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Saturday, February 7, 2026

जातिसूचक फिल्म शीर्षक पर बवाल


इस सप्ताह मनोज वाजयेपी अभिनीत फिल्म घूसखोर पंडत के नाम पर उठा विवाद उठा। ये फिल्म ओवर द टाप प्लेटफार्म (ओटीटी) नेटफ्लिक्स पर रिलीज होनेवाली थी। उसका ट्रेलर सामने आते ही इसके नाम को लेकर विवाद आरंभ हो गया। कई शहरों में इसके विरुद्ध प्रदर्शन हुए। लखनऊ में केस दर्ज होने और भारत सरकार के दखल के बाद फिल्म के निर्माताओँ ने ना सिर्फ ट्रेलर बल्कि इंटरनेट मीडिया पर मौजूद सभी प्रकार की प्रचार सामग्री हटा ली। फिल्म के निर्देशक ने एक लिखित बयान जारी किया जिसमें अपनी सफाई दी। कहा कि फिल्म का टाइटल एक कालपनिक चरित्र को ध्यान में रखकर तय किया गया था। फिल्म के शीर्षक किसी समुदाय विशेष को लक्षित करने के इरादे नहीं रखा गया था। अपने लंबे बयान में नीरज ने अपने पूर्व के कामों को भी याद किया। ये भी स्वीकार किया कि इस फिल्म के शीर्षक से कुछ लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। वो लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए फिल्म से जुड़ी सभी प्रचारात्मक सामग्री हटा रहे हैं। जल्द ही फिल्म को दर्शकों के सामने पेश करने का भरोसा भी दिया। अपने बयान में नीरज ने कंटेंट के इंटेट की बात भी की। प्रश्न ये उठता है कि बार-बार हिंदुओं को ही क्यों लक्षित किया जाता है। नीरज पांडे को ऐसी कहानी कैसे मिली कि उसमें पंडत को ही घूसखोर दिखाया गया। क्या नीरज पांडे कभी ऐसी कहानी पर काम कर पाएंगें या ऐसी फिल्म बनाने का साहस कर पाएंगे जिसका शीर्षक घूसखोर मौलाना या भ्रष्ट पादरी होगा। उत्तर नकारात्मक ही होगा।

नीरज पांडे की इस फिल्म ने एक बार फिर से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की मंशा पर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। एक बार फिर से ओटीटी प्लेटफार्म के नियमन को लेकर चर्चा होने लगी है। क्या ओटीटी के लिए भी किसी प्रकार के प्रमाणन या नियमन की आवश्यकता है। ये पहली बार नहीं हो रहा है कि ओटीटी प्लेटपार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर जनता का गुस्सा फूटा हो। इसके पहले भी याद करिए जब राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह आयोजित होनेवाला था तो उसके कुछ दिनों पूर्व नेटफ्लिक्स पर एक तमिल फिल्म अन्नपूर्णी रिलीज की गई। नेटफ्लिक्स पर प्रसारित इस फिल्म में दिखाया गया था एक ब्राह्मण लड़की देश का श्रेष्ठ शेफ बनना चाहती है। उसको कहा गया कि इसके लिए उसको नानवेज खाना बनाना होगा। इस फिल्म के संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया। हिंदू लड़की को नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया। तर्क ये दिया गया कि उसने बिरयानी बनाना एक मुस्लिम महिला से सीखा था इसलिए आभार प्रकट करने के लिए उसने नमाज पढ़ी। नेटफ्लिक्स पर आने के बाद इसके संवाद और दृष्य पर मुकदमा हुआ। केस के बाद इसके निर्माता कंपनी ने क्षमा मांगी। इस फिल्म को नेटफ्लिक्स से हटाया गया। ये सब कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर हुआ लेकिन 22 जनवरी को श्रीरामजन्मभमि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के पहले इस तरह के कंटेंट का आना इंटेंट पर प्रश्न तो खड़े करता ही है। सिर्फ नेटफ्लिक्स ही क्यों प्राइम वीडियो पर जब वेबसीरीज तांडव रिलीज हो रही थी तब उसको लेकर भी काफी हंगामा हुआ था। लखनऊ में केस दर्ज हुआ था। प्राइम वीडियो से जुड़ी अपर्णा पुरोहित से लखनऊ पुलिस ने पूछताछ भी की थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुरोहित को अग्रिम जमानत देने से मना कर दिया था। पिछले कई सालों से ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाई जानेवाले वेब सीरीज की सामग्री और फिल्मों को लेकर विवाद होते रहे हैं। हिंदू धर्म प्रतीकों के गलत चित्रण के आरोप लगते रहे हैं। दरअसल स्वनियमन या त्रिस्तरीय नियमन के नाम पर जो व्यवस्था बनाई गई है उसमें बहुत सारे झोल हैं। उन्हीं झोल का फायदा ये प्लेटफार्म्स उठाते रहे हैं। यूजीसी गाइडलाइंस को लेकर समाज का एक वर्ग उद्वेलित था। ऐसे वातावरण में घूसखोर पंडत की घोषणा ने उनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया।

एक दूसरा समाचार जो दिल्ली पुलिस के हवाले से सामने आया। समाचार था दिल्ली से गायब होनेवाली लड़कियों और महिलाओं को लेकर। अचानक इंटरनेट मीडिया पर इस खबर ने जोर पकड़ा कि दिल्ली से भारी संख्या में लड़कियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। रिपोर्ट को इस तरह से प्रस्तुत किया गया कि अमुक अवधि में अमुक संख्या में लड़कियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। सामने आए आंकड़े डरानेवाले थे। रिपोर्ट आधारित समाचार में गुमशुदा लोगों की बरामदगी का उल्लेख नहीं था। बाद में इन आंकड़ों पर विमर्श बढ़ा। देश की राजधानी में जब ये विमर्श बढ़ा तो दिल्ली पुलिस हरकत में आई। पुलिस ने अपने एक्स हैंडल पर पोस्ट करके बताया कि चंद संकेतों या प्रारंभिक जानकारी को जांचने के बाद ये सामने आया कि दिल्ली से गुमशुदा लड़कियों की संख्या पेड प्रमोशन का हिस्सा है। दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया कि डर का माहौल बनाकर लाभ कमाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा और इस तरह का वातावरण बनानेवालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। ये स्पष्ट तो नहीं है कि कौन इस तरह का वातावरण बनाकर लाभ कमाना चाहता है। संयोग है कि इसी समय फिल्म मर्दानी-3 रिलीज हुई थी। इस फिल्म की कहानी भी गुमशुदा लड़कियों और उनकी बरामदगी की है जिसमें रानी मुखर्जी लीड रोल में है। कैसे लड़कियां गायब होती हैं और किन-किन गैंगों का इसमें हाथ रहता है। यह बिल्कुल नहीं कहा जा रहा है कि मर्दानी फिल्म को लाभ पहुंचाने के लिए ही दिल्ली में लड़कियों के गायब होने की रिपोर्ट पर चर्चा हुई। अगर दिल्ली पुलिस कह रही है कि उस रिपोर्ट को प्रचारित करना पेड प्रमोशन का हिस्सा है तो उसको इसकी जांच तो करनी ही चाहिए। पेड प्रमोशन में हिस्सा लेकर लाभ कमाने की कोशिश करनेवालों को दिल्ली पुलिस को सामने लाना चाहिए।

एक तर्क ये भी दिया जा रहा है कि प्रचार के लिए घूसखोर पंडत नाम रख दिया गया। इस तरह के तर्क के बाद दर्शक ये सोचने को विवश हो जाता है कि क्या फिल्मकारों को अब अपनी कला पर भरोसा नहीं रहा। क्या उनको अपनी स्टोरीटेलिंग पर विश्वास नहीं रहा और वो प्रचार के विभिन्न हथकंडों को अपनाने लगा। फिल्म धुरंधर ने 1000 करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस किया लेकिन फिल्म को सफल बनाने के लिए निर्देशक आदित्य धर ने किसी प्रकार के सनसनी फैलाने वाले हथकंडे का उपयोग नहीं किया। आदित्य धर कहानी कहने के अपने हुनर और फिल्म की कहानी पर भरोसा था। दर्शकों ने उस भरोसे को सही साबित किया। धुरंधर को लेकर भी कुछ लोगों ने नकारात्मक प्रचार करने की कोशिश की लेकिन उसको दर्शकों ने नकार दिया। हिंदी फिल्मों में जब से भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से जुड़े लोग कहानी और गाने लिखने लगे तब से ही सनातन धर्म प्रतीकों का उपहास बढ़ा। इस स्तंभ में पिछले दिनों जावेद अख्तर से पूछे गए प्रश्न की चर्चा की थी। वो प्रश्न अब भी अनुत्तरित है कि क्या लेखक का मजहब उसकी कृति को प्रभावित करती है। अब उस प्रश्न का दायरा और बढ़ा देता हूं कि क्या लेखक की विचारधारा कहानी में जबरदस्ती अपने विचार ठूंसती है।

 

Saturday, November 29, 2025

घटनाओं का काल्पनिक कोलाज


हाल ही में दो वेब सीरीज प्रदर्शित हुई। द फैमिली मैन का सीजन तीन और महारानी का सीजन चार। महारानी सीजन चार बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान रिलीज हुई। बिहार की राजनीति को केंद्र में रखकर बनी ये वेबसीरीज उस दौरन चर्चा में रही। प्रधानमंत्री कार्यालय के खबर रोकने के लिए फोन किए जाने के दृश्य को लेकर चुनाव के दौरान विपक्षी ईकोसिस्टम के कुछ लोगों ने माहौल बनाने का प्रयास किया था। इन दोनों सीरीज में समानता है। दोनों कहीं न कहीं राजनीति और उसके दाव-पेंच पर आधारित है। राजनीति के साथ-साथ अपराध और आतंकवाद भी समांतर कहानी के तौर पर चलती है। दोनों वेबसीरीज में लेखक ने पिछले दशकों की राजनीतिक घटनाओं को उठाया है और उसका काकटेल बनाकर एक काल्पनिक कहानी गढ़ने का प्रयास किया है। ऐसी काल्पनिक कहानी जिसमें भारतीय राजनीति की कुछ घटनाएं तो दिखती हैं लेकिन उसका कालखंड मेल नहीं खाता है। कई प्रधानमंत्रियों के स्वभाव और उनके कालखंड में घटी घटनाओं को जोड़कर एक ऐसा प्रधानमंत्री बना दिया गया जिससे कि इसको काल्पनिक कहा जा सके। महारानी सीरीज में जिस प्रधानमंत्री को दिखाया गया है उसमें नरसिम्हाराव से लेकर अटल जी की छवि दिखती है। इसी तरह से फैमिली मैन में महिला प्रधानमंत्री दिखाया गया है लेकिन घटनाएं अलग अलग दौर की जोड़ दी गई हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक किरदार के राजनीतिक पहचान को उजागर तो करना चाहता है लेकिन बचने का रास्ता भी बनाकर चलता है। कहानी कहने की ये प्रविधि अपेक्षाकृत नई है। दर्शकों के सामने ये चुनौती होती है कि वो राजनीति के पात्रों को सीरीज में पहचाने और फिर घटनाओं का आनंद ले।

एक और चीज जो दोनों वेबसीरीज में समान रूप से प्रमुखता से उपस्थित है। वो है इसका अंत। फैमिली मैन के सात एपिसोड देखने के बाद भी दर्शकों को पूर्णता का एहसास नहीं होता और एक जिज्ञासा रह जाती है कि आगे क्या? म्यांमार में आपरेशन के बाद तमाम भारतीय सिपाही और एजेंट भारत लौट आते हैं लेकिन नायक मनोज वाजपेयी म्यांमार की सीमा में ही अचेत होकर गिरते दिखते हैं। सीरीज समाप्त हो जाती है। खलनायक की भूमिका निभा रहे जयदीप अहलावत भी फरार हो जाते हैं और दर्शकों के मन में प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है कि उसका क्या हुआ? वो भी घायल है। महारानी सीरीज में हुमा कुरैशी ने रानी भारती का किरदार निभाया है जिसको पहले सीजन से ही राबड़ी देवी से प्रेरित बताकर प्रचारित किया जा रहा है। इस सीजन में वो प्रधानमंत्री बनना चाहती है लेकिन उसके मंसूबों पर प्रधानमंत्री जोशी पानी फेर देते हैं। राजनीति के इन चालों के बीच उसके बेटे जयप्रकाश भारती और उसके दोस्त की लाश मिलती है। जयप्रकाश क्षेत्रीय दलों को रानी भारती के समर्थन केक लिए तैयार कर रहा था। रानी भारती की बेटी जिसको बिहार की मुख्यमंत्री दिखाया गया है उसको भी एक घोटाले का आरोपी बनाकर जेल में डाल दिया जाता है। इस सीरीज में भी कई घटनाक्रम भारतीय राजनीति से जुड़े हैं। रानी भारती की पार्टी के अधिकतर विधायक उसका साथ छोड़कर नई पार्टी बना लेते हैं। रानी के विश्वस्त मिश्रा के नेतृत्व में बिहार में नई सरकार बनती है। ये दृष्य कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना का विभाजन याद दिलाती है। रानी भारती के बड़े बेटे की लाश मिलती है, बेटी जो मुख्यमंत्री थी अब जेल में है। रानी बिल्कुल अकेली पड़ जाती है। विदेश में पढ़ रहा उसका दूसरा बेटा उसके साथ खड़ा हो जाता है। रानी भारती को पता चलता है कि उसके बेटे की योजनाबद्ध तरीके से हत्या की गई है। जब प्रधानमंत्री जोशी उसके पुत्र के निधन पर संवेदना प्रकट करने आते हैं तो वो उनसे कहती है कि जिस तरह से उसने अपने पति भीमा भारती के हत्यारों को सजा दी उसी तरह से वो अपने बेटे जयप्रकाश के हत्यारों को भी ढूंढ निकालेगी और सजा देगी या दिलवाएगी। कहानी यहीं समाप्त हो जाती है।  

दोनों वेब सीरीज के अंत में दर्शकों को पूर्णता का अहसास नहीं होता है। ऐसा लगता है कि निर्माता या प्लेटफार्म अगले सीजन के लिए उत्सुकता बनाए रखना चाहते हैं। यह ठीक है कि निर्माता और प्लेटफार्म दर्शकों की उत्सुकता बनाए रखने के लिए कहानी को ऐसे मोड़ पर छोड़ देते हैं ताकि दर्शकों को इस बात का अनुमान रहे कि अगले सीजन में कहानी आगे बढ़ेगी। प्रश्न यही उठता है कि जो दर्शक सात और आठ एपिसोड देख रहा है और तीन या चार सीजन देख रहा है उसको पूरी कहानी के लिए कितनी प्रतीक्षा करनी चाहिए। सीक्वल का एक तरीका तो ये भी हो सकता है जो साधरणतया फिल्मों में अपनाया जाता है। फिल्म दबंग या फिर एक था टाइगर, टाइगर जिंदा है और टाइगर 3 को देखा जा सकता है। तीनों फिल्म अपने आप में पूर्ण है लेकिन सीक्वल की संभावना भी बनी हुई है। पर वेब सीरीज तो जैसे दर्शकों के धैर्य की प्रतीक्षा लेना चाहते हैं। क्या दर्शकों को छह सात घंटे देखने के बाद कहानी की पूर्णता नहीं मिलनी चाहिए। इन दोनों सीरीज के आखिर में लगता है कि कुछ मिसिंग है। इस मीसिंग को सीक्वल की संभावना बताकर सही नहीं ठहराया जा सकता है। अगर इसी तरह का व्यवहार दर्शकों के साथ किया जाता रहा तो संभव है कि दर्शकों का वेब सीरीज से मोहभंग हो जाए। वेब सीरीज के लेखक को, फिल्म के निर्देशक को और उसको प्रसारित करनेवाले प्लेटफार्म को इसपर विचार करना चाहिए।

एक और बात जो इन वेब सीरीज से जुड़े लोगों को सोचना होगा कि जिस कालखंड की कहानी दिखा रहे हैं उस कालखंड में वो सारी चीजें होनी चाहिए जो वेब सीरीज में दिखाई जा रही हैं। अगर 2005 के कालखंड की घटनाओं को मुंबई में घटित होते दिखा रहे हैं तो बांद्रा वर्ली सी लिंक कैसे दिखा सकते हैं। 2005 में तो वो बना ही नहीं था। उस कालखंड की कहानी दिखाते समय इस बात का ध्यान भी रखना चाहिए कि उस समय ट्वीटर प्रचलन में था या नहीं। अगर नहीं था तो फिर उस दौर की घटनाओं को ट्वीटर पर ट्रेंड करते हुए कैसे दिखा सकते हैं। ये छोटी बाते हैं लेकिन इनका अपना एक महत्व है। घटनाओं का कोलाज बनाने के चक्कर में इस तरह की छोटी पर महत्वपूर्ण भूल दिख जाती है जो लेखक और निर्देशक की सूझबूझ पर प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं। आज के दौर की कई वेबसीरीज में इस तरह की घटनाएं आपको दिख जाएंगी। कल्पनिकता की आड़ में इस तरह की छूट नहीं ली जा सकती है। कहानी जिस कालखंड में सेट होती है उस कालखंड की विशेषताओं का ध्यान रखना होता है। अलग अलग समय पर हुए प्रधानमंत्रियों के गुणों और अवगुणों को मिलाकर एक चरित्र तो गढ़ सकते हैं लेकिन उस दौर की स्थायी चिन्हों को नहीं बदल सकते। किसी पात्र को संसद भवन ले जाते हैं तो उसको नई संसद के गेट पर उतरते हुए दिखाना होगा ना कि पुरानी संसद के पोर्टिको में। काल्पनिकता को भी एक प्रकार की प्रामाणिकता की जरूरत होती है।  

Saturday, April 20, 2024

फिल्मों से निकलते साहित्यिक संदेश


फिल्मों में रुचि के कारण मित्रों से नई और पुरानी फिल्मों पर चर्चा होती रहती है। आपस में बातचीत करते रहते हैं कि कौन सी फिल्म या वेबसीरीज आई है, किसका ट्रीटमेंट कैसा है, संवाद कैसा है, कौन सी देखी जा सकती है। इसी क्रम में साइलेंस टू का नाम आया। बताया गया कि वो अमुक प्लेटफार्म पर उपलब्ध है। मैंने सोचा, मनोज वाजपेयी की फिल्म है, देख ली जाए। प्रशंसा भी हो रही थी कि अच्छी मर्डर मिस्ट्री है। इस फिल्म को देखने की इच्छा के साथ टीवी आन किया। अलेक्सा का बटन दबाकर कहा, साइलेंस टू। अलेक्सा सर्च करने लगा। चंद पलों में उसने साइलेंस टू को स्क्रीन पर उपस्थित कर दिया। फिल्म का पोस्टर लगा था और नीचे उसकी अवधि भी एक घंटे पचास मिनट उल्लिखित थी। मैंने उसको सेलेक्ट करके चालू कर दिया। फिल्म आरंभ हो गई। मनोज वाजेयी इस फिल्म में थे। कहानी अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी की थी। मेंने देखना आरंभ कर दिया। कुछ अंतराल के बाद मुझे लगा कि गलत फिल्म देख रहा हूं। मैंने उसको बंद किया और फिर अलेक्सा को बोला कि साइलेंट टू दिखाओ। वो फिर वहीं लेकर गया । मैं उसी फिल्म को देखने लगा। करीब पौने घंटे के बाद फिर मुझे लगा कि गलत फिल्म देख रहा हूं। अपने मित्र को फोन करके कहा कि आपने नाम गलत बता दिया । थोड़ी नाराजगी भी दिखाई। उन्होंने फिर से कहा कि साइलेंस टू सर्च करिए और देखिए। अच्छी फिल्म है। मैंने फिर से देखा तो फिल्म के ऊपर छोटे अक्षरों में लिखा आ रहा था साइलेंस टू, मनोज वाजपेयी, प्राची देसाई। मैं फिर निश्चिंत हो गया और आगे देखने लगा। थोड़ी देर बाद ये समझ आ गया कि मैं साइलेंस टू नहीं बल्कि मनोज वाजपेयी की ही एक और फिल्म अलीगढ़ देख रहा था। तबतक एक घंटा देख चुका था। खैर...फिल्म पूरी देख गया। इस फिल्म ने दो सूत्र दे दिए जिसकी चर्चा यहां करना चाहता हूं। पहला तो ये कि अलेक्सा को भी धोखा दिया जा सकता है। किसी ने अलीगढ़ फिल्म के ऊपर साइलेंस टू का थंबनेल लगा दिया था। तकनीकी तौर फिल्म अलीगढ़ को यूट्यूब पर इस तरह से लगाया था कि साइलेंस टू सर्च करने पर वही फिल्म आए। स्तंभ लिखने के पहले एक बार फिर चेक किया। अब भी यही हो रहा था। दरअसल मुझसे गलती ये हो गई थी कि मुझे जी 5 प्लेटफार्म पर जाकर इस फिल्म को सर्च करना चाहिए था। 

दूसरी महत्वपूर्ण बात साहित्य से जुड़ी है। अलीगढ़ फिल्म में प्रोफेसर सिरस (मनोज वाजपेयी) और युवा पत्रकार दीपू (राजकुमार राव) के बीच एक संवाद है। बुजुर्ग प्रोफेसर सिरस युवा पत्रकार दीपू से पूछते हैं कि अच्छा बताओ तुमने किन किन पोएट को पढ़ा है। उत्तर मिलता पोएट, अय्यो! ज्यादा कुछ तो नहीं पढ़ा है...शब्दों का जो खेल है वो सब ऊपर से चला जाता है। प्रोफेसर सिरस कहते हैं कि पोएट्री शब्दों में कहां होती है बाबा। कविता तो शब्दों के अंतराल में मिलती है, साइलेंसेज और पाजेज में होती है। लोग अपने हिसाब से उसका अर्थ निकालते रहते हैं। उम्र और मैच्युरिटी के हिसाब से। समझे। दीपू कहता है, समझा। इसके बाद दीपू उनकी कविता पुस्तक के बारे में पूछता है। प्रोफेसर सिरस बेहद गंभीर भाव भंगिमा में बोलते हैं, नैचुरली आजकल कविता खरीदता कौन है?  और तुम्हारे जेनरेशन के लोगों को तो पोएट्री की समझ ही नहीं है। वो तो हर चीज को किसी न किसी लेबल से चिपकाना चाहते हैं- फैंटेस्टिक, फैबुलस, सुपर, सुपर्ब, कूल और आसम। फिर दोनों की बात केस को लेकर आगे चलती रहती है। संवाद की उपरोक्त पंक्तियों को अगर समकालीन साहित्य के संदर्भ में समझने का प्रयत्न करें तो काफी हद तक ये सही प्रतीत होती है। अगर प्रकाशकों की मानें तो कविता संग्रहों के खरीदार पहले की अपेक्षा में कम हुए हैं। कवियों को अपने संग्रह को प्रकाशित करवाने में संघर्ष करना होता है। समकालीन कविता के एक सशक्त हस्ताक्षर से स्वयं मुझसे कहा कि उन्होंने एक कविता संग्रह तैयार किया था। उसको प्रकाशित करवाना चाहते थे लेकिन प्रकाशक तैयार नहीं हो रहे थे। उनके मुताबिक प्रकाशकों के तर्क थे कि कविता आजकल खरीदता कौन है। कविता के पाठक घट गए हैं। कई बार फिल्मों के संवाद में साहित्यिक यथार्थ उद्घाटित हो जाते हैं। 

कविता के अलावा प्रोफेसर सिरस ने जो एक और बात कही वो भी महत्वपूर्ण है। युवा पत्रकार को जब वो कहते हैं कि तुम्हारी पीढ़ी हर चीज को किसी न लेबल से चिपकाना चाहती है, फैंटेस्टिक, फैबुलस, सुपर, सुपर्ब, कूल और आसम। ऐसा लेबलीकरण इंटरनेट मीडिया पर साफ तौर देखा जा सकता है। अगर किसी ने फेसबुक पर कोई कविता पोस्ट की तो कमोबेश इसी तरह की प्रतिक्रिया अधिक मिलती है। कई बार तो ऐसा लगता है कि कविता बिना पढ़े पोस्ट पर अपनी उपस्थिति दिखाने के लिए प्रशंसात्मक लेबलनुमा टिप्पणी कर देते हैं। यह तो हुई वो बात जो सतह पर दिखती है। प्रो सिरस के लेबल लगानेवाली बात के गंभीर निहितार्थ भी हैं। इस तरह की टिप्पणियों (लेबलीकरण) से खराब कविता लिखनेवालों को बढ़ावा मिलता है। उनको लगता है कि वो पंत और निराला के स्तर की कविताएं लिख रहे हैं। तुकबंदी मिलाने और भावोच्छ्वास को कविता की तरह परोसनेवाले लेखकों का उत्साहवर्धन इतना हो जाता है कि इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म पर इस तरह की कविताएं बहुतायत में उपलब्ध होने लगती है। प्रशंसात्मक टिप्पणियों से उनको लगता है कि वो महान कवि हो गए हैं। अब उनकी कविताओं का संग्रह आना ही चाहिए। वो भावोच्छ्वास और तुकबंदी लेकर प्रकाशकों के यहां पहुंचने लगते हैं। कुछ प्रकाशक, दबाव या अन्य कारणों से संग्रह प्रकाशित भी कर देते हैं। इस तरह के संग्रह कविता के गंभीर पाठकों को भाते नहीं। परिणाम ये होता है कि वो बिक नहीं पाते और कविता को लेकर एक खराब धारणा बनने लगती है। 

इन प्रशंसात्मक लेबलों का एक और गंभीर नुकसान होता है। खराब कविता लिखकर भी प्रशंसा पाने वाले कवियों को ये लगता है कि आलोचकों की कोई भूमिका ही नहीं है। वो खुलेआम ये घोषणा करते नजर आते हैं कि पाठक उनकी कविताओं को पसंद कर रहे हैं तो आलोचकों की आवश्यकता क्या है। कवि और पाठक के बीच तीसरा क्यों ? आलोचकों के इस नकार का परिणाम आज युवा कवि ही सबसे अधिक झेल रहे हैं। संजय कुंदन, प्रेमरंजन अनिमेष, हेमंत कुकरेती की पीढ़ी की कविताओं पर तो कुछ आलोचकों ने विचार किया भी। उनकी कविताओं को रेखांकित किया। उनको साहित्य जगत में कवि रूप में स्थापित किया। इसके बाद की पीढ़ी के कवियों का क्या हुआ ?  इनके बाद की पीढ़ी का आलोचक नहीं होने के कारण अच्छे कवि भी रेखांकित नही हो पा रहे हैं। उनकी पहचान नहीं बन पा रही है। प्रोफेसर सिरस कह रहे हैं कि कविता शब्दों के अंतराल में उसके साइलेंस में होती है। इसी अंतराल और साइलेंस की कविता को उद्घाटित करने का कार्य आलोचक करते हैं। सामान्य लेबलीकरण से न तो अंतराल और न ही साइलेंस के अर्थ पाठकों के सम्मुख आ सकते हैं। आंत में प्रोफेसर सिरस अनुवाद की स्थिति पर भी टिप्पणी करते हुए कहते हैं अनुवाद भी स्तरीय न होने के कारण कविता का रूप बिगड़ जाता है। यह स्थिति सिर्फ कविता की नहीं है। अधिकतर गद्य के अनुवाद भी स्तरहीन हो रहे हैं। सिनेमा को जो लोग सिर्फ मनोरंजन का माध्यम मानते हैं उनको सिनेमा के दृश्यों और संवादों से निकलते संदेशों को पकड़ना चाहिए। कई बार फिल्मों और उसके संवादों से जो संदेश निकलते हैं वो समकालीन रचनात्मकता या सामाजिक संदर्भों पर टिप्पणी होती है।