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Sunday, November 17, 2019

पुस्तक मेला नहीं सांस्कृतिक समागम


समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में देशभर में साहित्य महोत्सवों की धूम मच रही है और कस्बों और मोहल्ले स्तर पर लिटरेचर फेस्टिवल हो रहे हैं। दिल्ली के द्वारका से लेकर सुदूर कोच्चि तक में उसी नाम से लिटरेचर फेस्टटिवल हो रहे हैं। कई बार तो इन लिटरेचर फेस्टिवल में इस तरह के विषय और संवाद होते हैं जो साहित्य को मर्यादाहीन करते प्रतीत होते हैं। कई साहित्य महोत्सवों में मीना बाजार जैसा माहौल तैयार किया जाता है। साहित्य महोत्सव के नाम पर दुकानें सजाई जाती हैं, कपड़े, गहने से लेकर जूते तक साहित्यिक मेलों में बेचने का चलन शुरू हो चुका है। कई साहित्यिक महोत्सवों में सांस्कृतितिक कार्यक्रमों के नाम पर फूहड़ता का प्रदर्शन भी होता है। देशभर में आयोजित होनेवाले कई साहित्यिक मेलों को देखकर कहा जा सकता है कि लोगों की रुचि इस ओर बढ़ी है। लोग साहित्य कला और संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं। जब तक साहित्यिक महोत्सवों का उद्देश्य साहित्य और कला को बढ़ाना देना है तबतक इसका स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन जैसे ही उद्देश्य इससे अलग होता है तो उनकी आलोचना भी होनी चाहिए। लिटरेचर फेस्टिवल की भीड़ में एक पुस्तक मेला ऐसा है जो इस तरह के साहित्यिक आयोजन से बिल्कुल अलग दिखता है। यह आयोजन है पटना पुस्तक मेला। पिछले चौंतीस साल से पटना में आयोजित होनेवाला ये पुस्तक मेला पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में 8 नवंबर से शुरू हो चुका है और ये 18 नवंबर तक चलेगा। पटना पुस्तक मेला का ये पच्चीसवां आयोजन है। 1985 में शुरू हुआ ये पुस्तक मेला पहले हर दो साल पर आयोजित किया जाता था जो बाद में सालाना पुस्तक उत्सव के रूप में नियमित हुआ। पांच छह साल में पटना पुस्तक मेला बिहार में इतना लोकप्रिय हो गया कि वो प्रदेश के सांस्कृतिक कैलेंडर का अभिन्न हिस्सा हो गया। यहां सिर्फ पुस्तकों की बिक्री नहीं होती बल्कि लेखकों आदि से संवाद का सत्र भी होता है।
कहा जाता है कि लड़के स्कूल और कॉलेज छोड़कर या भागकर फिल्में देखने चले जाते हैं लेकिन कोई भी स्कूल कॉलेज से भागकर पुस्तकालय या फिर पुस्तकों के पास नहीं पहुंचता है । यह बात सत्य हो सकती है पर मेरा अनुभव बिल्कुल भिन्न है । हम तो कॉलेज छोड़कर अपने दोस्तों के साथ 1992 के पुस्तक मेला को देखने तकरीबन सवा दो सौ किलोमीटर की रेल यात्रा करके भागलपुर से पटना पहुंचे थे । कई हिंदी के प्रकाशकों के स्टॉल पर जाकर पुस्तक क्लब आदि की सदस्यता भी ली थी । दो तीन दिनों तक पुस्तक मेले में खरीदारी की थी और समृद्ध होकर लौट आए थे । मेरे जैसे जाने कितने नौजवान बिहार के दूर दूर के गांवों कस्बों से पटना पुस्तक मेले में पहुंचे थे। बिहार की बारे में मान्यता है कि वहां सबसे ज्यादा पत्र-पत्रिकाएं बिकती हैं। लोग सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यक रूप से जागरूक हैं । यह हकीकत भी है । यहां के लोग सिर्फ पढ़ते ही नहीं हैं उसपर बेहिचक अपनी राय भी देते हैं, आपस में किसी मुद्दे पर बहस भी करते हैं । बिहार में इस जागरूकता को और फैलाने और नई पीढ़ी की पढ़ने की रुचि को संस्कारित करने में पटना पुस्तक मेला ने बेहद सकारात्मक और अहम भूमिका निभाई है । बिहार ने इस स्थापना को भी निगेट किया है कि युवा साहित्य नहीं पढ़ते या युवाओं की साहित्य में रुचि नहीं है । पटना पुस्तक मेले के दौरान युवाओं की भागीदारी और उनके उत्साह को देखकर संतोष होता है कि हिंदी के पाठक भारी संख्या में हैं जरूरत है उनतक पहुंचने के उपक्रम की है।
इस वर्ष पटना पुस्तक मेले में ‘दैनिक जागरण हिंदी बेस्टसेलर’ की नई सूची भी जारी की गई। हिदी साहित्य की अलग अलग विधाओं में सबसे ज्यादा बिकनेवाली पुस्तकों को लेकर तैयार की गई दैनिक जागरण हिंदी बेस्टसेलर की सूची की घोषणा 15 नवंबर को पटना पुस्तक मेले में की गई। हिंदी साहित्य के लगभग हर मंच पर ‘दैनिक जागरण हिंदी बेस्टसेलर’ सूची की चर्चा होती है। दरअसल हिंदी में किताबों की बिक्री और उसके प्रामाणिक आंकड़ों को लेकर भ्रम की स्थिति रही है। इस भ्रम को दूर करने के लिए दैनिक जागरण ने तीन साल पहले एक ऐतिहासिक पहल की थी और हिंदी बेस्टसेलर सूची का प्रकाशन शुरू किया था। हिंदी में पहली बार प्रामाणिक और पारदर्शी तरीके से हिंदी बेस्टसेलर की सूची तैयार करवाई गई । दैनिक जागरण के लिए विश्व प्रसिद्ध एजेंसी नीलसन-बुकस्कैन बेस्सेलर की सूची तैयार करती है । नीलसन-बुकस्कैन दुनिया के कई देशों में बेस्टसेलर की प्रामाणिक सूची प्रस्तुत करती है। जब हिंदी में पहली बार बेस्टलर की सूची प्रकाशित हुई तो तमाम चर्चा इसके इर्द गिर्द होने लगी। दैनिक जागरण हिंदी बेस्टसेलर सूची को चार श्रेणियों में बांटा गया है – कथा, कविता, कथेतर और अनुवाद । हर श्रेणी में दस बेस्टसेलर पुस्तकों की सूची होती है। यह दैनिक जागरण की मुहिम ‘हिंदी हैं हम’ के तहत किया जा रहा है।
हिंदी में बिकनेवाली पुस्तकों की प्रामाणिक और पारदर्शी सूची को तैयार करने में कई मानदंडों को रखा गया है। प्रकाशकों के साथ बैठकर इस मानदंडों को तैयार किया गया था। पुस्तकों पर तेरह अंकों के वैध आईएसबीएन नंबर का होना आवश्यक है। दैनिक जागरण हिन्दी बेस्टसेलर के चयन के लिए देशभर के 42 बड़े शहरों का चुनाव किया जाता है जहां की मुख्य भाषा हिन्दी है। बेहतर नतीजों के लिए उन शहरों के चिन्हित पुस्तक विक्रेताओं से तय तिमाही के बिक्री के आंकड़ें इकट्ठा किए जाते हैं। बिक्री संबंधी जानकारी के लिए नीलसन एजेंसी के प्रतिनिधि हर शहर के चिन्हित पुस्तकों की दुकानों पर जाते हैं और प्रामाणिकता की जांच करने के बाद ही आंकड़ों को शामिल किया जाता है। बेस्टसेलर सूची को तैयार करने के लिए चिन्हित किये गए पुस्तकों की दुकानों के आंकड़ों को नील्सन-बुकस्कैन रिटेल पैनल में मौजूद ऑनलाइन बिक्री के आंकड़ों के साथ मिलाकर हिन्दी बेस्टसेलर की सूची को अंतिम रूप दिया गया है । यह बहुत ही वैज्ञानिक तरीका है। इस वर्ष इस पुस्तक मेले में दैनिक जागरण ने अपने अभियान हिंदी हैं हम के तहत जागरण सान्निध्य का आयोजन भी किया था। इसमें बिहार और देश के कई नामचीन लेखक जुटे थे। पटना पुस्तक मेला तो पुस्तक मेला से आगे जाकर सांस्कृतिक आंदोलन की शक्ल अख्तियार कर चुकी है । जैसा कि उपर संकेत किया गया है कि पटना पुस्तक मेले में लेखकों, पत्रकारों और विशेषज्ञों के साथ विषय विशेष पर विमर्श भी होते हैं । पटना पुस्तक मेला ने सूबे में समाप्तप्राय नुक्कड़ नाटक को एक विधा के तौर फिर से संजीवनी प्रदान की। इसके अलावा पटना पुस्तक मेला हर वर्ष कई तरह के नए प्रयोग भी करता है। इस वर्ष 8 नवंबर से शुरू हुए आयोजन का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन की बजाए पौधों में पानी डालकर किया गया क्योंकि इस वर्ष की थीम को पर्यावरण से जोड़ा गया था। किसी मशहूर शख्सियत की बजाए मेले का उद्घाटन पटना के स्कूलों के प्राचार्यों से करवाया गया। यहां बच्चों के लिए लेखन की कार्यशाला आदि भी आयोजित की जाती है। नवोदित कवियों को अपनी रचनाओं के पाठ के लिए मंच मुहैया करवाया जाता है।
पटना पुस्तक मेला के आयोजकों ने बिहार की कला-संस्कृति को संजोने के लिए भी तरह तरह के प्रयोग करते रहे हैं। यहां से राजनीतिक संकेत भी निकलते रहे हैं। पाठकों को याद होगा कि वो पटना पुस्तक मेला की पेंटिंग प्रदर्शनी ही थी जहां से नीतीश कुमार ने महागठबंधन से अलग होने का संकेत दिया था। पुस्तक मेले में पहुंचे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कमल के फूल में रंग भरे थे। दरअसल हुआ यह था कि नीतीश कुमार उस वक्त राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ महागठबंधन की सरकार चला रहे थे। उस वक्त तक किसी को इस बात का इल्म भी नहीं था कि नीतीश कुमार महागठबंधन से अलग हो सकते हैं। जब नीतीश कुमार पटना पुस्तक मेले की पेंटिंग प्रदर्शनी में मिथिला की प्रसिद्ध कलाकार बउआ देवी के पास पहुंचे थे और उनके बनाए कमल के फूल में अपनी कूची से रंग भरे थे तब पहली बार ये बात निकली थी कि नीतीश भारतीय जनता पार्टी के साथ जा सकते हैं। चंद दिनों बाद यही हुआ था और नीतीश कुमार ने महागठबंधन को छोड़कर भारतीय जनता पार्टी के समर्थन और साथ से सरकार बनाई थी। अगर हम समग्रता से पुस्तक मेले पर विचार करें तो हमें दो उत्साही युवाओं, अमित झा और रत्नेश्वर की दाद देनी जो अपनी टीम के साथ इस मेले को बेहतर बनाने में लगे रहते हैं। जरूरत इस बात की है कि बिहार सरकार भी इस पुस्तक मेले मे को अपने सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल करे और इस मेले को बेहतर बनाने की दिशा में अपना सहयोग करे।  

Saturday, June 16, 2018

नईवाली हिंदी की चुनौतियां


करीब तीन साल पहले की बात रही होगी,हिंदी प्रकाशन जगत में एक जुमला बहुत तेजी से चला, ‘नई वाली हिंदी’। ‘नई वाली हिंदी’ की इस तरह से ब्रांडिंग की गई जैसे हिंदी नई चाल में ढलने लगी हो। हिंद युग्म प्रकाशऩ ने इसको अपना टैग लाइऩ बनाया। वहां से प्रकाशित होनेवाले उपन्यासों और कहानी संग्रहों को ‘नई वाली हिंदी’ की कृतियां कहकर प्रचारित किया जाने लगा। सोशल मीडिया से लेकर साहित्य उत्सवों तक में इस ‘नई वाली हिंदी’ पर चर्चा शुरू हो गई। इसका एक असर ये हुआ कि पाठकों को लगा कि ‘नई वाली हिंदी’ कुछ नयापन लेकर आई है। इस बीच दैनिक जागरण बेस्टसेलर की सूची आई जिसमें इस ‘नई वाली हिंदी’ के कई लेखकों ने शीर्ष पर जगह बनाई। जागरण की हर तिमाही प्रकाशित बेस्टसेलर की सूची में ‘नई वाली हिंदी’ के लेखकों ने लगातार जगह बनाई। इस सूची में ‘नई वाली हिंदी’ के लेखकों के अलावा नरेन्द्र कोहली, रमेश कुंतल मेघ, गुलजार, जावेद अख्तर, यतीन्द्र मिश्र जैसे लेखकों ने भी जगह बनाई। लेकिन दैनिक जागरण बेस्टसेलर में ‘नई वाली हिंदी’ के लेखकों के लगातार बने रहने से इसपर देशव्यापी चर्चा शुरू हो गई। जब चर्चा जोर पकड़ने लगी तो वो ‘नई वाली हिंदी’ के लेखकों की कृतियों में अंग्रेजी के शब्दों के उपयोग पर चली गई, फिर एकाधिक बार इन कृतियों में रोमन में लिखे वाक्यों को लेकर चर्चा हुई, कभी सकारात्मक तो कभी नकारात्मक लेकिन ‘नई वाली हिंदी’ चर्चा में बनी रही। कुछ लेखकों ने प्रेमचंद से लेकर हिंदी के अन्य लेखकों की कृतियों को उद्धृत करते हुए ये बताया कि उन लोगों ने भी अपनी अपनी रचनाओं में अंग्रेजी के वाक्यों का प्रयोग किया है जो देवनागरी में छपी रचनाओँ के मध्य है। कुछ लोगों ने कहा कि साहित्यिक कृतियों में हिंदी को अपनी शुद्धता के साथ उपस्थित होना चाहिए तो कइयों ने भाषा को लेकर इस तरह की बात को दुराग्रह माना। कुछ लोगों ने बोलचाल की भाषा को अपनाने की वकालत करनी शुरू कर दी। बोलचाल की भाषा में हिंदी लिखने की बात भी नई नहीं है। हिंदी के महत्वपूर्ण कवि भवानी प्रसाद मिश्र की एक कविता है- जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख/और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख। दशकों पहले भवानी बाबू जैसे कवि ने साहित्य में भी बोलचाल की भाषा की वकालत की थी। यह बहस अब भी जारी है, जारी रहनी भी चाहिए। भाषा को लेकर लगातार मंथन होने के अपने फायदे भी हैं। लेकिन इस ‘नई वाली हिंदी’ में ब्राडिंग के अलावा भाषा के स्तर पर नया क्या था ये पाठकों के सामने आना शेष है।
भवानी बाबू बोलचाल की भाषा को साहित्य की भाषा बनाने का आग्रह तो करते हैं लेकिन अगली पंक्ति में वो इससे भी महत्वपूर्ण बात करते हैं जिसको रेखांकित किए जाने की जरूरत है। भवानी प्रसाद मिश्र अपनी इसी कविता में इसी पंक्ति के बाद कहते हैं कि ‘चीज ऐसी दे कि जिसका स्वाद सिर चढ़ जाए/बीज ऐसा बो कि जिसकी बेल बन बढ़ जाए।‘ कहने का मतलब यह है कि वो रचना की स्तरीयता और उसके उत्कृष्ट होने को लेकर भी कवियों और लेखकों को ललकारते हैं। हमें इस ‘नई वाली हिंदी’ के लेखकों की रचनाओं पर विचार करने का वक्त आ गया है। ‘नई वाली हिंदी’ के लेखक सत्य व्यास की किताब ‘बनारस टॉकीज’ जबरदस्त हिट रही, बिकी भी। सत्य व्यास को जमकर शोहरत मिली। बेस्टसेलर की सूची में भी इसने लगातार अपना स्थान बनाए रखा है। अपनी इस किताब में सत्य व्यास ने बनारस हिंदी विश्वविद्यालय को केंद्र में रखा और वहां की कहानी को बेहद दिलचस्प अंदाज में पाठकों के सामने पेश किया। अब तो इस कृति पर फिल्म भी बन रही है। इसके बाद सत्य व्यास का दूसरा उपन्यास आया, ‘दिल्ली दरबार’। अपने इस उपन्यास में लेखक ने दिल्ली विश्वविद्यालय और वहां के छात्र जीवन को केंद्र में रखा। यह पुस्तक भी चर्चित हुई, लेकिन लोकप्रियता और बिक्री में ये ‘बनारस टॉकीज’ को पार नहीं कर सकी। हलांकि सत्य के इस उपन्यास में भी पठनीयता थी, भाषा का प्रवाह भी था लेकिन विषयगत नवीनता नहीं थी। ‘बनारस टॉकीज’ के बाद निखिल सचान का उपन्यास ‘यूपी 65’ आया। निखिल सचान की इसके पहले ‘नमक स्वादानुसार’ और ‘जिंदगी आइस पाइस’ के नाम से दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थी। निखिल का ये पहला उपन्यास था जिसमें बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के आईआईटी के परिवेश में बुनी एक इंजीनियर के इश्क और शिक्षा व्यवस्था से उसके मोहभंग की कहानी है। वही विश्वविद्यालय और वही छात्रों के बीच का जीवन। निखिल के इस उपन्यास को सफलता मिली लेकिन अपेक्षाकृत कम। इसके बाद कई उत्साही युवाओं ने युनिवर्सिटी कैंपस को लेकर उपन्यास लिखे। ऐसा नहीं है कि ‘नई वाली हिंदी’ में सिर्फ उपन्यास लिखे जाने लगे। इसमें कहानियां और व्यंग्य आदि भी लिखे गए। ‘नई वाली हिंदी’ के एक और ब्रांड अंबेसडर बने दिव्य प्रकाश दुबे। उनका कहानी संग्रह ‘मुसाफिर कैफे’ खूब चर्चित हुआ। उनकी और कृतियां ‘मसाला चाय’ और ‘टर्म्स एंड कंडिशंस अप्लाई’ ने भी जमकर चर्चा बटोरी, पाठकों का प्यार भी मिला। इसी समय ये दावा किया गया कि हिंदी साहित्य में एक नई विधा का उदय हुआ है। ये दावा किया गया अजीत भारती के बैचलर व्यंग्य संग्रह ‘बकर पुराण’ में। 2016 में प्रकाशित इस किताब में लेखक ने लिखा- ‘बकर साहित्य हिंदी साहित्य की एक नई विधा है जो सड़के के पास की चाय दुकानों, गोलगप्पे के ठेलों, स्कूल कॉलेज के हॉस्टलों से होते हुए बैचलरों के उस कमरे पर पहुंचता है जहां गालिब है, मोमिन है, ट्रॉटवस्की है, आंद्रे ब्रेतां है और कास्मोपॉलिटन का पुराना-सा इशू भी है।‘ अब ‘बकर साहित्य’ हिंदी साहित्य की नई विधा के तौर पर स्थापित हो पाया या नहीं ये तो समय तय करेगा लेकिन साहित्य की नई विधा स्थापित करने का दावा लप्रेक ने भी किया था जिसका हश्र हिंदी जगत ने देख लिया। तीन-चार लेखकों से आगे नहीं बढ़ पाई वो कथित विधा।  
‘नई वाली हिंदी’ की ब्रैंडिंग के बाहर के लेखक चेतन भगत और पंकज दूबे ने भी युनिवर्सिटी जीवन को केंद्र में रखकर उपन्यास लिखे। पंकज दूबे को भी जो सफलता ‘लूजर कहीं का’ में मिली थी वैसी सफलता उनको बाद के उपन्यासों में नहीं मिल पाई। चेतन को भी नहीं। तो क्या अब ये वक्त आ गया है कि ‘नई वाली हिंदी’ के कई लेखकों को ये समझना होगा कि पाठकों को भाषा के चमत्कार से बहुत देर और दूर तक चमत्कृत नहीं किया जा सकता है। मुझे तो यही लगता है कि ‘नई वाली हिंदी’ के लेखकों को अब नए विषयों की तलाश करनी चाहिए। कॉलेज युनिवर्सिटी की किस्से बहुत हो गए। क्योंकि इनसे अलग हटकर भी जिसने लिखा उनको सफलता मिली। अनु सिंह चौधरी ने इससे अलग हटकर ‘नीला स्कार्फ’ और ‘मम्मा की डायरी’ लिखी। जिसे काफी सराहा गया। इसी तरह से भगवंत अनमोल ने ‘जिंदगी फिफ्टी फिफ्टी’ लिखी जिसको भी खूब पसंद किया गया। प्रियंका ओम की ‘मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है’ को भी लोगों ने सराहा। ‘नई वाली हिंदी’ के युवा लेखकों के सामने अभी पूरी जिंदगी पड़ी है, हिंदी साहित्य जगत को उनसे बहुत उम्मीदें हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य की उस जड़ता को तोडा जो किसी खास तरह की यथार्थवादी रचनाओं को ही श्रेष्ठ मानती थी। उन्होंने हिंदी से उन पाठकों को भी जोड़ा जो इन खास तरह की रचनाओं से उबकर साहित्य से विमुख होने लगे थे। एक योगदान इनका और है कि इन्होंने हिंदी के कई प्रकाशकों को भी इस तरह की कृतियां छापने के लिए उकसाया। इन्होंने अपनी सफलता से अपने आलोचकों का मुंह भी बंद किया जो इस नई वाली हिंदी के लेखकों को खारिज करने के लिए उनको हल्की फुल्की पुस्तकें कहा करते थे और ये भी तर्क देते थे कि इन पुस्तकों का स्थायी महत्व नहीं है। अब इनके सामने यही चुनौती है कि वो कैसे अपने लेखन में विषय का विस्तार करते हैं, अपने अलग अलग अनुभवों को कैसे कथानक में पिरोकर पाठकों के सामने पेश करते हैं। अगर वो ऐसा कर पाते हैं तो फिर उनको साहित्य के केंद्र में स्थापित होने से कोई रोक नहीं सकेगा लेकिन अगर वो अपने लेखन के दायरे का विस्तार नहीं कर पाएंगें तो बहुत संभव है उनकी हालत भी अमिताभ बच्चन के एंग्री यंग मैन के किरदार की तरह हो जाएगी जिसकी शुरुआत तो होती है ‘दीवार’ और ‘त्रिशूल’ जैसी फिल्मों से लेकिन अंत होता है ‘लाल बादशाह’ और ‘तूफान’ जैसी फिल्मों से। अमिताभ को भी तो सफलता के लिए परदे पर अपनी छवि बदलनी ही पड़ी थी।

Tuesday, February 20, 2018

'कथ्य पर विमर्श को नहीं थोपती'


   मनीषा कुलश्रेष्ठ हिंदी की ऐसी लेखिका हैं जिन्होंने लगातार अपने लेखन की चौहद्दी का अतिक्रमण किया है। हाल ही में उन्होंने बिरजू महाराज पर अपनी किताब पूरी की है। इसके पहले मानसिक रोग को केंद्र में रखकर उन्हों उपन्यास लिखा था जो खासा चर्चित हुआ था।  उऩसे हिंदी साहित्य के परिदृश्य और उनके लेखन पर मैंने उनसे बात की । 


1.   कहानी से शुरु करके उपन्यास और अब एक कलाकार पर पूरी किताब, लेखक क तौर पर कैसे विषयों के वैविध्य को संभाल पाती हैं
 उत्तर : मैं बहुविध विषयों से जुड़ी रही हूँ। विज्ञान की स्नातक होकर, हिंदी में एम. ए. फिर एम. फिल. किया, कथक में विशारद साथ चलता रहा। मनोविज्ञान मेरी रुचि का विषय रहा सो इसमें स्वअध्ययन मैं करती आई हूं। मुझे लगता है, ज्ञान का एक पात्र होता है जिसे एकत्र हो छलकना होता है, अभिव्यक्ति के माध्यम से । पहले कहानी लिख पाना श्रमसाध्य काम लगता था, फिर कहानी का फलक छोटा लगने लगा तो उपन्यास लिखे। फिर लगा कुछ अलग भी लिखा जाए, तब बिरजू महाराज के समूचे नृत्य को तकनीकी ढंग से विश्लेषित करती किताब लिखी, जो शीघ्र प्रकाशित होगी। अब मैं ‘ मेघदूत – कॉरीडोर’ परिकल्पना पर यात्राएं कर रही हूं रामगिरी से मानसरोवर तक की, साथ - साथ यात्रावृत्तांत लिख रही हूँ। जब जुनून हो तो बहुत कुछ मुनासिब हो ही जाता है।
2.   हिंदी कहानी पर अगर बात करें तो इस वक्त विषयगत नवीनता का अभाव दिखता है, आपको क्या वजह लगती है ।
उत्तर : मैं पुरानी हिंदी कहानी की बात करूं तो ऐसा नहीं था। वह समय था जब राजनैतिक, आंचलिक, मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक, नागरिक जीवन की कहानियां लिखी जाती थीं। विज्ञान कथाओं का भी द्वार खुला था। कहानी में शिल्पगत विविधताएं भी थीं। आज का परिदृश्य देख मुझे यही लगता है कि नए लेखक पढ़ते कम हैं, वे साहित्येतर कुछ नहीं पढ़ते। यही वजह है कि वे किसी पुरातन विषय पर लिखकर सोचते हैं, पहले किसी ने नहीं लिखा। शिल्प का बासीपन भी हिंदी कहानी को बोझिल बना रहा है। उस पर जीवनानुभव के बिना बहुत कुछ डैस्क पर बैठ कर लिखे जाने पर ऐसा होता है। इस कमी के चलते हम नई प्रवृत्तियों वाला अपना कथा-समय नहीं गढ़ पा रहे। वरना पुराने कहानीकारों को देखें वे निरंतर यात्राएं करते थे, आपसी संवाद उन्हें प्रेरित करता था कि वे स्वयं को प्रतिष्ठित करने से पहले अपना रचना - समय तो प्रतिष्ठित करें, जिस की पीठिका पर उनके समय की कथा प्रवृत्तियाँ उभर कर आएं।
3.   हिंदी कहानी में डिटेलिंग का भी अभाव नजर आता है वो क्यों।
उत्तर- सतही डीटेलिंग तो बहुत है आज की हिंदी कहानी में, मगर एक सतत बहुपरतीय बारीकी का अभाव है। इस मामले में मुझे छोटी क्रिस्प उर्दू कहानियां ज़्यादा पसंद हैं। डीटेलिंग हो तो गुलेरी जी की ‘ उसने कहा था’, राजेंद्र यादव की ‘जहाँ लक्ष्मी कैद है’, कमलेश्वर की ‘राजा निरबंसिया’, मन्नू जी की ‘यही सच है’ या मृदुला गर्ग की ताज़ा कहानी ‘जूते का जोड़ – गोभी का मोड़’ जैसी हो।
4.   इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में लंबी कहानियों का दौर चला लेकिन अब लंबी कहानियां कम लिखी जा रही हैं , आपको इसकी क्या वजह लगती है।
उत्तर : मैं यह नहीं मानती कि हमारे समकालीन यह चुनौती नहीं ले सकते, मैंने भी लंबी कहानियां लिखी हैं, कई समकालीनों ने भी। मनोज रूपड़ा लिखते आए हैं। हां, संपादकों का दबाव रहता है पत्रिका के पन्नों को लेकर।

5.   आपने अपने उपन्यास शिगाफ में कश्मीर को विषय बनाया, जब आपने लिखना शुरू किया था तो आपके दिमाग में क्या था या कैसे ये विषय सूझा।
उत्तर : मैं अवंतिपुर रही हूं। वह मेरे दांपत्य जीवन की शुरुआत हुई थी और आतंक के दौर की भी। तब मैं लेखक नहीं थी, मगर कश्मीर घूमने का उत्साह था। उसी दौर में एक बसस्टॉप पर वरिष्ठ वायुसेना अधिकारी को बस का इंतजार करते हुए गोली मार दी गई थी और तब से वह स्टेशन हमारे लिए एक बंद किला बन कर रह गया था । मैं कश्मीर में होकर भी कश्मीर को देखने का ख्वाब लिए लौट आई थी। कश्मीर का मुद्दा मेरे लिए समझ न आने वाला गुंजल था। बरस बीते, लिखना शुरू हुआ। पहलगाम में वर्ष 2005 जून में साहित्य अकादमी की एक अनुवाद कार्यशाला हुई जिसमें मैं भी आमंत्रित थी। आतंक का ब्रेक टाईम था, टूरिस्ट बसों पर यदा – कदा बम फेंके जाते थे। कभी कभी श्रीनगर का लाल - चौक दहल जाता था। अमरनाथ यात्रा चल रही थी, राज्य में रेडअलर्ट – सा था। माहौल में तनाव जाहिर था, मगर हमारे लेखक मित्र आजुर्दा का आग्रह और उत्साह था कि यह कार्यशाला संपन्न हुई। आते-जाते मुझे अवंतिपुर बसस्टैंड का वह पेड़ दिखा, जिस पर गोलियों के निशान तब तक थे। मेरा मन अनमना हो गया। हम आठ भाषाओं के लेखक, अनुवादक और साहित्य अकादमी के सदस्य  पहलगाम में जम्मू एंड कश्मीर टूरिज्म की कॉटेजेज़ में ठहरे हुए थे। प्रो.आज़ुर्दा के कॉटेज में अकसर सब इकट्ठा होते, शायरी – कविताओं का माहौल रहता। उन्ही दिनों एक स्वर्गीय कश्मीरी पंडित प्रोफेसर की बेटी विदेश में बस जाने के बाद श्रीनगर आई थी घूमने, पुराना सब देखने। वे लोग प्रो. आजुर्दा से भी मिलने आए। चाय के बीच अचानक कहीं से यह सवाल उछला- आप लोग चले क्यों गए थे? मरहूम कश्मीरी पंडित प्रोफेसर की बेटी कुछ देर बाद चुप रह कर बोली- सब तो जा रहे थे। उसके चेहरे की पीड़ा ने मुझे कहीं हिला दिया। बस उसी समय मेरे उपन्यास की प्रॉटोगॉनिस्ट अमिता ने जन्म ले लिया था।
6.       हिंदी में जिस तरह से स्त्री विमर्श हो रहा है उसपर कुछ लेखकों को आपत्ति है, आपका स्त्री विमर्श को लेकर क्या रुख या स्टैंड है ।

उत्तर : हिंदी में हम लोग अभी उस परिपक्वता को हासिल ही नहीं हुए हैं कि हम लेखन संग एक्टिविज्म की बात कर सकें। हम हमेशा विमर्श के मूल-मुद्दे से उखड़ जाते हैं। हर विमर्श का राजनैतिक ध्रुवीकरण हो जाता है और इन विमर्शों से किसी को कोई लाभ हो नहीं पाता। किंतु अगर स्त्री अपने परिवेश के उठ कर अपनी आज़ादी और हर किस्म की बराबरी की मांग उठाती है, या अपने अंतरंग संसार के घाव, अतृप्तियां, असमानता को उघाड़ती है तो वह साहस की बात है। इसलिए हिंदी जगत को स्त्री की हर खुलती आवाज़ का स्वागत करना चाहिए, इसे देह विमर्श, फैशनेबल फेमिनिज्म जैसे जुमलों में रिड्यूस नहीं करना चाहिए। हां दूसरी तरफ मैं यह भी मानती हूं कि स्त्री का अंतरंग बाज़ार की आपूर्ति का विषय नहीं सो अगंभीर चौंकाऊ चीजों से हमें बचना चाहिए। मेरे अपने कथा संसार में अपने अस्तित्व को लेकर सजग स्त्रियां जगह पाती रही हैं।

6.   फिक्शन में विमर्श होने से कथा बाधित होती है, इससे आप सहमत हैं असहमत ?  
उत्तर : सहमत। मैं कथाकार हूं और कथ्य पर मैं जबरन विमर्श को नहीं थोप सकती। हम सब दीर्घ या सूक्ष्म तौर पर मानव जीवन को कथ्य बनाते हैं। ऐसे में किसी पात्र को सहज जीवन प्रवाह से विपरीत पॉलिटिकली सही करना कथा को बाधित करता है। सहज जाग्रत किरदार अपने साथ कोई जागृति की किरण ले आए तो बात अलग है।

7.   हिंदी साहित्य के लिए सोशल मीडिया के विस्तार को आप किस तरह से देखती हैं, क्या इससे सकारात्मकता आई है या रचनात्मकता का विकास हुआ है।
उत्तर : सच कहूं तो मिश्रित असर हुआ है, यह विश्लेषण की विषयवस्तु है। सकारात्मकता के नज़रिए से देखें तो हम सब हिंदी लेखक एक जगह आ जुटे हैं, जहां सहज ही, मिनटों में सूचनाओं का आदान–प्रदान कर लेते हैं। हम पाठकों से रूबरू हैं। प्रकाशकों के लगातार संपर्क में हैं, आलोचकों की आपकी लेखनी, वैचारिकता, राजनैतिक रुझान, स्टैंड पर निगाह है। नए लेखक, नए मंच उभर रहे हैं। हम सब आपस में एक क्लिक की दूरी पर हैं। नकारात्मक नज़रिए से देखें तो वैचारिक गुटों की खोखली राजनीति, अवसरपरकता अपने पूरे नंगेपन से सामने आ रही है। गुटों की भीतरी टूटन और अंतत: लेखक के अकेले होने, रचने का सच सामने आ रहा है। एक क्लिक की आभासी निकटता का खोखलापन। सबसे बड़ी विडंबना कई लेखकों के वैचारिक मुखौटे ढीले होकर पाठकों के सामने ही लटक गए हैं।

9.   सोशल मीडिया ने लिखनेवाले को एक ऐसा मंच दे दिया जहां किसी तरह का चेक नहीं है, यह साहित्य के लिए कितना अहितकर है।

उत्तर- इंटरनेट ब्लॉगिंग के शुरुआती दौर में मैं जब नया ज्ञानोदय में हिंदी और इंटरनेट पर कॉलम लिखती थी। तब ही मैंने यह चिंता जताई थी कि जहां नेट हर किसी के भीतर की ‘छपास’ को तृप्त कर सकता है, वहीं संपादक नामक फ़िल्टर यहां नहीं होने वाला है। यहां अच्छा पढ़ना भूसे के ढेर में सुई खोजने जैसा है। गंभीर साहित्य की अपनी धारा होती है, अगंभीर, अकलात्मक और दिशाहीन साहित्य वहां अपने आप पीछे छूट जाता है। इसकी चिंता हमें नहीं करनी चाहिए।

10. आलोचना खासकर कथा आलोचना से आप संतुष्ट हैं ? 

उत्तर : नहीं। यह सच हम सब जानते हैं कि रचनात्मक आलोचना सिरे से गायब है। बहुत कम आलोचक हैं जो सरोकारों के साथ निष्पक्ष आलोचना कर रहे हैं। बुरी किताबों पर महान आलोचना पढ़ कर रहा,सहसा विश्वास उठ जाता है। जिन पर आलोचक लगातार लिख रहे हैं, वे पाठकों को औसत लगते हैं, जिनकों पाठकों का प्यार मिलता है उनसे आलोचक चिढ़े रहते हैं। तो मन में यह सवाल उठता है कि क्या कथा साहित्य को आलोचना की अब जरूरत भी है?

11. नई पीढ़ी के लेखकों के लिए कुछ कहना चाहेंगी।

उत्तर- पहली,अपना नया - पुराना हिंदी कथा साहित्य पढ़ लेना, फिर लेखक होने के बारे में दावा करना। दूसरी– जब तक बहुत ही नया न हो कहने को, तब तक कलम मत उठाना। औसत लेखकों का एक हुजूम है जो एक जैसी रचनाएं लिख रहे हैं।

12.   दैनिक जागरण हिंदी बेस्टसेलर पर आपकी क्या राय है।

उत्तर : मैं जानती हूं बेस्टसेलर को लेकर बहुत स्वागत और विरोध हुआ। मुझे यह प्रयास अच्छा लगा कि हिंदी में सबकी नींद खुली कि हिंदी में भी बेस्टसेलर किताबें हो सकती हैं। जहां आमतौर पर प्रकाशक किताब की तीन सौ पांच सौ - प्रतियां छाप कर भी, अंतत: किताबें डंप कर देते हैं। अब वे भी प्रतियोगिता में आने की कोशिश कर रहे हैं। हिंदी लेखक में शुरू से एक ऊंघ रही है, बाज़ार से बेरुख़ होने की, जिसे हमने हिंदी का स्वाभिमान नाम दिया, मगर फायदा इसका प्रकाशक ने उठाया है। किताब को तो बाज़ार से ही निकलना है, तो हम क्यों धारा के विपरीत बहने वाली मछलियों की तरह व्यवहार कर भालुओं का शिकार हों?