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Saturday, July 2, 2016

बयानों से बेनकाब चेहरे

फिल्म अभिनेता इरफान खान अपनी फिल्म मदारी के प्रमोशन में निकले थे और उस दौरान दिए उनके एक बयान से बवंडर खड़ा हो गया । दरअसल इरफान खान ने बकरीद के मौके पर बकरों की कुर्बानी पर सवाल खड़ा किया था । इरफान खान ने कहा कि दो बकरे खरीद कर उसका वध कर देना कोई कुर्बानी नहीं है । इससे कोई पुण्य नहीं मिलनेवाला है । कुर्बानी का अर्थ है कि हम अपनी कोई प्रिय वस्तु किसी को दे दें, जिसके साथ हमारा प्यार का संबंध हो । इरफान के इस बयान के बाद बवाल मच गया और कई मुस्लिम उलेमाओं और धर्मगुरुओं ने इरफान के बयान की लानत मलामत शुरू कर दी । एक मौलाना ने कहा कि इरफान को इस्लाम की जानकारी नहीं है और वो अपनी अज्ञानता में इस तरह के बयान दे रहे हैं । इरफान का जिस तरह से विरोध हो रहा है उसको देखते हुए लगता है कि आनेवाले दिनों में उनके खिलाफ फतवा भी जारी हो जाए । इरफान खान ने जो कहा है उसको लेकर गंभीर चर्चा के बगैर खारिज कर देना उचित नहीं होगा । इस्लाम में कुर्बानी की प्रथा बहुत पुरानी है और शरीयत के मुताबिक सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी का प्रावधान है । इरफान भी यही कह रहे हैं । लेकिन विवाद की शुरुआत तब हुई जब इरफान ने बकरीद के ठीक पहले ये बयान दे दिया कि बकरीद में दो बकरों को खरीद कर उसकी कुर्बानी के पुण्य नही मिलता है । दरअसल बकरीद पर बकरों की बलि की परंपरा बहुत पुरानी है और उस दिन कुर्बान किए गए बकरों का एक तिहाई जरूरतमंदों को, एक तिहाई दोस्तों को और तोहफे के तौर पर देने का रिवाज रहा है । बाकी बचा एक तिहाई हिस्सा कुर्बानी देनेवाला खुद रखता है । खैर हम इस परंपरा में औरर उसके पालन करनेवालों की श्रद्धा में नहीं उलझना चाहते हैं । सवाल यही है कि अगर इरफान खान ने कोई सवाल उठाया है तो बजाए उसकी लानत मलामत करने के उसपर विमर्श होना चाहिए । जिन भी उलेमाओं को उनके इस कथन से विरोध है वो अपनी बात तर्कों के साथ रखें । इरफान को मूर्ख और मूढ़ कहने और उनके खिलाफ आग उगलने से वही होगा जो इरफान अपेक्षा कर रहे थे । धर्मगुरुओं के विरोध पर इरफान खान ने अपने तेवर और सख्त कर लिए हैं । उन्होंने साफ तौर पर कहा कि वो धर्मगुरुओं से डरनेवाले नहीं हैं । इरफान ने ट्वीट किया- प्लीज भाइयो जो मेरे बयान से नाराज हैं वो या तो आत्मविश्लेषण करने को तैयार नहीं हैं या निष्कर्ष पर पहुंचने की जल्दबाजी में हैं । इरफान ने आगे लिखा कि – मेरे लिए धर्म निजी आत्मविश्लेषण की तरह है, यह मेरे लिए दया, विवेक और संयम का स्त्रोत है ना कि रूढ़िवादिता और कट्टरवाद का । धर्मगुरू मुझे डरा नहीं सकते हैं । थैंक गॉड में ऐसे देश में नहीं रहता हूं जिसे धर्म के ठेकेदार चलाते हैं । इरफान ने अपने इस ट्वीट में कई सारी ऐसी बातें कह दीं जो कि विचार करने को मजबूर करती है ।  
इरफान ने साफ तौर पर कहा है कि धर्म बेहद निजी मामला है लेकिन उसमें विरोधाभास दिखाते हुए वो धर्म को लेकर, उसकी परंपराओं को लेकर सार्वजनिक तौर पर अपनी बातें भी रख रहे हैं । संभव है कि वो अपने धर्म की कुछ बातों पर अपनी आपत्ति दर्ज करवाकर उसमें बदलाव की ख्वाहिश रखते होंगे । बकरों की कुर्बानी पर दिए उनके बयान को इस आलोक में देखा जाना चाहिए। लेकिन धर्मगुरुओं को नाराज होने और इरफान को उलजलूल कहने का हक क्यों होना चाहिए । जब इरफान पर हमले हो रहे हैं तो सवाल उठता है कि इस वक्त अभिव्यक्ति की आजादी के झंडाबरदार कहां हैं । समाज में बोलने की आजादी के अधिकार के निरंतर ह्रास को लेकर छाती कूटनेवाला समुदाय इस वक्त इरफान के पक्ष में क्यों नहीं मजबूती से खड़ा हो रहा है । इरफान को जिस तरह से घेरने की कोशिश की जा रही है उसको लेकर उसके पक्ष में कहीं से किसी तरह की हलचल दिखाई नहीं दे रही है । देश में असहिष्णुता को लेकर बयान देनेवाले शाहरुख खान भी बॉलीवुड के अपने साथी कलाकार इरफान के पक्ष में खड़े दिखाई नहीं देते । शाहरुख खान को इरफान को चुप करवा देने की कोशिशों में कोई असहिष्णुता अबतक नजर नहीं आई है । उन दिनों जब देश में असहिष्णुता के मुद्दे पर अवॉर्ड वापसी का कोलाहल था और उसके पक्ष विपक्ष में तर्क दिए जा रहे थे तब शाहरुख खान ने ट्वीट किया था कि – लोग बगैर सोचो समझे बयानबाजी करते हैं । धार्मिक असहिष्णुता...और इस देश में धर्मनिरपेक्ष नहीं होना एक देशभक्त के तौर पर सबसे बड़ा अपराध है । शाहरुख की बात सही है लेकिन अब जब इरफान ने जब इस्लाम की परंपरा पर सवाल खड़ा किया है और चंद मुस्लिम उलेमाओं द्वारा उनको खामोश करने की कोशिश हो रही है, तो पूरे देश को शाहरुख के उसी तरह के ट्वीट का इंतजार है । अगर धार्मिक असहिष्णुता उस वक्त गलत थी तो अब भी गलत होनी चाहिए । क्या धार्मिक असहिष्णुता का सवाल सिर्फ हिंदू कट्टरपंथियों के बयानों पर ही दिखाई देने लगता है । इसी तरह से बहुत संभव है कि आमिर खान को इरफान की आलोचनाओं के बाद भी डर नहीं लग रहा होगा और वो अपनी पत्नी से देश में डर लगने जैसी बातचीत नहीं कर रहे होंगे क्योंकि ये इस्लाम से जुड़ा मामला है । अगर ऐसा होता तो आमिख खान जरूर सामने आते और अपनी मन की बात को सामने रखते । तो क्या ये मान लिया जाए कि इस्लाम की परंपराओं की बात आते ही समाज के ये नायक खामोश हो जाते हैं । उनका ना तो देश में डर लगता है और ना ही देश की फिजां में कोई बुराई नजर आती है । मेरा मानना है कि ये मामला चूंकि एक धर्म विशेष से जुड़ा है लिहाजा हर कोई खामोशी की चादर ओढ़ कर सुविधा की नींद सो रहा है । अगर यही मामला हिंदी धर्म से जुड़ा होता तो अभिव्यक्ति की आजादी के चैंपियन अबतक उछलकूद मचा रहे होते । सवाल यही है कि क्या इरफान को भारतीय संविधान अभिव्यक्ति की आजादी नहीं देता है । क्या इरफान खान क खिलाफ मुस्लमि धर्मगुरुओं को लेकर दिए जानेवाले बयानों में किसी को भी असहिष्णुता नहीं दिखाई दे रही है । ये सब कई ऐसे प्रश्न हैं जो लगातार पूछे जाने चाहिए और सुविधा की खामोशी अख्तियार करनेवालों से तो अवश्य ही पूछे जाने चाहिए । दरअसल हमारे देश में अभिवयक्ति की आजादी आदि के मुद्दे पर हमारे चैंपियन अलग अलग धर्मों को लेकर अलग अलग रुख अपनाते रहे हैं । अब अगर इरफान ने इस्लाम की परंपराओं को लेकर कोई सवाल खड़ा किया है तो उसको धमका कर या विरोध का भय दिखाकर चुप करवा देना कहां तक जायज है । क्या इस्लाम में जारी परंपराओं पर बोलने का हक किसी को नहीं है और कोई बोले तो उसको ईशनिंदा की श्रेणी में डाल देना चाहिए । तब तो इरफान ने ठीक ही खुदा का शुक्रिया अदा किया है कि वो भारत जैसे देश में रह रहे हैं जहां धर्म के ठेकेदार देश नहीं चला रहे हैं । इरफान के बयान से एक बार फिर से सेलेक्टिव सेक्युलरिज्म का आंदोलन चलानेवालों के चहरे बेनकाब हो रहे हैं ।
कुछ लोगों का तर्क है कि इरफान अपनी फिल्म मदारी को हिट कराने के लिए जानबूझकर विवाद खड़ा करना चाहते हैं ताकि उनकी फिल्म को फायदा हो सके । हो सकता है ऐसी दलील देनेवालों के तर्क में दम हो । लेकिन अगर इरफान अपनी फिल्म को हिट कराने के लिए भी खुद को विवादित बना कर चर्चित होना चाहते हैं तब भी उनके अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार को कोई कैसे रोक सकता है । संभव है कि इरफान को लगा होगा कि इस्लाम की परंपराओं के खिलाफ बयान देकर वो फिल्म को सफल करवा ले जाएंगे । अगर ऐसा है तो बजाए इरफान का विरोध करने के उनके इस डिजायन को उभारा जाना चाहिए । उलेमाओं को धर्म की दुहाई देकर उसकी परंपराओं और शरीया की आड़ में इरफान का विरोध करने की बजाय साफ कर देना चाहिए कि वो अपनी फिल्म को सफल बनाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपना रहे हैं । बजाए इसके वो भी उल्टे भड़काऊ बयान देकर इरफान की रणनीति को सफल बना रहे हैं । इस विवादित बयान को लेकर भले ही कुछ दिनों में बयानों की जंग ठंडी पड़ जाए लेकिन इसका असर लंबे समय तक देखा जा सकेगा और मुझे लगता है कि ये कई तरह के गंभीर विमर्श को जन्म देने का पुख्ता आधार भी प्रदान करेगा ।


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