हिंदी के प्रतिभाशाली लेखक, कहानीकार और संपादक
प्रेम भारद्वाज ने बहुत ही कम उम्र में दुनिया छोड़ दी। हिंदी साहित्य में जब
राजेन्द्र यादव के संपादन में साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ अपनी कहानियों और पत्रिका में उठाए गए विवादों
की वजह से चर्चा बटोर रहा था तब प्रेम भारद्वाज ने ‘पाखी’ के संपादन का बीड़ा उठाया था। अपने संपादकीय
कौशल की वजह से प्रेम भारद्वाज ने ‘पाखी’ को हिंदी साहित्य की एक ऐसी पत्रिका के रूप में
स्थापित किया जो ‘हंस’ को चुनौती देने लगा
था। राजधानी के साहित्य जगत में बहुधा इस बात की चर्चा होती थी साहित्य में अब
नोएडा और दरियागंज के बीच मुकाबला है। ‘हंस’ का प्रकाशन दरियागंज से होता था जबकि ‘पाखी’ नोएडा से निकलती
है। प्रेम भारद्वाज भी अपने संपादकीयों में अक्सर विवाद उठाने की कोशिश करते थे
लेकिन वो राजेन्द्र यादव की तरह खुलकर नहीं खेलते थे। वो परोक्ष रूप से अपनी बात
कहते थे। प्रेम भारद्वाज आज से करीब बीस-बाइस साल पहले पटना से दिल्ली आए थे। ‘पाखी’ में उन्होंने लंबे
समय तक काम किया। साहित्यिक पत्रिका में संसाधनों की कमी की बात हमेशा सामने आती
है लेकिन बावजूद इसके प्रेम भारद्वाज ने ‘पाखी’ की स्तरीयता को कभी कम नहीं होने दिया। पाखी में
उन्होंने नए लेखकों को जोड़ा।
मुझे
याद पड़ता है कि पिछले वर्ष के विश्व पुस्तक मेला में प्रेम भारद्वाज की मांग सबसे
अधिक थी। हमलोग मजाक में कहते भी थे कि वो घंटे के हिसाब से कार्यक्रमों में
उपस्थित हो रहे हैं। लगातार किताबों पर होनेवाले कार्यक्रमों का संचालन करना या
फिर नई किताबों पर बोलना यह साबित करता था कि प्रेम भारद्वाज के अध्ययन का दायरा
बहुत विस्तृत था। कुछ सालों पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया। फिर अप्रिय
परिस्थियों में उनको ‘पाखी’
छोड़ना पड़ा था जिसके बाद उन्होंने दिल्ली से ही ‘भवन्ति’ नाम की साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया था। इस पत्रिका के शुरुआती
अंकों ने काफी चर्चा बटोरी थी। अचानक एक दिन खबर आई थी कि प्रेम भारद्वाज नोएडा के
मेट्रो अस्पताल में भर्ती हो गए हैं। बाद मे पता चला था कि कैंसर ने उनको अपनी
चपेट में ले लिया है। नोएडा-दिल्ली और अहमदाबाद में उनका इलाज चला और वो ठीक होने
लगे थे। सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हो गए थे और उन्होंने पाठकों को भरोसा दिया था
कि जल्द ही ‘भवन्ति’ का
नया अंक सामने होगा। अचानक एक दिन खबर फैली की उनको ब्रेन हेमरेज हो गया। उसके चंद
दिनों बाद प्रेम भारद्वाज के निधन की खबर से हिंदी जगत सन्न रह गया। उऩका कहानी
संग्रह ‘फोटो
अंकल’ काफी
चर्चित रहा था। प्रेम भारद्वाज ने सबरंग साहित्य के लिए कई बार लिखा था। उनको
श्रद्धांजलि।Translate
Showing posts with label पाखी. Show all posts
Showing posts with label पाखी. Show all posts
Friday, March 13, 2020
Saturday, September 8, 2018
साहित्यिक विवाद का वधस्थल फेसबुक
साहित्यिक पत्रिका ‘पाखी’ में छपे हिंदी
के लेखक-अध्यापक विश्वनाथ त्रिपाठी से की गई बातचीत पर जारी विवाद के बीच मशहूर
कथाकार ह्रषिकेश सुलभ ने फेसबुक पर दो महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं। एक तो
उन्होंने लिखा ‘फेसबुक
एक वधस्थल है।‘
दूसरी टिप्पणी भदेस लोकक्ति में थी। उन्होंने लिखा ‘कुछ लोग पूतवो मीठ, भतरो मीठ’ में लगे हैं।
ऐसे लोग वधिकों से कम खतरनाक नहीं हैं।‘ सुलभ जी की ये दो टिप्पणियां फेसबुक
पर सक्रिय लिखने पढ़ने वालों की मानसिकता को लेकर बेहद सटीक है। इन दिनों
साहित्यकारों को जिस तरह से फेसबुक पर घेर कर मारने या मारने की कोशिश की
प्रवृत्ति बढ़ी है उसने इस मंच को एक वधस्थल में तब्दील कर दिया है। फेसबुक पर कुछ
ऐसे साहित्यिक गिरोह सक्रिय हैं जो सुबह से ही ‘शिकार’ की तलाश में रहते हैं। चतुर शिकारी की
तरह उनको यह मालूम होता है कि किस मुद्दे को कितना हवा देकर किसी का वध करना है। विश्वनाथ
त्रिपाठी के प्रकरण को ही अगर देखें तो दो तीन स्वयंभू लोग बजाए इस मसले की
तार्किक परिणति तक ले जाने की कोशिश करने के लोग अपना अपना हिसाब बराबर करने में
लग गए। किसी को प्रेम भारद्वाज से दिक्कत थी तो वो प्रेम भारद्वाज को घेरने लग गए,
किसी को अपूर्व जोशी से परेशानी थी तो वो जोशी पर हमलावर होने लगे। किसी को
विश्वनाथ त्रिपाठी से अपना स्कोर सेट करना था तो वो उसमें लग गए। दूसरी बात जो
सुलभ ने कही उसका अर्थ है कि बेटा भी प्यारा और पति भी प्यारा। इस पूरे विवाद में
तो कई ऐसे लोग दिखे जो पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों तरह की टिप्पणियों से सहमति जता
रहे थे। यहां भी सहमत वहां भी सहमत। दरअसल ऐसे लोगों को पता ही नहीं चलता है कि
साहित्यिक विवाद में किस तरह का स्टैंड लेना है। उनको तो बस फेसबुक पर अपनी उपस्थिति
दर्ज करानी होती है। उनको लगता है कि साहित्य समाज उनकी उपस्थिति को दर्ज करे
लेकिन उपस्थिति दर्ज करनेवाने के चक्कर में इस तरह के लोग लगातार हास्यास्पद होते
चले जाते हैं।
इस पूरे विवाद में साहित्य के नेपथ्य
में चले जाने या फिर उस इंटरव्यू में त्रिपाठी जी कृति ‘व्योमकेश दरवेश’ की तथ्यात्मक
गलतियों पर सार्थक चर्चा होते होते रह गई। एक साहित्यकार की टिप्पणी थी कि किताब
की कमजोरियों से ध्यान हटाने के लिए यह सारा प्रपंच रचा गया। किसी भी कृति में अगर
कोई कमजोरी है तो उसपर किसी भी कालखंड में बात हो सकती है। वह कृति चाहे कितनी भी
चर्चित क्यों ना रही हो, कितनी भी पुरस्कृत रही हो जब भी नए तथ्य सामने आएंगें तो
उसपर बात होनी चाहिए और साहित्य जगत में ऐसा होता भी रहा है। तो ‘व्योमकेश दरवेश’ को इससे अलग
क्यों रखा जाना चाहिए। वह
कोई पवित्र ग्रंथ या किताब तो है नहीं कि उसपर सवाल उठानेवाले ईशनिंदा के दोषी
करार दे दिए जाएंगें। कथाकार प्रभात रंजन ने ‘पाखी’ में प्रकाशित विश्वनाथ त्रिपाठी की
बातचीत में तथ्यात्मक गलतियों को छोटी मोटी गलतियां करार दिया लेकिन इस क्रम में
उन्होंने उस पुस्तक की एक बड़ी गलती की ओर इशारा कर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि हजारी
प्रसाद द्विवेदी ज्योतिष विद्या में प्रवीण थे लेकिन उक्त पुस्तक में त्रिपाठी ने
उसपर नहीं लिखा है। प्रभात रंजन का आरोप था कि अल्पना मिश्र ने भी इस बिंदु पर
त्रिपाठी को क्यों नहीं घेरा। दरअसल त्रिपाठी जी इस किताब में इतनी त्रुटियां हैं
कि उसके दूसरे संस्करण को ठीक करने के लिए प्रकाशक ने एक अन्य आलोचक को दिया गया।
पहले संस्करण और दूसरे संस्करण में कई चीजें बदली गईं। इस स्तंभ में उसपर पहले भी
चर्चा हो चुकी है। दरअसल त्रिपाठी जी जिस अभिनंदन ग्रंथ के हवाले से इस किताब में
तथ्यों को लिया वो त्रुटिपूर्ण था और उसको ही आधार बनाकर गुरू आख्यान रच दिया। ऐसा
प्रतीत होता है कि विश्वनाथ त्रिपाठी ने हजारी प्रसाद द्विवेदी पर प्रकाशित
अभिनंदन ग्रंथ का गहनता से अध्ययन नहीं किया। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह और
गौरव अवस्थी को अथक प्रयास के बाद 83 साल बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
अभिनंदन ग्रंथ का पुनर्प्रकाशन हो पाया था। इसको ही ढंग से देख लेते।
इस किताब को बचाने के लिए जिस तरह से
विश्वविद्लाय शिक्षक एकजुट हुए उसको देखते हुए एक साहित्यकार ने इसकी तुलना आरुषि
हत्याकांड के दौरान सीबीआई के एक पूर्व निदेशक के बयान से की जो उस वक्त के
अखबारों में सूत्रों के हवाले से छपा था। सीबीआई के निदेशक के हवाले से उस वक्त ये
कहा गया था कि इस केस में उनको पिता नाम की संस्था को बचाना था,( वी हैव टू सेव द
इंस्टीट्यूशन ऑफ फादर)। उनका मानना है कि ‘व्योमकेश दरवेश’ को लेकर जिस
तरह की एकजुटता दिखी उसको देखकर कहा जा सकता है कि शिक्षकों की संस्था को बचाना
उद्देश्य हो सकता है। (वी हैव टू सेव द इंस्टीट्यूशन ऑफ द टीचर- क्रिटिक)। कुछ
विद्वान आलोचकों की राय है कि ‘व्योमकेश
दरवेश’
जीवनी नहीं बल्कि संस्मरण है।चलिए अगर यह मान लिया जाए कि वो संस्मरण है तो क्या
संस्मरणों में ताजमहल को दिल्ली में दिखाने की छूट लेखक को दी जा सकती है। क्या
रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर लाल किला को पटना में दिखाया जा सकता है।
दरअसल इस पूरे विवाद की जड़ में ‘पाखी’ पत्रिका में
विश्वनाथ त्रिपाठी की एक टिप्पणी थी जिसको लेकर घमासान मचा। पहले त्रिपाठी जी लानत
मलामत शुरू हो गई क्योंकि प्रकाशित टिप्पणी में आपत्तिजनक बातें थीं। बाद में बहस
इस दिशा में मुड़ गई कि साक्षात्कार प्रकाशित होने के पहले त्रिपाठी जी को दिखाया
जाना चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी के कई पैरोकार जो सुबह शाम इसको लेकर छाती कूटते
हैं वो चाहे अनचाहे प्री सेंसरशिप की वकालत करने लगे। पत्रकारों को ये राय दी जाने
लगी कि इंटरव्यू छपने के पहले दिखा लेना चाहिए। इंटरव्यू छपने के पहले क्यों दिखा
लेना चाहिए? अगर
आज यही मांग प्रधानमंत्री या अन्य मंत्रियों की तरफ से आए तो एकदम से इसी फेसबुक
बवाल मच जाएगा, ऐसा लगेगा कि इमरजेंसी से बुरे दिन आ गए। इंटरव्यू लेनेवाले और
इंटरव्यू देनेवालों दोनों को यह पता होता है कि वो क्या पूछ रहे हैं और क्या बोल
रहे हैं। कई बार जब मनमाफिक नहीं छपता है या उसपर विवाद हो जाता है तो लोग अपनी
सुविधानुसार मीडिया पर अपने बयान को तोड़-मरोड़कर छापने का आरोप लगा देते हैं
लेकिन उनको भी पता होता है कि जन्नत की हकीकत क्या है।
प्रेम भारद्वाज ने अंतत: विश्वनाथ
त्रिपाठी से मिलकर इस पूरे प्रकरण पर खेद जता दिया लेकिन उन्होंने कुछ सवाल भी
खड़े किए हैं। ‘पाखी
बनाम आदमीनामा’
शीर्षक से प्रेम भारद्वाज ने एक लंबी पोस्ट लिखी है और कुछ सवाल उठाए हैं- ‘आदमी का जवाब
आदमी होना चाहिए भीड़ नहीं। आलोचना और हत्या में फ़र्क होना चाहिए। आखिर वह कौन सा माइंडसेट है जो आदमी को
आदमी नहीं रहने देता, उसके भीतर की हिंसा को बार-बार उभार देता है? वह कौन सी
प्रवृत्ति है जो हर अच्छी-बुरी घटना में साजिश, मकसद और गणित ढूंढ़ती है? वह कौन सी सोच है जो हमें आदमी से जज बना देती है और कबीलाई
मानसिकता की ओर धकेलती है- कभी गाय, कभी मांस का टुकड़ा, ‘कभी एक विवाद’ के बहाने हमला बोला जाता है? यही वह पल होता है जब आदमी विवेकशील
व्यक्ति से विवेकहीन भीड़ के रूप में तब्दील हो जाता है। ऐसी भीड़ आपके साथ कुछ भी
कर सकती है।
कुछ दिन हुए जब नामवर सिंह द्वारा भगवान कहे जाने के अपराध में उनके प्रति गाली- गलौज की भाषा का इस्तेमाल किया गया। वह भी त्रिपाठी जी के गुरु और उम्र में उनसे भी बड़े, 93 साल के हैं। फिर वह कौन सी प्रवृत्ति थी जिसने उनकी उम्र और उनके काम को नज़रअंदाज़ कर उनके साथ सड़कछाप जेबकतरे को पकड़कर सजा देने जैसा व्यवहार किया?उसके भी पहले मैनेजर पांडेय की एक तस्वीर लगती है तब उनके प्रति अपमान का ज़हर उगलने के पीछे कौन सी प्रवृत्ति काम कर रही थी?’
कुछ दिन हुए जब नामवर सिंह द्वारा भगवान कहे जाने के अपराध में उनके प्रति गाली- गलौज की भाषा का इस्तेमाल किया गया। वह भी त्रिपाठी जी के गुरु और उम्र में उनसे भी बड़े, 93 साल के हैं। फिर वह कौन सी प्रवृत्ति थी जिसने उनकी उम्र और उनके काम को नज़रअंदाज़ कर उनके साथ सड़कछाप जेबकतरे को पकड़कर सजा देने जैसा व्यवहार किया?उसके भी पहले मैनेजर पांडेय की एक तस्वीर लगती है तब उनके प्रति अपमान का ज़हर उगलने के पीछे कौन सी प्रवृत्ति काम कर रही थी?’
अब समय आ गया है
हिंदी साहित्य के जुड़े लोगों को गंभीरता से इसपर विचार करने की आवश्यकता है कि
फेसबुक पर जिस तरह से ‘लिटरेरी
लिंचिंग’ को अंजाम दिया जाता है उसको रोकने के लिए क्या
किया जाना चाहिए। क्योंकि जब साहित्यकार के खोल में बैठे गिरोहबाज भाषा की मर्यादा
को भूलकर साहित्यिक विमर्श को व्यक्तिगत कर देते हैं और चरित्रहनन से लेकर उसमें
परिवार तक को शामिल करने का कुचक्र रचते हैं। इस प्रवृत्ति को तत्काल रोका जाना
जरूरी है। स्वस्थ साहित्यिक विवाद का हमेशा स्वागत होना चाहिए लेकिन स्वस्थ विवाद
के लिए स्वस्थ मानसिकता का होना भी आवश्यक है।
Saturday, August 25, 2018
सवालों के घेर में ‘व्योमकेश दरवेश’
राजेन्द्र यादव के जीवित रहते
साहित्यिक परिदृश्य जीवंत बना रहता था। वो अपनी पत्रिका हंस में या अन्यत्र भी
अपनी टिप्पणियों या अपने साक्षात्कार आदि के माध्यम से कुछ ऐसा कह जाते थे या कुछ
ऐसा लिख देते थे जिससे हिंदी जगत में बौद्धिक चहल-पहल बनी रहती थी। उनके निधन के
बाद हिंदी साहित्य जगत में जीवंतता और खिलंदड़ापन की कमी महसूस होती है। यादव जी
लगातार कुछ साहित्यिक शरारतें करते रहते थे, इन शरारतों से ज्यादातर विवाद होते
थे, उन विवादों की वजह से संवाद होता था, साहित्य के पाठकों को एक अलग किस्म का रस
और आनंद मिलता था। यादव जी तो हर वक्त इस फिराक में ही रहते थे कि कैसे कोई
साहित्यिक विवाद उठे, वो साथी लेखकों को उकसाते रहते थे, विवाद सुझाते भी रहते थे।
साहित्यिक पत्रिका ‘पाखी’ के संपादक
प्रेम भारद्वाज यदा-कदा अपने संपादकीय या अपने आयोजनों से हिंदी साहित्य के सन्नाटे
को तोड़ने की कोशिश करते रहते हैं। कभी विभूति नारायण राय और मैत्रेयी पुष्पा की
अपनी पत्रिका के कवर पर हंसते हुए फोटो छापकर तो कभी किसी विषय विशेष पर दो ध्रुव
पर बैठे लेखकों को सामने लाकर माहौल को जीवंत बनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन
उनमें विवादों को खड़ा करने को लेकर राजेन्द्र यादव जैसी निरंतरता नहीं है। प्रेम
भारद्वाज विवाद तो खड़ा करते हैं पर थोड़ा हिचकते भी हैं, यादव जी की तरह बिंदास
होकर फ्रंट फुट पर नहीं खेलते हैं।
‘पाखी’ के अगस्त अंक
में हिंदी के वरिष्ठ आलोचक और गद्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी से एक लंबी बातचीत छपी है
जिसमें कथाकार अल्पना मिश्रा ने त्रिपाठी जी को घेर लिया। दरअसल दो हजार ग्यारह
में त्रिपाठी जी की पुस्तक ‘व्योमकेश
दरवेश’
प्रकाशित हुआ था। यह पुस्तक उन्होंने अपने गुरू आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की
जिंदगी को आधार बनाकर लिखी थी। पुस्तक प्रकाशन के बाद उसपर काफी चर्चा हुई और
ढेरों पुरस्कार प्राप्त हुए। ‘पाखी’ में प्रकाशित
बातचीत में प्रेम भारद्वाज ने विश्वनाथ त्रिपाठी से इस पुस्तक पर बात शुरू की और
उनके सामने द्विवेदी जी कुल गोत्र की रचनाकार अल्पना मिश्र को सामने कर दिया। अल्पना
मिश्र ने कहा कि जबसे ये पुस्तक आई है तो इसको आचार्च द्विवेदी की प्रामाणिक जीवनी
के तौर पर देखा या माना जा रहा है। अल्पना मिश्र ने त्रिपाठी जी की इस पुस्तक की
तथ्यात्मक भूलों की ओर इशारा करते हुए त्रिपाठी जी से उत्तर की अपेक्षा की। अल्पना
ने अपने प्रश्न में बताया कि त्रिपाठी जी ने द्विवेदी जी के गांव का नाम गलत लिखा,
आचार्य द्विवेदी की मां का नाम गलत लिखा। अल्पना ने एक और तथ्य सामने रखा कि द्विवेदी
जी की एक पुत्री का निधन लिवर सिरोसिस से हुआ जबकि त्रिपाठी जी ने तीनों पुत्रियों
की मौत की वजह इस बीमारी को बता दिया है। अल्पना मिश्र पूरी तैयारी के साथ आई थी
और उन्होंने एक के बाद एक तथ्यात्मक भूलों को गिनाना शुरू कर दिया। त्रिपाठी जी ने
अपनी पुस्तक में लिखा कि आचार्य जी की पत्नी दूसरी कक्षा तक पढ़ी हैं जो कि अल्पना
के मुताबिक गलत है। अब त्रिपाठी जी को कोई उत्तर सूझ नहीं रहा था, उन्होंने जो
बताया वो चौंकानेवाला था। उनके मुताबिक वो द्विवेदी जी के गांव गए वहां उन्हें एक
शख्स मिला जिसने खुद को आचार्य द्विवेदी का पौत्र बताया। उस व्यक्ति ने त्रिपाठी
जी को विश्वनाथ द्विवेदी पर प्रकाशित एक अभिनंदन ग्रंथ दिया। त्रिपाठी जी ने उस
व्यक्ति के कहे और उस अभिनंदन ग्रंथ को ब्रह्मसत्य मानते हुए ‘व्योमकेश दरवेश’ की रचना कर
डाली। प्रेम भारद्वाज ने उनसे यह भी जानने की कोशिश की कि जब इस पुस्तक को लिखने
में 15-17 साल लगे तो इतनी तथ्यात्मक भूले क्यों हैं? त्रिपाठी जी
इसका कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाए।
अल्पना मिश्र ने तो कहा कि उन्होंने ‘व्योमकेश दरवेश’ के बाद
त्रिपाठी जी से मिलने की कई कोशिशें की जो कामयाब नहीं हो पाईं। विश्वनाथ त्रिपाठी
ने इसको भी अजीब तरह से लिया और कहा कि ‘कहानीकारों की अपनी एक ऐंठ होती है।
मैं जानता हूं लोग कैसे मिलते हैं। जिसको मिलना होता है वो मिल ही लेते हैं।‘ त्रिपाठी जी
किताब भूलों से भरी है लेकिन फिर भी हिंदी साहित्य जगत के कई पुरोधाओं ने, खासकर
विश्वनाथ त्रिपाठी की विचारधारा के लोगों ने, इन सारी भूलों को नजरअंदाज करते हुए
ऐसा माहौल बनाया जैसे कोई अप्रतिम पुस्तक लिख दी गई हो। नामवर सिंह ने तो इस
पुस्तक को अपनी किताब ‘दूसरी
परंपरा की खोज’
से बेहतर बताया। अब सवाल यही से शुरू होते हैं। नामवर सिंह भी आचार्य द्विवेदी के
काफी करीबी थे, उन्हें ‘व्योमकेश
दरवेश’
की गलतियां क्यों नहीं दिखाई दीं। क्यों नहीं हिंदी के अन्य विद्वानों ने ‘व्योमकेश दरवेश’ पर उंगली उठाई।
इस स्तंभ में एक भयानक भूल की ओर 2014
में इशारा किया गया था। ‘व्योमकेश दरवेश’ के पहले संस्करण में पृष्ठ संख्या 214 पर यशपाल और साहित्य अकादमी विवाद
के संदर्भ में त्रिपाठी जी लिखते हैं – ‘यशपाल के विषय में विवाद हुआ ।कहते हैं
कि दिनकर ने आपत्ति दर्ज की कि ‘झूठा सच’ के लेखक ने किताब में जवाहरलाल नेहरू के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया है
।नेहरू भारत के प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ अकादमी के अध्यक्ष भी थे । नेहरू तक
बात पहुंची हो या ना पहुंची हो, द्विवेदी जी पर दिनकर की
धमकी का असर पड़ा होगा । भारत के सर्वाधिक लोकतांत्रिक नेता की अध्यक्षता और पंडित
हजारीप्रसाद द्विवेदी के संयोजकत्व में यह हुआ । अगर यह सच है तो अकादमी के
अध्यक्ष और हिंदी के संयोजक दोनों पर धब्बा है यह घटना और ‘मेरे
नगपति मेरे विशाल’ के लेखक को क्या कहा जाए जो ‘अपने समय का सूर्य होने’ की घोषणा करता है।‘ अब यहीं विश्वनाथ त्रिपाठी का दिनकर को लेकर पूर्वग्रह सामने आता है ।
जबकि यह पूरा प्रसंग ही इससे उलट है । डी एस राव की किताब ‘फाइव
डिकेड्स, अ शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ साहित्य अकादमी’ के पृष्ठ संख्या 197 पर लिखा है – एक्जीक्यूटिव
बोर्ड की बैठक में नेहरू ने जानना चाहा कि यशपाल के झूठा सच को अकादमी पुरस्कार
क्यों नहीं मिला तो हिंदी के संयोजक हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि उसमें नेहरू
जी को बुरा भला कहा गया है । नेहरू जी ने कहा कि पुरस्कार नहीं देने की ये कोई वजह
नहीं होनी चाहिए । इसपर द्विवेदी जी ने जवाब दिया कि सिर्फ वही एकमात्र कारण नहीं
था बल्कि और भी अन्य बेहतर किताबें पुरस्कार के लिए थी । अर्थात द्विवेदी जी ने
यशपाल को साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं दिया । कालांतर में यह बात सुननियोजित
तरीके से फैलाई गई कि इसके पीछे दिनकर थे लेकिन वो गलत तथ्य है । इस पूरे प्रसंग
से यह साबित होता है कि विश्वनाथ त्रिपाठी या तो स्मरण दोष के शिकार हो गए या
जानबूझकर दिनकर को बदनाम करने की साजिश के हिस्सा बने । अगर स्मरण दोष के शिकार
हुए होते तो यह नहीं कहते- ‘मेरे नगपति मेरे विशाल के लेखक
को क्या कहा जाए जो अपने समय का सूर्य होने की घोषणा करता है’। यह दिनकर पर व्यक्तिगत प्रहार था।
दरअसल दिनकर अपने जीवन काल में लगातार वामपंथियों के निशाने पर रहे लेकिन चूंकि वो
इतने बड़े पाए के लेखक थे कि आयातित विचारधारा के लेखक उनकी रचनात्मकता को
प्रभावित नहीं कर सके। बाद मे जब व्योमकेश दरवेश का दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ तो
दिनकर के प्रसंग में त्रिपाठी जी ने सक्रियता दिखाई और मुझे
बताया गया है कि दिनकर का नाम और अपने समय का सूर्य वाली लाइन हटा दी गई है। अगर
ये पंक्तियां हटा दी गई हैं तो यह मान लेना चाहिए कि त्रिपाठी जी ने दुर्भावनावश
वो पंक्ति लिखी थी और तथ्य के सामने आने के बाद उसको हटा लेना उचित समझा।
‘व्योमकेश
दरवेश’
को लेकर जो शोर शराबा मचाया गया, उसको जिस तरह से प्रचारित किया गया, उसको जितने
पुरस्कार मिले वो सब अब सवालों के दायरे में है। हिंदी मे रचनाओं के पाठ और
पुनर्पाठ की बहुत चर्चा होती है, अब वक्त आ गया है कि त्रिपाठी जी की इस कृति का
पुनर्पाठ हो, भक्तिभाव की बजाए इस पुस्तक को तथ्यों की कसौटी पर फिर से कसा जाए। अगर
अल्पना जी के दिए गए तथ्य सही हैं तो त्रिपाठी जी को या फिर उस पुस्तक के प्रकाशक
को इन तथ्यों को सुधारने का उपक्रम किया जाना चाहिए क्योंकि इतिहास को बदल देना,
या उसके साथ छेड़छाड़ करना आनेवाली पीढ़ियों के साथ छल करना है। पाखी को इस सार्थक
चर्चा के आयोजन के लिए और चर्चा को दर्शन से हटाकर त्रिपाठी जी की पुस्तक पर लाकर
अल्पना मिश्र को आगे करने के लिए प्रेम भारद्वाज की तारीफ की जानी चाहिए।
Monday, February 15, 2016
वीराने में टहलती यादों की परछाइयां
निदा फाजली ने अपनी किताब ‘तमाशा मेरे आगे’ की भूमिका में मैडम बॉवेरी को याद करते हुए कहा है कि– ‘काश मेरे पास इतना पैसा होता कि सारी किताबें खरीद
लेता और उसको फिर से एक बार लिखता ।‘ उसके बाद निदा साहब कहते
हैं...समय का आभाव नहीं होता तो मैं भी ऐसा ही करता । मैडम बॉबेरी के कथन को जेहन में
रखते हुए वो अपना एक शेर कहते हैं – ‘कोशिश
के बावजूद एक उल्लास रह गया/ हर काम में हमेशा कोई काम रह गया
‘। निदा फाजली के निधन की जब खबर मिली तो मेरी स्मृति में निदा
साहब का ये शेर कौंध गया । वो इसलिए कि उनसे जनवरी 2013 में हुई दो बार हुई बातचीत
याद आ गई । उसके पहले निदा साहब से मेरा कोई संपर्क नहीं था । हां उनके लिखे फिल्मी
गीत – ‘तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल
है’ और ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं
मिलता’ मुझे बेहद पसंद हैं । उनकी आत्मकथात्मक उपन्यासों को पढ़कर
उनके संघर्षों और विचारों से अवगत था । लेकिन जब दो हजार तेरह में साहित्यक पत्रिका
‘पाखी’ में उनका एक खत पढ़ा तो हैरान रह
गया था । उन्हें तुरंत फोन किया था और उनसे काफी लंबी बात हुई थी । दरअसल उन्होंने
‘पाखी’ के संपादक के नाम एक पत्र में सदी
के महानायक अमिताभ बच्चन की तुलना मुंबई हमले के गुनहगार आतंकवादी आमिर अजमल कसाब से
कर दी थी । दरअसल निदा फाजली पूर्व के अंक में संपादकीय में कहानीकार ज्ञानरंजन की
तुलना अमिताभ बच्चन से किए जाने से खफा थे । निदा ने संपादक के नाम खत में लिखा था-
‘दूसरी बात जो आपके संपादकीय मे खटकी वो यह है कि ज्ञानरंजन जैसे
साहित्यकार की तुलना सत्तर के दशक के एंग्री यंगमैन अमिताभ बच्चन से की गई है । एंग्री
यंगमैन को सत्तर के दशक तक कैसे सीमित किया जा सकता है । क्या 74 वर्षीय अन्ना हजारे
को भुलाया जा सकता है । मुझे तो लगता है कि सत्तर के दशक से अधिक गुस्सा तो आज की जरूरत
है और फिर अमिताभ को एंग्री यंगमैन की उपाधि से क्यों नवाजा गया । वो तो केवल अजमल
आमिर कसाब की तरह गढ़ा हुआ खिलौना है । एक को हाफिज सईद ने बनाया था तो दूसरे को सलीम-जावेद
की कलम ने गढ़ा था । आपने भी खिलौने की प्रशंसा की लेकिन खिलौना बनाने वालों को सिरे
से भुला दिया । किसी का काम, किसी का नाम कहावत शायद इसलिए गढ़ी गई है ।‘ जब मैंने उनको फोन किया तो वो अपने तर्क और राय पर कायम थे । जब मैंने उनसे
सवाल किया कि आप अमिताभ कि तुलना कसाब से कैसे कर सकते हैं तो उन्होंने दो टूक कहा
था कि मैंने अपनी राय लिख दी, आप अपनी लिखें । जनवरी में ही मैंने उनकी इस राय के खिलाफ
लेख लिखा । लेख छपने के तीन दिन बाद निदा साहब का फोन आया और उन्होंने कहा कि कर ली
ना तुमने अपने मन की । फिर काफी बातें हुई लेकिन मुझे उसमें कहीं से तल्खी नहीं महसूस
हुई । मुझे लगा कि उनमें अपनी आलोचना को स्पेस देने का माद्दा था ।
उसके बाद मैंने निदा को और पढ़ना शुरू किया तो मुझे यह लगा कि निदा फाजली हिंदी-उर्दू
की तरक्कीपसंद अदबी रवायत के प्रतिनिधि शायर थे । मजरूह सुल्तानपुरी के बाद निदा ऐसे
शायर थे जिन्होंने शायरी को उर्दू और फारसी की गिरफ्त से आजाद कर आम लोगों तक पहुंचाया
। उन्होंने हिंदी-उर्दू की जुबां में शायरी की । कह सकते हैं कि हिन्दुस्तानी उनकी
शायरी में बेहतरीन रूप से सामने आई । ताउम्र निदा हिंदी और उर्दू के बीच की खाई को
पाटने में लगे भी रहे । वो इस बात के विरोधी थे कि मुशायरों में सिर्फ शायरों को और
कवि सम्मेलनों में सिर्फ कवियों को बुलाया जाए । उन्होंने कई मंचों पर गोपाल दास नीरज
के साथ साझेदारी में कविताएं पढ़ी थी । उनकी शायरी को देखते हुए ये लगता था कि उन्होंने
हिंदू मायथोलॉजी का गहरा अध्ययन किया था । सूरदास और कबीर के पदों से उन्होंने प्रेरणा
ली औक शायरी की । निदा बेखौफ होकर अपनी बात कहते थे । जिस तरह से कबीर ने मस्जिदों
और मंदिरों को लेकर काफी बेबाकी से लिखा था उसी तरह से निदा ने भी लिखा- ‘बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान, एक खुदा के पास इतना बड़ा मकान’ या फिर ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें ,
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए ।‘ उनकी शायरी के ये स्वर
लंबे वक्त तक साहित्य में याद किए जाएंगे ।
निदा फाजली का जन्म 12 अक्तूबर 1938 को दिल्ली में हुआ था और वो अपने माता-पिता
की तीसरी संतान थे और उनका असली नाम मुक्तदा हसन था । बंटवारे के वक्त उन्होंने पाकिस्तान
जाने की बजाए भारत में ही रहना ताय किया था क्योंकि वो दोस्तों से बिछुड़ना नहीं चाहते
थे । उनका बचपन ग्वालियर में बीता था जहां उन्होंने उस वक्त के विक्टोरिया कॉलेज से
पढ़ाई पूरी की थी । ग्वालियर में रहते हुए उन्होंने उर्दू अदब में अपनी पहचान बना ली
थी । उस वक्त ही उन्होंने अपना नाम बदल कर निदा फाजली रख लिया । उनकी कविताओं का पहला संग्रह ‘लफ्जों का पुल’ जब छपा तो उन्हें काफी शोहरत
मिली, भारत में भी और पाकिस्तान में भी । बाद में वो मुंबई चले गए और फिर वहीं के होकर रह गए । उनकी शायरी परवान चढ़ी और
जगजीत सिंह की आवाज ने उनको लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया । कालांतर में उन्होंने
फिल्मों के लिए गीत लिखने शुरू किए जो काफी हिट रहे । ‘आप तो ऐसे ना थे’, ‘रजिया सुल्तान’, ‘सरफरोश’, ‘अहिस्ता-अहिस्ता’, ‘इस रात की सुबह नहीं’ और ‘चोर पुलिस’ में लिखे उनके
गीतों ने धूम मचा दी थी । 2013 में निदा फाजली तो भारत सरकार ने पद्मश्री से नवाजा
था । इसके अलावा भी उनको दर्जनों पुरस्कार मिले थे । निदा फाजली को 1998 में उनकी कृति
‘खोया हुआ सा कुछ’ के लिए साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित
किया गया था । ‘खोया हुआ सा कुछ’ के अलावा ‘सफर में धूप’, ‘आंखों भर आकाश’, ‘मौसम आते जाते हैं’ ‘लफ्जों के फूल’ ‘मोर नाच’ आदि उनकी प्रमुख कृतियां हैं । ‘दीवारों के बीच’ उनकी गद्य रचना थी जो आत्मकथात्मक
उपन्यास है । इस उपन्यास में उन्होंने विभाजन से लेकर 1965 तक की घटनाओं को सिलसिलेवार
ढंग से पेश किया था । इसके बाद उन्होंने ‘दीवारों के बाहर’ नाम से बाद की घटनाओं को समेटा । फिर ‘तमाशा मेरे आगे’ का पकाशन हुआ जिसमें निदा के छिटपुट लेख संग्रहीत हैं । अंत में निदा की स्मृति
को नमन करते हुए उनकी ही एक कविता – ‘हर कविता मुकम्मल होती है, लेकिन वो कलम से कागज पर, जब आती है, थोड़ी सी कमी रह
जाती है ।‘ अलविदा निदा साहब ।
Wednesday, January 16, 2013
अमिताभ से कसाब की तुलना नाजायज
हिंदी की साहित्यिक पत्रिका पाखी पिछले
करीब दो महीनों से हिंदी जगत में विवादों के केंद्र में है । पहले तो उसने रांची में
रह रहे हिंदी के बुजुर्ग प्रोफेसर और लेखक श्रवण कुमार गोस्वामी का हिंदी की चर्चित
लेखिका महुआ माजी के उपन्यास मैं बोरिशाइल्ला के बारे में एक विवादास्पद लेख छाप कर
हिंदी जगत में हडकंप मचा दिया । लेखकों के बीच महुआ के पक्ष और विपक्ष की रेखा साफ
तौर पर दिखाई दी । कई लोगों को महुआ में कृतघ्नता का बोध दिखा तो कई लेखकों को इसमें
महिलाओं को लेकर पुरुषों की मानसिकता का प्रतिबिंब दिखा । बहरहाल उस विवाद से एक बार
फिर से अच्छी रचना की कमी झेल रहे हिंदी साहित्य को विवाद के रूप में विमर्श की गरमाहट
मिली । लेखकों ने कम से कम इस मसले पर स्टैंड तो लिया । क्योंकि हाल के दिनों में लेखकों
ने सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय जाहिर करनी बंद कर दी है ।
अब ताजा विवाद पाखी के जनवरी अंक में मशहूर शायर निदा फाजली के पत्र से उठा है । अपने पत्र में निदा फाजली ने सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की तुलना मुंबई हमले के गुनहगार और पाकिस्तानी आतंकवादी आमिर अजमल कसाब से कर दी है। संपादक के नाम लिखे पत्र में निदा फाजली ने लिखा कि – दूसरी बात जो आपकी संपादकीय में खटकी वह ज्ञानरंजन जैसे साहित्यकार की तुलना सत्तर के दशक के एंग्री यंगमैन अमिताभ बच्चन से की गई है । एंग्री यंग मैन को सत्तर के दशक तक कैसे सीमित किया जा सकता है । क्या 74 वर्षीय अन्ना हजारे को भुलाया जा सकता है । मुझे तो लगता है कि सत्तर के दशक से अधिक गुस्सा तो आज की जरूरत है, और फिर अमिताभ को एंग्री यंगमैन की उपाधि से क्यों नवाजा गया ? वे तो केवल अजमल आमिर कसाब की तरह गढ़ा हुआ खिलौना हैं । एक को हाफिज मुहम्मद सईद ने बनाया था, दूसरे को सलीम जावेद की कलम ने गढ़ा था, खिलौने को फांसी दे दी गई, लेकिन उस खिलौने को बनाने वाले को पाकिस्तान खुलेआम उसकी मौत का नमाज पढ़ने के लिए आजाद छोड़े हुए है । आपने भी खिलौने की प्रशंसा की, लेकिन खिलौना बनाने वाले को सिरे से भुला दिया । ‘किसी का नाम, किसी का काम’ की कहावत शायद इसी लिए गढ़ी गई है ।“ निदा साहब के इस पत्र के बाद साहित्यिक जगत में हलचल मच गई । उनके पक्ष और विपक्ष में लेखकों के बयान आने लगे । बयानों की पड़ताल के पहले हमें निदा फाजली के पत्र का विश्लेषण करना चाहिए । निदा फाजली को इस बात पर आपत्ति है कि कथाकार ज्ञानरंजन को पाखी में एंग्री यंग मैन क्यों बताया गया । दरअसल पिछले साल सितंबर में पाखी ने ज्ञानरंजन पर भारी भरकम विशेषांक निकाला था जिसके संपादकीय में प्रेम भारद्वाज ने लिखा था –ज्ञानरंजन की एक खासियत उनका आक्रोश है । यह आक्रोश उनकी कहानियों के पात्रों में भी दिखाई देता है । इन पंक्तियों के लिखते लिखते सहसा सत्तर दशक के एंग्रीयंगमैन अमिताभ याद आ जाते हैं । कुछ समानताएं और बहुत असमानताएं हैं दोनों दिग्गजों में । फिल्म को हेय मानने वाले कुछ शुद्धतावादियों के लिए यह तुलना असहज लग सकती है । लेकिन किसी चीज को अलग बड़े कैनवास में देखने में बुराई क्या है । मुझे इस तुलना के लिए माफ किया जाए, अगर किया जा सकता है तो । अपने उसी संपादकीय में प्रेम भारद्वाज लिखते हैं कि सुधीश पचौरी ने तो केवल स्टारडम के चलते नामवर सिंह को हिंदी साहित्य का अमिताभ बच्चन तक कह डाला । प्रेम भारद्वाज के इस बात का अंदेशा था कि साहित्य से जुड़े लोग उनकी इस तुलना पर सवाल खड़े कर सकते हैं लिहाजा उन्होंने पहले ही माफी मांग ली थी । लेकिन पाखी संपादक को शायद ही इस बात का इल्म रहा होगा कि साहित्य के अलावा फिल्मों से जुड़ा एक शायर उनकी तुलना पर उंगली उठाते हुए एक भयंकर भूल कर देगा ।
पाखी के इसी संपादकीय पर निदा फाजली को आपत्ति थी और उन्होंने पत्र लिखकर उसे जाहिर किया । लेकिन निदा इतने नाराज हो गए कि उन्हें यह तक याद नहीं रहा कि आमिर अजमल कसाब को भारत पर हमला करने और एक राष्ट्र के खिलाफ युद्ध झेड़ने का दोषी करार देकर उसे फांसी पर लटकाया गया है । एक ऐसे आतंकवादी से अमिताभ बच्चन की तुलना को किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता है । क्या अमिताभ बच्चन के देशप्रेम और उनकी कला पर कोई शक है । लेकिन जिस तरह से बुजुर्ग शायर निदा ने उनकी तुलना की है उससे ये लगता है कि निदा अमिताभ को अपमानित करना चाहते हैं । निदा ने जो लिखा उससे एक और बात ध्वनित होती है कि अमिताभ कुछ नहीं होते अगर सलीम जावेद नहीं होते तो । निदा के इन तर्कों पर बहस हो सकती है कि अमिताभ की सफलता में सलीम जावेद की कहानियों का कितना योगदान है । लेकिन अगर निदा ये मानते हैं कि सिर्फ कहानियों की वजह से ही अमिताभ बच्चन सदी के महानायक बने तो ये उनकी भूल ही नहीं है बल्कि ऐसा कहकर वो फिल्मों से जुड़े निर्देशकों, अन्य साथी कलाकारों, संगीतकारों के योगदान को भुला रहे हैं । किसी भी फिल्म की सफलता में कई सारे लोगों का सामूहिक योगदान होता है । निदा साहब फिल्मों को बहुत करीब से जानते हैं । बावजूद इसके इस तरह की तुलना करना उनकी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं है । अमिताभ बच्चन ने सलीम जावेद की कहानियों के अलावा भी कई ऐसी फिल्में की जो ना केवल यादगार हैं बल्कि क्लासिक्स की श्रेणी में आती हैं । अपनी सफलता की दूसरी पारी में अमिताभ बच्चन ने ब्लैक और पॉ जैसी सार्वकालिक फिल्में की जो ना केवल बॉक्स ऑफिस पर सफल रही बल्कि उसे सराहना भी मिली । लेकिन इन फिल्मों में रानी मुखर्जी और विद्या बालन के किरदार के बगैर सफलता का आकलन नहीं किया जा सकता है । इसके अलावा पॉ फिल्म में अमिताभ बच्चन के बोलने के लिए जिस तकनीक का इस्तेमाल किया गया उसके बिना क्या उस किरदार को निभा पाना संभव होता । हां इतना अवश्य है कि फिल्म और अभिनेता दोनों की सफलता में कहानियों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है ।
कहानीकार ज्ञानरंजन की तुलना अमिताभ बच्चन से करने से निदा फाजली इतने खफा हो गए कि गुस्से में अमिताभ की तुलना कसाब से तो की ही लेकिन इसके अलावा सलीम जावेद की तुलना भी पाकिस्तान में बैठे खूंखार आतंकवादी हाफिज सईद से कर डाली । किसी भी व्यक्तित्व की तुलना का एक अलिखित नियम होता है, एक मर्यादा होती है जिसका पालन करने की अपेक्षा सबों से की जाती है । तुलना करने में परंपराओं लोक मान्यताओं का भी ध्यान रखना आवश्यक माना गया है । हमारे आजादी के आंदोलन के दौरान कई आंदोलनकारियों ने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ बेहद उग्र रुख अपनाया हुआ था लेकिन क्या हम उनको आतंकवादी कह सकते हैं ।क्या भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों की तुलना दो हजार एक में भारतीय संसद पर हमला करनेवाले आतंकवादियों से की जा सकती है । कतई नहीं । उसी तरह अमिताभ बच्चन को चाहे निदा फाजली खिलौना माने लेकिन उन्हें उनकी तुलना कसाब से नहीं करनी चाहिए थी । अगर हम देखें तो पहले भी इस तरह की तुलनाएं हुई हैं जिसे साहित्य जगत ने नकार दिया था । इस लेख का अंत मैं मशहूर कथाकार और नाटककार असगर वजाहत के शब्दों में करना चाहूंगा- इस तरह की अभिव्यक्ति हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण है ।
अब ताजा विवाद पाखी के जनवरी अंक में मशहूर शायर निदा फाजली के पत्र से उठा है । अपने पत्र में निदा फाजली ने सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की तुलना मुंबई हमले के गुनहगार और पाकिस्तानी आतंकवादी आमिर अजमल कसाब से कर दी है। संपादक के नाम लिखे पत्र में निदा फाजली ने लिखा कि – दूसरी बात जो आपकी संपादकीय में खटकी वह ज्ञानरंजन जैसे साहित्यकार की तुलना सत्तर के दशक के एंग्री यंगमैन अमिताभ बच्चन से की गई है । एंग्री यंग मैन को सत्तर के दशक तक कैसे सीमित किया जा सकता है । क्या 74 वर्षीय अन्ना हजारे को भुलाया जा सकता है । मुझे तो लगता है कि सत्तर के दशक से अधिक गुस्सा तो आज की जरूरत है, और फिर अमिताभ को एंग्री यंगमैन की उपाधि से क्यों नवाजा गया ? वे तो केवल अजमल आमिर कसाब की तरह गढ़ा हुआ खिलौना हैं । एक को हाफिज मुहम्मद सईद ने बनाया था, दूसरे को सलीम जावेद की कलम ने गढ़ा था, खिलौने को फांसी दे दी गई, लेकिन उस खिलौने को बनाने वाले को पाकिस्तान खुलेआम उसकी मौत का नमाज पढ़ने के लिए आजाद छोड़े हुए है । आपने भी खिलौने की प्रशंसा की, लेकिन खिलौना बनाने वाले को सिरे से भुला दिया । ‘किसी का नाम, किसी का काम’ की कहावत शायद इसी लिए गढ़ी गई है ।“ निदा साहब के इस पत्र के बाद साहित्यिक जगत में हलचल मच गई । उनके पक्ष और विपक्ष में लेखकों के बयान आने लगे । बयानों की पड़ताल के पहले हमें निदा फाजली के पत्र का विश्लेषण करना चाहिए । निदा फाजली को इस बात पर आपत्ति है कि कथाकार ज्ञानरंजन को पाखी में एंग्री यंग मैन क्यों बताया गया । दरअसल पिछले साल सितंबर में पाखी ने ज्ञानरंजन पर भारी भरकम विशेषांक निकाला था जिसके संपादकीय में प्रेम भारद्वाज ने लिखा था –ज्ञानरंजन की एक खासियत उनका आक्रोश है । यह आक्रोश उनकी कहानियों के पात्रों में भी दिखाई देता है । इन पंक्तियों के लिखते लिखते सहसा सत्तर दशक के एंग्रीयंगमैन अमिताभ याद आ जाते हैं । कुछ समानताएं और बहुत असमानताएं हैं दोनों दिग्गजों में । फिल्म को हेय मानने वाले कुछ शुद्धतावादियों के लिए यह तुलना असहज लग सकती है । लेकिन किसी चीज को अलग बड़े कैनवास में देखने में बुराई क्या है । मुझे इस तुलना के लिए माफ किया जाए, अगर किया जा सकता है तो । अपने उसी संपादकीय में प्रेम भारद्वाज लिखते हैं कि सुधीश पचौरी ने तो केवल स्टारडम के चलते नामवर सिंह को हिंदी साहित्य का अमिताभ बच्चन तक कह डाला । प्रेम भारद्वाज के इस बात का अंदेशा था कि साहित्य से जुड़े लोग उनकी इस तुलना पर सवाल खड़े कर सकते हैं लिहाजा उन्होंने पहले ही माफी मांग ली थी । लेकिन पाखी संपादक को शायद ही इस बात का इल्म रहा होगा कि साहित्य के अलावा फिल्मों से जुड़ा एक शायर उनकी तुलना पर उंगली उठाते हुए एक भयंकर भूल कर देगा ।
पाखी के इसी संपादकीय पर निदा फाजली को आपत्ति थी और उन्होंने पत्र लिखकर उसे जाहिर किया । लेकिन निदा इतने नाराज हो गए कि उन्हें यह तक याद नहीं रहा कि आमिर अजमल कसाब को भारत पर हमला करने और एक राष्ट्र के खिलाफ युद्ध झेड़ने का दोषी करार देकर उसे फांसी पर लटकाया गया है । एक ऐसे आतंकवादी से अमिताभ बच्चन की तुलना को किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता है । क्या अमिताभ बच्चन के देशप्रेम और उनकी कला पर कोई शक है । लेकिन जिस तरह से बुजुर्ग शायर निदा ने उनकी तुलना की है उससे ये लगता है कि निदा अमिताभ को अपमानित करना चाहते हैं । निदा ने जो लिखा उससे एक और बात ध्वनित होती है कि अमिताभ कुछ नहीं होते अगर सलीम जावेद नहीं होते तो । निदा के इन तर्कों पर बहस हो सकती है कि अमिताभ की सफलता में सलीम जावेद की कहानियों का कितना योगदान है । लेकिन अगर निदा ये मानते हैं कि सिर्फ कहानियों की वजह से ही अमिताभ बच्चन सदी के महानायक बने तो ये उनकी भूल ही नहीं है बल्कि ऐसा कहकर वो फिल्मों से जुड़े निर्देशकों, अन्य साथी कलाकारों, संगीतकारों के योगदान को भुला रहे हैं । किसी भी फिल्म की सफलता में कई सारे लोगों का सामूहिक योगदान होता है । निदा साहब फिल्मों को बहुत करीब से जानते हैं । बावजूद इसके इस तरह की तुलना करना उनकी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं है । अमिताभ बच्चन ने सलीम जावेद की कहानियों के अलावा भी कई ऐसी फिल्में की जो ना केवल यादगार हैं बल्कि क्लासिक्स की श्रेणी में आती हैं । अपनी सफलता की दूसरी पारी में अमिताभ बच्चन ने ब्लैक और पॉ जैसी सार्वकालिक फिल्में की जो ना केवल बॉक्स ऑफिस पर सफल रही बल्कि उसे सराहना भी मिली । लेकिन इन फिल्मों में रानी मुखर्जी और विद्या बालन के किरदार के बगैर सफलता का आकलन नहीं किया जा सकता है । इसके अलावा पॉ फिल्म में अमिताभ बच्चन के बोलने के लिए जिस तकनीक का इस्तेमाल किया गया उसके बिना क्या उस किरदार को निभा पाना संभव होता । हां इतना अवश्य है कि फिल्म और अभिनेता दोनों की सफलता में कहानियों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है ।
कहानीकार ज्ञानरंजन की तुलना अमिताभ बच्चन से करने से निदा फाजली इतने खफा हो गए कि गुस्से में अमिताभ की तुलना कसाब से तो की ही लेकिन इसके अलावा सलीम जावेद की तुलना भी पाकिस्तान में बैठे खूंखार आतंकवादी हाफिज सईद से कर डाली । किसी भी व्यक्तित्व की तुलना का एक अलिखित नियम होता है, एक मर्यादा होती है जिसका पालन करने की अपेक्षा सबों से की जाती है । तुलना करने में परंपराओं लोक मान्यताओं का भी ध्यान रखना आवश्यक माना गया है । हमारे आजादी के आंदोलन के दौरान कई आंदोलनकारियों ने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ बेहद उग्र रुख अपनाया हुआ था लेकिन क्या हम उनको आतंकवादी कह सकते हैं ।क्या भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों की तुलना दो हजार एक में भारतीय संसद पर हमला करनेवाले आतंकवादियों से की जा सकती है । कतई नहीं । उसी तरह अमिताभ बच्चन को चाहे निदा फाजली खिलौना माने लेकिन उन्हें उनकी तुलना कसाब से नहीं करनी चाहिए थी । अगर हम देखें तो पहले भी इस तरह की तुलनाएं हुई हैं जिसे साहित्य जगत ने नकार दिया था । इस लेख का अंत मैं मशहूर कथाकार और नाटककार असगर वजाहत के शब्दों में करना चाहूंगा- इस तरह की अभिव्यक्ति हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण है ।
Subscribe to:
Posts (Atom)

