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Saturday, August 28, 2021

विभाजन विभीषिका पर उदासीन साहित्य


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पहले एक ट्वीट किया। लिखा कि ‘देश के बंटवारे के दर्द को कभी भुलाया नहीं जा सकता। नफरत और हिंसा की वजह से हमारे लाखों बहनों भाइयों को विस्थापित होना पड़ा और अपनी जान तक गंवानी पड़ी। उन लोगों के संघर्ष और बलिदान की याद में 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के तौर पर मनाने का निर्णय लिया गया है।‘  केंद्र सरकार के इस फैसले पर राजनीति आरंभ हो गई है। हम राजनीति से इतर साहित्य सृजन के आइने में विभाजन की विभीषिका को परखने की कोशिश करते हैं। 1947 में हमारे देश का बंटवारा हुआ। उसके बाद के हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर नजर डालें तो इस विषय को केंद्र में रखकर बहुत कम लेखन नजर आता है। ले-देकर यशपाल की औपन्यासिक कृति ‘झूठा सच’ का दो खंड और भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’ का नाम याद पड़ता है। बदीउज्जमा के उपन्यास ‘छाको की वापसी’ के अलावा सच्चिदानंद हीरानंद  वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, मोहन राकेश और कृष्णा सोबती ने कुछ कहानियां लिखी हैं। बहुत बाद में आकर कमलेश्वर ने भी लिखा। भीष्म जी को भी तमस लिखने में बीस साल से अधिक लगे। कथा साहित्य में तो कुछ रचनाएं मिलती भी हैं लेकिन कवियों ने तो इस ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया, प्रतीत होता है। अज्ञेय की ही एक कविता ‘शरणार्थी’ का स्मरण होता है। वामपंथी लेखक जिन मुक्तिबोध को अपना सबसे बड़ा कवि मानते और प्रचारित करते हैं उनकी रचनाओं में भी विभाजन की विभीषिका नहीं दिखाई देती है। दूसरी तरफ गुरुदत्त जैसे राष्ट्रवादी लेखकों ने विभाजन पर कम से कम आधा दर्जन उपन्यास लिखे। लेकिन गुरुदत्त को इन कथित प्रगतिशील लेखकों और आलोचकों ने साहित्य के परिदृश्य से ओझल कर दिया। उनकी विभाजन पर लिखी रचनाओं पर न तो आलोचनात्मक लेख लिखे गए और न ही किसी विमर्श में उनका नामोल्लेख किया जाता है। बावजूद इसके जब भी हिंदी में विभाजन पर लिखे साहित्य की बात होगी तो गुरुदत्त का नाम लेना ही पड़ेगा।  

स्वाधीनता के बाद हिंदी साहित्य में प्रगतिशीलता का झंडा लेकर घूमनेवाले लेखकों का बोलबाला रहा है। कई तरह के साहित्यिक आंदोलन चले लेकिन उन आंदोलनों में कहीं भी विभाजन की विभीषिका के दर्द और संघर्ष को जगह नहीं मिल पाई है। लाखों लोगों की जान गई, उससे अधिक लोग विस्थापित हुए। मरनेवालों के परिवार और विस्थापित समूहों के दर्द को हिंदी साहित्य के लेखक पकड़ नहीं पाए। पिछले दिनों मार्क्सवादी लेखक जगदीश्वर चतुर्वेदी से बात हो रही थी तो उन्होंने एक बेहद चौंकानेवाला तथ्य बताया। 15 अगस्त 1947 में जब देश स्वाधीन हुआ तो उसके अगले महीने यानि सितंबर में प्रयागराज (तब इलाहाबाद) में प्रगतिशील लेखक संघ की एक बैठक हुई। उस बैठक में उस वक्त के तमाम छोटे-बड़े लेखक शामिल हुए थे। सितंबर 1947 में हुए प्रगतिशील लेखक संघ की इस बैठक में 22 प्रस्ताव पास किए गए थे। इन 22 प्रस्तावों में कहीं भी विभाजन की चर्चा तो दूर की बात उसका उल्लेख तक नहीं था। ये वो दौर था जब पूरे देश में सिर्फ विभीषिका की चर्चा ही हो रही थी। यह तथाकथित प्रगतिशील लेखकों की अज्ञानता नहीं हो सकती है ये तो उदासीनता थी। बैठक के एक प्रस्ताव में एक या डेढ़ पंक्ति में सांप्रदायिकता की बात कही गई थी। ये चर्चा भी इस वजह से हुई कि प्रगतिशील लेखक संघ की बैठक के एक दिन पहले शाम को प्रयागराज के मुस्लिम बहुल इलाके में छुरेबाजी की घटना हुई थी। जिसकी वजह से प्रस्ताव में सांप्रदायिकता का उल्लेख हुआ था। ये वही प्रगतिशील लेखक संघ है जिसने 1975 में इमरजेंसी लगाए जाने के बाद दिल्ली में हुई अपनी बैठक में उसका समर्थन किया था। इमरजेंसी के समर्थन में प्रस्ताव पास किया था। इसलिए यह तर्क नहीं दिया जा सकता है कि लेखक संघों की बैठक में राजनीतिक मसलों पर प्रस्ताव पास नहीं किए जाते थे। विभाजन का दर्द वैसे भी राजनीतिक मसला नहीं था बल्कि वो सामाजिक और मानवीय मसला था। मानवता के कलेजे पर भोंके गए इस खंजर का दर्द उस समनय के हिंदी के लेखक महसूस नहीं कर सके।  

दरअसल अगर हम समग्रता में विचार करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि जिन लेखकों की आस्था कम्युनिस्ट पार्टियों में थीं वो विभाजन को लेकर उदासीन रहे, उसके दर्द को लेकर खामोश रहे। अपनी इस उदासीनता को उन्होंने बहुत करीने से दबाए रखा। वो लगातार ये नारा लगा रहे थे कि ‘ये आजादी झूठी है, देश की जनता भूखी है’ । ये नारा नहीं कम्युनिस्टों की मानसिकता को दर्शा रहा था। स्वाधीनता का ये अस्वीकार क्यों था। ये एक अलग लेख की मांग करता है। जब एक संप्रभु राष्ट्र जन्म ले रहा था तो ये कम्युनिस्ट उसका स्वागत करने की बजाए उसपर प्रश्न खड़े कर रहे थे। जब देश में लोकतंत्र स्थापित हो रहा था तो ये भूख और गरीबी का नारा लगाकर लोकतंत्र का मजाक उड़ा रहे थे। इनको ये बुनियादी बात समझ नहीं आ रही थी कि अगर देश स्वतंत्र नहीं होगा तो भूख और गरीबी कैसे हटेगी। दरअसल ये कम्युनिस्ट मन से स्वाधीनता के विरोधी थे। ये अनायास नहीं था कि देश के स्वतंत्र होने के 74 साल बाद कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने कार्यालय पर तिरंगा झंडा फहराया। जब मातृ संगठन की ये सोच होगी तो उससे संबद्ध लेखक संगठन और उन लेखक संगठनों से जुड़े लेखक भी तो इसी सोच के आधार पर सृजन करेंगे। हिंदी साहित्य में विभाजन की विभीषिका पर कहानी-कविता तो कम लिखी ही गईं कोई विमर्श भी नहीं हुआ। तो क्या ये माना जाए कि कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रभाव में ऐसा किया गया। 

दूसरा तर्क ये हो सकता है कि विभाजन के समय सक्रिय हिंदी के लेखकों की सोच का दायरा बहुत छोटा रहा। उनकी संवेदना में विभाजन का दर्द या विस्थापन की पीड़ा आ ही नहीं सकी। वो जिस भौगोलिक क्षेत्र में रहते थे वहां का विभाजन नहीं हुआ तो वो स्वतंत्र भारत की इस घटना को महसूस नहीं कर सके। पंजाब का विभाजन हुआ तो पंजाबी साहित्य में विभाजन को लेकर, उसके अलग अलग पहलुओं को लेकर विपुल लेखन हुआ। बंगाल का विभाजन हुआ तो बंगला में विभाजन पर, उसके असर को लेकर कई उत्कृष्ट कृतियां हैं। ये सही है कि हिंदी प्रदेश का भौगोलिक विभाजन नहीं हुआ लेकिन हिंदी प्रदेशों ने विभाजन की विभीषिका को तो बहुत करीब से देखा तो था ही। हिंदी के लेखकों की संवेदना क्यों नहीं झंकृत हुईं, ये आश्चर्य की बात है। इसी भौगोलिक प्रदेश के इतिहासकारों ने विभाजन को लेकर बहुत लिखा। भारत विभाजन के राजनीतिक पक्ष भी बहुत लिखा गया लेकिन हिंदी के लेखक अलग अलग विषयों में उलझे रहे। कहानी कविता से इतर आकर अगर आलोचना पर भी विचार करें तो वहां भी देश के बंटवारे को लेकर कोई डिस्कोर्स नहीं दिखता। रामविलास जी से लेकर नामवर सिंह तक के लेखन में इस विषय को प्रमुखता नहीं मिलती है। नामवर सिंह तो उर्दू के भी जानकार माने जाते हैं, उनको बंगला का भी ज्ञान था लेकिन उनके लेखन में भी विभाजन की बात नहीं आना हैरत में डालता है। बात घूम फिरकर वहीं पहुंचती है कि कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रभाव में रहनेवाले लेखकों को विभाजन का दर्द या तो समझ नहीं आया या फिर वो जानबूझकर उस वक्त हुए नरसंहार और विस्थापन को लेकर आंखें मूंदे बैठे रहे। अब अगर विभाजन विभीषिका दिवस की घोषणा हुई है तो एक बार फिर से हिंदी के लेखकों को अपनी इस ऐतिहासिक भूल पर विचार करना चाहिए और उसको सुधारने का उपक्रम भी। 


Sunday, September 27, 2015

मुक्तिबोध संचयन

वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने एक बार हिंदी कविता को लेकर बेहद दिलचस्प बात की । उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध की कविताओं के सामने आने के पहले हिंदी कविता के ज्यादातर महत्वूपूर्ण कवि उत्तरप्रदेश से होते थे । उनकी स्थापना के मुताबिक जब मुक्तिबोध की कविताओं ने हिंदी कविता में अपने को मजबूती से स्थापित किया तो उसके बाद से हिंदी कविता में मध्यप्रदेश के कवियों का दबदबा बढने लगा । अपने तर्क के समर्थन में नरेश जी ने उन्होंने अशोक वाजपेयी से लेकर राजेश जोशी और भगवत रावत तक के नाम गिनाए । इस बारे में मुक्तिबोध के एक और मित्र अशोक वाजपेयी से जब मैंने सवाल किया तो उन्होंने हंसते हुए कहा कि ये बहुत दूर की कौड़ी है लेकिन कौड़ी है अच्छी । अशोक वाजपेयी ने नरेश सक्सेना की बात को अपने अंदाज में लगभग स्वीकार कर किया । मुक्तिबोध को लेकर हिंदी कविता में लंबे समय से बहस चल रही है । उनकी कविताओं को अनेक तरह से व्याख्यायित किया जा रहा है । उनके निधन के बाद से लगातार उनकी कविताओं को लेकर आलोचकों के बीच विमर्श होता रहा है । डॉ रामविलास शर्मा ने उन्नीस सौ अठहत्तर में प्रकाशित अपनी किताब- नई कविता और अस्तित्ववाद में मुक्तिबोध की कविताओं का विस्तार से मूल्यांकन किया था । अपनी किताब में रामविलास शर्मा ने मुक्तिबोध की कविताओं को अस्तित्ववाद और रहस्यवाद से प्रभावित साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी । डॉ शर्मा ने तो मुक्तिबोध को सिजोफ्रेनिया नामक बीमारी से ग्रस्त बताकर एक धुंध का वातावरण बना दिया । बाद में नामवर सिंह ने डॉ रामविलास शर्मा की मुक्तिबोध को लेकर स्थापना का जबरदस्त विरोध किया । इन दो आलोचकों के बीच इस बात को लेकर लंबे समय तक बहस हुई कि कि मुक्तिबोध की रचनाओं में संघर्ष दिखाई देता है वह उनका अपना संघर्ष है या फिर पूरे मध्यवर्ग का संघर्ष है । कालांतर में अन्य आलोचकों ने रामविलास शर्मा की स्थापनाओं पर सवाल उठाए । मुक्तिबोध पर रामविलास शर्मा की स्थापनाओं को आलोचक नंदकिशोर नवल उनके संकीर्णतावादी मार्क्सवादी होने का परिणाम करार देते हैं और कहते हैं कि मुक्तिबोध ना केवल मानसिक रोगी नहीं थे बल्कि अपने युग के सर्वाधिक सुगठित व्यक्तित्ववाले रचनाकार थे । यह मुक्तिबोध की कविताओं की ताकत है कि वो अब तक आलोचकों को चुनौती दे रही है । सितंबर उन्नीस सौ पैंसठ के ज्ञानोदय में कवि श्रीकांत वर्मा का एक लेख छपा था जिसमें उन्होंने कहा था अप्रिय सत्य की रक्षा का काव्य रचनेवाले कवि मुक्तिबोध को अपने जीवन में कोई लोकप्रियता नहीं मिली और आगे भी, कभी भी, शायद नहीं मिलेगी । श्रीकांत वर्मा ने अपने उसी लेख में आगे मुक्तिबोध के कवित्व के वैशिष्ट्य को व्याखायित भी किया था । कालांतर में श्रीकांत वर्मा की आशंका गलत साबित हुई और मुक्तिबोध को उनकी मृत्यु के बाद पर्याप्त ख्याति मिली ।  अब भीमिल रही है । पिछले साल उनकी जन्म शताब्दी के मौके पर हफ्ते भर का कार्यक्रम आदि हुए ।
अभी हाल ही में कवि राजेश जोशी ने मुक्तिबोध संचयन का संपादन किया है । इस संचयन में मुक्तिबोध की कविताओं के अलावा उनकी कहानियां और उनका एक उपन्यास विपात्र संकलित है । इस किताब को देखने के बाद यह लगा कि हिंदी में संचयन के प्रकाशन की परंपरा का पूर्णत विकास होना शेष है । संचयन हिंदी में अंग्रेजी के रास्ते आया है जहां सलेक्टेड वर्क्स की लंबी और समृद्धशाली परंपरा रही है । हिंदी में संचयन को बहुत कैजुअली लिया जाता है । अब अगर हम समीक्ष्य संचयन को ही देखें तो इसमें मुक्तिबोध की एक साहित्यक की डायरी से कुछ भी नहीं लिया गया है जबकि मुक्तिबोध के संचयन की कल्पना उन लेखों के बगैर कैसे की जा सकती है । इस किताब में राजेश जोशी ने दस पन्नों की छोटी से भूमिका लिखी है जिसमें मुक्तिबोध से जुड़े प्रसंगों को ज्यादातर अन्य लेखकों के हवाले से कहा गया है । साहित्यक कृतियों के अलावा उनके व्यक्तिगत प्रसंगों की चर्चा है । मुक्तिबोध का चाय प्रेम और गिरे हुए घर से उबलते हुए चाय को उठा लाना दिलचस्प प्रसंग है । इसी तरह शादी के दौरान चाय पीने के लिए उतर जाना और बारात का उनको छोड़कर आगे बढ़ जाना जैसा प्रसंग पाठकों के लिए रुचिकर है । लेकिन ये सब ऐसे प्रसंग है जो पहले ही विस्तार से लिखे जा चुके हैं ।  
संचयन के संपादक राजेश जोशी का आग्रह है कि मुक्तिबोध की कविताओं को उनकी अन्य रचनाओं के साथ मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए । जैसे अपनी भूमिका की शुरुआत में ही राजेश जोशी ने एक कविता उद्धृत की है अगर मेरी कविताएं पसंद नहीं/उन्हें जला दो/ अगर उनका लोहा पसंद नहीं/उसे गला दो/अगर उसकी आग बुरी लगती है/दबा डालो/इस तरह बला टालो !/  । राजेश जोशी का आग्रह है कि इस कविता के के साथ आत्म वक्तव्य शीर्षक कविता को मिलाकर पढ़ा जाए तो मुक्तिबोध की काव्य प्रक्रिया  और कविता के साथ उनके सरोकारों को समझा जा सकता है । उनकी बेचैनी, उऩके तनाव, उनकी कविता के बार-बार बनते बदलते, कई कई प्रारूप और उलके लंबे होते जाने को कुछ हद तक समझा जा सकता है । लेकिन इस संचयन के संपादक राजेश जोशी ने इस किताब में मुक्तिबोध की कविता- एक टीले और डाकू की कहानी को नहीं रखा । माना जाता है कि इस कविता में पहली बार आत्मसंघर्ष पहलीबार बहुत तीखे रूप में सामने आया था । दरअसल इस पूरी भूमिका में राजेश जोशी बहुधा एक पंक्ति लिखकर पूर्ववर्ती लेखको के मुक्तिबोध पर लिखे को कोट करते हैं । पाठकों की यह जिज्ञासा ये जानने में हो सकती है कि राजेश जोशी मुक्तिबोध के बारे में क्या सोचते हैं । एक कवि अपने पूर्ववर्ती कवि के बारे में क्या सोचता है । लेकिन ऐसा हो नहीं सका । मुक्तिबोध की राजनीतिक कविता के बारे में राजेश जोशी क्या सोचते हैं । इस बात पर प्रकाश डाला जाना चाहिए था कि मार्क्सवादी आलोचना से मुक्तिबोध की क्या शिकायत थी । यह जानना भी दिलचस्प होता कि राजेश जोशी इस बारे में क्या सोचते हैं । इस पूरे संचयन को देखने के बाद यह लगता है कि संपादक ने मुक्तिबोध की रचनाओं का चयन कर पाठकों के सामने पेश कर दिया । अच्छा होता अगर राजेश जोशी अपने इस चयन के आधार को विस्तार से सामने रखते । दरअसल येसंचयन ना होकर मुक्तिबोध की कहानियों, कविताओं और एक उपन्यास का संग्रह कहा जा सकता है जो लगभग साढे पांच सौ पन्नों का है । 

Sunday, September 7, 2014

हिंदी कविता का ‘ब्रह्मराक्षस’

हिंदी कविता के महानतम हस्ताक्षरों में से एक गजानन माधव मुक्तिबोध के ऩिधन के पचास साल इसी सितंबर में पूरे हो रहे हैं । सितंबर उन्नीस सौ पैंसठ के नया ज्ञानोदय में कवि श्रीकांत वर्मा का एक लेख छपा था जिसमें उन्होंने कहा था अप्रिय सत्य की रक्षा का काव्य रचनेवाले कवि मुक्तिबोध को अपने जीवन में कोई लोकप्रियता नहीं मिली और आगे भी, कभी भी, शायद नहीं मिलेगी । श्रीकांत वर्मा ने अपने उसी लेख में आगे मुक्तिबोध के कवित्व के वैशिष्ट्य को व्याखायित भी किया था । कालांतर में श्रीकांत वर्मा की आशंका गलत साबित हुई और मुक्तिबोध निराला के बाद हिंदी के सबसे बड़े कवि के तौर पर ना केवल स्थापित हुए बल्कि आलोचकों ने उनकी कविताओं की नई नई व्याखाएं कर उनको हिंदी कविता की दुनिया में शीर्ष पर बैठा दिया । आलोचकों में मुक्तिबोध की कविताओं का सिरा पकड़ने को लेकर घमासान भी हुआ । डॉ रामविलास शर्मा ने उन्नीस सौ अठहत्तर में प्रकाशित अपनी किताब- नई कविता और अस्तित्ववाद में मुक्तिबोध की कविताओं का विस्तार से मूल्यांकन किया था । अपनी किताब में रामविलास शर्मा ने मुक्तिबोध की कविताओं को अस्तित्ववाद और रहस्यवाद से प्रभावित साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी । डॉ शर्मा ने तो मुक्तिबोध को सिजोफ्रेनिया नामक बीमारी से ग्रस्त बता दिया था । नामवर सिंह ने डॉ रामविलास शर्मा की मुक्तिबोध को लेकर स्थापना का जबरदस्त विरोध किया । इन दो आलोचकों के बीच इस बात को लेकर लंबे समय तक बहस हुई कि कि मुक्तिबोध की रचनाओं में संघर्ष दिखाई देता है वह उनका अपना संघर्ष है या फिर पूरे मध्यवर्ग का संघर्ष है । कालांतर में अन्य आलोचकों ने रामविलास शर्मा की स्थापनाओं पर सवाल उठाए । मुक्तिबोध पर रामविलास शर्मा की स्थापनाओं को वरिष्ठ आलोचक नंदकिशोर नवल उनके संकीर्णतावादी मार्क्सवादी होने का परिणाम करार देते हैं और कहते हैं कि मुक्तिबोध ना केवल मानसिक रोगी नहीं थे बल्कि अपने युग के सर्वाधिक सुगठित व्यक्तित्ववाले रचनाकार थे । हिंदी साहित्य में मुक्तिबोध के कम्युनिस्ट होने या नहीं होने को लेकर भी लंबा विवाद चला । मुक्तिबोध कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे यह नेमिचंद्र जैन को उज्जैन से 12 मार्च 1943 को लिखे पत्र से साफ है । उस पत्र में उन्होंने लिखा था कि मैं पुन: पार्टी का सदस्य बना लिया गया हूं । मुझे कुछ निश्चित कार्य दिए गए हैं जिन्हें करना मेरे लिए खुशी की बात है । लेकिन उनकी रचनाओं का निकट से अध्ययन करने के बाद यह साफ होता है कि मार्क्सवाद में उनकी आस्था अवश्य थी लेकिन वो उसको अपने गले में गिरमलहार बनाकर नहीं लटकाए चलते थे ।
लीलाधर मंडलोई के संपादन में नया ज्ञानोदय ने सितंबर का अंक मुक्तिबोध पर एकाग्र किया है । इस अंक में मुक्तिबोध की कुछ अप्रकाशित रचनाओं के अलावा शमशेर बहादुर सिंह, श्रीकांत वर्मा अशोक वाजपेयी समेत कई लेखकों के लेख प्रकाशित हैं । इस अंक से नई पीढ़ी को मुक्तिबोध के बारे में जानने की मदद मिलेगी । श्रीकांत वर्मा ने उन्नीस सौ पैंसठ में आशंका जताई थी कि मुक्तिबोध को शायद कभी लोकप्रियता नहीं मिलेगी । अब यह ठीक से नहीं पता कि श्रीकांत वर्मा का लोकप्रियता से क्या आशय था लेकिन पिछले पचास साल से तो मुक्तिबोध की कविताओं ने हिंदी साहित्य को झकझोर कर रखा हुआ है। उनकी रचनाएं आलोचकों को लगातार चुनौती दे रही जिससे आलोचक मुठभेड़ भी कर रहे हैं । उनकी मशहूर कविता अंधेर में और चांद का मुंह टेढा है को लेकर अब भी आलोचकों में व्याख्यायित करने की होड़ सी लगी है । गजानन माधव मुक्तिबोध की पचासवीं पुण्य तिथिपर उनको नमन