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Sunday, December 25, 2022

कथेतर के विविध रंग


वर्ष 2022 बीतने को आया। साहित्य सृजन की दृष्टि से इस वर्ष कुछ उल्लेखनीय पुस्तकों का प्रकाशन हुआ। कथेतर विधा में प्रकाशित पुस्तकों पर मेरी टिप्पणी 

हिंदी साहित्य के इतिहास में जब छायावाद पर बात होती है तो जयशंकर प्रसाद, निराला, महादेवी और पंत का नाम लिया जाता है। जयशंकर प्रसाद की कृति कामायनी पर मुक्तिबोध से लेकर रामस्वरूप चतुर्वेदी तक ने विस्तार से लिखा है। उनकी रचनाओं को समग्रता में समझने के लिए इस वर्ष एक पुस्तक आई है, जयशंकर प्रसाद, महानता के आयाम। जयशंकर प्रसाद की रचनाओं से गुजरते हुए पाठकों को ये अनुभूति होती है कि कवि/लेखक खुद को लगातार परिष्कृत करता चलता है। इस पुस्तक के लेखक ने अपनी इस पुस्तक में प्रसाद के इस गुण को भी रेखांकित करने का प्रयास किया है। 

पुस्तक- जयशंकर प्रसाद, महानता के आयानम, लेखक- करुणाशंकर उपाध्याय, प्रकाशक- राधाकृष्ण प्रकाशन,नई दिल्ली, मूल्य- रु. 1495

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संस्कृत काव्यशास्त्र के अध्येता राधावल्लभ त्रिपाठी का मानना है कि साहित्य का उत्स जीवन है। कविता और उसकी व्याख्या के सिद्धांतों के मूल में लोक और जीवन है। इसलिए वो कहते हैं कि जीवन में रस है, रीति है, वक्रोक्ति है तो ये सारे तत्व कविता में भी हैं। अपनी पुस्तक भारतीय साहित्यशास्त्र की नई रूपरेखा में त्रिपाठी संस्कृत काव्यशास्त्र की प्राचीन परंपरा का परीक्षण करते हैं। साथ ही भारतीय काव्यशास्त्र के संदर्भों से वैश्विक साहित्य के मूल्यांकन की एक पीठिका भी तैयार करते हैं। इसमें साहित्य की उपादेयता के साथ रस और अलंकार का भी विवेचन है।

पुस्तक- भारतीय साहित्यशास्त्र की नई रूपरेखा, लेखक- राधावल्लभ त्रिपाठी, प्रकाशक- सामयिक बुक्स, नई दिल्ली, मूल्य- रु. 895

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नाम और कवर के चित्रों से ये लग सकता है कि ये फिल्मी पुस्तक है। दरअसल ये पुस्तक एक साहित्यिक कृति के फिल्म बनने की बेहद दिलचस्प कहानी है। ‘दो गुलफामों की तीसरी कसम’ नाम की इस पुस्तक के लेखक हैं अनंत। उन्होंने इस पुस्तक में बहुत ही रोचक अंदाज में फणीश्वर नाथ रेणु की कृति ‘मारे गए गुलफाम अर्थात तीसरी कसम’ के पात्रों के चयन पर लिखा है। गाड़ीवान हिरामन और नर्तकी हीराबाई की भूमिका निभाने वाले कलाकार से लेकर फिल्म के निर्देशक चुनने की रोचक कहानी है, जिसको अनंत ने सधे अंदाज में लिखा है। 

पुस्तक- दो गुलफामों की तीसरी कसम, लेखक- अनंत, प्रकाशक- कीकट प्रकाशन, पटना, मूल्य- रु 650 

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कश्मीर साहित्य और संस्कृति को लेकर बेहद समृद्ध रहा है। भारत की इस भूमि पर ऐसे ऐसे दार्शनिक, कवि और लेखक हुए हैं जिन्होंने भारतीय प्रज्ञा को अपनी लेखनी से नई ऊंचाई दी। कश्मीरी काव्य में रामकथा, कश्मीर के कृष्णभक्त कवि परमानंद, कश्मीर की प्रसिद्ध कवयित्री अलखेश्वरी रूपभवानी और हिंदी और कश्मीरी के अंतर्संबंधों पर केंद्रित एक पुस्तक आई, कश्मीर साहित्य और संस्कृति। इसमें कश्मीरी साहित्य के अलावा वहां की संस्कृति पर भी लेखक शिबन कृष्ण रैणा ने प्रकाश डाला है। कश्मीरी नववर्ष नवरेह से लेकर कश्मीरी शिवरात्रि के बारे में विस्तार से लिखा गया है। कश्मीर की संस्कृति और साहित्य को जानने के लिए यह उपयोगी पुस्तक है। 

पुस्तक- कश्मीर, साहित्य और संस्कृति, लेखक- शिबन कृष्ण रैणा, प्रकाशक- लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, मूल्य – रु 199

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स्वाधीनता के अमृत महोत्व वर्ष में कई गुमनाम नायकों या कम ज्ञात नायकों पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुई। ऐसी ही एक पुस्तक है महाराणा, सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध । इस पुस्तक में लेखक ने मेवाड़ के योद्धाओं की वीरगाथा को कमलबद्ध किया है। लेखक ने मुस्लिम आक्रांताओं से लोहा लेनेवाले और हिंदू समाज की रक्षा करनेवाले मेवाड़ के शूरवीरों और जौहर की ज्वाला में अपने को होम करनेवाली रानियों के बारे में लिखते हुए लेखक सत्य को भी उद्घाटित करते चलते हैं। 

पुस्तक- महाराणा,सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध, लेखक- ओमेन्द्र रत्नू, प्रकाशक- प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, मूल्य- रु 500     


Saturday, May 21, 2022

भारत के भविष्य का उत्सव


फ्रांस में आयोजित विश्व प्रसिद्ध कान फिल्म फेस्टिवल में हिंदी के कालजयी कवि जयशंकर प्रसाद की कविता।  यह सोचना या कल्पना करना थोड़ा कठिन था लेकिन फेस्टिवल के इस संस्करण में ये हुआ। इंडिया फोरम के एक कार्यक्रम में अभिनेत्री वाणी त्रिपाठी टिक्कू ने जयशंकर प्रसाद की कविता की पंक्तियों से एक चर्चा सत्र का समापन किया। जब वाणी ने जयशंकर प्रसाद की कविता की पंक्तियां, हिमाद्री तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयं प्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती, अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो-बढे चलो, सुनाई तो हाल तालियों से गूंज उठा। वाणी ने ‘बढ़े चलो’ से भारतीय दर्शन को जोड़कर आगे बढ़ने की बात कही। कान फिल्म फेस्टिवल के दौरान हिंदी के कई वाक्य और मुहावरे गूंजे। सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने इंडिया फोरम के मुख्य मंच से अपनी बात ही हिंदी गीत ‘है प्रीत जहां की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूं, भारत का रहनेवाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं’ से आरंभ की। गीतकार और लेखक प्रसून जोशी ने भी भारत की रचनात्मकता को ‘बेचैन सपने’ जैसे पद से जोड़ा और कुछ कर गुजरने की बात की। लगभग इसी समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वडोदरा के युवा शिविर को संबोदित कर रहे थे। उन्होंने भी कुछ इसी तरह की बात की। उन्होंने भारत को दुनिया की नई उम्मीद बताते हुए कहा था कि कोरोनाकाल में संकट के बीच दुनिया को वैक्सीन और दवाईयां पहुंचाने से लेकर बिखरी हुई सप्लाई चेन के बीच आत्मनिर्भर भारत की उम्मीद तक, वैश्विक अशांति और संघर्षों के बीच शांति के लिए एक सामर्थ्यवान राष्ट्र की भूमिका तक, भारत आज दुनिया की नई उम्मीद है। ऐसे वक्त में जब देश में कुछ राजनीतिज्ञ हिंदी और भाषा को लेकर राजनीति कर रहे हों तो वैश्विक मंच पर भारत के गौरव को, भारतीय दर्शन को, भारत के युवाओं के सपनों को हिंदी में अभिव्यक्त करना न सिर्फ हिंदी बल्कि भारतीय भाषाओं का भी सम्मान है। वोट की राजनीति के लिए भाषा को हथियार बनाकर समाज को बांटने की जुगत में लगे नेताओं को ये बात समझनी होगी कि भारत की आकांक्षाओं को  वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए वैश्विक मंचों पर भारतीय भाषा में बात करनी होगी। हिंदी के लोगों को भी इस बात का ध्यान रखना होगा कि हिंदी की उन्नति का रास्ता भी भारतीय भाषाओं के आंगन से होकर जाता है। इस बार कान फिल्म महोत्सव में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने इस सोच को पूरी दुनिया के सामने रखा। यह अनायास नहीं था कि मंत्री अनुराग ठाकुर जब भारतीय प्रतिनिधिमंडल के साथ रेड कार्पेट पर चल रहे थे तो उनकी शेरवानी के बटन पर हिंदी, मराठी, गुजराती समेत अन्य भारतीय भाषाओं में भारत लिखा था। 

भारतीय फिल्मों को वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान को गाढ़ा करना है तो उसको भारत की कहानियों पर ध्यान देना होगा। अभिनेता माधवन ने ठीक कहा कि उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश तक में भारतीय समाज के नायकों की, उनकी सफलताओं की कहानियां बिखरी हैं। उन कहानियों पर फिल्में बनाई जाएं तो भारतीय फिल्मों की व्याप्ति पूरी दुनिया में होगी। आर्यभट्ट से लेकर सुंदर पिचाई तक भारतीयों की सफलता की कहानी पूरी दुनिया को बताने की जरूरत है। माधवन ने इसरो के वैज्ञानिक नंबी नारायणन की जिंदगी पर आधारित फिल्म राकेट्री, द नंबी इफेक्ट बनाई है जिसका प्रदर्शन कान में हुआ। ये फिल्म हिंदी, तमिल, तेलुगू समेत कई भारतीय भाषाओं में बनाई गई है। वैज्ञानिकों और तकनीक के महारथियों के जीवन पर बनी फिल्मों में अलग-अलग देशों के दर्शकों की रुचि इस वजह से संभव है कि उनके कार्य को कई देश के लोग जानते हैं। आज अगर गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई और माइक्रोसाफ्ट के सत्य नडेला की सफलता की कहानी को फिल्मों में चित्रित किया जाता है तो वो न केवल दुनिया के युवाओं को आकर्षित करेगी बल्कि भारत के गौरव को भी दुनिया में स्थापित कर सकेगी। आज अगर कोई फिल्मकार कोरोनाकाल में भारत की महामारी से लड़ने की जिजीविषा को केंद्र में रखकर फिल्म बनाता है तो पूरी दुनिया उसको ध्यान से देखेगी। कोरोनाकाल में जिस तरह से भय का वातावरण बना था और उस वातावरण में भारत ने वैक्सीन बनाया। भयंकर भय के उस माहौल में इस विशाल देश में वैक्सीन को अलग अलग राज्यों तक पहुंचाना और करोड़ों लोगों का टीकाकरण कराना किसी थ्रिलर से कम नहीं है। 

यह भी एक सुखद संयोग है कि कान फिल्म महोत्सव अपनी स्थापना के पचहत्तरवें साल में है, भारत अपनी स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है और भारत और फ्रांस के राजनयिक संबंध के भी 75 साल हो रहे हैं। इस संयोग को कान फिल्म फिल्म फेस्टिवल ने उत्साह के साथ समरोहपूर्वक मनाने का निर्णय लिया। भारत को फेस्टिवल के दौरान सम्मानित देश (कंट्री आफ आनर) का दर्जा दिया गया। ये पहली बार हो रहा है कि फिल्म फेस्टिवल के दौरान किसी भी देश को सम्मानित देश के तौर पर आमंत्रित किया गया है। कान फिल्म फेस्टिवल में चेतन आनंद की 1946 की फिल्म ‘नीचा नगर’ को सम्मानित किया जा चुका है, सत्यजित राय की फिल्म पाथेर पंचाली को भी । 2013 में अमिताभ बच्चन और लियेनार्दो द कैप्रियो ने संयुक्त रूप से कान फिल्म फेस्टिवल के औपचारिक शुरुआत की घोषणा की थी। भारत के फिल्मकार समय समय पर कान फिल्म फोस्टिवल की जूरी में नामित होते रहे हैं। अब कान फिल्म फेस्टिवल ने भारत की फिल्मों को,यहां की कहानियों को लेकर विशेष रुचि दिखाई है। कान फिल्म फेस्टिवल में भारतीय फिल्मों और फिल्मकारों को इतना महत्व मिलना ये साबित करता है कि पूरी दुनिया भारतीय मनोरंजन जगत को बहुत संजीदगी से देख रही है। मशहूर फिल्मकार और भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान, पुणे के चेयरमैन शेखर कपूर ने कान फिल्म फेस्टिवल के मंच से कहा कि ये भविष्य का उत्सव है। 

अब जब पूरी दुनिया भारतीय फिल्मों की ओर एक उम्मीद भरी नजरों से देख रही है तो भारतीय फिल्मकारों खासतौर पर हिंदी के फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों के सामने उन उम्मीदों पर खरा उतरने की चुनौती है। ऊलजलूल कहानियों से आगे जाकर, बेवजह की मारधाड़ और यौनिकता से आगे जाकर भारत के गौरव को स्थापित करनेवाली कहानियों को लेकर फिल्में बनानी होंगी। फिल्मकारों के लिए मुनाफा पहली प्राथमिकता है, होनी भी चाहिए लेकिन सिर्फ मुनाफे के लिए फिल्म बनाकर इस कला को समृद्ध नहीं किया जा सकता है। कला की उत्कृष्टता को बरकरार रखकर भी मुनाफा कमाया जा सकता है। पूर्व में कई फिल्मकारों ने ऐसा किया भी है। फिल्म ‘रंग दे बसंती’ और ‘तारे जमीं पर’ आदि का उदाहरण दिया जा सकता है। राजमौली ने अपनी फिल्मों में साबित किया है कि कला की भव्यता से भी जमकर पैसा कमाया जा सकता है। इस काम में राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम की महती भूमिका हो सकती है। भारत सरकार की इस संस्था को आगे आकर उन फिल्मकारों की पहचान करनी होगी जो भारतीय भूभाग पर बिखरी कहानियों की खोज करें। साथ ही उन फिल्मकारों को चिन्हित करें जो इन कहानियों पर उत्कृष्ट फिल्में बनाकर दर्शकों के सामने पेश कर सकें। इसके लिए आवश्यक है कि भारतीय फिल्म विकास निगम के पुनर्गठन के कार्य में तेजी लाई जाए। इसको अफसरशाही और लालफीताशाही की जकड़न से मुक्त किया जाए। फिल्म की समझ रखनेवाले, भारतीय कहानियों को, भारतीय भाषाओं में समझने और उसको भारतीय भाषाओं में ही अभिव्यक्त करनेवालों की भूमिका बढ़ाई जाए। अगर ऐसा हो पाता है तो न केवल भारतीय फिल्मों का भला होगा बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया जिस ‘नई उम्मीद’ की बात कर रहे हैं वो भारतीय फिल्म जगत में भी साकार हो सकेगा। 


Sunday, May 22, 2016

शब्दों के संरक्षण की पहल की दरकार

अभी हाल ही में एक बार फिर से एक अंग्रेजी शब्दकोश ने उन शब्दों की सूची जारी की है जो उन्होंने हिंदी समेत विश्व की दूसरी भाषाओं से लेकर अंग्रेजी में मान्यता दी हैं । यह अंग्रेजी का लचीलापन है जो उसको दूसरी भाषा के शब्दों को अपनाने में मदद करती है । अंग्रेजी जब इन शब्दों को गले लगाती है तो वो अपने शब्दों को छोड़ती नहीं है बल्कि उसको संजोकर रखते हुए अपने दायरे का विस्तार करती है । हिंदी में इससे उलट स्थिति दिखाई देती है । हिंदी की ताकत स्थानीय बोलियों के शब्द भी हैं । अभी हाल ही में मैं बिहार के अंग जनपद में बोले जानेवाले शब्दों को लेकर विचार कर रहा था तो कई ऐसे शब्द मिले जो अब वहां की स्थानीय बोली, अंगिका, से भी गायब हो रहे हैं । उदाहरण के तौर पर वहां आटा को चिकसा कहा जाता था, रोटी को मांड़ो, झोला को धोकरा, पॉकेट को जेबी, बच्चों को बुतरू, नवजात शिशु को फुलवा, दुल्हन को कनियां बुलाया जाता था । बदलते वक्त के साथ ये सारे शब्द प्रचलन से गायब होते चले गए । कुछ योगदान आधुनिक बनने की मानसिकता तो कुछ टीवी के घर घर में पहुंचने और बच्चों की उसकी भाषा अपनाने से हुई है । यह बहुत स्वाभाविक है कि शब्द प्रचलन से गायब होते हैं । हिंदी में भी कई शब्द है जो प्रचलन से गायब हो रहे हैं- जैसे सरिता, जल, पवन आदि, लेकिन चिंता तब होती है प्रचलन से हटने के साथ साथ वो बोलियों और भाषा से गायब भी हो जाती है । भाषा और बोलियों के संरक्षण के लिए हर स्तर पर गंभीर कोशिश की जानी चाहिए । सरकारें अपनी गति से ये काम करती हैं लेकिन वो गति भाषा और बोलियों के शब्द संरक्षण के लिए बहुत धीमी है । यह काम पत्रकारिता और साहित्य में होना आवश्यक है क्योंकि ये दोनों विधाएं आम आदमी के बोलचाल को गहरे तक प्रभावित करती हैं । बोलचाल में शब्दों का प्रचलन संरक्षण का एक बेहतर विकल्प है । पत्रकारिता खासकर टीवी पत्रकारिता में आसान शब्दों पर जोर दिया जाता है । वाक्यों को और शब्दों को आसान बनाने के चक्कर में बहुधा अंग्रेजी के वैसे शब्दों का प्रयोग भी हो जाता है जो अनपेक्षित है । अखबारों में भी अंग्रेजी के इस तरह के शब्दों का प्रयोग धड़ल्ले से शुरू हो गया है । पिछले दिनों भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने सात हिंदी अखबारों का कई दिनों तक अध्ययन किया और फिर उसके आधार पर पंद्रह हजार सात सौ सैंतीस अंग्रेजी के शब्दों को चिन्हित किया जो अखबारों में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे हैं । अंग्रेजी के इन शब्दों का पांच श्रेणियों में वर्गीकरण किया गया । विश्वविद्यालय ने एक ऐसी श्रेणी बनाई है जिसमें अंग्रेजी के वैसे शब्दों को रखा गया है जिसका उपयोग बाजिब माना गया । लेकिन इस सर्वेक्षण की सबसे बड़ी खामी ये रही कि इसने एक वैसे अखबार को शामिल नहीं किया जो सबसे ज्यादा अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल करता है । बहरहाल हम बात हिंदी के शब्दों के संरक्षण की कर रहे थे ।
पत्रकारिता के बाद या यों कहें कि उससे पहले साहित्यक लेखन पर ये जिम्मेदारी आती है कि वो हिंदी के शब्दों की भाषा और बोलियों को बचाने का उपक्रम करे । इस संबंध में हमें जयशंकर प्रसाद का स्मरण होता है । हिंदी में भारतेंदु ने खड़ी बोली शुरू की जिसमें हिंदी और उर्दू के शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग होता था लेकिन जयशंकर प्रसाद ने अपनी रचना में देहाती शब्दों का जमकर प्रयोग किया । जयशंकर प्रसाद के निबंधों की एक किताब है – काव्य और कला तथा अन्य निबंध । इस किताब में जयशंकर प्रसाद ने जिस तरह की भाषा और शब्दों का प्रयोग किया है वो खड़ी बोली से बिल्कुल भिन्न है । जयशंकर प्रसाद की ये महत्वपूर्ण किताब है । प्रसाद ने उर्दू मिश्रित हिंदी को छोड़कर एक नई भाषा गढ़ी और ये उनका हिंदी पर बड़ा उपकार है । उर्दू में जो लालित्य है वही लालित्य उन्होंने हिंदी के शब्दों में पैदा की । खड़ी बोली के पैरोकारों ने उस वक्त प्रसाद के संग्रह आंसू को दरकिनार कर उनका उपहास किया था । आंसू में जो उनकी कविताएं हैं उसमें शायरी का आनंद मिलता है । हिंदी के वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी इस किताब को हिंदी में शायरी की पहली किताब कहते हैं । हिंदी के कई कथाकारों ने स्थानीयता के नाम पर बोलियों को अपनी रचना में स्थान दिया लेकिन उत्तर आधुनिक होने के चक्कर में बोली के शब्दों का अपेक्षित प्रयोग नहीं कर पाए और उसको हिंदी के प्रचलित शब्दों से विस्थापित कर दिया । जिस कालखंड को अपनी कृति में दर्शाते हैं उस काल-खंड में बोली जाने वाली भाषा और उसके शब्दों को बहुधा छोड़ते नजर आते हैं । इसका नतीजा यह होता है कि बोलियों के शब्द छूटते चले जाते हैं और पहले प्रचलन से और फिर स्मृति से भी गायब हो जाते हैं । हिंदी में जरूरत इस बात की भी है कि कोई लेखक जयशंकर प्रसाद जैसा साहस दिखाएं और अपने मौजूदा दौर की भाषा की धारा के विपरीत तैरने की हिम्मत करे और करुणा कल्पित ह्रदय में क्यों विकल रागिनी बहती जैसी रूमानी पंक्ति लिख सके । जयशंकर प्रसाद ना तो खड़ी बोली से प्रभावित हुए थे और ना ही गालिब या रवीन्द्रनाथ टैगोर की भाषा से जबकि उस दौर के साहित्य लेखन पर इन दोनों का काफी असर दिखाई देता है । इस वक्त साहित्य सृजन में भाषा के साथ उस तरह की ठिठोली नहीं दिखाई देती है जैसी कि होली में देवर अपनी भाभी के साथ करता है । भाषा के साथ जब लेखक ठिठोली करेगा तो उसको अपने शब्दों से खेलना होगा । समकालीन साहित्य सृजन में हो ये रहा है कि कथ्य तो एक जैसे हैं ही भाषा भी लगभग समान होती जा रही है । कभी कभार किसी कवि की कविता में या किसी कहानी में इस तरह के शब्दों का प्रयोग होता है जो भाषा को तो चमका ही देता है बिसरते जा रहे शब्दों को जीवन भी देता है । शब्दों को बचाने में साहित्यकारों की बड़ी भूमिका है । इस भूमिका का निर्वहन गंभीरता के साथ करना चाहिए । आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपनी किताब कबीर में में लिखा है कि कबीर वाणी के डिक्टेटर थे और वो चाहते थे वो करते थे और भाषा में वो हिम्मत नहीं थी कि उनको रोक सके । क्या आज शब्दों को बचाने के लिए हिंदी को कबीर जैसा एक भाषा का डिक्टेटर चाहिए ।