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Saturday, August 2, 2025

लोकप्रियता को सम्मान


राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई। कोरोना महामारी के चलते राष्ट्रीय फिस्म पुरस्कार देर से घोषित हो रहे हैं। शुक्रवार को घोषित पुरस्कार 2023 के लिए है। पुरस्कारों में कई प्रकार की विविधता देखने को मिली। शाह रुख खान को पहली बार किसी फिल्म में उनके अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार देने की घोषणा की गई। उनको फिल्म जवान के लिए और विक्रांत मैसी को 12वीं फेल के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का साझा पुरस्कार दिया जाएगा। अभिनेत्री रानी मुखर्जी को भी पहली बार उनकी फिल्म मिसेज चटर्जी वर्सेस नार्वे के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार दिया जाएगा। रानी मुखर्जी ने इसके पहले भी कई बेहतरीन फिल्में की हैं, जिनपर उनको राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिया जा सकता था। ब्लैक और हिचकी में उनका अभिनय शानदार रहा था। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार कई मानदंडों पर आधारित होता है। संभव है कि जिस वर्ष रानी की ये फिल्में आई हों उस वर्ष किसी और फिल्म में किसी और अभिनेत्री ने बेहतर अभिनय किया हो। ब्लैक और हिचकी दो ऐसी फिल्में हैं जो रानी मुखर्जी की अभिनय प्रतिभा के लिए और फिल्म की विषयवस्तु और ट्रीटमेंट के लिए याद किया जाता है। फिल्म मिसेज चटर्जी वर्सेस नार्वे एक तरह से रानी मुखर्जी की दूसरी पारी की बेहतरीन फिल्म है। हिचकी में भी रानी मुखर्जी ने जिस विषय पर काम किया था वो लगभग अनजाना था। ये ब्रैड कोहेन की आत्मकथा ‘फ्रंट आफ द क्लास, हाउ टौरेट सिंड्रोम मेड मी टीचर आई नेवर हैड’ पर आधारित है। कहा जाता है कि इस फिल्म में अभिनय के पहले रानी घंटों तक इस सिंड्रोम को समझने का प्रयास करती थी। इस सिंड्रोम से ग्रस्त लोग कैसे व्यवहार करते हैं उसको जानने  में लंबा समय बिताया था। पर्दे पर ये मेहनत दिखी भी थी। कहना ना होगा कि फिल्म की जूरी के सदस्यों का चयन रेखांकित करने योग्य है। 

शाह रुख खान को फिल्म जवान के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार अवश्य कई प्रश्न खड़े करता है। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के चयन के समय अभिनय तो आधार होता ही है, फिल्म की कहानी और समाज पर उसके प्रभाव पर भी चर्चा की जाती है। जवान एक ऐसी फिल्म है जो सिस्टम को चुनौती देती है। संवैधानिक व्यवस्थाओं पर भी चोट करती है। फिल्म में देश की स्वास्थ्य व्यवस्था बेहतर करने के लिए मंत्री का अपहरण करना जैसी घटनाएं हैं। ये फिल्म एक्शन थ्रिलर है। जनता ने इस फिल्म को खूब पसंद किया था। बताया गया था कि इस फिल्म ने एक हजार करोड़ से अधिक का कारोबार किया था। उन चर्चाओं के दौरान शाह रुख खान के अभिनय की बहुत प्रशंसा हुई हो ऐसा याद नहीं पड़ता। पर जूरी के अध्यक्ष आशुतोष गोवारिकर और अन्य सदस्यों को शाह रुख खान के अभिनय में वो तत्त्व अवश्य दिखे होंगे जो अन्य समीक्षक भांप नहीं पाए। शाह रुख शानदार अभिनेता हैं, उन्होंने वर्षों तक अपने अभिनय से इसको साबित भी किया था। 2004 में जब उनकी फिल्म स्वदेश आई थी तो उनके अभिनय की जमकर सराहना हुई थी। उस वर्ष के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार सैफ अली खान को दिया गया था। एक अवसर पर शाह रुख का दर्द झलका भी था। उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा भी था कि स्वदेश के लिए उनको राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना चाहिए था। फिल्म स्वदेश और फिल्म हम तुम या यों कहें कि शाह रुख और सैफ के साथ दो संयोग हैं। जब सैफ को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला था तब उनकी मां शर्मिला टैगोर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की अध्यक्ष थीं। शाह रुख को नेशनल अवार्ड मिला है तो जूरी के चेयरमैन आशुतोष गोवारिकर हैं जो स्वदेश के निर्देशक थे। इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर इन दो संयोगों की खूब चर्चा हो रही है। पर स्वदेश के लिए शाह रुख को अवार्ड नहीं मिलने का कारण अलग था। स्वदेश रिलीज हुई थी तब निर्देशक टी एस नागबर्ना ने आरोप लगाया था कि स्वदेश उनकी फिल्म चिगुरिदा कनासू की नकल है। 2004 के राष्ट्रीय अवार्ड की जूरी के चेयरमैन सुधीर मिश्रा थे। अन्य सदस्यों के साथ टी एस नागवर्ना भी उस समिति में थे। जूरी के सामने स्वदेश का प्रदर्शन हुआ तो नागबर्ना ने वहां बताया था कि स्वदेश उनकी फिल्म की नकल है। उसके बाद जूरी के सदस्यों को चिगुरिदा कनासू दिखाई गई। सर्वसम्मति से निर्णय हुआ कि स्वदेश के लिए शाह रुख खान को पुरस्कार नहीं दिया जा सकता है। पहली बार ऐसा नहीं हुआ था। पहले भी और 2004 के बाद भी इस आधार पर कई फिल्मों और अभिनेताओं को पुरस्कार के योग्य नहीं माना गया। इसलिए सैफ अली खान के राष्ट्रीय पुरस्कार को शर्मिला टैगोर से जोड़ना गलत है। चर्चा तो उन बातों की भी हो जाती है जिसका होना ही संदिग्ध होता है। 

12वीं फेल के लिए विक्रांत मैसी का चयन अच्छा है। विक्रांत मैसी ने अपने अभिनय कौशल से ध्यान खींचा है। हाल ही में आई उनकी फिल्म साबरमती रिपोर्ट में भी उनका अभिनय शानदार है। द केरल स्टोरी के निर्देशक सुदीप्तो सेन ने भी धारा के विपरीत जाकर फिल्म बनाई। द केरल स्टोरी को लेकर काफी विवाद हुए। मामला कोर्ट में भी गया। कई राज्यों में उसको अघोषित प्रतिबंधित भी झेलना पड़ा। पर इस फिल्म ने भारतीय समाज में धीरे-धीरे जगह बनाते लव जिहाद के खतरों से दर्शकों को अवगत करवाया था। निर्देशक के तौर पर सुदीप्तो सेन ने इस फिल्म से अपनी पहचान स्थापित की। उनको पुरस्कार देना वैकल्पिक धारा की फिल्मों का स्वीकार है। एक और फिल्म ने ध्यान खींचा वो है हिंदी फिल्म कटहल। छोटे बजट की इस फिल्म की खूब चर्चा रही थी। कहानी और उसके ट्रीटमेंट को लेकर। सिनेमा पर सर्वश्रेष्ठ लेखन का पुरस्कार असम के उत्पल दत्ता को मिला। वो काफी लंबे समय से फिल्मों पर असमी और अंग्रेजी में लिख रहे हैं। इस श्रेणी में किसी पुस्तक का चयन नहीं होना चौंकाता है। चयन समिति के सामने अंबरीश रायचौधरी की श्रीदेवी पर लिखी अंग्रजी की पुस्तक, अमिताव नाग की सौमित्र चटर्जी पर लिखी पुस्तक, यतीन्द्र मिश्र की गुलजार पर लिखी पुस्तक के अलावा अन्य भाषाओं की दो दर्जन से अधिक पुस्तकें थीं। घोषणा के समय अन्यत्र व्यस्तता के कारण रायटिंग जूरी के चेयरमैन गोपालकृष्ण पई उपस्थित नहीं थे। मंत्री को जूरी की अनुशंसा के समय की जो तस्वीरें जारी हुई हैं उसमं भी रायटिंग जूरी के चेयरमैन या सदस्य दिख नहीं रहे। ऐसा कम ही होता है कि किसी श्रेणी की जूरी के चेयरमैन या उसके सदस्य मंत्री को अपनी अनुशंसा देने और पुरस्कार की घोषणा के समय अनुपस्थित रहें। जूरी चेयरमैन या उनके प्रतिनिधि को ये बताना चाहिए था कि किन कारणों से किसी पुस्तक का चयन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के लिए नहीं किया गया।कोरोना महामारी के बाद भी एक वर्ष ब्रेस्ट क्रिटिक का अवार्ड घोषित नहीं किया गया। तब उसका कारण ये बताया गया था कि जूरी ने किसी भी प्रविष्टि को पुरस्कार के योग्य नहीं माना। उस वर्ष वैध एंट्री की संख्या बहुत ही कम थी। अब पुरस्कारों की घोषणा हो गई है। 2024 के पुरस्कारों का चयन भी जल्द हो ताकि 2025 के पुरस्कारों की घोषणा समय से हो सके।  


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Saturday, April 7, 2018

फिल्मों के सामाजिक सरोकार


जॉर्ज बर्नाड शॉ ने 1930 में सिनेमा को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही थी। उनके मुताबिक सिनेमा लोगों के दिलोदिमाग को गढ़ेगा और उनके आचरण को प्रभावित करेगा। युवा वर्ग पर उसके दुष्प्रभाव की अवधारणा का उन्होंने निषेध किया था। वो मानते थे कि यह फिल्म पर भी निर्भर करता और युवा मस्तिष्क पर भी। हर कला में अच्छी और बुरी दोनों तरह की शक्ति होती है, जब आप किसी को लिखना सिखाते हैं तो आप उसे फर्जी चेक बनाना भी सिखाते हैं और अच्छी कविता लिखना भी।जॉर्ज बर्नाड शॉ के इस कथन का अचानक स्मरण तब हो उठा था जब पिछले दिनों किसी फिल्म देखने के पहले रानी मुखर्जी अभिनीत फिल्म हिचकी का ट्रेलर आया था। उस ट्रेलर को देखकर साथ बैठे एक दंपति की बातचीत बेहद दिलचस्प थी। ट्रेलर के बाद पत्नी ने सहज भाव से पति से पूछा कि ये हिचकी कैसी है जो इतने जोरों से आती है। पति ने भी उसी सहजता से उत्तर दिया कि अरे यार फिल्म है कुछ भी हो सकता है। बातचीत बेहद सामान्य थी लेकिन जब हिचकी फिल्म देखी तो लगा कि ये एक ऐसी बीमारी पर केंद्रित फिल्म है जिसके बारे में आमजन को ज्यादा पता नहीं है। ये बीमारी है टूरेट सिंड्रोम जिसके बारे में हमारे देश में बहुत ही कम लोगों को पता है । ये एक न्यूरोसाइकेट्रिक समस्या है जो किसी को भी बचपन से ही हो सकती है। कोई भी बच्चा इस न्यूरोसाइकेट्रिक समस्या की चपेट में क्यों आता है इसकी सही वजह का पता नहीं चल पाया है। दरअसल इससे ग्रस्त बच्चों में कंधे के उपर के हिस्से में अचानक मूवमेंट होती है, कोई आंख मिचकाता है, कोई कंधों को हिलाता है और कोई बार-बार नाक सिकोंड़ता है आदि आदि। चूंकि इसके बार मे ज्यादा लोगों को पता नहीं है लिहाजा बच्चों में इस तरह के व्यवहार को लेकर माता-पिता असवाधानी कर जाते हैं। उनको लगता है कि उनके बच्चे बदमाशी में ऐसा कर रहे होते हैं। फिल्म हिचकी के माध्यम से इस समस्या के बारे में समाज को बताया गया है। यह फिल्म ब्राड कोहेन की आत्मकथा फ्रंट ऑफ द क्लास, हाउ टूरेट सिड्रोम मेड मी द टीचर आई नेवर हैड पर आधारित है। विशेषज्ञों के मुताबिक टिक या टूरेट सिंड्रोम के शिकार बहुत कम बच्चे होते हैं। एक अनुमान के मुताबिक पंद्रह सत्रह हजार बच्चों में से एक बच्चे इसके शिकार होते हैं। इस पूरी बात को बताने का मकसद ना तो इस समस्या के बारे में बात करना है और ना ही इस सिड्रोम से ग्रस्त बच्चों का लक्ष्ण बताना उद्देश्य है। उद्देश्य है सिर्फ फिल्म की उस भूमिका को रेखांकित करना जिसमें वो समाज को शिक्षित भी करता है और किसी खास विषय को लेकर जनता को जागरूक भी करता है। हिचकी फिल्म के माध्यम से इसके निर्माताओं ने अपनी उस भूमिका का निर्वाह भी किया है।
इसी तरह से अगर हम देखें तो 2007 में आमिर खान अभिनीत फिल्म आई थी तारे जमीं पर। ये पूरी फिल्म आठ साल के बच्चे ईशान के इर्द गिर्द घूमती है। ईशान डिस्लेक्सिया का शिकार है। इस फिल्म में ईशान पढाई में जब अच्छा नहीं कर पाता है तो उसको उसके माता पिता बोर्डिंग स्कूल में भेज देते हैं जहां वो परेशान होकर खुदकुशी तक करने की सोचता है क्योंकि उसके आसपास का परिवेश बच्चे की समस्या को नहीं समझ पाता है। उसको जिस संवेदनशील व्यवहार की जरूरत होती है वो उसको ना तो अपने परिवार से मिलता है ना ही समाज से और ना ही स्कूल के परिवेश से। जानकारी के अभाव में इस तरह के बच्चों के साथ उनके माता पिता मारपीट करते हैं जो उसके लिए घातक होता है। परिवार के लोगों को लगता है कि बच्चा जानबूझकर पढाई नहीं करना चाहता है लिहाजा पिटाई कर उसपर पढ़ने के लिए दबाव बनाया जाता है।
डिसलेक्सिया के अलावा बहुत सारे बच्चे ऑटिज्म के भी शिकार होते हैं जिन्हें हमारा समाज जागरूकता के अभाव में पागल तक समझने लगता है। जबकि ऐसा होता नहीं है। इस तरह के बच्चों को संवेदना की दरकार होती है और उनके व्यवहार को नियंत्रित कर और उनकी समस्या को समझकर अगर उनके साथ उचित व्यवहार किया जाए तो बहुत हद तक वो ठीक होने लगते हैं। पूरी दुनिया में ऐसे कई उदाहरण है जब डिसलेक्सिया या ऑटिज्म के शिकार बच्चे अपनी जिंदगी में बहुत अच्छा करते हैं। अलबर्ट आइंस्टीन, बिल गेट्स, स्टीव जॉब्स से लेकर मोजार्ट तक इसके उदाहरण हैं। आमिर खान की इस फिल्म तारे जमीं पर के रिलीज होने के बाद हमारे देश में जनता के बीच एक खास तरह की जागरूकता देखने को मिली। डिसलेक्सिया से लेकर ऑटिज्म तक पर बात होने लगी। ऑटिज्म के अलग अलग स्पेक्ट्रम को लेकर लोगों में जागरूकता फैली। बहुत सारे लोगों का, अभिभावकों का, स्कूलों का इस तरह के बच्चों के साथ व्यवहार बदल गया। हमारा समाज अटेंशन डिफसिट हाइपर एक्टिविटी डिसऑर्डर की समस्या से जूझ रहे बच्चों के प्रति संवेदनशील होने लगा। उसके पहले से भी इसको लेकर कुछ लोगों में जागृति थी लेकिन इस फिल्म के बाद इसकी व्याप्ति कई गुणा बढ़ गई।
2010 में शाहरुख खान की फिल्म आई माई नेम इज खान। इसमें शाहरुख खान ऑटिज्म के स्पेक्ट्रम पर आनेवाले एस्पर्जर सिड्रोंम का शिकार होते हैं। इस फिल्म में परोक्ष रूप से ये संदेश दिया गया था कि एस्पर्जर सिड्रोंम का शिकार व्यक्ति किसी खास काम में बेहद निपुण हो सकता है। इस फिल्म में शाहरुख खान ने रिजवान खान का चरित्र निभाया है जो किसी भी चीज की मरम्मत कर देने की कला में निपुण होता है। बाद में ये फिल्म अमेरिका चली जाती है और वहां की समस्याओं पर फोकस करती है लेकिन कथानक में उन सारी समस्याओं के साथ साथ एस्पर्जर सिंड्रोम भी साथ चलता रहता है। इस फिल्म ने भी इस समस्या के बारे में जनता को बताया। जागरूकता बढ़ाई। फिल्म एक बेहद सशक्त माध्यम है और मनोरंजन के अलावा समाज के प्रति उसका एक उत्तरदायित्व लोगों के बीच किसी समस्या और उसके समाधान के बारे में जागरूकता फैलाना भी है। तारे जमीं पर के रिलीज के दो साल बाद 2009 में आर बाल्कि ने अमिताभ बच्चन के साथ पा फिल्म बनाई। इस फिल्म में नायक प्रोजोरिया जैसी दुर्लभ बीमारी से ग्रस्त है। प्रोजोरिया एक ऐसा जेनेटिक डिसऑर्डर है जिसमें उससे ग्रस्त बच्चा बहुत कम उम्र में बुजुर्ग दिखने लगता है। इसी तरह से ब्लैक फिल्म में अल्जाइमर को केंद्र में रखा गया है। इस तरह की फिल्में जनता को पसंद भी आती हैं। इस तरह की दुर्लभ बीमारियों को केंद्र में रखकर जितनी भी फिल्में बनी लगभग सभी व्यावसायिक दृष्टि से सफल भी रहीं क्योंकि ये लोगों के दिलों को छूती हैं। इन फिल्मों की माउथ पब्लिसिटी इतनी जबरदस्त होती है कि वो दर्शकों को सिनेमा हॉल तक खींच लाती है।
सत्तर के पहले बनने वाली फिल्मों में बीमारियों का चित्रण लोगों की भवनाओं को ध्यान में रखकर किया जाता था। पहले तो हीरो या फिर उसकी मां या परिवार का कोई अहम सदस्य टीबी का शिकार होता था और बाद में उसको कैंसर जैसी घातक बीमारी होने लगी थी। हिंदी फिल्मों के फिल्मकारों ने टी वी जैसी बीमारी का इस्तेमाल ज्यादातर किसी परिवार के गरीबी के चित्रण के तौर पर किया। इसी तरह से कैंसर जैसी असाध्य बीमारी को भी फिल्मकारों ने इस्तेमाल किया । जैसे हर्षिकेश मुखर्जी ने आनंद या मिली में इस बीमारी को अपनी कहानी में इस तरह से पिरोया कि सिनेमा हॉल में दर्शक सुबकते नजर आए थे। दर्द का रिश्ता में कैंसर की बीमारी से उपजी संवेदना को केंद्र में रखा गया लेकिन उसके बाद के फिल्मकार संवेदना से आगे जाकर समस्याओं को केंद्र में रखकर जनता को संदेश देने लगे।
मूक फिल्मों से शुरू होकर आज तक की हिंदी फिल्मों के बिंब लगातार बदल रहे हैं। रंग और ध्वनि के बदलते प्रयोगों के बीच फिल्मों के विषयों को लेकर भी लगातार नए प्रयोग हो रहे हैं। अब वो दौर खत्म हो गया कि फिल्मों को व्यावसायिक और अव्यावसायिक की श्रेणी में बांटकर विचार किया जाए। हिंदी फिल्मों कला और व्यावसायिक फिल्मों में बंटवारे का दौर भी देखा। उस दौर में कुछ बेहद अच्छी फिल्में बनीं लेकिन वो कारोबार की दृष्टि से अच्छा नहीं कर पाईं। उसका नतीजा यह हुआ कि अच्छी फिल्म बनानेवालों के पास संसाधनों की कमी रही और वो धारा सूख गई। अब जबकि यथार्थपरक फिल्मों के नाम पर कोई अलग खांचा नहीं बचा तो हिंचकी, तारे जमीं पर, माई नेम इज खान, ब्लैक जैसी फिल्में उस कमी को भी पूरा कर रही हैं और अच्छी कमाई कर इस तरह की फिल्में बनाने वालों के हाथ भी मजबूत कर रही हैं।