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Saturday, October 16, 2021

अत्याचारी राजवंश के नाम पर सड़क ?


दिल्ली में सड़कों का नाम किस तरह से रखा गया अगर इसपर कोई शोध हो तो कई दिलचस्प जानकारियां निकल सकती हैं। पराधीन भारत में सड़कों के नाम तो उन राजाओं या राजवंशों के नाम पर रखे गए थे लेकिन स्वाधीनता के बाद  नाम परिवर्तन को लेकर क्या सोच रही ये जानना भी दिलचस्प होगा। अगर इस संबंध में कोई नीति होती तो आज सेंट्रल दिल्ली में कम से कम तुगलक के नाम से सड़क, लेन और क्रिसेंट नहीं होते। तुगलक क्रेसेंट एक अर्धचंद्राकार सड़क है जिसपर एक तरफ सरकारी बंगले हैं और दूसरी तरफ भारत आसियान ( दक्षिण पूर्वी एशियाई राष्ट्रों का संगठन) मैत्री पार्क है। ये सड़कें तुगलक वंश के नाम पर रखा गया है। उसी तुगलक वंश के नाम पर जिसके शासकों ने भारत पर ना केवल राज किया बल्कि यहां की जनता को पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े रखा। यहां यह भी याद रखना आवश्यक है कि मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल के दौरान जब भयानक अकाल पड़ा था तब उसने अपने खजाने को भरने के लिए जनता पर लगनेवाले टैक्स की राशि काफी बढ़ा दी थी। गंगा-युमना दोआब के बीच निवास करनेवाली जनता से टैक्स की राशि वसूलने के लिए तमाम तरह के जुल्म किए गए। अत्याचार से बचने के लिए लोगों ने घर बार तक छोड़ दिए थे। इस राजवंश के एक शासक के नाम पर हमारे देश में तुगलकी फरमान जैसा पद अब तक बोला जाता है। उसके फैसले अजीबोगरीब होते थे, बगैर सोचे समझे उसने अपनी राजधानी को दिल्ली से करीब 1500 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के देवगिरी में बसाने का फैसला कर लिया था। देवगिरी का नाम बदलकर दौलताबाद कर दिया था। तमाम लोगों को दिल्ली से दौलताबाद जाने का शाही फरमान जारी कर दिया था। इस विस्थापन में हजारों लोगों की जान गई थी। लेकिन उसको इन सबकी फिक्र नहीं थी। उसके साथ जब दिल्ली से लोग देवगिरी पहुंचे तो वहां स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने लगी। एक दिन अचानक फिर से तुगलकी फरमान जारी हुआ कि अब राजधानी फिर से दिल्ली होगी। देवगिरी से दिल्ली आने में फिर लोगों की जान गईं। इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी के मुताबिक उस दौर में पूरी दिल्ली खाली हो गई थी। मध्यकालीन इतिहास में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि इस तुगलकी फरमान की वजह से हिंदू व्यापारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। क्या हम पाराधीनता के उस दौर में अपने पूर्वजों पर हुए अत्याचारों के जिम्मेदार शासक को याद रखना चाहते हैं।