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Saturday, February 21, 2026

साहित्य से छंटती विवादों की धुंध


इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर उपभोक्ताओं के व्यतीत किए जानेवाले समय को लेकर इन दिनों खूब चर्चा हो रही है। इन प्लेटफार्म्स की सार्थकता को लेकर पक्ष विपक्ष के तर्क सामने आते रहते हैं। फेसबुक से लेकर एक्स और इंस्टा जैसे प्लेटफार्म पर डाली जानेवाली सामग्री चर्चा कें केंद्र में रहती है। हिंदी साहित्य के अधिकतर लोग फेसबुक पर अपनी मन की बात लिखते हैं। कोई पुस्तकों के बारे में बताता है तो कोई वैचरिक वातें करता है। कुछ कवि अपनी कविताओं का पाठ करके वीडियो फेसबुक पर डालते हैं। स्मार्ट फोन का चलन बढ़ने से और फोन के कैमरे की क्वालिटी बेहतर होने से वीडियो पोस्ट करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। कई बार फेसबुक पर इतिहास की घटनाओं की जानकारी भी मिल जाती है। कोई चर्चित साहित्यिक प्रसंग और उसपर हुई चर्चा भी अचानक आपके सामने आ जाती है। पिछले दिनों फेसबुक पर स्क्रोल करते समय एक ऐसे ही विवादित प्रंसग की जानकारी मिली। नामवर सिंह और उनके अनुज काशीनाथ सिंह की टिप्पणी और उसपर महाश्वेता देवी का प्रतिकार। ये पोस्ट कोलकाता से निकलनेवाली पत्रिका लहक के संपादक निर्भय देव्यांश की थी। इस पोस्ट में नामवर सिंह और काशीनाथ सिंह के बयान की चर्चा थी।  उक्त पोस्ट में लिखा था कि लखनऊ में एक पत्रिका के कार्यक्रम में नामवर सिंह ने साहित्यकारों की हैसियत सत्ता के समक्ष कांता यानि जोरू जैसी बताया। वहीं उनके कहानीकार भाई काशीनाथ सिंह ने कहा था कि साहित्यकार गांव के सिवान पर मुंह ऊपर उठाकर भूंकता हुआ कुकूर है। इसी पोस्ट के नीचे बांग्ला की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी की अंग्रेजी में लिखी हस्तलिखित प्रतक्रिया थी। जिसका अनुवाद है, मैं यह जानकर बहुत आहत हुई कि सम्मानित लेखक नामवर सिंह ने कहा है कि आज के लेखक सत्ता के समझ लार टपकानेवाले कुत्ते हैं, वे रखैल और जोरू की तरह हैं। उनके छोटे भाई भी उनके इस बयान से सहमत हैं। महाश्वेता देवी ने लिखा कि 29.4.2012 के समाचारपत्र में प्रकाशित समाचार को पढ़कर उनका दिल टूट गया। उन्होंने आगे लिखा कि वो बचपन से ही एक ऐसे भारत में विश्वास करती हैं जिसमें हिंदी, बांग्ला, मराठी, गुजराती, उर्दू व अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य का साझा विकास हो। यह संपदा सिर्फ भारत के पास है। महाश्वेता देवी ने अपनी हस्तलिखित नोट पर 4 मई 2012 की तिथि अंकित की थी। 

नामवर सिंह और काशीनाथ सिंह ने अगर इस तरह का बयान दिया था, महाश्वेता जी के पत्र से तो यही लगता है, तो यह बेहद आपत्तिजनक था साथ ही महिला और साहित्यकार विरोधी भी। हिंदी के शीर्ष आलोचक और प्रमुख कथाकार अगर अपने साथी लेखकों के बारे में इस तरह की बातें करेंगे तो अन्य भाषा के साहित्यकारों की बीच हिंदी जगत की क्या छवि बनी होगी। इस बात की कल्पना की जा सकती है। दरअसल हिंदी में ये देखा जाता है कि जो साहित्यकार शीर्ष पर पहुंच जाते हैं वो अपने साथी साहित्यकारों को हेय दृष्टि से देखने लगते हैं। उनका श्रेष्ठता बोध उनको अहंकारी बना देता है। अशोक वाजपेयी से लेकर रवीन्द्र कालिया तक इसके शिकार रहे हैं। राजेन्द्र यादव इसके अपवाद रहे हैं। वो लेखकों पर तीखा हमला करते थे, नाम लेकर करते थे, लेकिन कभी भी वो समान्यीकरण के शिकार नहीं होते थे। वो इस तरह की गर्वोक्ति नहीं कहते थे कि हिंदी के लेखकों को हवाई जहाज पर मैंने चढ़ाया। जब मैंने निर्भय की फेसबुक वाल पर ये पोस्ट देखी तो मुझे दशकों पहले एक चैनल पर करीब 20 वर्ष हुई परिचर्चा का स्मरण हो उठा। इस परिचर्चा में रवीन्द्र कालिया, ज्ञानरंजन, मैनेजर पांडे, विभूति नारायण राय, संतोष भारतीय,अखिलेश और मैंने हिस्सा लिया था। चर्चा का विषय था हिंदी साहित्य में विवादों का गिरता स्तर। हिंदी साहित्य में विवादों के स्तर पर होते हुई चर्चा साहित्य के सत्ता केंद्रों तक पहुंच गई। संतोष भारतीय ने रवीन्द्र कालिया से दिल्ली के साहित्यिक मठाधीश के बारे में जानना चाहा।  रवीन्द्र कालिया ने चर्चा का रुख मेरी तरफ मोड़ते हुए कहा था कि अनंत उन मठाधीशों को जानते हैं। अनंत उनको साहित्य का ब्रह्मा विष्णु महेश कहते हैं। मैं उन्हें ऐसा नहीं मानता बल्कि मैं उन तीनों को साहित्य का कफ, पित्त और वात कहता हूं। चर्चा में शामिल सभी लोगों को पता था कि कालिया जी नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी और राजेन्द्र यादव के बारे में बोल रहे थे। आज से करीब तीस वर्ष या उसके भी पहले हिंदी साहित्य में नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी और राजेन्द्र यादव की तूती बोलती थी। नामवर सिंह नियमित अंतराल पर विवादित बयान देते रहते थे। कई बार उन बयानों से लक्षित साहित्यकार या साहित्य समूह आहत भी होते थे। उनके विरुद्ध प्रदर्शन आदि भी होते थे। नरेन्द्र कोहली जी तो जीवनपर्यंत नामवर सिंह के आलोचक रहे और साहित्य को समग्रता में नहीं देखने की प्रवृत्ति के प्रवर्तक भी मानते रहे। अपनी विचारधारा के औसत लेखकों को बढ़ावा देनेवाले और विपरीत विचारधारा वाले लेखकों को हाशिए पर रखनेवाले मठाधीश।

एक बार फिर लौटते हैं नामवर और काशीनाथ सिंह के उक्त बयान पर जिसमें साहित्कारों पर अपमानजनक टिप्पणी की गई। उस टिप्पणी से दोनों भाइयों की मानसिकता का भी संकेत मिलता है। महाश्वेता देवी ने बहुत सधे हुए तरीके से अपनी प्रतिक्रिया दी थी। उस समय फेमिनिज्म का इतना जोर नहीं था अन्यथा नामवर सिंह के कथन पर उनकी जमकर आलोचना होती। प्रश्न ये उठता है कि साहित्य में इस तरह की टिप्पणियां शीर्ष पर माने जानेवाले साहित्यकार क्यों करते थे। दरअसल नामवर सिंह जिस कथित प्रगतिशील विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे उसमें महिलाओं को लेकर एक विचित्र भाव था। नामवर सिंह की उक्त टिप्पणी पर याद पड़ता है शायर कैफी आजमी की पत्नी शौकत कैफी से जुड़ा एक प्रसंग। शौकत कैफी ने अपनी किताब ‘यादों की रहगुजर’ में लिखा है कि शादी के बाद वो मुंबई (तब बांबे) में एक कम्यून में रहती थीं। उनको एक बेटा हुआ जो टी बी के कारण काल के गाल में समा गया। शौकत पूरी तरह से टूट गई थीं। दुख से उबरने की कोशिश में उनको पता चला कि वो फिर से मां बनने वाली हैं। अपनी इस खुशी को शौकत ने कम्यून में साझा की । तब शौकत कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले चुकी थी। पार्टी को जब इसका पता चला तो पार्टी ने शौकत से गर्भ गिरा देने का फरमान जारी किया। ये कैसी अमानवीय विचारधारा है। महिलाओं को लेकर कितना असंवेदनशील रवैया। हिंदी के शीर्ष आलोचक नामवर सिंह उसी विचारधारा के लंबे समय तक ध्वजवाहक रहे थे।  

हिंदी में विवादों की एक लंबी परंपरा रही है लेकिन साहित्यिक सत्ता में जब से मठाधीशी आरंभ हुई तब से व्यक्तिगत टिप्पणियां अधिक होने लगी। व्यक्ति केंद्रित कहानियां पहले से अधिक लिखी जाने लगी। हंस पत्रिका के पुनर्प्रकाशन के बाद इस प्रवृत्ति को मंच मिला। उदय प्रकाश ने कई ऐसी कहानियां लिखीं जिसके केंद्र में साहित्यकार लेखक थे। अशोक वाजपेयी ने साथी लेखकों पर कई व्यक्तिगत टिप्पणियां कीं। नामवर जी को अचूक अवसरवादी कहा। आज कम से उस तरह के विवाद साहित्य जगत में नहीं हैं। अपमानित करने की मंशा से होनेवाले विवादों का धुंध झंट सा गया लगता है।              


Saturday, September 4, 2021

पाठ्यक्रम बदलाव पर बेवजह विवाद


देशभर के विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम में नियमित अंतराल पर बदलाव होते रहते हैं। विभाग विशेष की अनुशंसा पर विद्या परिषद (अकेडमिक काउंसिल) बदलाव को स्वीकार करते हुए मंजूरी देती है। नियमानुसार साल में दो बार विद्या परिषद की बैठक आवश्यक है। मोटे तौर पर विश्वविद्लाय दो या तीन साल में अपने पाठ्यक्रमों में बदलाव करते हैं। इसके पीछे उद्देश्य ये रहता है कि छात्रों में नई प्रवृत्तियों से परिचित करवाया जा सके। इसको इस तरह से भी समझा जा सकता है कि किसी विषय में कोई नया शोघ हुआ हो तो उससे छात्रों का परिचय हो सके। अगर साहित्य से जुड़े विषयों की बात करें तो लेखन की नई प्रवृत्तियों से छात्रों का परिचय तभी संभव होता है जब पाठ्यक्रम में उस नई प्रवृत्ति को शामिल किया जाए। अभी दिल्ली विश्विद्यालय ने अंग्रेजी के पाठ्यक्रम में बदलाव किया है और महाश्वेता देवी समेत कुछ अन्य लेखकों की रचनाओं को हटा कर दूसरे लेखकों की रचनाओं को स्थान दिया गया है। इसपर विवाद खड़ा किया जा रहा है। विवाद की वजह रचना नहीं बल्कि उससे इतर है। इसको विचारधारा के आधार पर विवादित करने का प्रयास आरंभ हो गया है। कुछ वामपंथी विचारधारा के समर्थक लेखक और स्तंभकार इसको केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जोड़कर देखने लगे हैं। उनको लगता है कि महाश्वेता देवी की रचना को पाठ्यक्रम से हटाने के पीछे हिंदुत्ववादी विचारधारा के लोग हैं। जबकि ये एक सामान्य प्रक्रिया है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से महाश्वेता देवी की कहानी द्रोपदी को हटाया गया है। इसके बारे में विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने अपना पक्ष रखा है। ये कहानी एक आदिवासी महिला और उसके संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमती है। महाश्वेता देवी की रचना को पाठ्यक्रम से हटाने के फैसले की आलोचना करनेवाले ये तर्क भी दे रहे हैं कि महाश्वेता जी ने जीवन भर समाज के हाशिए के लोगों के लिए संघर्ष किया। उन्होंने उन लोगों के हितों की रक्षा के लिए आंदोलनों में भी हिस्सेदारी की। यह कहानी भी उसी वर्ग पर लिखी गई है, इसलिए इसको हटाना अनुचित है । यह ठीक बात है कि उन्होंने समाज के वंचित वर्गों के लिए संघर्ष किया, पर अब समय बदल गया है। क्या पाठ्यक्रम को बदलते हुए समय के साथ नहीं बदला जाना चाहिए। महाश्वेता देवी समादृत लेखिका रही हैं। उनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है। भारत सरकार ने उनको पद्मविभूषण से भी सम्मानित किया है। इसके आधार पर अगर पाठ्यक्रम में उनकी रचना को रखने को फैसला होता है तो फिर उनके अन्य क्रियाकलापों पर भी विचार करना चाहिए और समग्र मूल्यांकन के आधार पर फैसला होना चाहिए। महाश्वेता देवी पर माओवादियों को हिंसा के लिए उकसाने का आरोप भी है। बात 1997 की है, तब बिहार में जातीय संघर्ष चरम पर था। जातीय हिंसा में लोग मारे जा रहे थे। 1997 के एक दिसंबर को लक्ष्मणपुर बाथे में नरसंहार हुआ। रणवीर सेना पर उस नरसंहार का आरोप लगा था। इसके बाद 27 दिसंबर 1997 को महाश्वेता देवी ने एक हस्तलिखित अपील जारी की थी। उस अपील में माओवादियों से बिहार में हुए इस नरसंहार का बदला लेने का आह्वान किया गया था। उस वक्त बदले का आह्वान करके महाश्वेता देवी साफ-साफ हिंसा के लिए उकसा रही थीं। इस तरह हिंसा के लिए उकसाना वर्ग शत्रुओं के सफाए की विचारधारा का अनुयायी ही कर सकता है। जिसकी भी संविधान में आस्था हो और जो सार्वजनिक जीवन में हो वो किसी नरसंहार के लिए बदला लेने की बात करे तो यह उसकी सोच को दर्शाता है। बदले के इस आह्वान का कितना असर हुआ ये नहीं पता लेकिन उनकी अपील के 15 महीने बाद मार्च, 1999 में बिहार के जहानाबाद जिले के सेनारी में माओवादियों ने एक नरसंहार को अंजाम दिया। तब महाश्वेता देवी से किसी ने सवाल नहीं पूछा ना ही उनके खिलाफ माओवादियों को उकसाने का कोई केस दर्ज किया। जब भी महाश्वेता देवी का मूल्यांकन होगा तो उनके इस हस्तलिखित पत्र का उल्लेख जरूर होगा क्योंकि बगैर समग्रता के उचित मूल्यांकन संभव नहीं है। जो लोग इस आधार पर महाश्वेता देवी की रचना को पाठ्यक्रम से हटाने का विरोध कर रहे हैं कि वो एक बड़ी और सम्मानित लेखिका थीं, उनको भी महाश्वेता के उपरोक्त पक्ष पर विचार करना चाहिए।

पाठ्यक्रम में बदलाव का फैसला न तो विचारधारा के आधार पर होना चाहिए, न ही लेखक की ख्याति के आधार पर और न ही किसी को खुश करने के लिए। स्वाधीनता के बाद से इस देश में जिस तरह शिक्षा के क्षेत्र में विचारधारा को प्राथमिकता देकर उसका राजनीतिकरण किया गया उसने छात्रों का बहुत नुकसान किया। शिक्षण प्रणाली का भी। शिक्षा को राजनीति का अखाड़ा नहीं बनाना चाहिए न ही पाठ्यक्रमों को तय करते समय लेखकों की विचारधारा के आधार पर फैसला लिया जाना चाहिए। पाठ्यक्रमों के बारे में निर्णय लेते समय छात्रों के हितों को सर्वोपरि रखना चाहिए। विश्वविद्यालयों के सामने इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने की है। इस शिक्षा नीति के हिसाब से तो अभी विद्यालय और महाविद्यालय स्तर पर पाठ्यक्रमों में बहुत बदलाव करना होगा। जिस तरह से भारतीयता के स्वर को इस शिक्षा नीति में प्राथमनिकता देने की बा की गई है उसके आधार पर बनने वाले पाठ्यक्रमों को बनाना भी बड़ी चुनौती है। विरोध के स्वर भी उठेंगे और विरोध का आधार भी लेखकों की प्रतिष्ठा आदि को बनाया जाएगा। लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय से मिले संकेतों से सीख लेने की जरूरत है ताकि पाठ्यक्रम बनाते समय किसि प्रकार के दबाव को नकारा जा सके। दरअसल भारत में हो रहे बदलावों पर पूरी दुनिया की नजर है। शिक्षा आदि के क्षेत्र से जुड़े संगठनों पर अगर इस बदलाव का असर पड़ता है तो वो किसी भी हद तक जाकर विरोध कर सकते हैं। 

इसका एक और दिलचस्प पहलू भी है। अमेरिका में रहनेवाले भारतीय मूल के लेखक सलिल त्रिपाठी ने भी दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में बदलाव पर लिखा है। विश्वविद्यालय को कठघरे में खड़ा करते हुए उन्होंने महाश्वेता देवी का गुणगान किया है। इस कहानी के बहाने सवाल खड़े करते हुए वो महाभारत के पात्र द्रोपदी और उसके चीरहरण की घटना की व्याख्या भी करने लग जाते हैं। अंग्रेजी के लेखकों के साथ दिक्कत ये है कि वो मूल ग्रंथ को नहीं पढ़ते हैं बल्कि उसके आधार पर लिखी गई पुस्तकों को आधार बना लेते हैं। महाश्वेता देवी की कहानी पर लिखते हुए द्रोपदी के चीरहरण के प्रसंग तक पहुंचते हैं तो अंग्रेजी के लेखक किरण नागरकर का उदाहरण देते हैं। उनके हवाले से कहते हैं कि द्रोपदी का जब चीर हरण हो रहा था तो कृष्ण देर से उनके बचाव के लिए आए थे। इस प्रसंग के लिए महाभारत का मूल पाठ देखना चाहिए। पौराणिक पात्रों पर विपुल लेखन करनेवाले नरेन्द्र कोहली हमेशा मूल महाभारत में वर्णित चरित्रों के संवाद को पढ़ने की बात किया करते थे। पौराणिक और ऐतिहासिक पात्रों पर लिखना बेहद श्रमसाध्य कार्य है। इसके लिए बहुत अध्ययन की आवश्यकता होती है और प्राथमिक स्त्रोत तक पहुंचने की चुनौती भी होती है। ऐतिहासिक पात्रों पर लिखते भी हैं और उसको फिक्शन भी करार देते हैं। फिक्शन ही लिखना है तो ऐतिहासिक पात्रों के नाम उनका परिवेश और कालखंड भी वही क्यों होता है। इस प्रकार की रचनात्मकता, फिक्शन की आड़ में इतिहास के साथ खिलवाड़ को वैधता देने की कोशिश होती है। अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए भी इस प्रविधि का सहारा लिया जाता है। यह खेल लंबे समय से हमारे देश में चल रहा है लेकिन अब जनता इस खेल को समझ चुकी है।   


Tuesday, March 14, 2017

साईबाबा को उम्रकैद से निकलते संदेश

उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और उसके नतीजों के कोलाहल के बीच एक बेहद अहम खबर लगभग दब सी गई । राजनीतित विश्लेषखों ने इस खबर को उतनी तवज्जो नहीं दी जितनी मिलनी चाहिए थी । उस खबर पर प्राइम टाइम में उतनी बहस नहीं हुई जितनी होनी चाहिए थी । वह खबर थी दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज के शिक्षक जी साईबाबा और चार अन्य को देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश रचने से लेकर प्रतिबंधित माओवादियों को मदद देने के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाए जाने की । सजा सुनाते वक्त महाराष्ट्र के गढचिरौली के जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने बेहद कड़ी टिप्पणी की । उन्होंने कहा कि मुजरिमों के क्रियाकलापों की वजह से कई लोगों की जान गई और सरकारी संपत्ति का भारी नुकसान हुआ । जज ने कहा कि उम्रकैद की सजा इन लोगों के लिए मुकम्मल नहीं है लेकिन उनके हाथ यूएपीए कानून की धाराओ से बंधे हैं । अदालत से साईबाबा को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद अखबारों में उनकी पत्नी का जो बयान छपा है उसपर ध्यान देने की जरूरत है । प्रोफेसर जी एन साईबाबा की पत्नी ने सजा के बाद कहा- इस फासिस्ट गवर्नमेंट ने हमारे साथ ऐसा किया कि हमारे आंख में आंसू नहीं आ रहे, आग आ रही है । उन्होंने अपने बयानों में राज्य और केंद्र सरकार द्वारा न्यायपालिका पर दबाव डाले जाने की आशंका भी जताई । आंखों में आंसू नहीं आग आ रही है । सवाल यह उठता है कि आग किस चीज की, क्या उनकी पत्नी किसी तरह के इंतकाम की ओर संकेत कर रही हैं या फिर सिर्फ तात्कालिक गुस्से की वजह से उन्होंने ऐसा बयान दे दिया । साईबाबा की पत्नी ने केंद्र और राज्य सरकार पर भी संगीन इल्जाम लगाए । उनके पति को अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई है  और वो इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में अपील कर सकती हैं । बजाए न्यायपालिका पर भरोसा जताने के साईबाबा की पत्नी ने न्यायपालिका को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है । दरअसल यह उनका दोष नहीं है यह उस विचारधारा का असर है जिसमें सत्ता बंदूक की नली से निकलती है । यह उस विचारधारा का प्रभाव है जिसका लोकतंत्र में नहीं हिंसातंत्र में यकीन है । अगर लोकतंत्र में यकीन होता तो आंखों में आग नहीं आती । यह अकारण नहीं है कि 27 दिसंबर 1997 को महाश्वेता देवी ने हस्तलिखित अपील में सीपीआई एमएल से बिहार में बदला लेने का आह्वान किया था । रणवीर सेना पर उस वक्त एक सामूहिक नरसंहार का आरोप लगा था उसके बाद महाश्वेता देवी ने यह अपील की थी । उस वक्त महाश्वेता देवी किससे बदला लेने के लिए उकसा रही थीं, ऊमती जाति के उन गरीब लोगों पर जो निरीह थे । यह हिंसा के लिए उकसाना वर्ग शत्रुओं के सफाए की विचारधारा या सिद्धांत का पोषक ही कर सकता था । इस विचारधारा को पोषकों को ना तो संविधान की फिक्र है ना ही कानून और अदालतों पर उनका भरोसा है । व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर, गरीबों, मजलूमों को उनका हक दिलाने के नाम पर निरीह, निर्दोष लोगों की हत्या को अंजाम दिया जाता रहा है ।
महाश्वेता देवी पर किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं हुई क्योंकि उनको गरीबों का मसीहा माना जाता था और गरीबों की हत्या का बदला लेने के लिए उकसाने को लेकर कहीं किसी प्रकार का स्पंदन नहीं हुआ था । जब साईबाबा को नक्सलियों से सांठगांठ के आरोप में गिरफ्तार किया गया तो मार्क्सवादियों को सांप सूंघ गया था । इसको तानाशाही से लेकर फासीवाद आदि आदि तक करार दिया गया था । दरअसल 22 अगस्त दो हजार तेरह को हेम मिश्रा की गिरफ्तारी के बाद इनलोगों के मंसूबों का पर्दाफाश हुआ था । आरोप लगा था कि साईबाबा ने मिश्रा के हाथों गढ़चिरौली इलाके में सक्रिय खूंखार नक्सली कमांडर नर्मदा अक्का के पास एक माइक्रोचिप भिजवाया था । उसके बाद मिश्रा और उनके साथियों की गिरफ्तरी और पूछताछ के बाद पुलिस साईबाबा तक पहुंची थी । करीब छह सात महीने तक साई बाबा पर नजर रखने के बाद महाराष्ट्र पुलिस ने 9 मई दो हजार चौदह को साई बाबा को दिल्ली से गिरफ्तार किया था । पुलिस ने उस वक्त दावा किया था कि साईबाबा के घर से उनको जो हॉर्ड डिस्क मिला था उससे साईबाबा की नक्सलियों के साथ संलिप्तता साबित होती थी । पुलिस को जांच के दौरान यह भी पता चला था कि साईबाबा रिवोल्यूशनरी डेमोक्रैटिक फ्रंट का संयुक्त सचिव था । यह संगठन खुले तौर पर इस बात की वकालत करता था कि नक्सली तौर-तरीकों से ही सरकार को हटाया जा सकता है । उनकी जमानत याचिका हाईकोर्ट की नागपुर बेंच से खारिज हुई थी, फिर बांबे हाईकोर्ट से उनको अस्थायी जमानत मिली थी जिसे बाद में रद्द भी किया गया था । पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने साईबाबा को जमानत दे दी थी ।
अब सवाल यही उठता है कि नक्सलियों के रोमांटिसिज्म में या फिर हिंसक विचारधारा के प्रभाव में भारत के खिलाफ युद्ध झेड़ने का जुर्म साबित होने पर उम्रकैद होने से नक्सलियों या उनके बौद्धिक समर्थकों के बीच कड़ा संदेश जाएगा । दरअसल नक्सलियों के जो बौद्धिक समर्थक हैं वो उनके स्लीपर सेल के तौर पर काम करते हैं । रहा होगा किसी जमाने में नक्सलबाड़ी आंदोलन की नैतिक आभा लेकिन पिछले एक दो दशक से तो नक्सली खालिस अपराधी हो गए हैं जो ठेकेदारों से रंगदारी वसूलते हैं, लूटपाट करते हैं, बलात्कार करते हैं, अपने संगठन की महिलाओं पर जमकर यौन अत्याचार करते हैं । यह कौन सी विचारधारा है जो गांधी के इस देश में हिंसा का प्रचार प्रसार करती है । अब इसपर नक्सलियों को बौद्धिक आधार देनेवालों को भी गंभीरता से विचार करना चाहिए कि वो हिंसा के साथ हैं या अहिंसा के साथ ।    

Sunday, July 31, 2016

महान विभूतियों को प्रणाम

पिछला सप्ताह साहित्य, कला और संगीत के लिहाज से बेहद दुखद रहा । इन तीनों क्षेत्रों की तीन महान विभूतियों के महाप्रयाण से ये क्षेत्र विपन्न हुआ । मशहूर चित्रकार सैयद हैदर रजा, महान लेखिका महाश्वेता देवी और गायक और तबला वादक लच्छू महाराज के निधन ने साहित्य और कलाजगत को झककोर कर रख दिया । महाश्वेता देवी लिखती अवश्य बांग्ला में थीं लेकिन वो पूरे देश में समादृत थीं । महाश्वेता देवी के लेखन में समाज के हाशिए के लोगो की आवाज प्रमुखता से दिखाई देती थीं । महाश्वेता देवी के बारे में एक बात तो दावे के साथ कही जा सकती है कि वो आदिवासियों और दबे कुचले लोगों के जीवन के बीच जीवन गुजारकर जो जीवानानुभव होता था उसको अपने लेखन में समाहित करती थी । नतीजा यह होता था कि महाश्वेता देवी के लेखन में एक खास किस्म का यथार्थ दिखाई देता था जो कि गढ़े हुए यथार्थ से अलग होता था । वो जब बोलती थीं तो उनकी आवाज में ना तो बनावटीपन होता था और ना ही श्रोताओं को खोखला लगता था क्योंकि उन्होंने जो जिया वही लिखा । महाश्वेता देवी नक्सलियों के प्रति झुकाव रखती थीं और मौके बेमौके उनके समर्थन आदि में लेख आदि भी लिखते रहती थीं । मुझे याद है कि उन्नीस सौ सत्तानवे में 27 दिसंबर को महाश्वेता देवी ने सीपीआई एमएल को अपने हाथों से लिखा एक खत दिया था जिसमें उनसे रणबीर सेना द्वारा किए गए एक सामहूक नरसंहार का बदला लेने की बात कही गई थी । उनके उस पत्र के छपने के बाद महाश्वेता देवी पर हिंसा के लिए उकसाने का आरोप भी लगा था लेकिन वो अपने स्टैंड से टस से मस नहीं हुई थी । वो अपनी विचारधारा में सीपीएम के करीब थीं लेकिन जब नंदीग्राम में लोगों पर सीपीएम शासनकाल में अत्याचार हुआ तो वो बंगाल की सीपीएम सरकार के खिलाफ खड़ी हो गई थी। अपने जीवन के अंतिम समय में वो ममता बनर्जी के साथ खड़ी थीं । महाश्वेता देवी जितना साहित्य में सक्रिय थी उतनी ही सक्रियता से वो राजनीति के मसलों पर भी अपनी राय रखती थीं । उन्नीस सौ छब्बीस में ढाका में साहित्यक परिवार में पैदा हुई महाश्वेता के पिता मनीष घटक मशहूर कवि थे और चाचा ऋत्विक घटक मशहूर फिल्मकार । महाश्वेता देवी की हजार चौरासी की मां, अरण्येर अधिकार, झांसीर रानी, अग्निगर्भा आदि मशहूर कृतियां थी । हजार चौरासी की मां पर तो इसी नाम से फिल्म भी बनी और अग्निगर्भा पर रुदाली के नाम से फिल्म का निर्माण हुआ था । महाश्वेता देवी को ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, रोमन मैगसेसे अवॉर्ड समेत कई सम्मान मिल चुके थे । भारत सरकार ने उनको पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया था । मैं दो तीन बार महाश्वेता देवी से मिला था । पहली बार उनसे दो हजार तीन में साहित्य अकादमी के चुनाव के दौरान मुलाकात हुई थी । उस वक्त वो गोपीचंद नारंग के खिलाफ अकादमी के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ रही थीं । उस दौरान मैंने उनके दो इंटरव्यू किए थे । उस वक्त उनपर आरोप लगा था कि वो अशोक वाजपेयी के दबाव में अकादमी का चुनाव लड़ रही थीं । पहले उन्होंने ऐलान किया था कि अगर वो निर्विरोध चुनी जाती हैं तभी अध्यक्ष बनेंगी लेकिन बाद में उन्होंने अपना विचार बदल लिया था । तब पहली बार उन्होंने मुझसे ही बातचीत में इस बात को स्वीकार किया था कि वो लोकतांत्रिक परंपरा का सम्मान करने की वजह से चुनाव मैदान में हैं । हलांकि महाश्वेता देवी वो चुनाव हार गई थीं । उसके बाद भी मैंने उनका एक इंटरव्यू किया था तब उनके दिल में चुनाव हारने की टीस तो थी ही इस बात का भी मलाल था कि हिंदी के कुछ लेखकों ने उनका इस्मेताल कर लिया था । उन्होंने खुलकर तो ये बात नहीं कही थी लेकिन ये अवश्य कहा था कि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने की वजह से उन्हें बेवजह के कई आरोपों को झेलने पड़े थे । महाश्वेता के जाने से समाज के वंचितों की आवाज भी कमजोर होगी ।
महाश्वेता के जाने से साहित्य जगत की जो क्षति हुई है उतना ही बड़ा नुकसान सैयद हैदर रजा के निधन से कला क्षेत्र को हुआ है । रजा साहब भारत की चित्रकारी की त्रिमूर्ति- रजा ,सूजा और हुसैन- के आखिरी स्तंभ थे । उनके निधन से विश्व कला की दुनिया का एक कोना सूना हो गया है । रजा साहब की चित्रकारी में अद्वैत दर्शन को साफ तौर पर देखा जा सकता था । वो कहते भी थे कि दिव्य शक्तियों के सहयोग के बिना कला संभव नहीं है । उनकी कला के केंद्र में बिंदू का खास महत्व था और उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा भी था कि बिंदू की अहमियत को समझने में उनको करीब पचास साल लगे थे । रजा साहब का मानना था कि पूरी सृष्टि के केंद्र में बिंदू है । रजा की चित्रकारी में एक क्रमिक विकास दिखाई देता है जब पहले वो पीला और नारंगी रंग का इस्तेमाल करते हैं और कालांतर में उनकी चित्रकारी में काले रंग का प्रवेश दिखाई देता है । विशेषज्ञों का मानना है कि वो रंगों के माध्यम से भारतीय मिथकों के प्रतीकों का अपने चित्रों में इस्तेमाल करते हैं । रजा सहाब के बारे में मित्र चित्रकार मनीष पुष्कले से यदा कदा बातचीत होती रहती थी । हमने उनके साथ स्टूडियो में जाकर बातचीत का एक कार्यक्रम भी बनाया था लेकिन वो योजना परवान नहीं चढ़ सकी । मनीष बताते थे कि रजा साहब युवा चित्रकारों को सोचने के लिए उकसाते थे और हमेशा प्रश्नों के साथ उसका उत्तर ढूंढने के लिए छोड़ देते थे । संभव है ये उनकी युवाओं को सिखाने की अदा हो ।
महाश्वेता और रजा के अलावा इस सप्ताह बनारस के मशहूर तबला वादक और गायक लच्छू महाराज भी हमें छोड़कर चले गए । बनारस घराने के लच्छू महाराज ने आठसाल की उम्र से ही तबला बजाना शुरू कर दिया था । भले ही लच्छू महाराज ने बनारस घराने में ट्रेनिंग ली हो लेकिन वो तबले पर चारो घराने की थाप को उसी सहजता के साथ बजाते थे । लच्छू महाराज प्रचार प्रसार से दूर रहते थे और अपनी शर्तों पर ही संगत करते थे । लच्छू महाराज के तबला वादन की एक विशेषता ये भी थि उनकी थाप में दोहराव देखने को नहीं मिलता था । स्वभाव से ठेठ बनारसी लच्छू महाराज के जाने से भारतीय तबला वादन परंपरा में एक खास किस्म की खामोशी आई है । इन तीन विभूतियों को श्रद्धांजलि ।


Sunday, March 3, 2013

साहित्य का मीना बाजार


पिछले कई सालों से जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ने ना सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया के साहित्यक मानचित्र पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है । बेहद छोटे स्तर से शुरु हुए इस लिटरेचर फेस्टिवल ने छह सालों में एक लंबा सफर तय किया है । इन छह सालों में इस फेस्टिवल में विश्व के अनेक भाषाओं के लेखकों ने शिरकत की और साहित्य से जुड़े गंभीर विषयों पर विमर्श किया । लेकिन समय बदला तो इस महोत्सव का स्वरूप भी बदला । पिछले साल सलमान रश्दी के जयपुर आने को लेकर मचे बवाल ने लिटरेचर फेस्टिवल को लोकप्रियता और चर्चा के शीर्ष पर पहुंचा दिया था । सलमान रश्दी के नहीं आने से भी कोई फर्क नहीं पड़ा था क्योंकि विवाद फिर भी हुआ था । जीत थाईल, रुचिर शर्मा और हरि कुंजरू ने सलमान रश्दी की विवादित किताब के अंश पढ़ दिए थे । उसके बाद जीत थाईल पर जयपुर और अजमेर में आठ केस दर्ज किए गए थे । यह अलग बात है कि साल भर बीत जाने के बाद भी इन केस की अबतक फाइल खुली ही नहीं है । जीत थाईल इस साल भी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में पहुंचे और उन्हें उनके उपन्यास नारकोपोलिस पर प्रतिष्ठित डीएससी पुरस्कार भी मिला ।
अपने छठे एडिशन तक आते आते जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल साहित्यक उत्सव से अपना फलक बड़ा करते हुए साहित्य के मीना बाजार में तब्दील होता नजर आया । मैं पिछले कई सालों से जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को देखता आ रहा हूं । इस बार इस साहित्य मेले में कई नई चीजें देखने को मिली । पहले जयपुर के दिग्गी पैलेस में आयोजित इस मेले में साहित्य पर गंभीर विमर्श हुआ करते था, इस बार भी हुआ लेकिन विमर्श के साथ साथ मेले में कारोबार का भी प्रवेश हो गया । शुरुआत में जब इस साहित्यक उत्सव की कल्पना की गई होगी तब भी उसके पीछे साहित्य पर गंभीर चिंतन के अलावा लाभ कमाने का भी उद्देश्य रहा होगा । लेकिन पिछले पांच मेलों तक यह थोड़ा ढंके छुपे तौर पर चल रहा था । इस बार मेले में खुलकर कारोबार हो रहा था । इस साल मेले में हर मंडप के पास तरह तरह के खाने पीने के स्टॉल लगे थे । कुल्हड़वाली चाय जो इस मेले की खासियत हुआ करती है उसके दाम में पिछले साल की तुलना में सौ फीसदी का इजाफा करते हुए उसे बीस रुपए प्रति कुल्हड़ कर दिया गया । खाने-पीने तक तक अगर यह मामला रुका रहता तब भी बात समझ में आती वेकिन इस बार तो विदेशी मेहमानों को ध्यान में रखते हुए हैंडीक्राफ्ट की भी कई दुकानें वहां लगाई गई थी जिसनें जयपुरी बलॉक प्रिंट के कपड़ों से लेकर थैले और टोपियां मिल रही थी । सबसे हैरानी की बात तो यह थी कि इस बार मेले में पहली बार गहनों की भी एक दुकान थी । साहित्यक मेले में गहनों की दुकान का मतलब समझ में नहीं आया । क्या आयोजकों को यह लगता है कि लिटरेचर फेस्टिवल में आनेवाले लोग वहां साहित्य सुनने और अलग अलग सत्रों में होनेवाले विमर्श में शामिल होने के अलावा पिकनिक और मौज मस्ती और शॉपिंग के लिए आते हैं । या फिर लिटरेचर फेस्टिवल की लोकप्रियता को भुनाते हुए आयोजक ज्यादा से ज्यादा लाभ कमा लेना चाहते हैं । इन सवालों के जबाव अबतक अनुत्तरित हैं । हलांकि इस बार जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के प्रोड्यूसर संजॉय रॉय के हवाले से खबरें छपी कि मेले के आयोजन में तकरीबन डेढ़ करोड़ रुपए का नुकसान होगा । आयोजकों की दलील थी कि एकदम आखिरी वक्त में दो बड़े प्रायोजकों ने हाथ खींच लिया । साहित्यक मेले का इस साल का बजट तकरीबन साढ़े पांच करोड़ का था और प्रायोजकों से चार करोड़ रुपए मिले थे । इस लिहाज से मोटे तौर पर जो बैलेंस शीट बनती है उसमें डेढ करोड़ का नुकसान है ।
मैंने इस मेले को साहित्य का मीना बाजार इस वजह से कहा क्योंकि इस बार मेले में मीना बाजार में मौजूद तकरीबन हर चीज वहां मौजूद थी एक सिर्फ चरखी को छोड़कर । इस मेले के पहले इस साल रायल्स इलेवन और लेखकों की टीम के बीच एक क्रिकेट मै भी खेला गया । मेले को सफल बनाने के लिए कई फिल्मी सितारों को भी बुलाया गया । इस बार पहली बार शाम को होनेवाले म्यूजिकल कार्यक्रम को आयोजन स्थल, दिग्गी पैलेस से हटाकर एक अलग होटल के लॉल में आयोजित किया गया । जहां शामिल होने के लिए तीन सौ रुपए का टिकट भी था । लेकिन ऐसा नहीं है कि जयपुर साहित्य उत्सव सिर्फ कारोबार है, सिर्फ चकल्लस का अड्डा है । जैसा कि हमारे कई बुद्धिजीवी और बुद्दिजीवी होने का भ्रम पाले बैठे लोग सोचते हैं । जयपुर लिट फेस्ट में कई गंभीर मुद्दों पर भी चर्चा हुई । कई लोगों को इस बात पर आपत्ति है कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में साहित्यक विमर्श के नाम पर हल्की चर्चा हुई । यह मानसिकता उन लोगों की है जो पूर्वग्रह से ग्रसित हैं और समाज में कुछ भी अच्छा और रचनात्मक घटित होना, उनके हिसाब से देश की अस्सी फीसदी गरीब जनता के साथ छल है ।
इस तरह के तर्क देनावाले लोग यह भूल जाते हैं कि इसी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के सत्र ऑफ वुमन आुटकास्ट्स प्रजेंट्स एंड रिबेल्स में में अपने जीवन काल में ही महान लेखिका का दर्जा हासिल कर चुकी महाश्वेता देवी ने कहा था कि सपने देखना इंसान का पहला और मूलभूत अधिकार है । नक्सलवादी भी सपने देखते हैं । उनका अपराध यही तो है कि उन्होंने सपने देखने का सहस किया, तो उनको फिर यह अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए । महाश्वेता देवी के इस बयान पर लंबा विमर्श चला । अखबारों में विशेष संपादकीय लिखे गए । एक ओर जहां महाश्वेता यह बात कह रही थी वहीं दूसरी ओर इसी मेले में किनशिप्स ऑफ फेश नाम के सत्र में तिब्बती धर्मगुरू और नोबेल पुरस्कार प्राप्त दलाई लामा ने शांति की जमर वकालत की । दलाई लामा ने कहा कि – जो लोग मैं –मैं के बारे में सोचते हैं उन्हें दिल का दौरा पड़ने की संभावना ज्यादा रहती है । दिल पर ऐसा दबाव ना बनाएं । दूसरों के बारे में भी सोचें । यही इस तरह के साहित्यक उत्सव की खूबसूरती है । उसी मेले में पाकिस्तान की उर्दू साहित्यकार और महिलावादी लेखिका फहमीदा रियाज का दर्द भी झलक आया, जब उन्होंने पूछा कि कहां जाऊं- उस पार जाऊं तो लोग मुझे भारत का एजेंट कहते हैं और यहां आती हूं तो विरोध की धमकी दी जाती है । धर्म में औरतों की हालात पर गीतकार जावेद अख्तर और फहमीदा के बीच जमकर तकरार हुई । जावेद का मानना था कि हर धर्म औरतों के खिलाफ है जिसका  फहमीदा ने जमकर विरोध किया और कहा कि इस तरह किसी भी मसले का सरलीकरण नहीं किया जा सकता है ।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में जो और बात रेखांकित की जा सकती है वह यह है कि इसमें युवाओं की भागीदारी ने पिछले कई सालों के कीर्तिमान तोड़ दिए । इस बार के साहित्योत्सव में स्कूली छात्रों ने भी जमकर हिस्सा लिया । स्कूली छात्रों की भीड़ को देखकर ब्रिटिश लेखक एच जैक्ब्सन ने मजाक में कहा- हमारे मुल्क में मेरे श्रोताओं की औसत उम्र नब्बे साल से ज्यादा रहती है लेकिन यहां जयपुर में मुझे औसतन चौदह साल की बच्चियां प्रशंसक के रूप में मिली । मजाक में कही इस बात पर गंभीरता से चिंतन किया जा सकता है । हम इसको अपने देश के किशोर और नौजवानों के साहित्य में झुकाव के तौर पर देख सकते हैं । कई हिंदी लेखकों को यह अंग्रेजीवालों का जमावड़ा लगता है लेकिन इस बार एक और बात साफ हो गई कि हिंदी और उर्दू के सत्रों में अंग्रेजी साहित्य के सत्रों से ज्यादा श्रोता मौजूद थे । यह भी तो कुछ ना कुछ कहता ही है जिसको डिकोड किया जाना चाहिए । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल साहित्य का मीना बाजार तो बन गया है लेकिन अगर इस मीना बाजार से देऎश के किशोरों और युवाओं के बीच साहित्य के सवालों को सुनने और उससे टकराने की रुचि जागती है तो इस मीनाबाजर का स्वागत किया जाना चाहिए । इस मीना बाजार से अगर देश के किसी भी हिस्से में नई पीढ़ी में साहित्य का संस्कार विकसित होता है तो हमें तमाम विरोध के बावजूद इसका समर्थन करना चाहिए ।