Translate

Showing posts with label लता मंगेशकर. Show all posts
Showing posts with label लता मंगेशकर. Show all posts

Monday, September 22, 2025

सितंबर के सितारे


हमारे यहां विभिन्न कलाओं का कैनवस इतना बड़ा है कि वर्ष के हर महीने में इन कलाओं से जुड़े कलाकारों की जन्मतिथि या जयंती उनके स्मरण का अवसर देती हैं। भारतीय फिल्मों का इतिहास सौ वर्षों से अधिक का हो गया है। कई कलाकारों ने भारतीय फिल्मों में अपने हुनर से उसको समृद्ध किया। हर महीने इन कलाकारों में से कइयों से जुड़ी घटनाएं, फिल्में, फिल्मों में उनके गाए गानों आदि की चर्चा होती है पर सितंबर एक ऐसा महीना है जिसमें कई दिग्गज कलाकारों की जन्म तिथि पड़ती है। भारत रत्न लता मंगेशकर से लेकर रणबीर कपूर तक कई कलाकारों का जन्म सितंबर में हुआ। लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर को हुआ। लता मंगेशकर बनने के लिए उन्होंने कई सालों की तपस्या की। मुंबई (तब बांबे) के नाना चौक इलाके के दो कमरे के छोटे से फ्लैट में मां और भाई बहनों के साथ रहते हुए लता मंगेशकर ने न दिन देखा और न रात, बस एक ही सपना देखा कि कैसे अपनी गायकी को बेहतर करना है। लता मंगेशकर कोई भी गाना गातीं तो अपने पिता मास्टर दीनानाथ मंगेशकर की दी सीख याद रखतीं। पिता ने कहा था ‘गाते समय हमेशा ये सोचना कि तुमको अपने पिता या गुरु से बेहतर गाना है।‘ लता ने इसको अपने जीवन में उतार लिया। अपनी गायिकी से वो उस ऊंचाई पर पहुंच गई जहां पहुंच पाना किसी के लिए आसान नहीं। लता मंगेशकर की छोटी बहन आशा भोंसले का जन्म आठ सितंबर को हुआ था। लता मंगेशकर की लोकप्रियता के बीच हिंदी फिल्मों की दुनिया में एक ऐसी आवाज आई जिसे संगीतकार राहुल देब बर्मन के हुनर ने वो ऊंचाई दे दी जो लंबे समय तक बनी रही। फिल्म तीसरी मंजिल में आशा भोंसले और मोहम्मद रफी के गाए युगल गीत अमर हो गए। ओ मेरे सोना रे सोना हो या ऐ हसीना जुल्फों वाली हो या आ जा आ जा मैं हूं प्यार तेरा को याद करिए, आज भी वेलेंटाइन डे पर तीसरी मंजिल फिल्म के ये गीत अवश्य बजते हैं।

गीतों से अगर अभिनय की ओर बढ़ें तो सदाबहार अभिनेता देवानंद का जन्म 26 सितंबर को हुआ। देवानंद का सपना था कि वो प्रसिद्ध हों, इसलिए उन्होंने फिल्मों का रास्ता चुना। बांबे आए, लेकिन फिल्मों में काम नहीं मिल पा रहा था। मिलिट्री सेंसर आफिस में नौकरी की। फिर प्रभात स्टूडियो की एक फिल्म हम एक हैं में काम मिला। फिल्म चली नहीं तो संघर्ष और बढ़ गया। इस फिल्म के दौरान उनकी दोस्ती कोरियोग्राफर गुरु दत्त से हो गई थी। एक दिन अचानक ट्रेन में उनकी मुलाकात अशोक कुमार से हुई। देवानंद ने उनसे फिल्मों में काम मांगा। अशोक कुमार ने देवानंद को बांबे टाकीज बुलाया। वहां निर्देशक शाहिद लतीफ ने देवानंद को ये खारिज कर दिया, कहा कि वो चाकलेटी दिखते हैं। अशोक कुमार अड़े रहे। देवानंद को फिल्म जिद्दी फिल्म में काम मिला। उसके बाद की कहानी इतिहास में दर्ज है। एक समय राज कपूर, देवानंद और दिलीप कुमार हिंदी फिल्मों पर राज करते थे। इसी दौर में देवानंद की दोस्ती किशोर कुमार हुई जो आजीवन चलती रही। हाल में हिंदी फिल्मों में पचास वर्ष पूर्ण करनेवाली शबाना आजमी भी सितंबर में ही पैदा हुईं। कपूर खानदान के दो सितारों, रणबीर और करीना कपूर का जन्म भी सितंबर में हुआ। रणबीर कम फिल्में करते हैं लेकिन दर्शकों को अपने अभिनय का कायल बना लेते हैं। करीना भी एक समय हिंदी फिल्मों में टाप की अभिनेत्री बन गई थीं। इन दिनों वो अलग तरह के रोल में नजर आ रही हैं। अभिनेता अक्षय कुमार भी सितंबर में ही जन्मे। दिल्ली से मुंबई जाकर अक्षय ने फिल्मी दुनिया में अपना एक अलग स्थान बनाया। जब हिंदी फिल्मों में तीन खान अभिनेतों का डंका बज रहा था तो उसके बीच अक्षय कुमार की फिल्मों की सफलता ने उनको सुपरस्टार बना दिया। अक्षय ने एक्शन से लेकर कामेडी फिल्मों में काम किया जो दर्शकों को खूब भाया।

अभिनेताओं के बाद अगर हम बात करें दो फिल्म निर्देशकों हर्षिकेश मुखर्जी और यश चोपड़ा भी सितंबर में ही जन्मे थे। आज दोनों हमारे बीच नहीं हैं लेकिन इन दोनों ने हिंदी फिल्मों के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी। बिमल राय जब कलकत्ता (अब कोलकाता) से बांबे आए तो उनके साथ चार अन्य युवा भी मुंबई पहुंचे उनमें से ह्रषिकेश मुखर्जी एक थे। बिमल राय के सहायक के तौर पर हिंदी फिल्मों में आए ह्रषिकेश मुखर्जी ने एक से एक श्रेष्ठ और लोकप्रिय फिल्में बनाईं। उनकी निर्देशित फिल्म आनंद ने अमिताभ बच्चन के अभिनय के नए आयाम से दर्शकों का परिचय करवाया। गोलमाल और मिली जैसी फिल्में मुखर्जी की फिल्म कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। लतो मंगेशकर ने कहा भी था कि वी शांताराम, गुरुदत्त और बिमल राय की परंपरा को ह्रषिकेश मुखर्जी ने आगे बढ़ाया। सितंबर के एक और सितारे हैं यश चोपड़ा। यश चोपड़ा ने अमिताभ बच्चन की फिल्म दीवार का निर्देशन किया जहां से एंग्री यंग मैन का युग आरंभ होता है। लेकिन यश चोपड़ा एक प्रयोगधर्मी निर्देशक थे। एंग्री यंग मैन को गढ़ने के बाद उन्होंने जब सिलसिला या चांदनी बनाई तो उसमें प्यार का एक अलग ही रूप दर्शकों को देखने को मिला। यश चोपड़ा ने एक्शन फिल्में की तो उसमें भी अपनी छाप छोड़ी और जब रोमांस और लवस्टोरी को विय बनाया तो दर्शकों को भी उनकी फिल्म से प्यार हो गया। सितंबर के इन सितारों में कुछ तो है जो इनको विशेष बनाती है। 

Sunday, January 12, 2025

तुमसा नहीं देखा...


ओंकार प्रसाद नैयर जिसे ओपी नैयर के नाम से जाना गया, एक ऐसे संगीतकार थे जिन्होंने शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं प्राप्त की थी। लेकिन जब वो किसी गीत के लिए संगीत तैयार करते थे तो उसमें रागों का उपयोग इतनी खूबसूरती से करते थे कि पारखियों को इस बात का अनुमान नहीं होता था कि उन्हें रागों की व्यवस्थित शिक्षा ग्रहण नहीं की। 16 जनवरी 1926 को अविभाजित भारत के लाहौर में उनका जन्मे नैयर की बचपन से ही संगीत में रुचि थी। पढ़ाई में उनका मन नहीं लगता था। उनके परिवार के लोग उनको संगीत की तरफ जाने से रोकते। उनको लगता था कि अगर नैयर संगीत से दूर हो गया तो पढ़ाई में मन लगेगा। पर नैयर का मन तो संगीत में रम चुका था। 17 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने एचएमवी के लिए कबीर वाणी कंपोज की थी लेकिन वो पसंद नहीं की गई। बावजूद इसके उन्होंने एक प्राइवेट अलबम प्रीतम आन मिलो कंपोज की जिसमें सी एच आत्मा से गवाया। इस अलबम ने नैयर को संगीत और सिनेमा जगत में एक पहचान दी। नैयर खुश हो रहे थे कि उनका सपना पूरा होने वाला है। नियति को कुछ और ही मंजूर था। देश का विभाजन हो गया। उनको लाहौर में सबकुछ छोड़-छाड़ कर पटियाला आना पड़ा। पटियाला में वो संगीत शिक्षक बनकर जीवन-यापन करने लगे। पर मन तो फिल्मों में संगीत देने का था। एक नैयर बांबे (अब मुंबई) पहुंचते हैं। लंबे संघर्ष और जानकारों की सिफारिश के बाद उनको फिल्म संगीत में हाथ आजमाने का अवसर मिला।

1952 की फिल्म आसमान ने नैयर के लिए सफलता का क्षितिज तो खोला पर उनके और लता मंगेशकर के बीच दरार भी पैदा कर दी। दोनों ने फिर कभी साथ काम नहीं किया। ये वो समय था जब लता मंगेशकर फिल्म अनारकली, नागिन और बैजू बाबरा जैसी फिल्मों के गाने गाकर प्रसिद्धि की राह पर चल पड़ी थीं। नैयर ने लता से अपनी फिल्म आसमान में गाने का अनुबंध किया था। जब रिकार्डिंग का समय हुआ तो लता मंगेशकर नदारद। वो तय समय पर नहीं पहुंची। बाद में लता ने नैयर को बताया कि उनके नाक में कुछ दिक्कत थी। डाक्टर ने उनको आराम की सलाह दी थी। तब नैयर ने उनसे दो टूक कहा कि जो समय पर नहीं पहुंच सकता उसका मेरे लिए कोई महत्व नहीं। लता ने समझाने का प्रयत्न किया। नैयर नहीं माने। तब लता ने भी कहा जो व्यक्ति संवेदनहीन हो  वो उनके लिए नहीं गा सकती। इस विवाद के बाद राजकुमारी ने वो गाना गाया। गीत था, मोरी निंदिया चुराए गयो...। दरअसल नैयर एक ऐसे संगीतकार थे जो अपनी शर्तों पर काम करते थे। जब लता से विवाद हुआ तो शमशाद बेगम ने उनका साथ दिया। उन्होंने गीता दत्त और आशा भोंसले से गवाना आरंभ किया। उनकी संगीत में जो रिद्म था या जो पंजाबी लोकसंगीत की धुनों का उपयोग करते थे उसमें आशा की आवाज एकदम फिट बैठ रही थी। गीता दत्त ने ही नैयर को गुरुदत्त से मिलवाया। फिल्म आर-पार के गीतों और उसके बाद मिस्टर एंड मिसेज 55 की गीतों ने ओ पी नैयर के संगीत को सफलता के ऊंचे पायदान पर पहुंचा दिया। नैयर निरंतर सफल हो रहे थे। बी आर चोपड़ा ने दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला को लेकर फिल्म नया दौर शुरु की। चोपड़ा ने नैयर को संगीतकार के तौर पर साइन किया। यही वो फिल्म थी जिसके गीतों को कंपोज करते नैयर और आशा के बीच की नजदीकियां बढ़ीं। नया दौर में आशा और रफी के गानों ने लोकप्रियता का शिखर छुआ। रफी के साथ उनका गाया गाना ‘उड़े जब जब जुल्फें तेरी, कवांरियों का दिल मचले’ या शमशाद बेगम के साथ ‘रेशमी सलवार कुर्ता जाली का’ जैसे गीत लोगों की जुबान पर चढ़ गए। जैसे जैसे आशा और नैयर की नजदीकियां बढ़ीं, गीता और शमशाद की उपेक्षा आरंभ हो गई। नैयर भूल गए कि शमशाद बेगम ने उनकी कठिन समय में मदद की थी और गीता दत्त ने उनको गुरुद्त्त से मिलवाया था। गीता दत्त ने नैयर से एक बार पूछा भी था वो क्यों उनकी उपेक्षा कर रहे हैं पर नैयर के पास कोई उत्तर नहीं था। पर जब फिल्म हाबड़ा ब्रिज में हेलेन पर फिल्माया गीत मेरा नाम चिन चिन चू को गीता दत्त की आवाज मिली तो वो बेहद खुश हो गईं थीं। ये गाना हेलेन की पहचना भी बना। हेलेन की तरह ही शम्मी कपूर को जपिंग स्टार की छवि देने में ओपी नैयर के संगीत की बड़ी भूमिका है। फिल्म तुमसा नहीं देखा के गीत और संगीत से ही शम्मी कपूर की छवि मजबूत हुई।  

ओ पी नैयर एक ऐसे संगीतकार थे जिन्होंने हारमोनियम, सितार, गिटार, बांसुरी, तबला, ढोलक, संतूर, माउथआर्गन और सेक्साफोन आदि का जमकर उपयोग किया। इन वाद्ययंत्रों के साथ जब वो प्रयोग करते थे तो गीत के एक एक शब्द का ध्यान रखते थे। ये बहुत कम लोगों को पता है कि नैयर होम्योपैथ और ज्योतिष के भी अच्छे जानकार थे। एक समय में सबसे अधिक पैसे लेनेवाले संगीतकार को बाद में अपनी जिंदगी चलाने के लिए अपना घर तक बेचना पड़ा था। पर स्वाभिमानी इतने कि अपने किसी निर्णय पर कभी अफसोस नहीं किया।  


Saturday, February 12, 2022

वैचारिक दासता से मुक्ति की दरकार


गीतकार मजरुह सुल्तानपुरी को उनकी एक कविता के लिए जेल भेज दिया गया था। तब देश में कांग्रेस का शासन था और नेहरू जी प्रधानमंत्री थे। संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान ये बातें कहीं। कुछ बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश कर करने का आरोप लगाया। नरेन्द्र मोदी को बेहतरीन गल्पकार तक बता दिया गया। विद्वान माने जानेवाले  कुछ स्तंभकारों ने प्रधानमंत्री को लेकर अनर्गल टिप्पणियां कीं। प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में दिए अपने वक्तव्य में लता मंगेशकर के भाई ह्रदयनाथ मंगेशकर को वीर सावरकर की कविता को लेकर आकाशवाणी से निकाले जाने का उदाहरण दिया। विवाद मजरुह सुल्तानपुरी पर कही उनकी बातों को लेकर आरंभ हुआ। आरोप लगानेवालों ने जो प्रसंग बताया उसके मुताबिक मजरुह वामपंथी थे। स्वाधीनता  को झूठी आजादी बताकर वामपंथियों ने उस समय की सरकार के खिलाफ आंदोलन और षडयंत्र रचा था, उसमें मजरुह की गिरफ्तारी की बात की गई।

तथ्यों को जान लेते हैं कि मजरुह की गिरफ्तारी किस वजह से हुई थी। आजादी के बाद वामपंथियों का सरकार के खिलाफ विद्रोह चल रहा था। अलग-अलग क्षेत्र में काम करनेवाले कम्युनिस्ट उस विद्रोह में शामिल हो रहे थे। हिंदी फिल्म जगत भी उससे अछूता नहीं रहा था। सिनेमा से जुड़े कुछ लेखक, गीतकार, निर्देशक और अभिनेता भी उस आंदोलन में हिस्सा ले रहे थे। मजरुह उनमें से एक थे। मजरुह जिस कवि गोष्ठी या मुशायरे में जाते थे तो एक कविता अवश्य पढ़ते थे। उस कविता की कुछ पंक्तियां थीं- ये भी है हिटलर का चेला/मार लो साथी जाने न पाए/कामनवेल्थ का दास है नेहरू/मार लो साथी जाने न पाए। इस कविता में नेहरू का नाम लेकर मजरुह ने हमला किया था और उनके पहनावे को खादी का केंचुल बताकर तंज किया था। मजरुह को मुंबई में गिरफ्तार कर लिया गया। कांग्रेस से जुड़े कई लोगों ने उनको सलाह दी कि नेहरू से माफी मांग लें तो रिहाई हो जाएगी। मजरुह ने माफी नहीं मांगी और उनको लंबा समय जेल में बिताना पड़ा। उसी समय प्रदर्शन करते समय अभिनेता बलराज साहनी भी गिरफ्तार हुए थे। कैफी आजमी गिरफ्तारी से बचने के लिए भूमिगत हो गए थे। कई फिल्मों के संवाद लेखक अख्तर उल ईमान को सरकार के खिलाफ षडयंत्र रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। अख्तर उल ईमान मशहूर अभिनेता अमजद खान के श्वसुर थे। ये तथ्य है और इसका उल्लेख सरकारी अभिलेखों में मिलता है। उस दौर में लिखी पुस्तकों में भी। बहुत संभव है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में कविता पर जेल भेजे जाने की ये पहली घटना हो। तो जो विद्वान लेखक प्रधानमंत्री को संसद की मर्यादा भंग करने की नसीहत दे रहै हैं या उनके भाषण को अर्धसत्य बता रहे हैं उनको अपने लेखन पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।

कलाकारों के खिलाफ कार्रवाई सिर्फ नेहरू जी के जमाने में ही नहीं हुई। कालांतर में जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं तो उनके कार्यकाल में भी फिल्म से जुड़े लोगों को विरोध करने की सजा मिली। प्रख्यात अभिनेता देवानंद ने अपनी आत्मकथा रोमांसिंग विद लाइफ में इमरजेंसी के दौर की एक घटना का उल्लेख किया है। देवानंद के मुताबिक इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी सातवें आसमान पर थीं। गूंगी गुड़ियानिरंकुश हो गई थीं और अपनी हनक स्थापित करने में लगी थी। संजय गांधी अपनी मां की वारिस के तौर पर खुद को स्थापित कर चुके थे। कांग्रेस ने उस समय दिल्ली में एक रैली की थी जिसमें देवानंद भी शामिल हुए थे। दिलीप कुमार भी। उन्होंने रैली के दौरान के अपने अनुभव के आधार पर लिखा कि संजय गांधी या कांग्रेस की प्रोपगंडा मशीनरी फासीवादी तरीके से काम कर रही थी। रैली के बाद देवानंद और दिलीप कुमार को कांग्रेस की तरफ से संदेश दिया गया कि दूरदर्शन केंद्र जाकर इमरजेंसी के समर्थन में बयान रिकार्ड करवाएं। दिलीप कुमार हिचक रहे थे लेकिन देवानंद ने साफ मना कर दिया कि वो इमरजेंसी के समर्थन में बयान नहीं देंगे। देवानंद ने लिखा है कि उनके मना करने के तुरंत बाद से दूरदर्शन पर उनकी फिल्मों के प्रदर्शन को बैन कर दिया गया। किसी भी सरकारी माध्यम में देवानंद के नाम लिखे जाने तक पर पाबंदी लगा दी गई। इसके पहले किशोर कुमार के साथ भी ऐसा किया जा चुका था क्योंकि उन्होंने गाने से मना कर दिया था।

इस घटना से व्यथित होकर देवानंद ने उस समनय के सूचना ओर प्रसारण मंत्री से भेंट की। मंत्री ने छूटते ही देवानंद से पूछा कि आपको दिक्कत क्या है? देवानंद ने उनको स्पष्ट किया कि वो दबाव में किसी तरह का बयान इमरजेंसी के समर्थन में नहीं दे सकते हैं। मुलाकात खत्म हो गई। कुछ दिनों बाद गांधी परिवार की करीबी अभिनेत्री नर्गिस से देवानंद की मुंबई में एक पार्टी में मुलाकात हुई। नर्गिस ने भी देवानंद से सरकार के समर्थन में बयान न देने की चर्चा की और कहा कि वो अनावश्क रूप से जिद पाले बैठे हैं। बात खत्म हो गई लेकिन जो एक पंक्ति देवानंद ने लिखी है उसका उल्लेख आवश्यक है। देवानंद के मुताबिक इस पूरे प्रकरण के बाद संजय गांधी के दरबारियों ने उनको चिन्हित कर लिया था। उस वक्त देवानंद की फिल्म देस परदेस बन रही थी और वो उसके भविष्य को लेकर चिंतित थे। देवानंद ने भले ही मना कर दिया लेकिन उस वक्त फिल्मों के अधिकांश कलाकार इंदिरा गांधी और इमरजेंसी के समर्थन में थे। इन दिनों एक वरिष्ठ अभिनेत्री लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र की बात जोर शोर से कर रही हैं, लेकिन उस वक्त आपातकाल का समर्थन किया था। इमरजेंसी में इंदिरा गांधी की सरपरस्ती में संजय गांधी के फासीवादी कदमों की चर्चा विनोद मेहता भी अपनी पुस्तक द संजय स्टोरी में करते हैं। ये सूची बहुत लंबी है। स्वतंत्र भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करने की चार बेहद गंभीर कोशिशें हुईं जो नेहरू, इंदिरा, राजीव और मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुई। इस स्तंभ में एकाधिक बार इसकी चर्चा की जा चुकी है।

अब प्रश्न ये उठता है कि जब संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात उठाकर प्रधानमंत्री ने नेहरू के दौर को याद किया तो एक विचारधारा विशेष के पोषक स्तंभकारों ने उसपर सुनियोजित तरीके से प्रतक्रिया क्यों दी। अगर आप ध्यान से प्रधानमंत्री के भाषण को सुनेंगे तो उत्तर भी उसमें ही निहित है। उन्होंने अपने भाषण में एक ईको सिस्टम की बात की। भारतीय जनता पार्टी के विरोधी कहें या कांग्रेस के समर्थकों का वो ईको सिस्टम इस तरह का है कि उसमें वैकल्पिक विचारों के लिए जगह ही नहीं है। वो सिर्फ अपने सिद्धांतों को और अपने विचारों को ही दुनिया का श्रेष्ठ विचार मानते हैं। दूसरे विचारों का उपहास करना और उनसे इतर विचारों को हेय समझना और बताना उनकी योजना का हिस्सा है। इसी श्रेष्ठता ग्रंथि को लेकर चलनेवाले स्तंभकार और कथित इतिहासकार आजाद भारत में घटी घटनाओं का विश्लेषण करते समय वैचारिक दोष के शिकार हो जाते हैं। इस कारण उनके लेखन में समग्र दृष्टि का अभाव दिखाई देता है। इतिहास पर लिखनेवालों से ये अपेक्षा की जाती है कि वो वैचारिक रूप से निरपेक्ष रहकर और समग्र दृष्टि के साथ लेखन करेंगे। अफसोस कि हमारे देश में स्वाधीनता के बाद का इतिहास लेखन वैचारिक जकड़न से मुक्त नहीं हो पाया। यह अकारण नहीं है कि स्वाधीन भारत में घटनेवाली राजनीतिक घटनाओं पर लिखते समय भी वैचारिक दासता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। स्वाधीनता के अमृत काल में वैचारिक दासता से मुक्ति भी आवश्यक है।

 

Tuesday, February 8, 2022

राम और कृष्ण की भक्त थीं लता जी


लता मंगेशकर लगातार को भक्ति के पद गाने में बहुत आनंद आता था। उन्होंने मीरा के कई पद गाए। उनको जयदेव का गीत गोविन्द भी बेहद प्रिय था। लता मंगेशकर बचपन से ही कृष्ण के प्रति आकर्षित रहती थीं। बाद में जब मीरा, सूरदास और जयदेव के पदों को पढ़ा तो उनकी कृष्ण में आस्था और गहरी हो गई। वो कोई भी गीत कागज पर लिखती थीं तो सबसे पहले वहां श्रीकृष्ण लिखती थीं और उसके बाद गीत के बोल। इससे जुड़ा एक प्रसंग लता जी ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था। लता जी का उदयपुर के महाराज महाराणा भागवत सिंह से पारिवारिक रिश्ता था। एक बार वो, पंडित नरेन्द्र शर्मा, उषा मंगेशकर और ह्रदयनाथ मंगेशकर उदयपुर गए और महाराणा मेवाड़ भागवत सिंह से मिलने उनके महल पहुंचे। भागवत सिंह बहुत प्रसन्न थे। महाराणा ने उनसे कहा कि आप तो कृष्ण की भक्त हैं, आपको मीरा के पद गाना और सुनना दोनों बेहद पसंद है। आपको अपनी पूर्वज मीराबाई के भगवान का दर्शन करवाते हैं। फिर महाराज उनको एक कमरे में लेकर गए। वहां बेहद करीने से रखे गए कृष्ण की छोटी सी मूर्ति के दर्शन करवाए। भागवत सिंह ने लता मंगेशकर को बताया कि ये कृष्ण की वही मूर्ति है जिसको गोद मे लेकर मीराबाई पूजा किया करती थीं। कृष्ण की उस मूर्ति को देखकर लता जी की आंखों में आंसू आ गए। कृष्ण भक्त लता अपने अराध्य की मूर्ति का दर्शन कर बेहद रोमांचित थीं।   

दूसरा वाकया राम भक्ति से जुड़ा है। लता मंगेशकर ‘राम रतन धन पायो’ वाला रिकार्ड तैयार कर रही थीं। उसी समय उनके बेहद नजदीकी पंडित नरेन्द्र शर्मा ने उनसे कहा कि ‘राम ऐसे अकेले भगवान हुए हैं कि अगर कोई उनकी तन मन से सेवा करे तो तो उसका सारा कार्य सिद्ध होता है। राम ही वो ईश्वर हैं जो सत्य के छोर पर खड़े होकर आपको अंत में निर्वाण की दशा में ले जाते हैं। लता मंगेशकर ने यतीन्द्र मिश्र को बताया कि, पंडित नरेन्द्र शर्मा की ये बात उनको गहरे तक छू गई और पता नहीं क्या हुआ कि इस रिकार्ड के बनते बनते तक उनकी राम में श्रद्धा बढ़ने लगी। लता जी ने आगे कहा कि, ‘तभी से मैं राम भक्त हूं और मैं मानती हूं कि उनके जैसा चरित्र बल किसी दूसरे पौराणिक किरदार में ढूंढने से नहीं मिलेगा। पंडित नरेन्द्र शर्मा ने लता जी से कहा था कि देखना तुम्हारा ये रिकार्ड सबसे अधिक चलेगा। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि जब ये रिकार्ड रिलीज हुआ तब से लेकर आजतक उसके मुकाबले कोई रिकार्ड नहीं चला। बधाई और आशीर्वाद के जितने भी पत्र आजतक मुझे मिलते रहे हैं वो पहले या बाद में कभी इस तरह से नहीं मिले। इसको मैं रामजी का आशीर्वाद मानती हूं।‘  इन दो प्रसंगों से स्पष्ट है सकता है कि लता जी बेहद धार्मिक और आस्थावान महिला थीं। 

Sunday, October 24, 2021

लता को सावरकर ने संवारा


महापुरुष वो होते हैं जो अपने ज्ञान से मानव जाति का कल्याण मात्र नहीं करते बल्कि पीढ़ियों को संस्कारित करते हैं । अपने विचार और ज्ञान से वो प्रतिभा को न सिर्फ चिन्हित करते हैं बल्कि उनको उस पथ पर चलने की प्रेरणा देते हैं जो महानता की ओर जाता है। रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद और वीर सावरकर ऐसे ही महापुरुष थे जिन्होंने अपनी वाणी और व्यक्तित्व से कई लोगों को संस्कारित किया। वीर सावरकर ने तो  न केवल भारत माता को गुलामी की जंजीर से मुक्त करने का स्वप्न देखा बल्कि उसको साकार करने के लिए लंबे समय तक भयंकर यातनाएं झेलीं। इतना ही नहीं उन्होंने अपने प्रेरणादायी व्यक्तित्व से, अपने विचारों से पीढ़ियों को प्रभावित किया। कई कई ऐसे नायक तैयार कर दिए जो भारत के भाल पर चमकता सितारा है। ऐसा ही एक सितारा है लता मंगेशकर। भारत रत्न लता मंगेशकर । 

कुछ दिनों पहले लता मंगेशकर ने लिखा,आज से 90 साल पहले 18 सितंबर 1931 को मेरे पिताजी के ‘बलवंत संगीत मंडली’ के लिए वीर सावरकर जी ने एक नाटक लिखा जिसका नाम था, संन्यस्त खड्ग। उसका पहला प्रयोग मुंबई (तब बांबे) ग्रांट रोड के एलफिस्टन थिएटर में हुआ जिसमें बाबा ने ‘सुलोचना’ की भूमिका की थी। लता मंगेशकर जब ये लिख रही थीं तो वो उस दौर कि बात कर रही थीं जब उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर अपनी संगीत मंडली के जरिए संगीत और रंगमंच की दुनिया में सार्थक हस्तक्षेप कर रहे थे। दीनानाथ मंगेशकर ने मात्र 18 वर्ष की उम्र में अपने दोस्तों के साथ मिलकर बलवंत संगीत मंडली का गठन किया था। अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे के दादा कृष्णराव कोल्हापुरे भी उस वक्त इस संगीत मंडली में बेहद सक्रिय थे। जब संगीत मंडली के कार्यक्रम लोकप्रिय होने लगे तो दीनानाथ मंगेशकर ने अपनी मंडली के लिए नए नाटक लिखवाने आरंभ किए। उस दौर में विनायक दामोदर सावरकर ने बलवंत संगीत मंडली के लिए संन्यस्त खड्ग नाटक लिखा था। जिसकी चर्चा लता मंगेशकर ने की है। ये नाटक बेहद लोकप्रिय हुआ था। दीनानाथ मंगेशकर और सावरकर के संबंध प्रगाढ़ होते चले गए। अब ये संबंध औपचारिकताओं की सीमा तोड़कर घरेलू संबंध जैसे हो गए थे। लता मंगेशकर ने कई इंटरव्यू में वीर सावरकर के साथ अपने संबंधों को बहुत आत्मीयता के साथ याद किया है। वीर सावरकर ने कैसे लता मंगेशकर के जीवन की दिशा बदल दी इसपर आने के पहले आपको बता दें कि बलवंत संगीत मंडली के मंच पर ही पहली बार लता मंगेशकर ने गाया था। इसकी बेहद दिलचस्प कहानी है जिसको लता मंगेशकर ने अपने एक इंटरव्यू में बताया है। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर अपनी मंडली के साथ कोल्हापुर गए थे, साथ में अपनी बेटी को लेकर भी गए थे। नौ साल की छोटी सी बच्ची हमेशा पिता के साथ रहती थी। वहां के माहौल को देखकर अचानक बच्ची ने पिता से स्टेज पर गाने के बारे में पूछा । पिता थोड़े चकित हुए जब बिटिया ने कहा कि वो उनके साथ गाना चाहती हैं। मुस्कुराते हुए पिता ने पुत्री को गाने की अनुमति तो दी लेकिन ये पूछा कि वो कौन सा राग गाएगी। बेटी के मुंह से निकला राग खंबावती। ये सुनकर दीनानाथ मंगेशकर को आश्चर्य तो हुआ पर प्रसन्न भी हुए। कहा चलो आज तुम स्टेज पर गाकर दिखाओ। कोल्हापुर के नूतन थिएटर में लता मंगेशकर ने राग खंबावती तो गाया ही, दो और मराठी गाने गाए। इस संगीत मंडली से भी सावरकर का गहरा जुड़ाव था।  और लता मंगेशकर के पिता उनके साथ अपने अनुभवों को साझा करते थे। एक दूसरे से सलाह मशविरा किया करते थे।

मंगेशकर परिवार में जीवन अपनी गति से चल रहा था। लता मंगेशकर जब तेरह साल की हुईं तो अचानक से उनके परिवार पर वज्रपात हुआ। उनके पिता गुजर गए। अब परिवार के सामने कई तरह का संकट खड़ा होगा। इतने कम उम्र में लता मंगेशकर के कंधे पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गई। पिता की मृत्यु के बाद लता मंगेशकर बेहुत परेशान रहने लगी थी। संघर्ष के उस दौर में भी मंगेशकर परिवार को वीर सावरकर का साथ मिला था। उन्होंने अपने सोच और विचारों से लता मंगेशकर को प्रभावित किया। यतीन्द्र मिश्र ने अपनी पुस्तक में लता मंगेशकर  की जिंदगी को अहम मोड़ देने के सावरकर के योगदान को रेखांकित किया है। अपनी किशोरावस्था में लता मंगेशकर ने समाज सेवा करने की ठान ली थी। अपने इस निर्णय के बारे में लता ने वीर सावरकर से चर्चा की थी। सावरकर ने ही उन्हें समझाया था कि तुम ऐसे पिता की संतान हो जिसका शास्त्रीय संगीत और कला में शिखर पर नाम चमक रहा है। अगर देश की सेवा ही करनी है तो संगीत के मार्फत समाजसेवा करते हुए भी उसको किया जा सकता है। यहीं से लता मंगेशकर का मन भी बदला जो उन्हें संगीत की कोमल दुनिया में बड़े संघर्ष की तैयारी के लिए ले आया। हम भारतीयों को सावरकर का ऋणी होना चाहिए कि उन्होंने एक बड़ी प्रतिभा को खिलकर सफल होने का जज्बा दिया। कल्पना कीजिए कि अगर सावरकर ने लता मंगेशकर को ये सलाह न दी होती तो क्या होता। स्वाधीनता का स्वप्न देखनेवाले एक क्रांतिवीर ने अपनी मिट्टी में जन्मी प्रतिभा को रास्ता दिखाकर उसको संवारा। बाद के वर्षों में भी लता मंगेशकर ने वीर सावरकर के लिखे कई गीतों को अपनि वाणी दी। सावरकर का शिवाजी पर लिखा एक मराठी गीत आज भी बेहद लोकप्रिय है। इस गीत के बोल हैं ‘हे हिंदू नृसिंहा प्रभो शिवाजी राजा’। लता मंगेशकर ने जब संगीत पर आधारित फिल्म बनाने की सोची तो उसका मुहुर्त वीर सावरकर से ही करवाया था। कहना ना होगा कि वीर सावरकर ने लता मंगेशकर की जिंदगी को जो दिशा दी उसने सुरों की दुनिया को लता जैसा कोहिनूर दिया। 

Monday, September 27, 2021

संघर्ष और समर्पण की सुरगाथा


लता मंगेशकर, एक ऐसा नाम जिसपर हर भारतवासी को गर्व है। संगीत की दुनिया में बेहद सम्मान के साथ इस नाम को लिया जाता है। भारत रत्न लता मंगेशकर की आवाज में जादू है, उनके अंदर ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा है आदि आदि बातें तो हम उनके बारे में सुनते ही रहते हैं लेकिन ऐसा बहुत कम बार होता है कि उनके संघर्ष को रेखांकित किया जाए। लता मंगेशकर ने उस दौर में गाना शुरु किया था जब तकनीक इतना विकसित नहीं था। साउंड रिकार्डिंग और मिक्सिंग के इतने उन्नत यंत्र नहीं थे। महल का गाना ‘आएगा आनेवाला’ ने लता को बहुत प्रसिद्धि दी। बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि इस गाने में ध्वनि का जो उतार चढ़ाव है वो किसी तकनीक के सहारे पैदा नहीं किया गया बल्कि उसकी रिकार्डिंग उस तरह से की गई। अगर आप गाने को याद करें तो अशोक कुमार जब आईने के सामने खड़े हैं और गाना शुरु होता है तो आवाज दूर से आती लगती है, खामोश है जमाना और फिर तीन चार पंक्तियों के बाद पास से आती प्रतीत होती है। तकनीक के सहारे इस तरह का ध्वनि प्रभाव पैदा किया जा सकता है लेकिन उस वक्त इसको करने के लिए गायक को बहुत मेहनत और संतुलन साधना पड़ा था। लता मंगेशकर ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि माइक्रोफोन को कमरे के बीच में रखा गया था और वो कमरे के एक कोने में खड़ी हो गई थीं। पहला छंद खामोश है जमाना गाते हुए लता जी माइक की तरफ बढ़ती जाती और जब माइक के सामने पहुंचती तो आएगा आने वाला शुरु करतीं। ये काम इतना मुश्किल था कि परफेक्शन के लिए इस प्रक्रिया को कई बार दुहराना पड़ा था। खेमचंद प्रकाश ने इस गाने को संगीतबद्ध किया था। रिकार्ड होने के बाद भी इस फिल्म के प्रोड्यूसर सावक वाचा इससे संतुष्ट नहीं थे और उनको लगता था कि ये लोकप्रिय नहीं हो पाएगा, जबकि दूसरे प्रोड्यूसर अशोक कुमार की राय भिन्न थी। इस तरह के दर्जनों उदाहरण हैं जब लता मंगेशकर ने गानों को बेहतर करने के लिए दिन दिन भर प्रयास किए। 1948- 49 वो वर्ष है जब लता मंगेशकर एक दिन में आठ आठ गाने रिकार्ड करती थीं। दो गाने सुबह, दो गाने दोपहर, दो गाने शाम और दो गाने रात में गाती थीं। कई बार ऐसा होता था कि वो सुबह घर से निकलती थीं और देर रात दो तीन बजे तक घर पहुंच पाती थीं। खाने पीने का भी कोई ठिकाना नहीं रहता था। कई बार तो ऐसा होता था कि गाने की रिकार्डिंग हो जाती थी और बाद में बताया जाता था कि रिकार्डिंग ठीक नहीं हो पाई तो फिर से गायक को बुलाया जाता था।

एक संघर्ष तो ये था लेकिन लता मंगेशकर ने वो दौर भी देखा है जब गायकों को उनके गाने का नाम नहीं मिलता था। फिल्मों में भी या बाद में जब रिकार्ड बनने लगे तो उसमें भी आरंभिक दिनों में पार्श्व गायकों को  क्रेडिट नहीं दिया जाता था। यह स्थिति बहुत लंबे समय तक रही। जब आएगा आनेवाला गाने का रिकार्ड बना तो उसपर गायिका के तौर पर कामिनी का नाम छपा । कामिनी फिल्म महल की नायिका का नाम है जिसकी भूमिका में मधुबाला थीं। कल्पना कीजिए तब लता मंगेशकर पर क्या गुजरी होगी जब उन्होंने वो रिकार्ड देखा होगा। इसके पहले जब रेडियो पर ये गाना बजाया जाता था तब इसके गायक का नाम नहीं बताया जाता था। रेडियो स्टेशन में सैकड़ों पत्र सिर्फ ये जानने के लिए आते थे कि इस गाने की गायिका कौन हैं। जब फिल्म बरसात में लता मंगेशकर को गायक के तौर पर क्रेडिट मिला तो वो बहुत खुश हुई थीं। लता मंगेशकर कोई यूं ही नहीं बन जाता। लता मंगेशकर बनने के लिए कई सालों तक तपस्या करनी होती है अपना जीवन समर्पित करना पड़ता है। मुंबई (तब बांबे) के नाना चौक इलाके के दो कमरे के छोटे से फ्लैट में मां और भाई बहनों के साथ रहते हुए लता मंगेशकर ने न दिन देखा और न रात देखी बस एक ही सपना था कि बेहतरीन गाना है। लता मंगेशकर जब भी कोई गाना गातीं तो अपने पिता मास्टर दीनानाथ मंगेशकर की दी वो सीख याद रखतीं जो उन्होंने गायन की शिक्षा आरंभ करते वक्त दी अपनी छोटी सी बेटी को दी थी। उन्होंने तब लता को कहा था कि ‘गाते समय हमेशा ये सोचना कि तुमको अपने पिता या गुरु से बेहतर गाना है।‘  लता मंगेशकर इंटरनेट मीडिया पर सक्रिय रहकर खुद को देश और समाज से जोड़े रखती हैं।


 

Saturday, December 29, 2018

युवाओं की सराहना का हो नया साल


एक दिन बाद नया वर्ष शुरू होगा। नववर्ष में तरह-तरह के संकल्प लिए जाएंगे।बुरी आदतों को छोड़ने का संकल्प, अच्छी आदतों को अपनाने का संकल्प। इन संकल्पों में एक संकल्प को शामिल करना आवश्यक है, पुरानी पीढ़ी के लेखकों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों का नई पीढ़ी के लेखकों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों के उत्साहवर्धन का संकल्प। नई पीढ़ी की प्रतिभा को पहचानने और उसको सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते हुए महत्वपूर्ण अवसरों पर चिन्हित करने का संकल्प। इस संकल्प की वकालत मैं इस वजह से कर रहा हूं क्योंकि इस वर्ष जितने भी आयोजनों में गया, उसमें ज्यादातर में पुराने लेखक और कलाकार नई पीढ़ी को कोसते नजर आए। साहित्य में भी जब नई वाली हिंदी की बात होती है तो ज्यादातर पुरानी पीढ़ी के लोग उसकी आलोचना में जुट जाते हैं। बगैर इस ओर ध्यान दिए कि ये कोई नई-पुरानी हिंदी है ही नहीं, ये तो बस मार्केटिंग का एक नुस्खा है। प्रकाशक ने हिंदी किताबों की भीड़ से अपनी किताबों को अलग दिखाने के लिए ये जुमला गढ़ा जो चल गया। इसी तरह से फिल्मों से जुड़े बुजुर्गों और खुद को संजीका फिल्म जानकार बताने वालों को सुनिए तो लगातार ये कहा जाता है कि पुराने जमाने के गाने कितने अच्छे होते थे और अब को अश्लीलता की सारी हदें पार हो गई हैं, गीतों का स्तर काफी गिरा है, कुछ भी ऊलजलूल लिखा जा रहा है आदि-आदि। जबकि स्थिति ऐसी है नहीं। अगर हम पुराने फिल्मी गानों की तुलना अब के गानों से करें तो पुराने गानों में भी अश्लीलता होती थी। अश्लीलता से भी अधिक महिलाओं के शरीर का वर्णन और प्रेम की स्थितियों का आपत्तिजनक वर्णन खुलेआम किया जाता था। ये तब की बात है जब हमारे देश में नैतिकता की खूब दुहाई दी जाती थी। फिल्मों से लेकर समाज तक में।
अगर हम आजादी के पहले की फिल्मों को देखें तो उसमें भी इस तरह के शब्द होते थे जो अश्लील और द्विअर्थी होते थे। 1944 की एक फिल्म थी मन की जीत जिसके एक गाने का वाक्य देखा जा सकता है। मोरे जुबना का देखो उभार, पापी जुबना का देखो उभार/जैसे नदी की मौज, जैसे तुर्कों की फौज/ जैसे सुलगे से बम, जैसे बालक उधम/जैसे गेंदवा खिले, जैसे लट्टू हिले, जैसे गद्दर अनार। इस गीत को लिखा है मशहूर शायर-गीतकार जोश मलीहाबादी ने और इसको गाया है जोहराबाई अंबालेवाली ने। अब इस गीत में प्रयोग किए गए शब्द को लेकर कुछ कहने की या उसकी व्य़ाख्या करने की आवश्यकता है क्या। जो लोग दबंग टू में करीना कपूर के एक आइटम नंबर को लेकर परेशान हो रहे थे उनको ये गीत सुनना और देखना चाहिए। दबंग टू के इस गीत के बोल थे अंगडाइयां लेती हूं मैं जोर जोर से, उह आह की आवाज आती है हर ओर से। उस समय से तर्क भी दिए गए थे कि गीतकार ने सारी मर्यादाएं तोड़ डाली हैं, आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया है। तब भी पुराने गीतों को बेहतर बताया गया था। उस वक्त भी लोग 1970 की फिल्म जॉनी मेरा नाम का गीत भूल गए जिसको आनंद बक्षी ने लिखा था और आशा भोंसले ने गाया था। उस गीत के बोल थे हुस्न के लाखों रंग कौन सा रंग देखोगे../आग है ये बदन, कौन सा अंग देखोगे। ये गीत पद्मा खन्ना पर फिल्माया गया था जो पूरे गीत के दौरान अपनी मादक अदाओं के साथ नृत्य करती हैं और जैसे जासे फिल्म में गाना आगे बढ़ता है वैसे-वैसे वो अपने कपड़े भी उतारती चलती हैं।
ये सिर्फ एक फिल्म या एक गाने की बात नहीं है, उस दौर में कई फिल्मों में इस तरह के गीत लिखे और फिल्माए गए थे जिसको लता मंगेशकर से लेकर आशा भोंसले तक ने अपनी आवाज दी थी। 1968 की फिल्म इज्जत का एक गाना है जिसे साहिर लुधयानवी ने लिखा था जिसके बोल हैं- जागी बदन में ज्वाला, सैंया तूने क्या कर डाला। इसमें आगे की पंक्ति है, मना मना कर हारी, माने नहीं मन मतवाला। और आगे लिखा गया अब से पहले हाल न ऐसा देखा था, अरे सोलह साल में, साल ने ऐसा देखा था। इसी वर्ष एक और फिल्म आई थी साथी। इसका एक गीत है जिसे मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा था और लता मंगेशकर ने अपनी जादुई आवाज में इसको गाया था। जरा इस गीत की पंक्तियों पर ध्यान दिया जाए और फिर उसके बारे में विचार किया जाए। गीत की पंक्तियां हैं- मेरे जीवन साथी, कली थी मैं तो प्यासी, तूने देखा खिल के हुई बहार। गीतकार आगे कहता  है, मस्ती नजर में कल के खुमार की/मुखड़े पर लाली है पिया तेरे प्यार की। गीतों में सिर्फ प्रणय निवेदन ही नहीं होता था बल्कि नायक नायिका के बीच के संबंधों को जीवंत कर दिया जाता था। गीतकार स्थितियों की कल्पना कर उसको शब्दों में पिरो देता था। लगा मंगेशकर और आशा भोंसले ने जमकर ऐसे गाने गाए थे जिनको अश्लीलता के बेहद करीब के कोष्टक में रखा जा सकता है। लिखा भी उस दौर के मशहूर गीतकारों ने।
1967 में एक फिल्म आई थी अनीता। जिसके गीत राजा मेंहदी अली खान ने लिखे थे और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने संगीत दिया था। इस गाने को लता मंगेशकर ने गाया था और उसको बोल हैं, कैसे करूं प्रेम की मैं बात, कैसे करूं मैं प्रेम की बात, हाय ए ना बाबा ना बाबा, पिछवाड़े बुड्ढा खांसता। इसमें ही आगे की पंक्ति है, काहे जोरा-जोरी मेरा घूंघटा उतारते, देख ये तमाशा दैया तारे आंखे मारते। इसमें अन्य पंक्तियां भी इसी तरह की हैं और हर स्थिति के बाद कहा जाता है कि ये कैसे करें पिछवाड़े बुड्ढा खांसता। इसके पहले 1964 में एक सुपर हिट फिल्म आई थी संगम जिसमें राज कपूर, राजेन्द्र कुमार और वैजयंतीमाला जैसी चोटी के अभिनेता और अभिनेत्री ने काम किया था। फिल्म भी सुपरहिट रही थी। उसमें हसरत जयपुरी का लिखा और लता मंगेशकर की आवाज में गाया एक गाना है, मैं क्या करूं राम मुझे बुड्ढा मिल गया। इसमें नायिका कहती हैं मैंने जो उठाया घूंघट बुड्ढा गुस्सा खा गया, अब क्या होगा अंजाम मुझे बुड्ढा मिल गया। इस तरह के सैकड़ों गाने हैं चाहे वो 1971 की फिल्म दुश्मन का गाना हो जिसे आनंद बक्षी ने लिखा था और लता मंगेशकर ने गाया था। इसके बोल थे, हो बलमा सिपहिया हाय रे...शाम को पकड़ा हाथ सबरे तक ना छोड़ा रेया फिर 1977 में आई फिल्म अब क्या होगाका गीत है मैं रात भर ना सोई रे नादान बालमां जिसमें आगे की पंक्तियां हैं कि घोड़ा पकड़कर कर रोई, खंभा पकड़कर रोई ने बेईमान बालमां। शत्रुध्न सिन्हा और बिंदू पर इस गाने को फिल्माया गया था। ये तो उस दौर की बात है अगर 1970-80 के दौर में भी देखें तो इस तरह के गाने लिखे गए। 1982 में विधाता फिल्म आई थी उसमें सात सहेलियां खड़ी खड़ी वाला जो गाना है उसके बोल भी द्विअर्थी हैं। इस गीत को भी आनंद बक्षी ने ही लिखा था।
कहने का आशय इतना है कि जब हम नई पीढ़ी को किसी परंपरा को भ्रष्ट या नष्ट करने का दोषी ठहराते हैं तो हम अपने दौर को भुला देते हैं। नई पीढ़ी या युवा पीढ़ी में भी सृजनात्मकता की कमी नहीं है, वो भी बेहद सधे हुए अंदाज में अपनी परंपरा को ही आगे बढ़ाते हैं। कला साहित्य और संस्कृति में परंपरा बहुत महत्वपूर्ण होती है। इसमें कई बार ये होता है कि उत्साह में लेखक, कलाकार थोड़ा आगे बढ़ जाते हैं । आगे बढ़ना भी चाहिए। प्रयोग करने भी चाहिए। अपने तरीके से अपनी बात कहनी भी चाहिए क्योंकि अगर सृजन लीक से हटकर प्रयोग नहीं करेगा तो सृजनात्मकता उभर कर सामने नहीं आएगी। युवाओं को खुलकर खेलने का मौका मिलना चाहिए, हर बात पर हर रचना पर, हर कृति पर टोका-टाकी होने से रचनात्मकता बाधित होने का खतरा रहता है। वरिष्ठों का काम टोकना है पर खारिज करना उचित नहीं होगा। टोकना भी देश काल और परिस्थिति के हिसाब से हो तो बेहतर होगा। नया साल युवाओं का ऐसा सृजनात्मक साल हो जिसमें उनको अपने वरिष्ठों और बुजुर्गों का साथ मिले, वरिष्ठ अपने कनिष्ठों को सही राह दिखाएं इसी कामना के साथ आप सबों को नए वर्ष की अग्रिम शुभकामनाएं।

Thursday, December 22, 2016

कैसी पहेली जिंदगानी

रेखा- ये नाम लेते ही एक ऐसे अभिनेत्री की तस्वीर सामने आती है जिसकी जिंदगी एक पहेली की तरह है । वो पहेली जिसको सुलझाने का प्रयास अबतक कई लेखकों ने किया है लेकिन वो सुलझने की बजाए उलझती चली जाती है । भारतीय फिल्मों में मीना कुमारी के बाद रेखा ऐसी अभिनेत्री के तौर पर आईं जिनकी जाति जिंदगी के बारे में जानने की प्रबल इच्छा उनके प्रशंसकों में है । रेखा ने अपने व्यक्तित्व के आसपास एक ऐसा तिलिस्म भी बनाया हुआ है जिसमें बहुत कम लोगों का प्रवेश है । रेखा की जिंदगी के कई हिस्से हैं और हर हिस्से में अलग अलग तरह का व्यक्तित्व सामने आता है । कई लेखकों ने रेखा की जिंदगी के इन अलग अलग छोरों को पकड़ने की कोशिश की है लेकिन सभी छोर किसी एक लेखक के हाथ आ नहीं पाए हैं । राजेश खन्ना पर किताब लिखकर चर्चा में आए यासिर उस्मान ने भी रेखा की जिंदगी के पन्ने पलटने की कोशिश की है । उनकी नई किताब रेखा- द अनटोल्ड स्टोरी बाजार में आई तो पाठकों ने उसको हाथों हाथ लिया । इससे एक बार फिर साबित हुआ कि रेखा में लोगों की कितनी दिलचस्पी है । चंद महीनों में यासिर की इस किताब के कई संस्करण हो गए । रेखा- द अनटोल्ड स्टोरी में कितनी अनकही है इसपर बहस हो सकती है ।
दरअसल ये किताब बगैर रेखा से बात किए लिखी गई है । लेखक के मुताबिक उन्होंने रेखा से कई
बार बात करने की कोशिश की लेकिन वो सफल नहीं हो सके । दरअसल रेखा अपने आसपास जिस तरह का माहौल बनाकर रखती हैं या फिर अपने व्यक्तित्व को जिस तरह के आवरण में ढंक कर चलती हैं उसमें बगैर उनसे बात किए उनके व्यक्तित्व की परतों को खोलना मुमकिन ही नहीं है । महज चौदह साल की उम्र में हिंदी फिल्मों में कदम रखनेवाली रेखा बोल्ड सीन को लेकर चर्चित हुईं । साठ के दशक के आखिरी वर्षों में या फिर सत्तर के दशक की शुरुआत में रेखा अपनी बिंदास अदाओ के साथ-साथ बेबाक बोल की वजह से भी लोकप्रिय हुई थी । छुटपन की उस उम्र में भी रेखा को पता था कि फिल्मी पत्रिकाओं पर कैसे राज किया जा सकता है और उसने किया भी।
कई वर्षों तक वो बी ग्रेड की फिल्मों में काम करती रहीं लेकिन बावजूद इसके रेखा को करीब करीब सभी हिंदी अंग्रेजी फिल्मी पत्रिकाओं में प्रमुखता से जगह मिलती रही । रेखा की इस काबिलियत पर भी अलग से विचार करने की जरूरत है । बी ग्रेड फिल्मों में सेक्सी डांस करनेवाली रेखा ने ऐसा क्या कर दिया कि अभी हाल ही में यतीन्द्र मिश्र की लता की सांगीतिक यात्रा पर लिखी किताब लता सुरगाथा में जब लेखक उनसे पूछते हैं कि बाद की पीढ़ी में कौन सी अभिनेत्री उनको जंची ? जबाव में पहला नाम- रेखा । इसमें कोई शक नहीं कि उनकी एक्टिंग कमाल की है । डांसर तो वो हैं ही, उमराव जान में उनके जैसा काम आज भला कितने लोग कर सकते हैं ? उन्होंने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया था । आज भी उमराव जान मेरी पसंद की फिल्मों में शामिल है ।लता मंगेशकर ने रेखा के बारे में एक और दिलचस्प बात कही- और सबसे बड़ी बात ये है कि वो साउथ इंडियन होते हुए भी उर्दू अच्छा बोलती हैं । वे लाजवाब ढंग से सुंदर हैं और यह सवाल ही नहीं उठता है कि वेव किसी फिल्म में कम अच्छा काम करें । वह जिस फिल्म में होती हैं,वह फिल्म अपने आप उपर उठ जाती हैं । आप उऩकी उत्सव देखें, तो उसमें वो जिस तरह से राजनर्तकी बनकर अपना पूरा किरदार संभाल रही हैं वह बहुत सुन्दर है । उनका सिलसिला का रोल भी मुझे पसंद है । उनकी हर फिल्म को देखकर यह लगता है कि वह अपने किरदार को समझकर करती हैं । मुझे रेखा जैसी समझदार अभिनेत्री जल्दी दूसरी दिखाई नहीं पड़ती ।
लता मंगेशकर ने रेखा की जिन खूबियों को गिनाया है उसपर यासिर उस्मान ने भी अपनी किताब रेखा- द अनटोल्ड स्टोरी में विचार किया है या फिर इन बातों का जिक्र है । जैसे लता मंगेशकर इस बात से मुतमईन हैं कि रेखा उर्दू अच्छा बोलती हैं । दरअसल अगर यासिर की किताब में उल्लिखित तथ्यों को मानें तो रेखा को तमिल छोड़कर कोई भाषा आती नहीं थी लेकिन उसमें सीखने की जबरदस्त क्षमता थी । जब निर्माता कुलजीत पाल रेखा जो उस वक्त भानुरेखा को साइन करने के लिए उसके घर पहुंचे तो उन्होंने पूछा कि क्या तुम अंग्रेजी बोल सकती हो तो रेखा ने साफ कहा नहीं । लेकिन उसकी मां ने कुलजीत को भरोसा दिया कि रेखा में सीखने की जबरदस्त क्षमता है । रेखा का टेस्ट लेने के लिए कुलजीत ने हिंदी की चंद लाइनें रोमन में लिखकर उसको दी । जबतक वो चाय पीते तबतक रेखा कमरे से वापस आई और बोली- सतीश, अब तो वो दिन आ गए हैं कि तुम्हारे और मेरे बीच में एक फूलों का हार भी नहीं होना चाहिए, हमारे दो जिस्म और दो जान एक होने चाहिए ।इतना साफ उच्चारण कि कुलजीत हैरान । रेखा को फिल्म के लिए साइन कर लिया जाता है । बाद में भी रेखा कठिन से कठिन डॉयलॉग को अपनी इस क्षमता की वजह से बेहतर तरीके से डिलीवर कर पाईं। कहा तो ये भी जाता है कि अमिताभ बच्चन की संगति में रेखा ने अपने उच्चारण पर बहुत काम किया । कहा तो ये भी जाता है कि रेखा का मेकओवर भी अमिताभ के संपर्क में आने के बाद ही हुआ । रेखा के बारे में कहने को बहुत कुछ है और कहा भी बहुत गया है । यासिर ने इन सारे कहे गए को एक साथ अपनी इस किताब में इकट्ठा किया है ।
रेखा ने बहुत ही कम उम्र में जिंदगी के कई रंग देख लिए । बचपन में अवैध संतान होने का दंश झेलने के बाद जब उसकी मां गरीबी से उबकर हिंदी फिल्मों की ओर रुख करती है । वो दौर बॉलीवुड में गोरे रंग की नायिकाओं का दौर था लेकिन सांवली या लगभग काली होने के बावजूद रेखा ने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाई । हलांकि अपनी इस उपस्थिति को दर्ज करवाने की रेखा ने लगभग अपमानजनक संज्ञाओं के साथ कीमत भी चुकाई । उसको सेक्स बम से लेकर मर्दों को छीनने जैसे उपमाओं से नवाजा गया लेकिन बेफिक्र रेखा अपनी राह पर आगे चलती गई । यासिर की किताब में रेखा के कई प्रेम प्रसंगों का उल्लेख मिलता है जिसमें विनोद मेहरा से लेकर जीवन के बेटे किरण कुमार से चले उनके इश्क का जिक्र है । इस बात के भी संकेत हैं कि रेखा इनमें से कइयों के साथ सहजीवी भी रहीं लेकिन तब भी उनकी उम्र बीस पच्चीस साल के बीच ही थी । विनोद मेहरा के साथ तो शादी भी की लेकिन उनकी मां की वजह से वो ससुराल में रह नहीं सकीं और उनका संवंध विच्छेद हो गया । उस दौर में रेखा की खुदकुशी की कोशिशों का भी जिक्र है । ये किताब रेखा की दिल्ली के कारोबारी मुकेश अग्रवाल के साथ शादी के प्रसंग से शुरू होती है और फिर वो उनके अतीत और वर्तमान में आवाजाही करती है । मुकेश अग्रवाल के साथ उनके संबंधों का अंत मुकेश की खुदकुशी से होता है । खुदकुशी की वजह क्या रही थी इसपर लेखक ने निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा है लेकिन उन्होंने बेहद संवेदनशीलता के साथ दोनों के संबंधों को उस दौर के उनके दोस्तों और पत्रिकाओं में छपे लेखों को आधार बनाते हुए विस्तार दिया है । रेखा पर बात हो और उसमें अमिताभ बच्चन के साथ उनके प्रेम संबंधों का जिक्र ना हो ये मुमकिन ही नहीं है । यासिर ने भी अपनी किताब के कई हिस्से इस प्रेम संबंध पर लिखे हैं । सबसे दिलचस्प किस्सा है सिलसिला फिल्म के दौरान और उसके पहले के स्टार कास्ट को फाइनल करने का प्रसंग । यश चोपड़ा ने कितने पापड़ बेले थे जब रेखा, अमिताभ और जया को इस फिल्म में काम करने के लिए तैयार किया था ।  
उनहत्तर में हिंदी फिल्मों में कदम रखनेवाली रेखा दो साल के अंदर प्रोड्यूसर्स की पसंद बनकर उभरती है । बहत्तर और तिहत्तर दो सालों में उनकी सोलह फिल्में रिलीज होती हैं लेकिन उनको एक अभिनेत्री के तौर पर पहचान नहीं मिल पाती है । उनहत्तर में ही उनपर श्याम बेनेगल की नजर पड़ती है जो उस वक्त विज्ञापन फिल्में बनाते थे । उन्होंने गोल्ड स्पॉट के विज्ञापन में रेखा को फीचर किया था जिसमें रेखा अपनी दिलकश अंदाज में कहती हैं – ताजगी के पास आइए, अपनी प्यास बुझाइए । उस दौर रेखा का ये पोस्टर काफी चर्चित रहा था और उनकी सेक्सी बाला की छवि को उभारता था । रेखा पर लिखी इस किताब को जब आप एक बार पढ़ना शुरू करेंगे तो पढ़ते चले जाएंगे क्योंकि उनकी जिंदगी से जुड़े लगभग सारे गॉसिप एक जगह पढ़ने को मिल जाते हैं । यासिर ने रेखा के समकालीन अभिनेत्रियों के हवाले से भी कई बातें कही हैं । कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो ये किताब दिलचस्प बनी है लेकिन रेखा के अभिनय कला से ज्यादा इसमें उनकी जाति जिंदगी की कहानियां हैं जो कमोबेश पहले से ज्ञात हैं ।   


Saturday, May 28, 2016

मुबारक बेगम को मदद का इंतजार

आज के दौर के फिल्म संगीत और गाने के प्रेमियों के लिए मुबारक बेगम का नाम भले ही अनजाना हो लेकिन साठ और सत्तर के दशक में मुबारक बेगम के गाए गीत खूब लोकप्रिय हुआ करते थे । मुबारक बेगम ने एक सौ पंद्रह फिल्मों में करीब पौने दो सौ गाने गाए हैं । मुबारक बेगम ने अपना पहला गाना उन्नीस सौ उनचास में फिल्म आइए के लिए गाया था । इनको पार्श्वगायकी का पहला मौका देने वाले थे उस दौर के मशहूर संगीतकार शौकत हैदरी उर्फ नाशाद । मुबारक बेगम का पहला गाना था- मोहे आने लगी अंगड़ाई, आ जा आ जा बलम हरजाई । इस फिल्म में ही मुबारक बेगम ने लगा मंगेशकर के साथ एक डूयट भी गाया था- जिया डोले ही जिया डोले ही किसी के ख्याल में । उसके बाद उन्नीस सौ इकसठ हमारी याद आएगी का गाना- कभी तन्हाइयों में हमारी याद आएगी, अंधेरे छा रहे होंगे कि बिजली कौंध जाएगी -को लोगों ने काफी पसंद किया था । मुबारक बेगम ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि इस गीत के बोल उनकी जिंदगी में साकार हो उठेंगे लेकिन ऐसा हो गया है । मुंबई के बीएसईएस अस्पताल के बिस्तर पर गुमनामी में अपना इलाज करवा रही मुबारक बेगम तन्हाइयों में अपनी सफलता के दौर को याद कर रही हैं । उन्हें भी इस बात का इंतजार है कि उनकी जिंदगी में छाए अंधेरे में कोई बिजली कौंधेगी । कोई रौशनी होगी जो उनकी अंधेरी जिंदगी में थोड़ा प्रकाश भर देगी । तेइस साल तक फिल्म इंडस्ट्री में अपनी प्रतिभा के दम पर बनी रहने और हर साल कई कई हिट गाने गाने के बाद भी आज अस्सी साल की उम्र में मुफलिसी में इलाज के लिए मदद का मुंह जोह रही  हैं मुबारक बेगम । उन्नीस सौ तिरसठ में सुपरहिट फिल्म हमराही का गाना- मुझको अपने गले लगा लो - जब मुबारक बेगम ने गाया था तब उस वक्त भी उनकी आवाज को लेकर खूब प्रसिद्धि मिली थी लेकिन उस गाने के पचपन साल बाद भी अस्पताल के बेड पर मुबारक बेगम सोच रही होंगी कि काश कोई मुझे अपने गले लगा ले यानि मदद का हाथ फैलाए । गले लगाने का सरकार ने वादा किया था लेकिन वो हो ना सका । अस्सी साल की उम्र में तंगहाली में रह रही मुबारक बेगम ने अपने श्रेष्ठ दौर में पैसों को अहमियत नहीं दी  वो कहती हैं उस वक्त फिल्मों में गाने के लिए ज्यादा पैसे नहीं मिलते थे । एक गाने के तीन चार सौ रुपए मिला करते थे और वो यह भी बताती हैं कि वो गाने के लिए पैसों को लेकर मोलभाव नहीं करती थीं जो भी जितना देता था रख लेती थी । सच्चा कलाकार ऐसा ही होता है वो अपनी कला का सौदा नहीं करता है । मुबारक बेगम के दौर के पहले के संगीतकार नौशाद ने वो वो मुकाम हासिल किया था जो आमतौर पर नायकों को ही हासिल हो पाता था । वो किसी भी फिल्म में संगीत देने के लिए मुंहमांगी रकम लेते थे । उनका जो मन होता था वो मांगते थे और फिल्म निर्माता उतना पैसा देते थे । पचास के दशक में नौशाद एक फिल्म के एक लाख दस हजार रुपए लेते थे जबकि निर्देशकों को उसका आधा पैसा भी नहीं मिलता था । कई फिल्मों में तो नायकों को भी इतना मेहनताना नहीं मिलता था । बाद में तो शंकर-जयकिशन की जोड़ी ई जो प्रति फिल्म बीस हजार रुपए पर काम करने लगी थी लेकिन तब भी नौशाद की शान और दाम दोनों में कोई कमी नहीं आई । नौशाद के संगीत का ये जलवा था कि उनका नाम देखकर ही फिल्में हिट हो जाती थी । कहते हैं कि ये नौशाद के नाम का ही असर था कि दर्शकों और श्रोताओं को भरमाने के लिए नक्शब ने शौकत देहलवी का नाम नाशाद रख दिया था । ये वही नाशाद थे जिन्होंने मुबारक बेगम को ब्रेक दिया था । यह अलहदा बात है कि नाशाद कभी भी नौशाद के स्तर तक नहीं पहुंच पाए लेकिन उन्होंने कई बेहतरीन गाने दिए । उन्होंने अपने संगीत में कई तरह के प्रयोग किए । खैर ये अवांतर प्रसंग है ।   
ये सुनने में अच्छा लगता है कि कला का सौदा नहॆं किया जाना चाहिए लेकिन जब कलाकरों को वक्त के उबड़खाबड़ रास्ते पर चलना होता है तो उनको कई बार अफसोस होता है कि काश अपने अच्छे दिनों का सौदा कर लिया होता या अपने फन के लिए उचित पैसे ले लिए होते तो आज ये दिन नहीं देखने होते। हमें पता नहीं कि इन दिनों मुबारक बेगम को इस बात का अफसोस हो रहा है या नहीं कि उन्होंने अपने अच्छे समय में पैसे को लेकर मोलभाव क्यों नहीं किए थे । क्यों नहीं उन्होंने गाने के लिए ज्यादा पैसों की मांग की थी । लेकिन उन्हें इस बात का बेहद अफसोस है कि मदद का ऐलान करने के बावजूद महाराष्ट्र सरकार उनकी मदद के लिए अबतक आगे नहीं आई है । खुद महाराष्ट्र के संस्कृति मंत्री के ऐलान के बावजूद मदद नहीं मिलने से हमारी व्यवस्था की संवेदनहीनता उजागर होती है । मदद तो दूर की बात सरकार का कोई नुमाइंदा मुबारक बेगम का हाल चाल लेने अस्पताल तक नहीं पहुंचा । इन दिनों मुबारक बेगम की मदद उनके साथ फिल्मों में गायकी करनेवाली लता मंगेशकर कर रही हैं और बहुधा दवाइयों का खर्चा सलमान खान उठा रहे हैं । लता मंगेशकर पैसों से भी उनकीमदद करती हैं लेकिन वो उनकी बीमारी को देखते हुए नाकाफी है ।  कुछ दिनों पहले सैकड़ों फिल्मों में काम करनेवाले मशहूर अभिनेता ए के हंगल की मुफलिसी की खबरें भी आईं थी । तब भी सरकार की संवेदनहीनता पर सवाल उठे थे लेकिन तब से लेकर अबतक कोई बदलाव नहीं आ पाया है । कलाकार को, लेखक को, अभिनेता को तो हमें अपनी विरासत की तरह सहेज कर रखना चाहिए लेकिन हो यह रहा है कि ये भी विरासत की तरह ही नष्ट होते जा रहे हैं । कलाकारों को सरकार की तरफ से तवज्जो ही नहीं मिल रही है, मदद की बात तो दूर । क्या केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती कि वो इतनी अच्छी गायिका की उनके बुरे दिनों में मदद करे । क्या संगीक नाटक अकादमी के पास इस बात के लिए पैसे नहीं हैं कि वो मुबारक बेगम के अच्छे इलाज का इंतजाम करवा सके । इन अकादमियों को क्या सिर्फ पुरस्कार, गोष्ठी और सेमिनारों तक सीमित कर दिया जाना चाहिए । इस वजह से काफी समय से एक मांग उठ रही है कि मुफलिसी के वक्त कलाकारों,लेखकों की मदद के लिए एक कोष की स्थापना की जाए और उसमें संबंधित अकादमियों के नुमाइंदों के साथ साथ उस क्षेत्र की एक एक मशहूर हस्तियां भी हों । इस कोष में सरकार एक आधार राशि अनुदान के तौर पर दे और उसके बाद इंडस्ट्री और कला प्रेमियों से डोनेशन लेकर इस फंड को बढ़ाने की कोशिश की जानी चाहिए । ताकि वक्त जरूरत कलाकारों और लेखकों की मदद की जा सके । हमें याद पड़ता है कि हिंदी के वरिष्ठ कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने भी अपनी जिंदगी के आखिरी साल मुफलिसी में ही गुजारे थे । जब उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को जब इस बात का पता चला था तब उन्होंने साहित्य अकादमी के मार्फत निराला जी की मदद करवाई थी । सवाल यही उठता है कि क्यों लेखकों को इस स्थिति का सामना करना पड़ता है । फिल्मों में गायक गायिका से लेकर सबने अब अपनी आर्थिक स्थिति के मद्देनजर अपने को मजबूत बनाने का काम किया और अपनी जिंदगी के पूर्वार्ध की आर्थिक सुरक्षा पक्की कर ली । लेकिन हिंदी साहित्य की स्थिति अब भी जस की तस बनी हुई है । आज भी हिंदी साहित्य रचकर जीविकोपार्जन कर पाना मुश्किल है । शायद ही हिंदी का कोई साहित्यकार हो जो सिर्फ साहित्य सृजन कर अपनी जिंदगी अच्छे से रह सकता है ।

साहित्यकारों और संगीतकारों और गायकों की मदद करने के लिए कई निजी संस्थाएं सक्रिय हैं लेकिन उनकी सक्रियता काफी नहीं है । मुंबई में ही एक कार्यक्रम रहमतें के नाम से होता है और उसको आयोजित करनेवाली संस्था हर साल कलाकारों की मदद करती है । मदद करने का उनका अपना अनूठा तरीका है वो कलाकारों का एक निश्चित रकम का बीमा करवाकर उनको देती है जो मौके पर काम आ सके । इसी तरह से कई निजी कंपनियां कलाकारों की समय समय पर मदद करती हैं लेकिन कोई केंद्रीय संस्था नहीं है जो कलाकारों, लेखकों को उनके बुरे वक्त में मदद कर सके ।