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Friday, March 17, 2017

ये फिल्मी कोठेवालियां

विद्या बालन । बेबाक । बिंदास । बेहतरीन अदाकारा जो फिल्मों में अपनी छवि को लगातार तोड़ती चलती हैं और भूमिका के हिसाब से अपनी छवि गढ़ती और जीती रहती हैं । कहानी दो में बगैर मेकअप के पूरी फिल्म करने का साहस दिखाकर विद्या ने खासी प्रशंसा बटोरी थी । बॉलीवुड में पश्चिम की नायिकाओं की तरह कपड़ों के माध्यम से अपनी सेक्स अपील को बढ़ाने की चलन को विद्या साड़ी में सेंसुअस दिखकर पारंपरिकता से आधुनिकता को चुनौती देती चलती हैं । फिल्मों में बोल्ड सींस और बोल्ड संवादों के लिए भी विद्या को तारीफ मिलती रही है । फिल्म डर्टी पिक्टर में विद्या के रोल को लेकर हॉल में सीटियां बजनी शुरू होती थी तो रुकने का नाम ही नहीं लेती थी । अब विद्या बालन एक बार फिर से वेश्या के चुनौतीपूर्ण रोल में आ रही हैं । फिल्म का नाम है ‘बेगम जान’ और इसको राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी डायरेक्ट कर रहे हैं और निर्माता है महेश और मुकेश भट्ट । कोठे के मालकिन की भूमिका में विद्या बेहद बिंदास नजर आ रही हैं । भारत पाकिस्तान के बंटवारे की पृष्ठभूमि और बांग्ला फिल्म ‘राजकहिनी’ का ये हिंदी रीमेक है। कोठे को लेकर भारतीय फिल्मकारों के मन में हमेशा से एक खास किस्म का आकर्षण रहा है । फिल्मकारों से लेकर कलाकारों तक की इच्छा होती है कि वो कोठे के जीवन को लेकर एक फिल्म जरूर बनाए । हिंदी फिल्मों की परंपरा को देखें तो यहां कोठों को लेकर सैकडों फिल्में बनी हैं । सबसे मजेदार तथ्य तो यह है कि कोठेवाली बनने में नई से लेकर पुरानी अभिनेत्रियों को कभी गुरेज नहीं रहा । कोठेवाली की भूमिका को अभिनेत्रियां चुनौतीपूर्ण मानती रही हैं ।
विद्या बालन की इस फिल्म के पहले देखें तो करीना कपूर ने ‘चमेली’ में वेश्या की भूमिका निभाई । इस फिल्म में करीना को उसका चाचा वेश्यावृत्ति के लिए बेच देता है लेकिन बिंदास करीना अपनी अदाओं से बैंकर राहुल बोस को प्रभावित करती है । वेश्या होने के हुनर के साथ साथ उसके मानवीय गुणों से भी राहुल प्रभावित होता है । इस फिल्म में चमेली के रोल को करीना ने अपने अभिनय से जीवंत कर दिया था । इस फिल्म के आठ साल बाद करीना एक बार फिर से वेश्या की भूमिका में दिखी फिल्म ‘तलाश’ में जिसमें उसके साथ आमिर खान और रानी मुखर्जी भी थे । रीमा बुगती की इस फिल्म में भी करीना ने जोरदार अभिनय किया । करीना के अलावा रानी मुखर्जी ने भी साल दो हजार सात में दो फिल्मों में वेश्या की भूमिका निभाई थी – ‘सांवरिया’ और ‘लागा चुनरी में दाग’ । ‘सांवरिया’ में उसको रणबीर से इश्क होता है लेकिन कहानी को कुछ और ही मंजूर था और रणबीर, सोनम के इश्क में डूबने लगता है और रानी को भुला देता है । लेकिन रानी की फिल्म ‘लागा चुनरी में दाग’ एक बेहतरीन और यादगार भूमिका वाली फिल्म है जब एक लड़की बनारस से मुंबई आती है । वो अपने परिवार की खुशहाली के लिए पैसे कमाना चाहती है लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था । पैसे कमाने की चाहत में बनारस की वो लड़की हाईप्रोफाइल एस्कार्ट बन जाती है । इसी तरह से दो हजार एक में आई फिल्म ‘चांदनी बार’ में तब्बू की भूमिका ने उस साल उसकी झोली पुरस्कारों से भर दी थी । डांस बार में काम करनेवाली डांसर मुमताज एक गैंगस्टर के प्यार के जाल में फंसती है और उससे शादी कर लेती है लेकिन बाद में उसको अपने और अपने परिवार के लिए फिर से वेश्यावृत्ति के दलदल में उतरना पड़ता है । मुमताज के रोल को इस फिल्म में तब्बू ने निभाया था ।
इक्कसवीं सदी की शुरुआत में कई फिल्में बनीं जिसमें उस दौर की टॉप की हिरोइंस ने वेश्या का रोल निभाया । जैसे दो हजार एक में ही बनी फिल्म ‘चोरी चोरी चुपके चुपके’ में प्रीति जिंटा वेश्या थी जिसे सलमान खान सैरोगेसी के लिए तैयार करते हैं क्योंकि कारोबरी सलमान और उसकी पत्नी रानी मुखर्जी को बच्चा नही हो रहा था । खेल तब पलट जाता है जब बच्चा पैदा होने के बाद प्रीति जिंटा को बच्चे के साथ साथ सलमान से भी प्यार हो जाता है  । इस फिल्म को दर्शकों ने खूब पसंद किया था । इसी तरह से अगर देखें तो दो हजार नौ में आई फिल्म ‘देव डी’ में कल्कि ने भी हाई प्रोफाइल काल गर्ल की भूमिका निभाई थी जो दिन में कॉलेज की छात्रा होती थी और रात में वेश्यावृत्ति करती थी । इस फिल्म में आधुनिक समाज में एक लड़की के वेश्यावृत्ति के धंधे में किस मजबूरी में उतरना पड़ता है इसको फिलमकार ने बेहद सधे अंदाज में पेश किया है और कल्कि ने अपने दमदार अभियन से इस रोल को एक नया आयाम भी दिया है । इस वक्त की सफलतम अभिनेत्रियों में से एक कंगना रनावत ने भी दो हजार तेरह में बनी फिल्म ‘रज्जो’ में मुंबई के रेड लाइट एरिया में रहनेवाली वेश्या का रोल किया था । कहानी वही थी कि कैसे एक लड़का उसके प्यार में गिरफ्तार होता है और फिर मुसीबतों को सामना करना पड़ता है । दो हजार पांच में आई फिल्म ‘नो एंट्री’ में बिपाशा बसु ने भी एक सेक्स वर्कर का रोल किया था । फिल्म ‘मार्केट’ में मनीषा कोइराला तो ‘जूली’ में नेहा धूपिया ने भी वेश्या का रोल किया है ।

फिल्मों में वेश्या के रोल को जिस तरह से हिरोइंस चुनौतीपूर्ण मानती रही हैं उसी तरह से निर्माता और निर्देशक भी वेश्या के इर्द गिर्द फिल्म बनाने को चैलेंज की तरह लेते रहे हैं । भारतीय समाज में वेश्या का चरित्र हमेशा से लोगों को लुभाता रहा है, सेक्स के अलावा अन्य वजहों से भी । उनके रहन-सहन से लेकर बात व्यवहार से लेकर उनके जीवन की परतों को देखने समझने की आकांक्षा जनमानस में होती है । भारतीय समाज में स्त्रियों की खुली जिंदगी में झांकने की जो दबी छुपी इच्छा मर्दों में रहती है, फिल्मकार उसको ही भुनाने के लिए वेश्या को केंद्र में रखकर फिल्में बनाते और सफल होते रहे हैं । हिरोइंस भी इस तरह के रोल को लीक से हटकर मानती रही हैं और उनको भी लगता है कि वेश्या का सफल रोल निभाना उनके करियर का एक अगम पड़ाव हो सकता है, लिहाजा कोई भी हिरोइन वेश्या के रोल से परहेज नहीं करती है ।   

Friday, February 17, 2017

बॉलीवुड में महिलाओं का जलवा

इन दिनों हिंदी साहित्य में नया वाला फेमिनिज्म पर जमकर चर्चा हो रही है । पतनशील पत्नियों के नोट्स जैसी शीर्षकवाली किताबें छप ही नहीं रही हैं बल्कि पसंद भी की जा रही हैं । कुछ ऐसा ही हाल इस वक्त हिंदी फिल्मों का भी है । हिंदी फिल्मों में इस वक्त अभिनेत्रियों का स्वर्णकाल चल रहा है । अगर पिछले एक दशक की फिल्मों पर नजर डालें तो महिला किरदारों पर केंद्रित कितनी ही फिल्में आईं और करीब करीब सभी को दर्शकों ने पसंद किया । जिस तरह से महिला किरदारों पर केंद्रित फिल्में लिखी और फिल्माई जा रही हैं तो उससे यह साबित होता है कि इस वक्त समाज में दर्शक महिलाओं की सफलता, उसके संघर्ष और इसकी जिजीविषा को देखना चाहते हैं क्योंकि बहुधा फिल्मों में चरित्रों का बार-बार चित्रण होना समाज की रुचियों का प्रकटीकरण होता है । इस तरह की फिल्मों के बनने से यह भी पता चलता है कि हमारे समाज के दर्शकों की रुचियों का भी परिष्कार हुआ है । दो हजार तेरह में जब विकास बहल के निर्देशन में बनी फिल्म क्वीन आई थी तो उसमें कंगना के रोल ने दर्शकों को झकझोरा था । किस तरह दिल्ली के मध्यमवर्गी. परिवार की एक पंजाबी लड़की अपनी शादी के पहले शादी तोड़ने की खबर से सदमे में आकर विदेश जाती है और वहां खुद को रीडिस्कवर करती है । इस फिल्म में कंगना के रोल ने उनको राष्ट्रीय पुरस्कार दिलवाया । इसी तरह के कहानी में विद्या बालन ने एक गर्भवती महिला का रोल किया है जो कोलकाता में अपने पति तको तलाशने में जुटती है । सुजय घोष की इस फिल्मने जबरदस्त बिजनेस किया था । विद्या के रोल ने इस कहानी को हिट कर दिया था । इस फिल्म का सीक्वल भी अभी हाल ही में रिलीज हुआ था जिसमें विद्या बालन की भूमिका की प्रशंसा हुई थी । इसमें विद्या ने एक बेहद बोल्ड फैसला किया था जहां पूरी फिल्म में किरदार की मांग के मुताबिक उसने ना तो ग्लैमरस कपड़े पहने और ना ही किसी प्रकार का मेकअप किया । हिंदी फिल्मों में खूसूरत और ग्लैमरस दिखने और दिखाने की चाहत वालों के लिए यह फिल्म नया वाला फेमिनिज्म को ही सामने लाता है जहां महिलाएं जो है जैसी हैं वैसी ही रूपहले पर्दे पर आने का साहस दिखाती हैं । इसी तरह से विद्या बालन की फिल्म डर्टी पिक्चरे ने भी नये वाले फेमिनिज्म को आगे बढाया । उसके बोल्ड गाने, उसके बोल्ड सींस आदि ने इस वक्त देशव्यापी चर्चा को जन्म दिया था । सेंसर बोर्ड की कैंची भी चली थी और दूरदर्शन ने उसको रात के स्लॉट में दिखाया था । विवाद चाहे जितना हो लेकिन डर्टी पिक्चर बेहद सफल रही थी 
अभी पिछले साल जूब अनिरुद्ध रायचौधरी की फिल्म पिंक रिलीज हुई थी तो यह पूरी फिल्म एक बॉलीवुड से लेकर समाज तक में विमर्श का नया आधार प्रदान कर गई थी । सार्थक सिनेमा के दौर का खत्म हो जाने के बाद कमर्शियस फिल्मों में इस तरह के विषय को उठाने के साहस को जनता का भी समर्थन मिला । अगर कोई महिला स्वछंद है, सिगरेट और शराब पीती है तो इसका यह मतलब तो नहीं होता है कि वो चालू है और किसी के साथ भी सोने के लिए उपलब्ध है । नहीं का मतलब नहीं होता है इसको इस फिल्म ने पुरजोर तरीके से पेश किया। चंद सालों पहले तक इस तरह की फिल्मों के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था । मीनल को जिस तरह से सरेआम उठा लिया जाता है और उसके साथ यौन शोषण कर गाड़ी से बाहर फेंक दिया जाता है और उसके बाद उसको ही गिरफ्तार करवा दिया जाता है । अपने को साबित करने की जद्दोजहद में एक लड़की को कितना संघर्ष करना पड़ता है यह दर्शकों को पसंद आया क्योंकि इस तरह की वारदातें हर रोज उनके आसपास घटित होती रहती हैं । फिल्मकार ने दर्शकों की इस मानसिकता को पकड़ा और पिंक बनाकर अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया । इस तरह की फिल्म में एक रिस्क भी था लेकिन वो रिस्क फिल्मकार ने उठाया ।
इसी तरह से अनुष्का शर्मा की फिल्म एनएच10 भी दर्शकों को खूब पसंद आया। ये फिल्म भी समकालीन सामाजिक यथार्थ के बेहद करीब थी लिहाजा दर्शकों ने पसंद किया । किस तरह से हाइवे पर बदमाशों का गैंग महिलाओं के साथ बदतमीजी करता है और उसको बचाने आनेवाले पर हमला करता है यह इस फिल्म की शुरुआत है और उसके बाद नायिका मीरा अपने तरीके से प्रतिशोध लेती है । ऐसा नहीं है कि सिर्फ सामाजिक अपराध को झेल रही स्त्रियों के विषय को उठाकर ही फिलमें बनाई जा रही हैं । अगर आप गौरी शिंदे की फिल्म इंगलिश विंगलिश पर नजर डालें तो इसमें एक ऐसी स्त्री का चित्रण है जो अंग्रेजी नहीं बोल पाती है और उसका पति और बेटी हर दिन उसका मजाक उड़ाते हैं । लड्डू का बिजनेस करनेवाली शशि गोडबोले की भूमिका में श्रीदेवी वे अपने जीवंत अभिनय से रंग भर दिए थे । यह फिल्म पंद्रह साल बाद श्रीदेवी की फिल्मों में वापसी की मुनादी भी थी । घर परिवार का संघर्ष, क्लास में अंकुरित होता प्रेम जिसको सामाजिक मान्यताओं के बोझ तले दबाकर अपने अरमानों का गला घोटती अभिनेत्री के रूप में फिल्म बेहद सफल रही थी ।  कहने का अर्थ यह है कि इस दौर में फिल्मकार महिलाओं से जुड़े मुद्दे को लेकर लगातार प्रयोग कर रहे हैं और अच्छी बात यह है कि इस तरह के प्रयोग सफल भी होते रहे हैं ।

ऐसा नहीं है कि पहलवे महिला प्रधान फिल्में नहीं बनीं । मदर इंडिया से लेकर आंधी जैसी फिल्में बॉलीवुड में मील का पत्थर हैं । महबूब खान की फिल्म मदर इंडिया जब 1957 में रिलीज हुई थी तो उसने भी समाज को झकझोरा था । इसी तरह से इसके बीस साल बाद रिलीज हुई फिल्म भूमिका में एक बाल कलाकार की अबिनेत्री बनने की कहानी को जिस तरह से पेश किया गया था उसकी वजह से इसको नई सिनेमा की शुरुआत माना गया था । उसके बाद अर्थ, मिर्च मसाला, दामिनी, चंदानी बार, नो वन किल्ड जेसिका जैसी फिल्में भी आईं थी लेकिन अब की फिल्मों का धरातल थोड़ा अलग है ।  

Friday, December 16, 2016

निगेटिव रोल वाले एक्टर से तौबा

हाल ही में रिलीज रणवीर सिंह की फिल्म बेफिक्रे में जिस तरह से फिल्म की हिरोइन बोल्ड सीन्स देती है या फिर हीरो के साथ इंटीमेट होती है उससे लगता है कि अब फिल्में में हिरोइनें सबकुछ करने के लिए तैयार हैं । एक जमाना था जब दर्शकों को सेड्स करने के लिए हिंदी फिल्मों में वैंपिस कैरेक्टर हुआ करती थी । गाउन में बॉडी एक्सपोजर के साथ हेलेन के लटकों झटकों को कौन भूल सकता है । कम कपड़ों में डांस करनेवाली उस पात्र को लेकर दर्शक खासे उत्साहित रहा करते थे । इसी तरह से अभिनेत्री बिंदू को अब भी लोग याद करते हैं उनकी बोल्ड सीन्स और खास मौकों पर निचले होठ को दांत से काटने की अदा को । ये दौर हिंदी फिल्मों में बहुत लंबे समय तक चला । बाद में जयश्री टी ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश की लेकिन तबतक इस तरह के बोल्ड और निगेटिव रोल के लिए अलग से किसी कलाकार को रखने की जरूरत होती थी । ये वो दौर था जब फिल्मों की हिरोइनें निगेटिव रोल को लेकर बेहद सतर्क रहती थीं । उनको लगता था कि अगर वो निगेटिन रोल करेंगी तो समाज में उनकी छवि दरक जाएगी जिसका आगे चलकर उनको नुकसान होगा । लिहाजा फिल्मकारों को अपनी फिल्म के लिए अलग से एक बिंदास या बुरी लड़की की इमेज वाली अभिनेत्री को रखना पड़ता था । बाद में धीरे-धीरे ये परंपरा टूटने लगी । हिरोइनें बोल्ड होने लगीं, उनको अंग प्रदर्शन से परहेज नहीं रहा, उनके शरीर पर कपड़े कम होने लगे, वो डिस्को में हीरो के साथ बिंदास अदा के साथ डांस करती नजर आने लगीं । जब हिरोइनें ये करने लगीं तो इसको आइटम सांग कहा जाने लगा । शुकुआत में इन आइटम नंबर के लिए भी बिंदास बालाओं को रखा गया लेकिन मुख्य किरदार निभाने वाली हिरोइनें ही इस तरह की भूमिका के लिए तैयार होने लगीं या फिर टॉप की हिरोइन भी आइटम नंबर के लिए तैयार होने लगी । दर्शकों को मैं तो यूपी बिहार लूटने आई में शिल्पा शेट्टी की दिलकश अदा अब भी याद हैं । जब शिल्पा ने शेट्टी ने फिल्म शूल में इस गाने पर परफॉर्म किया तो वो अपने करियर के शिखर पर थीं । बाद में तो करीना कपूर और कटरीना कैफ जैसी टॉप की हिरोइन्स ने आइटम करना शुरू कर दिया । चिकनी चमेली से लेकर पटाइले सैंया मिस्ड कॉल से । इसके अलावा भी करीना और कटरीना कैफ कई आइटम सांग पर थिरकती नजर आईं । जब दो हजार ग्यारह में डर्टी पिक्चर रिलीज हुई तो विद्या बालन के रोल ने अबतक के तमाम टैबू को खत्म कर दिया । उ लाला उ लाला में जब वो नसीरुद्दीन शाह के साथ ट्राली पर थिरकती हैं तो उसका ही एक डॉयलॉग जेहन में आता है फिल्म का मतलब – एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और सिर्फ एंटरटेनमेंट ।

ये तो रही बोल्ड गानों की बात लेकिन ऐसा क्या हुआ कि हिंदी फिल्मों की हिरोइनें निगेटिव रोल भी करने लगीं । दरअसल जब काजोल की फिल्म गुप्त जब उन्नीस सौ सत्तानवे में रिलीज हुई तो उसने बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता हासिल की । इस फिल्म में काजोल निगेटिव रोल में थी और उनके साथ मनीषो कोइराला और बॉबी देयोल थे लेकिन इसको काजोल की फिल्म मानी गई । इस फिल्म की सफलता ने बॉलीवुड की हिरोइंस को निगेटिव रोल की तरफ कदम बढ़ाने का रास्ता खोल दिया । उसके बाद तो जैसे फिल्मों की हिरोइनों को किसी तरह के रोल से परहेज ही नहीं रहा । लेकिन इसका नतीजा यह हुआ है कि हिंदी फिल्मों में हेलेन और बिंदू जैसी अभिनेत्रियों के लिए जगह ही खत्म हो गई । आर्थिक उदारीकरण की बयार के बाद तो हिंदी फिल्मों में भी उदारीकरण का दौर शुरू हो गया और उसको सबसे पहले अपनाया हिंदी फिल्मों की हिरोइंस ने । ऐसा नहीं है कि हिंदी फिल्मों से सिर्फ खलनायिकाओं की भूमिका खत्म हुई बल्कि अब तो विशेषज्ञ खलनायकों की भी कमी महसूस की जाती है । हिंदी फिल्मों में खलनायकों की एक लंबी परंपरा रही है । जिसके चरिए और कमीनापन में वक्त के साथ साथ बदलाव देखने को मिलता रहा है ।  जीवन जैसे खलनायक के बाद प्रेम चोपड़ा, अमरीश पुरी, कुलभूषण खरबंदा जैसे खलनायकों का दौर रहा । इन सबके बीच प्राण साहब को कोई कैसे भूल सकता है जिन्होंने अपनी खलनायकी की भूमिका से  से फिल्मों को एक नई मुकाम दी । आज से चार दशक पहले फिल्म शोले में रमेश सिप्पी ने जिस गब्बर सिंह के किरदार को पेश किया था वो किरदार कई फिल्मों में मजबूती के साथ खड़ा रहा लेकिन बाद में उसकी भूमिका भी कम होती चली गई । इसके साथ कादर खान, शक्ति कपूर और गुलशन ग्रोवर ने भी अपनी अदायगी और फिल्मी पर्दे की बदमाशियों की वजह से दर्शको के बीच सोकप्रियता हासिल की । जब अस्सी के दशक की शुरुआत में फिल्म जितेन्द और श्रीदेवी फिल्म तोहफा रिलीज हुई थी तो उस फिल्म के साथ शक्ति कपूर एक जुमला आउउ भी लोगों की जुबान पर चढ़ गया था । किसी भी किरदार की सफलता उसके संवाद के लोगों की दुबान पर चढ़ जाने से आंकी जा सकती है । फिल्म शोले के बाद गब्बर और कालिया के बीच का संवाद खूब दोहराया जाता था । उसके बाद लंबे समय तक जो भी फिल्में आईं उसमें अमरीश पुरी, कादर खान और गुलशन ग्रोवर की उपस्थिति लगभग आवश्यक रहती थी । लेकिन धीरे –धीरे नायक और खलनायक के बीच का भेद भी खत्म होने लगा था । शाहरूख खान की फिल्म बाजीगर का कैरेक्टर, फिल्म वास्तव में संजय दत्त का कैरेक्टर, अजनबी में अक्षय कुमार की भूमिका इस दीवार को तोड़ने की बुनियाद रख रहा था । धीरे धीरे ये हुआ कि फिल्मों से खलनायक गायब होते चले गए । उधर सलमान खान की फिल्मों में जो खलनायक होते हैं उनके लिए पिटने के अलावा करने के लिए कुछ और होता नहीं है लिहाजा नए अभिनेताओं ने उस ओर जाने में कोई रुचि नहीं दिखाई । फिल्मकारों को भी नायकों के तौर पर नए खलनायक मिलने लगे तो उन्होंने भी हिरोज़ से इस तरह के रोल करवाने शुरू कर दिए ।

Saturday, April 28, 2012

डर्टी पिक्टर पर डर्टी पॉलिटिक्स

फिल्म डर्टी पिक्चर को एक निजी टेलीविजन चैनल पर प्रसारित नहीं करने की सलाह देकर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है । फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों से लेकर बौद्धिक वर्ग के बीच इस बात को लेकर डिबेट शुरू हो गई है । सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने एक निजी टेलीविजन चैनल को भेजे अपनी सलाह में केबल टेलीविजन नेटवर्क रूल 1994 का सहारा लिया और उसके सबरूल 5 और 6 का हवाला देते हुए फिल्म डर्टी पिक्चर के प्रसारण को रात ग्यारह बजे के बाद करने की सलाह दी । केबल टेलीविजन रूल यह कहता है कि किसी भी चैनल को बच्चों के नहीं देखने लायक कार्यक्रम के प्रसारण की इजाजत उस वक्त नहीं दी जा सकती जिस वक्त बच्चे सबसे ज्यादा टीवी देखते हों। सूचना और प्रसारण मंत्रालय यह मानकर चल  रहा है कि रात ग्यारह बजे के बाद अपेक्षाकृत कम बच्चे टीवी देखते हैं । सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को इस बात की जानकारी कहां से मिली कि दोपहर बारह बजे सबसे ज्यादा संख्या में बच्चे टीवी देखते हैं । उसका आधार क्या है । क्या इस बात का कोई वैज्ञानिक आधार है या फिर टीआरपी के दस हजार बक्सों से किए जाने वाले विश्लेषण के आधार पर यह मान लिया गया है कि दिन में ज्यादा संख्या में बच्चे टीवी देखते हैं । क्या रात ग्यारह बजे के बच्चे टीवी नहीं देखते हैं । मंत्रालय के आला अफसर अबतक उसी पुरातन काल में जी रहे हैं जब यह माना जाता था कि बच्चे खा पीकर रात नौ बजे तक सो जाते हैं । समाज में हो रहे बदलाव और बच्चों के बदलते लाइफ स्टाइल को मंत्रालय नजरअंदाज कर रहा है । महानगर की अगर बात छोड़ भी दें तो किस शहर में अब बच्चे ग्यारह बजे तक सोते होंगे, वो भी छुट्टी वाले दिन। मंत्रालय को लगता है कि वो निजी टीवी चैनल पर डर्टी पिक्चर का प्रसारण रुकवाकर बच्चों और किशोरों को इस फिल्म को देखने से रोक लेंगे । आज बच्चों के लिए इंटरनेट का एक्सेस इतना आसान है कि उन्हें रोक पाना मुमकिन ही नहीं है । किशोरों के हाथ में जो मोबाइल फोन है उसमें भी इंटरनेट की सुविधा मौजूद है । समाज बदल रहा है, विचार बदल रहे हैं, बदल रही है लोगों की सोच, लेकिन सूचना और प्रसारण मंत्रालय में बैठे कर्ता-धर्ता अबतक पाषाणकाल में ही जी रहे हैं । उन्हें तो खुद को बदलना होगा और अगर किसी एक्ट में इस तरह के प्रावधान हैं तो पुराने पड़ चुके उन नियम कानून में भी बदलाव की दरकार है ।   लेकिन लगता है कि यहां मूल कारण बच्चे नहीं कुछ और हैं जिसका खुलासा होना चाहिए।
दक्षिण भारतीय हिरोइन स्लिक स्मिता की जिंदगी पर बनी इस फिल्म को पहले तो सेंसर बोर्ड ने एडल्ट सर्टिफिकेट दिया लेकिन बाद में जब इस फिल्म के टीवी पर दिखाने के अधिकार का करार हुआ तो बोर्ड ने करीब पचास से ज्यादा दृश्य और डॉयलॉग पर कैंची चलाने के बाद इस फिल्म को यूए यानि यूनिवर्सल एडल्ट का दर्जा दे दिया । एडल्ट फिल्म और यूनिवर्सल एडल्ट फिल्म में बुनियादी फर्क है । सोलह साल से कम उम्र के बच्चे सिनेमा हॉल में एडल्ट यानि वयस्क फिल्में नहीं देख सकते हैं भले ही वो अपने माता पिता के साथ क्यों ना हों । लेकिन जिस फिल्म को सेंसर बोर्ड युनिवर्सल एडल्ट फिल्म का प्रमाण पत्र देती है उसको बच्चे अपने अभिभावक के साथ जाकर देख सकते हैं । माना यह गया था कि कई फिल्में बच्चे अपने माता पिता के साथ देख सकते हैं ताकि उनके मन में उठने वाले प्रश्नों का उत्तर उनके साथ बैठे मां-बाप दे सकें।  डर्टी पिक्चर को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आनेवाला केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने टीवी पर दिखाए जाने के लिए जब यूए सर्टिफिकेट दिया है तो नियमानुसार डर्टी पिक्चर को टीवी पर नहीं दिखाए जाने की सलाह देना सरासर गलत है । अगर बच्चे अपने घर में माता पिता की मौजूदगी में डर्टी पिक्टर देखना चाहें तो देखें । और ऐसा पहली बार नहीं होता कि यूए प्रमाण पत्र मिली फिल्म टीवी पर दिखाई जाती । इसके पहले भी इस श्रेणी की कई फिल्में निजी चैनलों पर दिन और शाम के वक्त दिखाई जा चुकी है । लंबी सूची है जिसको यहां गिनाने का कोई मतलब नहीं है ।  
अब अगर हम उन तर्कों पर विचार करें जिसके आधार पर डर्टी पिक्चर के प्रसारण को रात ग्यारह बजे के बाद करने लायक माना गया तो क्या वही तर्क मनोरंजन चैनल पर दिखाए जा रहे धारावाहिकों पर लागू नहीं होते । ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब एक चैनल पर सबसे ज्यादा दर्शक संख्या वाले वक्त पर इस जंगल से मुझे बचाओ जैसे धारावाहिक दिखाए गए जिसमें नायिकाएं बेहद कम कपड़ों में झरने के नीचे नहाती हुई दिखाई गई । बिग बॉस में चाहे वो अस्मित और वीणा मलिक के एक ही बिस्तर में लेटकर अंतरंग संवाद के दृश्य हों या फिर राहुल महाजन और उसकी नायिका पायल रोहतगी के स्वीमिंग पूल में तैरने के दृश्य हों क्या वो एडल्ट की श्रेणी में नहीं आते । हाल ही में एक सीरियल में लंबे लंबे चुंबन दृश्य दिखाए गए तो उस वक्त मंत्रालय ने क्या कर लिया । हमारे देश में सच का सामना जैसे कार्यक्रम भी दिखाए गए जिसमें सीधे सीधे पूछा जाता था कि आपने पत्नी के अलावा कितनी महिलाओं से जिस्मानी संबंध बनाए । उसे भी रात ग्यारह बजे के बाद दिखाने के लिए उक्त चैनल को राजी करने में सूचना और प्रसारण मंत्रालय के पसीने छूट गए थे । एक चैनल पर राखी सावंत का शो आता था जिसमें इस तरह के संवाद होते थे जिसको सुनकर वयस्क भी असहज हो जाते थे ।
मंत्रालय का तर्क है कि उनके पास प्री सेंसरशिप का अधिकार नहीं है । ठीक है मान लिया कि आपके पास वो अधिकार नहीं है । लेकिन क्या रात ग्यारह बजे से पहले वैसे दृश्यों को दिखाने वाले चैनलों के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई की गई या सिर्फ चेतावनी देकर खानापूरी कर ली गई । अब भी कई चैनलों पर ऐसे धारावाहिक चल रहे हैं जिनके संवाद इतने अश्लील होते हैं कि आप परिवार के साथ बैठकर देखने में खुद को असहज महसूस करते हैं लेकिन मंत्रालय के अधिकारियों को उस वक्त केबल टेलीविजन रेगुलेशन एक्ट की याद नहीं आती है । क्यों । 
दूसरी जो अहम बात है वह भी समझ से परे है । इस फिल्म में शानदार भूमिका निभाने के लिए फिल्म की नायिका विद्या बालन को राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया । उनकी भूमिका की जोरदार प्रशंसा की गई । अब यहां भी सूचना और प्रसारण मंत्रालय बुरी तरह से फंसता नजर आ रहा है । नियमों के मुताबिक जिस भी फिल्म को किसी भी क्षेत्र में चाहे वो अभिनय हो या फिर गीत से लेकर साउंड रिकॉर्डिंग तक में अगर राष्ट्रीय पुरस्कार मिलता है तो उस फिल्म को टैक्स फ्री करना पड़ता है । साथ ही उस फिल्म को दूरदर्शन पर दिखाने की भी परंपरा है । अब अगर मंत्रालय यह मानता है कि यह फिल्म बच्चों के देखने लायक नहीं है तो क्या दूरदर्शन पर भी इसका प्रसारण रात ग्यारह बजे के बाद ही किया जाएगा या फिर दूरदर्शन पर डर्टी पिक्चर का प्रसारण ही नहीं किया जाएगा । दूरदर्शन की पहुंच केबल टीवी से कहीं ज्यादा है यह बात तो प्रामाणिक है । क्या डर्टी पिक्टर को टैक्स फ्री किया जाएगा या फिर इस नियम की भी काट मंत्रालय निकाल लेगा । कुल मिलाकर देखा जाए तो इस पूरे मामले में सूचना और प्रसारण मंत्रालय की खासी किरकिरी हुई है और अब वक्त आ गया है कि मंत्रालय अपने फैसले लेने के पहले उससे जुड़े सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार करे ।