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Saturday, December 31, 2016

नया वर्ष, नई किताबें, नया अंदाज

नए साल की आहट और दिल्ली में सात जनवरी से आयोजित होनेवाले विश्व पुस्तक मेले के मद्देनजर इन दिनों लेखकों के बीच और सोशल मीडिया पर प्रकाशित होनेवाली किताबों की जमकर चर्चा हो रही है । लेखक अपनी नई किताब को लेकर उत्साहित नजर आ रहे हैं तो हिंदी के प्रकाशकों ने भी नए वर्ष पर नई किताबों की प्रकाशन योजना को अंजाम पर पहुंचाना शुरू कर दिया है । किताबों का पहला सेट दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में जारी करने की तैयारी है । फेसबुक इन दिनों आनेवाली किताबों के कवर से अटा पड़ा है । तमाम तरह के छोटे बड़े मंझोले लेखक अपनी अपनी किताबों का कवर साझा कर रहे हैं और दोस्तों की शुभकामनाएं बटोर रहे हैं । कई प्रकाशकों ने तो बकायदा फेसबुक पर अपने पेज पर नई किताबों का प्रमोशन शुरू कर दिया है तो किसी ने फेसबुक पर अपने प्रकाशनों का विज्ञापन देना शुरू कर दिया है । हर किसी के जेहन में किसी भी तरह से दिल्ली विश्व पुस्तक मेला के सारा आकाश पर छाने की तमन्ना है । वरिष्ठ टीवी पत्रकार शाजी जमां की बहुप्रतीक्षित किताब अकबर (राजकमल प्रकाशन) की खासी चर्चा है और पाठकों को इस किताब को लेकर उत्सुकता भी है । काफी दिनों से अमेजन आदि पर इस किताब की प्री बुकिंग भी शुरू हो चुकी थी और एक दो लिटरेचर फेस्टिवल में इसका कवर भी जारी किया जा चुका था । बावजूद इसके इस किताब के प्रकाशन में देरी हुई । शाजी जमां के इसके पहले दो उपन्यास प्रेम गली अति सांकरी और जिस्म जिस्म के लोग भी प्रकाशित हो चुके हैं । अकबर उनके सालों के शोध का नतीजा है और लिटरेचर फेस्टिवल्स में जो उनकी बातचीत इस किताब को लेकर सुनने को मिली थी वह बेहद दिलचस्प और चौंकानेवाली रही है । हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की लंबी परंपरा रही है । वरिष्ठ लेखक शरद पगारे के दो ऐतिहासिक उपन्यासों की खासी चर्चा हुई थी । पाटलिपुत्र की साम्राज्ञी और गन्धर्वसेन । अब शाजी जमां ने अकबर पर लिखकर इस परंपरा को आगे बढाया है । ये देखना दिलचस्प होगा कि पाठक शाजी की इस किताब को पाठक किस तरह से लेते हैं ।
दूसरी एक महत्वपूर्ण किताब जिसकी खासी चर्चा पिछले कई लिटरेचर फेस्टिवल में सुनने को मिली है वो है युवा लेखिका नीलिमा चौहान की किताब पतनशील पत्नियों के नोट्स ( वाणी प्रकाशन ) । इस किताब को लेकर भी प्रकाशक और लेखक दोनों खासे उत्साहित हैं और फेसबुक पर अलग से इसका पेज बनाकर पाठकों की उत्सकुता बढ़ाने का काम किया जा रहा है । पेसबुक के इस पेज पर लेखिका भी सक्रिय हैं और वो पाठकों से संवाद भी कर रही हैं । इस पेज पर बेहद दिलचस्प प्लाकॉर्ड के जरिए किताब की रिलीज डेट का काउंटडाउन भी चलाया जा रहा है । नीलिमा चौहान दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षिका हैं और सोशल साइट्स पर अपने बोल्ड लेखन के लिए जानी जाती हैं । उनकी इस किताब का हिंदी जगत को इंतजार है । कैसी होती हैं पतनशील पत्नियां या फिर पतनशील पत्नियों को लेखिका ने किस तरह से व्याख्यायित किया है यह जानना दिलचस्प होगा । एक और महत्वपूर्ण किताब आ रही है वह है प्रेमचंद साहित्य के मर्मज्ञ कमल किशोर गोयनका के संपादन में – प्रेमचंद कुछ संस्मरण ( सामयिक प्रकाशन) । इस किताब का भी पाठकों को इंतजार है क्योंकि कमल किशोर गोयनका हिंदी के ऐसे लेखक हैं जो प्रेमचंद के विभिन्न आयामों को ना केवल तलाशते रहते हैं बल्कि पाठकों के लिए उसको रुचिकर तरीके से पेश भी करते रहे हैं । कुछ दिनों पहले उन्होंने प्रेमचंद के उपन्यास गो-दान के दस जून उन्नीस सौ छत्तीस को छपे पहले संस्करण का जिस तरह से संकलित संपादित करके पेश किया था वह बेहद महत्वपूर्ण है । एक और किताब जिसका बहुत दिनों से हिंदी पाठकों को इंतजार था वह है फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार की आत्मकथा । मूलत: अंग्रेजी में द सब्सटेंस एंड द शैडो के नाम से प्रकाशित उपन्यास वजूद और परछाइयां ( वाणी प्रकाशन) के नाम से हिंदी पाठकों के लिए उपलब्ध होगा । अकबर और पतनशील पत्नियों को नोट्स को लेकर बने उत्सकुकता का जो वातावरण है उसको देखकर लगता है कि हिंदी पाठकों की रुचि साहित्य की शास्त्रीय विधाओं से इतर किताबों में बढ़ी है । कई प्रकाशकों से बात करने पर भी इस बात की पुष्टि होती है । यह सिर्फ इस साल की प्रवृत्ति नहीं है । इसकी पृष्ठभूमि काफी पहले से बन रही थी । लोग एक ही तरह की कहानियां, कविताएं और उपन्यास पढ़-पढ़कर उब गए थे । हिंदी के ज्यादातर लेखक इस बात को समझ नहीं पा रहे थे लिहाजा एक एक करके हर विधा में पाठकों की रुचि कम होती चली गई । सबसे पहले कविता पर इसका असर देखने को मिला और इसके पाठक इतने कम हो गए कि प्रकाशकों ने कविता संग्रह छापना लगभग बंद कर दिया । वरिष्ठ कवियों से लेकर स्थापित कवियों तक को अपने संग्रह छपवाने के लिए संघर्ष करना पड़ा । इन दिनों यही हाल कहानी का हो रहा है । फॉर्मूलाबद्ध कहानियां लिखते जाने से लेखक का नाम देखकर इस बात का अंदाज लग जाता है कि अमुक की कहानियां कैसी होंगी । बावजूद इसके पुस्तक मेले में कई कहानी संग्रह प्रकाशित होने जा रहे हैं । हंस कथा मासिक से लंबे समय तक जुड़े रहे कथाकार गौरीनाथ का कहानी संग्रह बीज-भोजी (अंतिका प्रकाशन), कथाकार वंदना शुक्ला का काफिला साथ और सफर तन्हा ( अनन्य प्रकाशन) से प्रकाशित हो रहा है । इसके अलावा कई दिग्गज कहानीकारों की कहानियों का संकलन भी प्रकाशित हो रहा है जिनमें नरेन्द्र कोहली और विजयदान देथा की लोकप्रिय कहानियां ( प्रभात प्रकाशन) शामिल हैं ।
हिंदी में अनुवाद पर काम कम हो रहा है लेकिन पाठकों की साहित्येत्तर रुचि के मद्देनजर प्रकाशकों ने इस ओर अपना फोकस किया है । हलांकि हिंदी पाठकों की संख्या को देखते हुए अनुवाद के दायरे को और फैलाना होगा । दरअसल हिंदी में  अनुवाद की एक दिक्कत और है । हिंदी में अनुवाद करने पर ना तो ज्यादा पैसा मिलता है और ना ही अच्छे अनुवादक मिलते हैं । गूगल से अनुवाद करनेवालों की संख्या बढ़ती जा रही है । बावजूद इसके दो हजार सत्रह में कई अच्छी अनूदित किताबें प्रकाशित हो रही हैं । मशहूर अमेरिकी एंकर ओपरा विनफ्रे की बेस्टसेलर किताब व्हाट आई नो फॉर श्योर का हिंदी अनुवाद ये जो है जिंदगी ( प्रभात प्रकाशन) छपकर आनेवाली है । इसी तरह से मशहूर लेखक ज्यां द्रेज और कमल नयन चौबे के संपादन में भारत में सामाजिक नीतियां: समकालीन परिप्रेक्ष्य (वाणी प्रकाशन) दो हजार सत्रह में प्रकाश्य है । मशहूर उद्योगपति एन आर नारायणमूर्ति की किताब मेरे बिजनेस मंत्र ( प्रभात प्रकाशन) और आस्टिन ग्रेनविल की किताब भारतीय संविधान ( वाणी प्रकाशन) से छपकर आनेवाली है । इस वक्त पूरी दुनिया में आतंकवादी संगठन आईएआईएस और उसकी कार्यप्रणाली के तिलिस्म को जानने की इच्छा है । जाहिर है कि इसमें हिंदी के पाठक भी शामिल हैं । हिंदी के पाठकों की इस क्षुधा को शांत करेगी पैट्रिक कॉकबर्न की किताब आईएसआईएस का आतंक ।  अनुवाद के अलावा अगर हम नजर डालें तो एक और महत्वपूर्ण किताब जो नए वर्ष में प्रकाशित होगी वह है अंग्रेजी और हिंदी की नई कविता पर केंद्रित अंगरेजी-हिंदी नयी कविता की प्रवृतियां ( सामयिक प्रकाशन) । उपन्यासों की अगर बात करें तो कई उपन्यास इस वर्ष भी प्रकाशित होंगी । इनमें कुसुम अंसल के उपन्यास परछाइयों का समयसार (सामयिक प्रकाशन) से प्रकाश्य है ।

दो हजार सत्रह में एक और प्रवृत्ति के जोर पकड़ने की आशंका है वह है पैसे देकर किताबें छपवाना । ऐसा नहीं है कि अभी पैसे देकर किताबें नहीं छप रही है लेकिन यह काम छिटपुट तरीके से हो रहा है । अब कुछ प्रकाशक सेल्फ पब्लिशिंग के नाम पर इसको संस्थागत रूप देने जा रहे हैं । सेल्फ पब्लिशिंग के नाम की सिर्फ आड़ होगी । एक प्रकाशक ने तो बकायदा एक पूरा विभाग इस काम में लगा रखा है और बजाप्ता रेटकार्ड तय कर दिया है । पचास प्रति छपवाने पर कितना,सौ प्रति छपवाने पर कितना बल्कि रेटकार्ड में तो पच्चीस प्रतियां छापने का भी प्रावधान रखा गया है । पैसे देकर पहले भी और अब भी किताबें छप रही हैं लेकिन जिस तेजी से इसका विस्ततार हो रहा है वो हिंदी साहित्य के लिए एक खतरनाक संकेत है । जिस तरह से अखबारों के खबरनुमा विज्ञापन या टेलीविजन के पैसे लेकर बने आधे घंटे के शो के दौरान विज्ञापन या मार्केटिंग इनीशिएटिव लिखकर चलाया या छापा जाता है उसी तरह से पैसे देकर छपी किताबों पर भी इस बात का उल्लेख किया जाना चाहिए या संकेत होना चाहिए कि यह किताब पैसे देकर छपवाई गई है या फिर सेल्फ फाइनिंसिंग योजना के तहत प्रकाशित है । यह होता भी रहा है जब हिंदी अकादमी या अन्य संस्थाओं के सहयोग से किताब छपती है तो उसका उल्लेख किताब पर होता है । इससे पारदर्शिता बनी रहेगी ।    

Friday, December 30, 2016

‘रईस’ और ‘काबिल’ की जंग

शाहरुख खान अपनी फिल्म रईस की रिलीज के पहले राज ठाकरे के दरबार में मत्था टेकने को लेकर विवाद से उबरे भी नहीं थे कि एक दूसरा विवाद खड़ा हो गया है । दो हजार सोलह ने जाते जाते बॉलीवुड में रिलीज वॉर का एलान कर दिया है । शाहरुख खान की फिल्म रईस को छब्बीस जनवरी को रिलीज करना तय हुआ था । रईस की रिलीज डेट को देखते हुए राकेश रोशन ने अपने बेटे की फिल्म काबिल को रईस के एक दिन पहले यानि पच्चीस जनवरी को रिलीज करने का एलान कर दिया था । हाल ही में जब रईस का ट्रेलर रिलीज किया जा रहा था तो फिल्म के निर्माता ने रईस की रिलीज डेट को भी गणतंत्र दिवस के एक दिन पहले यानि पच्चीस जनवरी कर दिया । अब इस खबर के बाहर आते ही राकेश रौशन आगबूबूला हो गए । अपने बेटे ऋतिक की डूबती नैया को पार लगाने के लिए उनको काबिल से बड़ी उम्मीदें थी लेकिन किंग खान की लोकप्रियता को देखते हुए अब उनको डर सताने लगा है । उन्होंने बड़े तल्ख अंदाज में कहा कि वो जो भी डेट तय करते हैं रईस वाले उसका ही पीछा करने लग जाते हैं । राकेश रोशन ने कहा कि वो फिल्मों के पुराने स्कूल ऑफ थॉट्स के हैं जहां दूसरे फिल्मकारों की रिलीज डेट से टकराने की सोच कभी नहीं रही । राकेश रोशन का कहना था कि उनकी फिल्म तो तैयार है और वो चाहते तो दंगल से या फिर बेफिके के साथ काबिल को रिलीज कर सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया । दरअसल राकेश रोशन को दो हजार सात का वाकया याद होगा जब शाहरुख खान की फिल्म मोहब्बतें और ऋतिक की फिल्म मिशन कश्मीर एक साथ रिलीज हुई थी । उस वक्त विधु विनोद चोपड़ा ने मोहब्बतें के साथ ही मिशन कश्मीर को रिलीज करने का फैसला लिया था जो उनके लिए घातक साबित हुआ था और ऋतिक और प्रीति जिंटा की जोड़ी भी उस फिल्म को नहीं बचा पाई थी ।    
दरअसल वॉलीवुड में ये माना जाता है कि किंग खान की फिल्मों से पंगा लेना आसान नहीं होता है । उनके साथ रिलीज होनेवाली ज्यादातर फिल्में फ्लॉप ही होती रही हैं । दो हजार सात में भी जब शाहरुख की फिल्म ओम शांति ओम के सामने रणबीर कपूर और सोनम की डेब्यू फिल्म सांवरिया रिलीज हुई थी तो उसने बॉक्स ऑफिस पर पानी भी नहीं मांगा था । जबकि सांवरिया के साथ ये दो डेब्यू स्टार के अलावा संजय लीला भंसाली जैसा डायरेक्टर भी था । दो हजार छह में सलमान और शाहरुख की फिल्मों में भी मुकाबला हुआ था जब डॉन और जानेमन एक साथ रिलीज हुई थी । तब भी किंग खान ही भारी पड़े थे और सलमान और अक्षय मिलकर भी फिल्म जानेमन को बचा नहीं पाए थे । किंग खान के सामने कोई टिक नहीं पाता है । दो हजार चार में अक्षय कुमार की फिल्म एतराज और शाहरुख की वीर जारा एक साथ रिलीज हुई थी । एतराज की स्टोरी सॉलिड थी और प्रियंका चोपड़ा और अक्षय कुमार की जोड़ी उन दिनों चर्चा में भी थी, बावजूद इसके वीर जारा ने अपनी कामयाबी का परचम लहरा दिया क्योंकि उस वक्त किंग खान का जादू दर्शकों के सर चढ़कर बोलता था । शाहरुख खान ने तो अमिताभ बच्चन और गोविंदा को भी पछाडा था जब बड़े मियां छोटे मियां रिलीज हुई थी तो उसी दिन शाहरुख और काजोल की फिल्म कुछ कुछ होता है रिलीज हुई थी । कुछ कुछ होता है ने डेविड धवन,गोविंदा और अमिताभ बच्चन की तिकड़ी को बहुत पीछे छोड़ दिया था । राकेश रोशन को इस इतिहास का ज्ञान है लिहाजा वो इस बात से घबराए हुए हैं कि अगर रईस और काबिल एक साथ रिलीज हुई  तो काबिल का क्या हश्र होगा ।
बॉलीलुड में रिलीज वॉर होते रहे हैं । अभी कुछ महीनों पहले शिवाय और करण जौहर की फिल्म ऐ दिल है मुश्किल को लेकर बड़ा विवाद उठा था । अजय देवगन और करण जौहर के झगड़े के बीच कमाल खान कूद पड़े थे । पैसों के लेनदेन की बातें भी हुई थी । कई बार तो ये झगड़े फिल्मों की पब्लिसिटी को लेकर भी उटाए जाते हैं । जैसे किसी जमाने के फ्लॉप एक्टर रहे कमाल खान का अजय देवगन और कपण जौहर के झगड़े में कूदना किसी की समझ में नहीं आया था । या तो कमाल खान ने पैसे के लिए वो विवाद खड़ा किया था या फिर फिल्म को पब्लिसिटी दिलाने के लिए ये खेल खेला गया था । हलांकि शिवाय ने भी अच्छा बिजनेस किया लेकिन वो ऐ दिल है मुश्किल से कमाई के मामले में पिछड़ गई और फायदा करण जौहर की फिल्म को हो गया । अजय देवगन पहले भी अपनी फिल्म के रिलीज के डेट्स को लेकर आदित्य चोपड़ा से भिड़ चुके हैं । दो हजार बारह की बात है जब अजय की फिल्म सन ऑफ सरदार और आदित्य चोपड़ा की फिल्म जबतक है जान की रीलिज डेट टकरा गई थी तब भी अजय नाराज हो गए थे । उन्होंने आरोप लगाया था कि उनकी फिल्म को कम स्क्रीन मिल रहे हैं । उस वक्त भी मामला कोर्ट तक पहुंचा था ।
रिलीज को लेकर तो अमिताभ बच्चन की आईक़निक फिल्म शोले का टकराव जय संतोषी मां से हुआ था । जय संतोषी मां बेहद हिट रही थी और शोले शुरुआत में पिट गई थी । उस वक्त जब शोले की समीक्षा छपी थी तो एक लेख का शीर्षक था- शोले जो भड़क ना सका । जय संतोषी मां ने तो इतिहास ही रच दिया था । फिल्मों की डेट पहले अनाउंस हो जाती है तो फिर निर्माता क्यों नहीं एडजस्ट करते हैं । जैसे पहले ये खबर आई थी कि सलमान की सुल्तान और शाहरुख की रईस ईद के मौके पर रिलीज होगी लेकिन शाहरुख ने होशियारी दिखाई और रईस की रिलीज डेट का टाल दिया । शाहरुख का पता है कि इस वक्त सलमान की फिल्में उनसे ज्यादा चल रही हैं लिहाजा उन्होंने डॉन और जानेमन की टक्कर में डॉन की जीत को भुलाकर अपनी फिल्म की रिलीज टाल दी । नए साल में ये देखना दिलचस्प होगा कि रईस शाहरुख की सफलता के इतिहास को दोहराते हुए काबिल को पटखनी देता है या फिर ऋतिक रौशन, शाहरुख के विजय रथ को रोक देते हैं ।   


चुनौतियों से निबटने का वक्त

नोट बदलने की मियाद खत्म होने के बाद अब पांच सौ और हजार रुपए के नोट सिर्फ रिजर्व बैंक से बदले जा सकेंगे, वो भी अगले वर्ष इकतीस मार्च तक । आठ नवंबर को जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी के सरकार के फैसले का एलान किया था तब से लेकर अब तक देशभर में विमर्श की धुरी ये फैसला ही रहा है । नोट बदलने की मियाद खत्म होने के पहले ही इस बात का आंकलन भी शुरू हो गया है कि इससे हासिल क्या हुआ । आठ नवंबर को जब प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का एलान किया था तो उन्होंने तीन बिंदुओं पर जोर दिया था । उनके मुताबिक इस फैसले से भ्रष्टाचार, काला धन और जाली नोट का कारोबार करनेवालों की कमर टूट जाएगी और उनके पास रखे पांच सौ और हजार के नोट महज काजग के टुकड़ों में तब्दील हो जाएंगें । उन्होंने जोर देकर कहा था कि देश में नकदी का अत्यधिक प्रचलन का सीधा संबंध भ्रष्टाचार से है और भ्रष्टाचार के मार्फत कमाई गई नकदी महंगाई को बढ़ाती है जिसकी मार गरीबों को झेलनी पड़ती है । तीसरी महत्वपूर्ण बात जो प्रधानमंत्री मोदी ने कही थी वो ये कि इस फैसले से आतंकवादियों और भारत के खिलाफ गतिविधि चलानेवालों की कमर टूट जाएगी । इन तीन बिंदुओं पर जनता ने प्रधानमंत्री पर भरोसा किया और नकदी की दिक्कतों के बावजूद जनता में व्यापक पैमाने पर नाराजगी देखने को नहीं मिली ।
नोटबंदी के पचास दिन बीत जाने के बाद बैंकों के बाहर लगनेवाली लंबी कतारें छोटी हो गई हैं । लोगों को शुरुआती दिक्कतों से राहत मिलती नजर आ रही है । हलांकि स्थिति सामान्य होने में अभी और वक्त लगेगा । लेकिन क्या इस फैसले के असर को आंकने के लिए बैंकों के आगे लगनेवाली लंबी या फिर छोटी होती कतार आधार बन सकती है । कतई नहीं । यह एक ऐसा फैसला है जिसका असर भी कम से कम छह महीने बाद महसूस किया जा सकेगा । लोगों को होनेवाली दिक्कतों को मुद्दा बनाकर जो लोग सरकार पर हमलावर हो रहे हैं वो खालिस सियासत कर रहे हैं । जनता को होनेवाली दिक्कतों पर चर्चा होनी चाहिए उसको दूर करने के उपायों पर विचार किया जाना चाहिए और सरकार को उन उपायों को संवैधानिक दायरों में लागू करने में किसी भी तरह की कोई हिचक भी नहीं दिखानी चाहिए । संसद में भी ये बहस होती तो बेहतर होता लेकिन विपक्षी दलों और सत्ता पक्ष के शोर-शराबे के बीच पूरा शीतकालीन सत्र धुल गया । नोटबंदी का यह फैसला इतना बड़ा है कि इसपर विचार करते समय देश की अर्थव्यवस्था, बैंकिंग सिस्टम और सिस्टम से बाहर की नकदी को सिस्टम में लाने के फायदों पर विचार करना होगा । जब नोटबंदी का फैसला लागू किया गया था तो एक आंकलन सामने आया था कि पांच सौ और एक हजार के जो नोट चलन में हैं वो करीब साढे पंद्रह लाख करोड़ हैं । एक अनुमान के मुताबिक अबतक अबतक साढे चौदह लाख करोड़ रुपए बैंकिंग सिस्टम में आ चुके हैं । अब इस पर विचार किया जाना चाहिए कि जो धन बैंकिगं सिस्टम में आ गया है वो टैक्स के दायरे में भी आयगा यानि कि जो साढे चौदह लाख करोड़ रुपए बैंकों के पास जमा हुए हैं उसके बारे में आयकर विभाग के पास जानकारी उपलब्ध हो गई है ।
इस आधार पर सरकार की आलोचना की जा रही है कि नोटबंदी करने से बहुत कुछ हासिल नहीं हुआ और महज लाख पचास हजार करोड़ रुपए का काला धन ही सामने आ पाया है, जिसके लिए सरकार ने पूरे देश को कतार में खड़ा कर दिया । ये वो राशि है जो बैकों में जमा नहीं की गई । यह सही है लेकिन जो पैसे बैकों में जमा हुए हैं और उनपर टैक्स लगाया गया तो सरकारी खजाने में लोकहित में खर्च करने के लिए धन की बढ़ोतरी हो जाएगी । इसके अलावा अगर हम अर्थशास्त्र के लिहाज से बात करें तो रिजर्व बैंक की जिम्मेदारी भी लाख पचास हजार करोड़ कम हो जाएगी क्योंकि वो नोट काजग के टुकड़े हो गए । लेकिन सवाल वही कि क्या क्या इससे कालाधन खत्म हो जाएगा । आम लोगों को यह लग सकता है कि जो पैसा बैंक में आ गया वो काला धन नहीं है लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है । लोगों ने अपने काले धन को बैंकों में जमा करवाकर सफेद दिखाने की कोशिश की है लेकिन अभी इसका सही मूल्यांकन होना अभी शेष है । अब आयकर विभाग के लोग इस बात का असेसमेंट करेंगे कि जिन खातों में पैसे जमा हुए हैं उनपर टैक्स दिया गया है या नहीं । लिहाजा इस बात की संभावना है कि इस वर्ष आयकर विभाग ज्यादा टैक्स वसूलने में कामयाब होगा ।
केंद्र सरकार पर एक आरोप यह भी लग रहा है कि इस योजना से कालाधन को रोकने में कोई मदद नहीं मिलेगी क्योंकि उसका स्त्रोत नहीं सूखेगा । इस तरह का आरोप लगाने वाले लोग सामान्यीकरण के दोष के शिकार हो जा रहे हैं । अर्थशास्त्र का एक बहुत ही बुनियादी नियम है कि यहां कोई भी नीति बनाई जाती है तो वो एक खास लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए उसको हासिल करना होता है । अर्थशास्त्र में इसको लक्षित सिद्धांत यानि टार्गेटिंग प्रिंसिपुल के नाम से जाना जाता है ।  कालेधन के स्त्रोत को रोकना इस योजना का उद्देश्य था भी नहीं, सरकार की योजना के मुताबिक कालेधन को टैक्स के दायरे में लाना और सरकार को उसके मालिकों के बारे में जानकारी हासिल करना था और पचास दिनों में जिस तरह से बैंकों में पैसे जमा हुए उससे लगता है कि सरकार अपने इस लक्ष्य को हासिल करने में लगभग कामयाब रही है । इस संदर्भ में एक छोटा सा उदाहरण देना काफी होगा। बहुजन समाज पार्टी के खाते में इस पचास दिनों के दौरान सौ करोड़ से ज्यादा की राशि जमा की गई । सरकार को इस राशि के बारे में जानकारी नहीं थी और ना ही राशि बैंकिंग सिस्टम में थी । जमा होने के बाद अब यह राशि सिस्टम का हिस्सा है । इस तरह के कई खाते होंगे जिनमें करोड़ों जमा हुए होंगे । आंकड़ों के मुताबिक बैंकों में करीब तीन सौ फसदी ज्यादा नकदी जमा हुई है । नोटबंदी के पहले बैंकों के पास करीब ढाई लाख रुपए का जमाधन था जो अब बढ़कर 7 लाख करोड़ से ज्यादा हो गया है । इससे बैंकिंग सिस्टम मजबूत हुआ है ।  

इस नोटबंदी का एक और फायदा दिखाई दे रहा है वह है नक्सलियों की कमर टूटती नजर आ रही है । छत्तीसगढ़ में सक्रिय नक्सलियों के पास से करीब सात हजार करोड़ की रकम का पता चला है । इतवनी बड़ी रकम बेकार होने के बाद नक्सलियों को ऑपरेट करने में आर्थिक रूप से बहुत दिक्कत हो रही है । केंद्र सरकार को अनुमान है कि करीब पाचं सौ करोड़ रुपयों के नकली नोट का कारोबार ठप हो गया है । लेकिन यह मान लेना बेमानी होगा कि नोटबंदी से नक्सलियों और आतंकवादियों का सफाया हो जाएगा । नक्सलियों के जो मददगार हैं वो उनको अन्य तरीकों से मदद कर रहे हैं । आतंकवादियों की फंडिंग सीधे तौर पर पाकिस्तान से हो रही है और वो आतंकावादी घटनाओं को अंजाम देने के लिए फंडिंग का अन्य स्त्रोत ढूंढ लेंगे । इसके अलावा आतंकवादियों के जो स्लीपर सेल सक्रिय हैं वो देश की बैंकिंग सिस्टम से जुड़े हैं उसको पकड़ना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है । देश ने देखा है कि दो हजार आठ में आतंकवादियों को पाकिस्तान ने किस तरह से फंडिंग की थी । सरकार के इस फैसले को लागू करने में बड़ी चुनौतियां अब भी सामने हैं, सामने तो इस योजना को सफल बनाने के लिए और रिफॉर्म की भी जरूरत है ।  

Tuesday, December 27, 2016

भ्रम और उलझन के भंवर में कांग्रेस

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस इस वक्त उस दौर से गुजर रही है जहां नेतृत्व को लेकर नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक में एक भ्रम और उलझन लक्षित किया जा सकता है । सोनिया गांधी की बीमारी और राहुल गांधी को आगे बढ़ाने की रणनीति के तहत कांग्रेस अध्यक्षा ने खुद को नेपथ्य में रखा था । उनके नेपथ्य में रहने की वजह से पुरानी पीढ़ी के नेता स्वत: परिधि पर चले गए थे और राहुल गांधी के आसपास के नेता पार्टी के केंद्र में दिखाई देने लगे थे । यह संसद और उसके बाहर दोनों जगह पर साफ तौर पर देखा जा सकता था । सोनिया के नेपथ्य में जाने के बावजूद उनके इर्दगिर्द के नेता भले ही पृष्ठभूमि में चले गए हों लेकिन उनकी ताकत कम नहीं हुई थी । ये जरूर हुआ कि राहुल गांधी के नजदीकी नेताओं का भाव बढ़ गया । इस परिस्थिति में नियमित अंतराल के बाद राहुल गांधी की पार्टी की कमान संभालने की खबरें आती रहती हैं । इस परिस्थिति में पार्टी के फैसलों और नेताओं के बयान में एकरूपता नहीं दिखाई देती है । उदाहरण के तौर पर अगर हम हाल के बयानों और घटनाओं को देखें तो यह साफ दृष्टिगोचर होता है । हाल ही में जब थल सेनाध्यक्ष के तौर पर लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत की नियुक्ति की गई तो उस मुद्दे पर भी कांग्रेस नेताओं के अलग अलग सुर सुनाई दिए थे । कांग्रेस के प्रवक्ता और पूर्व सूचना और प्रसारण राज्यमंत्री मनी। तिवारी ने सरकार पर आरोप लगाया था कि लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत को सेनाध्यक्ष नियुक्त करने में राजनीति की गई थी । उनके बयान के पहले कांग्रेस के महाराष्ट्र इकाई के सचिव शहजाद पूनावाला ने प्रधानमंत्री पर इल नियुक्ति में मुसलमान लेफ्टिनेंट जनरल की अनदेखी का आरोप लगाया था । मनीष तिवारी ने शहजाद के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था । मनीष तिवारी के बयान के बाद सत्यव्रत चतुर्वेदी ने बयान दिया कि सेना की नियुक्तियों पर राजनीति नहीं करनी चाहिए । अब तीन नेताओं के अलग अलग बयान ने पार्टी में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी । कार्यकर्ताओं के बीच जो संदेश गया वो भी भ्रमित करनेवाला था ।
इसी तरह से पिछले दिनों राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के किसानों की समस्या को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलने पहुंच गए । उनके साथ कई युवा नेता थे, कहा तो यहां तक गया कि लोकसभा में पार्टी की संसदीय दल के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को अंतिम वक्त में इस मुलाकात की जानकारी दी गई और उनको आने को कहा गया । वो भागे भागे वहां पहुंचे थे । राहुल गांधी से प्रधानमंत्री की इस मुलाकात की रूपरेखा उनके एक युवा सांसद साथी ने तैयार की थी और वरिष्ठ नेताओं को इसकी जानकारी मुलाकात का वक्त मिलने के बाद दी गई । अब इस मुलाकात को लेकर भी पार्टी में अलग अलग राय सामने आ रही है । कुछ नेताओं का मानना है कि राहुल गांधी जब नोटबंदी का विरोध कर रहे थे और धीरे-धीरे अन्य विपक्षी दलों के नेता उनके साथ आते दिख रहे थे वैसे में प्रधानमंत्री से सिर्फ अपनी पार्टी के नेताओं से मिल आना विपक्षी एकता के प्रयासों को झटका दे गया । इस बात में दम भी है क्योंकि उसके बाद एक बार फिर से विपक्षी दल अलग अलग राह पर चलते नजर आने लगे । पार्टी के हलकों में तो दबी जुबान में ये आरोप भी लग रहे हैं कि जिस युवा नेता ने ये मुलाकात तय करवाई या इसकी योजना बनाई उनके भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ मंत्री से अच्छे संबंध हैं और ये भारतीय जनता पार्टी की एक सियासी चाल थी विपक्ष के आसन्न एका को रोकने की ।

दरअसल अगर हम देखें तो दो हजार नौ के लोकसभा चुनाव के बाद ही राहुल गांधी को कमान सौपने की मांग के बाद से यह भ्रम की स्थिति बनी हुई है । इस भ्रम ने दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की लुटिया डुबोई थी । सात आठ साल से यह स्थित बनी हुई है और पिछले आम चुनाव में पार्टी की हार के बाद यह और बढ़ गया है । प्रशांत किशोर को उत्तर प्रदेश में रणनीति बनाने के काम को लेकर भी भ्रम बना रहा । शीला दीक्षित को उत्तर प्रदेश का चेहरा बनाने और फिर उनको किनारा कर देने का फैसला भी एक तरह से भ्रमित फैसले की परिणति ही कही जा सकती है । इसी तरह से अगर हम देखें तो राज बब्बर को यूपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाने के बाद अब अखिलेश यादव के साथ गठबंधन की बात की जा रही है । रणनीतिकार ये भूल गए कि अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल को राज बब्बर ने हराया था और ये फांस अब भी अखिलेश के दिल में है । अगर यूपी में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी में गठबंधन होता है तो राज बब्बर का हाशिए पर जाना लगभग तय माना जाना चाहिए । अब एक बार फिर एक फैसले हुआ है जिससे कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के समर्थकों के बीच रस्साकशी सामने आ सकती है । नोटबंदी पर देशव्यापी विरोध की रणनीति तय करने के लिए सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की अगुवाई में कमेटी बनाई गई है जिसके संयोजक राहुल के सिपहसालार रणदीप सिंह सुरजेवाला हैं । नोटबंदी पर विपक्षी दलों के नेताओं की बैठक सोनिया ने बुलाई । इस तरह के फैसलों का असर संगठन पर पड़ता है जो दिख भी रहा है ।  
(नेशनलिस्ट आनलाइन- 27.12.2016)

अबकी बार ‘बेनामी’ पर वार

क्रिसमस के दिन जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस साल का आखिरी मन की बात की तो उन्होंने आनेवाले दिनों के लिए अपनी सरकार के मंसूबे को साफ कर दिए । देश को संबोधित मन की बात में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश से वादा किया है कि वो भ्रष्टाचार और कालाधन के खिलाफ अपनी जंग जारी रखेंगे । उन्होंने नोटबंदी को इस दिशा में उठाया गया पहला कदम बताया और कहा कि कालेधन और भ्रष्टाचार को खत्म करने का ये आखिरी प्रयास नहीं है । उन्होंने ऐलान किया कि कालेधन के कुबेरों को बख्शा नहीं जाएगा । उन्होंने साफ किया कि नोटबंदी की सीमा खत्म होने के बाद सरकार अब बेनामी संपत्ति रखनेवालों पर वार करने जा रही है । अपने चौंतीस मिनट के मन की बात में प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि बेनामी संपत्ति कानून अट्ठाइस साल पहले पास कर दिया गया था लेकिन कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति की वजह से उसको अमल में नहीं लाया गया । नतीजा यह हुआ कि बेनामी संपत्ति कानून के तहत ना तो नियम बनाए गए और ना ही उनको अधिसूचित किया गया । उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी सरकार इस कानून को धारदार और प्रभावी तरीके से लागू करने जा रही है दरअसल राजीव गांधी के शासनकाल के दौरान उन्नीस सौ अठासी में बेनामी संपत्ति कानून बना था लेकिन वो अट्ठाइस साल तक ठंडे बस्ते में रहा । अब संसद ने अगस्त में इस कानून को नए सिरे से पारित किया । इसके मुताबिक बेनामी लेन-देन का जुर्म साबित होने पर अधिकतम सात साल तक की सजा हो सकती है और संपत्ति के बाजार मूल्य का पच्चीस फीसदी तक जुर्माना भी लगाया जा सकता है ।
मन की बात में प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के विरोध पर कहा कि जो लोग खुलकर विरोध नहीं कर पा रहे हैं वो विमुद्रीकरण की खामियां गिनाने में लगे हैं । उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि विमुद्रीकरण को सांप्रदायिक रंग देने की भी कोशिश की गई । दरअसल हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओबैसी ने कुछ दिनों पहले ये आरोप लगाया था कि मुस्लिम बहुल इलाकों के एटीएम में पैसे नहीं डाले जा रहे हैं । ओबैसी का नाम लिए बगैर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सांप्रदायिक मानसिकता पर प्रहार किया । प्रधानमंत्री के मुताबिक अगर विपक्ष संसद चलने देता तो वहां राजनीतिक दलों की फंडिंग पर भी बात होती और संभव है कि कुछ अच्छा निकलकर आता । नरेन्द्र मोदी के मुताबिक अगर संसद में बहस होती तो राजनीतिक दलों की फंडिंग के बारे में जो भ्रम की स्थित है वो भी कुछ साफ होती । उन्होंने पूरे देश को कालेधन के खिलाफ मुहिम में सरकार का साथ देने के लिए आभार भी जताया । रिजर्व बैंक के नोटबंदी को लेकर लगातार नियम बदलने पर भी प्रधानमंत्री ने अपनी तरफ से सफाई दी । उन्होंने कहा कि पिछले सत्तर साल से बेइमानी और भ्रष्टाचार से बड़ी ताकतें जुड़ी हुई हैं जो सरकार के कदमों को नाकाम करने के लिए सक्रिय हो जाते हैं और हर अच्छे कदम की काट निकाल लेते हैं । उनके मुताबिक इन ताकतों को नाकाम करने के लिए सरकार को भी तू डाल डाल हम पात पात वाली नीति अपनानी पड़ती है । नियमों के बदलने से जनता को दिक्कत नहीं बल्कि फायदा ही हुआ । यह माना जाना चाहिए कि सरकार जनता की सहूलियत के लिए लचीला रुख अख्तियार करती रही और जब जब जैसी जैसी दिक्कतों को सामने लाया गया तब तब सरकार ने जनता को सहूललियत देने के लिए उसमें बदलाव किया । यह सरकार की संवेदनशीलता है । इससे भ्रम की स्थिति नहीं बल्कि सहूलियतें बढ़ीं । नोटबंदी को लेकर देशभर में कुछ ताकतों ने कई तरह की अफवाहें फैलाईं लेकिन जनता के भरोसे ने सबको नाकाम कर दिया ।

नोटबंदी को लेकर पूरे देश में पिछले आठ नवंबर से चर्चा हो रही है । सरकार पर इस तरह का आरोप भी लगाया जा रहा है कि इससे जनता को दिक्कत हो रही है।  नोटबंदी के बाद से जनता ने अपने व्यवहार से यह साबित कर दिया कि वो कालाधन और भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए इन दिक्कतों को सहने के लिए तैयार है ।  जैसे जैसे समय बीत रहा है तो धीरे-धीरे दिक्कतें कम भी हो रही हैं । शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में बैंकों में कतार कम हो गई हैं । लोगों को पैसे मिलने लगे हैं । बैंक के गड़बड़ी फैलानेवाले कर्मचारियों पर कार्रवाई के बाद बैंकिंग सिस्टम की चूलें भी कस दी गई हैं । नोटबंदी के फैसले से जुड़े लोगों का मानना है कि वो बैंक कर्मचारियों की गड़बड़ी का अंदाजा नहीं लगा सके थे वर्ना जनता को इतनी दिक्कत भी नहीं होती । अब दूसरी बात ये भी उठाई जा रही है कि इससे अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा । संभव है कि बड़े अर्थशास्त्रियों के अपने तर्क हों लेकिन सरकार भी इस आसन्न खतरे से निबटने को लेकर सतर्क नजर आ रही है । एक आकलन के मुताबिक जनवरी से मार्च की तिमाही में इसका असर विकास दर पर पड़ सकता है लेकिन उसके अगली तिमाही से हालात बेहतर हो सकते हैं। जनता को होनेवाली दिक्कतों पर जितनी चर्चा हो रही है उसके अनुपात में श्रमिकों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को होनेवाले फायदे पर मंथन नहीं हो रहा है । जिन मजदूरों को नगद भुगतान पर सालों साल तक काम करना पड़ता था उनको अब चेक से भिगतान करना होगा । चेक से भुगतान करने की वजह से उन सबकी इंट्री बुक्स में करनी होगी । अब अगर मजदूरों की एंट्री बुक्स में होगी तो उनका भविष्य निधि खाता खुलवाना होगा और उसमें पैसे जमा करवाने होंगे । इसी तरह से उनको ईएसआई का लाभ भी देना होगा जो कि उनके परिवार के स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर है । अब हमें इंतजार करना चाहिए कि सरकार तीस दिसंबर के बाद क्या क्या कदम उठाती है । 

Saturday, December 24, 2016

सन्नाटे का सृजनात्मकता प्रदेश

वर्ष दो हजार सोलह बीतने को आया है । इस साल के तमाम बड़े-छोटे साहित्यक पुरस्कारों का एलान हो चुका है । साहित्य के लिए सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित माने जानेवाला पुरस्कार ज्ञानपीठ सम्मान इस बार बांग्ला के मशहूर कवि शंख घोष को देना की घोषणा की गई है । नामवर सिंह की अध्यक्षतावाली चयन समिति ने शंख घोष की कविताओं और उनके आलोचनात्मक लेखन पर विस्तार से मंथन करने के बाद उनको इस सम्मान के लिए उपयुक्त पाया। इसी तरह से साहित्य अकादमी के पुरस्कारों की घोषणा भी कर दी गई है । हिंदी के लिए उपन्यासकार नासिरा शर्मा को उनकी कृति पारिजात पर ये सम्मान देने का फैसला लिया गया है । इसके अलावा शब्द साधक शिखर सम्मान केदारनाथ सिंह को दिया जाएगा । हिंदी में छोटे-बड़े-मंझोले कुल मिलाकर सैकड़ों पुरस्कार हर साल दिए जाते हैं । इस बार भी दिए गए । पुरस्कारों के अलावा छिटपुट विवाद भीहुए लेकिन उन विवादों की जमीन साहित्यक कम राजनीति ज्यादा रही । नामवर सिंह के नब्बे साल पूरे होने के जश्न में गृह मंत्री और संस्कृति मंत्री की भागीदारी से लेकर आयोजन स्थल तक पर विरोध किया गया । हिंदी अकादमी के भाषादूत सम्मान में सम्मानित किए जानेवाले लेखकों को सूचित करने के बाद सूची बदलने पर विवाद हुआ । कवि अनिल जनविजय ने गगन गिल को लेकर एक अप्रिय विवाद फेसबुक पर उठाया । लेकिन इस बार किसी रचना तो लेकर कोई साहित्यक वाद-विवाद-संवाद नहीं हुआ ।  
हिंदी में जब भी साहित्यक कृतियों की बात होती है कविता, कहानी और उपन्यास पर सिमट कर रह जाती है । अन्य विधाओं की बात चलते चलते की जाती है । अगर हम वर्ष दो हजार सोलह को देखें तो इन विधाओं से इतर भी कई अच्छी किताबें छपकर आईं चर्चित हुईं और पाठकों ने भी उनको हाथों हाथ लिया । कई लेखकों ने लगभग अनछुए विषयों को उठाया और उसपर मुकम्मल किताब लिखी । साल के खत्म होते होते कवि और कला पर गंभीरता से लिखनेवाले यतीन्द्र मिश्र की किताब लता, सुर-गाथा (वाणी प्रकाशन) से छपकर आई । करीब छह सौ पन्नों की ये किताब यतीन्द्र मिश्र के सालों की मेहनत का परिणाम है । इस किताब में यतीन्द्र ने लता मंगेशकर की सुरयात्रा के उपर दो सौ पन्ने लिखे हैं और करीब चार सौ पन्नों में लता मंगेशकर से बातचीत है । लता मंगेशकर ने राजनीति से लेकर समाज, परिवार और अपने संघर्षों पर बेबाकी से उत्तर दिए हैं । सता मंगेशकर ने गायन से पहले समाज सेवा के क्षेत्र में जाने का मन बनाया था लेकिन वीर सावरकर उनसे कई दिनों तक बहस की और उनको इस बात के लिए राजी किया कि देश की सेवा संगीत के मार्फत भी हो सकती है । इस किताब में लता जी से जो सवाल पूछे हैं उसमें इनकी मेहनत दिखाई देती है ।  जैसे बॉलीवुड में कोई फिल्म साल की सबसे बड़ी हिट मानी जाती है उसी तरह से यतीन्द्र की ये किताब इस साल की सबसे बड़ी किताब कही जा सकती है । इसी तरह से युवा कथाकार इंदिर दांगी ने नाटक लिखकर इस विधा के सन्नाटे को तोड़ने की कोशिश की । उनका लिखा नाटक आचार्य ( किताबघर प्रकाशन) इस वर्ष पुस्तकाकार छपा ।
अब अगर हम उपन्यासों की बात करें तो कहानीकार और उपन्यासकार मनीषा कुलश्रेष्ठ ने अपने उपन्यास स्वप्नपाश (किताबघर प्रकाशन) में एकदम अछूते विषय पर कलम चलाई है । इस उपन्यास में मनीषा ने अपने पात्र गुलनाज के माध्यम से स्कीत्जनोफ्रेनिया नामक बीमारी को उठाया है । हिंदी के हमारे लेखक इस तरह के विषयों से दूर ही रहते हैं लेकिन मनीषा ने इस बंजर प्रदेश में प्रवेश कर मेहनत से उसके हर पहलू के रेशे-रेशे को अलग किया है । यह उपन्यास बदलते समय और समाज की हकीकत का दस्तावेज है । कुछ लोगों को इस उपन्यास के डिटेल्स को लेकर आपत्ति हो सकती है लेकिन वो विषय वस्तु की मांग के अनुरूप है । वरिष्ठ उपन्यासकार चित्रा मुद्गल का उपन्यास पोस्ट बॉक्स नं-203 नाला सोपारा(सामयिक प्रकाशन) भी ऐसे ही एक लगभग अनछुए विषय को केंद्र में रखकर लिखा गया है । किन्नरों की जिंदगी पर लिखे इस उपन्यास में चित्रा मुद्गल ने उस समुदाय की पीड़ा, संत्रास आदि को संवेदनशीलता के साथ सामने रखा है जो पाठकों को सोचने पर विवश कर देती है । चित्रा जी का ये उपन्यास एक लंबे अंतराल के बाद आया है लिहाजा इसको लेकर पाठकों में एक उत्सकुकता भी है । इन उपन्यासों के अलावा एक और उपन्यास ने पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा वो है युवा लेखक पंकज सुबीर का अकाल में उत्सव ( शिवना प्रकाशन ) । उस उपन्यास में लेखक ने अंत तक पठनीयता बनाए रखने में कामयाबी हासिल की है और उसका ट्रीटमेंट भी लीक से थोड़ा अलग हटकर है । जयश्री राय का उपन्यास दर्दजा ( वाणी प्रकाशन) और लक्ष्मी शर्मा के पहले उपन्यास सिधपुर की भगतणें ( सामयिक प्रकाशन) की भी चर्चा रही । बस्तर की नक्सल समस्या और उसकी जटिलताओं को केंद्र में रखकर लिखा टीवी पत्रकार ह्रदयेश जोशी का उपन्यास लाल लकीर (हार्पर कालिंस) में समांतर रूप से एक बेहतरीन प्रेमकथा भी साथ-साथ चलती है । इस उपन्यास को भी पाठकों ने पसंद किया । नई वाली हिंदी का दावा करने वाले प्रकाशक हिंद युग्म से कई किताबें आईं, बिक्री का भी दावा किया गया लेकिन अपनी पठनीयता को लेकर पर्याप्त चर्चा बटोरी सत्य व्यास के उपन्यास दिल्ली दरबार ने ।
हिंदी में कविता को लेकर बहुत कोलाहल है । कुंवर नारायण से लेकर शुभश्री तक कई पीढ़ियों के कवि इस वक्त सृजनरत हैं । पर इस कोलाहल में बहुधा यह सुनने को मिलता है कि कविता के पाठक कम हो रहे हैं, प्रकाशक कविता संग्रह छापने के लिए आसानी से तैयार नहीं होते हैं । अगर आप हिंदी के प्रकाशकों की वर्ष दो हजार सोलह की प्रकाशन सूची पर नजर डालेंगे तो ऐसा लगता है कि कविता संग्रह अपेक्षाकृत बहुत ही कम छपे । कहना ना होगा कि यह स्थिति साहित्य के लिए चिंताजनक है, बावजूद इसके वर्ष दो हजार सोलह में कविता की कई किताबें छपीं । जिस कविता संग्रह ने पाठकों और आलोचकों का सबसे अधिक ध्यान खींचा वह है वरिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई का भीजै दास कबीर (वाणी प्रकाशन ) ।अशोक वाजपेयी का कविता संग्रह नक्षत्रहीन समय में’ (राजकमल प्रकाशन) से छपी लेकिन इस संग्रह को अपेक्षित चर्चा नहीं मिल पाई । इसके अलावा विनोद भारद्वाज, दिविक रमेश, कात्यायनी की कविताएं भी पुस्तकाकार प्रकाशित हुईं । युवा कवि चेतन कश्यप का दूसरा संग्रह एक पीली नदी हरे पाटों के बीच बहती हुई (प्रकाशन संस्थान) ने भी कविता प्रेमियों का ध्यान खींचा । उपेन्द्र कुमार ने महाभारत को केंद्र में रखकर इंद्रप्रस्थ (अंतिका प्रकाशन) की रचना की । जिसके बारे में कवि मदन कश्यप ने लिखा है कि यह कृति महाभारत की अशेष सृजनात्मकता को प्रमाणित करती है ।
कहानी संग्रहों को लेकर हिंदी जगत में खास उत्साह देखने को नहीं मिला । कहा तो यहां तक गया कि हिंदी कहानी भी कविता की राह पर चलने लगी है । पत्र-पत्रिकाओं में इतनी फॉर्मूलाबद्ध कहानियां छपीं कि पाठक निराश होने लगे जिसका असर कहानी संग्रहों की बिक्री पर पड़ा । अवधेश प्रीत का कहानी संग्रह चांद के पार चाभी ( राजकमल प्रकाशन) हलांकि दो हजार पंद्रह के दिसंबर में पटना पुस्तक मेले में विमोचित हुई थी लेकिन पूरे साल इस संग्रह की चर्चा होती रही । अवधेश प्रीत के अलावा रजनी मोरवाल का कुछ तो बाकी है...( सामयिक प्रकाशन) की चर्चा रही ।
अनुवाद के लिहाज से ये साल बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता है । सालभर अनूदित किताबों पर बहस चलती रही लेकिन साहित्य अकादमी ने कुछ अच्छी किताबों का अनुवाद अवश्य छापा । डी एस राव की किताब फाइव डिकेड्स का पांच दशक के नाम से भारत भारद्वाज ने अनुवाद किया । साहित्य अकादमी के इतिहास में रुचि रखनेवालों के लिए यह महत्वपूर्ण किताब है । इसी तरह से ओड़िया लेखक शरत कुमार महांति की गांधी की जीवनी का हिंदी अनुवाद गांधी मानुष’ (साहित्य अकादमी) के नाम से सुजाता शिवेन ने किया । सुजाता शिवेन उन चंद अनुवादकों में से हैं जो ओड़िया की अहम किताबों का हिंदी में अनुवाद कर रही हैं । श्रीकृष्ण पर लिखा रमाकांत रथ का खंडकाव्य श्री पातालक का अनुवाद श्रीरणछोड़ ( साहित्य अकादमी) से प्रकाशित हुई । चीनी लेखक ह च्येनमिंङ की किताब का हिंदी अनुवाद जनता का सचिव, पीपुल्स पार्टी में भ्रष्टाचार से जंग (प्रकाशन संस्थान) भी आंखे खोलनेवाला है । इस किताब से चीन की हकीकत का खुलासा होता है । इसका अनुवाद अरुण कुमार ने किया है । एक और किताब जिसने पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा वह है वरिष्ठ उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल की स्मृति कथा पकी जेठ का गुलमोहर (वाणी प्रकाशन) । इस स्मृति कथा में मेवात अपनी पूरी जीवंतता के साथ उपस्थित है । शायर मुनव्वर राना की आत्मकथा का पहला खंड- मीर आ के लौट गया(वाणी प्रकाशन) भी प्रकाशित हुआ है । शायर अनिरुद्ध सिन्हा के गजलों का संग्रह तो गलत क्या किया(मीनाक्षी प्रकाशन) से छप कर आया है । कुळ मिलाकर अगर हम देखें तो सैकड़ों किताबों के छपने के बावजूद परिदृश्य संतोषजनक नहीं लगता ।

सृजनात्मकता का लेखा-जोखा

हिंदी में जब भी साहित्यक कृतियों की बात होती है कविता, कहानी और उपन्यास पर सिमट कर रह जाती है । अन्य विधाओं की बात चलते चलते हो जाती है । अगर हम वर्ष दो हजार सोलह को देखें तो इन विधाओं से इतर भी कई अच्छी किताबें छपकर आईं चर्चित हुईं और पाठकों ने भी उनको हाथों हाथ लिया । कई लेखकों ने लगभग अनछुए विषयों को उठाया और उसपर मुकम्मल किताब लिखी । साल के खत्म होते होते कवि और कला पर गंभीरता से लिखनेवाले यतीन्द्र मिश्र की किताब लता, सुर-गाथा (वाणी प्रकाशन) से छपकर आई । करीब छह सौ पन्नों की ये किताब यतीन्द्र मिश्र के सालों की मेहनत का परिणाम है । इस किताब में यतीन्द्र ने लता मंगेशकर की सुरयात्रा के उपर दो सौ पन्ने लिखे हैं और करीब चार सौ पन्नों में लता मंगेशकर से बातचीत है । लता मंगेशकर ने राजनीति से लेकर समाज, परिवार और अपने संघर्षों पर बेबाकी से उत्तर दिए हैं । जैसे बॉलीवुड में कोई फिल्म साल की सबसे बड़ी हिट मानी जाती है उसी तरह से यतीन्द्र की ये किताब इस साल की सबसे बड़ी किताब कही जा सकती है । कहानीकार और उपन्यासकार मनीषा कुलश्रेष्ठ ने अपने उपन्यास स्वप्नपाश (किताबघर प्रकाशन) में एकदम अछूते विषय पर कलम चलाई है । इस उपन्यास में मनीषा ने अपने पात्र गुलनाज के माध्यम से स्कीत्जनोफ्रेनिया नामक बीमारी को उठाया है । हिंदी के हमारे लेखक इस तरह के विषयों से दूर ही रहते हैं लेकिन मनीषा ने इस बंजर प्रदेश में प्रवेश कर मेहनत से उसके हर पहलू के रेशे-रेशे को अलग किया है । यह उपन्यास बदलते समय और समाज की हकीकत का दस्तावेज है । कुछ लोगों को इस उपन्यास के डिटेल्स को लेकर आपत्ति हो सकती है लेकिन वो विषय वस्तु की मांग के अनुरूप है । वरिष्ठ उपन्यासकार चित्रा मुद्गल का उपन्यास पोस्ट बॉक्स नं-203 नाला सोपारा(सामयिक प्रकाशन) भी ऐसे ही एक लगभग अनछुए विषय को केंद्र में रखकर लिखा गया है । किन्नरों की जिंदगी पर लिखे इस उपन्यास में चित्रा मुद्गल ने उस समुदाय की पीड़ा, संत्रास आदि को संवेदनशीलता के साथ सामने रखा है जो पाठकों को सोचने पर विवश कर देती है । चित्रा जी का ये उपन्यास एक लंबे अंतराल के बाद आया है लिहाजा इसको लेकर पाठकों में एक उत्सकुकता भी है । इन उपन्यासों के अलावा एक और उपन्यास ने पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा वो है युवा लेखक पंकज सुबीर का अकाल में उत्सव ( शिवना प्रकाशन ) । उस उपन्यास में लेखक ने अंत तक पठनीयता बनाए रखने में कामयाबी हासिल की है और उसका ट्रीटमेंट भी लीक से थोड़ा अलग हटकर है । जयश्री राय का उपन्यास दर्दजा ( वाणी प्रकाशन)            और लक्ष्मी शर्मा के पहले उपन्यास सिधपुर की भगतणें ( सामयिक प्रकाशन) की भी चर्चा रही । बस्तर की नक्सल समस्या और उसकी जटिलताओं को केंद्र में रखकर लिखा टीवी पत्रकार ह्रदयेश जोशी का उपन्यास लाल लकीर (हार्पर कालिंस) में समांतर रूप से एक बेहतरीन प्रेमकथा भी साथ-साथ चलती है ।
हिंदी में कविता को लेकर बहुत कोलाहल है । कुंवर नारायण से लेकर शुभश्री तक कई पीढ़ियों के कवि इस वक्त सृजनरत हैं । पर इस कोलाहल में बहुधा यह सुनने को मिलता है कि कविता के पाठक कम हो रहे हैं, प्रकाशक कविता संग्रह छापने के लिए आसानी से तैयार नहीं होते हैं । कहना ना होगा कि यह स्थिति साहित्य के लिए चिंताजनक है, बावजूद इसके वर्ष दो हजार सोलह में दर्जनों कविता की किताबें छपीं । जिस कविता संग्रह ने पाठकों और आलोचकों का सबसे अधिक ध्यान खींचा वह है वरिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई का भीजै दास कबीर (वाणी प्रकाशन ) ।अशोक वाजपेयी का कविता संग्रह नक्षत्रहीन समय में’ (राजकमल प्रकाशन) से छपी लेकिन इस संग्रह को अपेक्षित चर्चा नहीं मिल पाई । इसके अलावा विनोद भारद्वाज, दिविक रमेश, कात्यायनी की कविताएं भी पुस्तकाकार प्रकाशित हुईं । युवा कवि चेतन कश्यप का दूसरा संग्रह एक पीली नदी हरे पाटों के बीच बहती हुई (प्रकाशन संस्थान) ने भी कविता प्रेमियों का ध्यान खींचा । उपेन्द्र कुमार ने महाभारत को केंद्र में रखकर इंद्रप्रस्थ (अंतिका प्रकाशन) की रचना की । जिसके बारे में कवि मदन कश्यप ने लिखा है कि यह कृति महाभारत की अशेष सृजनात्मकता को प्रमाणित करती है । नाटक तो कम ही लिखे गए लेकिन इंदिरा दांगी लिखित नाटक आचार्य(किताबघर प्रकाशन) की जमकर चर्चा हुई ।  कहानी संग्रहों को लेकर हिंदी जगत में खास उत्साह देखने को नहीं मिला । कहा तो यहां तक गया कि हिंदी कहानी भी कविता की राह पर चलने लगी है । पत्र-पत्रिकाओं में इतनी फॉर्मूलाबद्ध कहानियां छपीं कि पाठक निराश होने लगे जिसका असर कहानी संग्रहों की बिक्री पर पड़ा । अवधेश प्रीत का कहानी संग्रह चांद के पार चाभी ( राजकमल प्रकाशन) के अलावा रजनी मोरवाल का कुछ तो बाकी है...( सामयिक प्रकाशन) की चर्चा रही ।
अनुवाद के लिहाज से ये साल बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता है । सालभर अनूदित किताबों पर बहस चलती रही लेकिन साहित्य अकादमी ने कुछ अच्छी किताबों का अनुवाद अवश्य छापा । डी एस राव की किताब फाइव डिकेड्स का पांच दशक के नाम से भारत भारद्वाज ने अनुवाद किया । साहित्य अकादमी के इतिहास में रुचि रखनेवालों के लिए यह महत्वपूर्ण किताब है । इसी तरह से ओड़िया लेखक शरत कुमार महांति की गांधी की जीवनी का हिंदी अनुवाद गांधी मानुष’ (साहित्य अकादमी) के नाम से सुजाता शिवेन ने किया । सुजाता शिवेन उन चंद अनुवादकों में से हैं जो ओड़िया की अहम किताबों का हिंदी में अनुवाद कर रही हैं । श्रीकृष्ण पर लिखा रमाकांत रथ का खंडकाव्य श्री पातालक का अनुवाद श्रीरणछोड़ ( साहित्य अकादमी) से प्रकाशित हुई । चीनी लेखक ह च्येनमिंङ की किताब का हिंदी अनुवाद जनता का सचिव, पीपुल्स पार्टी में भ्रष्टाचार से जंग (प्रकाशन संस्थान) भी आंखे खोलनेवाला है । इस किताब से चीन की हकीकत का खुलासा होता है । इसका अनुवाद अरुण कुमार ने किया है । एक और किताब जिसने पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा वह है वरिष्ठ उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल की स्मृति कथा पकी जेठ का गुलमोहर (वाणी प्रकाशन) । इस स्मृति कथा में मेवात अपनी पूरी जीवंतता के साथ उपस्थित है । शायर मुनव्वर राना की आत्मकथा का पहला खंड- मीर आ के लौट गया(वाणी प्रकाशन) भी प्रकाशित हुआ है । शायर अनिरुद्ध सिन्हा के गजलों का संग्रह तो गलत क्या किया(मीनाक्षी प्रकाशन) से छप कर आया है ।

विवादों से छीजती मर्यादा

साहित्य में विवादों की लंबी परंपरा रही है, कई बार साहित्यक सवालों को लेकर मुठभेड़ होती है तो कई बार विचारधारा की टकराहट देखने को मिलती है तो कई बार लेखकों के बीच आरोप प्रत्यारोपों से मर्यादा की रेखा मिटती नजर आती है । वर्ष दो हजार सोलह भी इन साहित्यक विवादों से अछूता नहीं रहा । पिछले साल सबसे बड़ा विवाद उठा नामवर सिंह के नब्बे साल होने के मौके पर दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में दिनभर का जश्न और मंच पर गृह मंत्री राजनाथ सिंह और महेश शर्मा की उपस्थिति । प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव ने बयान जारी कर नामवर सिंह के कृत्यों से प्रलेस को अलग कर लिया । इसी तरह का एक विवाद कृष्णा सोबती पर केंद्रित युवा लेखिका, फोटग्राफर कायनात काजी की किताब के विमोचन के मौके पर हुआ । विमोचन कार्यक्रम के कार्ड पर सचिदानंद जोशी और विजयक्रांति का नाम देखकर कृष्णा जी ने लेखिका को विमोचन नहीं करने का दबाव बनाया और कार्यक्रम रद्द हो गया ।  कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी का काव्यपाठ के आमंत्रण पत्र पर प्रगतिशील लेखक संघ के आयोजक के रूप में नाम छपने को लेकर भी विवाद उठा था ।
दिल्ली की हिंदी अकादमी ने हिंदी दिवस के मौके पर सोशल मीडिया पर हिंदी के प्रचार प्रसार और उत्कृष्ट कार्य के लिए सक्रिय नौ शख्सियतों को भाषादूत सम्मान देने का एलान किया । लेखकों के नाम को लेकर भ्रम की स्थिति बनी अकादमी ने पहले कुछ लेखकों को पुरस्कृत होने की सूचना दी और बाद में खेद प्रकट किया । इसको लेकर खूब हो हल्ला मचा । मैत्रेयी पुष्पा से इस्तीफे की मांग भी उठी थी । इसी तरह से उत्तर प्रदेश सरकार के थोक में बंटे यश भारती पुरस्कार को लेकर भी साहित्य जगत उद्वेलित हुआ था । पुरस्कार वापसी के अगुवा अशोक वाजपेयी को बिहार सरकार ने विश्व कविता सम्मेलन आयोजित करनेवाली कमेटी में मनोनीत किया तो इसको पुरस्कार वापसी के पुरस्कार के तौर पर देखा गया । हलांकि इस विवाद के उठने के बाद से विश्व कविता सम्मेलन का आयोजन ठंडे बस्ते में जाता दिख रहा है । अशोक वाजपेयी ने दिल्ली में अखिल भारतीय युवा लेखक सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें प्रतिभागियों की उम्र को लेकर सोशल मीडिया पर विवाद का धुंआ उठा था ।इसी तरह से एक और बड़ा विवाद व्हाट्सएप के जरिए उठा । व्हाट्सएप पर वायरल एक आडियो क्लिप में प्रभु जोशी ये कहते सुने गए कि भालचंद्र जोशी के लिए कहानियां वो लिखा करते थे । जिसका भालचंद्र ने लेख लिखकर प्रतिवादद किया ।  साहित्यक पत्रिकाओं में भी इस विवाद पर जमकर लिखा गया ।
कुछ अप्रिय विवाद फेसबुक पर भी उठे । मास्को में रह रहे अनिल जनविजय ने फेसबुक पर पोस्ट लिखकर सनसनी फैलाने की कोशिश की कि वरिष्ठ कवयित्री गगन गिल के लिए वो कविताएं लिखा करते थे । जनविजय ने उससे भी आगे जाकर व्यक्तिगत बातें लिखी जिसके समर्थन में दो एक लेखक आए लेकिन जब महिला ब्रिगेड ने जनविजय पर हमला बोला तो वो बैकफुट पर आ गए । गगन गिल फेसबुक पर नहीं हैं पर उनके हवाले से जब ये बात फेसबुक पर आई कि वो इस मसले में कानूनू कार्रवाई कर सकती हैं तो जनविजय बैकफुट पर आ गए । इस तरह के गैर साहित्यक विवाद फेसबुक पर उठते रहते हैं जिनमें लेखकीय मर्यादा तार-तार होती रहती है । फेसबुक पर कुछ भी लिख ने की अराजक आजादी ने विचारधारा की टकराहट की आड़ में लेखकों ने एक दूसरे पर हमले किए जिनमें बहुधा लक्ष्मण रेखा लांघी गई ।


बिछड़े सभी बारी बारी...

वर्ष दो हजार सोलह बीतने को है, विमर्श के कोलाहल के बीच साहित्य, संस्कृति और कला के दिग्गजों के निधन से अपूरणीय क्षति हुई । साल के शुरुआत में ही कथाकार और संपादक रवीन्द्र कालिया का छिहत्तर साल की उम्र में निधन हो गया । कालिया जी की कहानियों ने अपने समय में सार्थक हस्तक्षेप किया था । उनकी किताब गालिब छुटी शराब धर्मवीर भारती की गुनाहों के देवता के बाद हिंदी में सबसे ज्यादा बिकनेवाली किताबों में से है । कालिया जी के निधन से साहित्य जगत उबरा भी नहीं था कि निदा फाजली के निधन की खबर आई थी । निदा फाजली ने शायरी को उर्दू और फारसी की गिरफ्त से आजाद कर आम लोगों तक पहुंचाया । ताउम्र निदा हिंदी और उर्दू के बीच की खाई को पाटने में लगे भी रहे । निदा के बाद काल के क्रूर हाथों ने हमसे उर्दू के सबसे बड़े कहानीकारों में एक जोगेन्द्र पॉल को छीन लिया । जोगेन्द्र पॉल के तेरह से अधिक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें खुला, खोदू बाबा का मकबरा और बस्तिआन शामिल हैं । कहानियों के अलावा पॉल ने कई उपन्यास भी लिखे जिनमें से एक बूंद लहू की खासी चर्चित रही है । पॉल की ज्यादातर किताबें हिंदी में भी अनूदित हैं ।
साल 2016 में हिंदी के मशहूर लेखक मुद्राराक्षस का भी निधन हुआ । विचारों से मार्क्सवादी-लेनिनवादी मुद्राराक्षस ताउम्र अपनी विचारधारा को लेकर मजबूती से साहित्य और समाजकी जमीन पर डटे रहे । बांग्ला की प्रख्यात साहित्यकार महाश्वेता देवी भी इस साल अपनी महायात्रा पर निकल गईं । महाश्वेता देवी ने हजार चौरासी की मां, अरण्येर अधिकार, झांसीर रानी, अग्निगर्भा जैसी मशहूर कृतियां रचीं । उनको ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, रोमन मैगसेसे अवॉर्ड के अलावा पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया था । पंजाबी के मशहूर कथाकार गुरदयाल सिंह भी इस वर्ष हमसे जुदा हो गए ।उनका उपन्यास मरही दे दीवा पंजाबी साहित्य में बेहद लोकप्रिय है और इस उपन्यास ने ही उनको उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठा दिलाई । इनके उपन्यासों पर फिल्में भी बनी हैं । गुरदयाल सिंह को उनके लेखन के लिए प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला था ।मलयालम के मशहूर कवि ओ वी एन कुरुप का निधन भी साहित्य के लिए बड़ा झटका था । यशस्वी संपादक और लेखक प्रभाकर श्रोत्रिय भी इस दुनिया को छोड़कर चले गए । प्रभाकर श्रोत्रिय ने अपने संपादन से युवा लेखकों की पहचान कर उनको संस्कारित किया । पूरब के प्रेमचंद कहे जानेवाले विवेकी राय भी इस साल हमसे बिछुड़ गए । उनकी रचनाओं में गांव अपने समग्र परिवेश के साथ उपस्थित रहता था । इनके ललित निबंध हिंदी साहित्य की थाती हैं । विवेकी राय के अलावा हाल ही में उपन्यासकार ह्रदयेश का भी निधन हुआ । ह्दयेश हिंदी के उन चंद लेखकों में थे जो खामोशी के साथ बगैर किसी शोर-शराबे के लेखन में जुटे रहते थे । उनके दस के करीब उपन्यास और दर्जनभर कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं ।
सैयद हैदर रजा के निधन से कला क्षेत्र को बड़ा नुकसान हुआ । सैयद हैदर रजा रंगों के माध्यम से भारतीय मिथकों के प्रतीकों का अपने चित्रों में इस्तेमाल करते हैं । इसी साल मशहूर तबला वादक और गायक लच्छू महाराज भी हमें छोड़कर चले गए । मशहूर कलाकार और पद्मविभूषण से सम्मानित के जी सुब्रह्मण्य भी इस साल हमसे बिछड़ गए । इस साल पत्रकारिता को भी एक बड़ा झटका लगा जब वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर का निधन हो गया । दिलीप उन संपादकों में थे जो इस संस्था की गरिमा और साख बचाने के लिए अंतिम समय तक संघर्षरत रहे ।