Translate

Showing posts with label राजकमल प्रकाशन. Show all posts
Showing posts with label राजकमल प्रकाशन. Show all posts

Saturday, March 12, 2022

प्रश्नों के घेरे में लेखक प्रकाशक संबंध


हिंदी साहित्य में इन दिनों एक बार फिर से विनोद कुमार शुक्ल की चर्चा हो रही है। चर्चा उनकी किसी कृति को लेकर नहीं बल्कि उनके एक बयान को लेकर हो रही है। इंटरनेट मीडिया पर वायरल एक वीडियो में वो अपनी पुस्तकों के प्रकाशकों से नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं। उनको इस बात का मलाल है कि उनके प्रकाशकों ने उनकी पुस्तकों पर रायल्टी कम दी या रायल्टी देने में गड़बड़ी की। इस वीडियो के पहले फिल्मों से जुड़े मानव कौल ने विनोद कुमार शुक्ल को मिलनेवाली रायल्टी के बारे में लिखा था। विनोद कुमार शुक्ल की आयु 85 वर्ष से अधिक हो रही है। इस उम्र में उन्होंने रायल्टी का मुद्दा उठाया, अच्छी बात है। उनकी पुस्तकों के प्रकाशकों, राजकमल और वाणी प्रकाशन, ने भी अपना पक्ष सार्वजनिक रूप से सामने रखा। इन दोनों प्रकाशकों के प्रमुखों ने विनोद जी को सम्मानित लेखक बताया और उनको समय पर रायल्टी देने की बात कही। 1990 के बाद के वर्षों में विनोद कुमार शुक्ल को लेकर अशोक वाजपेयी और उनकी मंडली के लोग खूब चर्चा करते थे। 1994 में अशोक वाजपेयी को जब संस्कृति मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहते साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल गया तो उनकी मंडली ने विनोद कुमार शुक्ल के पक्ष में माहौल बनाना आरंभ किया था। उस वक्त साहित्य जगत में ये चर्चा हुई थी कि कवि विष्णु खरे ने विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ का प्रकाशन अरुण माहेश्वरी से बात करके वाणी प्रकाशन से करवाया था। चर्चा तो इस बात की भी हुई थी कि वाणी प्रकाशन ने उपन्यास लेखक को अग्रिम भुगतान किया था। विनोद जी हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक हैं। उनकी बात को हिंदी जगत में गंभीरता से लिया जाता है। उन्होंने रायल्टी का मसला छेड़ा है तो उनको ये भी बताना चाहिए कि ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ का अनुबंध कब हुआ था और उसकी शर्तें क्या थीं। क्या पुस्तक प्रकाशन के पहले अनुबंध हुआ था या प्रकाशन के बाद, आदि। 

1997 में विनोद कुमार की पुस्तक ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ का प्रकाशन हुआ और दो वर्षों के बाद 1999 में इस पुस्तक पर उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। अकादमी पुरस्कार के बाद विनोद जी की पुस्तकों की बिक्री बढ़ी होगी, ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है। श्रद्धा से मुक्त होकर विचार करना होगा कि क्या विनोद कुमार शुक्ल की पुस्तकें अब भी उतनी ही संख्या में बिकती हैं जितनी बीस वर्ष पहले बिका करती थीं। कोई भी पुस्तक अपने प्रकाशन के दो तीन वर्षों तक अधिक संख्या में बिकती है और उसके बाद धीरे धीरे उसकी बिक्री कम हो जाती है। विनोद कुमार शुक्ल की पुस्तकें इसका अपवाद नहीं हो सकती हैं। किंडल आदि पर तो बिक्री का आंकड़ा पारदर्शी होता है। उसमें तो किसी भी तरह की गड़बड़ी की भी नहीं जा सकती। जितना डाउनलोड होगा उतनी संख्या पता चल जाएगी।  हिंदी साहित्य में इन दिनों एक चिंताजनक प्रवृत्ति देखने को मिल रही है, वो ये कि साहित्य से जुड़े कुछ लोग साहित्यिक मसलों का फेसबुक पर फौरी हल चाहते हैं। इस मामले में भी ऐसा ही  देखने को मिल रहा है। जिनको प्रकाशन जगत की बारीकियों का कुछ भी नहीं पता वो भी क्रांति की पताका लेकर फेसबुक पर विनोद कुमार शुक्ल के पक्ष में नारेबाजी कर रहे हैं। जबकि इस पूरे मसले को समग्रता में देखे जाने की जरूरत है। इस पर विचार करने की भी आवश्यकता है कि विनोद कुमार शुक्ल जैसे सम्मानित लेखक को इस उम्र में ऐसे सवाल क्यों उठाने पड़ रहे हैं। कुछ वर्षों पूर्व निर्मल वर्मा की पुस्तकों की रायल्टी को लेकर विवाद उठा था। निर्मल जी की पत्नी गगन गिल ने तो झुब्ध होकर प्रकाशक बदल दिया था। इन दो लेखकों के अलावा भी लेखकों और प्रकाशकों के बीच रायल्टी को लेकर विवाद होते रहते हैं। दरअसल हिंदी प्रकाशन जगत अनुबंध से अधिक संबंध के आधार पर चलते रहे हैं। पुस्तक प्रकाशन के समय कम ही लेखक अनुबंध पर जोर देते हैं और इससे भी कम लेखक अनुबंध की शर्तों को लेकर प्रकाशक से बातचीत करते हैं। लेखक का जोर तो पुस्तक के प्रकाशन को लेकर रहता है। हिंदी प्रकाशन में कोई मानक अनुबंध नहीं है, अलग अलग प्रकाशकों के अलग अलग अनुबंध पत्र हैं। 

स्वाधीन भारत में पहली बार रायल्टी को लेकर पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने टिप्पणी की थी। 13 मार्च 1954 को साहित्य अकादमी के तत्कालीन सचिव कृष्ण कृपलाणी को नेहरू ने एक पत्र लिखा था। उस पत्र में उन्होंने निराला जी की आर्थिक मदद की बात की। उसी पत्र में नेहरू ने लिखा था प्रकाशकों ने निराला की पुस्तकें बेचकर काफी मुनाफा कमाया लेकिन निराला को बहुत कम राशि मिली। नेहरू ने इसको प्रकाशकों के लेखक के शोषण का शर्मनाक मसला बताया था। उन्होंने अकादमी से कापीराइट एक्ट में बदलाव को लेकर गंभीरता से काम करने की सलाह भी दी थी। कापीराइट एक्ट में बदलाव तो हुए लेकिन रायल्टी का मसला नहीं सुलझ पाया। नेहरू के कालखंड में भी और उसके बाद भी जो लोग साहित्य की दुनिया में प्रभावशाली रहे उन्होंने लेखक प्रकाशक संबंध को लेकर कोई काम नहीं किया। अगर किया होता तो आज विनोद कुमार शुक्ल को ये सब कहने की जरूरत नहीं पड़ती। एक विशेष कालखंड में हिंदी में लेखक संघ प्रभावी रहे हैं। प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच जैसे वाम विचार वाले लेखक संगठनों ने रायल्टी के मुद्दे पर कोई गंभीर पहल तो दूर की बात गंभीर मंथन भी नहीं किया। नामवर सिंह प्रगतिशील लेखक संघ से लंबे समय से जुड़े रहे और वो राजकमल प्रकाशन के भी सलाहकार रहे लेकिन लेखक-प्रकाशक अनुबंध के मानकीकरण की दिशा में कोई काम नहीं किया। साहित्य अकादमी में भी नामवर सिंह और उनके खेमे के लेखकों का दबदबा रहा लेकिन रायल्टी का मसला वहां भी दबा ही रहा। बात बात पर अपील जारी करनेवाले लेखकों ने भी कभी रायल्टी के मुद्दे को अपने एजेंडे में शामिल नहीं किया। कश्मीर समस्या से लेकर साप्रदायिकता पर लेखकों को एकजुट करने का दावा करनेवाले अशोक वाजपेयी ने भी रायल्टी के मसले पर कोई पहल की हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। वामपंथी लेखकों ने भी लेखकीय अधिकार के लिए कभी एकजुट होकर आवाज नहीं उठाई। वामपंथी लेखकों ने प्रकाशकों के साथ मिलकर स्वयं का स्वार्थ साधा और खामोश रहे। 

विनोद कुमार शुक्ल ने अगर अपनी लोकप्रियता के कालखंड में रायल्टी का प्रश्न उठाया होता तो ज्यादा असरदार होता। वाणी प्रकाशन और राजकमल प्रकाशन के बयानों को देखें तो उसमें विनोद कुमार शुक्ल को ज्यादातर समय अग्रिम भुगतान ही होता रहा है। फेसबुक के क्रांतिवीरों को भी ये देखना चाहिए और इसपर भी सवाल खड़े करने चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की है कि रायल्टी के मुद्दे पर ठोस और सकारात्मक पहल हो। लेखकों और प्रकाशकों को अनुबंध के मानकीकरण की दिशा में काम करना होगा। रायल्टी ठीक से और समय पर मिले इसके लिए एक ऐसा तंत्र विकसित करना होगा जिसमें किसी तरह की शंका की गुंजाइश न रहे। पुस्तकों की बिक्री के आंकड़ों का रिकार्ड रखने के लिए भी एक पारदर्शी तंत्र बनाना होगा। लेखकों को भी पुस्तक प्रकाशन के पहले अनुबंध को ध्यान से देखना चाहिए। ‘किसी तरह पुस्तक छप जाए’ की मानसिकता से बाहर निकलना होगा। प्रकाशकों को भी खुले दिल से लेखकों के साथ बैठकर इस समस्या को दूर करना चाहिए। कोरोनाकाल में प्रकाशन जगत संकट के दौर से गुजर रहा है। लेखकों और प्रकाशकों को रायल्टी के साथ साथ पुस्तको की बिक्री बढ़ाने के उपायों पर भी संयुक्त रूप से विचार करना चाहिए। 

Saturday, July 17, 2021

लापरवाहियों से खंडित होता इतिहास


मेरे एक मित्र हैं, संजीव सिन्हा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं। दो दिन पहले उन्होंने चहकते हुए फोन किया, भाई साहब, नामवर सिंह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संस्थापक थे, क्या आपको मालूम है? जब संघ पर प्रतिबंध लगा था तो वो जेल भी गए थे। मैंने अनभिज्ञता प्रकट की तो उन्होंने पूरा प्रकरण बताया। दरअसल हुआ ये है कि नामवर सिंह की एक जीवनी प्रकाशित हुई है, नाम है ‘अनल पाखी’। इस जीवनी को लिखा है अंकित नरवाल ने। इस पुस्तक में हिंदी के शिक्षक-लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी के हवाले से नामवर सिंह को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का अपने जिले का संस्थापक बताया गया है। दरअसल 2017 में नामवर सिंह और विश्वनाथ त्रिपाठी की एक बातचीत प्रकाशित हुई थी जो बाद में 2019 में एक पुस्तक में संकलित हुई। पुस्तक का नाम है ‘आमने-सामने’। प्रकाशक हैं राजकमल प्रकाशन। इस पुस्तक का संकलन-संपादन किया है नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह ने। इसका प्रकाशन जुलाई 2019 में हुआ था। हम इस विषय़ पर आगे बात करें इसके पहले साक्षात्कार का वो अंश देख लेते हैं जिसके आधार पर जीवनीकार से भूल हुई है। विश्वनाथ त्रिपाठी का प्रश्न है, आप पहले आरएसएस में थे, फिर वामपंथी कैसे हो गए? नामवर सिंह का उत्तर है, ‘मैं कोई किताब या मार्क्स को पढ़कर प्रगतिशील नहीं हुआ। लेकिन हां, मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अपने जिले के संस्थापकों में से हूं। गांधी की हत्या के बाद तीन महीने जेल में भी था, पुणे से मुझे लखनऊ सेंट्रल जेल भेजा गया। जब छूटा तो अटल जी मेरे सम्मान में जेल के द्वार  पर खड़े थे। मैंने उनको कविताएं भी सुनाई थीं। आरएसएस में था जरूर लेकिन मुसलमान और वामपंथियों से मेरी दोस्ती थी।...संघ हिंदू संगठन है और वहां भी पैसे वालों का दबदबा है। जात-पात छूआछूत जैसी विसंगतियां देखने को मिलीं। इसी वर्गभेद की वजह से मैं वामपंथ में चला गया।‘ 

इन बातों के सामने आने के बाद विश्वनाथ त्रिपाठी की तरफ से किसी और ने सफाई पेश की। सफाई में कहा गया कि ‘नामवर जी आजीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी विचारधारा के सक्रिय विरोधी रहे थे। नामवर सिंह मार्क्सवादी थे, प्रगतिशील लेखक संघ और सीपीआई से संबद्ध थे। सीपीआई के उम्मीदवार के तौर पर चंदौली से लोकसभा चुनाव भी लड़े थे।‘  विश्वनाथ त्रिपाठी के भक्त और कम्युनिस्ट लेखक इस अभियान में लग गए हैं कि उनको इससे बरी कर दिया जाए। चाहे कितना भी बड़ा अभियान चला लें,इस साहित्यिक अपराध को ढंकने की कितनी भी कोशिश की जाए, लेकिन ये अक्षम्य है। चार साल पहले एक साक्षात्कार छपा,फिर दो साल पहले वो बातचीत एक पुस्तक में संकलित हुई, लेकिन विश्वनाथ जी दोनों को ही देख नहीं पाए। क्या ये मान लिया जाए कि हिंदी का ये लेखक अपना लिखा नहीं पढ़ते हैं या अपने कृतित्व को लेकर बेहद असावधान हैं। इस जीवनी के प्रकाशक भी पूरे मामले को ढंकने की कोशिश कर रहे हैं और इस पुस्तक की बची हुई प्रतियों पर चिट लगाकर भूल सुधार की डुगडुगी बजा रहे हैं। अगले संस्करण में उस अंश को हटाने की घोषणा भी की गई है। सवाल फिर वही उठता है कि जो प्रतियां बिक गईं या जो पाठकों तक पहुंच गईं या जो बातें इंटरनेट मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक हो गईं उनका परिमार्जन कैसे हो पाएगा। हो भी पाएगा या नहीं।  

जीवनीकार अंकित नरवाल से गलती ये हुई कि उन्होंने इस तथ्य की पुष्टि के लिए विश्वनाथ त्रिपाठी से स्पष्ट रूप से इस मुद्दे पर बात नहीं की और प्रकाशित बातचीत को सही मान लिया। बहुधा लेखक ऐसा करते हैं। अंकित ने दावा किया है कि ‘इसके संबंध में विश्वनाथ त्रिपाठी जी से मेरी बातचीत हुई थी। उनसे पूरी तरह यह पांडुलिपि तैयार होने से पहले और बाद में भी घंटों-घंटो बातचीत होती थी। उन्होंने अपनी बातचीत में हमेशा यह दोहराया है कि उन्होंने नामवर जी के बारे में जो इधर-उधर संस्मरण लिखे हैं, वह सभी प्रामाणिक तथ्य हैं। उनके साथ हुए साक्षात्कारों के संबंध में भी उनकी यही दृढ़ता बनी रहती थी। अब जब यह मामला तूल पकड़ गया है, तो उन्होंने अपने उस साक्षात्कार से किनारा कर लिया है।‘ लगता है कि अंकित नरवाल, विश्वनाथ जी के अतीत में कहने-पलटने की आदत से परिचित नहीं रहे होंगे। त्रिपाठी जी बहुधा पल्ला झाड़ते रहे हैं और किसी न किसी बहाने की ओट लेते रहते हैं। अपनी पुस्तक ‘व्योमकेश दरवेश’ में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के हिंदी भाषा के संयोजक रहते हुए साहित्य अकादमी पुरस्कार से संबंधित एक प्रसंग लिखा। उस प्रसंग की सत्यता के बारे में जब इस स्तंभ में सवाल उठाया गया तो उन्होंने अगले संस्करण में उस पूरे प्रसंग को ही पुस्तक से हटा दिया। इसी तरह से एक साहित्यिक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में जब कुछ आपत्तिजनक बातें उनके हवाले से छपीं तो उससे किनारा कर लिया और ठीकरा बातचीत करनेवालों पर फोड़ दिया। मैत्रेयी पुष्पा से संबंधित एक साहित्यिक पत्रिका में अश्लील टिप्पणी करने के बाद उनको फोन करके हाथ-पांव जोड़े थे।

नामवर जी से जुड़े इस प्रसंग पर उठे विवाद से कई बड़े प्रश्न खड़े हो रहे हैं। ये प्रश्न लेखकों की साख, प्रकाशकों की विश्वसनीयता और पुस्तकों के संपादकों की गंभीरता को लेकर भी खड़े होते हैं। कोई भी लेखक क्यों नहीं तथ्यों की पड़ताल के लिए प्राथमिक स्त्रोत तक जाने की कोशिश करता है, क्यों वो सेकेंडरी सोर्स पर आश्रित रहता है। इसी तरह से प्रकाशकों की किसी पुस्तक को लेकर क्या कोई जिम्मेदारी नहीं होती है? क्या आधार प्रकाशन और इसके स्वामी देश निर्मोही का दायित्व नहीं था कि वो नामवर सिंह की जीवनी में प्रकाशित हो रहे तथ्यों के बारे में जांच पड़ताल करते। क्या आधार प्रकाशन सिर्फ प्रिंटर हैं कि जो भी आया छापा और उसको बाजार में भेज दिया। जब उसपर आपत्ति आई तो अगले संस्करण में सुधार की बात कहकर किनारे हो गए। इस पूरे प्रसंग से एक बार फिर से प्रिंटर और प्रकाशक की भमिका पर विचार करने का आधार हिंदी साहित्य जगत के सामने है। देश निर्मोही स्वयं प्रगतिशीलता का डंडा-झंडा लेकर चलते रहते हैं लेकिन उनको भी नामवर सिंह के बारे में इस तथ्य की पड़ताल की जरूरत नहीं लगी। राजकमल प्रकाशन से नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह के संपादन में आमने सामने छपी, उसमें भी विश्वनाथ त्रिपाठी का नामवर का लिया साक्षात्कार छपा लेकिन न तो उनके पुत्र ने इसको जांचने की जहमत उठाई और न ही प्रकाशक के स्तर पर इसकी कोशिश हुई। अब प्रकाशक ने पुस्तक में संशोधन की बात की है।

दरअसल ये पूरा मामला ही लापरवाहियों से भरा हुआ है। इससे हिंदी साहित्य और प्रकाशन जगत में व्याप्त अगंभीरता सामने आती है। ऐसा प्रतीत होता है कि जिनको हम बड़े साहित्यकार या बड़े प्रकाशक मानते हैं उनको अपनी साख की कोई चिंता नहीं । एक और बात जो प्रमुखता से उभर कर सामने आई है कि खुद को प्रगतिशील कहनेवाले कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े लेखक अपनी विचारधारा से जुड़े लोगों की भूल गलतियों के लिए उनको कठघरे में खड़ा नहीं करते। कम्युनिस्ट लेखक ये काम बहुत ही संगठित तरीके से करते हैं। पूरा माहौल बनाते हैं कि उनकी विचारधारा के लेखक की गलती नहीं है वो तो परिस्थितियों के शिकार हो गए हैं आदि आदि। अब वक्त आ गया है कि साहित्य में वामपंथ की गलतियों और उनको ढ़कने और छुपाने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया जाए। साहित्य में सत्य का अनुकरण हो और झूठ और मिथ्या की इस विचारधारा के बचे खुचे ध्वजवाहकों को आईना दिखाया जाए।

Saturday, June 13, 2020

साहित्य की नामवरी असावधानी के स्मारक

कोरोना के संकट के दौरान पुस्तकें पढ़कर समय बिताना एक बेहतर विकल्प है। बाजार आदि भले ही खुल गए हैं लेकिन बहुत आवश्यक होने पर ही वहां जाना होता है। लोगों से मिलने-जुलने वाली संस्कृति पर भी फिलहाल विराम लगा हुआ है। पिछले करीब अस्सी दिन में कई किताबें पढ़ने का सुयोग बना। नामवर सिंह की पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ को करीब बीस साल बाद दोबारा पढ़ी। इसी क्रम में नामवर सिंह की ही एक और पुस्तक ‘हिंदी का गद्यपर्व’ पढ़ी। यह किताब नामवर सिंह के जीवित रहते ही 2010 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी और इसका संपादन काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के शिक्षक आशीष त्रिपाठी ने किया है। मैंने इस पुस्तक की पहली आवृत्ति, जो 2011 में प्रकाशित हुई थी, पढ़ी। नामवर सिंह के आलोचनात्मक लेखन के साठ साल पूरे होने के अवसर पर प्रकाशित हुई थी। इसके संपादक आशीष त्रिपाठी ने लिखा है कि ‘यह पुस्तक साक्ष्य है नामवर जी के सक्रिय साठ वर्षों का-एक दस्तावेजी साक्ष्य। इसमें उनका पहला प्रकाशित निबंध है और अभी तक लिखित अंतिम निबंध द्वा सुपर्णा... और पुनर्नवता की प्रतिमूर्ति।‘ संपादक के इन दावों को पढ़कर इस पुस्तक को पढ़ने की रुचि और बढ़ गई।
इस किताब में एक लेख है ‘हिंदी साहित्य के पच्चीस वर्ष’। इस लेख के बारे में बताया गया है कि ‘स्वतंत्रता की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर साहित्य अकादमी ने भारत की विभिन्न भाषाओं में साहित्यिक प्रगति का एक सर्वेक्षण अंग्रेजी में प्रकाशित किया गया था, इंडियन लिटरेर सिंस इंडिपेंडेंस। इस ग्रंथ के लिए हिंदी साहित्य का सर्वेक्षण किया था डॉ नामवर सिंह ने। उस सर्वेक्षण का हिंदी रूप।‘ इस पूरे लेख में कई त्रुटियां हैं। नामवर सिंह जैसी पकी आंखों वाले आलोचक जो तथ्यों को लेकर बहुत सावधान रहते थे उनसे एक लेख में इतनी तथ्यात्मक गलतियां चौंकाती हैं। इस लेख (पृ.71) में उन्होंने निर्मल वर्मा की मशहूर कहानी ‘परिंदे’ का प्रकाशन वर्ष 1960 बताया है। जबकि इस कहानी का प्रकाशन 1957 में हुआ था। प्रेमचंद के स्मृति दिवस 8 अक्तूबर 1957 को ‘हंस’ का साहित्य संकलन-1, प्रकाशित हुआ था, जिसके संपादक बालकृष्ण राव और अमृतराय थे। इस संकलन में पहली बार निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ का प्रकाशन हुआ था। आश्चर्य की बात ये है कि ‘हंस’ के उस संकलन में नामवर सिंह का भी लेख प्रकाशित है। सिर्फ 15 वर्ष के अंतराल में नामवर सिंह से ये चूक हो जाती है। वो भी तब जब नामवर सिंह ने निर्मल की इस कहानी को ‘नई कहानी की पहली कृति’ घोषित करते हुए एक लंबा लेख लिखा था। अगर नामवर सिंह से ये चूक हुई है तो वो एक बेहद असावधान आलोचक थे और अगर अनुवाद और संपादन में ये भूल हुई है तो ये अक्षम्य है। महत्वपूर्ण ये है कि इस पुस्तक का प्रकाशन नामवर सिंह के जीवित रहते हो गया था, लेकिन इस भूल की ओर ध्यान नहीं दिया गया। साहित्य के शोधार्थियों को ध्यान में रखकर अगर विचार किया जाए तो ये गलती बहुत बड़ी नजर आती है। 
इस पुस्तक में सिर्फ एक गलती नहीं है बल्कि अनेक तथ्यात्मक भूलें हैं। अपने इसी लेख में नामवर सिंह लिखते हैं कि ‘रोमांटिक मोह के युग में भी मुक्तिबोध मोहभंग के प्रयास करते रहे। उन्होंने 1953 में यह लिखा था कि ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’।‘  नामवर सिंह अपने जीवनकाल में लगातार मुक्तिबोध की कविताओं पर बोलते-लिखते रहे थे। मुक्तिबोध को वामपंथी विचारधारा के अग्रणी कवि के तौर पर स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील भी रहे। वामपंथी विचारधारा के कवि के तौर पर मुक्तिबोध का रेखांकन करते-करते नामवर सिंह इस कविता का प्रकाशन वर्ष लिखने में चूक कर बैठे। मुक्तिबोध की ये प्रसिद्ध कविता ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ पटना से प्रकाशित काव्य संकलन ‘विविधा’ में छपी थी जिसका प्रकाशन 1956-57 में हुआ था। इस काव्य संकलन के संपादक राजेन्द्र किशोर और रणधीर सिन्हा थे। इस एक तथ्य के आधार पर भी यह कहा जा सकता है कि नामवर सिंह असावधान आलोचक थे। साहित्य के इतिहास में तिथियों का बहुत महत्व होता है और एक भी गलत तिथि का उल्लेख कालखंडों के आकलन के निष्कर्षों को गलत कर सकता है। इसी पुस्तक में एक लेख है ‘एक अन्तर्यात्रा के प्रदेश’ इस लेख की पहली पंक्ति है सन 1884 में भारतेन्दु हरिश्चंद्र का अवसान हुआ और रामचंद्र शुक्ल का उदय। ये तो बहुत ही बड़ी चूक है क्योंकि भारतेन्दु हरिश्चंद्र का निधन 1884 में नहीं बल्कि 1885 में हुआ। इसके आलोक में देखें तो पहली पंक्ति से वो जो स्थापित करना चाहते थे उसकी बुनियाद ही गलत थी। पता नहीं किन परिस्थितियों में नामवर सिंह ने अपने लेख में भारतेन्दु का अवसान उनकी मृत्यु के पहले ही मान लिया था। इसी लेख में ‘हंस’ के आत्मकथा अंक का प्रकाशन वर्ष 1931 बताया गया है जबकि इसका प्रकाशन 1932 में हुआ था। बाद में बनारस के एक प्रकाशक ने भी ‘हंस’ के इस अंक को प्रकाशित किया था। इस पुस्तक में तथ्यात्मक भूलों के अलावा प्रूफ और नाम में भी ढेरों गलतियां हैं, ईश्वरचंद्र को रमेशचंद्र, नागेन्द्र को नरेन्द्र, रामकुमार को राजकुमार कह दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि न तो संपादक ने और न ही प्रकाशक ने तथ्यों के अलावा लेखों में उल्लिखित नामों को जांचने का कष्ट किया। 
2019 में राजकमल प्रकाशन से ही नामवर जी के साक्षात्कारों की एक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसका नाम है ‘आमने सामने’। इस पुस्तक का संकलन संपादन नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह ने किया। इसमें विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा किया गया नामवर सिंह का एक साक्षात्कार प्रकाशित है जिसका शीर्षक है, ‘भैरव का सोंटा’। इसमें एक जगह विश्वनाथ त्रिपाठी साहित्य अकादमी के पुरस्कारों को छोड़ने और न छोड़ने पर उनकी राय पूछते हैं। इसके उत्तर में नामवर सिंह अपनी बात रखते हैं कि ये संस्था लेखकों की है, सरकार से क्या लेना देना। अपनी बात रखने के क्रम में वो बताते हैं कि साहित्य अकादमी का जब गठन हुआ तो कृष्णा कृपलानी इसकी सचिव थीं। इसको पढ़ते हुए स्पष्ट है कि नामवर सिंह ये कह रहे थे कि कृष्णा कृपलानी महिला थीं। जबकि साहित्य अकादमी से प्रकाशित डी एस राव की पुस्तक ‘फाइव डिकेड्स’ में भी और इसके हिंदी अनुवाद में भी इस बात का साफ उल्लेख है उनका नाम कृष्ण कृपलानी था और वो पुरुष थे। भारत सरकार ने 1954 में उनको दो वर्षों के लिए साहित्य अकादमी के पहले सचिव के रूप में नियुक्त किया था। बाद में अकादमी के कार्यकारी मंडल ने उनको कई सेवा विस्तार दिए और वो 1971 तक साहित्य अकादमी के सचिव पद पर बने रहे।  अब ये इतनी हास्यापद बात है कि नामवर सिंह की छवि को देखते हुए इसको स्वीकार कर पाना थोड़ा कठिन है कि नामवर सिंह को ये नहीं पता होगा कि साहित्य अकादमी के पहले सचिव पुरुष थे, महिला नहीं। पता तो इस बात का विश्वनाथ त्रिपाठी को भी होना ही चाहिए। फिर एक संपादक भी हैं जिन्होंने इस तथ्य पर गौर नहीं किया, क्या इतनी असावधानी होनी चाहिए थी ? और सबसे उपर तो प्रकाशक की भी जिम्मेदारी बनती है। एक अच्छा आलोचक वो होता है जिसकी स्मृति बहुत अच्छी हो, वो आलसी न हो और तथ्यों की जांच करने के लिए सिर्फ अपनी स्मृति पर भरोसा न रखे और संदर्भ ग्रंथ देखने के लिए बार बार अपनी मेज से उठे। क्या नामवर इतने सतर्क आलोचक थे? लगता तो नहीं।   


Sunday, September 16, 2012

पुरानी तकनीक, नया संग्रह

समकालीन हिंदी कहानी के परिदृष्य पर नजर डालें तो की युवा कथाकारों ने अपनी कहानियों में शिल्प के अलावा उसके कथ्य में भी चौंकानेवाले प्रयोग किए हैं । आज की नई पीढ़ी के कहानीकारों के पास अनुभव का एक नया संसार है जिसको वो अपनी रचनाओं में व्यक्त कर रहे हैं । पहले यह माना जाता था कि जो कहानीकार रूप और शिल्प में नयापन पेश करेगा वह पाठकों को अपनी ओर खींच लेगा और आलोचक भी उनकी कृतियों का नोटिस लेने को विवश हो जाएंगे । लेकिन नई पीढ़ी ने जिसमें वंदना राग, मनीषा कुलश्रेष्ठ, जयश्री राय और गीताश्री जैसी कई कहानीकारों ने रूप और शिल्प के अलावा विषय की नई भावभूमि से पाठकों को रूबरू कराया । विषय और अनुभव के नए प्रदेश में पाठकों को ले जाने का कहानीकारों का यह प्रयोग सफल भी हुए हैं और हिंदी जगत ने उनका नोटिस भी लिया । पर हिंदी में कुछ कहानीकार ऐसे हैं जो पुरानी पद्धति और लीक पर ही कहानियों का सृजन कर रहे हैं । अल्पना मिश्र का कहानी संग्रह - क़ब्र भी क़ैद औ’ ज़ंजीरें भी उसी तरह के संग्रहों में से एक है । नौ कहानियों के इस संग्रह में अल्पना ने गोरिल्ला तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अपने पाठकों को चौंकाने की कोशिश की है । हिंदी कहानी में यह तकनीक बेहद पुरानी हो चुकी है जहां अचानक से किसी अनपेक्षित स्थितियों पर ले जाकर कहानी खत्म कर दी जाती है । अल्पना मिश्र के संग्रह की पहली कहानी – गैरहाजिरी में हाजिर- में भी कथाकार इसी तकनीक का इस्तेमाल करती है । इस कहानी में शुरू से लेकर आखिर तक समाज और अफसरशाही में गहरे तक जमे जाति व्यवस्था को उघारते हैं । फिर भटकते हुए लाल बिंदी के बहाने से समाज की एक और बुराई की तरफ इशारा करती हैं । लेकिन जब कथा अपने मुकाम पर पहुंच रही होती है तो अंत में नायिका के भाई की अनायास मौत पर कहानी खत्म होती है ।
दूसरी कहानी गुमशुदा भी अल्पना मिश्रा की सपाट बयानी का बेहतरीन नमूना है । एक बछड़े की मौत के बहाने वो नेताओं पर मीडिया पर कटाक्ष करती है लेकिन कहानी को संभाल नहीं पाती है । इस कहानी में अल्पना एक जगह बताती हैं कि एक खबरिया चैनल को एक नेता धमका कर अपने कवरेज के लिए तैयार कर लेता है । धमकी के बाद चैनल से वहां एक कर्मचारी भेजा जाता है जिसे कैमरा चलाना नहीं आता लेकिन वो वहां पहुंचकर अपनी उपस्थिति मात्र से चैनल को नेता के प्रकोप से बचा लेता है । यहां तक तो ठीक था लेकिन उसके बाद अल्पना ने कह दिया कि नेता जी चैनल पर भाषण देकर अखबारों को फोन करने लगे । स्थिति बड़ी विकट है जब रिकॉर्डिंग नहीं आती तो नेता का चैनल पर भाषण कैसे हो सकता है । कहानी में अल्पना की कल्पना को देखते हुए रूस के मशहूर समीक्षक विक्टर श्क्लोव्सकी के विचार साफ तौर पर याद आते हैं जब वो कहते हैं- प्लाट जीवन एवं मानव संबंधों के व्यवस्था क्रम के बारे लेखक की अपनी समझदारी को दर्शाता है । इस कहानी में भी खबरिया चैनल और उसके प्रसारण को लेकर लेखिका की लचर समझ एक्सपोज हो जाती है ।  अल्पना की इस कहानी में कथा कई छोरों और कोनों में भटकती हुई जब कसाईबाड़े तक पहुंचती है तो फिर से घटना शॉक देने की कोशिश के साथ कहानी खत्म होती है ।
पुलिस पर सालों से ये आरोप लगते रहे हैं कि अपराधियों के नाम पर वो निर्दोष लोगों की गिरफ्तारी दिखा कर वाहवाही लूटती है । जब से देश में आतंकवादी घटनाएं बढ़ी हैं तब से पुलिस पर आतंकवादियों के नाम पर एक खास समुदाय के लोगों को बगैर सबूत के गिरफ्तार कर लिया जाता है । इस संग्रह की एक कहानी- महबूब जमाना और जमाने में वे- भी एक ऐसी ही कहानी है । जिसमें फुटपाथ पर अपना कारोबार करनेवाले दो बेकसूर रहमत और रामसू को पुलिस ने मुठबेड़ में मार गिराया । इस कहानी और अखबार की रिपोर्ट में ज्यादा फर्क नहीं है । इस रिपोर्टनुमा कहानी में लेखिका कुछ और पात्रों के मार्फत कथारस डालना चाहती है लेकिन पात्रों से प्रभाव पैदा नहीं हो पाता है । इसके अलावा पुष्पक विमान और महबूब जमाना और जमाने में वे, का पुलिसवाला और दुकानवाला दोनों का व्यक्तित्व एक सा दिखाया गया है । कहानियों में कहीं ना कहीं से खबर, अखबार और चैनल आदि भी आ ही जाते हैं ।
इस संग्रह की एक और कहानी मेरे हमदम, मेरे दोस्त में औरतों के प्रति समाज के नजरिए को सामने लाया गया है । नायिका सुबोधिनी और उसके पति में अनबन चल रहा होता है । इस बात का पता उसके दफ्तर के सहयोगियों को चलता है तो सब उस स्थिति का फायदा उठाना चाहते हैं और सुबोधिनी में अपने लिए संभावना तलाशते हैं । यह भी एक साधारण कहानी है जिसको पढ़ते हुए पाठकों के मस्तिष्क में कोई तरंग उठेगी उसमें संदेह है । इस संग्रह के अंत में नामवर सिंह का दशकों पहले का एक कथन सर्वथा उपयुक्त होगा- आज भी कुछ कहानीकार नाटकीय अंतवाले कथानकों की सृष्टि करते दिखाई पड़ते हैं, परंतु ये वही लोग हैं, जिनके पास या तो कहने को कुछ नहीं है या फिर जीवन के प्रति उनका अपना कोई विशेष दृष्टिकोण नहीं है । हिंदी में किताबों के ब्लर्ब हमेशा से प्रशंसात्मक ही लिखे जाते हैं और इस संग्रह में ज्ञानरंजन ने उसका निर्वाह किया है ।

Tuesday, February 21, 2012

…कुछ तो है जिसकी परदादारी है

हिंदी में साहित्यिक किताबों की बिक्री के आंकड़ों को लेकर अच्छा खासा विवाद होता रहा है । लेखकों को लगता है कि प्रकाशक उन्हें उनकी कृतियों के बिक्री के सही आंकड़े नहीं देते हैं । दूसरी तरफ प्रकाशकों का कहना है कि हिंदी में साहित्यिक कृतियों के पाठक लगातार कम होते जा रहे हैं । बहुधा हिंदी के लेखक प्रकाशकों पर रॉयल्टी में गड़बड़ी के आरोप भी जड़ते रहे हैं । लेकिन प्रकाशकों पर लगने वाले इस तरह के आरोप कभी सही साबित नहीं हुए । निर्मल वर्मा की पत्नी और राजकमल के बीच का विवाद हिंदी जगत में खासा चर्चित रहा । निर्मल वर्मा की पत्नी गगन गिल को लगा था कि राजकमल प्रकाशन से उन्हें उचित रॉयल्टी नहीं मिल रही है लिहाजा उन्होंने हिंदी के शीर्ष प्रकाशन गृह पर रॉयल्टी कम देने का आरोप लगाते हुए निर्मल की सारी किताबें वापस ले ली थी । उसके बाद यह पता नहीं चल पाया कि गगन गिल को निर्मल वर्मा की किताबों पर दूसरे प्रकाशन संस्थानों से कितनी रॉयल्टी मिली । अभी जनवरी के हंस में राजेन्द्र यादव ने एक बार फिर से इस मुद्दे को उटाया है । राजेन्द्र जी ने लिखा- वस्तुत : हिंदी प्रकाशन अभी भी पेशेवर नहीं हुआ है और उसी डंडी मार बनिया युग में बना हुआ है । मेरे उपर आरोप है कि मैं प्रकाशकों का पक्षन लेता हूं ; कि लेखक अभी भी हवाई दुनिया में रहते हैं । दस बीस पुस्तकों के लेखक अपने शोषण और प्रकाशक की शान शौकत को गालियां देते हैं । मेरा कहना है कि प्रकाशक हजारों पुस्तकें प्रकाशित करता है और अपनी लागत पर दस पांच प्रतिशत बचाता भी है तो यह राशि निश्चय ही किसी भी लेखकीय रॉयल्टी से सैकड़ों गुना अधिक होगी । राजेन्द्र यादव आगे लिखते हैं – आज लेखक-प्रकाशक के रिश्ते बेहद अनात्मीय और बाजरू हो गए हैं । कच्चा माल दो और भूल जाओ । अपने इस संपादकीय लेख में यादव जी ने यह भी बताया है कि उनके जवानी के दिनों में ओंप्रकाश जी, विश्वनाथ, रामलाल पुरी और शीला संधू किस तरह से लेखकों से दोस्ती का संबंध रखते थे । लेखकों की हर महीने पार्टी होती थी और एडवांस रॉयल्टी देकर लेखकों को लिखने के लिए दबाब डालते थे । लेकिन राजेन्द्र यादव ने रिश्तों के बाजारू और अनात्मीय होने की वजह नहीं बताई । हिंदी के इस शीर्ष लेखक से यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वो इसकी वजह भी बताते और अपने अनुभवों के आधार पर इस रिश्ते की गरमाहट को बचाए रखने के लिए कुछ उपाय सुझाते । लेकिन बजाए एक वरिष्ठ लेखक की भूमिका अख्तियार करने के यादव जी वयक्तिगत लेन देन के ब्यौरे में उलझ कर रह गए । कहने लगे राजकमल और वाणी से मेरी लगभग 90 पुस्तकें प्रकाशित हुई- अनुवादित संपादित और लिखित । नगर दोनों जगह मिलाकर आंकड़ा डेढ लाख मुश्किल से छू पाता है- जबकि दस बीस किताबें ऐसी भी हैं जिनके हर साल संस्करण होते हैं –आठ दस विभिन्न पाठ्यक्रमों में भी लगी है । यादव जी का संपादकीय पढ़ने के बाद मुझे छाया मयूर छपने के बाद का एक प्रसंग याद आ रहा है । छाया मयूर के अंक में भारत भारद्वाज ने हिंदी की चुनिंदा पुस्तकों पर लिखा था । अब ठीक से याद नहीं है लेकिन भारत जी के उस लेख को लेकर राजेन्द्र जी कुछ विचलित और झुब्ध थे । उसके बाद मैंने राजेन्द्र जी का एक इंटरव्यू किया था उसमें यादव जी ने बताया था कि उन्हें साठ या सत्तर के दशक में ही रॉयल्टी के लाख रुपये मिला करते थे । मुझे याद नहीं है कि अब वो इंटरव्यू कहां है लेकिन यह प्रसंग इस वजह से याद है कि तब मैंने सोचा था कि लेखकों को ठीक ठाक पैसे मिलते हैं । साठ सत्तर के दशक में भी लाख-डेढ लाख और चार दशक के बाद भी लाख डेढ लाख – ये तो बेहद नाइंसाफी है । यादव जी को साफ तौर पर बताना चाहिए था कि उन्हें कितने पैसे रॉयल्टी के मिलते हैं और क्या प्रकाशक उन्हें एडवांस भी देते रहे हैं । उनके लेख से यह ध्वनि निकलती है कि किताबघर और सामयिक प्रकाशन उन्हें सही रॉयल्टी देते हैं । लेख को पढ़ते वक्त मेरे दिमाग में यह कौंधा कि यादव जी की क्या मजबूरी है कि वो वाणी और राजकमल के साथ बने हुए हैं क्यों नहीं अपनी किताबें सामयिक और किताबघर को दे देते हैं । रॉयल्टी में कमी का अंदेशा भी है और हंस के पच्चीस साल पूरे होने पर भी जो किताबें छपी वो भी वाणी और राजकमल से ही छपीं । कुछ तो है जिसकी परदादारी है ।
दरअसल यह पूरा मामला बेहद उलझा हुआ है और उतना आसान है नहीं जितना दिखता है । हिंदी में साहित्यिक कृतियों का अब बमुश्किल तीन सौ से लकर पांच सौ प्रतियों का संस्करण होता है और दूसरा संस्करण छपने में सालों बीत जाते हैं । लेकिन इसके ठीक उलट अंग्रेजी में हालात बिल्कुल जुदा है । वहां एक औसत से लेखक की कमजोर कृति भी आठ से दस हजार बिक ही जाती है । ऐसा नहीं है कि हिंदी का बाजार कम बड़ा है बल्कि हाल के दिनों में तो हिंदी का बाजार भी बहुत बढ़ा है । तो फिर क्या वजह है कि हिंदी में एक साहित्यिक कृति के अपेक्षाकृत कम संख्या वाले संस्करण को बिकने में अंग्रेजी की तुलना में काफी ज्यादा वक्त लगता है ।
मुझे लगता है कि इसकी कई वजहें साफ तौर पर नजर आती है । हमारे देश में हिंदी का बाजार अवश्य बढ़ा है यह तो अखबारों की बढ़ती प्रसार संख्या और उसके नए संस्करणों की लोकप्रियता से पता चल जाता है और प्रामाणिक भी लगता है । इसको ही हम हिंदी का विस्तार मानते हुए इस निष्कर्ष पर भी पहुंच जाते हैं कि साहित्यिक कृतियों का बजार बढ़ा है । मेरे ख्याल से आकलन का यह तरीका सरही नहीं है । अखबारों और पत्रिताओं की संख्या में इजाफा के आधार पर साहित्यिक कृतियों की बिक्री का अंदाजा लगाना गलत है बल्कि इससे एक भ्रम और अविश्वास की स्थिति पैदा होती है । लेखकों को यह लगने लगता है कि उनकी कृतियां काफी बक रही है और प्रकाशक सर पीट रहा होता है कि जितनी पूंजी लगाकर किताब प्रकाशित की उसका निकल पाना भी संभव नहीं हो पा रहा है । ये दोनों ही स्थितियां प्रकाशन जगत के लिए हानिकारक हैं । अब से कुछ दिनों बाद नई दिल्ली के प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेला लगनेवाला है । वहां भी इस बात की चर्चा होगी, बहस होगी लेकिन होगा कुछ नहीं । प्रकाशकों और लेखकों के बीच इस तरह के अविश्वास की स्थिति हिंदी के लिए अच्छी नहीं है । अब वक्त आ गया है कि राजेन्द्र यादव जैसे बड़े लेखक वयक्तिगत दर्द से उपर उठकर इस मसले के स्थायी हल के लिए पहल करें और एक मुकम्मल रास्ता निकालें ।

Friday, July 22, 2011

किताबों में बनता इतिहास

प्रभाष जोशी हमारे समय के बड़े पत्रकार थे । उनके सामजिक सरोकार भी उतने ही बड़े थे । समाज और पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंता का दायरा भी बेहद विस्तृत था । हिंदी पट्टी और हिंदी समाज में प्रभाष जी की काफी इज्जत भी थी । उनके निधन के बाद हिंदी पत्रकारिता में एक खालीपन आ गया है । जिस तरह से प्रभाष जोशी समाज को लेकर चिंतित रहा करते थे या फिर पत्रकारिता के गिरते स्तर को बचाने के लिए उन्होंने जिस तरह से एक अभियान की अगुवाई की थी वो हम सबके लिए अनुकरणीय है । प्रभाष जी जो भी सोचते थे बेखौफ होकर उसे या तो अपने स्तंभ में व्यक्त करते थे या फिर सभाओं या गोष्ठियों के जरिए लोगों तक अपनी बात पहुंचाते थे । देश भर की यात्राओं के बावजूद प्रभाष जोशी अपने स्तंभ लेखन को लेकर बेहद सतर्क रहते थे और बिना नागा उसको लिखते थे।हर हफ्ते हमलोग रविवार का इंतजार इस बात के लिए करते थे कि कागद कारे पढ़ने को मिलेगा । प्रभाष जी के स्तंभ से पाठकों का जो एक अपनापा कायम हुआ था वही उनकी ताकत थी । अपने स्तंभ के माध्यम से प्रभाष जी का पाठकों से सीधा संवाद था । लेकिन उनके निधन के बाद ये संवाद टूट गया । जनसत्ता और अन्य पत्र-पत्रिकाओं में लिखे उनके स्तंभ हिंदी समाज के लिए थाती हैं और पाठकों के लिए सहेजकर रखनेवाला धरोहर ।
प्रभाष जी के जीवन काल में ही 2003 में राजकमल प्रकाशन ने उनके लेखों का संग्रह -हिंदू होने का धर्म- छापा था जिसकी खासी चर्चा हुई थी । अब एक बार फिर से राजकमल प्रकाशन से ही उनके लेखों के दो संग्रह- आगे अन्धी गली है और 21वीं सदी पहला दशक- छपे हैं । इन दोनों पुस्तकों का संपादन वरिष्ठ पत्रकार सुरेश शर्मा ने किया है । आगे अन्धी गली है में प्रभाष जोशी के प्रथम प्रवक्ता और तहलका हिंदी में छपे लेख संकलित हैं । अपने संपादकीय में सुरेश शर्मा ने लिखा है कि – आगे अन्धी गली प्रभाष जी के अंतिम दिनों का लेखन है । ....वे प्रथम प्रवक्ता और तहलका में में कॉलम लिख रहे थे । ये कॉलम अपने समय की धड़कनों के जीवन्त दस्तावेज हैं । इस पुस्तक के संपादकीय में सुरेश शर्मा ने प्रभाष जी की जिंदगी के अंतिम दिनों पर विस्तार से लिखा है । सुरेश शर्मा के इस लेख से आम पाठकों के मन पर प्रभाष जी के व्यक्तित्व की तस्वीर और साफ होती है । बीमारी में भी समाज और पत्रकारिता के अपने पेशे के उत्तरदायित्व का निर्वहन करते हुए प्रभाष जी ने अपनी जान को भी दांव पर लगा दिया । तबीयत खराब होने के बावजूद उन्होंने हिंद स्वराज पर आयोजित गोष्ठी में हिस्सा लिया और अपनी बात श्रोताओं के साथ साझा की । सुरेश शर्मा ने प्रभाष जी की अंतिम घड़ी को उनकी अदम्य जिजिविषा से जोड़कर एक बेहद संजीदा तस्वीर पेश की है । इस किताब में कई ऐसे लेख हैं जो वर्तमान परिस्थितियों में भी प्रासंगिक है । जैसे मई 2008 में प्रथम प्रवक्ता में प्रभाष जी ने लिखा- राहुल के अंदेशे से दुबलीं मायावती । प्रभाष जी का यह लेख उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में आज भी उतना ही मौजूं है जितना तीन साल पहले था । उस वक्त दलितों के घर राहुल के खाना खाने और रात बिताने को लेकर मायावती परेशान थी और आज भट्टा पारसौल में राहुल के धरने ने मायावती को परेशानी में डाल रखा है । मायवती की परेशानी पर प्रभाष जी विस्मित होते हुए लिखते हैं – राहुल गांधी के दलित प्रेम से मायावती इतनी घबरा क्यों गई हैं । दूसरे नेताओं की तरह वो कोई जड़विहीन हवाई नेता नहीं जो मीडिया में लगातार बने रहने के कारण नेता हो गई हैं । मई 2008 में ही प्रभाष जी ने एक और लेख लिखा था- चूके अवसरों की महादेवी । इस लेख के केंद्र में कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी है । उस लेख में प्रभाष जी ने निराशा भरे लहजे में लिखा था- इस त्याग ( प्रधानमंत्री पद ठुकराना) ने सोनिया गांधी को भारत ते जनमानस में वह जगह दी जो उन्हें अपनी पार्टी कांग्रेस में प्राप्त थी । ....उन्हें ऐसा नैतिक आभामंडल मिला जो उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी के पास भी नहीं था । पअपने इस लेख में सोनिया की रहनुमाई में चल रही सरकार के चार साल के कार्यकाल से प्रभाष जी निराश थे, निराश तो वो सोनिया गांधी के प्रदर्शन से भी थे । उन्हें उम्मीद नहीं थी कि कांग्रेस को फिर से सरकार बनाने का मौका मिलेगा । लेकिन वो हो नहीं सका और कांग्रेस ने सोनिया की अगुवाई में 2004 के मुकाबले ज्यादा सीटें हासिल की । प्रभाष जी के लेखों में विभिन्न विषयों की जो रेंज थी वो उनकी विद्वता और अध्ययन को दिखाता है । समाज और राजनीति के अलावा प्रभाष जी साहित्य के भी गहरे अध्येता थे । राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का शताब्दी वर्ष जिस तरह से हिंदी समाज में मनाया गया और जो लापरवाहियां हुई उसपर भी प्रभाष जी ने एक बेहद तल्ख टिप्पणी लिखी । जिस तरह से दिनकर शताब्दी समारोह में बिहार के एक मंत्री ने बाद में मंच पर आकर उलजलूल बातें की उससे प्रभाष जी बेहद खिन्न थे । दिनकर जन्म शताब्दी वर्ष में बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार और बिहार सरकार की लापरवाही से भी प्रभाष जी दुखी थे । इसी तरह से एक और अन्य विषय समलैंगिकता पर भी इसमें प्रभाष जी का एक लेख संकलित है । कुल मिलाकर यह किताब प्रभाष जी की विचारधारा और अपने समय, समाज और राजनीति को जानने की एक कुंजी है जिस इसके संपादक सुरेश शर्मा ने श्रमपूर्वक तैयार किया है ।
दूसरी किताब -21वीं सदी पहला दशक है जिसमें प्रभाष जोशी के दो हजार एक से लेकर 2009 तक के बीच में जनसत्ता में लिखे लेख संकलित हैं । संपादक का कहना है कि इस जनसत्ता में प्रकाशित इस कालखंड के तकरीबन सारे लेख इस किताब में संकलित किए गए हैं । यह संकलन इस लिहाज से अहम है कि इसमें लगभग एक दशक की राजनीति गतिविधयां की एक मुकम्मल तस्वीर बनती है । प्रभाष जी के लेखों को पढकर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और बीजेपी के काम करने के तरीकों को समझने में मदद मिल सकती है । लेकिन दोनों किताबों के कुछ लेखों में मोहभंग को भी साफ तौर रेखांकित किया जा सकता है । मई 2004 में जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद ठुकरा कर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री मनोनीत किया था तो प्रभाष जी को उनमें एक उम्मीद की किरण दिखाई दी थी । उन्होंने एक लेख लिखा था- आइए सोनिया जी, अनन्त संभावनाओं की दहलीज पर । इस लेख में प्रभाष जी ने सोनिया गांधी की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी । उस लेख की दो लाइन देखिए- किन्हीं भी कारणों और कैसे भी इराजदों से सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद छोड़ा हो पर सच बताइये कितने माई के लाल ऐसा कर सकते हैं और कितनों ने ऐसा किया है ? जिसने किया है, उठिए और उनको सलाम कीजिए । लेकिन चार साल में ही प्रभाष जी का सोनिया से मोहभंग हो गया और 2008 में मई में लिख डाला- चूके अवसरों की महादेवी । जिसका जिक्र मैं उपर कर चुका हूं । इस तरह के कई लेख देखकर आप इस बात का अंदाज लगा सकते हैं कि देश और पत्रकारिता का मूड कैसा रहा होगा । प्रभाष जी के वस्तुनिष्ठ लेखों से समाज की उस सोच का भी पता चलता है जिसमें लोग राजनेताओं के बारे में क्या विचार रखते हैं । प्रभाष जोशी के इन लेखों को एक साथ सामने लाने के लिए सुरेश शर्मा ने जो श्रम किया उसके लिए वो साधुवाद के पात्र हैं ।