।

Saturday, January 29, 2011

वर्धा में दो दिन

बेहद सर्द सुबह थी, कोहरा इतना घना था कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था । मैं बात कर रहा हूं जनवरी के पहले हफ्ते की जब अचानक से दिल्ली में सर्दी कम हुई थी और कोहरा घना हो गया था । मुझे वर्धा जाना था और उसके लिए नागपुर तक की प्लाइट लेनी थी जो दिल्ली एयरपोर्ट से सुबह सवा पांच बजे उड़ती थी । जाहिर तौर पर मुझे घर से तड़के साढ़े तीन बजे निकलना था । टैक्सी लेकर घर से निकला तो कार की लाइट और कोहरे के बीच संघर्ष में कोहरा जीतता नजर आ रहा था । इंदिरापुरम का इलाका कुछ खुला होने की नजह से कोहरा और भी ज्यादा था । एक जगह तो हमारी गाड़ी डिवाइडर से टकराते -टकराते बची । सामने कुछ दिख नहीं रहा था अंदाज से गाड़ी चल रही थी । लेकिन वर्धा के गांधी आश्रम को और महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय को देखने की इच्छा मन में इतनी ज्यादा थी कि वो कोहरे पर भारी पड़ रही थी। किसी तरह चलते चलाते हम हवाई अड्डे तक पहुंचने वाले थे लेकिन ड्राइवर के सुझाव पर हम हवाई अड्डे के ठीक पहले चाहरदीवारी से घिरे गांव मेहरमपुर में घुस गए। हवाई अड्डे के पहले इतनी बड़ी बस्ती जिसका हमें आजतक एहसास भी नहीं था । लेकिन वो पूरी बस्ती तो सुबह चार सवा चार बजे पूरी तरह से जगमगा रही थी । कई चाय की दुकान और कूरियर कंपनी के कर्मचारी अपने काम में तन्मयता से लगे थे उनको देखकर लग रहा था कि ना तो उन्हें ठंड का एहसास था और ना ही कोहरे का भय । हमने भी वहां रुककर चाय पी । उस हाड़ कंपा देनेवाली ठंड में चाय पीने का आनंद ही कुछ और था । इच्छा थी उस बस्ती को घूमकर वहां की जिंदगी को देखता लेकिन हवाई यात्रा की घंटे भर पहले पहुंचने की मजबूरी की वजह से संभव नहीं हो पाया ।
लगभग सवा घंटे की उड़ान के बाद जब सुबह सवा सात बजे नागपुर हवाई अड्डे पर उतरा तो बेहद शांत हवाई अड्डा शहर के मिजाज का भी एहसास करा रहा था । थोड़ी देर वहां रुकने के बाद वर्धा के लिए रवाना हो गया क्योंकि सुबह ग्यारह बजे से वहां दो दिनों का राष्ट्रीय सेमिनार होना था जिसमें भाग लेने के लिए वक्त पर पहुंचना जरूरी था । नागपुर से तकरीबन डेढ़ घंटे में वर्धा पहुंचा । विश्वविद्यालय कैंपस में घुसते ही सामने फादर कामिल बुल्के अंतराष्ट्रीय छात्रावास दिखा । वहीं हमारे रुकने का इंतजाम था और पत्रकारिता के उत्साही छात्र हमारे स्वागत के लिए खड़े थे । वहीं हमारी मुलाकात जनमोर्चा के संपादक और बुजुर्ग पत्रकार शीतला सिंह और वरिष्ठ लेखक गंगा प्रसाद विमल जी से हुई । विमल जी सुबह की सैर से लौटकर आए थे और शीतला सिंह छात्रावास के बाहर धूप सेंक रहे थे । सुबह वहां भी ठीक-ठाक ढंड थी लेकिन लोग बता रहे थे कि दिन में मौसम गर्म हो जाता है । शीतला सिंह से गपशप करते हुए पुराने हिंदुस्तानी प्रदीप सौरभ से मुलाकात हो गई । खुले आकाश के नीचे बैठकर ढंड में धूप का आनंद लेना दिल्ली में तो कभी नसीब नहीं हुआ इसलिए छात्रों के बार-बार कमरे में जाकर आराम करने की सलाह को नजरअंदाज करते हुए वहीं बैठा रहा । कुछ देर बाद पत्रकारिता विभाग के युवा और उत्साही प्रोफेसर और अध्यक्ष अनिल के राय अंकित भी आ गए जो इस कार्यक्रम के संयोजक थे । उनसे गपशप करने के बाद विश्विद्यालय के दिल्ली केंद्र प्रभारी मनोज राय के साथ मैं कैंपस घूमने निकल गया । हम वहां भी गए जहां बैरकनुमा चार कमरों से विश्वविद्यालय शुरू हुआ था । सड़क के आमने सामने विश्वविद्यालय के दो कैंपस हैं । लेकिन अभी मुख्य कैंपस में ही ज्यादा हचलचल और चहल पहल थी क्योंकि विश्वविद्यालय के तमाम अधिकारियों के दफ्तर और आवास इसी कैंपस में है । पूरे विश्वविद्यालय कैंपस के चारो ओर रिंग रोड बन बनाकर उसे सुरुचिपूर्ण तरीके से एक आकार दिया जा रहा है । उपर एक जगह गांधी हिल है जहां पहाड़ी के हिस्से को एक छोटे पार्क के तौर पर विकसित किया गया है जिसमें गांधी के तीन बंदरों की मूर्तियों के अलावा गांधी की घड़ी और उनका चश्मा भी है । पहाड़ी के उपर, पानी की कमी के बावजूद गांधी हिल पर तमाम फूल पौधे लहलहा रहे थे । छात्रों ने बताया कि कुलपति की व्यक्तिगत रुचि की वजह से ही यह हो पाया ।
नियत समय पर हमलोग विश्वविद्यालय के हबीब तनवीर सभागार में पहुंचे और बाबू विष्णुराव पराड़कर को नमन कर कार्यक्रम शुरू हुआ । बनारस से आए विद्वान प्रोफेसर राममोहन पाठक और कोलकाता विश्वविद्यालय की पत्राकरिता विभाग की प्रोफेसर ताप्ती बसु का भाषण हुआ । बोझिल से कार्यक्रम में गर्मी आई जब हरिभूमि के संपादक हिमांशु द्विवेदी ने जोशीले अंदाज में ये साबित करने की कोशिश की पत्रकारिता भी कारोबार है और पत्रकारिता के गिरते स्तर के लिए पाठक भी जिम्मेदार हैं । हिंमाशु ने कहानियां, चुटकुले और शेर सुनाकर खूब तालियां बटोरी लेकिन बाद में जब गंगा प्रसाद विमल और कुलपति विभूति नारायण राय बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने हिमांशु के भाषण की धज्जियां उड़ा दी । जोश में विमल जी ने तो सारे संपादकों और पत्रकारों को बिचौलिया करार दे दिया । कुलपति ने भी डंके की चोटपर कहा कि पत्रकारिता और किसी व्यवसाय की तरह नहीं है, जब भी मीडिया की आजादी पर हमला हुआ है तो पूरा समाज उसके खिलाफ खडा़ हो गया । इस वजह से मीडिया से समाज की अपेक्षा भी है लेकिन जोश में कुलपति ने भी मीडिया संपादकों को भ्रष्ट करार दे दिया । जिसपर बाद में उन्होंने, अगले दिन जब ये मुद्दा उठा, तो सफाई देते हुए कहा कि उन्हें मिसकोट किया गया । दो सत्रों में यह विमर्श हुआ । दोनों सत्रों में बजुर्ग प्रोफेसर और पत्रकारों ने विमर्श किया जिनकी बातें सुनकर मैं बहुत ज्यादा निराश हुआ, पत्रकारिता कहां से कहां चली गई लेकिन वो लोग अब भी मिशन की लकीर पीट रहे हैं । मुझे लगता है कि पत्रकारिता पर बात हो तो युवा पत्रकारों को ज्यादा मौका मिलना चाहिए क्योंकि विश्वविद्यालय के बुजुर्ग प्रोफेसर ना तो नई तकनीक से अवगत हैं और ना ही मीडिया में पिछले दशक में आए बदलाव से । ऐसे में पत्रकारिता के छात्रों को हम नैतिकता और मिशन की घुट्टी तो पिला देते हैं लेकिन व्यावहारिकता छूट जाती है । अनिल के राय अंकित युवा विभागाध्यक्ष हैं और उम्मीद करता हूं कि भविष्य में इस तरह के सेमिनार में युवाओं को भी बराबरी का मौका देंगे इससे एक तो छात्रों को नई तकनीक और माहौल में काम करने का तरीका और दबाव दोनों का पता चलेगा ।
अगले दिन टीवी पर केंद्रित सत्र था जिसकी अध्यक्षता कोलकाता विश्वविद्यालय की पत्रकारिता विभाग की अध्यक्ष ताप्ती बसु थी और वक्ता थे वरिष्ठ पत्रकार और ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव एन के सिंह, जी न्यूज के एंकर और राजनीतिक संपादक पुण्य प्रसून वाजपेयी, आगरा विश्वविद्यालय पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष गिरिजा शंकर शर्मा और मैं । एन के सिंह ने बीज वक्तव्य में जोर देकर इस बात को कहा कि आज समाज के हर क्षेत्र में मूल्यों में गिरावट देखी जा सकती है चाहे वो राजनीति हो, कार्यपालिका हो या फिर विधायिका । एन के ने तर्कपूर्ण तरीके से अपनी बात रखते हुए कहा कि मूल्यों के क्षरण की समस्या हमारे लोकतांत्रिक वयवस्था में खामी की वजह से है । मैंने पूर्ववर्ती वक्ताओं द्वारा पूरी मीडिया को भ्रष्ट और संपादकों को बिचौलिया रहे जाने पर गहरी आपत्ति जताते हुए कहा कि विभूति नारायण राय और गंगा प्रसाद विमल की समाज में एक अहमियत हैं और जब वो बोलते हैं तो समाज पर असर डालते हैं । इस वजह से उन्हें इस तरह के स्वीपिंग रिमार्क से बचना चाहिए । प्रसून ने अपने अंदाज में बोलते हुए गूगल को पत्रकारिता का पर्याय ना मानने की सलाह दी । इसके बाद भी एक सत्र हुआ जिसमें प्रकाश दूबे, विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति अरविंदाक्षन ने अपनी बात रखी । कुल मिलाकर दो दिनों तक चला यह कार्यक्रम बेहद सफल रहा । लेकिन जैसा कि मैं उपर भी कह चुका हूं कि ऐसे कार्यक्रमों में युवा पत्रकारों की भागीदारी इस विमर्श को एक अलग स्तर पर लेकर जाएगी । क्योंकि विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों की जो राय पुरानी पड़ चुकी है और वो अपनी विद्वता के बोझ तले इतने दब चुके होते हैं कि उन्हें जो कुछ नया हो रहा है उसको जानने की रुचि ही नहीं रहती है । दो दिनों तक वर्धा में रहने के दौरान मैं गांधी आश्रम भी गया, गांधी के कमरे हर चीज को देखा-छुआ । अपने स्तंभ में आश्रम के अपने अनुभवों को भी लिखूंगा ।