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Sunday, August 24, 2025

...वो साल 75 था


स्वाधीन भारत के इतिहास में वर्ष 1975 एक ऐसा वर्ष है जिस साल कई क्षेत्रों में अनेक तरह के बदलाव देखने को मिले। इंदिरा गांधी ने 1975 में देश की राजनीति और संविधान की आत्मा को बदलने का काम किया था। देश पर आपातकाल थोपा गया था। नागरिक अधिकारों पर पहरा लगा दिया था। राजनीति में ऐसा बदलाव देखने को मिला जो इसके पहले स्वाधीन भारत के इतिहास में लगभग नहीं के बराबर दिखता है। कई नेता जो आपातकाल के दौरान राज्य के मुख्यमंत्री थे, इंदिरा जी के साथ थे, समय भांपकर कांग्रेस को छोड़ दिया। जनता पार्टी के नेता हो गए। इंदिरा के साथ रहकर आपातकाल के भागी बने, फिर पाला बदलकर जयप्रकाश जी के साथ हो गए। 1977 में जब जनता सरकार बनी तो उसमें केंद्रीय मंत्री बन गए। आपातकाल नें राजनीति को इस कदर बदल दिया कि राजनीति सत्ता में बने रहने का खेल हो गया। स्वाधीनता के पूर्व जिस प्रकार की राजनीति होती थी और उसके कुछ अंश स्वाधीनता के बाद भी दिखते थे वो एक झटके में 1975 में समाप्त हो गए। स्वाधीनता के बाद पहली बार 1975 में देश ने अधिनायकवाद की आहट सुनी। संजय गांधी के रूप में सत्ता का एक ऐसा केंद्र बना जो बगैर किसी शक्ति के बेहद ताकतवर था।  वो जो चाहता था देश में वही होता था। संजय गांधी के साथ कई युवा नेता जुड़े जिन्होंने बाद में देश की राजनीति को अलग अलग तरह से प्रभावित किया। अधिनायकवाद के साथ साथ देश का व्यापक रूप से अवसरवादी राजनीति से भी परिचय हुआ। सत्ता के लालची नेताओं को भी देश ने देखा। प्रतिरोध की राजनीति ने दिरा जैसी ताकतवर नेता को हरा दिया लेकिन स्वार्थ और लालच के कारण ये प्रतिरोध ढह गया।  आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के दामन पर एक ऐसा स्थायी दाग है जो किसी भी तरह से धोया नहीं जा सकता है। 

राजनीति के अलावा कला के क्षेत्र में भी 1975 को याद किया जाएगा। 1975 में एक ऐसी फिल्म आई जिसने हिंदी सिनेमा के लैंडस्केप को बदलकर रख दिया। 1975 के पहले हिंदी फिल्मों में पारिवारिक संबंधों पर आधारित कहानियों की धूम रहती थी। समांतर रूप से रोमांटिक कहानियों पर बनी फिल्में जनता को पसंद आती थीं। 1973 में राज कपूर की फिल्म बाबी ने बाक्स आफिस के तमाम रिकार्ड ध्वस्त कर दिए थे। युवा प्रेम का रंग ऐसा बिखरा था कि बाबी में नायक और नायिकाओं के कपड़े पहनने का स्टाइल युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ था। एक खास तरह के डिजायन का नाम ही बाबी प्रिंट पड़ गया था। 1973 में ही अमिताभ बच्चन की फिल्म जंजीर आई थी। इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा के दर्शकों के सामने एक नए प्रकार के नायक की छवि प्रस्तुत की थी। जिसको बाद में एंग्री यंगमैन कहा गया। फिल्म जंजीर की सफलता की पृष्ठभूमि में दो वर्ष बाद शोले फिल्म रिलीज होती है। इसकी सफलता की कहानी तो बहुतों को मालूम है लेकिन इस फिल्म के साथ फिल्म समीक्षा या समीक्षकों के असफलता की कहानी की चर्चा कम होती है। इस स्तंभ में पहले भी इस बात की चर्चा हो चुकी है कि बिहार से प्रकाशित होनेवाले एक समाचारपत्र में शोले की समीक्षा प्रकाशित हुई थी, जिसका शीर्षक था- शोले जो भड़क ना सका। इसी तर्ज पर एक अन्य लोकप्रिय हिंदी पत्रिका ने फिल्म शोले को एक स्टार दिया था। समीक्षा भी बेहद मनोरंजक लिखी गई थी, कुछ पंक्तियां देखिए- इंटरवल तक फिल्म ठीकठाक है, कुछ हद तक मजेदार भी। फिर इस खिचड़ी फिल्म के निर्देशक और लेखकद्वय सलीम जावेद को लगता है मारपीट और खून खराबे का दौरा पड़ जाता है। लेकिन सचाई यह है कि मार-पीट वाले दृष्यों में न तो कोई जान है और न ही उनमें से किसी तरह की उत्तेजना हो पाती है। समीक्षक महोदय इसके बाद अभिनेताओं की खबर लेते हैं। वो अमिताभ बच्चन,धर्मेंद्र और संजीव कुमार के अभिनय पर लिखते हैं- धर्मेंद्र या अमिताभ न तो गुंडे लगते हैं, न ही भाड़े के टट्टू। धर्मेंद्र की नंगी छाती या उसके बाजुओं को देख कर फूल और पत्थर वाला वह किरदार याद नहीं आता। अब तो वह ‘फूलफूल’ होता हुआ सा हिंदी फिल्मों का एक्टर भर लगता है। संजीव तो कांफी रेंज का अभिनेता है लेकिन शोले में वह उमर शरीफ बनने की कशिश में बिल्कुल पिछड़ गया लगता है। उसके गले से आवाज इस तरह से निकलती है जैसे भूत बंगले वाली फिल्मों के चरित्र बोलते हैं। 

इमरजेंसी ने जिस तरह से राजनीति की दिशा बदली उसी तरह से शोले ने फिल्म और फिल्म निर्माण की दिशा भी बदल दी। मल्टीस्टारर फिल्मों अपेक्षाकृत अधिक संख्या में बनने लगीं। हिंदी सिनेमा के जो दर्शक प्रेम के मोहपाश में थे, जो राजेश खन्ना की अदायगी के दीवाने थे, जिनको प्यार भरे संवाद अच्छे लगते थे उनकी पसंद बदल गई। अब उनका नायक जमाने से टकरा सकता था। वो प्रेम भी करता था लेकिन विद्रोही नायक की उसकी छवि उसके प्रेमी रूप पर भारी पड़ती थी। राजनीति में भी 1975 के बाद नेताओं की छवि बदलने लगी। उनको देश की जनता अवसरवादी जमात के तौर पर देखने लगी। वादे करके मुकर जानेवाली प्रजाति के रूप में देखने लगी। नेताओं की आयडियोलाजी ते प्रति लगवा उसी तरह से घटने लगा जैसे हिंदी सिनेमा के दर्शकों का प्रेम कहानियों के प्रति लगाव कम होने लगा था। ये समाजशास्त्रीय शोध और अनुसंधान का विषय हो सकता है कि क्या आपातकाल में जिस तरह से सिस्टम या संविधान से ऊपर व्यक्ति की आकांक्षा को तरजीह दी गई उसका परिणाम ये हुआ कि जनता एक विद्रोही नायक को ढूंढने लगी। वो विद्रोही नायक जो सड़ते जा रहे सिस्टम से टक्कर ले सके, उसको ठीक कर सके। देश के राजनीतिक सिस्टम के प्रति जनता के मन में जो गुस्सा उमड़ रहा था वो गुस्सा तब ढंडा होता था जब वो पर्दे पर नायक को सिस्टम तोड़ता देखता था। इसी संतुष्टि के लिए दर्शक बार-बार सिनेमा हाल जाते थे। आम जनता के सिस्टम के विरुद्ध उठ खड़े होने जैसी कई फिल्में 1975 के बाद बनीं। उनमें से कई बेहद सफल रहीं। 1975 में ही अमिताभ बच्चन की एक और फिल्म रिलीज हुई थी दीवार। इसमें भी नायक सिस्टम में रहकर सिस्टम को चुनौती देता है। जब  फिल्म रिलीज हुई थी तब कुछ उत्साही समीक्षकों ने इसके नायक की तुलना इंदिरा गांधी के 1969 के फैसलों से की थी। तब कहा गया था कि इंदिरा गांधी ने 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। वो सिस्टम में रहते हुए सिस्टम को ठीक करने का प्रयत्न कर रही थीं। वही काम दीवार के नायक ने भी किया। ये पैरलल कुछ लोगों के गले नहीं उतर सकती है।

वैश्विक स्तर पर भी 1975 में कई घटनाएं हुईं। वियतनाम युद्ध समाप्त हुआ। कुछ देशों को स्वाधीनता मिली और वहां लोकतंत्र स्थापित हुआ। कह सकते हैं कि वैश्विक स्तर पर भी 1975 में जो घटनाएं हुईं उसने भी भारत को प्रभावित किया। इस लिहाज से 1975 का स्वाधीन भारत में एक महत्वपूर्ण स्थान है। 


Sunday, August 18, 2024

कितने आदमी थे...


शोले जो भड़क न सका। करीब चार दशक पहले पढ़ा ये शीर्षक दिमाग पर इस कदर अंकित हो गया कि वर्षों बाद आज भी स्मृति में बना हुआ है। जब भी फिल्म शोले देखता हूं या इससे जुड़ी कोई चर्चा होती है तो ये शीर्षक कौंध जाता है। स्कूल में था, फिल्मों में रुचि थी। उसी समय फिल्म शोले पर एक समीक्षानुमा लेख देखा था। उसमें ये बताया गया था कि शोले फिल्म सफल नहीं हो सकी। बाद में शोले ने सफलता का इतिहास रच दिया। 15 अगस्त 1975 को शोले फिल्म के प्रदर्शन के 50 वर्ष पूरे हुए। एक बार फिर से इस शीर्षक की याद आई। इसी समय पता चला कि सलीम खान और जावेद अख्तर एक बार फिर से साथ आ रहे हैं। सलीम-जावेद की जोड़ी पर प्राइम वीडियो पर तीन पार्ट में एक डाक्यूमेंट्री आ रही है। ये सलीम जावेद की जोड़ी ही थी जिसने हिंदी सिनेमा के एंग्री यंगमैन को गढ़ा था। शोले फिल्म की कहानी और पटकथा सलीम- जावेद की है। जिसके प्रदर्शन पर लिखा गया था कि शोले जो भड़क न सका वो शोले ऐसा भड़का कि मुंबई (तब बांबे) के मिनर्वा सिनेमा हाल में लगातार पांच वर्षों तक दिखाई जाती रही। उस दौरे को जिसने देखा है उनका कहना है कि दो साल तो मिनर्वा के बाहर तक टिकट लेनेवालों की लाइनें लगा करती थी। इतना ही नहीं दिल्ली के प्लाजा सिनेमा में फिल्म देखने के लिए दूर दूर से लोग थे। पंजाब के दर्शकों को दिल्ली लाने के लिए चलनेवाली बस का नाम ही शोले एक्सप्रेस रख दिया गया था। 

यह बात सही है कि शोले फिल्म ने अपने प्रदर्शन के पहले सप्ताह में अच्छा बिजनेस नहीं किया था। रिव्यू भी अच्छे नहीं थे। तब फिल्मों के कारोबार के बारे में बताने वाली फिल्म पत्रिका द ट्रेड गाइड में सलीम-जावेद ने अपने नाम से एक विज्ञापन देकर भविष्यवाणी की थी। उन्होंने विज्ञापन में दावा किया था कि फिल्म हर वितरण के लिहाज से बनाए गए हर क्षेत्र में ये फिल्म एक करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार करेगी। ये इनका आत्मविश्वास था। इसी तरह से इन दोनों से जुड़ा एक और रोचक किस्सा है। एक फिल्म प्रदर्शित होनेवाली थी। फिल्म के पटकथा लेखक सलीम-जावेद ने निर्माताओं से कहा कि पोस्टर पर उनका भी नाम होना चाहिए। निर्माता नहीं माने। पूरे मुंबई में फिल्म के पोस्टर लग गए। सलीम-जावेद ने तय किया शहर के हर पोस्टर पर अपना नाम लिखवाएंगे। रातों रात उन्होंने कुछ पेंटर्स से संपर्क किया। अगले दिन अधिकतर पोस्टर्स पर सलीम जावेद का नाम लिखा था। परिणाम ये हुआ कि भविष्य में निर्माता पोस्टर पर पटकथा लेखक के तौर पर इस जोड़ी का नाम लिखने लगे। सलीम-जावेद की जोड़ी ने जिस तरह के संवाद लिखे वो भी बेहद लोकप्रिय हुए थे। चाहे फिल्म दीवार में अमिताभ और शशि कपूर के बीच का संवाद- आज मेरे पास बिल्डिंग है,प्रापर्टी है, बैंक बैलेंस है, बंगला है गाड़ी है तुम्हारे पास क्या है? उत्तर मिलता है- मेरे पास मां है। या फिल्म शोले में अमिताभ का ये पूछना कि तुम्हारा नाम क्या है बसंती अथवा गब्बर का ये कहना कि अरे ओ साभां, कितने आदमी थे। शोले के तो कई संवाद बेहद लोकप्रिय हुए, अब भी गाहे बगाहे लोग दोहराते हैं। संवाद के कैसेट तक बिके थे। सलीम-जावेद कि संवाद की एक और विशेषता है कि वो अश्लील या द्विअर्थी नहीं होते हैं। शोले में जब गब्बर बसंती को देखकर कहता है कि- अरे ओ साभां, ये रामगढ़ वाले अपनी बेटियों को कौन सी चक्की का आटा खिलाते हैं रे, जरा दारी के हाथ पांव देख, बहुत करारे हैं। इस संवाद पर तालियां बजी थीं किसी को गुस्सा नहीं आया था। सलीम जावेद एक कथा में कई उपकथा यानि कहानी के भीतर कहानी की कला में पारंगत हैं। शोले की कथा में कई गैप हैं लेकिन उन गैप्स को उपकथाएं भर देती हैं और दर्शक मनोरंजन की सपनीली दुनिया में चला जाता है। 


Monday, July 5, 2021

बोलती आंखों वाले अभिनेता


अभिनेता संजीव कुमार की बात हो तो दो फिल्मों और उसके बनने के दौर की कई दिलचस्प प्रसंग याद आते हैं। एक फिल्म थी रमेश सिप्पी की ‘शोले’ और दूसरी फिल्म थी के आसिफ की ‘मुहब्बत और खुदा’। ‘शोले’ समय पर रिलीज हो गई लेकिन ‘मोहब्बत और खुदा’ कई वर्षों बाद रिलीज हो सकी। पहले तो गुरुदत्त के निधन की वजह से रुकी फिर के आसिफ की मौत की वजह से इसके पूरा होने में समय लगा। ‘शोले’ की जब शूटिंग हो रही थी उस वक्त संजीव कुमार और हेमा मालिनी के रोमांस के किस्से फिल्मी पत्रिकाओं में छाए रहते थे। ‘शोले’ की शूटिंग के दौरान इन चर्चाओं से बचने के लिए संजीव कुमार उस होटल में नहीं रुके थे जिसमें धर्मेन्द्र, अमिताभ बच्चन आदि ठहरे हुए थे। वो एक अलग होटल में रहते थे। जब शूटिंग शुरू हुई तो एक दिन धर्मेन्द्र को लगा कि इस फिल्म का असली हीरो तो गब्बर सिंह है। वो रमेश सिप्पी के पास पहुंचे और जिद करने लगे कि उनको वीरू का नहीं गब्बर सिंह का रोल करना है। रमेश सिप्पी ने काफी समझाया लेकिन धर्मेन्द्र मानने को तैयार नहीं थे। अचानक रमेश सिप्पी राजी हो गए और कहा कि ठीक है ‘गब्बर’ का रोल आप कर लो मैं ‘वीरू’ की भूमिका संजीव कुमार को देता हूं, पर सोच लो फिल्म में वीरू और बसंती की जोड़ी है और संजीव कुमार और हेमा मालिनी फिल्म में रोमांस करते नजर आएंगे। इतना सुनना था कि धर्मेन्द्र फौरन बोले नहीं-नहीं, मेरे लिए वीरू की भूमिका ही ठीक है। मिहिर बोस ने अपनी पुस्तक ‘बॉलीवुड’ में इस दिलचस्प प्रसंग का उल्लेख किया है। बाद के दिनों में जो हुआ वो सभी को पता है। जब हेमा मालिनी से संजीव कुमार और उनके रोमांस के बारे में पूछा गया था तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा था कि ‘वो बेहद व्यक्तिगत और जटिल मामला था’। 

गुरुदत्त के निधन के कई सालों बाद जब के आसिफ ने ‘मोहब्बत और खुदा’ की शूटिंग करने का फैसला लिया तो उऩके सामने अभिनेता के चयन की समस्या थी। उस समय तक संजीव कुमार थिएटर में नाम कमा रहे थे। के आसिफ के किसी दोस्त ने फिल्म की उस भूमिका के लिए संजीव कुमार का नाम सुझाया। दोनों मिले और के आसिफ ने संजीव कुमार को फिल्म के सेट पर बुलाया । अगले दिन संजीव कुमार फिल्म के सेट पर पहुंचे तो के आसिफ ने उनको तैयार होने के लिए कहा और अपने कमरे में चले गए। संजीव कुमार शूटिंग के लिए तैयार होकर सेट पर बैठ गए। के आसिफ कमरे से सेट पर बैठे संजीव कुमार को देख रहे थे जो बेचैन हो रहे थे। के आसिफ यही चाहते थे, वो संजीव कुमार के चेहरे के भावों को पढ़ रहे थे। करीब तीन घंटे के बाद के आसिफ अपने कमरे से निकले और संजीव कुमार को गले लगा लिया। उनको अपनी फिल्म का हीरो मिल गया था। दरअसल संजीव कुमार हिंदी फिल्मों के ऐसे नायक थे जिनकी आंखें भी अभिनय करती थी। उनका चेहरे के भाव और आंखों की भाषा दर्शकों से संवाद करती थीं। संजीव कुमार इकलौते ऐसे अभिनेता थे जो किसी भी रोल में खुद को ढाल लेते थे। वो छवि के गुलाम नहीं थे। ए के हंगल की शागिर्दी में थिएटर करनेवाला ये अभिनेता जब फिल्मों में आया तो वो रूपहले पर्दे के अपनी छवि के चक्कर में नहीं पड़ा। उसके लिए किरदार महत्वपूर्ण होता था। ये साहस संजीव कुमार ही कर सकते थे कि ‘परिचय’ में जया बच्चन के पिता की भूमिका निभाई तो ‘अनामिका’ में जया बच्चन के प्रेमी की। दर्शकों ने दोनों भूमिका में उनको खूब पसंद किया। ‘शोले’ में तो वो जया बच्चन के श्वसुर की भूमिका में थे। फिल्म ‘नया दिन नई रात’ में तो उन्होंने नौ अलग अलग चरित्रों को पर्दे पर साकार कर दिया था। गुजराती कारोबारी परिवार से जब ये रंगमंच पर पहुंचे तो इनका नाम हरिभाई जेठालाल जरीवाला था। थिएटर से फिल्म में पहुंचे तो हरिभाई संजीव कुमार हो गए। संजीव कुमार को कम उम्र मिली लेकिन अपनी अभिनय क्षमता से भारतीय फिल्मों को समृद्ध कर गए ।