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Saturday, September 21, 2024

वैश्विक धरोहर पर लापरवाही का पौधा


पिछले दिनों ये आगरा के ताजमहल के गुंबद से पानी टपकने का समाचार चर्चा में आया। कारण ये बताया गया कि ताजमहल के गुंबद पर एक पौधा उग आया था और उसकी जड़ों से होकर पानी टपका। उस पौधे का वीडियो और फोटो इंटरनेट मीडिया पर खूब प्रचलित हुआ। तरह-तरह की टिप्पणियां की गईं। ताजमहल वैश्विक धरोहर की श्रेणी में आता है और इसके रख-रखाव का दायित्व भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण का है। गुंबद से पानी टपकने के समाचार को पढ़ने के बाद जिज्ञासा हुई कि देखा जाए भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण की वेबसाइट पर ताजमहल के सबंध में क्या जानकारियां हैं। भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण की वेबसाइट खोलते ही इसके मुख्य पृष्ठ पर ताजमहल की तस्वीर नजर आती है जहां लिखा भी है कि ये वैश्विक धरोहर है। वैश्विक धरोहर की देखरेख या रखरखाव इस तरह से की जाती है कि उसके ऊपर पौधा उग आए और अधिकारियों को हवा तक नहीं लगे। यहां ये बात ध्यान दिलाने योग्य है कि भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण का एक कार्यालय आगरा में भी है। इतना ही नहीं आगारा किला की एक दीवार पर भी छोटे-छोटे पौधे उग आए हैं और वो बढ़ रहे हैं। उसपर पता नहीं कब तक भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण के जिम्मेदार अफसरों का ध्यान जाएगा। दरअसल इस बात को संस्कृति मंत्रालय के रहनुमाओं को समझना होगा कि संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत को संभालने और सहेजने के लिए संवेदनशील मानव संसाधन की आवश्यकता है। ऐसे मानव संसाधन की जिनको संस्कृति की समझ भी हो और उसको सहेजने को लेकर एक उत्साह भी हो।

ताजमहल की ही अगर बात करें तो ना सिर्फ गुंबद में पौधे उग आए हैं बल्कि ध्यान से देखें तो मुख्य मकबरे में पश्चिम की दिशा में जो पत्थरों के बीच बीच लगे हुए कई शीशे टूटे हुए हैं। शीशे के अलावा भी दीवारों और गुंबदों के अंदर की तरफ की गई पच्चीकारी के रंगीन पत्थर कई जगह से निकले हुए हैं। पच्चीकारी के उन पत्थरों के निकल जाने से उतना क्षेत्र अजीब सा लगता है। पच्चीकारी के पत्थरों की कीमत को कम ही होती है फिर क्या समस्या है। जानकारों का कहना है कि पत्थरों की कीमत भले ही कम होती है लेकिन उसको लगाने में बहुत श्रम और समय लगता है। इस कारण उसको तत्काल नहीं बनवाया जाता है। दूसरा पक्ष ये है कि अगर पच्चीकारी के पत्थरों के टूटने के बाद अविलंब उसकी मरम्मत नहीं की जाती है तो पत्थरों को जोड़ना और भी मुश्किल हो जाता है। क्या भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण के अधिकारी या कर्मचारी ताजमहल का चक्कर नहीं लगाते या उनको ये सब दिखाई नहीं देता है या देखकर अनदेखा किया जाता है। बात तो इसपर भी होनी चाहिए कि क्या भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण के पास इस वैश्विक धरोहर की देखभाल करने के लिए पर्याप्त धन है या नहीं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ ताजमहल में ही आपको इस तरह के लापरवाही दिखाई देगी बल्कि कई विश्व प्रसिद्ध धरोहरों में और सैकड़ों वर्षों से भारतीय शिल्पकला के उदाहरण के तौर पर सीना ताने खड़े इमारतों में भी इस तरह के उदाहरण आपको मिल सकते हैं।

इस स्तंभ में ही पूर्व में इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि किस तरह से ओडिशा के कोणार्क मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगे हाथी की सूंढ में दरार आ जाने के बाद उसको सीमेंट-बालू से भर दिया गया था। कोणार्क सूर्य मंदिर भी यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में है। कोणार्क मंदिर में इस तरह की लापरवाही ना केवल भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण की लापरवाही बल्कि अपने धरोहर को सहेजने की असंवेदनशील प्रवृत्ति को भी सामने लाता है। इसी तरह कभी आप त्रिपुरा के उनकोटि चले जाइए। भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण की लापरवाही का उदाहरण आपको पूरे परिसर में सर्वत्र बिखरा हुआ नजर आएगा। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में लाल किला की प्राचीर से देशवासियों से  पंच प्रण की बात करते हैं जिसमें अपनी विरासत पर गर्व की बात करते हैं। विरासत पर गर्व करने के लिए यह बेहद आवश्यक है कि हम अपनी विरासत को संरक्षित करें। संस्कृति मंत्रालय के अधीन आनेवाली संस्था भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण की अपनी विरासत को सहेजने में लापरवाही और उदासीनता दिखाई देती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में 13 दिसंबर 2022 को राज्यसभा में संस्कृति मंत्रालय की स्टैंडिंग कमेटी ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध संसद की इस समिति ने अपनी रिपोर्ट संख्या 330 में भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण के कामकाज को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए थे। 

रिपोर्ट में समिति ने मंत्रालय/ भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण में धनराशि के उपयोग को लेकर बेहद कठोर टिप्पणी भी की थी। समिति के मुताबिक मंत्रालय ने अपने उत्तर में इस बात का उल्लेख नहीं किया है कि भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण को जो धनराशि आवंटित की गई थी उसका आवंटन और उपयोग किस तरह से किया गया। इसके अलावा भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण में खाली पदों को भरने में हो रहे बिलंब पर भी समिति ने कठोर टिप्पणियां की थी। पता नही उसके बाद क्या हुआ। क्या भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण में विशेषज्ञों की नियुक्ति हुई या अफसरों के भरोसे ही कार्य चलाया जा रहा है। तब समिति की रिपोर्ट में बताया गया था कि भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण के आर्कियोलाजी काडर में 420 पद स्वीकृत हैं जिसमें से 166 पद खाली थे। संरक्षण काडर में कुल स्वीकृत पद 918 थे जिनमें से 452 पद रिक्त थे। संस्कृति मंत्रालय के कामकाज को लेकर संसदीय समिति की इस रिपोर्ट में इस बात पर नाराजगी जताई गई थी कि करीब पचास फीसद पद कैसे खाली हैं। क्या मंत्रालय या भारतीय पुरात्तत्व सर्वेक्षण इस बात का आकलन नहीं कर पाई थी कि भविष्य में कितने पद खाली होनेवाले हैं। 

दरअसल संस्कृति मंत्रालय में कामकाज की एक अजीब सी संस्कृति पनप गई है। मंत्रालय में संवेदनहीन अधिकारियों के साथ साथ उन बाहरी संस्थाओं को कई कार्य करने का दायित्व दिया गया है जिनको संस्कृति की समझ ही नहीं है। किसी पब्लिक रिलेशन एजेंसी को भारतीय संस्कृति को वैश्विक स्तर पर छवि बनाने के काम में लगाया गया था। उनके लोग संस्कृति से संबंद्ध लेखकों-कलाकारों की बैठकों में नोट्स लेते हैं। उसके आधार पर पावर प्वाइंट बनाकर भारतीय संस्कृति की छवि बनाने का कार्य करने का प्रयास करते हैं। पता नहीं ये कार्य हो पाया नहीं लेकिन इन बैठकों में जब पब्लिक रिलेशन कंपनी से जुड़े लोग कलाकारों या शिक्षाविदों से पूछते कि नृत्य या संगीत की इतनी शैलियों को कैसे समेटा जाए तो हास्यास्पद स्थिति बन जाती। सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी ही नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक भारतीय सांस्कृतिक विरासत को लेकर गंभीरता से संवाद और कार्य करने के पक्षधर हैं। बावजूद इसके संस्कृति मंत्रालय के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। सिस्टम अपनी गति से ही चलता रहता है। संस्कृति मंत्रालय में यथास्थितिवाद को झकझोरनेवाला नेतृत्व चाहिए जो संस्कृति की बारीकियों को समझ सके, उसके विविध रूपों को लेकर गंभीर हो और अधिकारियों को प्रधानमंत्री की नीतियों को लागू करने के लिए ना केवल प्रेरित कर सके बल्कि कस भी सके।   

Saturday, September 14, 2024

संस्कृति मंत्रालय का अजीब फरमान


भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की वेबसाइट देखने से पता चलता है इस मंत्रालय के अंतर्गत कई श्रेणियों में संस्थाओं का वर्गीकरण है। कुछ संस्थाएं, जैसे राष्ट्रीय अभिलेखागार और पुरातत्व सर्वेक्षण मंत्रालय से संबद्ध हैं। इसी तरह से कोलकाता की केंद्रीय संदर्भ पुस्तकालय, दिल्ली स्थित नेशनल गैलरी आफ मार्डन आर्ट और राष्ट्रीय संग्रहालय आदि मंत्रालय के अधीनस्थ कार्यालय हैं। एक श्रेणी स्वायत्त संस्थाओं की है। जिसमें दिल्ली स्थित साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, इंदिरा गांधी कला केंद्र जैसी संस्थाएं हैं। इनके अलावा भई अन्य संस्थाएं भी स्वायत्त संस्थाओं की श्रेणी में हैं। वेबसाइट पर एक मजेदार बात पता चली कि साहित्य अकादमी का नाम साहित्य कला अकादमी है। ये गड़बड़ी हिंदी भाषा में है। अंग्रेजी में सही नाम है। ये भूल हो सकती है लेकिन मंत्रालय की वेबसाइट पर इस तरह की गलतियां लापरवाही को दर्शाती हैं। खैर...। मोटे तौर पर स्वायत्त संस्थाओं का अर्थ ये है कि संस्कृति मंत्रालय इन संस्थाओं को अनुदान देती है और ये संस्थाएं अपने उद्देश्यों के हिसाब के कार्य करती है। सैद्धांतिक रुप से यही व्यवस्था है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में इसके ट्रस्टी मिल बैठकर निर्णय लेते हैं। इसी तरह से साहित्य अकादमी की साधारण सभा और कार्यकारी परिषद निर्णय लेती है। संगीत नाटक अकादमी में भी यही व्यवस्था है। साहित्य अकादमी में तो हर पांच वर्ष में चुनाव होता है और साधारण सभा के सदस्यों के साथ साथ अध्यक्ष और उपाध्य़क्ष भी चुने जाते हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के ट्रस्टियों और अध्यक्ष का चयन भारत सरकार करती है। इसी तरह से ललित कला अकादमी के अध्यक्ष का चयन राष्ट्रपति करते हैं। 

संस्कृति मंत्रालय की स्वायत्त संस्थाओं की चर्चा करने के पीछे कारण ये है बीते 19 जुलाई को संस्कृति मंत्रालय के अकादमी प्रभाग के इन स्वायत्त संस्थाओं के अध्यक्षों और चेयरमैन को मिलनेवाली सुविधाओं को लेकर एक गाइडलाइन जारी किया है। गाइडलाइन में इस बात का उल्लेख किया गया है कि मंत्रालय का अकादमी प्रभाग सात संस्थाओं के प्रशासनिक मामलों को देखता है। मंत्रालय का ये भी कहना है कि इन सात अकादमियों का नेतृत्व अध्यक्ष या चेयरमैन के द्वारा किया जाता है जिसका चयन केंद्र सरकार करती है। उनकी चयन प्रक्रिया, उनके दायित्व, और उनकी शक्तियां अलग अलग संस्थाओं के संविधान में उल्लिखित हैं। लेकिन इन संस्थाओ के दस्तावेज में अध्यक्ष या चेयरमैन को मिलनेवाली सुविधाओं में भिन्नता है। इसमें एकरूपता लाने के लिए अकादमी प्रभाग ने कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग से मशिवरा करने के बाद एक गाइडलाइन जारी की। इस गाइडलाइन के बारे में निर्णय लेनेवालों की जानकारी का स्तर देखिए। साहित्य अकादमी के अध्यक्ष का चुनाव होता है। केंद्र सरकार उनको नियुक्त नहीं करती है। थोड़ी जांच कर ली जाती तो भद नहीं पिटती। लेकिन जहां संस्था का नाम ही सही न लिखा जाए उनसे इतनी जानकारी की उम्मीद बेमानी है। 

अब गाइडलाइन पर नजर डालते हैं। पहले बिंदु में कहा गया है कि इन सभी अध्यक्षों पर सेंट्रल सिविल सर्विसेज आचरण नियम लागू होंगे। इसका अर्थ ये हुआ कि संस्कृति मंत्रालय इन स्वायत्त संस्थाओं के अध्यक्षों और चेयरमैन को सरकारी कर्मचारी मानती है। जबकि इनके चेयरमैन और अध्यक्ष पद मानद है। इतना ही नहीं इन सबको गोपनीयता अधिनियम 1923 के अंतर्गत नियमों के पालन करने की सलाह दी गई है। अपेक्षा की गई है कि इनकी नियुक्ति के समय ही बताना चाहिए कि उनको सरकारी घर और वेतनभोगी कर्मचारियों को मिलनेवाली अन्य सुविधाएं नहीं मिलेंगी। उनको ना तो वेतन मिलेगा और ना ही वेतनभोगी जैसी सुविधाएं। सिर्फ वेतभोगियों वाले नियम लागू होंगे। आगे कहा गया है कि इनको मानदेय के रूप बड़ी धनराशि नहीं दी जा सकेगी लेकिन बैठकों में भाग लेने का जो मानदेय होता है वो संस्था की नीति निर्धारक समिति तय करेगी। इसमें भी सीमा तय की गई है कि महीने में दस से अधिक बैठक नहीं होगी। देश में यात्रा भी तभी कर सकेंगे जबकि फोन, ईमेल और वीडियो कांफ्रेंसिंग का विकल्प उपलब्ध नहीं होगा। ये भी स्पष्ट किया गया है कि चेयरमैन और अध्यक्ष भारत सरकार के कर्मचारियों के वेतनमान के स्तर 14 और उससे उच्च स्तर के वेतनमान वाले अधिकारियों के समकक्ष सुविधाएं ले सकेंगे। लेकिन ये नहीं बता गया है कि इसको तय कौन करेगा। बिजनेस या क्लब क्लास में हवाई यात्रा, होटल में प्रतिदिन रु 7500 का कमरा, रु 1200 का भोजन और टैक्सी भत्ता। इसके अलावा भी कुछ और हिदायतें दी गई हैं। 

गाइडलाइन को समग्रता में देखने पर ये प्रतीत होता है कि संस्कृति मंत्रालय के जिस भी अधिकारी ने इसको तैयार किया है उसका उद्देश्य संस्थाओं की स्वायत्तता को बाधित करना है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के चेयरमैन और सदस्य सचिव का उदाहरण लें तो सदस्य सचिव भारत सरकार के सचिव के समकक्ष होते हैं। उसी अनुसार उनका वेतन और अन्य सुविधाएं परिभाषित हैं। नई गाइडलाइ के मुताबिक अध्यक्ष को संयुक्त सचिव के बराबर सुविधाएं मिलेंगी। ये कैसी विडंबना और विसंगति है कि पदानुक्रम में ऊपर रहते हुए भी चेयरमैन को सुविधाएं कम मिलेंगी। अगर सुविधाएं नहीं दे सकते तो कम से कम अपमानित तो नहीं करना चाहिए। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक का पद संयुक्त सचिव के स्तर का होता है और चेयरमैन का पद मानद होता है लेकिन उनको भारत सरकार के सचिव के बराबर माना जाता रहा है। अब चेयरमैन और निदेशक को संस्कृति मंत्रालय ने बराबर कर दिया है। दरअसल जब मंत्रालयों में संस्कृति को लेकर संवेदनशील और जानकार अधिकारी नहीं होंगे तो इस तरह के कदम उठाए जाते रहेंगे। कोई रेलवे कैडर का, कोई वन या पोस्टल या आयकर कैडर का अधिकारी जब संस्कृति जैसे महकमे को संभालता है तो इसी तरह के निर्णय लिए जाते हैं। मंत्रालय के अधिकारियों को जिन प्रशासनिक मसलों पर ध्यान देना चाहिए उससे हटकर वो बेकार की चीजों में उलझे रहते हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के चेयरमैन परेश रावल का कार्यकाल समाप्त हो गया। बेहतर होता कि चेयरमैन का प्रभार लेने की आकांक्षा की जगह मंत्रालय के अधिकारी उनकी जगह नियुक्ति की प्रक्रिया आरंभ करते और समय रहते किसी नए व्यक्ति को चेयरमैन नियुक्त किया जाता। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश की संस्कृति और विरासत को लेकर बहुत गंभीर रहते हैं। भारतीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को लेकर उनका अपना एक विजन है। वो निरंतर इस कोशिश में रहते हैं कि भारत की संस्कृति को वैश्विक पटल पर प्रचारित प्रसारित किया जाए। लेकिन अधिकारियों के ऊलजलूल निर्णय उनके विजन को जमीन पर उतारने में बाधा डालते रहते हैं। इस गाइडलाइन के बाद प्रश्न ये उठ रहा है कि क्या संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत को इस निर्णय की जानकारी दी गई थी। क्या सरकार में उच्चतम स्तर पर ये निर्णय लिया गया है। क्या सरकार इन संस्थाओं को संस्कृति मंत्रालय के अधीन लाना चाहती है। क्या इन सभी संस्थाओं को एक साथ मिलाकर कोई नई संस्था बनाने की कोशिश कर रही है। कुछ वर्षों पूर्व बजट में इंडियन इंस्टीट्यूट आफ हेरिटेज की घोषणा की गई थी। क्या उसको प्राणवायु देने के लिए जमीन तैयार की जा रही है। इनसे बेहतर हो कि संस्कृति मंत्रालय से पर्यटन विभाग को अलग कर दिया जाए ताकि वहां के मंत्री संस्कृति पर पूरा ध्यान दे सकें। 


Saturday, March 25, 2023

राजनीतिक कोलाहल में गुम होता विमर्श


संसद के बजट सत्र में लगातार हंगामा होता रहा है। फिर मानहानि केस में दो साल की सजा के बाद राहुल गांधी की सदस्यता समाप्त हो गई। संसद से लेकर सड़क तक हंगामा और बढ़ गया। आरोप प्रत्यारोप की राजनीति तेज हो गई है। बयानों के कोलाहल में संसद से जुड़ी कुछ समितियों की सिफारिशें और सरकार का उत्तर कहीं दब सा गया। एक वर्ष के बाद लोकसभा का चुनाव होना है। देश में राजनीति चरम पर है। पर संसदीय व्यवस्था का जो विमर्श लोगों तक पहुंचना चाहिए उसको बाधित करने का अधिकार राजनीति को नहीं है। संसदीय व्यवस्था के विमर्श को बाधित करने से जनता अंधेरे में रह जाती है और ये लोकतंत्र को कमजोर करता है। संसद के बजट सत्र में हुए हंगामे के कारण देश की संस्कृति से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण विमर्श पर अपेक्षित चर्चा नहीं हो पाई। संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति ने संस्कृति मंत्रालय की बजट राशि में बढोतरी की बात की। समिति का कहना है कि इस वर्ष के बजट का सिर्फ 0.075 प्रतिशत ही संस्कृति मंत्रालय को आवंटित किया गया है। जबकि चीन, ग्रेट ब्रिटेन, अमेरिका और आस्ट्रेलिया अपने कुल बजट का दो से पांच प्रतिशत संस्कृति के विकास और संरक्षण पर आवंटित करता है। संसदीय समिति की इस टिप्पणी पर संस्कृति मंत्रालय ने अपनी स्थिति स्पष्ट की। मंत्रालय के मुताबिक भारत जैसे विकासशील देश में जहां ग्रामीण इलाके में आधारभूत ढांचा, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन की स्थिति प्राथमिकता में है वहां जनता के अधिक धन को संस्कृति और कला के विकास पर खर्च करना तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता है। मंत्रालय की तरफ से ये भी कहा गया कि जिन देशों में कला और संस्कृति के विकास पर अधिक खर्च किया जा रहा है उनमें से अधिकांश राशि निजी क्षेत्रों के सहयोग से जुटाई जा रही है। संस्कृति मंत्रालय भी कला और संस्कृति के विकास के लिए देश की निजी कंपनियों को प्रोत्साहित कर रही है। अनेक ऐसी योजनाएं भी आरंभ की गई हैं जहां स्मारकों और पौराणिक इमारतों के रखरखाव का कार्य निजी कंपनियों को सौंपा गया है। 

ये एक ऐसा विषय है जिसपर राष्ट्रव्यापी चर्चा होनी चाहिए। यह सही है कि विकासशील देश की अलग प्राथमिकताएं होती हैं और विकसित देश की अलग। भारत जैसे समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाले देश को ये भी सोचना होगा कि क्या संस्कृति इसकी प्राथमिकता में है या नहीं? यह ठीक है कि शिक्षा,स्वास्थ्य और ग्रामीण इलाकों में आधारभूत संरचनाएं हमारे देश की प्राथमिकता है लेकिन क्या हम इन चीजों के साथ संस्कृति को जोड़कर नहीं देख सकते हैं। परिवहन, पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय की स्थायी समिति की रिपोर्ट संख्या 315 में कहा गया था कि संस्कृति का विकास किसी भी देश के विकास का अभिन्न हिस्सा है। संस्कृति के विकास से आर्थिक विकास को भी गति मिलती है। इससे रोजगार सृजन होता है और दूसरे क्षेत्रों में भी आर्थिक गतिविधियों में तेजी आती है। संस्कृति के समग्र विकास से देश की एकता और अखंडता को भी शक्ति मिलती है। संस्कृति का संरक्षण और विकास हमारे देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संजोती है। संस्कृति को संजोने की बात तो प्रधानमंत्री भी कर चुके हैं। 

स्वाधीनता के अमृत महोत्सव पर लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमृतकाल के पांच प्रण बताए थे। उसमें तीसरा प्रण देश की विरासत पर गर्व है। विरासत पर गर्व तो तभी कर सकेंगे जब आनेवाली पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत के बारे में बता सकेंगे। आनेवाली पीढ़ी के लिए अपनी विरासत को संजो कर, उसको संरक्षित कर सकेंगे। किसी भी विरासत को संजोने और संरक्षित करने में धन की आवश्यकता होती है। संसदीय समिति के अवलोकन और संस्कृति मंत्रालय के उत्तर से ये स्पष्ट होता है कि सरकार अपनी विरासत को संजोने और उसको संरक्षित करने के लिए अब निजी क्षेत्र को भागीदार बनाना चाहती है। निजी क्षेत्र को भागीदार बनाया जाना चाहिए। बनाया जा भी रहा है। लेकिन यह भी देखना होगा कि जो कार्य सरनरेन्काद्रर मोदी या सरकारी विभाग कर सकते हैं उसको निजी क्षेत्र के लोग उसी जिम्मेदारी से निभा पा रहे हैं या नहीं। आज जब पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है तो क्या ये माना जाए कि सरकार देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को निजी क्षेत्रों के भरोसे संरक्षित और उसके विकास के रास्ते पर चलने का मन बना चुकी है। कला संस्कृति के विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी लंबे समय से रही है। दिल्ली से लेकर मुंबई और कोलकाता से लकर बेंगलुरू और चेन्नई तक में निजी क्षेत्र की भागीदारी से कला संस्कृति को बल मिल रहा है। चाहे वो सांस्कृतिक केंद्र की स्थपना हो या कलाओं को सहेजने का उपक्रम। निजी क्षेत्र की भागीदारी है और बढ़ भी रही है।  

संस्कृति को लेकर एक महत्वपूर्ण बात ये है कि अबतक केंद्रीय बजट में संस्कृति मंत्रालय को जितनी धनराशि का आवंटन किया जा रहा है उसका सही उपयोग हो पा रहा है नहीं। आजकल संस्कृति से जुड़ी सरकारी संस्थाओं में एक ऐसी प्रवृत्ति देखी जा रही है जिसको अविलंब तर्कसंगत बनाए जाने की आवश्यकता है। आज स्थिति ये है कि संस्कृति से जुड़ी संस्थाएं लगातार कार्यक्रमों के आयोजन करने में लग गई है। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव पर विशेष आयोजन होना उचित था। उसके बाद भी लगातार आयोजनों से क्या हासिल हो रहा है। इसका परीक्षण तो किसी न किसी स्तर पर किया ही जाना चाहिए। संस्कृति के विकास का दायित्व जिन संस्थाओं पर है वो कुछ ठोस करने की बजाए आयोजनों में जुटी हैं। जिन संस्थाओं पर संरक्षण की जिम्मेदारी है वो भी प्रदर्शनियों आयोजित कर रही हैं। अधिकारियों के लिए बहुत आसान होता है कि वो किसी मंत्री या नेता को बुलाकर आयोजन का शुभारंभ करवा कर अपने नंबर बढ़वा लें। जबकि कुछ ठोस करने के लिए श्रम करना होगा। संस्कृति से जुड़े ग्रंथों के पुनर्प्रकाशन या नए ग्रंथों के प्रकाशन के कार्य में सुपात्र के चयन से लेकर उसके प्रकाशन तक में मेहनत की आवश्यकता होगी। जिस मेहनत की आवश्यकता आयोजनों में नहीं होती। सांस्कृतिक संस्थाओं की देखा देखी अब विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में भी आयोजनों की भरमार हो गई है। 

संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी इन संस्थाओं के आयोजनों में जो खर्च होता है वो तो बजट में आवंटित राशि से ही होता है। इस धनराशि का उपयोग पौराणिक इमारतों और स्मारकों के संरक्षण पर किया जाना चाहिए। पूरे देश में आर्कियोलाजी सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) के संरक्षित इमारतों में से ज्यादातर की हालत बहुत अच्छी नहीं है। इस स्तंभ में कई स्मारकों और उसके संरक्षण में लापरवाहियों का उल्लेख किया जा चुका है। ऐसी स्थिति में सरकार को सांस्कृतिक विकास के लिए एक संतुलन बनाकर चलना होगा। निजी क्षेत्र को सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित करने के लिए प्रेरित करना, उनको संरक्षण पर धन खर्च करने के लिए प्रोत्साहित करें ।साथ ही सरकारी विभागों को आवंटित धन राशि को लेकर एक ऐसी व्यवस्था बनाए जिसमें उसका सदुपयोग हो सके। संस्कृति मंत्रालय को ये भी देखना चाहिए कि जिन विभागों के पास सांस्कृतिक धरोहरों को बचाकर रखने की जिम्मेदारी है वहां पर्याप्त मानव संसाधन है कि नहीं। संस्कृति मंत्रालय की स्थायी समिति ने एएसआई में विशेषज्ञों और कर्मचारियों की कमी की ओर भी ध्यान आकर्षित करवाया था। मंत्रालय को उनकी नियुक्ति में तेजी लानी चाहिए। संस्कृति से जुड़ा एक काम नीति आयोग को भी करना चाहिए। उसको कई मंत्रालयों में संस्कृति से जुड़े कार्यों का आकलन करना चाहिए और फिर केंद्र सरकार को संस्कृति मंत्रालय के पुनर्गठन का सुझाव देना चाहिए। इससे संस्कृति से जुड़े सभी कार्य एक ही मंत्रालय से हो सकेंगे और धन भी बचेगा। 

Saturday, January 14, 2023

सांस्कृतिक धरोहरों की उपेक्षा


कुछ समय पूर्व ओडिशा स्थित कोणार्क के सूर्य मंदिर जाने का अवसर प्राप्त हुआ। सूर्य मंदिर परिसर के प्रवेश द्वार से विशाल मंदिर बेहद भव्य लग रहा था। परिसर में अंदर जाते ही एक शिलालेख पर इस मंदिर के बारे में जानकारी दिखी। स्थापत्य कला की इस अनुपम कृति का निर्माण 1250 ईसवी में गंग राजा नरसिंहदेव प्रथम के राज्यकाल में सूर्य प्रतिमा की स्थपना के लिए किया गया था। इस संपूर्ण स्थापत्य को एक विशाल रथ के रूप में अनुकृत किया गया था। इस कृति में बारह जोड़ी अंलकृत पहिए लगे हुए हैं और उसे सात घोड़े खींच रहे हैं। शिलालेख के मुताबिक यह मंदिर ओडिशा के स्थापत्य कला के चरमोत्कर्ष का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस मंदिर का गर्भगृह और नाट्य मंदिर भग्न रूप में हैं, जबकि जगमोहन सुरक्षित स्थिति में है। मंदिर की भित्तियों पर दैवीय मानव , पेड़, पौधों और जीव जंतुओं के साथ साथ ज्यामितीय अलंकरण बहुतायत में हैं। कन्याओं, नर्तकियों और वादकों की शारीरिक संरचना, अलंकरण एवं भाव भंगिमाएं विशेष दर्शनीय हैं। 

शिलालेख को पढ़ने के बाद मंदिर को पास से देखने की उत्सुकता और बढ़ गई। शिलालेख के विवरण को पढ़कर जो छवि बनी थी उसके साक्षात अवलोकन के लिए मंदिर के पास पहुंचा। मुख्य मंदिर की तरफ जाने के लिए सामने की तरफ से सीढ़ियां बनी हुई हैं। उन सीढ़ियों के पहले भी एक प्रवेश द्वार है। वहां विशाल शिलाओं से बनी हाथी की आकृति है। अचानक मेरी नजर एक तरफ के हाथी की आकृति वाले शिला पर पड़ी तो तो उसके एक पांव पर सीमेंट और बालू का लेप लगा दिखा। पास जाने पर ऐसा प्रतीत हुआ कि मूर्ति में आई दरार को पाटने के लिए उसको सीमेंट और बालू से भर दिया गया था। ये भी लग रहा था कि इसके ऊपर सीमेंट का घोल डाल दिया गया है। हाथी पर घोले हुए सीमेंट के निशान स्पष्ट दिख रहे थे। ये निशान उस कलाकृति को भद्दा बना रहे थे। मंदिर के चारो तरफ घूमने और सूर्य मंदिर में पत्थर पर उकेरी गई कलाकृतियों को देखकर मंदिर की स्थापत्य कला से बेहद प्रभानित हुआ अपने देश की मंदिर निर्माण कला के बारे में जानना और उसको प्रत्यक्ष देखना अविस्मरणीय था। 

कोणार्क का ये सूर्य मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में शामिल है। इसकी देखरेख की जिम्मेदारी आर्कियोलाजी सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) पर है। इस संगठन का काम ही सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण का है। यह संस्था भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करती है। इतने उत्कृष्ट कला के संरक्षण में इतनी लापरवाही हो रही है कि किसी कलाकृति की दरार को बेहद भद्दे तरीके भर दिया जा रहा है। दरार को पाटने वाली सामग्री के घोल को उसपर उड़ेल देना जिससे उसकी खूबसूरती नष्ट हो जा रही हो। प्रश्न उठता है कि एएसआई कोणार्क के सूर्य मंदिर के संरक्षण को लेकर इतनी लापरवाह क्यों है। क्या इन संरक्षित धरोहरों का रखरखाव विशेषज्ञों की देख-रेख में नहीं होता है। क्या इन सांस्कृतिक धरोहरों के रखरखाव का कोई वार्षिक आडिट नहीं होता है। करीब डेढ़ वर्ष पहले कुछ ऐसा ही अनुभव त्रिपुरा के उनकोटि परिसर में जाकर भी हुआ था। अगरतला से करीब पौने दो सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित उनकोटि में पत्थर पर उकेरी गई बेहतरीन कलाकृतियां हैं। इस परिसर में करीब तीस फीट के ‘उनकोटेश्वर कालभैरव’ की पत्थर की मूर्ति है। इस मूर्ति का मुकुट करीब दस फीट के पत्थर पर बना है जिसपर अद्भुत कलाकारी है। उनके आसपास दो देवियों के चित्र पत्थर पर उकेरे हुए हैं। पास ही में नंदी की पत्थर की दो मूर्तियां हैं। काल भैरव की मूर्ति की दूसरी तरफ एक विशाल शिला पर गणेश जी की मूर्ति बनी हुई है जिसके दोनों तरफ हाथी की मुखाकृति वाले चित्र उकेरे हुए हैं। उनकोटि परिसर के देखभाल का दायित्व भी एएसआई पर है। वहां भी उन मूर्तियों के संरक्षण के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं दिखा था। कुछ मूर्तियां भले ही एक कमरे में बंद कर दी गई हैं लेकिन हजारों मूर्तियां ऐसे रखी हुई हैं और लोग उसपर चढ़कर आते जाते हैं। एक जगह तो एक मूर्ति पर कपड़े धोए जा रहे थे। इस स्तंभ में विस्तार से इसपर चर्चा हो चुकी है। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वाधीनता के अमृत महोत्सव में लाल किले की प्राचीर से पांच प्रण की घोषणा करते हुए विरासत पर गर्व की बात करते हैं। अपने उसी गर्व को सहेजने के लिए प्रधानमंत्री की पहल पर काशी विश्वनाथ मंदिर का नव्य स्वरूप, उज्जैन का महाकाल लोक का भव्य परिसर का निर्माण हुआ। अयोध्या में भव्य राममंदिर का निर्माण हो रहा है। इसके पहले केदारनाथ धाम से लेकर गुजरात के मंदिरों की पौराणिकता को भव्यता के साथ सहेजा गया। इसको देश में सांस्कृतिक पुनरुत्थान के तौर पर देखा जा रहा है। विरासत पर गर्व करने के लिए यह बेहद आवश्यक है कि हम अपनी विरासत को संरक्षित करें। संस्कृति मंत्रालय के अधीन आनेवाली संस्था एएसआई की अपनी विरासत को सहेजने में लापरवाही और उदासीनता दिखाई देती है। संसद के पिछले सत्र में 13 दिसंबर 2022 को राज्यसभा में संस्कृति मंत्रालय की स्टैंडिंग कमेटी ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध संसद की इस समिति ने अपनी रिपोर्ट संख्या 330 में एएसआई के कामकाज को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए हैं। रिपोर्ट में समिति ने मंत्रालय/एएसआई में धनराशि के उपयोग को लेकर बेहद कठोर टिप्पणी की है। समिति के मुताबिक मंत्रालय ने अपने उत्तर में इस बात का उल्लेख नहीं किया है कि एएसआई को जो धनराशि आवंटित की गई थी उसका आगे आवंटन और उपयोग किस तरह से किया गया। इसके अलावा एएसआई में खाली पदों को भरने में हो रहे बिलंब पर भी समिति ने टिप्पणियां की है। संस्कृति मंत्रालय के विभिन्न संस्थानों में खाली पदों की स्थिति को रेखांकित करते हुए स्थिति को बेहद दयनीय बताया। समिति की रिपोर्ट में बताया गया है कि एएसआई के आर्कियोलाजी काडर में 420 पद स्वीकृत हैं जिसमें से 166 पद खाली हैं। संरक्षण काडर में कुल स्वीकृत पद 918 हैं दिनमें से 452 पद खाली हैं। समिति की इन टिप्पणियों पर संस्कृति मंत्रालय ने सफाई दी लेकिन समिति मंत्रालय के उत्तर से संतुष्ट नहीं हो सकी। उसने अपना असंतोष रिपोर्ट में दर्ज भी कर दिया। संस्कृति मंत्रालय के कामकाज को लेकर संसदीय समिति की इस रिपोर्ट में इस बात पर नाराजगी जताई गई है कि करीब पचास फीसद पद कैसे खाली हैं। क्या मंत्रालय या एएसआई इस बात का आकलन नहीं कर सकी कि भविष्य में कितने पद खाली होनेवाले हैं। समय रहते अगर ऐआसा हो जाता तो ये स्थिति नहीं बनती।

संस्कृति मंत्रालय में ऐसी स्थिति क्यों बनती हैं कि उससे संबद्ध कई संस्थाएं वर्षों से तदर्थ तरीके से चल रही हैं। भारतीय जनता पार्टी से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक देश की संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत को लेकर संवेदनशील हैं, बावजूद इसके संस्कृति अगर मंत्रालयों की प्राथमिकता में नहीं आ रही है तो इसके कारणों पर विचार करने की आवश्यकता है। क्या नौकरशाही संस्कृति को लेकर संवेदनशील नहीं है। संस्कृति और उसके संरक्षण के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों और अधिकारियों का विशेष तौर पर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। आवश्यक है कि संस्कृति मंत्रालय के मंत्रियों का कला, संस्कृति और संरक्षण में रुचि लेकर उसके प्रति संवदेशनशील होना। कलाकारों और उनके हुनर का सम्मान करना। इस स्तंभ में कई बार इस बात की चर्चा की गई है कि संस्कृति को सरकार की प्राथमिकता में लाने के लिए देश में एक समग्र सांस्कृतिक नीति की आवश्यकता है।एक ऐसी नीति जिसमें संस्कृति, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और आयोजनों के बीच सामंजस्य हो।  


Saturday, January 7, 2023

अनियमितताओं के भंवर में अकादमी


भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक स्वायत्त संस्था है, ललित कला अकादमी। इस संस्था का मुख्यालय नई दिल्ली में है। देशभर में इस संस्था के कई क्षेत्रीय केंद्र हैं। इसकी स्थापना 1954 में हुई थी। इसकी परिकल्पना राष्ट्रीय कला अकादमी के रूप में की गई थी। अकादमी के गठन का उद्देश्य सृजनात्मक दृश्य कलाओं के क्षेत्र में क्रियाकलापों को प्रोत्साहित और समन्वित करते हुए देश की सांस्कृतिक एकता का प्रोन्नयन करना है। अपने स्थापना के बाद के दशकों में ललित कला अकादमी ने काफी महत्वपूर्ण कार्य किया। अकादमी के संग्रह में कई अनमोल कलाकृतियां हैं। पिछले करीब तीन दशक से ललित कला अकादमी विवादों में घिरी रही है। कभी उसके संग्रह की कलाकृतियों के गायब होने की खबर आती रही तो कभी उचित रखरखाव के आभाव में कलाकृतियों के खराब होने की। नई दिल्ली के गढ़ी केंद्र में अवैध कब्जे के समाचार भी आए थे। इसके पूर्व अध्यक्ष और हिंदी के कवि अशोक वाजपेयी पर सीबीआई की जांच भी हुई थी या हो रही है। इस जांच का निष्कर्ष क्या रहा ये सार्वजनिक नहीं हो पाया है। अकादमी के सचिव रहे सुधाकर शर्मा भी विवाद में घिरे थे। अशोक वाजपेयी के कार्यकाल में पहले हटाए गए फिर बहाल किए गए। अशोक वाजपेयी के बाद के के चक्रवर्ती को ललित कला अकादमी का अध्यक्ष बनाया गया था। इनका कार्यकाल भी बेहद विवादित रहा। विवाद इतना बढ़ा था कि मंत्रालय ने इनको बर्खास्त करके ललित कला अकादमी को अपने अधीन कर लिया था। उसके बाद मंत्रालय ने कृष्णा शेट्टी को ललित कला अकादमी का प्रशासक नियुक्त किया था। फिर मंत्रालय के संयुक्त सचिव प्रोटेम चेयरमैन बनाए गए। प्रोटेम चेयरमैन बनाए जाने को लेकर भी विवाद हुआ था। 

इन विवादों के बीच महाराष्ट्र के उत्तम पचारणे को ललित कला अकादमी का चेयरमैन नियुक्त किया गया। उनकी नियुक्ति और उनके कार्यकाल में वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर विवाद उठा और पूरा मामला अदालत तक गया। जो अभी विचाराधीन है। इस बीच उत्तम पचारणे का कार्यकाल समाप्त हो गया। उनको छह महीने का सेवा विस्तार मिला था ताकि नए अद्यक्ष का चययन हो सके। लेकिन ऐसा नहीं हो सका तो संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव उमा नंदूरी को मंत्रालय ने ललित कला अकादमी की चेयरमैन का कार्यभार सौंप दिया। अकादमी की इस पृष्ठभूमि का बताने का आशय सिर्फ इतना है कि भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध इस संस्था में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। उपरोक्त सारी बातें तो मीडिया में आईं थीं लेकिन अभी कुछ दिनों पहले भारत सरकार के लेखा परीक्षा के महानिदेशक कार्यालय ने ललित कला अकादमी की आडिट की थी। 14 अक्तूबर 2022 को ओबीएस 446867 के अंतर्गत लेखा परीक्षकों ने जो रिपोर्ट दी उसमें भारी वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितता की बात सामने आई है। 

लेखा परीक्षक ने अपने आडिट रिपोर्ट में वाहन किराए पर लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि बगैर किसी टेंडर के गाड़ियों को किराए पर लिया जाता रहा। जबकि नियमानुसार बगैर टेंडर के अकादमी वाहन किराए पर नहीं ले सकती है। कोविड के समय भी स्टाफ को लाने और छोड़ने के लिए जिन गाड़ियों को किराए पर लिया गया उसमें भी आडिट रिपोर्ट में खामियां पाई गई हैं। संस्कृति राज्य मंत्री के नाम पर ललित कला अकादमी ने एक गाड़ी किराए पर ली जिसका प्रतिमाह किराया 52 से 55 हजार रुपए भुगतान किया गया। लेखा परीक्षक के मुताबिक ये नियम विरुद्ध है। इस मद में अकादमी ने साढे छह लाख रुपए खर्च किए हैं। रिपोर्ट में इसको अविलंब रोकने की सलाह दी गई है। गाड़ियों के अलावा बिजली बिल के भुगतान में भी अनियमितता पाई गई है। लेखा परीक्षक की रिपोर्ट में जो सबसे बड़ी खामी पाई गई है वो ये है कि अकादमी ने सांस्कृतिक संस्थाओं को बगैर उपयोग प्रमाण पत्र के आर्थिक सहयोग दिया। नियम के मुताबिक जब किसी सांस्कृतिक संस्था को किसी प्रकार की आर्थिक मदद दी जाती है तो उसको अकादमी में उस धनराशि के उपयोग का प्रमाण पत्र जमा करना होता है । उसके बाद ही उसको फिर से आर्थिक सहायता दी जाती है लेकिन इस नियम की धज्जियां उड़ा दी गई। करीब 25 करोड़ की धनराशि का उपयोग प्रमाण पत्र अकादमी के रिकार्ड में नहीं है। 

वित्तीय अनियमितताओं की कहानी यही नहीं रुकती है। अकादमी अपने कर्मचारियों को किसी कार्य के लिए अग्रिम धनराशि देती है। नियम है कि बगैर इस राशि का हिसाब दिए दूसरी बार किसी को अग्रिम धनराशि नहीं दी जा सकती है। लेकिन अकादमी में 31.3.2022 तक 133 केस पेंडिंग है जिसका हिसाब नहीं दिया गया था। लेखा परीक्षकों ने इसपर प्रश्न उठाए हैं। पूर्व अध्यक्ष उत्तम पचारणे से लेकर क्षेत्रीय सचिवों और कई कर्मचारियों के नाम भी अग्रिम धनराशि पेंडिंग है जिसका हिसाब नहीं दिया गया है। लेखा परीक्षकों की इस रिपोर्ट में गड़बड़ियों की लंबी फेहरिश्त है जिसमें लैपटाप खरीद में गड़बड़ी, वकीलों की फीस में अनियमितता, बिना किसी अनुमति के मुख्यालय और गढ़ी केंद्र पर 173 सुरक्षा गार्डों को काम पर रखना, 12 लाख से अधिक के ओवरटाइम में गड़बड़ी, नियम विरुद्ध नियुक्तियां और वेतन निर्धारण, विज्ञापन पर एक करोड़ से अधिक खर्च आदि आदि। एक बड़ा ही गंभीर मसला इस रिपोर्ट में है। इस वक्त ललित कला अकादमी के प्रभारी सचिव रामकृष्ण वेडाला हैं। रिपोर्ट में है कि 2019 में ये बगैर मंत्रालय की अनुमति के मैक्सिको की यात्रा पर गए। जबकि मंत्रालय ने अकादमी को पत्र लिखकर निर्देश दिया था कि सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बगैर वो विदेश नहीं जाएं। लेकिन ललित कला अकादमी के प्रभारी सचिव ने भारत सरकार के दिशा निर्देश की अनदेखी की। इसका संज्ञान भी मंत्रालय को लेना चाहिए। अकादमी के स्टाक पर भी लेखा परीक्षकों ने गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।

केंद्रीय व्यय के महानिदेशक लेखा परीक्षक कार्यालय ने ललित कला अकादमी के क्रियाकलापों में जो अनियमितताएं पाईं है वो बेहद गंभीर हैं। संस्कृति मंत्रालय को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। साहित्य, कला और संगीत के क्षेत्र में कार्य कर रही संस्थाओं को स्वायत्ता दी जानी चाहिए लेकिन जब करदाताओं के पैसे का अपव्यय सामने आए या उसका दुरुपयोग दिखे तो सरकार को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। इस वक्त अकादमी के अध्यक्ष का कार्यभार संभाल रहीं संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव उमा नंदूरी से ये अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि लेखा परीक्षकों की रिपोर्ट में जिन अनियमितता और गड़बड़ियों की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है उनपर कार्रवाई करेंगी। बगैर उपयोग प्रमाण पत्र के आर्थिक मदद का हिसाब किताब लिया जाएगा। इन गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों के खिलाफ भी नियमानुसार दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। 

संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध संस्थाओं में नियुक्ति की प्रक्रिया भी तेज करनी होगी। कई महीनों से ललित कला अकादमी में अध्यक्ष और सचिव का पद खाली है। इसको अविलंब भरने की आवश्यकता है। दरअसल इन संस्थाओं के नियमित चेयरमैन, सचिव या निदेशक के नहीं होने के कारण वहां अराजकता का माहौल बन जाता है। ललित कला अकादमी के अलावा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में नियमित निदेशक नहीं होने की वजह से अराजकता जैसा माहौल है। कुछ दिनों पहले प्रभारी निदेशक ने कुलसचिव को सेवामुक्त करने का आदेश दे दिया था जिसकों कुछ ही घंटों में वापस लेना पड़ा था। राष्ट्रीय महत्व के इस संस्थान में नियमित निदेशक नहीं होने के कारण नियमित शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो पा रही है। नुकसान छात्रों और संस्था का हो रहा है। संस्कृति मंत्रालय के अधीन कई संस्थाएं ऐसी हैं जहां कई महत्वपूर्ण पद खाली हैं। संस्कृति मंत्री को स्वयं रुचि लेकर इन पदों को भरने का उपक्रम आरंभ करना चाहिए। 


Saturday, February 26, 2022

अराजकता का रंगमंच,अव्यवस्था का खेला


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इन दिनों अपने चुनावी भाषणों में एक शब्द का प्रयोग कई बार करते हैं वो है ईकोसिस्टम। जब वो ईकोसिस्टम की बात करते हैं तो उनका निशाना उस संगठित समूह की ओर होता है जो उनकी पार्टी और उनके कार्यों को विफल करना चाहती है, लक्ष्य तक पहुंचने की राह में रोड़े अटकाती है। इस ईकोसिस्टम का प्रभाव राजनीति के बाद सबसे अधिक संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं में देखा जा सकता है। इस ईकोसिस्टम का प्रभाव देखना हो तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में पिछले पांच छह साल में घटने वाली घटनाओं को देखा जा सकता है।  ईकोसिट्म के सदस्य वहां इस कदर हावी हैं कि संस्थान  के हर तरह के काम में रोड़े अटकाए जाते हैं। पिछले दिनों राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की दीवार पर प्रधानमंत्री का एक बेहद ही आपत्तिजनक चित्र बना दिया गया। बड़े आकार के चित्र को दीवार पर उकेरने में घंटों लगे होंगे लेकिन विद्यालय प्रशासन को इसकी भनक नहीं लगी । चित्र जब व्हाट्सएप पर साझा किया जाने लगा तो प्रशासन हरकत में आया। चित्र मिटाया गया। उस शिक्षक पर कोई कार्रवाई नहीं हुई जिसकी देखरेख में आपत्तिजनक चित्र बना। यहां भी ईकोसिस्टम सक्रिय हुआ और पहले इसको अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ा गया लेकिन जब कार्यकारी निदेशक के कार्यालय से दबाव बना तो इसको छात्रों की उत्साह में की गई गलती बताकर मामले को रफा दफा करने की कोशिशें हुईं। किसी पर भी कोई कार्रवाई हुई हो ये पता नहीं चल पाया। 

नई दिल्ली के बहावलपुर हाउस में चलनेवाला राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नाट्य प्रशिक्षण देता है। नाट्य प्रशिक्षण के क्षेत्र में इस संस्था की देश-विदेश में बहुत प्रतिष्ठा है। इन दिनों ये संस्था अपनी इस प्रतिष्ठा को बचाने के लिए संघर्षरत है। आए दिन इसके कैंपस में हाय-हाय के नारे गूंजते हैं। इस संस्था के अध्यक्ष प्रख्यात अभिनेता और पूर्व सांसद परेश रावल हैं। परेश रावल को 2020 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की कमान सौंपी गई थी। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि संस्थान के अध्यक्ष का पद करीब तीन साल तक खाली रहा था। परेश रावल के पहले रतन थिएम 2017 में पदमुक्त हो चुके थे। संस्थान में सितंबर, 2018 के बाद से कोई नियमित निदेशक भी नहीं है। ज्यादतर प्रशासनिक कार्य तदर्थ आधार पर हो रहे हैं। इस संस्थान में सरकार ने दो बार निदेशक नियुक्त करने की प्रक्रिया आरंभ की लेकिन अब तक सफलता नहीं मिल पाई है। पहली बार जब निदेशक नियुक्ति की प्रक्रिया आरंभ तो अज्ञात कारणों से नियुक्ति अटक गई। जब परेश रावल अध्यक्ष बने तो उन्होंने दुबारा प्रक्रिया आरंभ की, साक्षात्कार आदि संपन्न हुआ और सफल अभ्यार्थियों का पैनल बनाकर संस्कृति मंत्रालय भेज दिया गया। इस बीच पहली सूची में चयनित पैनल का एक व्यक्ति अदालत चला गया और मामला लंबा उलझ गया। अदालत से केस के निस्तारण के भी कुछ महीने बीत चुके हैं लेकिन निदेशक की नियुक्ति नहीं हो पा रही है।  

इतने महत्वपूर्ण संस्थान में निदेशक के नहीं होने और करीब तीन वर्ष तक अध्यक्ष नहीं होने की वजह से वहां व्यवस्था लड़खड़ा गई। प्रशासनिक भी और अकादमिक भी। जब व्यवस्था लड़खड़ाती है तो अराजकता का जन्म होता है। वहां भी हुआ। ईकोसिस्टम मजबूत हुआ। इस तरह के नाटकों पर काम होने लगा जो अपने समाज की सही तस्वीर पेश नहीं करता है। आपत्तिजनक भी है। कोई देखनेवाला नहीं है और ईकोसिट्म मजबूत है तो इस तरह के काम निर्बाध गति से चलते भी रहते हैं। स्टूडेंट प्रोडक्शन के नाम पर जिन नाटकों को तैयार करवाया जाता है उसको लेकर कोई नियम नहीं होने की वजह से फूहड़ नाटकों के प्रदर्शन को बढ़ावा मिलता है। किसी भी संस्थान का पाठ्यक्रम निर्धारित होता है, यहां भी है लेकिन स्टूडेंट प्रोडक्शन का एक ऐसा रास्ता है जिसका कोई पाठ्यक्रम या नाटकों की कोई सूची निर्धारित नहीं है। जो भी निर्देशक या शिक्षक पढ़ाने आएगा वो अपनी मर्जी के नाटक का चयन करेगा। अगर नाटक की स्क्रिप्ट है तब तो उसका पता संस्थान के अन्य विभाग को लग सकता है लेकिन अगर नाटक इंप्रोवाइज्ड है तो उसका पता प्रोडक्शन के बहुत करीब आने पर ही चलता है। इसकी आड़ में ही मनमाने नाटकों का प्रदर्शन होता रहता है। कई बार राजनीतिक एजेंडे वाले नाटकों का भी प्रोडक्शन होता है तो कई बार यौन उनमुक्तता को विषय बनाकर समाज की भद्दी छवि पेश की जाती है। बताया जाता है कि इस महीने के आरंभ में इस तरह के एक नाटक का प्रदर्शन वहां हुआ। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री का आपत्तिजनक चित्र भी राजनीतिक एजेंडे वाले एक नाटक की तैयारी के दौरान ही बनाया गया बताते हैं। 

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय संस्कृति मंत्रालय के अधीन है और भारत सरकार से वित्त पोषित है। जब परेश रावल को वहां का अध्यक्ष बनाया गया था तो उम्मीद जगी थी कि नाट्य विद्यालय की प्रतिष्ठा वापस लौटेगी। परेश रावल ने अपने कार्यकाल के आरंभिक दिनों में इसके लिए प्रयास भी किए थे। उत्साह में देशभर में नाट्य प्रदशनों को लेकर बडी बड़ी बातें की थीं लेकिन ईकोसिस्टम ने उनके कुछ नया करने के मंसूबों पर पानी फेर दिया। अब तो वो संस्थान में यथास्थितिवाद को बनाए रखने के लिए ही संघर्ष करते नजर आ रहे हैं। ईकोसिट्म ने अध्यक्ष के एक सहयोगी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और उसको हटाने का दबाव बनाया जा रहा है। अध्यक्ष के सहयोगी का दोष इतना है कि उसने पूर्व में हुई गड़बड़ियों को सामने लाने का काम आरंभ किया है। ईकोसिस्टम को ये मंजूर नहीं है। ईकोसिट्म को न तो छात्रों की परवाह है ना ही विद्यालय की प्रतिष्ठा की। ईकोसिस्टम में तो वहां ऐसे सदस्य भी हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वो कम्युनिस्ट पार्टी के भी सक्रिय सदस्य हैं और पार्टी की इंटरनेट पर चलनेवाली गतिविधियों को संचालित भी करते हैं। अर्जुन देव चारण सालों से संस्थान के उपाध्यक्ष के पद पर बने हुए हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की हालत का अंदाज इस बात से ही लगाया जा सकता है कि वहां की वेबसाइटट तक अपडेट नहीं हो रही है। 

आवश्यकता इस बात की है कि संस्कृति मंत्रालय में उच्चतम स्तर पर इस संस्थान पर ध्यान दिया जाए। यहां नियमित निदेशक की नियुक्ति की जाए ताकि प्रशासनिक कार्य पटरी पर आ सके। मंत्रालय एक शार्टकट निकालता है कि निदेशक की नियुक्ति होने तक मंत्रालय के किसी अफसर को संस्थान का प्रभार दे दिया जाए। यह स्थायी समाधान नहीं है। आवश्यक नहीं कि जिस अधिकारी को नाट्य विद्यालय का प्रभार दिया जाए उसकी रुचि इस विधा या कला में हो। हमारे सामने ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी का उदाहरण है जहां अधिकारी इन संस्थाओं को चला रहे हैं। ये दोनों संस्थाएं कैसे चल रही हैं इस बारे में कई बार इस स्तंभ में लिखा जा चुका है, उसको दोहराने का कोई लाभ नहीं। जरूरत इस बात की भी है कि इस संस्थान के पाठ्यक्रम को अद्यतन किया जाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप पाठ्यक्रम में बदलाव किया जाना आवश्यक है। संस्थान के अध्यक्ष परेश रावल को भी सामने आकर नेतृत्व करना होगा। उनको भी ये समझना होगा कि अभिनय और इससे जुड़ी विधाओं में उनके अनुभव का विपुल लाभ किस तरह से छात्रों को और संस्थान को मिले। ईकोसिस्टम को खत्म करने का सबसे अच्छा तरीका है कि उसके सामने उनसे बड़ी लकीर खींच दी जाए। कोसने का वक्त निकल चुका है, अब कर दिखाने का समय है। संस्कृति मंत्रालय में इस वक्त योग्य मंत्रियों की टीम है और उम्मीद की जानी चाहिए कि ये टीम ईकोसिस्टम के दुष्प्रभावों को कम करने या खत्म करने के क्षेत्र में सक्रिय होंगे।     


Saturday, December 4, 2021

ललित कला अकादमी में विद्रोह


भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक स्वयायत्त संस्था है ललित कला अकादमी। इस संस्था का शुभारंभ 5 अगस्त 1954 को उस समय के शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद ने किया था। इसका उद्देश्य चित्रकला, मूर्तिकला आदि के क्षेत्र में अध्ययन और शोध को बढ़ावा देना है। इसके अलावा क्षेत्रीय कला और कलाकारों के बीच संवाद का मंच प्रदान करना भी एक उद्देश्य है। इस वक्त इस संस्था के प्रोटेम (अस्थायी) अध्यक्ष उत्तम पचारणे हैं। इनका तीन वर्ष का कार्यकाल खत्म होने के बाद इनको इस वर्ष जून में छह महीने के लिए अस्थाई अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। ललिता कला अकादमी के संविधान में छह महीने के अस्थाई अध्यक्ष का प्रावधान है ताकि वो नए अध्यक्ष के चयन की औपचारिकताएं पूरी करवा सकें। ललित कला अकादमी पिछले कई वर्षों से अपने उद्देश्यों से भटक गई प्रतीत होती है। पिछले कई वर्षों से अकादमी लगातार विवादों में रही है। अकादमी से एम एफ हुसैन की पेंटिंग गायब होने की घटना सुर्खियों में रही थीं। अकादमी से मूल्यवान पेंटिंग्स के गुम होने को लेकर आरोप प्रत्यारोप का लंबा सिलसिला चला। पूर्व के चेयरमैन पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे। इस संस्था के अध्यक्ष रहे अशोक वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान अनियमितताओं को लेकर सीबीआई जांच चल रही है। विवादों की इस शृंखला में इस संस्था का प्रशासन केंद्र सरकार ने अपने हाथ में भी लिया था। कुछ समय तक केंद्र से नियुक्त प्रशासक ने इसको चलाया। उस वक्त भी विवाद थम नहीं सका। 

ताजा विवाद अस्थाई अध्यक्ष के खिलाफ कार्यकारिणी के सदस्यों के विद्रोह का है। पिछले महीने की 25 तारीख को उपाध्यक्ष नंदलाल ठाकुर और कार्यकारिणी के सदस्यों ने संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव को एक पत्र लिखकर अध्यक्ष के असंवैधानिक कामों के बारे में उनका ध्यान आकृष्ट किया। अपने पत्र में इन लोगों में स्पष्ट रूप से अकादमी के अध्यक्ष उत्तम पचारणे पर ललित कला अकादमी के संविधान के हिसाब से काम नहीं करने का आरोप लगाया है। उस पत्र में आरोप है कि उत्तम पचारणे कार्यकारिणी के निर्णयों को बदलकर कार्यक्रम आयोजित करवा रहे हैं। कार्यकारिणी ने जिन कार्यक्रमों को तय किया है उसको नहीं करवा कर दूसरे कार्यक्रम करवा रहे हैं। उपाध्यक्ष और कार्यकारिणी के सदस्यों ने अपने पत्र में मंत्रालय को लिखा है कि उत्तम पाचरणे ने दिल्ली में आयोजित होनेवाले प्रिंट बिनाले को बगैर कार्यकारिणी की मंजूरी के मुंबई में कराने का आदेश जारी कर दिया है। अकादमी का संविधान उनको ऐसा करने की अनुमति नहीं देता है।  इसके अलावा स्वाधीनता के अमृत महोत्सव पर मुंबई में किए जानेवाले आर्ट कैंप का नाम बदलकर अनसंग हीरो-छत्रपति शिवाजी के नाम से कराने का फैसला किया है। कार्यकारिणी के सदस्यों ने छत्रपति शिवाजी को अनसंग हीरो कहे जाने का विरोध किया लेकिन अस्थाई अध्यक्ष सुनने को राजी नहीं थे।अस्थाई अध्यक्ष ने बैठक में घोषणा की कि वो इसको मुंबई के जे जे स्कूल आफ आर्ट में अपनी जिम्मेदारी पर आयोजित करवा रहे हैं। यह भी अकादमी के संविधान के खिलाफ निर्णय है। 

इस पत्र में ये आरोप भी लगाया गया है अस्थायी अध्यक्ष कार्यक्रमों के आयोजन में मनमानी करते हैं और कार्यकारिणी को विश्वास में नहीं लेते हैं। ललित कला अकादमी के क्रियाकलापों को लेकर मंत्रालय जांच करेगी या नहीं ये भविष्य में पता चलेगा। अगर जांच होती भी है तो संभव है कि जांच  आरंभ होने तक अस्थायी अध्यक्ष का छह महीने का कार्यकाल समाप्त हो जाए। उनका छह महीने का कार्यकाल इस महीने ही पूरा हो रहा है। जिस काम, नए अध्यक्ष के चुनाव, के लिए अस्थायी अध्यक्ष की नियुक्ति की गई थी उसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई है। सर्च कमेटी बनी या नहीं इस बारे में भी अकादमी की बेवसाइट पर कोई जानकारी नहीं है। अगर दिसंबर में अस्थाई अध्यक्ष का कार्यकाल बगैर नए अध्यक्ष के चयन के खत्म हो जाता है तो क्या एक बार फिर से अस्थाई अध्यक्ष की नियुक्ति की जाएगी। क्या संस्कृति मंत्रालय फिर से उत्तम पचारणे के नाम की सिफारिश राष्ट्रपति से करेगी और राष्ट्रपति उसको मान लेंगे। अगर ऐसा होता है तो यह नियमों की खामियों की आड़ लेना होगा। तब सवाल ये भी उठेगा कि क्या उत्तम पचारणे तबतक ललित कला अकादमी के अस्थाई अध्यक्ष बने रहेंगे जबतक कि नए अध्यक्ष का चयन नहीं हो जाता है। नियमों की खामियों की आड़ लेकर ऐसा होता है तो फिर अस्थाई अध्यक्ष नए अध्यक्ष का चयन क्यों होने देगा। इसके पहले जब उत्तम पचारणे नियमित अध्यक्ष थे तब भी उन्होंने अपना कार्यकाल तीन साल से पांच साल करने का प्रस्ताव मंत्रालय को भेजा था जिसपर संस्कृति मंत्रालय की मुहर नहीं लग पाई थी। तब उत्तम पचारणे को पद छोड़ना पड़ा था लेकिन कुछ ही दिन बाद संस्कृति मंत्रालय ने अस्थाई अध्यक्ष के तौर पर उत्तम पचारणे के नाम का अनुमोदन कर राष्ट्रपति को भेज दिया था। 

दरअसल अगर देखा जाए तो उत्तम पचारणे की नियुक्ति के समय से ही विवाद आरंभ हो गया था। इनकी नियुक्ति में तय प्रक्रिया के पालन नहीं होने के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में एक केस चल रहा है। पर लंबी कानूनी प्रक्रिया की वजह से उसपर निर्णय कब आएगा इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है। ललित कला अकादमी के क्रियाकलापों को लेकर अन्य कई केस भी अदालत में लंबित हैं। करदाताओं के पैसे का जो सदुपयोग कला के विकास में होना चाहिए वो कानूनी पचड़ों में खर्च हो रहा है। नियुक्तियों में भी अनियमितताओं के आरोप लग रहे हैं। ललित कला अकादमी में काम रही एक महिला को बिना किसी आरोप पत्र के सस्पेंड कर दिया गया, वो केस भी अदालत में लंबित है। ललित कला अकादमी को नजदीक से जानने वालों का कहना है कि अकादमी जितना धन मुकदमों की पैरवी में खर्च कर रही है उसमें तो कई कार्यक्रम या कार्यशाला आयोजित किए जा सकते हैं। 

ललित कला अकादमी में विवादों की शुरुआत एक तरह से नौकरशाह और कवि अशोक वाजपेयी के कार्यकाल से हुई। उन्होंने अपने कार्यकाल में कला के विकास के नाम पर कई ऐसे कार्यक्रम आरंभ किए जिसमें उन्होंने अपने मित्रों को बढ़ावा दिया। उनपर विदेशी कला प्रर्दर्शनियों में हिस्सा लेने को लेकर भी विवाद है। नियुक्तियों और गैलरी आवंटन को लेकर भी विवाद उठे थे। उसके बाद से तो जो भी इस पद पर आया उसमें से अधिकतर ने मनमानी की। ललित कला अकादमी का संविधान है. जिसके हिसाब से इसके अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों को काम करना होता है। दिक्कत तब होती है जब इस संविधान के हिसाब से काम नहीं होता है। उत्तम पचारणे का कार्यकाल खत्म होने के पहले ही संस्कृति मंत्रालय ने नए अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए सक्रियता क्यों नहीं दिखाई। क्यों इस बात का इंतजार करते रहे कि अस्थाई अध्यक्ष नियुक्त करने की नौबत आए। संस्कृति मंत्रालय के नौकरशाहों ने इस मंत्रालय से जुड़ी संस्थाओं का बेड़ा गर्क करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। अगर इन संस्थाओं में सही समय पर नियमित नियुक्तियां हों जाएंगी तो अफसरों को मनमानी का अवसर नहीं मिलेगा।  रिटायरमेंट के बाद राघवेन्द्र सिंह को सालभर के लिए संस्कृति सचिव बनाया गया था। उनसे उम्मीद थी कि वो कुछ बेहतर करेंगे लेकिन उन्होंने अपने सालभर के कार्यकाल में इन स्वायत्त संस्थाओं में कोई नियुक्ति नहीं की या नहीं होने दी। अगर इन संस्थाओं को विवादों से दूर रखना है तो इसके लिए स्पष्ट नियम बनाने होंगे। मंत्रियों को यह देखना होगा कि सही समय पर नियुक्तियां हों। संसद के चालू सत्र में राज्यसभा में सोनल मानसिंह ने संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं के शीर्ष पदों के खाली रहने का विषय उठाया है, देखते हैं उसका क्या असर होता है। 

Saturday, March 16, 2019

संस्कृति की ओट में चुनावी आखेट


लोकसभा चुनाव की तिथियों की घोषणा के बाद देशभर में चुनावी राजनीति जोर पकड़ने लगी है। बयानों के वीर अपने अपने तीर से अपने-अपने विपक्षी नेताओं को धराशायी करने में जुटे हैं। अलग-अलग विचारधारा के लोग अपनी-अपनी विचारधारा और दल को श्रेष्ठ साबित करने में जुटे हैं। श्रेष्ठता साबित करने की होड़ में जिस तरह के विशेषणों का उपयोग हो रहा है वो बेहद दिलचस्प होता जा रहा है। आजादी के बाद के चुनावों में बौद्धिकों के बीच समाजवाद, सामंती समाजवाद, सच्चा समाजवाद, रूढ समाजवाद, पारंपरिक समाजवाद से लेकर गरीब जनता और पूंजी जैसे विशेषणों का सहारा लिया जाता रहा है। दो हजार चौदह के आम चुनाव के बाद से लगातार बजने वाला राग फासीवाद इस बार धीमे स्वर में बज रहा है। दरअसल फासीवाद शब्द अब इतना घिस और पिट गया है और जिस उदारता के साथ उसका पिछले चार सालों में उपयोग किया गया कि उसने अपना अर्थ खो दिया।लोगों पर अब इस शब्द का प्रभाव लगभग खत्म सा होता दिखाई दे रहा है। फासीवाद का इस्तेमाल करनेवालों को भी यह बात समझ में आने लगी है। अब फासीवाद की जगह लोगों ने अलग शब्द चुन लिया है। अब गाहे बगाहे अघोषित आपातकाल जैसे शब्द चुनावी फिजां में गूंजने लगे हैं। असहिष्णुता का माहौल बनानेवाले अशोक वाजपेयी और रामचंद्र गुहा जैसे बौद्धिकों की रुचि भी अब इस जुमले में भी नहीं दिखाई पड़ती है, क्योंकि फासीवाद की तरह असहिष्णुता शब्द का भी प्रभाव अब क्षीण पड़ गया है। हलांकि गाहे बगाहे इस शब्द का इस्तेमाल हो जाता है। मोदी सरकार पर यह आरोप बहुत आसानी से लगाते रहे हैं कि वो असहिष्णु है, अपने विरोधियों को स्पेस नहीं देते हैं। यही आरोप अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार पर लगते रहे थे। इसको लेकर लंबे समय तक मोदी सरकार को घेरने की कोशिश की जाती रही । असहिष्णुता का ये आरोप अगर कोई प्रभाव छोड़ने में असफल रहा तो इसके पीछे संस्कृति मंत्रालय की उदारता रही। 2014 से लेकर अबतक संस्कृति मंत्रालय ने जिस उदारता के साथ सरकार के विरोधियों को आर्थिक से लेकर हर प्रकार की मदद की उसको रेखांकित किया जाना आवश्यक है। इस स्तंभ में संस्कृति मंत्रालय की उदारता और वौचाकिक विरोधियों को अहमियत और आर्थिक मदद की चर्चा होती रही है।
हाल में दो ऐसी घटनाएं घटी जिसने एक बार फिर से संस्कृति मंत्रालय की उदारता और बगैर भेदभाव के काम करने की छवि को मजबूत किया। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का शपथ लेने से लेकर अबतक ये आरोप लगता रहा है कि शिक्षा और संस्कृति विभाग में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कब्जा हो गया है। केंद्र सरकार के इन दो मंत्रालयों के अधीन या संबद्ध संस्थाओं में नियुक्ति और वहां से आर्थिक अनुदान तक संघ की हरी झंडी मिलने के बाद ही मिलती है। पर दर्जनों ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जिससे ये साफ तौर पर दिखता है कि संघ और इसके अनुषांगिक संगठनों का किसी प्रकार का प्रभाव इन मंत्रालयों पर हो, या संघ के इशारे पर काम होता हो। एक ताजा उदाहरण देखा जा सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी एक संस्था है संस्कार भारती। संघ से संबद्ध ये संस्था साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में काम करती है। प्रयागराज कुंभ के दौरान संस्कार भारती ने 15 जनवरी से लेकर 4 मार्च तक अपना पूर्वोत्तर नाम से एक कार्यक्रम किया। किसी भी कुंभ में ये पहली बार हुआ कि पूर्वोत्तर के सभी राज्यों के कलाकारों ने उसमें हिस्सा लिया। पूर्वोत्तर के अलग अलग विधा के तीन हजार के करीब कलाकारों ने संस्कार भारती के इस आयोजन में हिस्सा लिया। इसके अलावा संस्कार भारती ने कुंभ के दौरान ही संस्कृति विद्वत कुंभ के नाम से भारतीय साहित्य, सिनेमा और भारतीय ज्ञान परंपरा के विद्वानों के साथ तीन दिन के विचार कुंभ का आयोजन भी किया। इस कार्यक्रम के आयोजन में आर्थिक मदद के लिए संस्कार भारती ने संस्कृति मंत्रालय को एक प्रस्ताव भेजा था जिसमें पौने दो करोड़ रुपए की आर्थिक मदद की मांग की गई थी। बताया जा रहा है कि संस्कृति मंत्रालय ने संस्कार भारती के इस प्रस्ताव को मौखिक स्वीकृति दे दी थी। फाइल प्रोसेस हो गई थी। इस आयोजन का निमंत्रण पत्र आदि छप गया था जिसमें संस्कृति मंत्रालय के सहयोग का उल्लेख था। कार्यक्रम से चंद दिनों पहले संस्कृति मंत्रालय ने इस आयोजन के लिए आर्थिक मदद देने से इंकार कर दिया। आयोजकों के हाथ-पांव फूल गए। आनन-फानन में दूसरा निमंत्रण पत्र छपा, जिसमें से संस्कृति मंत्रालय के सहयोग का उल्लेख हटाया गया। अन्य प्रचार सामग्री में भी ऐसा ही करना पड़ा। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दबाव या प्रभाव संस्कृति मंत्रालय पर होता तो इस तरह की स्थिति नहीं बनती। आखिरी वक्त में संस्कार भारती को अन्य संस्थाओं की मदद और संसाधनों से इस कार्यक्रम को करना पडा।
संस्कृति मंत्रालय से जुड़ा एक और उदाहरण। पटना की एक संस्था है जिसने 12 और 13 मार्च को टीवी पत्रकार रवीश कुमार की कृति इश्क में शहर होना पर एक नाटक का आयोजन किया। कालिदास रंगालय में दो दिनों तक हुए इस मंचन के लिए भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने आर्थिक मदद दी। रवीश कुमार मोदी सरकार की नीतियों के कठोर आलोचकों में से हैं। सरकार की नीतियों के विरोध में स्क्रीन काला करने से लेकर अपने कार्यक्रम में स्टूडियो में विदूषकों तक को बिठा चुके हैं। मोदी सरकार के लिए तरह तरह के विशेषणों का प्रयोग करते रहे हैं। बावजूद इसके उनकी कृति पर होनेवाले नाटक को संस्कृति मंत्रालय से आर्थिक मदद दी गई। बगैर किसी दुराग्रह और पूर्वाग्रह के। यह भी तर्क नहीं दिया जा सकता है कि मंत्रालय में निचले स्तर पर चूक हुई होगी। इसकी एक प्रक्रिया है जिसके तहत संस्थाएं नाटक के मंचन के लिए आर्थिक सहयोग की मदद के लिए आवेदन देती हैं । अपने आवेदन में वो नाटक के मंचन की तिथि के अलावा किस लेखक की कृति पर आधारित नाटक का मंचन होगा, आयोजन स्थल आदि सभी जानकारी अपने आवेदन के साथ संलग्न करते हैं। आवेदन पर मंत्रालय में उच्च स्तर पर फैसला लिया जाता है। अगर किसी तरह का पूर्वग्रह होता या भेदभाव होता तो क्या ये संभव हो पाता। यह अलग बात है कि इश्क में शहर होना का नाट्य रूपांतर कैसा हुआ होगा क्योंकि वो छोटी छोटी कहानियों का संग्रह है।
इस वर्ष फरवरी और मार्च में संस्कृति मंत्रालय के इन दो फैसलों से साफ है कि संस्कृति मंत्री ने जो शपथ ली थी, जिसमें कहा जाता है कि बगैर किसी राग या द्वेष के काम करेंगे, उसको अक्षरश: निभाया है। बावजूद इसके अगर मोदी सरकार पर असहिष्णुता और संघ के इशारे पर काम करने का आरोप लगता है तो वो सही नहीं प्रतीत होता है। दरअसल अगर हम 2014 से मोदी सरकार पर लग रहे इस तरह के आरोपों का विश्लेषण करते हैं तो इसमें राजनीति की एक अंतर्धारा साफ नजर आती है। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद और राज्यों के विधानसभा चुनावों के पहले इस तरह की बातें फैला कर मोदी विरोधी राजनीति को मजबूत करने की एक कोशिश की जाती रही है। यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि पिछले बिहार विधानसभा चुनाव के पहले पुरस्कार वापसी अभियान को एक सोची समझी रणनीति के तहत शुरू किया गया था। इस बात की पुष्टि पिछले दिनों तब हुई जब साहित्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी ने एक लंबा लेख लिखकर सारी घटनाओं को क्रमबद्ध तरीके से देश के सामने रख दिया। इसी तरह से 2017 में गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले जुटान नाम से संगठन बनाकर वामपंथी लेखकों ने मोदी सरकार के विरोध करने की योजना बनाई थी। कुछ कार्यक्रम भी किए थे जिसमें देशभर में प्रतिरोध के बिखरे हुए स्वर को एक करने की आवश्यकता जताई गई थी। गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद इस जुटान का क्या हुआ ये पता नहीं चल पा रहा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले भी इस तरह की कोशिश की गई थी। लेखकों और साहित्यकारों को राजनीति करनी चाहिए या नहीं, इसको लेकर चली बहस में पूरी दुनिया के विचारकों ने अपने मत प्रकट किए। लुकाच से लेकर ब्रेख्त और बेंजामिन जैसे विश्वप्रसिद्ध लेखकों की राय है कि लेखक और राजनीति का संबंध होना चाहिए। अज्ञेय से लेकर मुक्तिबोध तक ने लेखकों में राजनीतिक चेतना की वकालत की है लेकिन इस बात का उल्लेख कहीं नहीं मिलता है कि लेखक सांस्कृतिक मसलों की आड़ लेकर राजनीति करें। पिछले पांच सालों से हो ये रहा है कि एक खास विचारधारा के लेखक साहित्यिक और सांस्कृतिक मसलों की आड़ में राजनीति कर रहे हैं। अगले महीने से लोकसभा चुनाव के लिए मतदान शुरू होगा, उसके पहले भी इस तरह के मसले उठेंगे, पर कहते हैं न कि ये जो पब्लिक है वो सब जानती है। इसमें जोड़ सकते हैं कि वो सब समझती भी है।

Thursday, January 17, 2019

पुस्तकों और दस्तावेजों से समृद्ध पुस्तकालय


अगर आप आजादी के बाद के रियासतों के भारत में विलय संबंधी सरकारी दस्तावेजों को देखना चाहते हैं और उस वक्त बनी राज्यों की भौगोलिक और राजनीतित स्थितियों की जानकारी चाहते हैं तो नई दिल्ली के शास्त्री भवन के जी विंग में स्थित पुस्तकालय जा सकते हैं। यहां विलय सबंधी कमेटी के सेटलमेंट रिपोर्ट्स भी हैं जो शोधार्थियों के लिए स्थायी महत्व के दस्तावेज हैं। विलय के दौर में राज्यों की भौगोलिक सीमा तय करने के लिए किन तर्कों का सहारा लिया गया, रजवाड़ों के प्रतिनिधियों ने क्या कहा और भारत सरकार के क्या तर्क थे, ये सबकुध इन दस्तावेजों में दर्ज है।  इन रिपोर्टस में उस दौर का पूरा इतिहास जीवंत होता है। संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के अधीन चलनेवाली इस लाइब्रेरी में ऐतिहासिक दस्तावेजों का जखीरा उपलब्ध है। तीन फ्लोर पर स्थित इस लाइब्रेरी में अलग-अलग खंड हैं जहां अलग अलग विषयों की पुस्तकें उपलब्ध हैं। इंडियन ऑफिसियल डॉक्यूमेंट डिवीजन में अबतक के सभी सरकारी गैजेट्स, सरकारी नोटिफिकेशन के अलावा सभी सरकारी प्रकाशन भी उपलब्ध हैं। इस खंड में ज्यादातर पॉलिसी मेकर्स और शोधार्थी आते हैं। इस अलावा एक खंड फॉरेन ऑफिसियल डॉक्यूमेंड डिवीजन है जहां वर्ल्ड बैंक, यूनेस्को आदि के तमाम दस्तावेज सहेज कर रखे गए हैं। इसी खंड में अंतराष्ट्रीय संधियों की प्रतियां भी पाठकों के लिए उपलब्ध हैं। सार्क देशों के बीच के समझौतों के कागजात भी यहां उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं अगर आप 1702 में भारत में प्रिंटिग की स्थिति को जानना चाहते हं, उस समय की पुस्तकों को देखना चाहते हैं तो भी इस पुस्तकालय में जाकर देख सकते हैं। 1702 के बाद की फुस्तकें भी वहां हैं जिनको पाठक देख पढ़ सकते हैं। इस तरह से पाठकों के सामने एक पूरे दौर का इतिहास खुलता है। शास्त्री भवन स्थित इस पुस्तकालय में पुस्तकों और दस्तावेजों को मिला लिया जाए तो उनकी संख्या साढे आठ लाख के करीब है। सवा चार लाख तो पुस्तकें हैं जो अंग्रेजी और अन्य भारतीय भाषाओं की हैं। ग्राउंड फ्लोर पर केंद्र सरकार के कर्मचारियों और उनके परिवारवालों के लिए अलग से रीडिंग रूम है। ग्राउंड फ्लोर के रीडिंग रूम में हो ची मिन्ह कॉर्नर है जहां रीडिंग रूम से अलग प्राइवेसी है और कुछ लोग वहां बैठकर भी पढ़ाई करते है। तीनों फ्लोर पर मिलाकर करीब सवा दो सौ लोगों के बैठकर अध्ययन करने की सुविधा इस लाइब्रेरी में है।
इस लाइब्रेरी में ऐतिहासिक दस्तावेजों, अंतराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अलावा सभी भारतीय भाषाओं में लिखा जा रहा साहित्य भी उपलब्ध है। यहां सभी भाषाओं के दर्जनों अखबार और पत्रिकाएं भी आती हैं जो पाठकों के लिए आकर्षण का केंद्र होती हैं। इसके अलावा पुस्तकों और दस्तावेजों की माइक्रोफिल्म भी बनाकर रखी गई हैं ताकि लंबे समय तक उसका उपयोग किया जा सके। केंद्रीय सचिवालय ग्रंथागार या सेंट्रल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी के नाम से इस पुस्तकालय की स्थापना हुई थी। उस वक्त ये सरकारी कर्मचारियों के लिए बनाई गई थी लेकिन अन्य लोगों को भी इसमें प्रवेश मिलता है। सोमवार से शनिवार तक खुलनेवाले इस पुस्तकालय की टाइमिंग सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक है। केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों को यहां से एक महीने के लिए चार किताबें इश्यू भी होती हैं। सरकारी कर्मचारियों के अलावा एक हजार रुपए जमा करवा कर कोई भी साल भर की सदस्यता ले सकता है। इनमें से पांच सौ रुपए सेक्युरिटी के तौर पर जमा किया जाता है जो सदस्यता छोड़ते वक्त वापस मिल जाता है। शास्त्री भवन में चूंकि भारत सरकार के कई मंत्रालय के दफ्तर भी हैं इसलिए सुरक्षा सख्त होती है। डॉ राजेन्द्र प्रसाद रोड स्थित शास्त्री भवन में प्रवेश के लिए आपके पास भारत सरकार द्वार जारी या मान्य पहचान पत्र होना अनिवार्य है। यहां का नजदीकी मेट्रो स्टेशन केंद्रीय सचिवालय है।  
  

Saturday, November 24, 2018

विरोधियों को मदद करती सरकार


साहित्य, कला और संस्कृति को लेकर इस देश में बहुधा विवाद होते रहते हैं। कोई कार्यक्रम हो जाए तो विवाद, कोई कार्यक्रम टल जाए तो विवाद। कोई नियुक्ति हो जाए तो विवाद, कोई नियुक्ति ना हो पाए तो विवाद। किसी संस्थान में कोई अध्यक्ष चुन लिया जाए तो विवाद और ना चुना जाए तो विवाद। इन विवादों में ज्यादातर तर्क आरोप की शक्ल में सामने आते हैं। दो हजार चौदह में जब से नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तब से साहित्य-संस्कृति के विवादों में आरोपों को विचारधारा से भी जोड़ा जाने लगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडा को बढ़ाने का आरोप लगना भी तेज हो गया। इसके पहले जब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने थे तब भी इस तरह की बात हुआ करती थी। अब तो हालत ये हो गई है कि कोई भी छोटा-मोटा विवाद भी हो तो उसमें प्रधानमंत्री को घसीट लिया जाता है। कोई कार्यक्रम चाहे किसी भी वजह से स्थगित हो उसकी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री पर डाल दी जाती है। बात इतने पर ही नहीं रुकती है, आरोप लगाने वाले इसको फासीवाद से जोड़ देते है। कोई इसको अघोषित इमरजेंसी बता देता है। मतलब हालात यह है कि जिसके मन में जिस तरह की बात आती है उसी तरह के आरोप लगा देता है, तथ्य, आधार और स्तर की परवाह किए बगैर।
जबकि साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र पर नजर डालें तो मौजूदा केंद्र सरकार बेहद उदार दिखाई देती है। अब अगर हम कृष्णा और सोनल मानसिंह के कार्यक्रम रद्द होने के मसले को ही देखें तो स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। इन लोगों के कार्यक्रम की आयोजक स्पिक मैके नाम की एक संस्था थी। ये संस्था सालों से भारतीय शास्त्रीय संगीत और कला के क्षेत्र में काम कर रही है। इस ताजा विवाद के बाद इस संस्था पर भी सवाल उठे। इनको केंद्र सरकार और इनके उपक्रमों से मिलनेवाली आर्थिक मदद को लेकर भी प्रश्न खड़े किए गए। कुछ लोगों की राय इस तरह की भी सामने आई कि इस पूरे विवाद में स्पिक मैके की परोक्ष भूमिका थी, लिहाजा केंद्र सरकार को उनको आर्थिक मदद देने पर पुनर्विचार करना चाहिए। इस विचार को संस्कृति मंत्रालय ने बिल्कुल तवज्जो नहीं दिया। बताया जा रहा है कि कुंभ के सिलसिले में कार्यक्रम करने के लिए इस संस्था को डेढ़ करोड़ से अधिक की राशि देने का फैसला किया गया है।संस्कृति मंत्रालय इतनी उदार है कि उनको अपने क्षेत्रीय सांस्कृति केंद्रों से ज्यादा भरोसा स्पिक मैके पर है। देशभर में सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक कार्यलय हैं, संगीन नाटक अकादमी है, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र है, कई अन्य संस्थान हैं लेकिन निजी संस्थान स्पिक मैके पर ही संस्कृति मंत्रालय को भरोसा है। इस भरोसे की क्या वजह है वो साफ नहीं है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में भारतीय रूपंकर कला के इतने बेहतरीन कार्यक्रम आयोजित होते हैं और वो भी नियमित होते हैं लेकिन कला केंद्र से भी स्पिक मैके को तीन साल में एक करोड़ चालीस लाख रुपए दिए गए हैं। इतना ही नहीं बल्कि स्पिक मैके को कार्यक्रमों के आयोजन के लिए विभिन्न मंत्रालयों और सार्वजविक उपक्रमों से लाखों का अनुदान मिलता है। अगर मौजूदा सरकार बदले की भावना से काम करती या अगर इस सरकार की नीतियां अपनी विचारधारा से इतर विचारवालों को तंग करना होता तो इतनी उदारता से स्पिक मैके को अनुदान नहीं दिया जाता। स्पिक मैके के मंच पर तो मोदी सरकार से विरोध रखनेवाले कलाकारों को आमंत्रित किया ही जाता रहा है। दरअसल ये सरकार कलाकार को कलाकार की नजर से देखती है।
संस्कृति मंत्रालय तो इस मामले में बेहद उदार है। वो पहले भी साहित्यिक पत्रिका हंस के आयोजनों को आर्थिक मदद करती रही है जहां मंच पर घोषित मोदी विरोधी लोग बैठते थे और सरकार को कोसते थे। वो दृष्य कितना मनोहारी और समावेशी होता है जब वक्ता के पीछे बोर्ड पर लिखा होता है, संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से आयोजित, और वक्ता उस बोर्ड के आगे खड़े होकर नरेन्द्र मोदी और फासीवाद को कोसते हैं। देश में इमरजेंसी जैसे हालात को लेकर गरजते हैं। पर यह कितनी हास्यास्पद बात है कि संस्कृति मंत्रालय के आर्थिक सहयोग से सजे मंच पर खडे होकर आप कह रहे हैं कि देश में इमरजेंसी जैसे हालात हैं। दरअसल इस तरह के आरोप लगानेवालों को इमरजेंसी जैसे हालात का अंदाज ही नहीं होता है। अगर इमरजेंसी जैसे हालात होते तो सरकारी मदद वाले मंच से सरकार के विरोध के बोल नहीं गूंजते। इमरजेंसी के दौर में अनुदान देने के पहले मंच पर बैठनेवालों की सूची मांगी जाती थी। सूची से संतुष्ट होने के बाद ही धन जारी किया जाता था। सूचना के अधिकार के तहत संस्कृति मंत्रालय से प्रश्न पूछकर यह पता लगाया जा सकता है कि क्या कभी इस मंत्रालय ने वक्ताओं या मंच पर परफॉर्म करनेवाले कलाकारों के नाम को देखकर धन दिया। शुरुआत में तो संस्कृति मंत्रालय ने कई ऐसे कार्यक्रमों को आर्थिक मदद दी जिसमें धुर वामपंथी शामिल होते रहे हैं। मोदी सरकार पर इस तरह के आरोप लगानेवालों को संस्कृति मंत्रालय के कामकाज को देखना चाहिए।
संस्कृति मंत्रालय तो इतनी उदार है कि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और आमसभा के सदस्यों के चुनाव के समय भी सिर्फ अपनी राय ही दे पाई। आम सभा के सदस्यों ने तो सस्कृति मंत्रालय की राय को ठुकरा दिया। संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव ने मंत्रालय की तरफ से एक उम्मीदवार को नामित किया था और आमसभा से उनको वोट देने को कहा था लेकिन उस उम्मीदवार की हार हो गई। मंत्रालय ने कुछ नहीं किया, साहित्य अकादमी के कामकाज में किसी तरह की बाधा खड़ी नहीं की। अगर किसी तरह की असहिष्णुता होती तो यहां उसका असर तो दिखता। साहित्य अकादमी ही क्यों अगर हम संगीत नाटक अकादमी की बात करें तो वहां भी समावेशी माहौल है। संगीत नाटक अकादमी की जो समिति है उसमें कम्युनिस्ट पार्टी के कार्ड होल्डर को इसी सरकार ने नामित किया। नक्सली होने का आरोप झेल रहे एक शख्स के रिश्तेदार को संगीत नाटक अकादमी ने पुरस्कृत किया। कहीं कोई विरोध या कहीं किसी तरह की हलचल तक नहीं हुई। इसी तरह से आरोप लगता है कि नियुक्तियों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इशारे पर नियुक्तियां होती हैं। यह भी मिथ्या आरोप है। ऐसे ऐस शख्सियतों को सरकार ने अहम जिम्मेदारी दी है जो घोषित तौर पर मोदी और संघ के विरोधी रहे हैं। इस स्तंभ में समय समय पर ऐसे लोगो के बारे में लिखा जाता रहा है, जिसको दोहराने का कोई अर्थ नहीं है।
असहिष्णु तो मोदी के पहले की सरकारें थीं। यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि जब 2004 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा और कांग्रेस की अगुवाई में वामपंथियों के समर्थन से सरकार बनी तो साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में क्या हुआ था। 2005 में संगीत नाटक अकादमी के अद्यक्ष के पद से सोनल मानसिंह को बर्खास्त कर दिया गया था। यह पहली बार हुआ था कि राष्ट्रपति के आदेश से संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष को पद से हटाया गया। उस दौर के अखबारों को देखकर इस बात का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि सोनल मानसिंह को वामपंथी दलों के दबाव में हटाया गया था। इसी तरह से तत्कालीन सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष अनुपम खेर को हटा दिया गया था। तब पार्टी के पत्र पीपल्स डेमोक्रेसी में हरकिशन सिंह सुरजीत ने लेख लिखकर अनुपम खेर को हटाने की बात की थी और खेर को संघ का आदमी करार दिया था। इस तरह के कई वाकए उस दौर में हुए थे लेकिन तब की सरकार को किसी ने असहिष्णु नहीं कहा था। इस वक्त की यूपीए सरकार पर किसी कोने अंतरे से फासीवाद को बढ़ावा देने का आरोप नहीं लगाया गया था। जब आप कोई काम करें और उसके लिए आपको जिम्मेदार ना ठहराया जाए और जब आप वो काम ना करें तो उसके लिए आपको जिम्मेदार ठहराया जाए। यह किस तरह का मैनेजमेंट है इसको समझने की जरूरत है। दरअसल ये पूरा खेल अर्थ से जुड़ा है। जब तक अनुदान मिलता रहता है वामपंथ से जुड़े संगठन या उस विचारधारा के खुद को करीब माननेवाले खामोश रहते हैं और जहां आर्थिक मदद में कटौती होने की आशंका दिखाई देती है तो फासीवाद का शोर मचने लगता है ताकि सरकार पर दबाव बने और इस तरह के आरोपों से बचने के लिए आर्थिक मदद में कटौती नहीं हो सके। आजाद भारत की ये इकलौती और पहली सरकार है जो उन संगठनों को मदद करती है जिसके मंच पर से उसके सबसे बड़े नेता की व्यक्तिगत और वैचारिक दोनों आलोचना की जाती है।