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Saturday, April 12, 2025

इतिहास लेखन की विसंगतियों पर प्रहार


पहले महाराष्ट्र में औरंगजेब की कब्र को लेकर बवाल मचा। इस विवाद को लेकर नागपुर में हिंसा और आगजनी भी हुई। उसके बाद संसद में समाजवादी पार्टी के सांसद रामजीलाल सुमन ने राणा सांगा पर बाबर को लेकर अपमानजनक टिप्पणी कर दी। उसके बाद इतिहास लेखन को लेकर एक बार फिर से विमर्श आरंभ हो गया। हमारे देश में स्वाधीनता के बाद से ही इतिहास लेखन में एक वैकल्पिक धारा भी रही है। इतिहास लेखन की उस वैकल्पिक धारा को बल प्रदान करते हैं युवा इतिहासकार विक्रम संपत। यूके के रायल हिस्टारिकल सोसाइटी के फेलो रहे विक्रम संपत ने 10 बेस्टसेलर पुस्तकों का लेखन किया है। वीर सावरकर पर दो खंडो में लिखी विक्रम की पुस्तक इतिहास के बहुत सारे जाले को साफ करती है। हाल ही में टीपू सुल्तान पर उनकी एक वृहदाकार पुस्तक आई है जिसमें उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर विक्रम ने टीपू की क्रूरता को सामने लाया है। उनको युवा सहित्य अकादेमी सम्मान भी मिल चुका है। औरंगजेब और बाबर को लेकर मचे बवाल के बीच एसोसिएट एडीटर अनंत विजय ने इतिहासकार विक्रम संपत से बात की।  

प्रश्न- सबसे पहले तो ये बतिए कि हमारे देश में औरंगजेब जैसे आक्रांता को लेकर कुछ लोगों का प्रेम क्यों उमड़ता है। 

देखिए जब हमारे देश का धर्म के आधार पर, नहीं-नहीं धर्म बोलना उचित नहीं होगा, बल्कि इस्लाम के आधार पर देश का बंटवारा हुआ। उसके तुरंत बाद ये कहा जाने लगा कि अगर हम ऐतिहासिक घावों को कुरेदेंगे तो तनाव फैल सकता है। स्वाधीनता के शुरुआती दौर में ऐसा मानना फिर भी थोड़ा जायज हो सकता था। ये भी गलत है लेकिन इसी के बाद ऐसी धारणा बन गई कि सारे आंक्राताओं, मोहम्मद गजनी, मोहम्मद गौरी, औरंगजेब, तैमूर, टीपू सुल्तान आदि ने जिस तरह के बर्बरतापूर्ण कृत्य किए, अगर उसका सत्य चित्रण प्रस्तुत किया जाए तो एक समुदाय आहत हो जाएगा। मेरे हिसाब से ये बिडंबना है। उस समुदाय के लोग इन आंक्रातांओं की क्रूरताओं के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। उसके लिए हम किसी को जिम्मेदार ठहरा भी नहीं सकते हैं। पर इसका उल्टा भी सही है कि आज उस समुदाय के लोग इन सारे आक्रांताओं और आक्रमणकारियों को अपना आदर्श या हीरो क्यों समझें। 

प्रश्न- एक इतिहासकार के तौर अतीत की बातें उठाकर समाज में कटुता फैलाने को कितना उचित मानते है। 

सबसे पहले तो ये सोचना चाहिए कि अगर किसी मुसलमान को भारत में सुरक्षित महसूस करना है तो उसके लिए किसी एक मुसलमान को ही आदर्श मानने की आवश्यकता नहीं है, कोई एक हिंदू भी उसका आदर्श हो सकता है। दूसरा अतीत पर लीपापोती करके या आक्रांताओं के अपराध को मिटाकर कुछ हासिल नहीं होगा। लीपापोती करके जो इतिहास लिखा गया ये उसी का परिणाम है। आज का दौर सूचना का दौर है, आज हर हाथ में मोबाइल में है और इंटरनेट सबकी पहुंच में है। आज के युग में सभी सत्य जानना चाहते हैं। ऐसे में कुछ विशेष लोग जो जेएनयू और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में बैठकर कहते हैं कि देश का इतिहास ऐसा होना चाहिए या इसी को आपको मानना चाहिए। जनता उनको मानने को तैयार नहीं। अब लोग सत्य की खोज खुद कर रहे हैं। ऐसे में समाज में तनाव और बढ़ रहा है, पर यह जो सिलसिला आज का नहीं है। 

प्रश्न- हमारे देश में स्वाधीनता के बाद जो इतिहास लिखा गया और जो स्कूलों में पढ़ाया गया उसपर आपकी क्या राय है। 

प्रसिद्ध इतिहासकार अरुण शौरी ने एक बात का जिक्र किया था। संभवत: ये बात 1989 की है, तब बंगाल में ज्योति बसु की सरकार थी। इस दौरान एक सर्कुलर निकाला गया था कि राज्य में इतिहास की किताबों में जो दो कालम हैं- शुद्धो और एक अशुद्धो। अशुद्धो में इन सारी बातों का जिक्र किया गया था कि किस तरह मोहम्मद गजनी ने सोमनाथ का मंदिर तोड़ा था और किस तरह से औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ का मंदिर तोड़ा था आदि। शुद्धो में इस बात का जिक्र किया गया था कि ऐसा कुछ नहीं हुआ था, इन सब बातों के बारे में बात नहीं करना है और इन सबको हटा दो। मैं जिस राज्य कर्नाटक से आता हूं  वहां के डा. भैरप्पा जब एनसीईआरटी की कमेटी में थे और एक नेशनल सिलेबस बनना था। तब इसी तरह की बातों को लेकर कमेटी के तत्कालीन चेयरपर्सन पार्थसारथी से उनकी बहस हो गई थी। चेयरमैन कह रहे थे कि ऐसा बोलने से सामाजिक समरसता खत्म हो जाएगी और राष्ट्रीय एकीकरण खतरे में आ जाएगा। 

प्रश्न- अंग्रेजों ने जो अत्याचार किए, उनके बारे में खुल्लम-खुल्ला बोलते हैं तब तो कोई नहीं सोचता कि ईसाइयों को बुरा लगेगा। 

यही तो दिलचस्प है कि चर्चिल को डिक्टेटर, जनरल डायर को हत्यारा कहने पर किसी को आपत्ति नहीं होती। इन सबके बारे में खुलकर बोलने के दौरान हमें ये नहीं लगता है कि देश के जो ईसाई हैं उन्हें बुरा लगेगा। फिर औरंगजेब, टीपू और गजनी के बारे में बात करने पर हमें ये क्यों लगता है कि इससे देश के जो मुसलमान हैं वे नाराज हो जाएंगे। ऐसा करते-करते हम खुद ही ये हाइफनेट कर रहे हैं कि ये लोग आपके रोल माडल हैं और इनको आपका रोल माडल बनाए रखने के लिए इनके द्वारा किए गए सारे कृत्यों को हम पूरी तरह साफ कर देंगे। 

प्रश्न- हम टीपू पर आपसे बात करेंगे, आपने उसपर एक बड़ी किताब लिखी है। अभी हम औरंगजेब और अन्य आक्रांताओं पर ही रहते हैं। मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों को ऐसा क्यों लगता है या इसके पीछे का मनोविज्ञान क्या है कि आक्रांता ही हमारे आदर्श हैं। 

अथर अली नामक एक शोधकर्ता ने मुगलकाल के दौरान भारत के मुस्लिमों की स्थिति के बारे में लिखा है कि मुगल बादशाह बाहर से आए विभिन्न देशों के लोगों को अपने दरबार में प्रमुख जिम्मेदारी देते थे। इनमें पर्शियन, ईरानी, तूरानी आदि प्रमुख रूप से शामिल थे। जबकि देश के मुस्लिमों की दरबार में भागीदारी मुश्किल से सात-आठ प्रतिशत ही होती थी। फिर भी आज के मुस्लिमों को यही लगता है कि जिसने काफिरों के धर्म का हनन किया वे ही हमारे आदर्श हैं। औरंगजेब के भाई दारा शिकोह को अगर देखें तो एक हद तक वो थोड़ा सा आदर्श हो सकता है, लेकिन हम उसको आदर्श नहीं मानते हैं। दरअसल उसने गंगा-जमुनी तहजीब शब्द का प्रयोग किया था, लेकिन उसके भाई औरंगजेब ने ही उसका सिर कलम किया और गंगा-जमुनी तहजीब का भी। फिर भी हम गंगा-जमुनी तहजीब की बात करते हैं। गंगा भी हमारी है और जमुना भी हमारी है, जमुना को हम किसी को देने के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं। मुस्लिम समुदाय के कुछ नेता अपने भाषणों में कहते हैं कि हमने यहां आठ सौ साल राज किया है। यह पाकिस्तान वाला सोच है और इसी सोच का परिणाम है कि पाकिस्तान बना। मैंने अपनी वीर सावरकर वाली किताब लिखने के क्रम में मुस्लिम लीग के काफी नेताओं के 900 से अधिक भाषणों का अध्ययन किया था। इससे यह बात निकलकर आई कि मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों का सोच था कि हमने यहां शासन किया था और जब अंग्रेज चले जाएंगे तो जिनपर हमने शासन किया था हम उनसे शासित हो जाएंगे। कारण, प्रजातंत्र का मूलमंत्र यही है कि बहुसंख्यक ही शासन करता है। इसलिए हमारा एक अलग देश बनना चाहिए और इसी से अलगाववाद शुरू हुआ और यह श्रंखला अभी तक चली आ रही है। यह बहुत दुख की बात है कि जिस नेहरूवाद ने यह सोचा कि इतिहास में फेरबदल करके लोगों को आपस में जोड़ा जा सकता है इससे प्रेम और सद्भाव तो नहीं बढ़ा, बल्कि अलगाववाद ही फैला। 

प्रश्न- कुछ इतिहासकार कहते हैं कि मुगल आक्रांता के तौर पर आए लेकिन यहां बस गए और भारतीय हो गए। 

देखिए जब यहां राज करेंगे तो बस ही जाएंगे। उनकी कब्र भी यहीं होगी। पर अपने दौ सौ-ढाई सौ साल के शासनकाल में उन्होंने कितनी यूनिवर्सिटी बनाईं और लोगों के उद्धार के लिए क्या काम किए, इसपर विचार करना होगा। जब ताजमहल बन रहा था तब पूरे दक्षिण भारत में कर वसूली के लिए वहां कितने लोग मारे गए, इसको देखना होगा। ताजमहल बन रहा था तब दक्षिण में हुई बगावत में करीब 60 से 70 लाख प्रभावित हुए थे। अगर हम चर्चिल को बंगाल में 40 लाख लोगों को मारने के लिए एक नरहंतक बोलते हैं तो ये लोग कोई कम नहीं थे। उससे भी कई गुना ज्यादा थे। लोग कहते हैं कि उस समय जीडीपी बढ़ रही थी। वास्तविकता ये है कि वैश्विक स्तर पर भारत की जीडीपी जो पहले थोड़ा बेहतर थी वो मुगलकाल में गिरकर काफी नीचे आ गई थी। उन्होंने मुगल प्रशासन में भारतीयों को वो दर्जा नहीं दिया जो पर्शियन, ईरानी और तूरानियों को दिया। इतिहासकार अथर अली लिखते हैं कि औरंगजेब का शासनकाल जब अपने चरम पर था तब उसके शासन में भारतीयों की भागीदारी बमुश्किल सात-आठ प्रतिशत थी। 

प्रश्न- हमने इतिहास की किताबों में पढ़ा है कि अकबर महान थे। मध्यकाल का इतिहास लिखनेवाले कुछ इतिहासकार कहते हैं कि अकबर ने समाज में ऊंच-नीच को खत्म किया था। 

हम भी तो अब तक यही जानते हैं कि अकबर महान थे। मेरे खयाल से अब तक तीन ही महान हुए हैं अकबर महान, अशोक महान और सिकंदर महान। अशोक के बारे में बोला जाता है कि कलिंग युद्ध के बाद वे इतने आहत हुए कि जो पहले चंड अशोक थे, उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया। जबकि तथ्य यै है कि कलिंग युद्ध के दो साल पहले ही वह बौद्ध धर्म को स्वीकार कर चुके थे। ये जो महान वाली उपाधि दी गई है ये फर्जी ही है और ये सब एक प्रकार से गढ़ी हुई कहानी है। अकबर का शासन उत्तरार्द्ध में ही थोड़ा बेहतर था, पूर्वार्द्ध में चित्तौड़गढ़ में उन्होंने जो किया और उनके दरबार के इतिहासकार बंदायूनी ने जब कहा कि मैं अपनी दाढ़ी को काफिरों के खून से रंगना चाहता हूं तो वह उससे इतने खुश हुए कि उनको सोने की अशरफियां दीं। राजस्थान और चित्तौड़ में जो उन्होंने किया, वो तो इतिहास की बात है, लेकिन उनका जो सेकंड हाफ है उसमें उन्होंने दीन ए इलाही आदि की स्थापना की। इसीलिए आज भी अगर देखें तो पाकिस्तान में अकबर की उतनी वाहवाही नहीं होती। 

प्रश्न- कैसे 

पाकिस्तान के जो पांच नेवी के जहाज हैं, वो सभी आक्रांताओं के नाम पर हैं। जहाजों के नाम बाबर, शाहजहां, जहांगीर, आलमगीर और टीपू सुल्तान के नाम पर रखे हैं, लेकिन अकबर के नाम का प्रयोग नहीं किया। वर्ष 1965 में जब भारत-पाक युद्ध शुरू हुआ तो भारत पर आक्रमण करने के लिए उसने आपरेशन का नाम सोमनाथ चुना था जो बीते दिनों और गजनी की याद दिलाता था। उत्तरार्द्ध के शासन की कुछ खूबियों के कारण पाकिस्तान में अकबर वहां के स्टाक वैल्यू में निचले पायदान पर हैं। अकबर के उत्तरार्द्ध के शासन के बारे में इटैलियन ट्रैवेलर मनूची और निकोल आंखों देखा हाल लिखते हैं। अकबर के शासनकाल में आगरा में रोज हजारों हिंदुओं के सिर कलम किए जाते थे कि वे गलियों में पड़े रहते थे और गलियां दुर्गंध से भरी रहती थीं। उनसे इतनी बदबू आती थी कि लोगों को वहां पर नाक और मुंह ढककर चलना पड़ता था। यह तब की बात है जब अकबर ने दीन ए इलाही की स्थापना कर दी थी और उन्हें अकबर महान कहा जाने लगा था। 

प्रश्न- अब टीपू सुल्तान के बारे में जरा बताइए। आमधारणा है कि टीपू सुल्तान भारत की रक्षा के लिए लड़े, अंग्रेजों को रोका। 

टीपू को लेकर मेरी राय उलटी नहीं है, बल्कि सच्ची राय है। यह तथ्यों पर आधारित है। देश की स्वाधीनता के बाद टीपू का स्वतंत्रता सेनानी के रूप में चित्रण किया गया। ये बोलने वाले वही मार्क्सवादी इतिहासकार हैं, जो बोलते रहते हैं कि भारत नाम का कोई राष्ट्र था ही नहीं और ब्रिटिशर के आने के बाद ही हम एक राष्ट्र बने। अगर एक ही राष्ट्र नहीं था तो फिर वो किस राष्ट्र के स्वतंत्रता सेनानी बने। एक तरफ कहा जाता है कि वे भारत के लिए लड़ रहे दूसरी तरफ कहते हैं कि भारत 1947 में बना। चित्त भी मेरी और पट भी मेरी। टीपू ने ब्रिटिशर के साथ लड़ाई के लिए फ्रेंच की सहायता ली थी। फ्रेंच कोई कम कोलोनियल और इंपीरियलिस्ट नहीं थे। दक्षिण में जो कर्नाटक युद्ध हुआ उसमें देखा गया था कि हैदर और टीपू दोनों ने फ्रेंच की सहायता ली। यही नहीं वो जमनशाह जो अफगान के दुराणी शासक हैं उनको चिट्ठी लिखकर बुला रहे हैं कि आप भारत पर आक्रमण करो। हम दो साल का एक कार्यक्रम बनाएंगे साथ में। पहले साल में पूरे उत्तर भारत को काफिरों से मुक्त करेंगे और दूसरे साल में दक्षिण भारत को काफिरों से मुक्त करेंगे। 

प्रश्न- पत्र में लिखा है कि काफिरों से मुक्त करेंगे? 

जी, हर पत्र में काफिर शब्द है और लिखा है कि जो सच्चा दीन है उसको स्थापित करने के लिए हम ये लड़ाई लड़ रहे हैं। काफिर शब्द भी बार-बार उसका इस्तेमाल हो ही रहा है। दो साल के बाद हम ये पूरे सबकांटिनेंट को आपस में इस्लामिक कैलिफेट की तरह विभाजन कर लेंगे। ये कैसे स्वतंत्रता सेनानी हुए जो इस तरह के पत्र लिख रहे थे। ये उनके खुद के पत्र हैं। टीपू सुल्तान की जो तथाकथित तलवार है उस पर भी लिखा है कि इस तलवार का मकसद है कि काफिरों के खून से इसको रंगा जाए। उसका जो मैनिफेस्टो था जो मैसूर का इस्लामीकरण करके सल्तनते खुदादाद बनाया जाए और काफिरों का पूर्ण निर्मूलन होना चाहिए। काफिर मतलब गैर मुस्लिम्स, क्योंकि उनके आतंकी हमले ईसाइयों ने भी सहे हैं कर्नाटक में। 

प्रश्न- आप तो जिस राज्य से आते हैं, वहां तो लंबे समय तक टीपू जयंती मनाई जाती रही। 

देखिए अगर कांग्रेस कुछ करेगी तो भाजपा उसका विरोध करेगी और अगर भाजपा कुछ करेगी तो कांग्रेस उसका विरोध करेगी। उसमें हमें पड़ना ही नहीं है। हम तो पूरी तरह एकेडमिक बात कर रहे हैं। जब ये जयंती मनाई गई तो उसमें कई समुदाय, उसमें मैंगलोर के ईसाई भी शामिल थे वो भी सड़क पर उतरे थे। उनका कहना था जिसने हमारे पूर्वजों के साथ इतने अत्याचार किए, जो लिखित रूप में मौजूद हैं, सब जानते हुए भी आप इसका महिमामंडन कैसे कर सकते हैं? वहां आयंगार जो ब्राह्मण समुदाय है वो तो 250 वर्ष के बाद भी आज दीपावली नहीं मनाते, क्योंकि उसी दिन करीब सात सौ लोगों को उसने बर्बरता से मार डाला था, जिसमें महिलाएं, बच्चे और पुरुष शामिल थे। 

प्रश्न- इस घटना को थोड़ा विस्तार से बताएंगे कि दीवाली पर क्या हुआ था?

दीवाली के एक दिन पहले नरक चतुर्दशी होती है। उस दिन टीपू सुलतान ने श्रीरंगापट्टन के श्रीलक्ष्मीनरसिम्हा मंदिर में एक सामूहिक भोज के बहाने सात सौ लोगों को बुलाया था। इस मंदिर के प्रांगण में दो दरवाजे थे। जब लोग खाना  खा रहे थे तो दोनों तरह के दरवाजे बंद कर दिए गए। इसके बाद एक दरवाजे को खोला गया और इसके जरिए जो उत्पाती हाथी थे उनको अंदर भेज दिया गया। इसमें बहुत सारे लोग कुचलकर मर गए। जो बचकर भागना चाहते थे उनका कत्ल कर दिया गया। 

प्रश्न- ये हिंदू जनता थी? 

हां, सारे ब्राम्हण थे। इसीलिए आज भी 250 साल बाद ये लोग दीवाली की रात को कालरात्रि के रूप में मानते हैं। जब पूरा देश दीवाली मना रहा होता है तो भी वे अंधेरे में होते हैं। तो ये भी एक घाव है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से औऱ लोक कथाओं के रूप में हमारे समाज जीवन में है। 

प्रश्न- इतिहास को लेकर जो भ्रम है उसको कैसे दूर किया जा सकता है।

एक इतिहासकार होने के नाते मैं बोल रहा हूं कि हमें आगे बढ़ना चाहिए। पूर्व की बातों को लेकर बैठना नहीं चाहिए।लेकिन जब हम पूर्व की बातों पर लीपापोती करने लगते हैं तब हम देश को पीछे ढकेल रहे होते हैं। क्योंकि लोग तो और नई चीजें खोजने लगते हैं तो इससे कलह और बढ़ती है। 

प्रश्न- कहा जाता है कि जो आल्टरनेट व्यू वाले हिस्टोरियन मोदी के सत्ता में आने के बाद सक्रिय हुए। 

ये तो मीडिया की बदौलत है। आप लोग हमें ज्यादा फोकस देते हैं नहीं तो मैं 17 साल से लिख रहा हूं। तब मोदी जी शायद गुज़रात में मुख्यमंत्री थे। इसका सत्ता परिवर्तन से कोई संबंध नहीं है। हां, ये मानता हूं कि आज देश का माहौल बदला है। 2014 के बाद लोगों में सत्य जानने का वातावरण बना है। इतिहास एक ऐसा विषय है जहां अलग-अलग राय को पनपने के लिए जगह देनी चाहिए। ये विडंबना है कि जब हम परतंत्र थे तब इतिहास लेखन के लिए राष्ट्रवादी स्कूल अलाउड था। जब जेम्स मिल ने पहली बार ब्रिटिश इंडिया का इतिहास लिखा तो उसका खंडन करने के लिए महराष्ट्र से बहुत सारे लोगों ने गुमनाम पत्र लिखे। एक राष्ट्रवादी विचार धारा का इतिहास लेखन शुरू हुआ जिसमें सर जदुनाथ सरकार, आर सी मजूमदार, वी के रजवाडे, भंडारकर ये सारे लोग ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान थे। उनको पनपने के लिए आजादी थी। स्वतंत्रता के बाद जो राष्ट्रवादी स्कूल हैं उसको हाशिए पर डाल दिया गया। मार्क्सवादी इतिहासकारों का दबदबा बना।


Saturday, July 30, 2022

उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का हिंदू मन


आज उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की जयंती है। 1880 में आज के ही दिन प्रेमचंद का जन्म हुआ था। आज एक बार फिर मार्क्सवादी लेखक और मार्क्सवाद में आस्था रखनेवाले प्रेमचंद को कम्युनिस्ट और प्रगतिशील और जाने किन विशेषणों से विभूषित करेंगे। इस तरह की प्रवृति बहुत लंबे समय से हिंदी साहित्य में चल रही है। प्रेमचंद के लेखन का मूल्यांकन करते समय मार्क्सवादी आलोचकों ने समग्रता में उनके कृतित्व को ध्यान में नहीं रखा। प्रेमचंद की उन कृतियों को या उन कार्यों को जानबूझकर ओझल कर दिया गया जिससे उनकी एक अलग ही छवि बनती है। प्रेमचंद को जबरन मार्क्सवादी बताने का ये खेल हिंदी साहित्य में लंबे समय तक चलता रहा। स्कूल और कालेज की पुस्तकों में प्रेमचंद की रचनाओं की व्याख्या इस तरह से की जाती रही कि उनकी आस्था मार्क्सवाद में थी और उनकी रचनाओं में ये प्रतिबंबित होती थी। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों में मार्क्सवादियों का बोलबाला रहा है जिसकी वजह से छात्रों के मानस पर प्रेमचंद की मार्क्सवादी लेखक की छवि अंकित करवाने में उनको अधिक परेशानी नहीं हुई।  जिस भी लेखक ने प्रेमचंद की रचनाओं को समग्रता में सामने लाने का प्रयत्न किया उनको हाशिए पर रखने का उपक्रम मार्क्सवादियों ने चलाया, खासतौर पर विश्वविद्यालयों में। परिणाम ये हुआ कि लंबे कालखंड तक प्रेमचंद की रचनाओं का मूल्यांकन एकतरफा होता रहा। छात्र भी प्रेमचंद के लेखकीय व्यक्तित्व के एक ही रूप से परिचित होते रहे। ये सिर्फ प्रेमचंद के साथ ही नहीं किया गया बल्कि हिंदी के तमाम लेखकों के साथ ऐसा किया गया। निराला के उन लेखों को साहित्य जगत में सामने ही नहीं आने दिया गया जो उन्होंने कल्याण पत्रिका में लिखे थे। निराला ने कल्याण पत्रिका के अलग अलग अंकों में कई लेख लिखे थे लेकिन उसपर हिंदी में चर्चा नहीं हुई। 

प्रेमचंद की रचनाओं में हिंदू संस्कृति को लेकर कितना कुछ लिखा गया है या उनकी कहानियों में हिंदू संस्कृति किस तरह से मुखर हुई है इसपर प्रेमचंद साहित्य के विद्वान कमलकिशोर गोयनका ने काफी लिखा है। गोयनका को विचारधारा विशेष के विरुद्ध जाकर लिखने की कीमत भी चुकानी पड़ी। अपमान झेलना पड़ा।  साहित्यिक मंच पर सरेआम धमकियां दी गईं। लेकिन कहते हैं न कि सत्य को बहुत दिनों तक रोका नहीं जा सकता है। अब प्रेमचंद के अनेक रूप उपस्थित हो रहे हैं। पिछले दिनों विश्वविद्यालय प्रकाशन, काशी ने प्रेमचंद के संपादन में 1933 में प्रकाशित हंस पत्रिका के काशी अंक का पुनर्प्रकाशन किया। अक्तूबर-नवंबर 1933 में प्रकाशित पत्रिका के इस अंक के लेखों को देखकर संपादक प्रेमचंद की रुचि का पता चलता है। प्रेमचंद के संपादन में निकली इस पत्रिका में एक लेख प्रकाशित है, काशी: हिंदू संस्कृति का केंद्र। इसमें लेखक ने लिखा है- ‘मध्य युग में देश पर बाहरवालों के कितने ही हमले हुए। उत्तर भारत का कोई भी प्रसिद्ध नगर उनके विनाशकारी प्रभाव से नहीं बचा। काशी पर भी सुल्तान नियाल्तगीन, कुतबुद्दीन इबुक के, तथा मुगल-काल में भी कितने ही हमले हुए, परंतु काशी की महिमा का मुख्य आधार व्यापारिक अथवा राजनीतिक महत्ता कभी नहीं रहा, उसका अटूट संबंध तो धर्म और संस्कृति से था। यदि कोई विजयी शासक नगर में लूटपाट मचा देता, मंदिर या मूर्तियों को विध्वंस्त करवा देता, अथवा लोगों का दमन करने लगता तो यह अवश्य था कि काशी कुछ दिनों के लिए श्रीविहीन हो जाती परंतु उसपर कोई वास्तविक प्रभाव न पड़ता था। हर साल फिर ग्रहण पड़ते, अमावस्या और एकादशी आतीं और उनके साथ ही साथ आता- स्त्री-पुरुषों का विशाल जनसमूह जो काशी की गलियों, घाटों और मंदिरों में समा जाता। फिर सदा की भांति प्रात: और संध्या आरती, काशी नगरी में घंटे और शंख के गंभीर निनाद के साथ भक्तों की कंठ ध्वनि मिलकर फिर वही अपूर्व समां बांध देती, मानो कुछ हुआ ही न हो।‘  इस उद्धरण से कई बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं। पहला ये कि बाहर से कई हमले काशी पर हुए, मुगलों ने भी किए। मंदिर और मूर्तियां नियमित अंतराल पर तोड़ गए, लेकिन हिंदू संस्कृति में वो ताकत है कि वो इन हमलों को न केवल झेल गई बल्कि वापस उठ खड़ी हुई। प्रेमचंद अपने संपादन में इस तरह के लेख प्रकाशित करके उस वक्त अपना सोच देश के सामने रख रहे थे। 

हंस पत्रिका के इसी अंक में प्रेमचंद ने  काशी विश्वनाथ मंदिर पर भी एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख का एक महत्वपूर्ण अंश देखा जाना चाहिए, ‘काशी के श्रीविश्वनाथ मंदिर में स्वयंजात ज्योति:स्वरूप लिंग हैं, इनके ही दर्शन और अर्चन से भक्त लोग अपनी समस्त कामनाओं की पूर्ति के साथ-साथ मोक्ष जैसा अलभ्य प्राप्त करने काशी आते हैं। स्वर्गीय महारानी अहित्याबाई ने पंच मंडप-संयुक्त एक विशाल मंदिर बनवा दिया। 51 फीट ऊंचा यह वर्तमान मंदिर कीमती लाल पत्थरों से बना है। इसके बाद ही सन् 1839 ई. में सिख जाति के मुकुटमणि पंजाब केशरी स्वर्गीय महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के ऊपरी हिस्से को स्वर्ण मंडित करके उसकी सौगुनी शोभा बढ़ा दी।‘  इस लेख की ही कुछ और पंक्तियां, मुसलमान शासकों ने प्राचीन मंदिर को तोड़ा था, उन्हीं ने वर्तमान मंदिर के सिंहद्वार के सामने एक नौबतखाना बनवा दिया, जहां अबतक नौबत बजती है, जिसके ऊपर से विजातीय लोग दर्शन किया करते हैं। केवल दर्शन ही नहीं अंग्रेज लोग पूजोपहार और दक्षिणा भी दे जाते हैं। सम्राट पंचम जार्ज से लेकर प्रत्येक वायसराय विश्वनाथ-दर्शन कर चुके हैं। अभी हाल ही में जब लार्ड इरविन आए थे तब श्रद्धा के साथ चांदी के पूजा-पात्र उपहारस्वरूप भेंट कर गए थे। इस तरह विश्वनाथ इस समय समस्त जातियों द्वारा सम्मानित और पूजित होकर काशी में सुख से विराज रहे हैं।‘ 

उपरोक्त दोनों उद्धरणों में एक बात जो समान है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने काशी में मंदिर और मूर्तियां तोड़ीं। इस पत्रिका के कई अन्य लेखों में भी मंदिरों के तोड़े जाने का प्रसंग आया है। एक और लेख है काशी का इतिहास उसमें भी लेखक ने विस्तार से काशी पर हुए अनके हमलों का उल्लेख किया है। इसमें इस बात का जिक्र भी है कि शाहजहां ने भी काशी में मंदिर तुड़वाए थे। धर्मांध औरंजगजेब ने यहां के मंदिर तुड़वाने की आज्ञा प्रचलित की जिनके चिन्ह स्वरूप ज्ञानवापी और बेनीमाधन की मस्जिदें अभी तक मौजूद हैं। औरंगजेब ने तो काशी का नाम बदलकर मुहम्मदाबाद रखा था पर वो प्रचलित नहीं हो पाया। लेकिन मुगलकाल में काशी की जो टकसाल थी वहां के कुछ सिक्कों और कागजों में ये नाम मिलता है। मंदिरों और मूर्तियों को तोड़े जाने के अलावा प्रेमचंद के संपादन में निकले इस अंक से एक और ध्वनि निकलती है वो है हिंदू धर्म और संस्कृति की । 

इस अंक से प्रेमचंद की हिंदू धर्म और संस्कृति में आस्था का पता चलता है। बार बार मंदिरों के तोड़े जाने का उल्लेख इस बात की ओर संकेत करता है कि संपादक इससे आहत था।  उसको अपनी पत्रिका के माध्यम से आमजन तक पहुंचाना भी चाहता था क्योंकि अगर इन लेखों में प्रयुक्त वक्तव्यों, उद्धरणों और घटनाओं के आवरण को हटाकर भीतर छिपी मूल भावनाओं को देखें आपको प्रेमचंद का हिंदू मन दिखाई देगा। वो हिंदू मन जो अपने मंदिरों के तोड़े जाने से आहत है, वो हिंदू मन जो अपनी संस्कृति पर हुए हमलों से दुखी है, वो हिंदू मन जो सनातन संस्कृति की शक्ति को जानता है, वो हिंदू मन जो अपनी परंपरा से विद्रोह का खोखला नारा नहीं लगता बल्कि अपनी परंपरा को अपनी लेखनी से समृद्ध करता है। जो मार्क्सवादी लेखक विचारधारा की शिलाखंड पर बैठकर प्रेमचंद के साम्यवादी होने का शोर मचाते हैं उनको प्रेमचंद के संपादन में प्रकाशित पत्रिकाओं के अंक देखने चाहिए। 


Saturday, May 28, 2022

औरंगजेब पर अज्ञान का प्रदर्शन


काशी में ज्ञानवापी परिसर स्थित मस्जिद के सर्वे और अदालती कार्यवाही के बाद कई तरह के इतिहासकार सामने आने लगे हैं। वामपंथी रुझान और वामपंथी विचारधारा के पोषक कुछ साहित्यकार और लेखक भी इस विषय पर अपने अज्ञान का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहे हैं। कई तो मुगल बादशाह औरगंजेब के समर्थन में भी तर्क खोजकर ला रहे हैं। इंटरनेट मीडिया पर इस तरह के मनोरंजक टिप्पणियां देखी जा सकती हैं। एक लेखक महोदय तो किसी किताब से हवाले से ये तक लिख गए कि मंदिर के तहखाने में बलात्कार हुआ था और औरंगजेब को पता चला तो उसने उस जगह को अपवित्र मानकर मंदिर को ध्वस्त करवा दिया। इस मनोरंजक तर्क को लिखते समय लेखक महोदय ये भूल गए कि अगर कोई जगह अपवित्र हो गई तो वहां मंदिर गिराकर मस्जिद कैसी बनवाई जा सकती है। क्या मंदिर को ध्वस्त करके मस्जिद बनाकर किसी जगह को पवित्र किया जा सकता है? बलात्कार को लेकर अगर औरंगजेब इतना ही संवेदनशील था तो बीजापुर और गोलकुंडा आक्रमण के समय बलात्कर की असंख्य घटनाओं पर उसका दिल क्यों नहीं पसीजा था। दक्षिण भारत पर औरंगजेब के आक्रमण के समय जितनी बलात्कार की घटनाएं हुई उसकी तुलना सिर्फ 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बंगलादेश) में पाकिस्तानी सैनिकों की क्रूरता से की जा सकती है। दरअसल वामपंथियों का और स्वयं को धर्मनिरपेक्ष बतानेवाले लेखकों और इतिहासकारों का ये पुराना शौक रहा है। उनके लेखन में विदेशी आक्रांताओं को लेकर एक खास किस्म की उदारता दिखाई देती है। इसके पीछे की वजह क्या है ये पता नहीं लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि इस प्रकार के स्वयंभू इतिहासकार समाज के लिए खतरनाक हैं। इनकी अज्ञानता की वजह से और गलत स्थापनाओं के कारण दो समुदायों के बीच नफरत पैदा होती है। 

औरंगजेब को लेकर वामपंथी लेखकों को सर जदुनाथ सरकार की पुस्तक पढ़नी चाहिए जिससे इस क्रूर शासक के बारे में सबकुछ स्पषट हो जाएगा। पांच खंडों में प्रकाशित सरकार की पुस्तक ‘हिस्ट्री आफ औरंगजेब’ में जदुनाथ सरकार ने सप्रमाण बताया है कि किस फरमान के अंतर्गत काशी के मंदिर को तोड़ा गया था। उन्होंने फरमान का स्त्रोत भी बताया है, छद्म इतिहासकार की तरह सिर्फ मनगढ़ंत बातें नहीं की है । एजेंडा के तहत इतिहास लेखन या टिप्पणी करनेवालों ने सर जदुनाथ सरकार की पुस्तक या तो पढ़ी नहीं या पढ़कर भी अनभिज्ञ बने रहते हैं। हिंदुओं से घृणा करनेवाले शासक औरंगजेब के पक्ष में वामपंथी इतिहासकार पहले भी अनेक तरह के छद्म रचते रहे हैं। कुछ दशक पहले ये थ्योरी पेश करने की कोशिश की गई थी औरंगजेब हिंदुओं को लेकर उदार था। इसके लिए ये तर्क दिया जाता था कि उसने मनसबदारी प्रथा को बढ़ावा दिया। उसके कालखंड में अकबर के समय से अधिक हिंदू मनसबदार थे। यह सही है कि औरंगजेब के कालखंड में हिंदू मनसबदारों की संख्या अधिक थी लेकिन इसकी वजह उसका हिंदू प्रेम नहीं बल्कि मनसबदारी को बढ़ावा देना था। औरंगजेब के समय हिंदू मनसबदारों की संख्या जरूर अधिक दिखाई देती है लेकिन अगर इसको आनुपातिक तौर पर देखा जाए तो वो कम थी। अर्धसत्य बताना मार्क्सवादियों की पुरानी आदत रही है। तभी तो किसी ने व्यग्यात्मक लहजे में कहा था कि मार्क्सवादी इतिहासकारों के पास ईश्वर से भी अधिक ताकत होती है क्योंकि ईश्वर अतीत नहीं बदल सकता है लेकिन इस विचारधारा के इतिहास लेखकों के पास अतीत को बदलने की शक्ति होती है। हिंदुओं पर लगनेवाला कर जजिया को अकबर ने खत्म किया था लेकिन औरंगजेब ने उस कर को फिर से लागू कर दिया था। उसने हिंदुओं की तीर्थयात्रा पर भी कर लगा दिया था। जदुनाथ सरकार ने अपनी पुस्तक में श्रमपूर्वक औरंगजेब के सारे कारनामों को कलमबद्ध किया है। इस वजह से मार्क्सवादी इतिहासकार सामूहिक रूप से एजेंडे के तहत जदुनाथ सरकार का नाम सुनते ही अलग रास्ते पर चले जाते हैं। 

दरअल अगर हम उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों को समग्रता में देखते हैं तो ये पता चलता है कि विदेश से आए मुस्लिम शासकों ने हिंदुओं पर कितना और किस तरह से घृणित अत्याचार किए। 1953 में केंद्र सरकार की सहमति के बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग ने फारसी और अरबी में उपलब्ध ऐतिहासिक महत्व की सामग्री और स्त्रोत का हिंदी में अनुवाद और प्रकाशन आरंभ किया था। हिंदी में अनुवाद का कार्य सैयद अतहर अब्बास रिजवी ने किया था। इस योजना के अंतर्गत तुगलककालीन भारत के नाम से 1956 में पहली बार पुस्तक छपी। बाद में राजकमल प्रकाशन ने 2008 और 2016 में इन पुस्तकों का पुर्नप्रकाशन किया। 1320 से लेकर 1359 तक का तुगलक वंश का इतिहास तमाम तरह के अरबी फारसी के ऐतिहासिक पुस्तकों और यात्रियों के विवरणों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। तीन खंडों में प्रकाशित इस पुस्तक के पहले खंड में इब्ने बत्तूता का यात्रा विवरण भी है। इसमें बत्तूता ने मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में ईद के विशेष दरबार  की चर्चा की है। वो कहते हैं, ‘ईद के दिन महल में फर्श बिछाए जाते हैं और उन्हें बड़े सुंदर ढंग से सजाया जाता है। दरबार के कक्ष के बाहर वारगाह खड़ी की जाती है । यह एक बहुत बड़े मंडप के समान होती है (पृ 188)।‘ इसमें आगे दरबार और अवसर विशेष पर लगनेवाले सिंहासन की भव्यता का वर्णन है। आगे वो लिखते हैं, ‘हाजिब तथा नकीब अपने स्थानों पर खड़े होते हैं। तत्पश्चात गायक तथा नर्तकियां प्रविष्ट होती हैं। सर्वप्रथम काफिर (हिंदू) राजाओं की पुत्रियां जो उस वर्ष युद्ध में बंदी बनाई जाती हैं, आकर गाती नाचती हैं। तत्पश्चात वो अमीरों और मुख्य परदेशियों को प्रदान कर दी जाती हैं। इसके उपरांत अन्य काफिरों की पुत्रियां आकर नाचती गाती हैं। जब वे नाच गा चुकती हैं तो सुल्तान उन्हें अपने भाइयों, संबंधियों और मलिकों के पुत्रों आदि को दे देता है। सुल्तान ये दरबार अस्त्र की नमाज के पश्चात करता है। दूसरे दिन पुन: इसी प्रकार अस्त्र के उपरांत दरबार होता है। इसमें गायकायें लाई जाती हैं। जब वे नाच जा चुकती हैं तो सुल्तान उन्हें ममलूक के अमीरों (मुख्य दासों) को दे देता है (पृ 189)।‘ आगे बत्तूता सातवें दिन तक का विवरण देता है। ईद के समय लगनेवालों इन दरबारों में हिंदू राजाओं की बेटियों के साथ तुगलक क्या सलूक करता है वो स्पष्ट है। इस पुस्तक में इस तरह की कई घटनाओं का वर्णन है। सुल्तान के कर्मचारियों के खाने के लिए चावल कूटने के लिए लाई जानेवाली स्त्रियों की मृत्य का प्रसंग भी ह्रदय विदारक है। वो लिखते हैं कि सुल्तान के महल में सैकड़ों स्त्रियां नित्य मृत्यु को प्राप्त होती थीं।... जब वो रुग्ण हो जाती थीं धूप में पड़ जाती थीं और मर जाती थीं। (पृ.297)। क्या कभी इसपर मार्क्सवादियों ने समग्रता में विचार किया। क्या स्त्री विमर्श के झंडाबरदारों ने इसपर ध्यान दिया। 

दरअसल मुगलों समेत तमाम विदेशी आक्रांताओं ने हिन्दुस्तान की जनता पर भयानक अत्याचार किए। कईयों के शासन काल में सैकड़ों मंदिर तोड़े गए और इन सबके प्रमाण उपलब्ध हैं। जरूरत इस बात की है कि उन उपलब्ध प्रमाणों को जनता के सामने लाया जाय। सत्य और तथ्य के सामने आने से कई तरह की गलतफहमियां दूर होती हैं। जो लोग औरंगजेब से लेकर तुगलक और बाबर का गुणगान करके देश की जनता को बरगलाने का काम करते हैं वो एक्सपोज होंगे। जो भ्रमित होकर औरंगजेब को अपना पूर्वज मानते हैं उनके सामने भी अपने अतीत पर पुनर्विचार करने का अवसर पैदा होगा। आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में अगर इतिहास को तथ्यों के आधार पर लिखने और उसके प्रकाशन का कार्य आरंभ हो सके तो अच्छा रहेगा। इसको एक मिशन के तौर पर आरंभ करके पूरा करना चाहिए। ये कार्य देशहित में आवश्यक है। 

Friday, October 8, 2021

धर्म पर हमलावर के नाम सड़क क्यों?


स्वाधीनता के बाद दिल्ली में कई सड़कों और इमारतों के नाम बदले गए। सर्कुलर रोड को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नाम किया गया, क्लाइव रोड को त्यागराज मार्ग का नाम दिया गया। कर्जन कोड को कस्तूरबा गांधी रोड और कर्जन लेन का बलवंत राय मेहता लेन का नाम दिया गया। दिल्ली में ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं जब मार्गों के नाम से औपनिवेशिकता के चिन्ह को मिटाकर स्वाधीनता सेनानियों या अपनी मिट्टी पर सर्वोच्च बलिदान करनेवालों का नाम दिया गया। ये काम पिछली कई सरकारों ने किया। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी तो एक बार फिर से मांग उठी कि राजधानी में मौजूद गुलामी के निशानों को मिटाकर उसको अपने देश के सपूतों का नाम दिया जाए। 2015 में नई दिल्ली इलाके के औरंगजेब रोड का नाम बदलकर पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम के नाम कर दिया गया। औरंगजेब मुगलों में सबसे क्रूर शासक था और उसने हिन्दुस्तान की जनता पर बेइतहां जुल्म ढाए थे। सिख पंथ के महान गुरु तेगबहादुर जी के साथ औरंगजेब ने क्या किया उसके बारे में पूरे देश को ज्ञात है। 

औरंगजेब ने अपने शासनकाल में सैकड़ों मंदिरों को  तोड़कर हिन्दुस्तान के इतिहास, धर्म और संस्कृति को मिटाने की कोशिश की। वो इतना कट्टर मुस्लिम शासक था कि वो चाहता था कि उसके सल्तनत में सिर्फ इस्लाम धर्म को मानने वाले रहें। वो हिन्दुस्तान की जनता को तलवार के जोर पर इस्लाम धर्म में परिवर्तित करना चाहता था। जो भी उसकी इस राह में बाधा बनने की कोशिश करता था उसको जान से मार डालता था। सत्ता के नशे में चूर एक विदेशी शासक पूरे हिन्दुस्तान की संस्कृति को मिटा देना चाहता था। ये तो हिन्दुस्तान की संस्कृति की शक्ति और उसमें जनता का विश्वास था कि औरंगजेब की तमाम कोशिशों के बावजूद मिट नहीं पाई। आज जब हम स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो हमारी क्या मजबूरी है कि जिस विदेशी शासक ने भारत और भारतीयता पर हमले कर उनको नष्ट करने की कोशिश की, उसके नाम पर एक दिल्ली के मुख्य इलाके में एक लेन है। ए पी जे अब्दुल कलाम रोड से एक लेन निकलती है जिसका नाम औरंगजेब लेन है। जब कर्जन रोड और कर्जन लेन दोनों का नाम बदल दिया गया तो औरंगजेब रोड के साथ साथ औरंगजेब लेन का नाम क्यों नहीं बदला जा सका। आज देश के मानस को ये प्रश्न मथता है।