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Sunday, January 31, 2016

सेक्लयुर चैंपियनों की असलियत !

हाल के दिनों में पूरे देश में दो मुद्दे की खासी चर्चा हुई । सबसे पहले तो लेखकों, फिल्मकारों और कलाकारों ने देशभर में असहिष्णुता का मुद्दा उठाकर खूब शोर-शराबा किया । असहिष्णुता पर मचे कोलाहल के उस दौर में कन्नड़ लेखक कालबुर्गी, कॉमरेड पानसरे आदि की हत्या के साथ साथ अखलाक की हत्या का भी मुद्दा उठाकर माहौल बनाने की कोशिश की गई थी । बिहार चुनाव में बीजेपी की हार के बाद असहिष्णुता का मुद्दा थोड़ा शांत पड़ गया था लेकिन गाहे बगाहे कोई ना कोई इसको उठाकर मुद्दा बनाने की फिराक में रहने लगा था । इस बीच हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुल्ला की आत्महत्या में असहिष्णुता के मसीहाओं को फिर से एक बार सियासत की संभावना दिखी और वो जोर शोर से इसको दलित उत्पीड़न से जोड़कर शोर मचाने लगे । यह ठीक है कि लोकतंत्र में वैसी परिस्थितियां नहीं बननी चाहिए कि किसी को भी आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजहबूर होना पड़े । रोहित की मौत लोकतंत्र के चेहरे पर एक बदनुमा दाग है । लेकिन उससे भी ज्यादा व्यथित करनेवाली प्रवृत्ति है उसको भुनाने की कोशिश करना । उसपर सियासत करना । दलित और मुसलमानों को लेकर साहित्य और संस्कृति से जुड़े लोग खासे उत्तेजित हो जाते हैं । आक्रामक भी । लेकिन ये उनकी सियासत का हिस्सा है । वो दलितों और मुसलमानों को आगे करके अपनी चालें चलते हैं । इसका एक फायदा यह होता है कि आप समाज सुधारक और धर्मनिरपेक्ष होने का तमगा एक साथ हासिल कर लेते हैं । लेकिन जब दलितों और मुसलमानों के योगदान को रेखांकित या सम्मानित करने का वक्त आता है तो चैंपियन उनके खिलाफ ही काम करते नजर आते हैं । लेकिन ये खिलाफत इतनी खामोशी से होता है किसी को पता भी नहीं चलता है । इसके कई प्रमाण और दृष्टांत हिंदी साहित्य जगत में यहां वहां बिखरे हुए हैं लेकिन उनको सामने नहीं लाया जाता है ।
पिछले साल का साहित्य अकादमी पुरस्कार हिंदी के वयोवृदध लेखक रामदरश मिश्र को उनके कविता संग्रह पर दिया गया । असहिष्णुता के मुद्दे पर साहित्य अकादमी पुरस्कार वापसी के कोलाहल के बीच रामदरश मिश्र से बेहतर चयन शायद ही कोई होता । साहित्यक हलके में यह बात लगभग सबको मालूम भी थी कि इस बार रामदरश जी को पुरस्कृत किया जाना है । बानवे साल के रामदरश मिश्र जी को पुरस्कार देने पर कोई विवाद तो नहीं हुआ लेकिन यह सवाल जरूर उठा कि साहित्य अकादमी पुरस्कार हाल के दिनों में लेखकों की उम्र को देखकर दिया जाने लगा है । यह बात भी कही गई कि साहित्य अकादमी पुरस्कार अब कृति पर देने की बजाए लाइफटाइम अचीवमेंट के तौर पर दिया जाना चाहिए । रामदरश मिश्र जी को उनके कविता संग्रह आग पर हंसी के लिए पुरस्कृत किया गया, जो कि उनके ही रचे साहित्य में तुलनात्मक रूप से कमजोर कृति है । इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए की रामदरश जी को अगर इस उम्र में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो फिर किस उम्र में उनके कद के लेखकों को अकादमी की महत्तर सदस्यता से सम्मानित किया जाएगा । दरअसल साहित्य अकादमी पुरस्कारों को लेकर अकादमी के संविधान में आमूल चूल सुधार की आवश्यकता है । सुधार की आवश्यकता तो अकादमी के संविधान में साधारण सभा की सदस्यता को लेकर भी है लेकिन फिलहाल हम अकादमी पुरस्कार की बात कर रहे हैं । साहित्य अकादमी पुरस्कारों में सत्तर के दशक से गड़बड़ियां शुरू हो गई । अगर ठीक से साहित्य अकादमी के इतिहास का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि मार्क्सवादियों के साथ ही अकादमी में गड़बड़झाले का प्रवेश हुआ । 12 मार्च 1954 को तत्कालीन उपराष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि साहित्य अकादमी का उद्देश्य शब्दों की दुनिया में मुकाम हासिल करनेवाले लेखकों की पहचान करना, उन लेखकों को प्रोत्साहित करना और आम जनता की रुचियों का परिष्कार करना है । इसके अलावा अकादमी को साहित्य और आलोचना के स्तर को बेहतर करने के लिए भी प्रयास किया जाना चाहिए । 1954 में साहित्य अकादमी पुरस्कार देने के प्रस्ताव पर चर्च हुई थी और 1955 में पहला साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था । हिंदी के लिए पहला साहित्य अकादमी माखनलाल चतुर्वेदी को उनकी कृति हिम तरंगिणी पर दिया गया था । आश्चर्य की बात है कि पहले पुरस्कार से लेकर अबतक किसी भी मुसलमान लेखक को हिंदी में लेखन के लिए पुरस्कृत करने योग्य नहीं माना गया । यह साहित्य अकादमी की कार्यप्रणाली और संकीर्णतावादी दृष्टिकोण को उजागर करनेवाली बात है या फिर उसके कर्ताधर्ताओं की सोच का प्रदर्शन ।
यह सही है कि साहित्य, जाति, धर्म वर्ण, संप्रदाय आदि से उपर होता है और रचनाओं को किसी खांचे में बांधना उचित नहीं होगा । लेकिन अगर साठ साल के लंबे अंतराल में एक खास समुदाय के लेखकों की पहचान और सम्मान ना हो तो प्रश्न अंकुरित होने लगते हैं । हिंदी में लिखनेवाले मुस्लिम लेखकों की एक लंबी फेहरिश्त है । काला जल जैसा कालजयी उपन्यास लिखनेवाले गुलशेर खां शानी, आधा गांव जैसे बेहतरीन उपन्यास के लेखक राही मासूम रजा, सूखा बरगद जैसे उपन्यास के रचयिता मंजूर एहतेशाम को भी साहित्य अकादमी ने सम्मानित करने के योग्य नहीं माना । झीनी झीनी बीनी चदरिया के लेखक अब्दुल बिस्मुल्लाह के अलावा नासिरा शर्मा और असगर वजाहत अपने लेखन से लगातार हिंदी साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं लेकिन अकादमी इनको लेकर भी उदासीन ही नजर आती है । क्या वजह है कि हिंदी में लिखनेवाले मुस्लिम लेखकों की तरफ साहित्य अकादमी का ध्यान नहीं गया । अगर यह संयोग मात्र है तो बहुत दुखद है । अकादमी के क्रियाकलापों को देखकर, खासकर सत्तर के बाद, लगता है कि यह संयोग नहीं है । सत्तर के दशक के बाद साहित्य अकादमी पर धर्मनिरपेक्षता के चैंपियनों का कब्जा रहा । सहिष्णुता के उस कथित बेहतर माहौल में किसी भी मुस्लिम लेखक को पुरस्कार नहीं मिलना बेहद अफसोसनाक है । अगर हम गहराई से विचार करें तो अल्पसंख्यकों के नाम पर अपनी दुकान चलानेवालों ने उनके नाम की तख्ती तो लगाई लेकिन कभी भी उस तख्ती को सम्मान नहीं दिया । दरअसल साहित्य अकादमी पर इमरजेंसी के बाद जो भी शख्स हिंदी भाषा के कर्ताधर्ता रहे उनमें से ज्यादातार ने खास विचारधारा के ध्वजवाहकों को सम्मानित किया । मेधा और प्रतिभा पर अपने लोगों को तरजीह दी गई । ये पीरियड काफी लंबे समय तक चला और मुस्लिम लेखकों के साथ अन्याय होता चला गया । अपनों को रेवड़ी बांटने के चक्कर में इनका सांप्रदायिक चेहरा दबा रहा लेकिन अब वक्त आ गया है कि उनके चेहरे से नकाब उठाया जाए और उन सभी से ये सवाल पूछा जाए कि शानी, रजा, मंजूर एहतेशाम, असगर वजाहत को क्यों नजरअंदाज किया । साहित्य अकादमी के कथित सेक्युलर लेखकों ने साहित्य अकादमी ने उर्दू में लिखने वाले गोपीचंद नारंग, गुलजार जैसे हिंदू लेखकों को सम्नानित किया लेकिन हिंदी कर्ताधर्ता वो दरियादिली नहीं दिखा सके । उपर जिन लेखकों का नाम लिखा गया है उनमें से किसी की भी कृति अबतक साहित्य अकादमी प्राप्त किसी भी कृति से किसी भी मानदंड पर कमजोर नहीं है । फिर आखिर क्यों कर ऐसा हुआ । सुरसा के मुंह की तरह ये सवाल साहित्य अकादमी के सामने खड़ा है ।

बात सिर्फ मुस्लिम लेखकों की ही नहीं है । साहित्य अकादमी ने संभवत: अबतक किसी दलित लेखक को भी सम्मानित नहीं किया । इसके पीछे क्या वजह हो सकती है । जब भी जो भी हिंदी भाषा के संयोजक रहे उन्होंने अपने हिसाब से पुरस्कारों का बंटवारा किया । वर्तमान अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी जब हिंदी भाषा के संयोजक के चुनाव में खड़े हुए थे तब हिंदी के ही एक अन्य लेखक ने दावेदारी ठोकी थी लेकिन तब उनको यह समझा दिया गया कि संयोजक होने से पुरस्कार नहीं मिल पाएगा, लिहाजा वो नाम वापस ले लें । हुआ भी वही । जब सौदेबाजी, क्षेत्रवाद, जातिवाद के आधार पर पुरस्कार दिए जाते रहे तो फिर दलितों और मुसलमानों के मुद्दों के चैंपियन क्यों खामोश रहे । साहित्य के इन मठाधीशों के खिलाफ किसी कोने अंतरे से आवाज नहीं उठी थी, जो भी आवाज उठाने की हिम्मत करता उसको हाशिए पर धकेल दिया जाता था । इस परिस्थिति को देखते हुए अलेक्सांद्र सोल्झेनित्सिन के कथन का स्मरण होता है यह एक नियम है कि शिक्षित लोग मशीनगन के सामने भी उतना कायरतापूर्ण व्यवहार नहीं करते जितना बड़बोले वामपंथी लफ्फाजों के सामने । यह अकारण नहीं है कि अलेक्सांद्र सोल्झेनित्सिन इस तरह की बात करते थे । दरअसल इन बड़बोले वामपंथी लफ्फाजों ने वर्षों तक सही बात कहनेवालों का मुंह बंद करके रखा । सोवियत संघ के पतन के बाद से जिस तरह से इनके प्रकाशन और संस्थान आदि बंद हुए तो उनकी लफ्फाजी थोड़ी कमजोर हुई । वक्त आ गया है कि साहित्य अकादमी में इन्होंने जो गलतियां की उसको सुधारा जाए । अकादमी के संविधान में संशोधन करके तमाम योग्य मुस्लिम और दलित लेखकों को मरणोपरांत पुरस्कृत किया जाए ।

हिंदी के ‘छद्म’ पुरस्कार

हिंदी के लेखकों को पद्म पुरस्कार तो कम मिलता है लेकिन यहां थोक के भाव से छद्म पुरस्कार बांटे जाते हैं । हिंदी में पुरस्कारों का लंबा इतिहास है और उतना ही लंबा अतीत उन पुरस्कारों में गड़बड़ियों का भी है । हिंदी में सरकारी पुरस्कारों में पसंदीदा लेखकों से लेकर अपने कैंप के लेखकों को पुरस्कार तो दिया ही जाता है लेकिन हिंदी में प्राइवेट संस्थाओं द्वारा दिए जानेवाले पुरस्कारों पर भी यदाकदा अंगुली उठती रही है । हिंदी साहित्य में पुरस्कारों का खेल इतना बढ़ा कि अब तो कई लोग व्यक्तिगत स्तर पर भी पुरस्कार बांटने लगे हैं । इन व्यक्तिगत पुरस्कारों में चयन समिति आदि की औपचारिकता का निर्वाह तो किया जाता है लेकिन ना तो उसमें पारदर्शिता होती है और ना ही चयन समिति के सदस्यों की अनुशंसाएं सामने आ पाती हैं । व्यक्तिगत स्तर पर दिए जानेवाले पुरस्कारों को लेकर बहुधा ये आजादी रहती है कि जिस वर्ष मन हुआ दिया जब मन नहीं हुआ तो नहीं दिया यानि कि साहित्य की आड़ में प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह इसका संचालन किया जाता है । पिछले वर्ष कथा यूके का अंतराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान नहीं दिया गया । कथा की बजाए गजल को सम्मानित किया । इस बात की कोई सूचना हिंदी जगत को नहीं है कि कथा पर दिया जाने वाले ये मशहूर सम्मान बंद हो गया या जारी रहेगा । हिंदी साहित्य जगत में इस पुरस्कार को लेकर खासी उत्सुकता रहती थी । इसी तरह से दो तीन साल तक सीता पुरस्कार दिया गया और फिर वो बंद होगा । सीता पुरस्कार के बंद होने के पीछे हिंदी साहित्य की राजनीति थी । उसको देनेवाले लोग चाहते थे कि पुरस्कार की साख बेहतर रहे लेकिन उसके निर्णयकों ने साख बढ़ाने की कोई कोशिश नहीं की थी ।

दरअसल ज्यादातर व्यक्तिगत पुरस्कार देनेवालों की मंशा खुद को साहित्य की चर्चा के केंद्र में रखने की भी होने लगी है । हिंदी के बहुत सारे पुरस्कार पिपासु लेखकों को किसी ना किसी तरह से कोई भी पुरस्कार हासिल करने की लालसा इस तरह के पुरस्कारों के लिए प्राणवायु का काम करती है । इन व्यक्तिगत पुरस्कारों में पांच हजार से लेकर ग्यारह हजार तक की राशि दी जाती है । कई बार तो सिर्फ शॉल और श्रीफल से काम चलाना पड़ता है । मध्यप्रदेश से दिया जानेवाले एक पुरस्कार तो बजाप्ता इसके लिए निविदा आमंत्रित करता है और लेखकों को एक निश्चित राशि के बैंक ड्राफ्ट के साथ आवेदन करने को कहता है । हद तो तब हो जाती है कि इन पुरस्कारों को हासिल करने के बाद लेखक उसको अपने परिचय में प्रतिष्ठापूर्वक शामिल करता है । इन दिनों हिंदी में युवा लेखकों को दिए जानेवाले पुरस्कारों की संख्या काफी है । इन युवा पुरस्कारों की अगर पड़ताल की जाए तो यह बात सामने आती है कि एक तो युवा की कोई तय उम्र सीमा नहीं होती है । पचास वर्ष की आयु को छू रहे लेखकों और लेखिकाओं को भी इससे पुरस्कृत कर उपकृत किया जाता है । इस बात पर हिंदी जगत में गंभीरता से विमर्श होना चाहिए कि किस पुरस्कार के पीछे मंशा क्या है । बातचीत में एक बार हिंदी के वरिष्ठ कहानीकार हृषिकेश सुलभ ने कहा था कि कई बार पुरस्कार देनेवालों की मंशा पुरस्कृत लेखक के बहाने से खुद को या फिर पुरस्कार को क्रेडिबिलिटी हासिल करना होता है । ह्रषीकेश सुलभ की ये बात सोलह आने सच लगती है । यहां वैसे पुरस्कार का नाम गिनाकर बेवजह विवाद खड़ा करना मकसद नहीं है लेकिन साहित्य से जुड़े लोग इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि कौन सा पुरस्कार प्रदाता किस मंशा से पुरस्कार दे रहा है । क्या हम हिंदी के लोग इन छद्म पुरस्कारों को लेकर कभी विरोध कर पाएंगे । 

Wednesday, January 27, 2016

संविधान पर अंधविश्वास भारी

एक तरफ देश अपने संविधान के सम्मान में अपना सड़सठवां गणतंत्र दिवस मना रहा था तो दूसरी तरफ उसी संविधान को लागू करने की मांग को लेकर महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर में सैकड़ों महिलाएं सड़क पर धरना दे रही थी । भारत बहुलताओं का देश है, विविधताओं का देश है लेकिन संविघान को लागू करने को लेकर ये विरोधाभास अभूतपूर्व है । जिन सरकारों और पुलिसवालों पर संविधान को लागू करवाने की जिम्मेदारी है वो उन महिलाओं को रोकने में लगे थे जो चार सौ साल पुराने अंधविश्वास को तोड़कर हमारे गणतंत्र के मुकुट में एक और नगीना जड़ना चाहती थी । दरअसल संविधान और गणतंत्र को शर्मसार करनेवाला वाकया है महाराष्ट्र का जहां महिलाओं को शनि देव की पूजा करने से और उनके चबूतरे पर जाने से रोका गया । अपने अधिकारों को लेकर संघर्ष कर रही महिलाओं को रोकने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने पूरी ताकत लगा थी । शनि शिंगणापुर के शनि मंदिर के चबूतरे पर महिलाओं के पूजा करने पर प्रतिबंध है । माना जाता है कि ये प्रतिबंध चार पांच सौ साल से चला आ रहा है । पिछले साल नवंबर में एक महिला सुरक्षा घेरे को तोड़ते हुए शनि के चबूतरे तक जा पहुंची थी और उसने शनि की शिला पर तेल चढा़ दिया था । उसके बाद वहां के कर्ता-धर्ताओं ने शिला का शुद्धिकरण किया था । शुद्धिकरण इस वजह से किया गया था कि एक महिला ने शनि शिला का स्पर्श कर दिया । अब यह बात समझ से परे है कि किस वेद या पुराण या किस धर्मग्रंथ में ये लिखा है कि स्त्रियों के छूने से भगवान अपवित्र हो जाते हैं लेकिन धर्म के ठेकेदारों ने इसको भगवान और भक्ति से जोड़कर आजाद भारत की महिलाओं का अपमान कर डाला । महिला के स्पर्श के बाद शनि शिला के शुद्धिकरण करनेवालों पर किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं हुई लेकिन अब जब भूमाता ब्रिगेड की महिलाओं ने गणतंत्र दिवस के मौके पर इस भेदभाव को दूर करने की ठानी को सरकार ने उसको विफल कर दिया । दरअसल घर्म के ठेकेदारों ने धर्म के नाम पर महिलाओं को पुरुषों से कमतर आंकने की चाल चली थी जो लंबे वक्त तक सफल रही थी । अब जब उस डिजाइन को चुनौती दी जा रही है तो पुरुष प्रधान पुजारी समाज तिलमिलाने लगा है । तर्क ये दिया जा रहा है कि महिलाएं जब रजस्वला होती हैं तो वो भगवान के दरबार में नहीं जा सकती हैं । ये कौन सा तर्क है या कौन से धर्मग्रंथ में ये लिखा है । धर्म के इन ठेकेदारों को ये पता होना चाहिए कि हमारे समाज कि महिलाएं इतनी जागरूक और सजह हैं कि ज्यादातर इस दौर से गुजरनेवाली महिलाएं स्वयं ही मंदिर नहीं जाती हैं, पूजा पाठ नहीं करती हैं । यह मान्यता है कि रजस्वला स्त्री ऐसा नहीं कर सकती हैं शास्त्रों में कहीं इसपर किसी तरह की कोई रोक का उल्लेख नहीं मिलता है । दूसरा तर्क ये दिया जाता है कि शिला रूप में भगवान को स्त्री नहीं छू सकती है चाहे वो शनि हों या शालिग्राम । इसी तरह से महिलाओं के गर्भगृह में जाने पर पाबंदी है । ये कितना हास्यास्पद तर्क है कि जो महिलाएं गर्भ घारण करती हैं, जो सृष्टि को रचती हैं वो गर्भगृह में नहीं जा सकती है ।

दरअसल ये रोक सिर्फ शनि शिंगणापुर या हिंदू धर्म में नहीं है । हर धर्म के ठेकेदारों ने धर्म की आड़ में महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित किया है । मुंबई के हाजी अली दरगाह में महिलाओं का महिलाओं के प्रवेश को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ी जा रही है । केरल में सबरीमाला के अयप्पा मंदिर और श्रीपद्नाभस्वामी मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है । सबरीमाला के मामले में तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना है । इसी तरह से अजमेर के कार्तिकेय मंदिर में भी महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी है । अब ये सोचना होगा कि जिस सनातन धर्म में महिलाओं बेहद इज्जत की जाती थी और उनका ध्यान रखने के लिए पुरुषों को प्रेरित भी किया जाता था । ऋगवेद और अथर्वेद में स्त्रियों को सम्मान देने के बारे में विस्तार से लिखा गया है । अथर्वेद में साफ तौर पर कहा गया है कि जब कोई लड़की विवाह करके ससुराल में आती है तो वो नए परिवार से उसी तरह मिलती है जैसे समुद्र में नदी का मिलन होता है । विवाह के बाद स्त्री उस परिवार में रानी की तरह आती है जो अपने पति के साथ मिलकर सभी फैसले लेनेवाली होती है । ऋगवेद में तो कई ऋचाओं को महिला ऋषियों से ही कहलवाया गया है जिसका प्रतीकात्मक अर्थ है । उन अर्थों को प्रचरित करने के बजाए धर्म के ठेतेदारों ने दबा दिया।  महिला वैदिक ऋषियों की एक लंबी परंपरा रही है जिनमें रोमाशा, लोपामुद्रा, विवासरा से लेकर मैत्रेयी और गार्गी का उल्लेख मिलता है । उस धर्म में कालांतर में क्या हुआ कि स्त्रियों को दोयम दर्जा दे दिया गया । बाद के दिनों में भी हमारे नेताओं ने भी स्त्रियों के बारे में जो वयक्त किए वो निहायत आप्पतिजनक रहे हैं चाहे वो पूर्व कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल रहे हों या मुलायम सिंह यादव या शरद यादव रहे हों । अब वक्त आ गया है कि धर्म में महिलाओं को लेकर जिस तरह से कुरीतियों ने जड़ जमा लिया है उसको उखाड़ फेंका जाए और महिलाओं को उनका हक मिले । 

Tuesday, January 26, 2016

साहित्य पर भारी सितारों की चमक

जयपुर में पांच दिनों तक चलनेवाला सालाना साहित्यक जलसा जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल खत्म हो गया । साल दर साल इस सालाना जलसे में लेखक और साहित्यक विमर्श नेपथ्य में जा रहे हैं और सेलिब्रिटी की चमक ज्यादा महसूस की जा रही है । जब जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल शुरू हुआ था तब ये माना गया था कि इसका उद्देश्य साहित्य और समाज के सवालों से टकराने का है । वरिष्ठ लेखक आपस में साहित्य की समकालीन समस्याओं से लेकर नई लेखकीय प्रवृत्तियों पर चर्चा करेंगे जिससे उस भाषा के पाठक संस्कारित होंगे । परंतु हाल के दिनों में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सितारों और गंभीर लेखकों के बीच का फर्क मिट सा गया है । जिस तरह से प्रकाशक फिल्मी सितारों, राजनेताओं, सेलिब्रिटी पत्रकारों की किताबें छापने में लगे हैं उसी तरह अब लिटरेचर फेस्टिवल के कर्ताधर्ता भी फिल्मी सितारों से लेकर पूर्व और वर्तमान राजनेताओं की भागीदारी सुनिश्चित करते हैं । लिटरेचर फेस्टिवल में गुलजार साहब स्थायी भाव की तरह मौजूद रहते हैं भले ही उन साहित्यक मेलों में केदारनाथ सिंह, लीलाधर जगूड़ी या विनोद कुमार शुक्ल हों या ना हों । गुलजार को बुलाने के पीछे की मंशा उनकी बेहतरीन कविताएं सुनने की अवश्य रहती होंगी लेकिन भीड़ जुटाना और पाठकों को आकर्षित करना भी एक मकसद रहता है । ऐसा नहीं है कि सिर्फ जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में ही ऐसा होता है पूरी दुनिया में लिटरेचर फेस्टिवल में सितारों की चमक साहित्यक विमर्श पर भारी पड़ते हैं । बेस्टसेलर उपन्यास चॉकलेट की लेखक जॉन हैरिस ने भी एक बार कहा था कि कई लिटरेचर फेस्टिवल इन सितारों के चक्कर में लेखकों पर होनेवाले खर्चे में भारी कटौती करते हैं । आयोजकों को लगता है कि सितारों के आने से ही उनको हेडलाइन मिलेगी । उनका मानना था कि इससे आयोजकों को फायदा होता है पर साहित्य नेपथ्य में चला जाता है । बाजार के विषेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के साहित्यक आयोजनों तभी सफल हो सकते हैं जब इसमें शिरकत करनेवाले सितारे हों क्योंकि विज्ञापनदाता उनके ही नाम पर स्पांसरशिप देते हैं । विज्ञापनदाताओं की रणनीति होती है कि जितना बड़ा सितारा होगा उतनी बड़ी भीड़ जुटेगी और उनके उत्पाद का प्रचार बड़े उपभोक्ता वर्ग तक पहुंचेगा । परंतु सवाल यही है कि क्या इस तरह के आयोजनों में साहित्य या साहित्यकारों पर पैसे को तरजीह दी जानी चाहिए । अगर उद्देश्य साहित्य पर गंभीर विमर्श है, अगर उद्देश्य पाठकों को साहित्य के प्रति संस्कारित करने का है तब तो हरगिज नहीं । हां अगर उद्देश्य साहित्य के मार्फत कारोबार करना है तो फिर इस तरह से लटके झटके तो करने ही होंगे । अब तो जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में मीना बाजार की तर्ज पर राजस्थानी पोशाक से लेकर हस्तशिल्प तक की बिक्री भी होती है । गहने जेवर की दुकान से लेकर चप्पल जूतों तक की दुकान देखी जा सकती है ।
इस बार भी दुनियाभर के तमाम बड़े लेखक और लेखिकाओं ने जयपुर के लिटरेचर फेस्टिवल में शिरकत की लेकिन इन सब पर करन जौहर, काजोल, गुलजार, जावेद अख्तर आदि की उपस्थिति भारी पड़ी । पहले ही दिन करन जौहर ने लोकतंत्र को मजाक बताकर विवाद खड़े करने की कोशिश की। करन ने व्यंग्यात्मक लहजे में ये कहकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की कि हमारे देश में फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन सबसे बड़ा जोक है । करन जौहर इतने पर ही नहीं रुके और उन्होंने यहां तक कह दिया कि लोकतंत्र तो उससे भी बड़ा मजाक है । करन के मुताबिक अगर आप अपने मन की बात कहना चाहते हैं तो ये देश सबसे मुश्किल है । करन के बयान से हल्का फुल्का ही सही पर विवाद हुआ । कहने का मतलब ये कि जयपुर लिटरेटर फेस्टिवल में विमर्श और विवाद साथ-साथ चलते हैं । इस साहित्यक आयोजन की निदेशक नमिता गोखले बार-बार ये दोहराती हैं कि विवादों में उनकी रुचि नहीं है लेकिन जिस तरह से कुछ सत्र में विषयों और वक्ताओं का चुनाव होता है उससे लगता है कि अन्य आयोजकों की मंशा नमिता के मत से अलग है । पूर्व के वर्षों में विवादों ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को खासा चर्चित किया । चाहे वो सलमान रश्दी के कार्यक्रम में आने को लेकर उठा विवाद हो या फिर आशुतोष और आशीष नंदी के बीच का विवाद हो, सबने मिलकर इस फेस्टिवल को साहित्य की चौहद्दी से बाहर निकालकर आम जनता तक पहुंचा दिया ।



Sunday, January 24, 2016

लोकतंत्र को तुम क्या जानो करन जौहर !

जयपुर के डिग्गी पैलेस में एक बार फिर से साहित्य का सबसे बड़ा मीना बाजार सज चुका है । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में इस साल भी विवाद का धुंआ उठाने की भरसक कोशिश की गई लेकिन इस बार विवादों में वो तीव्रता देखने को नहीं मिल रही है । बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद जो असहिष्णुता नेपथ्य में चली गई थी उसको एक बार फिर से हवा देने की कोशिश की गई । देस के लोकतंत्र पर सवाल खड़े किए गए । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के पहले ही दिन एक सत्र में फिल्मकार करन जौहर ने लेखिका शोभा डे के साथ बातचीत में देश के माहौल के बारे में टिप्पणी कर दी । अपनी जीवनी अनसुटेबल ब्यॉय पर बात करते हुए करन जौहर देश में असहिष्णुता का माहौल बताने वाले की फेहरिश्त में अपना नाम भी लिखवा दिया । करन ने व्यंग्यात्मक लहजे में ये कहकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की कि हमारे देश में फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन सबसे बड़ा जोक है । करन जौहर इतने पर ही नहीं रुके और उन्होंने यहां तक कह दिया कि लोकतंत्र तो उससे भी बड़ा मजाक है । करन के मुताबिक अगर आप अपने मन की बात कहना चाहते हैं तो ये देश सबसे मुश्किल है । करन ने उत्साह में यहां तक कह दिया कि उन्हें हमेशा ये लगता रहता है कि कोई नया एफआईआर उनके खिलाफ होनेवाला है । दरअसल करन जौहर जब ये कहते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जोक है और लोकतंत्र मजाक तो वो खुद को एक्सपोज करते हैं । करन एक बेहतर फिल्मकार हैं लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि वो देश की राजनीति और लोकतंत्र को भी उतने ही बेहतर ढंग से समझ सकें । बहुधा ये माना जाता है कि कलाकार भावुक होता है, संभव है कि करन जौहर उसी भावुकता में बचकानी बातें कर रहे हों । करन जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मजाक बता रहे हैं वही उनको कुछ भी बोलने की आजादी दे रहा है । इससे बेहतर उदाहरण क्यो हो सकता है कि आप एक मंच पर सार्वजनिक तौर पर अपने देश के लोकतंत्र के बारे में उलजलूल बातें कर पाएं और फिर भी आप बगैर किसी विरोध आदि के वहां से निकल जाएं । करन जौहर साहब आपको देश का लोकतंत्र मजाक लगता होगा लेकिन उन लोगों से पूछिए जो इस लोकतंत्र को जी रहे हैं या इस लोकतंत्र ने जिनको गुलामी के दलदल से बाहर निकालकर जीने का मौका दिया। उन लोगों से समझिए जिनको इसी लोकतंत्र ने बेहतर जीवन जीने का माहौल दिया है और जीने की ताकत दी है । मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा होनेवालों को हो सकता है कि देश का लोकतंत्र मजाक लगता हो लेकिन उन करोडो़ं वंचितों-शोषितों से पूछिए कि उनके लिए लोकतंत्र के क्या मायने हैं । रही बात अभिव्यक्ति की आजादी की तो हमारी समझ में एक बात नहीं आती है कि जब इन फिल्मी कलाकारों की कोई किताब या फिल्म आती है तभी असहिष्णुता और बोलने की आजादी जैसी बातें याद आती हैं । करन की जीवनी छपी तो उसको लोकतंत्र मजाक लगने लगा और अभिव्यक्ति की आजादी जोक । इसी तरह जब शाहरुख खान की फिल्म दिलवाले आने वाली थी तब उनको देश का माहौल ठीक नहीं लगने लगा था । आमिर खान की फिल्म दंगल के पहले तो उनकी पत्नी को इतना डर लगने लगा कि वो देश छोड़ने की बात करने लगीं । इन फिल्मी सितारों को लगता है कि विवाद उठाकर वो चर्चित हो जाएंगे और उसका सकारात्मक असर उनके प्रोड्क्ट पर पड़ेगा । शाहरुख को ये देश चाहे कितना भी असहिष्णु लगे लेकिन फिर भी उनकी फिल्म यहां करीब डेढ सौ करोड़ का बिजनेस करती है । आमिर की पत्नी भले ही भारत छोड़कर जाने के बारे में बात करती हो लेकिन उसी आमिर खान को देश की जनता बेइंतहां मोहब्बत करती है और उनकी फिल्म तीन सौ करोड़ रुपए से ज्यादा का बिजनेस करती है । जब करन जौहर की जीवनी आई है तो उनको भी लगा कि विवाद बगैर किताब हिट नहीं हो सकती है,लिहाजा उन्होंने राग असहिष्णुता छेड़ दिया । ये तो भविष्य के गर्भ में है कि इस विवाद से उनको किताब की बिक्री में कितना फायदा होता है । ये तो चलिए विवाद पैदा कर लाभ की अपेक्षा रखनेवाले लोग हैं लेकिन उनके साथ सियार की तरह सुर में सुर मिलाकार हुआ हुआ करनेवालों का क्या । उनको ना तो कोई फायदा होता है और ना ही उन्हें कुछ हासिल होता है, बस मिलता है थोड़ा प्रचार । लेकिन इतने वर्षों से देश को आहत भावनाओं को गणतंत्र बतानेवाले इन विद्वानों को यह नहीं समझ आ रहा है कि हमारे समाज का ताना बाना इतना मजबूत है कि एक दो छिटपुट घटनाओं से कुछ भी हासिल होनेवाला नहीं है । लेकिन जयपुर निटरेचर फेस्टिवल में कोई विवाद ना हो ये अब संभव नहीं लगता है ।
हाल के दिनों में ये देखने को मिला है कि लिटरेचर फेस्टिवल आदि में एक दो सत्रों में साहित्यक विमर्श की बजाए विवाद पर ज्यादा जोर रहता है, सत्रों के विषय और वक्ताओं का चयन उसको ध्यान में रखकर किया जाता है ।लगता है इन आयोजनों को कर्ताधर्ताओं को लगता है कि विवाद सफलता का इंस्टेंट मंत्र है । दिल्ली में हुए एक लिटरेचर फेस्टिवल में भी कई विवाद उठाने की कोशिश हुई थी । कांग्रेस के नेता पी चिदंबरम ने सलमान रुश्दी की किताब पर भारत में लगे बैन को उचित नहीं माना था । जब उस किताब के आयात पर प्रतिबंध लगाया गया था तब चिदंबरम देश के आंतरिक सुरक्षा राज्य मंत्री थे, तब उनके विचार सामने नहीं आए थे । प्रेमचंद ने कहा ही है कि सिर्फ मूर्ख और मृतक अपने विचार नहीं बदलते हैं लिहाजा सबको विचार बदलने का हक है ।  इसी तरह से दलित चिंतक और विचारक कांचा इलैया ने भी कह दिया था कि सरदार वल्लभ भाई पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री बने होते तो भारत भी पाकिस्तान की राह चलता और देश में लोकतंत्र अबतक खत्म हो गया होता । दरअसल इस तरह के आयोजनों में कुछ भी कहने छूट होती है । जैसे कांचा इलैया ने तो यह भी कह दिया था कि सरदार पटेल ये नहीं चाहते थे कि बाबा साहब भीम राव अंबेडकर भारतीय संविधान लिखें । इलैया के मुताबिक पटेल चाहते थे कि कोई व्यक्ति जो मनुस्मृति को मानता हो वही संविधान लिखे । कांचा इलैया के ऐसा कहने का आधार सिर्फ इतना था कि पटेल हिंदू महासभा के करीब थे । इन साहित्यक आयोजनों को नजदीक से देखनेवाले मेरे एक मित्र का मानना है कि लिटरेचर फेस्टिवल अब साहित्य के विमर्श का स्थान नहीं बल्कि विवादों का अखाड़ा बन गया है । बेंगलुरू लिटरेचर फेस्टिवल में भी यही हुआ था। वह आयोजन भी साहित्येतर कारणों ही चर्चा में रहा । चर्चा में रहने की वजह से लिटरेचर फेस्टिवल का बाजार बनता है । बाजार बनता है तो उसमें प्रायजक आते हैं, प्रयोजक आते हैं तो फिर मुनाफा होता है । मुनाफे की चाहत में कई आयोजकों को लगने लगा है कि विवाद के बगैर लोकप्रियता और फिर प्रायोजक मिलने में आसानी होती है । देश में होनेवाले तमाम लिटरेचर फेस्टिवल के सामने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का ही उदाहरण होता है । विवादों और जयपुर लिट फेस्ट का चोली दामन का साथ रहा है । पिछले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले आयोजित लिट फेस्ट में सलमान रुश्दी के जयपुर आने को लेकर जबरदस्त विरोध हुआ था और अंतिम समय में सलमान की भारत यात्रा रद्द हुई थी । दो साल पहले पूर्व पत्रकार आशुतोष और आशीष नंदी के बीच एक सत्र में दलितों पर की गई टिप्पणी को लेकर जमकर विवाद हुआ था । कई दिनों तक टेलीविजन चैनल पर घंटों बहस हुई थी । हर बार मामला कोर्ट कचहरी से लेकर थाने और धरना प्रदर्शन तक पहुंचा है । आशुतोष और आशीष नंदी का विवाद तो सुप्रीम कोर्ट से निबटा ।  इन विवादों की वजह से ही जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल पूरी दुनिया में चर्चित हुआ है । जयपुर लिटरेचर फेस्टविल की आयोजक नमिता गोखले इस बात पर अफसोस करती हैं कि गंभीर विमर्श हमेशा से एक दो विवादों के बीच दब जाता है । नमिता गोखले ने एक बार बातचीत में मुझसे कहा था कि लिट फेस्ट एक ऐसा मंच होना चाहिए जहां साहित्य और उसकी समकालीन प्रवृत्तियों पर गंभीरता से विमर्श हो । दुनियाभर के लेखक और विचारकों के बीच साहित्य पर चिंतन हो जिसका फायदा पाठकों को मिल सके । लेकिन शायद उनको इस बात का एहसास नहीं है कि देश में आयोजित और लिटरेचर फेस्टिवल विवादों को अपनी सफलता का मंत्र मानते हैं । हमारा मानना है कि विवादों से कोई आयोजन चर्चित तो हो सकता है लेकिन उसकी प्रतिष्ठा के लिए यह आवश्यक है कि वहां गंभीर चिंतन और विमर्श हो ।



पाठकों की वापसी का मेला

हिंदी में लंबे समय से पाठकों की कमी का रोना रोया जा रहा है । खुद को महान मान कर किताबें लिखनेवाले कई साहित्यकारों की किताबें जब कम बिकती हैं तो वो ये प्रचारित करने में जुट जाते हैं कि हिंदी में साहित्य के पाठक कम हो रहे हैं । इस बात को भी फैलाया जाता है कि हिंदी साहित्य सरकारी थोक खरीद की वजह से जिंदा है । कुछ प्रकाशकों ने भी इस तरह की बातों को हवा दी और ये बात फैलाई कि साहित्यक किताबें नहीं बिकती हैं । प्रकरांतर से यह निकल कर आता है कि साहित्य के पाठक कम हो रहे हैं । इसके अलावा ई बुक्स की उपलब्धता और उसकी कम कीमत की वजह से भी किताबों के बाजार के सिकुड़ने की बात बहुधा सामने आती रहती है । हाल ही में दिल्ली में खत्म हुए विश्व पुस्तक मेला से पाठकों की कमी की बात गलत साबित होती है । एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली में नौ दिनों तक चले इस विश्व पुस्तक मेले में करीब बारह लाख पुस्तक प्रेमी पहुंचे थे । नौ दिन में बारह लाख यानि तकरीबन करीब एक लाख से ज्यादा पुस्तक प्रेमी हर दिन । काफी दिनों के बाद पुस्तक मेले में ये भी देखने को मिला कि लोग कतार में खड़े होकर हॉल में प्रवेश कर रहे थे । शनिवार और रविवार को तो कतार काफी लंबी थी लेकिन सप्ताह के अन्य दिनों में भी लोग पंक्तिबद्ध होकर मेले में पहुंच रहे थे । हिंदी के हॉल में ये स्थिति देखकर लगा कि साहित्य में पाठकों की वापसी हो गई है । इस बार के विश्व पुस्तक मेले में किताबों की जमकर बिक्री भी हुई । हिंदी के लगभग सारे प्रकाशक बेहद खुश नजर आए । पाठकों की वापसी ने उनके चेहरे पर मुस्कान खिला दी । वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी ने बेहद दिलचस्प वजह बताई । उनका मानना है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के फैलाव ने किताबों के लिए एक सकारात्मक वातावरण बनाया । उनके मुताबिक अब पाठक सोशल मीडिया पर किताबों से अवगत हो जाते हैं और उनेक मन में पुस्तक को लेकर उत्सकुता जगती है । उसी उत्सकुकता के आकर्षण में पाठक पुस्तक तक पहुंचना चाहते हैं ।

इसके अलावा पुस्तकों से पाठक भावनात्मक रूप से भी जुड़ते हैं । कई लोगों का कहना है कि वर्चुअल स्पेस पर किताबें पढ़ने से वो आनंद नहीं मिलता है जो कि हाथ में किताब लेकर पढ़ने से प्राप्त होता है । ई बुक्स को आप लगातार लंबे वक्त तक नहीं पढ़ सकते हैं । किंडल या अन्य डिवाइस पर लंबे वक्त तक पढने से आंखों पर जोर पड़ता है और कुछ समय के लिए पढ़ना रोकना पड़ता है , बहुधा यह कहानी या उपन्यास के आनंद को बाधित करता है । इस तरह से हम देखें तो कई वजहों से पाठकों का रुझान एक बार फिर से किताबों की ओर हुआ है । इनमें से एक और वजह है कि अब पाठकों का सामने विषयों की विविधता भी है । दो तीन दशकों तक पाठकों के सामने इतने विकल्प नहीं थे । उन्हें एक खास तरह का फॉर्मूलाबद्ध लेखन से रूबरू होना पड़ता था जिसकी वजह से साहित्य में एकरसता आ गई थी । अब हिंदी के लेखकों ने उन विषयों पर भी लिखना शुरू कर दिया है जिसको पिछले कई सालों से अस्पृश्य माना जाता था । अब फिल्मों से लेकर खेल आदि पर भी किताबें लिखी जाने लगी हैं लेकिन अगर हम गंभीरता से विचार करें तो हिंदी में अब भी कई विषयों पर काम नहीं हो रहा है । मसलन साइंस फिक्शन और पॉलिटिकल थ्रिलर आदि ना के ही बराबर लिखे जा रहे हैं । पाठकों को साहित्य की ओर वापस लाने और उनको अपने साथ बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि लेखक विविध विषयों पर लिखने का प्रयोग करते हैं । 

Thursday, January 21, 2016

स्टार्ट अप कैसे होगा अप ?

पिछले दिनों दिल्ली के विज्ञान भवन में देशभर के चुनिंदा लोगों के सामने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्टार्ट अप के लिए अपना विजन तो पेश किया ही सरकार की सहूलियतों का भी एलान किया । स्टार्टअप को सपोर्ट करने की सरकार की मंशा की तारीफ की जानी चाहिए लेकिन जिस तरह से इस सपोर्ट सिस्टम को डिजाइन किया गया है उसको लेकर बिजनेस जगत में आशंका है । कई जानकारों का मानना है कि स्टार्टअप के लिए सहूलियतें देने से जयादा जरूरी है कि उसके फलने फूलने के लिए वातावरण बनाना । स्टार्टअप के लिए तीन साल तक टैक्स में छूट का एलान क्यों किया गया यह समझ से परे है । तीन साल में कोई बिरला ही होगा जो अपने स्टार्टअप बिजनेस को मुनाफे में लेकर चला जाए । सरकार के आलोचकों का कहना है कि स्टार्टअप को तीन साल तक टैक्स छूट देने के एलान के पीछे चंद बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचाना है । स्टार्टअप की अवधारणा इंटरनेट के फैलाव से जुड़ा है और पिछला साल इसके लिए अबतक सबसे मुफीद रहा है । नैसकॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में स्टार्टअप सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बिजनेस मॉडल है । उस रिपोर्ट के मुताबिक यहां स्टार्टअप के लिए विश्व का तीसरा सबसे बड़ा बाजार भी उपलब्ध है । स्टार्टअप की अवधारणा सुनने और देखने में बहुत ही मोहक लगती है लेकिन क्या इसकी तस्वीर उतनी ही सुंदर है जितनी ये दिखती है । शायद नहीं । भारत में दो देश बसता है, एक वो जिसकी संख्या हम करीब दस फीसदी मान सकते हैं और दूसरा वो जिसकी हिस्सेदारी नब्बे फीसदी है । दस फीसदी आबादी स्टार्टअप के लिए बेहतर बिजनेस वातावरण दे सकता है और वो इसके साथ कदम से कदम मिलाकर चल भी सकता है लेकिन क्या सिर्फ दस फीसदी के साथ स्टार्ट अप का बिजनेस मॉडल सफल हो सकता है । स्टार्टअप की सफलता और असफलता दोनों को मिलाकर ही तय होगी । कोई भी स्टार्टअप अगर नब्बे फीसदी पर ध्यान देगा तो उसका घाटा होना तय है । नब्बे फीसदी तक पहुंचने के लिए जिस तरह के इंफ्रास्ट्रक्टर की जरूरत है वो काफी मंहगा पड़ता है । देश के सुदूर इलाके में रह रहे ग्राहकों तक पहुंचने के लिए श्रम से ज्यादा लॉजिस्टक में खर्च हो जाता है ।  
स्टार्टअप बिजनेस के लिए किसी भी तरह का मोबाइव एप बनवाना बहुत आसान और सस्ता है लेकिन उस मोबाइल एप को डाउनलोड करवाना और फिर उसको रिटेन करवाना बहुत ही मुश्किल है । इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि एक मोबाइल एप को डाउनलोड करवाने का खर्च लगभग पांच सौ रुपए आता है और उसको ग्राहक अपने मोबाइल में कब तक रखेगा इसकी कोई गारंटी नहीं है । भारत में मोबाइल के ग्राहकों की विशाल संख्या को देखते हुए वेंचर कैपिटलिस्टों को और स्टार्टअप को यहां एक बड़ा बाजार नजर आता है । वो भूल जाते हैं कि ज्यादातर स्मार्टफोन में मेमोरी बहुत कम होती है और ग्राहक खरीदारी के एप को ज्यादातर दो ही रखते हैं। इन स्टार्टअप बिजनेस में अन्य खर्चों को जोड़ा जाए तो मुनाफा का मार्जिन बेहद कम होता है और कहीं कहीं तो ये घाटे का भी सौदा होता है । कई स्टार्टअप बिजनेस में प्रोडक्टस पर डिलीवरी चार्ज भी लिया जाता है जो कि बाजर में उसकी लागत मूल्य से ज्यादा होता है । इसके अलावा इंटरनेट पर होनेवाले इस कारोबार में अन्य खर्चे इतने ज्यादा होते हैं जिसकी वजह से ये बिजनेस मॉडल सफल नहीं हो सकता है । ये पूरा बिजनेस ट्रांसेक्शन की संख्या पर भी निर्भर करता है ।

हमारे देश में हाल के दिनों में ग्रॉसरी से लेकर सब्जी तक के स्टार्टअप खुलते जा रहे हैं और उसी रफ्तार से बंद भी हो रहे हैं । मोबाइल एप पर आधारित इस तरह की ज्यादातर कंपनियां घाटे में चल रही हैं । घाटे में चल रही इन कंपनियों के लिए वेंचर कैपटलिस्ट की पूंजी प्राणवायु का काम तो करती है लेकिन ये दीर्घकालीन हल नहीं देते हैं क्योंकि वेंचर कैपटलिस्ट पहली बात तो इक्विटी से अपना घाटा पूरा करते हैं और फिर कंपनी की वैल्यूएशन के आधार पर उसको मौका मिलते ही बेच देते हैं । किसी भी कारोबार को शुरू करने और उसकी सफलता के लिए माना जाता है कि आपको अपने प्रोडक्ट के बारे में औरों से बेहतर जानकारी हो, आपको अपने ग्राहकों के स्वभाव और उनकी खरीदारी के पैटर्न का बेहतर अंदाजा हो और कारोबार को सफल करने का ख्वाब हो । लेकिन स्टार्टअप में एक और चीज जोड़ी जानी चाहिए कि कारोबारी को इस बात का भी इल्म हो कि उसके ट्रांजेक्शन कैसे बढ़ाए जा सकते हैं । इस कारोबार में एक और खतरा है जिसको ध्यान में रखना होता । गूगल और फेसबुक स्टार्टअप कंपनियों को एक निश्चित राशि के एवज में ग्राहक देते हैं । इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि फेसबुक और गूगल एक ग्राहक के लिए करीब पांच या छह सौ रुपए लेते हैं । इन खरीदे गए ग्राहकों के आधार पर स्टार्टअप कंपनियां निवेशकों को आकर्षित करती हैं । इन स्टार्टअप कंपनियों के पास फेसबुक या गूगल से खरीदे गए ग्राहकों को अपने साथ जोड़े रहने की कोई रणनीति नहीं है और ये मानकर चलते हैं कि उनमें से करीब बीस से पच्चीस फीसदी तो जुडे़ ही रहेंगे । हलांकि इस तरह का कोई रिसर्च उपलब्ध नहीं है । हर कोई फ्लिपकार्ट या स्नैपडील का उदाहरण देते हैं लेकिन वो ये भूल जाते हैं कि इस तरह की कई कंपनियां हजारों करोड़ के घाटे में चल रही हैं । हमारे यहां स्टार्टअप शुरू करने के लिए भारतीय परिस्थियों को ध्यान में रखना होगा अन्यथा ये भी डॉट कॉम के बुलबुले की तरह फूट कर स्थायित्व हासिल करेगा ।    

Monday, January 18, 2016

बहुत याद आएंगे कालिया जी

हिंदी के यशस्वी कथाकार और बेहतरीन संपादक रवीन्द्र कालिया का निधन हो गया छिहत्तर साल की उम्र में उन्होंने लंबी बीमारी बाद दिल्ली के एक अस्पताल में अंतिम सांसे लीं रवीन्द्र कालिया बेहतर कथाकार थे या बेहतर संपादक ये तय करना मुश्किल है लेकिन एक बात जिसपर पूरे साहित्य में मतैक्य है वो ये कि वो एक बेहतरीन और बेहद जिंदादिल इंसान थे हंस के संपादक राजेन्द्र यादव के निधन के बाद बोरियत की हद तक गंभीरता का आवरण ओढे दिल्ली की साहित्यक जमात में कालिया जी ही थे जो अपने विट और ह्यूमर से इसको बहुधा तोड़ते रहते थे पंजाब के जालंधर में 11 नवंबर 1938 को जन्मे रवीन्द्र कालिया ने कई शहरों की यायावरी की और बाद में एक बार फिर दिल्ली आए और फिर यहीं के होकर रह गए कालिया जी ने शिक्षण से अपने करियर की शुरुआत की फिर वो धर्मयुग पहुंच गए और वहां धर्मवीर भारती की सोहबत में पत्रकारिता के तमाम गुर सीखे थे मुंबई में रहते हुए कालिया जी ने साहित्य और पत्रकारिता को बेहद नजदीक से देखा जो बाद में उनकी कहानी काला रजिस्टर में सामने भी आया रवीन्द्र कालिया, धर्मवीर भारती के साथ काम करने के पहले मोहन राकेश की नजर में आ गए थे । मोहन राकेश के साथ और प्रेरणा से कालिया जी ने कहानियां लिखनी शुरू की । माना जाता है कि भाषा का जो अनुशासन रवीन्द्र कालिया में दिखाई देता है वो मोहन राकेश की ही सोहबत का असर है । मेरा कालिया जी से संपर्क अस्सी के दशक से था जब वो इलाहाबाद में रहते हुए एक अखबार गंगा-जमुना निकाला करते थे । उनके साथ पत्र व्यवहार होता था और वो बहुधा मेरे साहित्यक पत्र अपने अखबार में छाप दिया करते थे । ये पत्र संपर्क नियमित नहीं था लेकिन हमारी पीढ़ी कालियाजी की कहानियों की दीवानी थी । मुझे याद है कि जब उनकी किताब गालिब छुटी शराब छपी थी तो हॉस्टल में उसकी खूब चर्चा थी । मेरा अनुमान है कि धर्मवीर भारती की गुनाहों के देवता के बाद गालिब छुटी शराब ऐसी किताब है जिसको कई पाठकों ने कई बार खरीदी होगी क्योंकि जो उस किताब को पढ़ने के लिए ले जाता है वापस नहीं करता है । मैंने ही कम से कम उसकी दस प्रतियां खरीदी होगी लेकिन अब मेरे पास एक भी प्रति नहीं है । यह लेखक की लोकप्रियता का सबूत है ।
रवीन्द्र कालिया के व्यक्तित्व के अलग अलग शेड्स थे और ये सभी शेड्स एक दूसरे को चुनौती देते थे । कहानीकार के रूप में काला रजिस्टर और नौ साल छोटी पत्नी हिंदी कथा साहित्य में अलग से दिखाई देता है । इसी तरह से जब एक संस्मरणात्मक किताब- गालिब छुटी शराब देखते हैं तो लगता है कि यार कमाल का संस्मरण लेखक है ये शख्स । फिर इनके उनके संपादन के शेड्स पर नजर डालते हैं तो सामने आता है उन्नीस सौ इक्यानवे में वर्तमान साहित्य के दो कहानी महाविशेषांक । आज खबरिया चैनलों में बहुधा महा शब्द का प्रयोग किया जाता है जैसे महा-बहस, महा-कवरेज आदि । परंतु मेरे जानते महा शब्द को इस अर्थ में लोकप्रिय किया कालिया जी वर्तमान साहित्य के कहानी महाविषेशांके के जरिए । दो अंकों में प्रकाशित वर्तमान साहित्य के उस महाविशेषांक में कृष्णा सोबती की लंबी कहानी ऐ लड़की प्रकाशित हुई थी । उस महाविशेषांक के पहले अंक को देखकर उपेन्द्र नाथ अश्क ने लिखा था- मैं इक्यासी साल का होने जा रहा हूं और मैं कालिया को इस बात की दाद देना चाहूंगा कि उसने भैपव प्रसाद गुप्त, ज्ञानरंजन या राजेन्द्र यादव जैसे कमज़र्फ संपादकों की तरह अपने व्यक्तिगत राग-द्वेष अथवा मानापमान को अपने संपादन कार्य के आड़े नहीं आने दिया और ज्यादा से ज्यादा जीवंत कथाकारों का सहयोग लेने की कोशिश की । विगत साठ वर्षों यानि जब से मैं कहानियां लिख रहा हूं, मैंने कम से कम हिंदी में ऐसा विशाल कथा विशेषांक नहीं देखा ।कालिया जी के इस संपादन कौशल को बाद में हिंदी के पाठकों ने वागर्थ के अंकों में भी महसूस किया जब वो उसके संपादक बने थे । कालांतर में जब कालिया जी नया ज्ञानोदय के संपादक बनकर दिल्ली आए तो फिर तो उन्होंने अपने संपादन के दौरान हिंदी में युवा लेखकों की पूरी पीढ़ी खड़ी कर दी । युवा लेखकों को लेकर कालिया जी के अंदर एक खास किस्म का उत्साह रहता था और वो उनसे कुछ भी नया करवा लेने की कोशिश में रहते थे । नया ज्ञानोदय में मेरा स्तंभ कालिया जी ने ही शुरू किया था और इसके लिए वो मुझे करीब तीन साल तक उत्साहित करते रहे थे । ज्ञानपीठ के किसी सम्मान समारोह में मुझसे राष्ट्रीय संग्रहालय में मिले तो उन्होंने आदेशात्मक अंदाज में मुझसे कहा था कि अगले अंक से तु्म्हारा स्तंभ जाएगा । तब जाकर स्तंभ शुरू हुआ जो अब भी चल रहा है । अंग्रेजी की किताबों के बारे में पाठकों को परिचित करवाने उस स्तंभ का उद्देश्य है ।

कालिया जी साहित्य में दो बातों को लेकर चिंतित भी रहा करते थे । वर्ष दो हजार एक की बात रही होगी तब मैंने एक न्यूज चैनल था तब वहां मैंने साहित्य में विवादों के गिरते स्तर पर परिचर्चा आयोजित की थी । उस परिचर्चा में रवीन्द्र कालिया, अखिलेश, विभूति नारायण राय, मैनेजर पांडे, ज्ञानरंजन, संतोष भारतीय थे । उस परिचर्चा में कालिया जी ने साफ तौर पर कहा था कि उनकी साहित्य में विमर्श के गिरते स्तर से ज्यादा चिंता की बात है उसमें पनप रहा जातिवाद । कालिया जी कहा था- मेरी खास चिन्ता का विषय यह है कि साहित्य में एक खास तरह का जातिवाद पनप गया है । जैसे यह भी देखने में आ रहा है कि यहां एक खास तरह का ब्राह्मणवाद भी है,ठाकुरवाद भी है, कायस्थवाद भी । क्या यह अकारण है कि ठाकुरों को ठाकुरों की ही रचनाएं पसंद आती हैं कायस्थों को नहीं आती, ब्राह्णों को कायस्थों की नहीं आती ।आज के डेढ दशक पहले जिस बात की ओर कालिया जी ने इशारा किया था आज वो विद्रूप रूप से हमारे सामने है । कालिया जी अपने बेबाक राय के लिए भी जाने जाते थे। गंभीर बातों को भी हल्के अंदाज में कह देने की उनकी अदा साहित्य जगत में मशहूर थी । एक बार उन्होंने कहा था कि आजकल हिंदी साहित्य में कुछ कथाकार एक दूसरे को जलील करने के लिए कहानियां लिख रहे हैं । पात्रों के चयन से ये बात साफ होती भी रही है । आज वो नहीं हैं लेकिन उनकी कही कई बातें आज भी साहित्य में गूंज रही हैं और साहित्यकारों को सोचने पर विवश कर रही हैं । कालिया जी आप बहुत याद आएंगे क्योंकि आपके जाने से साहित्य जगत की जीवंतता लगभग समाप्त हो गई है और बच गए हैं गंभीरता का आवरण ओढे साहित्यकार जिनके पास जाने में युवाओं को सोचना पड़ता है ।  

Sunday, January 17, 2016

विचारधारा मुक्त साहित्य

पिछले साल लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस मुक्त भारत का नारा जोर शोर से गूंजा था । उस नारे को लोगों ने कितना अपनाया यह विवाद का विषय हो सकता है । इस बात पर भी बहस हो सकती है कि लोकतंत्र में एक मुख्य राजनीतिक दलों में से एक से देश को मुक्त करने की परिकल्पना कितनी उचित थी । विमर्श, बहस,वाद-विवाद-संवाद लोकतंत्र के लिए जरूरी है । इसी आवश्यकता की वजह से कांग्रेस मुक्त भारत की कल्पना के विरोध में कई लेख लिखे गए, लिखे भी जाने चाहिए क्योंकि भारत का संविधान आपको अपने विचार खुलकर रखने का हक देता है । राजनीति में जिस तरह से कांग्रेस मुक्त भारत पर लंबा विवाद हुआ उसी तरह से हिंदी में विचारधारा मुक्त साहित्य पर भी बहस होनी चाहिए । पिछले कई दशकों से जिस तरह से हिंदी साहित्य एक खास विचारधारा की जकड़न में है उसको दूर करने के लिए और साहित्य को विचारधारा की गुलामी से मुक्त करने के लिए यह आवश्यक है कि हिंदी में विचारधारा मुक्त साहित्य की मुहिम शुरू की जाए । दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में साहित्य में भारतीयता की अवधारणा विषय पर एक गोष्ठी आयोजित की गई थी । इस विषय पर बात करने से अबतक हिंदी के लोग कतराते रहे हैं । दरअसल हुआ यह है कि जिस वक्त से हिंदी साहित्य पर वामपंथी विचारधारा का प्रभाव बढ़ा उसके बाद से ही हमारे देश की चिंतन पद्धति का हास होना शुरू हो गया । इसके ह्रास के पीछे एक सोची समझी रणनीति को फलीभूत होते हुए रेखांकित किया जा सकता था । यह क्योंकर हुआ कि जिस देश में वेद, पुराण, उपनिषद जैसी कालजयी रचनाएं लिखी गईं, जिस देश में गणित और व्याकरण को वैज्ञानिक तरीके से समझा गया उसी देश में स्वतंत्र चिंतन की परंपरा खत्म हो गई । हमारी सोच समझ के औजार बदलने लगे । हम स्वदेशी चिंतन पद्धति को छोड़कर विदेशी और आयातित विचारधारा के प्रभाव में आने लगे । साहित्य से भारतीयता की बातें कम होनी लगीं । दबे कुचले मजलूमों की बातें करते करते हम अपने गौरवशाली इतिहास को भुलाने लगे । भारत विश्व का इकलौता देश है जहां इतनी बहुलता और विविधता है । यहां इतनी भाषाएं, इतनी बोलियां, इतनी पोशाकें, इतनी आदतें हैं जो पूरी दुनिया के किसीएक देश में दुर्लभ है । इतना विशाल देश होने के बावजूद जो समावेशी संस्कृति हमारे देश में है और उसकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि उसको देखकर पूरी दुनिया में लोग दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं ।
हमारे पुरातन ग्रंथों को चुनिंदा तरीके से दकियानूसी से लेकर जाति प्रथा विरोधी तक करार दे दिया गया । हमेशा से यह बात कही और सुनी जाती रही है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है । जिस तरह की मान्यताएं और परंपराएं समाज में होती हैं वो साहित्य में प्रतिबिंबित होती हैं । साथ ही समाज की कुरीतियो को भी साहित्य निगेट करता है । उसपर कुठाराघात करता है । हमारे पौराणिक ग्रंथों को बेहद ही चालाकी से स्त्री विरोधी करार दे दिया गया है और यह भ्रम फैलाया गया कि वेद और पुराण स्त्रियों की आजादी के खिलाफ हैं । दरअसल विदेशी और आयातित विचारधारा को स्थापित करने के लिए यह आवश्यक था कि पहले से स्थापित विचारधारा और मान्यताओं को विस्थापित किया जाए । किसी भी विचारधारा को या लेखन को जममानस से हटाने के लिए यह जरूरी है कि उसको बदनाम किया जाए । विदेशी विचारधारा को हमारे साहित्य पर थोपनेवालों ने यही काम किया । उन्होंने प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों को बदनाम करना शुरू किया । बदनाम करने के लिए सबसे जरूरी यह होता है कि उसको समाज के किसी समुदाय विशेष के खिलाफ साबित करो । आयातित विचारधारा चूंकि दबे, कुचलों और गरीबों के बारे में बात करती थी लिहाजा यह सोचा गया होगा कि भारतीय ग्रंथों में से कुछ ऐसा ढूंढकर निकाला जाए जिसमें इस विशाल वर्ग के खिलाफ कुछ हो । इस सोच के पीछे यह साबित करना था कि भारतीय चिंतन पद्धति या भारतीय लेखन में वर्ग विशेष के हितों का ध्यान रखा गया है । इस सोच के तहत ही पुराने भारतीय ग्रंथों को बदनाम किया जाने लगा। सबसे पहला आक्रमण हुआ मनुस्मृति पर । मनुस्मृति को दलितों और समाज के निचले तबके के खिलाफ प्रचारित कर दिया गया । कानों में शीशा डालने जैसी पंक्तियों को अत्याचार के तौर पर प्रचारित किया गया लेकिन अफसोस कि इसको समग्रता में नहीं देखा गया । यहां हम उसको उचित नहीं ठहरा रहे हैं, आग्रह सिर्फ इस बात का है कि किसी भी कृति का मूल्यांकन समग्रता में होना चाहिए । इसी तरह से तुलसीदास कृति रामचरित मानस की एक पंक्ति उठाकर उसको स्त्री के खिलाफ प्रचारित कर दिया गया । वेदों के बारे में जाने क्या-क्या अनाप शनाप प्रचारित किया गया । कमोबेश सभी ग्रंथों को स्त्री और दलित विरोधी करार दे दिया गया । उन धर्म ग्रंथों को भी स्त्री विरोधी करार दे दिया गया जिसकी बुनियाद दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे मजबूत चरित्रों के आधार पर किया गया है । इसके पीछे सिर्फ यह मानसिकता काम कर रही थी कि किस तरह से भारतीयता को बदनाम किया जा सके । किसी भी प्राचीन ग्रंथ का मूल्यांकन समग्रता में नहीं किया गया और कुछ चुनिंदा अंशों को उठाया गया और फिर विचारधारा के पोषकों ने उसको जमकर प्रचारित कर दिया । समग्रता में मूल्यांकन नहीं होता है तो उसको ही साहित्यक बेइमानी कहते हैं ।
उदाहरण के तौर पर अगर हम देखें तो हमारे पुराने ग्रंथों में स्त्रियों को लेकर बेहद अच्छे विचार पेश किए गए हैं । अगर इसका मूल्यांकन बगैर किसी पूर्वग्रह के समग्रता में हो तो यह बात निकल कर आ सकती है कि भारतीय समाज में स्त्रियों की बेहद इज्जत की जाती थी और उनका ध्यान रखने के लिए पुरुषों को प्रेरित भी किया जाता था । मनुस्मृति में भी इस बात का उल्लेख मिलता है जहां उसके तीसरे खंड में कहा गया है कि- पिता, भाई, पति, रिश्तेदारों को महिलाओं का सम्मान करना ही चाहिए । जहां स्त्रियों का सम्मान होता है वहां देवताओं का वास होता है और वो प्रसन्न होते हैं और जहां महिलाओं का अपमान होता है वहां चाहे आप कितना भी पूजा पाठ कर लें कुछ नतीजा नहीं निकल सकता है । जिस परिवार में स्त्रियां दुख में रहती हैं वो परिवार जल्द ही खत्म हो जाता है । मनुस्मृति में तो यहां तक कहा गया है कि जो पुरुष अपने परिवार में खुशहाली चाहते हैं उनको छुट्टियों में स्त्रियों को घुमाना चाहिए और उनको उपहार आदि देकर प्रसन्न रखना चाहिए । इसी तरह से अगर हम वेदों को देखें तो उसमें भी स्त्रियों को इतनी आजादी और सम्मान है जिसको उभारा ही नहीं गया । ऋगवेद और अथर्वेद में स्त्रियों के बारे में विस्तार से लिखा गया है । अथर्वेद में साफ तौर पर कहा गया है कि जब कोई लड़की विवाह करके ससुराल में आती है तो वो नए परिवार से उसी तरह मिलती है जैसे समुद्र में नदी का मिलन होता है । विवाह के बाद स्त्री उस परिवार में रानी की तरह आती है जो अपने पति के साथ मिलकर सभी फैसले लेनेवाली होती है । इस तरह की तुलना और स्त्री-पुरुष  समानता की बात उस काल में विश्व के अन्य ग्रंथों में दुर्लभ है । ऋगवेद में तो कई ऋचाओं को महिला ऋषियों से ही कहलवाया गया है जिसका प्रतीकात्मक अर्थ है । उन अर्थों को प्रचरित करने के बजाए दबा दिया गया । महिला वैदिक ऋषियों की एक लंबी परंपरा रही है जिनमें रोमाशा, लोपमुद्रा, विवसरा से लेकर मैत्रेयी और गार्गी का उल्लेख मिलता है ।

विदेशी आक्रमणों के अलावा विचारधारा के आक्रमण ने हमारे साहित्य का नुकसान किया । वामपंथी विचारधारा से इतर साहित्य रचना करनेवालों को कभी कलावादी तो कभी परिमलवादी कहकर एक खास खांचे में डाला गया । उनके मूल्यांकन को बाधित किया गया । अज्ञेय हिंदी साहित्य का वो हीरा है जो विश्व की किसी भी भाषा के लेखक से कमतर नहीं है लेकिन उनका वामपंथियों ने क्या हाल किया ये सबके सामने है । दिनकर के लेखन पर क्यों कर विचार नहीं किया गया । उनको सत्ता प्रतिष्ठान का पिछलग्गू प्रचारित कर उनके महत्व को कम कर आंकने की कोशिश की गई  और तो और अशोक वाजपेयी तक को उन्होंने साहित्य से बदर करने की भरसक कोशिश की । वो तो अशोक वाजपेयी की प्रतिभा थी कि अपने को प्रासंगिक बनाए रख सके । आज भी अगर कोई लखक इस तरह की बात करता है तो उसको संघी कहकर साहित्य से अछूत करने की भरसक कोशिश की जाती है क्योंकि जहां तर्क चुक जाते हैं वहां सामने वाले को संघी कहकर बच निकलने का वामपंथी मार्ग बेहद सुगम है । यह मार्ग आसान हो सकता है लेकिन ईमानदारी का मार्ग नहीं है । अगर किसी विषय पर विमर्श करना हो तो खुले दिल से हर मंच पर जाकर बात होनी चाहिए । साहित्य में किसी भी विचारधारा को लेकर अस्पृश्यता का भाव दरअसल इको पालने वाले की कमजोरी को ही रेखांकित करता है । 

Sunday, January 10, 2016

सब सरदार हैं खामोश !

पिछले दिनों चीन के दो महत्वपूर्ण नेताओं से संबंधित दो खबरें सुर्खियां बनी । पहली खबर थी चाउ एनलाई से संबंधित और दूसरी खबर है चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिगं के बारे में । लेकिन इन दोनों खबरों का संबंध आनेवाली किताबों से है जो हांगकांग से प्रताशित होनी है । पहली किताब जो नए साल में प्रकाशित होनी थी उसके केंद्र में चीन के क्रांतिकारीनेता चाउ एनलाई हैं । हांगकांग में रहनेवाली पत्रकार और लेखिका सुई विंग-मिंग ने पूर्व में प्रकाशित चाउ के पत्रों और उपलब्ध साहित्य के आधार पर किताब लिखी है द सेक्रेट इमोशनल लाइफ ऑफ चाउ एनलाइ । इस किताब में लेखिका ने अनुमान लगाया है कि अपने लंबे वैवाहिक जीवन के बावजूद चाउ एनलाइ समलैंगिक थे और उनका अपने स्कूल के दो साल जूनियर लड़के से संबंध था । सुई ने उन्नीस सौ अठानवे में कम्यिनुस्ट पार्टी द्वारा प्रकाशित किताब का पुनर्पाठ करते हुए ये निष्कर्ष निकाला है । इस किताब में चाउ के 1912 से लेकर 1924 तक पत्रों, कविताओं, डायरियों आदि को आदार बनाया गया है । लेखिका को आशंका है कि ये किताब चीन में प्रतिबंधित कर दी जाएगी । दूसरी किताब भी हांगकांग के प्रकाशक के यहां से प्रकाशित होनी है जिसके केंद्र में चीन के मौजूदा शासक शी जिनपिंग के पूर्व के प्रेम संबंध हैं । इस किताब की योजना की चर्चा के चंद दिनों बाद ही हांगकांग के प्रकाशन गृह के कई कर्मचारी लापता हो गए है । आरोप लग रहे हैं कि चीन की सीक्रेट सर्विस के लोगों ने इन लोगों को अगवा कर लिया है । इसमें से एक ब्रिटेन का नागरिक भी है । ब्रिटिश सरकार ने इस मसले को गंभीरता से लिया है और पिछले रविवार को हांगकांग में लोगों ने जुलूस निकालकर विरोध प्रदर्शन भी किया ।

भारत में माओ और चाउ एनलाइ को अपना आदर्श मानने वाले लोगों ने इन दोनों खबरों पर चुप्पी साध रखी है । अभिव्यक्ति की आजादी के लिए सुबह शाम छाती कूटनेवाले भारत के हमारे मार्क्सवादी चैंपियन इस पूरे मसले पर खामोश हैं । दरअसल चीन की विचारधारा को लेकर भले ही हमारे देश के मार्क्सवादी उत्साहित रहते हों लेकिन वहां इस तरह की घटनाएं आम हैं । चीन में अभिव्यक्ति की आजादी कितनी है यह बात किसी से छिपी नहीं है । चीन का शासक वर्ग इस बात को लेकर बेहद सतर्क रहता है कि उसके क्रांतिकारी नेताओं की व्यक्तिगत जिंदगी की खबरें जनता के बीच ना आ पाएं । उसपर सार्वजनिक रूप से चर्चा ना हो सके । इसको रोकने के लिए वो किसी भी हद तक जाते हैं जिसकी परिणिति बहुधा इस तरह के वाकयों में होती है । भारत में अगर किसी किताब पर किसी को आपत्ति हो तो उसको फौरन अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़कर संविधान को खतरे में बताने वाले लोग चीन के मसलसे पर खामोश रहते हैं । यहां आप गांधी जी समेत स्वतंत्रता संग्राम के सभी नेताओं के बारे में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर उलजलूल लिख सकते हैं । उसपर आपत्ति उठाने पर आपको दकियानूसी, तानाशाह, फासीवादी आदि आदि करार दिया जा सकता है लेकिन चीन और रूस में लेखकों के कत्ल होने पर भी ये खामोश रहते हैं । कम्युनिस्ट चीन में किताबों की पाबंदी का लंबा इतिहास रहा है और उतना ही लंबा इतिहास है हमारे वामपंथी बुद्धिजीवियों का भी जो कि अभिव्यक्ति की आजादी को ढाल बनाकर अपनी राजनीति करते हैं । रूस और चीन में इस तरह की घटनाओं को लेकर ना तो प्रगतिशील लेखक संघ, ना ही जनवादी लेखक संघ और ना ही जन संस्कृति मंच के कर्ताधर्ताओं के कानों पर जूं रेंगता है । इस तरह के चुनिंदा विरोध की वजह से ही आज वामपंथी बुद्धिजीवी अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं । वक्त आ गया है कि वो खुद को बदलें वर्ना जनता तो बदल ही रही है । 

संस्कारी सेंसर बोर्ड बनेगा संवेदनशील ?

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड जिसे हम सब लोग सेंसर बोर्ड के नाम से जानते हैं पिछले कई सालों से विवादों में है । दो हजार चौदह में सेंसर बोर्ड के सीईओ पर सत्तर हजार की घूसखोरी का आरोप लगा था और सीबीआई ने उनको गिरफ्तार भी किया था । तब यह बात सामने आई थी कि सेंसर बोर्ड में भ्रष्टाचार की जड़ें बेहद गहरी हैं और ये भी कहा गया था कि फिल्मों के दृश्यों को पास करवाने के लिए सेंसर बोर्ड के सीईओ को खुश करना पड़ता था । सीईओ साहब की गिरफ्तारी के बाद कई सुपरस्टार्स और निर्देशकों ने इस बात के पर्याप्त संकेत दिए थे कि उनको अपनी फिल्मों में गानों को पास करवाने के लिए घूस देनी पड़ती है । दो हजार चौदह में केंद्र में सत्ता बदली तो सेंसर बोर्ड का भी पुनर्गठन हुआ और पहलाज निहलानी को उसका अध्यक्ष बनाया गया । पहलाज निहलानी के पद संभालने के बाद सेंसर बोर्ड को संस्कारी बोर्ड बनाने की कवायद शुरू कप दी । सबसे बड़ा विवाद हुआ जेम्स बांड की फिल्म में कांट-छांट के आदेश के बाद । बांड की ताजा फिल्म स्पेक्टअ फिल्म में चुंबन के दृश्य पर सेंसर बोर्ड की कैंची चली थी । तब पहलाज निहलानी ने तर्क दिया था कि भारतीय समाज के लिए लंबे किसिंग सीन उचित नहीं हैं और किसिंग सीन में पटास फीसदी कटौती कर दी गई थी । बांड अपनी फिल्मों में गैजेट, गन और महिलाओं के साथ अपने संबंधों का मास्टर माना जाता है लेकिन भारत में हालिया रिलीज फिल्म में सेंसर बोर्ड की बदौलत बांड के दो ही रूप दर्शकों को देखने को मिल सके । बांड की फिल्म में कट लगाने के बाद पूरी दुनिया में सेंसर बोर्ड और उसके अध्यक्ष की फजीहत हुई थी । उस वक्त ये आरोप भी लगा था कि निहलानी प्रधानमंत्री मोदी को खुश करने के लिए इस तरह के कदम उठा रहे हैं । उनके कदम को प्रधानमंत्री से इस वजह से जोड़ा गया था कि उन्होंने नरेन्द्र मोदी पर एक शॉर्ट फिल्म डायरेक्ट की थी । बांड की फिल्म में कट लगाने का विरोध सेंसर बोर्ड के एक और सदस्य अशोक पंडित ने किया था लेकिन उनकी एक नहीं चली थी । उसके बाद से पहलाज निहलानी के हौसले बुलंद हो गए और वो फिल्मों में नैकिकता के नए झंडाबरदार के तौर पर उभर कर सामने आए । 
अब पहलाज निहलानी फिल्मों में हिंसा और गाली गलौच को भी कम करवाने पर तुले हुए लगते हैं । अभी हाल ही में मशहूर फिल्मकार प्रकाश झा ने सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पर आरोप लगाया है कि वो बेवजह उनकी फिल्म से साला शब्द हटवाना चाहते हैं । प्रकाश झा की फिल्म जय गंगाजल में कई सीन में साला शब्द का इस्तेमाल किया गया है । सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष का तर्क है साला गाली है और इतनी बार इस गाली को फिल्म में बोलने-दिखाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है जबकि प्रकाश झा का तर्क है कि साला अब आम बोलचाल की भाषा में प्रयुक्त होता है और वो गाली नहीं रह गया है । संस्कारी सेंसर बोर्ड के मुताबिक प्रकाश झा की फिल्म एडल्ट फिल्म की श्रेणी में आती है और बोर्ड उसको ए सर्टिफिकेट देने को तैयार है । उधर प्रकाश झा के मुताबिक वो यू यानि अनरेस्ट्रिक्टेड पब्लिक एक्जीबिशन या फिर यू ए की श्रेणी की फिल्म है लिहाजा उसको इस श्रेणी के तहत ही सर्टिफिकेट दिया जाना चाहिए । प्रकाश झा का आरोप है कि पहलाज निहलानी उनकी फिल्म से जो सीन और शब्द हटवाना चाहते हैं उससे फिल्म की कहानी खत्म हो जाएगी या फिर बेहद कमजोर हो जाएगी । अब इस बात का फैसला अदालत से होने के संकेत मिल रहे हैं । हलांकि फिल्मों में गालियां अब आम बात है ओमकारा से लेकर हाल की फिल्मों तक में गालियां मिल जाती हैं ।
हाल के दिनों में सेंसर बोर्ड के कारनामों को लेकर उसके खुद के सदस्य भी खफा है । उनका आरोप है कि अध्यक्ष उनकी नहीं सुनते हैं और मनमानी करते हैं । सेंसर बोर्ड में जिस तरह से एडल्ट और यू ए फिल्म को श्रेणीबद्ध करने की गाइडलाइंस है उसको लेकर भी बेहद कंफ्यूजन है । इन दोनों श्रेणियों के बीच बंटवारे को लेकर खासी मनमानी करने की गुंजाइश होती है जिसका लाभ सेंसर बोर्ड उठाता रहा है । अब इस बात की मांग उठने लगी है कि फिल्मों की ग्रेडिंग की जो प्रक्रिया है उसमें बदलाव की जरूरत है । इलस बदलाव की आवश्यकता को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने भी समझा मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक समिति का गठन कर दिया ।श्याम बेनेगल की अध्यक्षता वाली कमेटी के गठन के बाद बॉलीवुड के फिल्मकारों को उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी है । फिल्मकारों को अब इस बात की उम्मीद है कि उनकी सृजनशीलता पर कैंची नहीं चलेगी । सूचना प्रसारण मंत्रालय की गठित इस कमेटी में इक्यासी साल के बेनेगल हैं तो अपेक्षाकृत कम उम्र के राकेश ओमप्रकाश मेहरा और विज्ञापन की दुनिया की बड़ी हस्तियों में से एक पीयूष पांडे को भी रखा गया है । ये कमेटी सरकार को सेंसर बोर्ड के कामकाज के अलावा फिल्मों को दिए जानेवाले सर्टिफिकेट की प्रक्रिया की समीक्षा करेगी और जहां आवश्यक होगा वहां सरकार को इसमें बदलाव करने की सिफारिश करेगी ।

फिल्मों को सर्टिफिकेट देने का हमारे देश में लंबा इतिहास रहा है ।  हमारा संविधान देश के हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आजादी देता है लेकिन वही संविधान उस आजादी को तब रोक देता है जब उससे कोई भी दूसरा शख्स प्रभावित होता है । इसी अभिव्यक्ति ती आजादी की वजह से मीडिया को भी स्वतंत्रता मिली हुई है । फिल्मों को भी एक मीडियम माना गया है और वहां भी फिल्मकारों को रचनात्मक आजादी है । लेकिन फिल्मों के समाज पर पड़ने वाले प्रभाव के मद्देनजर यह माना गया कि उसपर नजर रखने की जरूरत है ताकि कोई भी फिल्मकार अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में कुछ ऐसा ना पेश कर दे जो समाज के कुछ वर्ग के लोगों के हित में ना हो । इस लिहाज से सिनेमेटोग्राफी एक्ट 1952 के तहत सेंसर बोर्ड का गठन किया । 1983 में इसका नाम बदलकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड कर दिया गया । तब भी यह बहस चली थी कि सेंसर बोर्ड क्यों । उसके बाद इसके नाम से सेंसर शब्द हटा दिया गया था । उसके बाद भी इस एक्ट के तहत समय समय पर सरकार गाइडलाइंस जारी करती रही है । जैसे पहले फिल्मों की दो ही कैटेगरी होती थी ए और यू । कालांतर में दो और कैटेगरी जोड़ी गई जिसका नाम रखा गया यू ए और एस । यू ए के अंतर्गत प्रमाणित फिल्मों को देखने के लिए बारह साल से कम उम्र के बच्चों को अपने अभिभावक की सहमति और साथ आवश्यक किया गया । एस कैटेगरी में स्पेशलाइज्ड दर्शकों के लिए फिल्में प्रमाणित की जाती रही हैं । फिल्म प्रमाणन के संबंध में सरकार ने आखिरी गाइडलाइंस 6 दिसबंर 1991 को जारी की थी जिसके आधार पर ही अबतक काम चल रहा है । इक्यानवे के बाद से हमारा समाज काफी बदल गया । आर्थिक सुधारों की बयार और हाल के दिनों में इंटरनेट के फैलाव ने हमारे समाज में भी बहुत खुलापन ला दिया है । बदले माहौल में जब हम करीब तीन दशक पुरानी गाइडलाइंस के आधार पर सर्टिफिकेट देंगे तो दिक्कतें तो पेश आएंगी । एक जमाना था जब फिल्मों में नायक नायिका के मिलन के दो हिलते हुए फूलों के माध्यम से दिखाया जाता था । छिपकली के कीड़े को खा जाने के दृश्य से रेप को प्रतिबंबित किया जाता था । समय बदला और फिल्मों के सीन भी बदलते चले गए । राजकपूर की फिल्म संगम में जब वैजयंतीमाला ने जब पहली बार बिकिनी पहनी थी तब भी जमकर हंगामा और विरोध आदि हुआ था लेकिन अब वो फिल्मों के लिए सामान्य बात है । फिल्मों में जब खुलेपन की बयार बहने लगी तो एक बार फिर सेंसर बोर्ड का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था और ये दलील दी गई थी कि फिल्मों के प्रमाणन को खत्म कर दिया जाना चाहिए । लेकिन उन्नीस सौ नवासी में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में साफ कर दिया था कि भारत जैसे समाज में फिल्मों के प्रमाणन की जरूरत है । कोर्ट ने कहा था कि ध्वनि और दृश्यों के माध्यम से कही गई बातें दर्शकों के मन पर गहरा असर छोड़ती है । सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद उन्नीस सौ इक्यानवे में एक गाइडलाइन जारी की गई जिसमें भी इस बात पर जोर दिया गया था कि फिल्मों में सामाजिक मूल्यों के स्तर को बरकरार रखा जाए । उस गाइडलाइंस में यह भी कहा गया था कि फिल्मों में हिंसा को गौरवान्वित करनेवाले दृश्यों को मंजूरी ना दी जाए । इस गाइडलाइंस की बिनाह पर ही पहलाज निहलानी प्रमाणन बोर्ड को संस्कारी बोर्ड बना चुके हैं । अब श्याम बेनेगल की अध्यक्षता वाली कमेटी से ये अपेक्षा है कि वो इसको संस्कारी से संवेधनशील बोर्ज बनाने की पहल करें ।  

Friday, January 8, 2016

पद्म पुरस्कारों की साख पर सवाल ?

हाल ही में केंद्र सरकार में वरिष्ठ मंत्री नितिन गडकरी के एक बयान ने पद्म पुरस्कारों को एक बार फिर से विवादों के कठघरे में खड़ा कर दिया है । नितिन गडकरी ने कहा था कि पद्मभूषण अवॉर्ड की चाहत में अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्री आशा पारेख उनके पास आई थी । गडकरी ने अपने खास अंदाज में यहां तक कह डाला कि घर की लिफ्ट खराब थी, बावजूद इसके आशा पारेख बारहवीं मंजिल तक सीढियों से चलकर पहुंची और उन्होंने खुद को पद्मभूषण दिलवाने का अनुरोध किया। गडकरी ने कहा कि इतनी सम्मानित अभिनेत्री का इस तरह से उनके घर आना उनको खल गया । उनके मुताबिक जब उन्होंने आशा पारेख को समझाने की कोशिश की कि उन्हें पद्मश्री मिल चुका है तो मशहूर अभिनेत्री ने ने उनको अपनी फिल्मों का हवाला दिया । नितिन गडकरी ने नाम सिर्फ आशा पारेख का लिया लेकिन इशारों में उन्होंने यहां तक कह डाला कि कई लोग उनके पद्म सम्मान दिलवाने के लिए उनके पीछे पड़े रहते हैं । गडकरी ने बेहद साफगोई से स्वीकार किया कि अब तक वो हजारों लोगों के नाम की सिफारिश गृह मंत्रालय को कर चुके हैं । इस पूरे प्रकरण के बात इस बात को लेकर बहस तेज हो गई है कि पद्म सम्मान में लॉबिंग की जाती है । पहले भी कई विवादित लोगों को पुरस्कार मिल चुके हैं । अमेरिका में रहने वाले एनआरआई संत चटवाल को भी पद्मभूषण दिया गया जबकि उनके खिलाफ कई तरह की जांच पेंडिंग थी । अमेरिका में उनके खिलाफ कई मामले चल रहे थे । अभी हाल ही में ये बात भी सामने आई कि गायक रेमो फर्नांडिस को पद्म सम्मान दिया गया है जबकि उन्होंने भारत की नागरिकता छोड़कर पुर्तगाल की नागरिकता हासिल कर रखी है । इसकी जांच की भी मांग की जा रही है । इसके पहले भी सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े लोगों ने अपने पसंद के लोगों को पद्म सम्मान से सम्मानित किया । इस बात के भी प्रमाण है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्रियों ने अपनी नर्स से लेकर डॉक्टर तक को, स्कूल के साथी से लेकर स्कूल के प्रिंसिपल तक को पद्म सम्मान से सम्मानित किया । जिसने भी हमारे प्रधानमंत्री का ऑपरेशन किया लगभग सभी पद्म पुरस्कार पा चुके हैं । हमारे देश में सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न को भी हमारे नेताओं ने नहीं बख्शा और वोट बैंक की राजनीति के लिए जब चाहा तब दिया । बाबा साहेब अंबेडकर को वी पी सिंह ने भारत रत्न देकर अपने को दलितों का मसीहा साबित करने की कोशिश की थी। क्या ये सिर्फ राजनीति नहीं थी कि बाबा साहेब को इतने सालों तक भारत रत्न नहीं दिया गया था। इसी तरह से एम जी रामचंद्रन को जब राजीव गांधी ने भारत रत्न दिया तो उनकी नजर तमिल वोटबैंक पर थी । पिछले साल योगगुरू बाबा रामदेव ने भी पद्म पुरस्कार लेने से ये कहकर मना कर दिया था कि इस अवॉर्ड के लिए बहुत ज्यादा लॉबिंग होती है । पद्म सम्मान पर नियमित अंतराल पर उठनेवाले विवादों के बाद अब यह सोचने का वक्त आ गया है कि क्या इस पुरस्कार को खत्म कर दिया जाए ।

पद्म पुरस्कार हर साल गणतंत्र दिवस के पहले अपने अपने क्षेत्र में शानदार काम करने के लिए भारत सरकार देती है । इसमें डॉक्टर, कलाकार, पत्रकार, सरकारी अफसर, समाजसेवी आदि कई कैटेगरी होते हैं जिनमें थोक के भाव से पुरस्कार दिए जाते हैं । इस पुरस्कार का उद्देश्य देश की उन प्रतिभाओं के काम को रेखांकित करना था जिन्होंने अपने अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान किया हो । आजादी के बाद इस जब ब्रिटिश सरकार की पदवी खत्म की गई तो संविधान सभा में भी इसके बारे में विचार किया गया था । तब संविधान सभा में इस बात को लेकर लंबी बहस हुई थि कि कोई पदवी रखी जाए या नहीं । आचार्य कृपलानी की अगुवाई में राय बहादुर और खान बहादुर जैसी पदवियों को खत्म करने की मुहिम अंजाम तक पहुंची थी । उस वक्त इन लोगों ने ये तर्क दिया था कि ये पदवियां औपनिवेशक चिन्ह हैं जिन्हें आजाद भारत में रखने का कोई औचित्य नहीं है  । संविधानसभा में चली उस बहस की  परिणति संविधान के अनुच्छेद अठारह (एक) के रूप में सामने आया था जिसके तहत हर तरह की पदवी को खत्म कर दिया गया था । बाद में भी आचार्य कृपलानी ने इस तरह के राष्ट्रीय पुरस्कारो को खत्म करने की मुहिम भी चलाई थी लेकिन वो परवान नहीं चढ़ सकी थी । संसद में रखा उनका प्रस्ताव गिर गया था । पद्म पुरस्कार का मामला उन्नीस सौ पचानवे में देश की सर्वोच्च अदालत में भी गया था । तब सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि ये पदवी नहीं बल्कि पुरस्कार है और सरकारों को किसी भी शख्स को उसके काम के आधार पर पुरस्कृत करने का हक है । सुप्रीम कोर्ट ने तब साफ तौर पर यह आदेश दिया था कि चूंकि यह पदवी नहीं है लिहाजा कोई भी पुरस्कृत शख्स इसको अपने नाम के आगे उपयोग नहीं कर सकता है । सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में सरकार को पद्म सम्मान की संख्या को पचास तक सीमित रखने की सलाह भी दी थी लेकिन सरकारें अदालती आदेश के अलावा सलाह कहां मानती हैं । पद्म पुरस्कारों की संख्या लगातार बढ़ती रही और पिछले सालों में तो ये सवा सौ तक जा पहुंची है । पद्म पुरस्कारों की इस पूरी पृष्ठभूमि और उसके विवादित होते रहने को देखते हुए यह आवश्यक है कि सरकार इसको खत्म करे या फिर या कम से कम इसको दिए जाने में पारदर्शिता बरती जाए । किसको, कब, कैसे, क्यों और किसकी सिफारिश पर पद्म पुरस्कार दिया जाता है और उनका उस क्षेत्र में क्या उल्लेखनीय योदगान है इसको गृह मंत्रालय की बेवसाइट पर प्रकाशित किया जाना चाहिए अन्यथा विवादों में घिरे इन पुरस्कारों की साख छीजती चली जाएगी ।  

Sunday, January 3, 2016

साहित्यक सर्वे में लापरवाही का “खेल’

आज से करीब सोलह साल पहले की बात है । दिल्ली के एक प्रतिष्ठित दैनिक में साहित्यक पुस्तकों के प्रकाशन का सालाना लेखा-जोखा छपा था । उस अखबार के सालाना लेखा जोखा का पूरे हिंदी जगत को इंतजार रहता था । वर्ष 1999 के उस साहित्यक सर्वे में उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल के पहले उपन्यास काला पहाड़ का भी उल्लेख सर्वेकार ने किया था । सर्वे करनेवाले लेखक ने लिखा था कि भगवानदास मोरवाल का ये उपन्यास काला पहाड़ पहाड़ी जीवन पर लिखा गया बेहतरीन उपन्यास है । इस टिप्पणी को पढ़ने के बाद उस समय हिंदी के सजग पाठकों ने अपन सर धुन लिया था क्योंकि ये टिप्पणी उपन्यास पर ना होकर उसके शीर्षक को ध्यान में रखकर लिखा गया था । दरअसल भगवानदास मोरवाल का उपन्यास काला पहाड़ हरियाणा के मेवात इलाके की सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि पर लिखा गया उपन्यास है. उस उपन्यास नमे पहाडी जीवन कहां है या फिर समीक्षक महोदय की वो कौन सी दिव्य दृष्टि थी जिसने उसमें पहाड़ी जीवन ढूंढ निकाला ये बात उपनयास के लेखक भी नहीं बता पाए ।   सालभर प्रकाशित पुस्तकों का लेखा-जोखा करनेवाले माननीय लेखक को लगा कि शीर्षक में पहाड़ है तो कहानी पहाड़ से संबंधित होगी, लिहाजा उन्होंने बगैर उसको पढ़े लिख दिया और वो छप भी गया । करीब डेढ़ दशक बाद इस प्रसंग की याद इस वजह से आई कि इस साल भी अखबारों और बेवसाइट्स पर प्रकाशित सालाना सहित्यक लेखा-जोखा को पढ़ने के बाद यह लग कि टिप्पणीकारों ने या तो किताब को पढ़ा नहीं है या फिर जल्दबाजी में अपने पहचानवालों का नाम लेने में पुस्तक का प्रकाशन वर्ष तक भी भुला कर घालमेल कर दिया है । दरअसल अखबारों में होनेवाले इस आयोजन की अपनी एक अहमियत है । इन आयोजनों में की गई गलतियां भविष्य में किए जानेवाले शोध को प्रभावित करते हैं और गलत इतिहास पेश करने का आधार तैयार करते हैं । इस साल भी साहित्यक सर्वे को देखकर यही लगता है कि टिप्पणीकारों ने बहुत कैजुअल तरीके से इस तरह की टिप्पणियां की या लिखीं । इस वर्ष के सर्वे में थोक के भाव में बगैर पढ़े किताबों की सूची पेश कर दी गई । अखबारों में इस तरह के सर्वे में टिप्पणी लिखने में एक सहूलियत रहती है कि किसी भी कृति के बारे में दो या तीन लाइन से ज्यादा नहीं लिखना पड़ता है । दो हजार पंद्रह मे प्रकाशित सर्वे में भी इस तरह की कई असावधान टिप्पणियां गई हैं जिसको रेखांकित किए जाने की जरूरत है । एक आलोचक ने अल्पना मिश्र के उपन्यास अन्हियारे चलछट में चमका को दो हजार पंद्रह में प्रकाशित कृति करार दे दिया । यह एक भयंकर भूल है जो कि यह दिखाता है कि हिंदी के वरिष्ठ लेखक और आलोचक प्रकाशित कृतियों को लेकर कितने अगंभीर हैं । इस कृति को लेकर दो एक लोगों को और भ्रम हुआ । इसी तरह से एक मशहूर अंतराष्ट्रीय बेवसाइट ने भी हिंदी साहित्य के साल दो हजार पंद्रह का लेखा जोखा प्रस्तुत किया । उसको पढ़कर ये प्रतीत हो रहा था कि लेखक साहित्य की इस परंपरा से अनभिज्ञ हैं । इसके अलावा इस तरह के सर्वे में यह भी देखा गया कि पंद्रह बीस दिन पहले प्रकाशित पुस्तक भी चर्चित पुस्तकों की श्रेणी में आ गया । जो कहानी संग्रह पटना पुस्तक मेला में पिछले वर्ष दिसंबर में विमोचित हुआ और ठीक से पाठकों के बीच पहुंच भी नहीं पाया उसको भी टिप्पणीकारों ने उल्लेखनीय कृति के रूप में रेखांकित कर दिया । यह असावधानी है या अज्ञानत या फिर पक्षपात इसका फैसला हिंदी साहित्य के सुधीजनों को कर देना चाहिए । इसी तरह के करीब महीने भर पहले छपी एक आत्मकथा को भी टॉप टेन आत्मकथा में शुमार कर दिया गया । ये जल्दबाजी क्यों । संभव है इन किताबों का प्रकाशन वर्ष भी सही नहीं हो क्योंकि दिसंबर में छपनेवाली अधिकांश किताबों में प्रकाशन वर्ष अगले ही साल का होता है ।

पिछले दिनों हिंदी साहित्य में समीक्षा लिखनेवालो पर ऊंगली उठी थी जब एक युवा आलोचक ने युवा लेखिका के उपन्यास पर समीक्षा लिखी थी । उस समीक्षा में आलोचक महोदय ने उपन्यास की उस पृष्ठभूमि की चर्चा की थी जो वहां मौजूद नहीं है । इसके अलावा भी अखबार में लिखी जानेवाली समीक्षाओं में असावधानियां या लापरवाहियां की बातें सामने आती रहती हैं । समीक्षा एक गंभीर कर्म है वहां छूट नहीं लिया जा सकता है । इसल तरह की असावधानी या लापरवाहियों से समीक्षा लिखनेवाले तमाम समीक्षक संदेह क घेरे में आ जाते हैं ।  साहित्यक सर्वे लिखनेवालों को यह सहूलियत रहती है कि लेखक ब्लर्ब लिखकर टिप्पणी कर दे । ज्यादातर मामलों में यही होता भी है लेकिन यह साहित्यक बेइमानी है । इस बार तो कई लेखकों ने सोशल मीडिया पर इन लापरवाह सर्वेकारों और सर्व में टिप्पणी करनेवालों की खासी लानत मलामत की । सोशल मीडिया के दौर में इस तरह की चूक को सार्वजनिक होने में जरा भी देर नहीं लगती है । सोशल मीडिया पर सार्वजनिक होने के बाद पाठकों को ठगे जाने का एहसाल होता है । पाठकों को साहित्य की राजनीति से कोई लेना देना नहीं है । मतलब तो उनको इस बात से भी नहीं होता है कि कोई लेखक किसी को उठाने या गिराने के लिए नाम लेता या नहीं लेता है । वो तो बस लेखकों को सही मानकर उनपर भरोसा करता है । जब आलोचक का तमगा लगाए लोग इस तरह की लापरवाहियों में चिन्हित किए जाते हैं तो साहित्य की साख को धक्का लगता है । पाठकों का विश्वास दरकता है । जब पाठकों का साहित्यकारों को लेकर विश्वास दरकता है तो वो स्थिति साहित्य क विकास में बाधा बनती है । इस साल की घटनाओं को देखकर चिंता होती है । अखबारों की भी ये जिम्मेदारी है कि वो सर्वेकारों या टिप्पणीकारों की लापरवाही सामने आने के बाद गलतियों को प्रकाशित करे और भविष्य में उनको इस काम से अलग रखें । जिस तरह से चुनावों के सर्वेक्षणों को लेकर लोगों के विश्वास में कमी आई है उसी तरह से साहित्य के इन सर्वेक्षणों में भी पाठकों का विश्वास घटने लगा है । सालभर के साहित्य का सर्वेक्षण करना अपने आप मे एक श्रमसाध्य काम है और सर्वेकार को सालभर सजग रहना पड़ता है । साहित्यक घटनाओं से लेकर चर्चित प्रकाशनों तक का खाता-बही संभालना पड़ता है । सैकड़ों किताबें पढ़नी पड़ती हैं तब जाकर सर्वेक्षण संभव हो पाता है ।