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Sunday, November 10, 2024

प्रगतिशीलता का अधिनायकवाद


इन दिनों हिंदी साहित्य जगत में एक बार फिर से वाम दलों से संबद्ध लेखक संगठनों की चर्चा हो रही है। चर्चा इस बात पर नहीं हो रही है कि लेखक संगठनों ने लेखकों के हित में कोई कदम उठाया है बल्कि इस बात पर हो रही है कि जनवादी लेखक संघ के संस्थापक सदस्य और राष्ट्रीय अध्यक्ष असगर वजाहत ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने 2 नवंबर को अपना त्यागपत्र संगठन के महासचिव और कार्यकारिणी सदस्यों को भेजा। उसके बाद गुरुवार को प्रगतिशील लेखक संघ के उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष पद से वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने भी त्यागपत्र दे दिया। उनके त्याग पत्र में उनका दर्द झलक रहा है। नरेश सक्सेना ने लिखा कि मैं मित्रों की असहमति का सम्मान करता हूं, किंतु अपने प्रति व्यंग्य और संदेह का नहीं। हार्दिक विनम्रता के साथ मैं तत्काल प्रभाव से उत्तर प्रदेश प्रगतिशील लेखख संघ के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देता हूं। गौर करने की बात है कि नरेश सक्सेना जी ने ये बात फेसबुक पर लिखी। उनके लिखने के बाद उनके समर्थन और विरोध में टिप्पणियां आने लगीं। कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति आस्थावान कुछ लेखकों ने उनको नसीहत दी तो अधिकतर लेखकों ने उनका समर्थन किया। कर्मेन्दु शिशिर ने अच्छी टिप्पणी की, संगठन और सृजन दोनों का अपना महत्व है। जब एक रचनाकार को संगठन और सृजन में चयन करना पड़े तो सच्चा रचनाकार तो सृजन का ही चयन करेगा। असगर वजाहत जैसे बड़े कथाकार/नाटककार और नरेश सक्सेना जैसे बड़े कवि को जब संगठन ही ट्रोल करने लगे तो वो क्या करें। नरेश सक्सेना का त्याग पत्र और उनपर आई टिप्पणियों को पढ़ने के बाद इस बात के संकेत मिलते हैं कि संघ की कोई बैठक चंडीगढ़ में हुई थी जिसमें ये तय किया गया था कि संघ से जुड़ा कोई लेखक किस मंच पर जाएगा ये संगठन तय करेगा। 

कम्युनिस्ट पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम करनेवाला प्रगतिशील लेखक संघ हो, जनवादी लेखक संघ हो या जन संस्कृति मंच सबमें एक अधिनायकवादी प्रवृत्ति दिखाई देती है। इस संबंध में राहुल सांकृत्यायन से जुड़ा एक प्रसंग का उल्लेख उचित होगा। स्वाधीनता के बाद दिसंबर 1947 में हिंदी साहित्य सम्मेलन का एक अधिवेशन बांबे (अब मुंबई) में होना था। राहुल सांकृत्यायन को अधिवेशन की अध्यक्षता के लिए मंत्रित किया गया था। उस समय राहुल सांकृत्यायन कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे। जब वो बांब पहुंचे तो पार्टी के कार्यालय पहुंचे। वहां कामरेडों ने उनके तैयार भाषण की कापी पढ़ी। उसके बाद तो वहां विवाद खड़ा हो गया। राहुल सांकृत्यायन ने अपने भाषण में लिखा था इस्लाम को भारतीय बनना चाहिए। उनका भारतीयता के प्रति विद्वेष सदियों से चला आया है। नवीन भारत में कोई भी धर्म भारतीयता को पूर्णतया स्वीकार किए बिना फल फूल नहीं सकता।ईसाइयों, पारसियों और बौद्धों को भारतीयता से एतराज नहीं फिर इस्लाम को ही क्यों? इस्लाम की आत्मरक्षा के लिए भी आवश्यक है कि वह उसी तरह हिन्दुस्तान की सभ्यता, साहित्, इतिहास, वेशभूषा, मनोभाव के साथ समझौता करे जैसे उसने तुर्की, ईरान और सोवियत मध्य-एशिय़ा के प्रजातंत्रों में किया। कामरेड चाहते थे कि राहुल अपने लिखे भाषण में बदलाव करें। उन हिस्सों को हटा दें जहां उन्होंने इस्लाम के भारतीयकरण की बात की है। मामला काफी गंभीर हो गया। राहुल जी भाषण में संशोधन के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हो रहे थे। कम्युनिस्ट पार्टी के कामरेड ने उनको पत्र लिखा और कहा कि आप अपने भाषण में आवश्यक रूप से ये कहें कि ये पार्टी का स्टैंड नहीं है। इसका राहुल सांकृत्यायन ने बहुत अच्छा इत्तर दिया । उन्होंने लिखा कि पार्टी की नीति के साथ नहीं होने के कारण वो स्वयं को पार्टी में रहने लायक नहीं समझते हैं और उन्होंने पार्टी छोड़ दी। कुछ ऐसा ही भाव नरेश सक्सेना के त्याग पत्र से भी प्रतिबिंबित हो रहा है। 

एक भयावह उदाहरण है शायर कैफी आजमी की पत्नी शौकत कैफी से जुड़ा।  शौकत कैफी ने अपनी किताब ‘यादों की रहगुजर’ में लिखा है कि जब उनकी शादी हुई तो वो मुंबई में एक कम्यून में रहते थे। उनका जीवन सामान्य चल रहा था। उनके घर एक बेटे का जन्म हुआ था। अचानक सालभर में बच्चा टी बी का शिकार होकर काल के गाल में समा गयॉ। इस विपदा से शौकत पूरी तरह से टूट गई थीं। अपने इस पहाड़ जैसे दुख से उबरने की कोशिश में जैसे ही शौकत को पता चला कि वो फिर से मां बनने जा रही हैं तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा । अपनी इस खुशी को शौकत ने कम्यून में साझा की । उस वक्त तक शौकत कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले चुकी थी । जब शौकत की पार्टी को इसका पता चला तो तो पार्टी ने शौकत से गर्भ गिरा देने का फरमान जारी किया। उस वक्त शौकत पार्टी के इस फैसले के खिलाफ अड़ गईं थी और तमाम कोशिशों के बाद बच्चे को जन्म देने की अनुमति मिली थी। स्वाधीनता, स्त्री अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करनेवाले कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों को जैसे ही अवसर मिलता है इनको दबाने का पूरा प्रयत्न करते हैं। नरेश सक्सेना इसके हालिया शिकार हैं।  

Saturday, February 10, 2018

जलेस के जलसे पर सवाल


एक लेखक संगठन है। जनवादी लेखक संघ। दिल्ली में उसका केंद्रीय कार्यालय है। भारतीय जनता पार्टी और जनवादी लेखक संघ का दफ्तर दिल्ली की एक ही सड़क पर स्थित है। यह लेखक संगठन हिंदी और उर्दू के लेखकों का संगठन है। अभी इसका राष्ट्रीय सम्मेलन झारखंड के धनबाद में हुआ। सम्मेलन का उद्घाटन अंग्रेजी के पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन ने किया। हिंदी के लेखक असगर वजाहत को इसका अध्यक्ष चुना गया। चुनाव के वक्त अधिवेशन में असगर वजाहत अनुपस्थित थे। वजह उऩका कहीं अन्यत्र व्यस्त होना बताया गया। महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और उप महासचिव संजीव कुमार बने रहे। इस वर्ष जनवरी में यह सब संपन्न हो गया। उपर से देखने पर ये बातें सामान्य लगती हैं लेकिन कुछ पूर्व जनवादियों को सिद्धार्थ वरदराजन से जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ करवाना खल गया। उनके मुताबिक यह जनवादी लेखक संघ के सांगठनिक कौशल की कमजोरी है जो किसी बड़े हिंदी या उर्दू के लेखक से सम्मेलन के उद्घाटन को ना करवा कर अंग्रेजी के पत्रकार से करवाता है । दूसरी बात जिसको लेकर साहित्यिक हलके में चर्चा रही वो ये कि जनवादी लेखक संघ के शीर्ष पदाधिकारी अब पूर्वी दिल्ली इलाके के निवासी हो गए। यह महज एक संयोग हो सकता है लेकिन सवाल यह भी उठता है कि जनवादी लेखक संघ को हिन्दुस्तान के अन्य शहरों से कोई अध्यक्ष, महासचिव या उप महासचिव क्यों नहीं मिलता है। जनवादी लेखक संघ में कुछ चुनिंदा लोगों का वर्चस्व कायम क्यों हैं। इससे बेहतर तो प्रगतिशील लेखक संघ है जो हर साल देश के अलग अलग हिस्से के लेखकों को शीर्ष पदों की नुमाइंदगी के लिए चुनते हैं। जनवादी लेखक संघ तो दिल्ली से पूर्वी दिल्ली में आ डटा है। खैर थोड़ी बहुत चर्चा के बाद बात आई गई हो गई।
इस बीच जनवादी लेखक संघ से पूर्व में जुड़े कोलकाता के लेखक अरुण माहेश्वरी ने धनबाद में आयोजित जलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन को लेकर एक लंबी पोस्ट फेसबुक पर डाल दी। इस स्तंभ में पहले भी इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि साहित्य के मसले अब फेसबुक पर स्थान पाने लगे हैं। ऐसा प्रतीत होने लगा है कि सभी तरह के साहित्यिक मसले फेसबुक पर हल हो जाएंगे। जनवादी लेखक संघ के धनबाद सम्मेलमन के संपन्न होने के बाद अरुण माहेश्वरी ने अपनी पोस्ट में लिखा- यद्यपि संजीव कुमार ने सम्मेलन के सांगठनिक सत्र और सचिव की रिपोर्ट के सूत्रीकरण पर विवादों का एक लाईन में संकेत दिया है, लेकिन कुछ इस प्रकार मानो वह सब किसी गोपनीय संगठन की गोपनीय बातें हो, जिनका खुले में उल्लेख करना पाप है! उनसे उस सम्मेलन में अनुपस्थित लेखकों का कोई सरोकार नहीं हो सकता है ! कहना न होगा, संजीव कुमार ने खुद ही अपनी रिपोर्ट से जलेस के इस राष्ट्रीय सम्मेलन को अजीब प्रकार से रहस्यमय बना दिया है । आज जब हर लेखक और संस्कृतिकर्मी अपनी सांसों पर मोदी-आरएसएस के फासीवाद के जहरीले सामाजिक दबाव को महसूस कर रहा है, उस समय लेखकों के एक राष्ट्रीय सम्मेलन की रिपोर्ट में उसका कहीं कोई उल्लेख तक न होना और भी रहस्यमय है? सीपीआई(एम) के सर्वोच्च नेतृत्व में चल रही गुटबाज़ी आज जगजाहिर है और दुनिया इस बात को भी जानती है कि सीपीआई(एम) के सर्वोच्च नेतृत्व में अभी ऐसे तत्वों ने अपना बहुमत बना रखा है जो मोदी-आरएसएस को फासीवादी नहीं मानते और उनके खिलाफ व्यापकतम मोर्चा तैयार करने के विचारों के विरोधी हैं । हमारा अनुमान है कि इन तत्वों ने ही अपने जनवादी केंद्रीयतावादके पवित्र अस्त्र के प्रयोग से जनवादी लेखक संघ की तरह के एक जन-संगठन की स्वायत्तता को पूरी तरह से रौंद डाला हैं ।
इस सम्मेलन में हिंदी के एक प्रतिष्ठित कथाकार असगर वजाहत को जलेस का अध्यक्ष बनाया गया है । हम नहीं जानते कि क्या वे भी मोदी-आरएसएस को फासीवादी नहीं मानते और इनके खिलाफ सभी धर्म-निरपेक्ष और जनतांत्रिक ताक़तों के व्यापकतम मोर्चे के विरोधी हैं ? बहरहाल, हमारी दृष्टि में लगता है यह सम्मेलन जलेस नामक एक ऐतिहासिक संगठन को मौत के मुँह में धकेल देने वाला सम्मेलन हुआ है, क्योंकि जनवाद की रक्षा के जिस बुनियादी उद्देश्य पर इस संगठन की नींव पड़ी थी, अब क्रमश: क्षय की एक बहु-स्तरीय प्रक्रिया के बीच से होते हुए अंत में उसी उद्देश्य को ठुकरा कर इसकी प्राण-सत्ता का ही अंत कर दिया गया है । प्रलेस का एक दुखांत हमने बिहार के ही गया में आंतरिक आपातकाल के दिनों में देखा था, अब उसी पिंडदानको प्रहसन के तौर पर हम झारखंड के शहर में दोहराते हुए देख रहे हैं।
अरुण माहेश्वरी की इस पोस्ट का जनवादी लेखक संघ के उप महासचिव संजीव कुमार ने बेहद आक्रामक तरीके से उत्तर दिया और एक नया शब्द चूर्ख गढ़ते हिए अरुण माहेश्वरी पर पलटवार किया- सबसे झूठा आरोप चूरख ने यह लगाया कि जलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन की रिपोर्ट (उसका आशय सम्मेलन में पेश केंद्र की रिपोर्ट से ही होगा) में साम्प्रदायिक फ़ासीवाद का कहीं जिक्र नहीं है. जिसकी भाषा की समझ का हाल आप देख चुके हैं, उसका ऐसा मानना कतई आश्चर्यजनक नहीं.
साम्प्रदायिक फ़ासीवादी उभार पूरी रिपोर्ट की केन्द्रीय चिंता है और अगर आप शब्द की मौजूदगी ढूंढने पर बजिद हों तो उसके भी दसियों उदाहरण रिपोर्ट में हैं. पहले खंड का शीर्षक ही है : साम्प्रदायिक फ़ासीवाद के अच्छे दिन’ ”. इस खंड में 1.1 से लेकर 1.8 तक, आठ बिंदु हैं जिनमें साम्प्रदायिक फ़ासीवाद की विभिन्न अभिव्यक्तियों पर विचार किया गया है।संजीव कुमार जी के इस उत्तर पर पक्ष और विपक्ष में बातें शुरू हो गई । कई लोगों ने चूरख शब्द पर आपत्ति जताई और हिंदी के प्रतिष्ठित कवि बोधिसत्व ने तो उनसे इस शब्द को वापस लेने की मांग की। बोधिसत्व ने तो यहां तक लिखा कि सांगठनिक बहसों में किसी तरह से किसी गाली की आवश्यकता क्यों? आप उत्तर दें लिहाड़ी नहीं लें..विरोध और आलोचना को सहज लें....संगठन संगठन ही है हस्तिनापुर का सिंहासन तो नहीं कि उस पर और उसके नियंताओं पर सवाल न उठाया जा सके?’
बवाल बढ़ा तो संजीव जी ने एक और पोस्ट लिखी जिसमें उन्होंने अपनी पिछली पोस्ट पर शर्मिदंगी का जिक्र किया। लेकिन वो पोस्ट खेद की शक्ल में व्यंग्य था। संजीव कुमार और अरुण माहेश्वरी में सीधे सीधे भी विवाद हुआ। ट्रोल से लेकर भक्त आदि जैसे शब्द भी इस्तेमाल किए गए। इस पूरे विवाद में साहित्यिक मर्यादा तार-तार हुई। अब सवाल यह उठता है कि अरुण माहेश्वरी को अचानक से जनवादी लेखक संघ के क्रियाकलापों से क्यों दिक्कत होने लगी। कुछ सालों पहले तक जब वो जनवादी लेखक संघ में पदाधिकारी थे तो क्या उस वक्त संगठन में इस तरह की बातें नहीं होती थी। हिंदी साहित्य जगत और वामपंथी लेखक संगठनों के क्रियाकलापों पर नजर रखनेवाले लोगों का कहना है कि जब प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी ने जनवादी लेखक संघ छोड़ा था तब अरुण माहेश्वरी ने कोई स्टैंड क्यों नहीं लिया था।
रही बात जनवादी लेखक संघ के क्रियाकलापों को लेकर तो वहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अपेक्षा करना व्यर्थ है। जिस कथित फासीवाद की चर्चा दोनों महानुभावों ने अपनी अपनी पोस्ट में किया है वह बहुत विद्रूप रूप में जनवादी लेखक संघ में उपस्थित है और वर्षों से वहां राज कर रहा है। नीचे के स्तर पर नए पदाधिकारियों का बदलाव चुनाव के जरिए होता रहा है लेकिन शीर्ष स्तर पर बहुत बदलाव नहीं होता है। पहले चंचल चौहान लंबे समय तक जनवादी लेखक संघ को चलाते रहे, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह के साथ, अब मुरली बाबू ओर संजीव कुमार चला रहे हैं। इस संघटन की उपयोगिता और सार्थकता पर तो तब बात हो जब इसमें लोकतंत्र दिखाई दे। यहां कुछ भी कहना बेमानी सा लगता है क्योंकि होता वही है तो शीर्ष पर बैठे दो लोग चाहते हैं। दूसरी बात जो यह कही जाती है वो यह कि इस लेखक संगठन का पदाधिकारी वही बन सकता है जो सीपीएम का सदस्य हो। इस वजह से भी शीर्ष के पदाधिकारियों मे ज्यादा बदलाव देखने को नहीं मिलता है। जो लेखक जमे हैं वो अपनी जगह पर बने रहते हैं। पहले भी मैं यह कह चुका हूं ये लेखक संगठन अपनी राजनीतिक पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम करते हैं। जब आप किसी राजनीतिक दल के पिछलग्गू बन जाते हैं या फिर उस पार्टी के बौद्धिक प्रकोष्ठ बन जाते हैं तो आपको स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार नहीं रह जाता है और आपको हर महत्वपूर्ण फैसले के लिए अपनी पार्टी के आलाकमान का मुंह जोहना पड़ता है। जब लेखक अपने राजनीतिक अकाओं की तरफ देखकर फैसले लेते हैं तो उनकी पहली प्राथमिकता पार्टी का हित हो जाता है और लेखक नेपथ्य में चला जाता है। यह बात पूरे देश ने इमरजेंसी के समय देखा जब प्रगतिशील लेखक संघ ने इमरजेंसी का समर्थन किया था। क्या लेखक संगछनों की अब कोई उपयोगिता बची है। विचार करें।  


Sunday, November 1, 2015

लेखक संगठनों की शतरंजी बिसात

देश में पुरस्कार वापसी के माहौल में अचानक से लेखक संगठनों की सक्रियता चौकानेवाली है । साहित्य अकादमी के खिलाफ प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच के साझा बैनर के तले दिल्ली में चंद लेखकों ने मौन जुलूस निकालते हुए क्रांति का बिगुल फूंका था। लगभग सुसुप्तावस्था में पड़े इन लेखक संगठनों ने जिस तरह से आनन फानन में विरोध किया उसके बाद उनकी मंशा पर सवाल खड़े होने लगे हैं । साहित्य जगत में मौजूद ये तीन लेखक संगठन दरअसल अपनी अपनी राजनीतिक पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ हैं । लिहाजा जिस तरह से राजनीतिक दलों के बौद्धिक प्रकोष्ठ काम करते हैं उसी तरह से ये भी ऑपरेट करते हैं । जैसे जैसे इन राजनीतिक दलों में विभाजन होता गया लेखक संगठन भी बंटते चले गए । प्रगतिशील लेखक संघ सीपीआई का बौद्धिक प्रकोष्ठ है । इसी तरह से सीपीएम का जनवादी लेखक संघ और सीपीआई माले का जन संस्कृति मंच । लेखकों के नाम पर बने इन पार्टियों के बौद्धिक संगठनों ने लेखकों का कुछ भला किया हो या लेखकों की बेहतरी के लिए कोई लड़ाई लड़ी हो, याद नहीं पड़ता । ये अपने हर कदम के लिए पहले अजय भवन आदि की ओर देखते हैं और वहां से ग्रीन सिग्नल मिलने के बाद ही कोई कदम आगे बढ़ा पाते हैं । समाज में बढ़ रही असहिष्णुता और लेखकों पर कथित सुन्योजित हमलों के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले इन लेखक संगठनों को कभी भी कॉपीराइट औप रॉयल्टी जैसे अहम मसलों पर विमर्श करते हुए नहीं देखा गया है । हिंदी में तो कम से कम से कम रॉयल्टी एक अहम मुद्दा है । बहुधा लेखकों की तरफ से ऐसे बयान आते हैं कि उनको प्रकाशककों से उचित रॉयल्टी नहीं मिलती है । लेखकों को लगता है कि प्रकाशक उनका हक मारकर मोटा मुनाफा कमाते हैं । यह बात भी बार बार कही जाती है कि हिंदी के लेखक गरीब होते जा रहे हैं जबकि प्रकाशक लगातार अमीर होते जा रहे हैं। हिंदी के इस सबसे अहम मुद्दे पर इन तीनों लेखक संगठनों ने कभी कोई आंदोलन नहीं किया । कभी कोई मौन जुलूस लेकर किसी प्रकाशक के दफ्तर पर प्रदर्शन नहीं किया । धरना प्रदर्शन आदि की बात छोड़ भी दें तो क्या इन लेखक संगठनों ती तरफ से इस बारे में कोई पहल की गई । इसका जवाब अबतक तो नहीं है । इस वक्त साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाकर सुर्खियों में आए मंगलेश डबराल ने कहा था लेखक संगठन लेखकों के यूनियन नहीं हैं जो क़पीराइट आदि के मुद्दों पर संघर्ष करें । ये तो वैचारिक संगठन हैं जिनका काम साहित्य की दुनिया में वैचारिक संवेदना का प्रचार करना है । यह जानना भी दिलचस्प होगा कि किस तरह की वैचारिक संवेदना को फैलाने का काम इन लेखक संगठनों ने किया । इसके अलावा इन लेखक संगठनों ने लेखकों की मदद के लिए कभी कोई पहल की, इस बारे में भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है । हिंदी के कई लेखक मुफलिसी में जिंदगी काटकर गुजर गए, कई गंभीर बीमारी और आर्थिक संकट की वजह से अपना समुचित इलाज नहीं करवा पाने की वजह से चल बसे लेकिन इन लेखक संगठनों ने उनकी कोई सुध नहीं ली । कई लेखक तो ऐसे थे जो कि इन संगठनों में बेहद सक्रिय थे लेकिन जब वो बीमार पड़े या फिर उनके सामने आर्थिक संकट आया तो लेखक संगठनों ने उनको दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका । आज कन्नड़ के लेखक कालबुर्गी की हत्या पर साहित्य अकादमी के शोक नहीं मनाने, जो कि तथ्यहीन है, को लेकर सड़कों पर उतरे साहित्यकारों को स्मरण दिलाना चाहता हूं कि हिंदी के वरिष्ठ लेखक अरुण प्रकाश की मौत के बाद लेखक संगठन कितने निष्क्रिय रहे थे । अरुण प्रकाश दिल्ली का निधन दिल्ली के मयूर विहार इलाके में हुआ था । लेखक संगठनों से जुड़े तमाम वरिष्ठ साहित्यकार उनके फ्लैट के आधे एक किलोमीटर के दायरे में रहते हैं लेकिन कोई उनके घर शोक व्यक्त करने तक नहीं पहुंचा था । उनके अंतिम संस्कार में भी गिने चुने साहित्यकार थे । इस तरह की संवेदनहीनता के दर्जनों उदाहरण इन लेखक संगठनों के सर पर कलगी की तरह लगे हैं । दुखद ये कि इन लेखक संगठनों को अपनी इस संवेदनहीनता पर शर्मिंदगी भी नहीं है । इसके अलावा साहित्य अकादमी में सालों से चली आ रही गड़बड़ियों को लेकर भी लेखक संगठनों ने कभी कोई आवाज वहीं उठाई, क्योंकि इन लेखक संगठनों से जुड़े लेखकों को वहां से फायदा मिल रहा था । वो पुरस्कृत हो रहे थे, साहित्यक विदेश यात्राएं कर रहे थे,, देश भर में सेमिनार आदि के नाम पर घूमना फिरना हो रहा था । उन्नीस सौ पचहत्तर के बाद साहित्य अकादमी का इतिहास घोटालों और घपलों का रहा है । उसपर किसी तरह का स्पंदन उस वक्त साहित्य जगत में नहीं दिखा । साहित्य अकादमी के अध्यक्ष गोपीचंद नारंग पर कई तरह के संगीन इल्जाम लगे थे लेकिन पंकज विष्ठ के अलावा किसी लेखक ने आवाज उठाई हो याद नहीं पड़ता, लेखक संगठन की बात तो दूर  । इसी तरह से साहित्य अकादमी के सचिव को घपलों के आरोप में सस्पेंड किया गया था । उनके खिलाफ जांच बैठी थी । इस बीच उनको रिटायर कर दिया गया । उनके घपलों की जांच रिपोर्ट के नतीजे क्या आए, ये जानने की कोशिश किसी लेखक संगठन ने की या नहीं इसको देखने की आवश्यकता है । साहित्य जगत में इस बात की चर्चा लगातार रही कि उक्त सचिव ने कई वामपंथी लेखकों को उपकृत किया था लिहाजा उन सबों का अकादमी पर दबाव था कि इस मामले को रफा दफा कर दिया जाए। वही हुआ । विश्वनाथ तिवारी उन घपलों की जांच कर रहे थे लेकिन नतीजा क्या रहा पता नहीं चल पाया । सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में घुमा-फिरा कर टाल दिया गया ।  
अब जरा इन लेखक संगठनों के क्रियाकलापों पर नजर डालते हैं। इन लेखक संगठनों में विश्वविद्लाय के शिक्षकों के दबदबे पर राजेन्द्र यादव ने कहा था- साहित्यकारों में ज्यादातर प्राध्यापक हैं, क्या ईमानदारी से इनमें से कोई वो काम करता है जिसके लिए उनको वेतन मिलता है । ये लोग ना तो अपने पाठ्यक्रम के साथ न्याय करते हैं न अपने छात्रों के साथ । साहित्य में उतरकर उनका लगभग यही उठाईगीर रवैया हम सबके सामने है । पुराने कवियों लेखकों को छोड़कर न इऩमें से किसी ने भी कोई ऐसी पुस्तक लिखी है जो वैचारिक रूप से आंदोलित करे या देश-विदेश के विचारों के परीक्षण का जोखिम उठाए । आर्थिक और औद्योगिक क्षेत्र की तरह सब बाहर से माल लाकर अपना ठप्पा ठोंक देते हैं । कभी कभी मैं सोचता हूं कि हिंदी में कबीर, तुलसी और निराला ना होते तो इन बेचारों की जिंदगी क्या होती । अपनी विद्वता कहां झाड़ते । समीक्षक वीरेन्द्र यादव ने भी माना था लेखक संगठनों की निष्क्रियता के मूल में वामपंथी राजनीति कीपस्त हिम्मती, सुविधाजीविता और परिप्रेक्ष्यविहीनता है, वहीं लेखकों के बीच पद, प्रतिष्ठा व पुरस्कार आदि को लेकर लोलुपता बढ़ी है । वैचारिक उदारतावाद का स्थान नग्न अवसरवाद ले रहा है । इन्हीं दुर्गुणों को प्रगतिशील लेखक संघ में लक्ष्य करके जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच का गठन हुआ था , लेकिन ये संगठन भी कमोबेश आज के प्रगतिशील लेखक संघ की तरह झंडा-बैनर अधिक रह गए, सक्रिय लेखक संगठन कम ( कोलाहल कलह में-पृ 60)। यहां वीरेन्द्र यादव, मंगलेश से इतर विचार रखते हैं जब वो कहते हैं कि लेखक संगठनों को कॉपीराइट आदि के मुद्दों पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है । लेखक संगठनों को लेकर इनसे वैचारिक और सांगठनिक रूप से जुड़े लेखकों के बीच जबरदस्त कंफ्यूजन की स्थिति है और यह कंफ्यूजन इनकी निष्क्रियता की वजह है ।

अब जरा हम इन लेखक संगठनों के क्रियाकलापों में पारदर्शिता की परख करते हैं । इन लेखक संगठनों का सालाना या द्वैवार्षिक अधिवेशन होता है । उन अधिवेशनों में क्या क्या प्रस्ताव आदि पारित होते हैं उसका कोई दस्तावेजी रिकॉर्ड कहीं मिलता नहीं है । इन लेखक संगठनों से जुड़े मठाधीशों ने अपने कितने चेले चपाटों की किताबें छपवाकर उनको प्रोफेसर बनवा दिया लेकिन अपने संगठन के क्रियाकलापों के दस्तावेज छपवाने के लिए उनके पास वक्त नहीं है । हो सकता है कि उन अधिवेशनों में जो होता हो उसका रिकॉर्ड रखना संगठन के हित मे ना हो लिहाजा उसको संभालने की उचित व्यवस्था नहीं की गई । अधिवेशनों में पारित प्रस्ताव अगर मौजूद होते तो उसको कसौटी पर कस कर काल और परिस्थिति के मुताबिक इन संगठनों का मूल्यांकन हो सकता था । जो हो नहीं पा रहा है । क्या ये माना जाए कि जानबूझकर इन संगठनों के क्रियाकलापों के सबूत को छिपाकर रखा गया है ताकि उनका मूल्यांकन ना हो सके । निर्मल वर्मा ने कम्युनिस्टों के बारे में कहा था- उनका लगाव और प्रेम अपने सिवा किसी और से नहीं है । उनके शतरंजी खेल में कोई भी वर्ग , चाहे वो कितना भी उत्पीड़ित क्यों ना हो, उनके लिए बाजी जीतने की मुहर से अधिक महत्व नहीं रखता । साहित्य अकादमी के बाहर इकट्ठे लेखक संगठन के लोगों को देखकर यही सवाल मन में कौंधा था कि इस बार शतरंजी खेल में असहिष्णुता के मोहरे का इस्तेमाल हो रहा है । 

Sunday, May 25, 2014

जनवाद की शवसाधना

लोकसभा चुनावों में दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत और वामपंथी दलों की ऐतिहासिक हार के बाद हिंदी साहित्य जगत का एक खेमा सदमे में था । कुछ लेखक खीज मिटाने के चक्कर में इन दिनों फेसबुक जैसे सोशल साइट्स पर अपनी और अपनी विचारधारा की डफली बजाते घूम रहे हैं । उनकी टिप्पणियों में थोड़ा क्षोभ ज्यादा खिसियाहट दिखाई दे रही है । इस बीच खबर आई कि ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ कन्नड़ लेखक यू आर अनंतमूर्ति को कथित हिंदू संगठनों की धमकी के बाद सुरक्षा प्रदान कर दी गई है । इस खबर के सामने आने के बाद जनवाद की शवसाधना कर रही जनवादी लेखक संघ को इसमें संभावना नजर आई और आनन फानन में इस मृतप्राय लेखक संगठन ने एक बयान जारी कर विरोध जता दिया । खबरों के मुताबिक अपने बयान में जनवादी लेखक संघ ने कहा है कि आम चुनावों के परिणाम के आते ही अनंतमूर्ति को डराने धमकाने की जो हरकतें सामने आई हैं वो निंदनीय है । उनके मुताबिक ये हरकतें असहमति के अधिकार के प्रति इन राजनीतिक शक्तियों की असिष्णुता का परिचायक है । असहमति का अधिकार लोकतंत्र के सबसे बुनियादी उसूलों में से एक है । इस अधिकार पर हमला लोकतंत्र की बनियाद पर हमला है । यू आर अनंतमूर्ति जैसे कद्दावर लेखक को किसी भी प्रकार की धमकी या उनको डराने धमाकाने की कोशिशों की ना सिर्फ निंदा की जानी चाहिए बल्कि ऐसी कोशिशों के लिए जिम्मेदार लोगों और संगठनों को सलाखों के पीछे होना चाहिए । इस पूरे विवाद के पीछे अनंतमूर्ति का एक बयान है जो उन्होंने चुनाव के पहले दिया था जिसमें कथित तौर पर उन्होंने कहा था कि अगर मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तो वो देश छोड़ देंगे । हलांकि बाद में उन्होंने सफाई दी थी ।
यू आर अनंतमूर्ति एक बड़े लेखक हैं और उन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था है लिहाजा मोदी की जीत के बाद उन्होंने स्वीकार किया- मेरा मानना है कि मोदी युवाओॆं के बीच खासे लोकप्रिय थे और देश के युवा चीन, अमेरिका की तरह मजबूत राष्ट्र चाहते थे । अनंतमूर्ति के मुताबिक यही राष्ट्रीय भावना मोदी को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने में सहायक रही । अनंतमूर्ति का बुनियादी विरोध मजबूत राष्ट्रवाद से है । उनका मानना है कि राष्ट्रवाद की आड़ में झूठ को फैलाया जा सकता है और यही उनके विरोध की वजह भी है । यू आर अनंतमूर्ति को इसका हक भी है क्योंकि वो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नागरिक हैं और यहां का संविधान उन्हें अपने विचार रखने और उसके पक्ष में खड़ा होने की इजाजत देता है । लेकिन उन लोगों का क्या जिनकी आस्था भारतीय संविधान से ज्यादा लाल किताब में है, एक विचारधारा में है । इस तरह के लोग एक अवसर की तलाश में रहते हैं जिसका फायदा उठाकर वो दुनिया में अपने होने की दुंदुभि बजा सकें । हिंदी के इन बयानवीर लेखक संगठनों को बजाए बायान जारी करने के लेखकों के हितों में कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए । देशभर की अकादमियों में फैली अव्यवस्था के खिलाफ आवाज बुलंद करनी चाहिए । लेखकों-प्रकाशकों के बीच बढ़ती खटास को कम करने से लेकर रायल्टी और करारनामे के मसले पर कदम बढ़ाने चाहिए । यह इनका मूल काम होना चाहिए लेकिन सिर्फ अभिवयक्ति की आजादी के पक्ष में खड़े होने और कागजी विरोध जताने की आदत का त्याग करना होगा । हमारे देश का लोकतंत्र इतना मजबूत है कि कोई भी शख्स हमसे हमारे बुनियादी और संवैधानिक अधिकार नहीं छीन सकता है । इसके लिए बुक्का फाड़ने की जरूरत नहीं है ।