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Monday, January 10, 2011

संस्थागत साहूकारों पर लगे लगाम

देश में माइक्रो फाइनेंस कंपनियों की शुरुआत गरीबों की भलाई और उसको रोजगार शुरू करने के लिए सहायता देने के घोषित उद्देश्य से की गई थी । पिछले दशक में भारत में माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के विकास पर नजर डालें तो पाते हैं कि पहला और शुरुआती दौर तो वह था जिसमें गरीबों को उनके छोटे-मोटे काम के लिए कर्ज मुहैया कराने की कवायद शुरू की गई । इस वक्त तक गरीबों की मदद करना और समाज के सबसे निचले पायदान के लोगों के जीवन स्तर को सुधारना मकसद था । लेकिन ज्यों-ज्यों उसका दायरा बढ़ा तो बाजार और कंपनियां इसमें फायदेमंद कारोबार की संभावनाएं तलाशने लगी । नतीजा यह हुआ कि दशक के अंत तक आते आते कई नामचीन और बड़ी कंपनियां इस कारोबार में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कूद पड़ी । इस कारोबार में उनको कम लागत पर ज्यादा मुनाफे की संभावना नजर आने लगी थी । इन कंपनियों ने इस तरह का मॉडल अपनाया जिसमें वो पहले गरीबों को चिन्हित करते,फिर उनको समूहों में इकट्ठा करते ताकि वसूली की एक सामाजिक गारंटी हो,उसके बाद गरीबों को डराकर कर अपने प्रभाव में लेकर ऋण वापसी या ब्याज वसूली की जा सके ।
गरीबी उन्मूलन या फिर गरीबों या किसानों की मदद की आड़ में ये कंपनियां अपने कामकाज को बेहद शातिराना अंदाज में अंजाम देती हैं । समय के साथ उन कंपनियों का अघोषित उद्देश्य सामने आ गया और गरीबों की भलाई की आड़ में खेला जानेवाला खेल खुल गया । आंध्र प्रदेश में माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के वसूली एजेंटों की ज्यादतियों से तंग आकर कई किसानों की खुदकुशी ने देशभर का ध्यान इन कंपनियों के क्रियाकलापों की ओर खींचा । पड़ताल में पता चला कि छोटे ऋण की आड़ में निवेश कर कंपनियां बड़ा लाभ कमा रही हैं । इन कंपनियों का तर्क है कि वो गरीबों को बगैर किसी गारंटी या गारंटीदाता के ऋण उपलब्ध करवाते हैं लिहाजा पैसा डूबने का खतरा बहुत ज्यादा रहता है । इस तर्क को ढाल बनाकर वो ब्याज की दरें उंची रखते हैं । आमतौर पर ये कंपनियां पांच प्रतिशत की दर पर अपना कारोबार करती हैं जो सालाना तकरीबन साठ प्रतिशत के करीब बैठता है । चूंकि ये कंपनिया ब्याज की दरें साप्ताहिक वसूलती हैं इस वजह से गरीबों को बेहिसाब ब्याज दर का एहसास नहीं हो पाता है । इन कंपनियों के कामकाज में कोई पारदर्शिता भी नहीं होती और ये जिन तबकों के बीच काम करती हैं उनको बाजार का यह व्यभिचार समझ में भी नहीं आता । ये कंपनियां व्यक्तिगत ऋण के बजाए तीन चार लोगों के छोटे समूह को कर्ज देती है। अगर समूह का कोई वयक्ति ब्याज चुकाने में नाकाम रहता है तो पूरे समूह पर जुर्माना लगाया जाता है । जुर्माने की यही राशि कंपनियों के मुनाफे को बढ़ा देती हैं ।
दरअसल ये माइक्रो फाइनेंस कंपनियां सूदखोर साहूकार की तरह काम करती है । फर्क सिर्फ इतना होता है कि सूदखोरी के धंधे को संस्थागत रूप दे दिया गया है और साहूकारों की जगह बड़ी कंपनियों ने ले लिया है । एक अनुमान के मुताबिक देशभर में सात करोड़ लोगों ने इन कंपनियों से कर्ज लिया हुआ है । अगर माइक्रो फाइनेंस इंफॉर्मेशन एक्सचेंज के दो हजार नौ के आंकड़ों पर नजर डालें तो हमारे देश में इस वक्त एक सौ उनचास माइक्रो क्रेडिट कंपनियां काम कर रही हैं । इन कंपनियां का सालाना कारोबार बीस हजार सात सौ करोड़ रुपये का है । गणित लगाने पर प्रति वयक्ति कर्ज की औसत रकम साढे छह हजार रुपये बैठती है ।
आंध्र प्रदेश में किसानों की खुदकुशी के बाद यह सवाल भी उठा कि ये कंपनियां अधिकतम कितना ब्याज वसूल सकती हैं । माइक्रो फाइनेंस के अंतराष्ट्रीय विशेषज्ञ और अंतराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी माइक्रोरेट के संस्थापक डी वी स्टॉफनबर्ग का मानना है कि – ‘ब्याज की दरों को तय करते वक्त स्थानीय परिस्थितियों और लागत पूंजी के खतरे को ध्यान में रखना जरूरी होता है लेकिन बाजार के मौजूदा दर से बीस या तीस फीसदी अधिक ब्याज दर रखना और उसे वसूलना नाजायज है । लेकिन हमारे यहां ये बेलगाम कंपनियां साठ से सत्तर फीसदी तक ब्याज वसूलती हैं । गरीबों के बीच काम करनेवाली इन कंपनियां से यह अपेक्षा की जाती है कि वो धन जुटाने के लिए बाजार से पैसा नहीं उठाएंगी । लेकिन कुछ महीनों पहले हैदराबाद की एक माइक्रो फाइनेंस कंपनी ने आईपीओ के जरिए बाजार से धन जुटाया । इससे एक बात तो साबित हो गई कि बड़ी कंपनियां इस सेक्टर में मुनाफा की ना केवल गुंजाइश देख रही हैं बल्कि निवेशकों को इसका भरोसा भी दे रही हैं ।
अब सवाल यह उठता है कि क्या ये कंपनियां गरीबों की सहायता कर रही हैं या उनका खून चूस कर अपना खजाना भर रही हैं। विभिन्न अध्ययनों के नतीजों से यह पता चलता है कि गरीबों के बेहतरी के नाम पर चलनेवाली ये कंपनियां धन कमाने का आसान जरिया बन चुकी है। आम आदमी की बात करनेवाली सरकार के सामने ये कंपनियां एक बड़ी चुनौती की तरह हैं । वक्त आ गया है कि सरकार इन संस्थागत साहूकारों को काबू में करने के लिए सख्त कानून बनाए नहीं तो खुदकुशी करनेवाले किसानों-गरीबों की संख्या बढ़ती जाएगी और ये इन बेलगाम कंपनियों का खजाना बढ़ता रहेगा ।