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Saturday, August 22, 2026

श्रीराम की छवि की व्याख्या का खेल


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किला की प्राचीर से दिमागी नक्सल शब्द युग्म का प्रयोग किया। तमाम दिमागी नक्सल बिलबिलाने लगे। समाज को पता लगाने के लिए श्रम नहीं करना पड़ा और उनकी पहचान हो गई। यह ठीक है कि समाज में दिमागी नक्सलियों की उपस्थिति है, पर दिमागी नक्सल व्यक्ति से अधिक प्रवृत्ति है। ये प्रवृत्ति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलती है। दिमागी नक्सली जैसी प्रवृत्ति समय के अनुसार अपने में बदलाव करके समाज को भ्रमित करने का कार्य भी करती है। प्रश्न उठता है कि क्या ये अनायास है कि प्रगतिशील और जनवादियों को अब प्रभु श्रीराम की चिंता होने लगी है। समाज में राम-राम कहकर अभिवादन करने की जगह जयश्रीराम से अभिवादन करना उनको राजनीतिक लगने लगा है। राम-राम और जयश्रीराम में उनको अंतर नजर आता है। राम-राम में कोमलता और जयश्रीराम में आक्रामकता। इतना ही नहीं समाजवाद की डोर थामे जनवाद की ध्वजा लहरानेवाले एक प्राध्यापक आलोचक तो कबीर और गांधी के राम, तुलसीदास के राम और सत्ताधारी दल के राम में अंतर दिखाने की कोशिश करते हैं। अयोध्या के भव्य और नव्य मंदिर में स्थापित श्रीराम की अलग छवि ढूंढने की कोशिश भी होती है। ढूंढते ही नहीं हैं बल्कि प्रभु श्रीराम की एक राजनीतिक छवि गाढा करने का प्रयत्न करते हैं। अच्छी बात है कि समाजवादी/जनवादी और वामपंथी प्रभु श्रीराम की बात तो करने लगे हैं। यह इनका ह्रदय परिवर्तन है या समाज को राम के नाम पर बांटने का प्रयास। इसको देखना होगा। वो राम की राजनीतिक छवि गढ़ने का प्रयत्न नहीं करते बल्कि राम के इमाम-ए-हिंद कहे जाने की बात को दोहराते हुए एक अलग विमर्श खड़ा करना चाहते हैं। ये भूल जाते हैं कि लोक में प्रभु श्रीराम की जो छवि व्याप्त है उसको बदलने या उसको प्रश्नांकित करने का प्रयास सफल हो ही नहीं सकता है। 

एक वामपंथी प्राध्यापक आलोचक प्रभु श्रीराम की छवियों में अंतर खोज रहे हैं तो एक अन्य वामपंथी प्राध्यापक-आलोचक तुलसी को याद करते हुए उनकी पंक्तियों को व्याख्यायित करते हुए वर्तमान राजनीति से जोड़कर सामने रखने का प्रयास कर रहे हैं। तुलसी दास की पंक्तियों के आधार पर ये महोदय भी श्रीराम की वाल्मीकि की बनाई छवि, तुलसी की रचनाओं से बनती छवि और आज की राजनीति में उनकी छवि को अलग अलग देखने का प्रयत्न करते हैं। आलोचक महोदय कहते हैं, तुलसी ने जिस राम को गढ़ा था वे वाल्मीकि से भिन्न हैं और आज जिस राम का प्रचार है वो तुलसी के राम से भिन्न हैं। फतवेबाजी करके निकल जाते हैं अपनी अवधारणा के समर्थन में कोई मजबूत तर्क प्रस्तुत नहीं करते हैं। ये महोदय तुलसी की एक पंक्ति राज-नीति बिनु धन-बिनु धर्मा को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि इसमें तुलसी अपने समय में स्पष्ट कहते हैं कि राजनीति नीति-विहीन हो गई है और लोग अधर्म को अपना कर अमीर हो रहे हैं। साथ ही एक पंक्ति जड़ते हैं कि यह आज का भी यथार्थ है। प्रस्तुत ऐसे कर रहे हैं कि ऐसा हाल के दिनों में हो रहा है पहले ऐसा नहीं था। यही आलोचकीय बेईमानी है। इस तरह की कई पंक्तियों को उद्धत करके उसको आज का संदर्भ देने की कोशिश में भाईलोग लगे हुए हैं। तुलसीदास की पंक्तियों के साथ वामपंथी ऐसा पहली बार नहीं कर रहे हैं बल्कि पहले भी लगातार ऐसा करते हैं। महिलाओं और समाज के एक विशेष वर्ग को लेकर लिखी गई उनकी पंक्तियों के आधार पर तुलसीदास को कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है। 

तुलसीदास की बात करते हुए इन वामपंथियों को कबीर अवश्य याद आते हैं। कबीर को वो क्रांतिकारी सिद्ध करते रहे हैं । उनकी तुलना में तुलसी को परंपरावादी और दकियानूसी कहते हैं। कबीर को क्रांतिकारी और तुलसी को परंपरावादी दिखाने की होड़ में कुछ क्रांतिकारी लेखकों ने तुलसीदास को वर्णाश्रम व्यवस्था का पोषक, नारी और शूद्र विरोधी करार देकर उनकी जमकर आलोचना की। श्रीरामचरितमानस की एक पंक्ति को उठाकर तुलसीदास को कलंकित करने का प्रयास हुआ लेकिन उनकी कविताओं में उनकी रचित चौपाइयों में इतनी शक्ति है कि वो उनपर इन आलोचनाओं का कोई असर ही नहीं हुआ। वामपंथियों ने सुनियोजित तरीके से तुलसीदास की उन पंक्तियों को उठाया जिनसे उनकी छवि स्त्री विरोधी और वर्णाश्रम व्यवस्था के पोषक की बनती हो। तुलसीदास को स्त्री विरोधी करार देनेवाले श्रीरामचरितमानस में अन्यत्र स्त्रियों का जो वर्णन है उसकी ओर उनकी नजर नहीं जाती है। तुलसीदास लिखते हैं – कत विधि सृजीं नारि जग माहीं, पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं । इसी तरह अगर देखें तो श्रीरामचरितमानस में पुत्री की विदाई के प्रसंग में लिखा - बहुरि बहुरि भेटहिं महतारी, कहहिं बिरंची रचीं कत नारी। इतना ही नहीं तुलसी ये भी कहते हैं कि- रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा। इन पंक्तियों को आलोच्य पंक्ति के सामने रखकर तुलसीदास का मूल्यांकन किया जाना चाहिए । नारी के अलावा जब उनको शूद्रों का विरोधी कहा जाता है तब भी खास विचार के पोषक आलोचक उन पंक्तियों को भूल जाते हैं जहां वो रामराज्य की बात करते हुए सबकी बराबरी की बात करते हैं। तुलसी के रामराज्य में चारों वर्णों के सरयू नदी के तट पर साथ स्नान करने का वर्णन मिलता है । इस ओर क्रांतिकारी कामरेड लेखकों का ध्यान जाता नहीं है। चुलसी ने लिखा है– राजघाट सब बिधि सुंदर बर, मज्जहिं तहां बरन चारिउ नर। साहित्य में ये वामपंथी खेल तुलसीदास के अलावा प्रेमचंद और निराला के साथ भी खेला गया। प्रेमचंद और निराला दोनों लेखकों ने गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका कल्याण के विशेषांकों और अन्य अंकों में लेख लिखे। उनको ओझल कर दिया गया। नई पीढ़ी के पाठकों को इस बात का पता ही नहीं चलने दिया गया कि प्रेमंद और निकाला ने कल्याण में भी लिखा है। उनको वामपंथी बता दिया गया। ये पाठ्य पुस्चतों से लेकर शोध तक होता रहा। इसके आधार पर ही स्वयं को बौद्धिक भी कहने लगे। 

इस तरह की बौद्धिक बेइमानियों को किस कोष्ठक में रखना चाहिए ये तो पाठक तय कर लेंगे। पाठकों के सामने नहीं आने देने का जो षडयंत्र रचा गया और जिसको सरकारों की शक्ति के कारण अंजाम तक पहुंचाया गया उसको परिभाषित करने के लिए लाल किला की प्राचीर से बोला गया शब्द युग्म दिमागी नक्सल सटीक बैठता है। हिंदी समाज को इसपर आत्ममंथन करना चाहिए। वही तत्व अब श्रीराम को भी बांटकर समाज के सामने प्रस्तुत करने के चक्कर में लग गए हैं लेकिन इससे इतना तो हुआ कि प्रभु श्रीराम के अस्तित्व को नकार नहीं रहे हैं, उनको काल्पनिक नहीं बता रहे हैं। जब ये संगठित और सुनियोजित तरीके से प्रचारित किया जाने लगे और सबकी टिप्पणियों में एक साझा सूत्र दिखाई देने लगे तो समझ लीजिए कि साहित्य के बेईमान लोग इकट्ठा हो गए हैं और कुछ काल्पनिक अवधारणा को यथार्थ का रूप देने निकल पड़े हैं। पर इस बार ये भूल जा रहे हैं कि भारतीय समाज में श्रीराम को परिभाषित करके उनको किसी कोष्ठक में नहीं रखा जा सकता। सबके अपने अपने काम हैं उनको किसी परिभाषा की आवश्कता नहीं।   


Saturday, November 11, 2023

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का हिंदू मन


भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में पिछले दिनों भारतीय भाषाओं के अंतरसंबंध पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने का अवसर मिला। उस दौरान आचार्य रामचंद्र शुक्ल का अंग्रेजी में लिखा लेख हिंदी एंड द मुसलमान्स पर चर्चा हुई। उसी क्रम में रामचंद्र शुक्ल की तुलसी की भक्तिपरक और काव्य पद्धति को पढ़ने का मौका मिला। उसके बाद ऐसा प्रतीत हुआ कि रामचंद्र शुक्ल के साथ बाद के लेखकों ने न्याय नहीं किया। तुलसी काव्य की उनकी व्याख्या और उसके धार्मिक आधारों की विवेचना कम हुई। चर्चा इस बात की अधिक होती रही कि रामचंद्र शुक्ल ने तुलसी के सामने कबीर को याद नहीं किया। इतना ही नहीं कोशिश तो ये भी हुई कि तुलसी और कबीर को लेकर आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी को प्रतिद्वंदी की तरह पेश किया गया। रामचंद्र शुक्ल के तुलसी काव्य पर लिखे को आगे बढ़ाने का प्रयास न के बराबर हुआ। अगर शुक्ल के लेखन के समग्र आयामों पर अगर बात होती तो उनका हिंदू मन या सनातन धर्म में उनकी आस्था सामने आ जाती। ये बात वामपंथ में आस्था रखनेवाले लेखकों और आलोचकों को स्वीकार नहीं होता, लिहाजा इस तरह का प्रपंच रचा गया कि शुक्ल के लेखन के हिंदू पक्ष के बारे में बात ही न हो। यह कार्य निराला के साथ भी किया गया, प्रेमचंद के साथ भी किया गया और कल्याण पत्रिका में प्रकाशित उनके लेखों को हिंदी के नए पाठकों से दूर रखने का बौद्धिक षडयंत्र रचा गया। इस षडयंत्र की चर्चा आगे होगी लेकिन पहले देख लेते हैं कि शुक्ल जी ने क्या लिखा है। 

तुलसी की भक्ति पद्धति में आचार्य शुक्ल ने दिल खोलकर हिंदूओं और उनके धर्म प्रतीकों पर लिखा है। लेख के आरंभ में आचार्य शुक्ल कहते हैं कि देश में मुसलमान साम्राज्य के पूर्णतया प्रतिठित हो जाने पर वीरोत्साह के सम्यक संचार के लिए वह स्वतंत्र क्षेत्र न रह गया, देश का ध्यान अपने पुरुषार्थ और बल-पराक्रम की ओर से हटकर भगवान की शक्ति और दया-दाक्षिण्य की ओर गया। देश का वह नैराश्य काल था जिसमें भगवान के सिवा कोई सहारा नहीं दिखाई देता था। आचार्य शुक्ल ने आगे कहा कि सूर और तुलसी ने इसी भक्ति के सुधारस से सींचकर मुरझाते हुए हिंदू जीवन को फिर से हरा कर दिया। भगवान का हंसता खेलता रूप दिखाकर सूरदास ने हिंदू जाति की नैराश्यजनित खिन्नता हटाई जिससे जीवन में प्रफुल्लता आ गई। पीछे तुलसीदासजी ने भगवान का लोक-व्यापारव्यापी मंगलमय रूप दिखाकर आशा और शक्ति का अपूर्व संचार किया। अब हिंदू जाति निराश नहीं है। आचार्य शुक्ल इतने पर ही नहीं रुकते हैं वो आगे कहते हैं कि सूरदास की दिव्य वाणी का मंजु घोष घर-घर क्या, एक एक हिंदू के ह्रदय तक पहुंच गया। यही वाणी हिंदू जाति को नया जीवनदान दे सकती थी। इसके बाद वो तुलसी के रामचरित की जीवनव्यापकता पर आते हैं और कहते हैं कि राम के चरित से तुलसी की जो वाणी निकली उसने राजा, रंक, धनी, दरिद्र, मूर्ख, पंडित सबके ह्रदय और कंठ में बसा दिया। गोस्वामी जी ने समस्त हिंदू जीवन को राममय कर दिया।

आचार्य शुक्ल ने सूफियों के ईश्वर को केवल अपने मन के भीतर समझने और ढूढ़ने की अवधारणा पर भी प्रहार किया। उन्होंने कहा कि भारतीय परपंरा का भक्त अपने उपास्य को बाहर लोक के बीच प्रतिष्ठित करके देखता है, अपने ह्रदय के कोने में नहीं। गोस्वामी जी भी ललकार कर कहते हैं कि भीतर ही क्यों देखें, बाहर क्यों न देखें- अन्तर्जामिहु तें बड़ बारहजामी हैं राम जो नाम लिए तें। पैज परे प्रह्लादहु को प्रगटे प्रभु पाहन तें, न हिए तें। वो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि अगर भगवान को देखना है तो उन्हें व्यक्त जगत के संबंध से देखना चाहिए। वो यह मानते थे कि भगवान को मन के भीतर देखना योगमार्ग का सिद्धांत है भक्ति मार्ग का नहीं। सूफियों की इस अवधारणा के बाद गोस्वामी जी ने उपासना या भक्ति का केवल कर्म और ज्ञान के साथ ही सामंजस्य स्थापित नहीं किया, बल्कि भिन्न भिन्न उपास्य देवों के कारण जो जो भेद दिखाई पड़ते थे, उनका भी एक में पर्यवसान किया। इसी एक बात से ये अनुमान हो सकता है कि उनका प्रभाव हिंदू समाज की रक्षा के लिए ,उसके स्वरूप को रखने के लिए कितने महत्व का था। तुलसी के इस महत्व को बाद के दिनों में बहुत ही कम रेखांकित किया गया। आचार्य शुक्ल ने तुलसी के काव्य को लेकर इस प्रकार के जो विचार प्रस्तुत किए थे उसको भी दबाने का प्रयास किया गया। धर्म और जातीयता के समन्वय पर भी आचार्य शुक्ल ने विचार किया। उनका मानना था कि तुलसी ने अपने काव्य में जो रामरसायन तैयार किया जिसके सेवन से हिंदू जाति विदेशी मतों के आक्रमणों से बहुत कुछ रक्षित रही और अपने जातीय स्वरूप को दृढ़ता से पकड़े रही। उनका मानना था कि सारा हिंदू जीवन राममय हो गया था। वो तो यहां तक कह गए कि राम के बिना हिंदू जीवन नीरस है, फीका है, यही रामरस उनका स्वाद बनाए रहा और बनाए रहेगा। राम का मुंह देख हिंदी जनता का इतना बड़ा भाग अपने धर्म और जाति के घेरे में पड़ा रहा। न उसे तलवार हटा सकी, न धनमान का लोभ, न उपदेशों की तड़क भड़क। जिन राम को जनता जीवन के प्रत्येक स्थिति में देखती आई, उन्हें छोड़ना अपने प्रियजन को छोड़ने से कम कष्टकर न था। आचार्य शुक्ल ने बहुत बोल्ड तरीके से अपनी बात कही थी कि हमने चौड़ी मोहरी का पायजामा पहना, आदाब अर्ज किया पर राम-राम न छोड़ा। कोट पतलून पहनकर बाहर ‘डैम नानसेंस’ कहते हैं पर घर आते ही राम-राम।

अब आते हैं बौद्धिक षडयंत्र पर जहां कि रामचंद्र शुक्ल के हिंदू मन को हिंदी पाठकों से छिपाने का प्रयत्न हुआ। यशपाल से लेकर प्रकाशचंद्र गुप्त तक ने शुक्ल जी को सामंतवाद का विरोधी और जनवादियों से सहानुभूति रखनेवाला बताया। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की त्रैमासिक पत्रिका बहुवचन के प्रवेशांक( अक्तूबर-दिसंबर 1999) में सुधीश पचौरी का एक लेख प्रकाशित हुआ था, रामचंद्र शुक्ल की धर्म भूमि। विखंडनवाद के औजारों से लैस होकर सुधीश पचौरी ने रामचंद्र शुक्ल को एक धार्मिक विमर्शकार करार दिया था। लेख जब आगे बढ़ता है तो वो शुक्ल जी को एक हिंदू विमर्शकार के रूप में रेखांकित करते हैं और कहते हैं कि वो एक हिंदू विमर्शकार हैं जो अपने समय के प्रतिबिंब तो हैं ही अपने समय को सत्ता विमर्श में बदलनेवाले भी हैं और हिंदी आलोचना अभी तक उनके विमर्श से बाहर नहीं निकली है। इस लेख में सुधीश पचौरी ने शुक्ल जी की आलोचना करते हुए उनको एकार्थवादी हिंदुत्व के औजार बनते देखते हैं। सुधीश पचौरी की स्थापनाओं पर तब काफी विवाद हुआ था। यह साहित्यिक विमर्श का विषय हो सकता है लेकिन शुक्ल जी ने जिस प्रकार से हिंदी आलोचना की अस्मिता को तुलसी और सूर के काव्य के माध्यम से राम और कृष्ण से जोड़ा वो उनके हिंदू मन को सामने लाता है। आचार्य शुक्ल ने उस हिंदू मन को पकड़ा और रेखांकित किया है जो अपने अतीत को याद रखते हुए अपनी ज्ञानदृष्टि को समायनुकूल बनाने में नहीं हिचकता है। शुक्ल जी ने जर्मन वैज्ञानिक हैकल की एक पुस्तक का अनुवाद किया था जो ‘विश्वप्रपंच’ के नाम से प्रकाशित है उसकी भूमिका में उनकी समयानुकूल दृष्टि दिखती है। अपनी परंपरा और जड़ों से जुड़े रहकर भी आधुनिक बने रहने की। कहना न होगा कि शुक्ल हिंदी आलोचना के ऐसे हिरामन हैं जिनकी वैश्विक दृष्टि ने भारतीय साहित्य को समृद्ध किया। जरूरत इस बात की है कि उनके हिंदू मन पर समग्रता में विमर्श हो। 

Wednesday, May 31, 2017

तुलसी और कबीर के निकष अलग

क्या यह संभव है कि एक कालखंड में या अलग अलग कालखंड में दो या तीन कवि महान हो सकते हैं? क्या एक कवि को दूसरे कवि के निकष पर कसना और फिर उनका मूल्यांकन करना उचित है ? एक कवि के पदों में से दो एक पदों को उठाकर उसको प्रचारित कर देना और दूसरे कवि के चंद पदों के आधार पर उनको क्रांतिकारी ठहरा देना कितना उचित है? पर हमारे देश के दो महान कवियों के साथ ये सब किया गया। तुलसीदास को नीचा दिखाने के लिए कबीर को उठाने का सुनियोजित खेल खेला गया। उपर जितने भी सवाल उठाए गए हैं अगर हम उनके उत्तर ढूंढते हैं तो यह खेल साफ हो जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी पुस्तक में तुलसीदास को लेकर अपनी मान्यताओं को स्थापित किया था। जब बीसबीं शताब्दी में हजारी प्रसाद द्विवेदी आए तो उनके सामने यह चुनौती थी कि वो खुद आचार्य शुक्ल से अलग दृष्टिवाले आलोचक के तौर पर खुद को स्थापित करें। खुद को स्थापित करने के लिए यह आवश्यक था कि वो कोई नई स्थापना लेकर आते या पहले से चली आ रही स्थापनाओं को चुनौती देते । द्विवेदी जी के सामने शुक्ल जी की आलोचना थी जिसमें उन्होंने तुलसी को स्थापित किया था। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने माहौल के हिसाब से कबीर की व्याख्या की और उनको क्रांतिकारी कवि सिद्ध किया। इस क्रम में उन्होंने तुलसीदास को प्रत्यक्ष रूप से कमतर आंकने की कोशिश नहीं की, लेकिन तुलसीदास पर गंभीरता से स्वतंत्र लेखन नहीं करके उनको उपेक्षित रखा । कालांतर में हिंदी साहित्य में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्यों का साहित्य पर बोलबाला रहा और उन सब लोगों ने द्विवेदी जी की स्थपना को मजबूत करने के लिए कबीर को श्रेष्ठ दिखाने के लिए अलग अलग तरह से लेखन किया और तुलसी को उपेक्षित ही रहने दिया आ फिर जहां मौका मिला उनको नीचा दिखाने का काम किया। विनांद कैलवर्त ने अपनी पुस्तक- ‘द मिलेनियम कबीर वाणी, अ कलेक्शन आफ पदाज़’ में साफ तौर पर लिखा भी है- ‘निहित स्वार्थों ने कबीर को बहुत जल्दी हथिया लिया। सत्रहवीं सदी में गोरखपंथियों और रामानंदियों से लेकर बीसीं शताब्दी में हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे ब्राह्मणों तथा अन्य सामाजिक समूहों तक ने कबीर का इस्तेमाल अपने अपने विचारधारात्मक उद्देश्यों और फायदों के लिए किया।‘ संभव है कि विनांद कैलवर्त की स्थापनाएं अतिरेकी हों लेकिन इस बात से कहां इनकार किया जा सकता है कि कबीर का इस्तेमाल ‘विचारधारात्मक उद्देश्यों और फायदों के लिए किया गया’।
कबीर को क्रांतिकारी दिखाने और तुलसी को परंपरावादी साबित करने की होड़ में कुछ क्रांतिकारी लेखकों ने तुलसीदास को वर्णाश्रम व्यवस्था का पोषक, नारी और शूद्र विरोधी करार देकर उनकी घोर अवमानना की। रामचरित मानस की एक पंक्ति ‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी’ को पकड़कर तुलसी को कलंकित करने की कुत्सित कोशिश की गई। तुलसीदास की कविता की व्याख्या करनेवाले आलोचक या लेखक बहुधा बहुत ही सुनियोजित तरीके से तुलसीदास के उन पदों को प्रमुखता से उठाते हैं जिनसे उनकी छवि स्त्री विरोधी और वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थक की बनती है। तुलसीदास को स्त्री विरोधी करार देनेवाले मानस में अन्यत्र स्त्रियों का जो वर्णन है उसकी ओर देखते ही नहीं हैं। एक प्रसंग में तुलसीदास कहते हैं – कत विधि सृजीं नारि जग माहीं, पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं । इसी तरह अगर देखें तो मानस में पुत्री की विदाई के समय के प्रसंग में कहा गया है- बहुरि बहुरि भेटहिं महतारी, कहहिं बिरंची रचीं कत नारी। इसके अलावा तुलसी साफ तौर पर कहते हैं- रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा। इन पदों को आलोच्य पद के सामने रखकर तुलसीदास का मूल्यांकन किया जाना चाहिए । नारी के अलावा जब उनको शूद्रों का विरोधी कहा जाता है तब भी खास विचार के पोषक आलोचक तुलसी के उन पदों को भूल जाते हैं जहां वो रामराज्य की बात करते हुए सबकी बराबरी की बात करते हैं। तुलसी जब रामराज्य की बात करते हैं तो वो चारों वर्णों के सरयू नदी के तट पर साथ स्नान करने का वर्णन करते हैं जिसकी ओर क्रांतिकारी लेखकों का ध्यान जाता नहीं है। वो कहते हैं – राजघाट सब बिधि सुंदर बर, मज्जहिं तहॉं बरन चारिउ नर। यहां यह खेल तुलसीदास तक ही नहीं चला बल्कि निराला को लेकर भी इस तरह का खेल खेला गया। निराला ने कल्याण पत्रिका के भक्ति अंक से लेकर कई अन्य अंकों में जो लेख लिखे थे उनको ओझल कर दिया गया। नई पीढ़ी के पाठकों को इस बात का पता ही नहीं है कि भक्त निराला ने किस तरह की रचना की।

कबीर को ऊपर उठाने के खेल में जिस तरह से तुलसीदास की आलोचना की जा रही थी और जिस तरह से दोनों को सामने रखकर तुलनात्मक बातें हो रही थीं उसी क्रांतिकारी व्याख्या से उत्साहित होकर एक पत्रिका ने तुलसीदास को हिंदू समाज का पथभ्रष्टक साबित करने के लिए लेखों की एक श्रृंखला प्रकाशित की थी जो बाद मे पुस्तकाकार भी छपी। बावजूद इसके तुलसी की व्याप्ति भारतीय मानस से जरा भी नहीं डिगी। तुलसीदास के सामने कबीर को सोशल रिवोल्यूशनरी साबित करनेवाले यह भूल गए कि वे वेदांतवादी थे और वैष्णव होने की वजह से एकात्मवाद को बढ़ावा देते थे और सार्वजनिक जीवन में किसी भी तरह के आडंबर के खिलाफ थे। उन्होंने समाज मे व्याप्त आडंबर के खिलाफ चेतावनी के पद लिखे जिसको बार बार उछाल कर कबीर को क्रांति के संवाहक के तौर पर पेश किया गया। लेकिन जब राम उनके पदों में आते हैं तो उसको बिसरा दिया जाता है। वो राम को मानते रहे। राम का नाम कबीर के पदों में बार बार आता है – ‘राम मेरे पियू, मैं राम की बहुरिया हो या राम निरंजन न्यारा के, अंजन सकल पसारा। या फिर दुलहिन गावहूं मंगल चार, हम घरि आए हो राजा राम भरतार।‘ कबीर को राम से अलग करके देखने की गलती बार बार हुई या जानबूझकर की गई इस बारे में निश्चित तौर पर कुछ भी कहना मुश्किल है। वामपंथी लेखकों ने लगातार रामचरित मानस को धर्म से जोड़कर मूल्यांकन किया और कबीर को क्रांतिकारी समाज सुधारक और कुरीतियों पर प्रहार करनेवाले बताते रहे । यहां उनसे एक चूक हो गई। वो यह भूल गए कि किसी कवि की कृति को अगर धर्मग्रंथ का दर्जा हासिल हो जाए तो वो महान हो जाता है। आज रामचरित मानस की स्थिति क्या है, विचार करिए। लोग उसको मंदिरों में रखते हैं, उसकी पूजा होती है, जन्म मरण के समय उसका परायण होता है। एक कवि के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है। लेकिन वामपंथी बौद्धिकों को इससे घबराहट होने लगी और उन्होंने तुलसीदास को उनके विचारों के आधार पर खारिज करने की लगातार मुहिम चलाई। लेकिन तुलसीदास की कविताई में वो तेज है जिसने अपनी तमाम आलोचनाओं को अबतक धता बताते हुए अपनी लोकव्याप्ति का दायारा और बढ़ाया है।
दरअसल अगर हम देखें तो तुलसीदास के सृजन का जो कालखंड है उसमें भारतीय संस्कृति एक संक्रमण के दौर से गुजर रही थी । अपनी समृद्ध विरासत और संस्कृति के प्रति लोगों की निष्ठा कमजोर हो रही थी या कह सकत हैं कि लगभग खत्म सी होने लगी थी। एक के बाद एक लगातार हो रहे विदेशी आक्रमणों से देश जख्मी था। तुलसीदास के सामने एक कवि के रूप में चुनौती थी कि वो जनता को अपने लोक से जोड़ने वाली कोई रचना प्रस्तुत करें। यह अकारण नहीं है कि तुलसीदास जी ने रामचरित मानस की शुरुआत सरस्वती और गणेश वंदना से की- ‘वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि/ मंगलानां च कर्त्तरौ वन्दे वाणीविनायकौ।‘ तुलसीदास ने जब रामचरित मानस की रचना की तो उन्होंने एक आदर्श राज्य की अवधारणा को राम के माध्यम से प्रस्तुत किया, जिसे रामराज्य कहा गया। राम का चरित्र एक मर्यादा पुरुष के तौर पर पेश किया जहां वो न्याय के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। एक ऐसा राजा जिसकी प्राथमिकता में उसका राज्य उसके परिवार से पहले है। पत्नी के तौर पर जब सीता का चरित्र चित्रण किया तो एक ऐसी आदर्श पत्नी के तौर पर उसको अपनी रचना में पेश किया जो अपने पति के मान-सम्मान के लिए राजसी जीवन छोड़ने में देर नहीं लगाती। लोकोपवाद के छींटे पति पर ना पड़ें इसके लिए अग्निपरीक्षा देने को तैयार हो जाती है। पति के बनवास के वक्त उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलती है।  भाई हो तो लक्ष्मण और भरत जैसा जो आदर्श हैं। और तो और दुश्मन भी बनाया तो रावण को जो उद्भट विद्वान और शिव का उपासक था। तुलसीदास का जो समय था वो कबीर के समय से अलग था। तुलसीदास के सामने देश का सांस्कृतिक संकट था और वो उससे अपनी लेखनी के माध्यम से उस संकट से मुठभेड़ कर रहे थे। दूसरी तरफ कबीर समाज में व्याप्त कुरीतियों पर प्रहार कर रहे थे । इस तरह से देखें तो दोनों कवियों का निकष अलग था । तुलसीदास और कबीर की तुलना करने का उपक्रम ही गलत इरादे से किया गया था।
अस्सी के दशक में राम मंदिर का जब आंदोलन परवान चढ़ा तो हमारे वामपंथी आलोचक दिग्गजों ने राम को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिशें शुरू कर दीं । उन्होंने ऐसा ताना बाना बुना कि लोक में अभिवादन का जो सबसे लोकप्रिय तरीका था, राम-राम जी, उसको भी सांप्रदायिकता से जोड़ने की कोशिश की। यह अनायास नहीं हो सकता है कि हर हर महादेव कहनेवाले, या राधे राधे कहने वाले, या फिर जयश्री कृष्ण कहनेवाले सांप्रदायिक ना हों और जयश्री राम बोलनेवाले सांप्रदायिक हों। जब इन लोगों ने राम को ही संदेहास्पद बनाने की कोशिश की तो उसकी आंच से तुलसीदास भी बच ना सके। तुलसी को नीचा दिखाने के लिए इन लोगों ने कबीर का सहारा लिया। लेकिन तुलसीदास के बारे में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की पंक्तियां ध्यातव्य हैं जिसे डॉ रामविलास शर्मा ने निराला की साहित्य साधना में लिखा है- अंग्रेजी और बांग्ला के अनेक कवियों के नाम गिनाने के बाद एक दिन निराला बोले- ‘इन सब बड़ेन क पढ़ित है तो ज्यू जरूर प्रसन्न होत है पर जब तुलसीदास क पढ़ित है तो सबका अलग धरि देइत है। हमार स्वप्न इहै सदा रहा कि गंगा के किनारे नहाय के भीख मांगिके रही और तुलसीदास कै पढ़ी।‘ महाप्राण निराला के यह कहने के बाद क्या बचता है। क्या कभी किसी ने ये जानने की कोशिश की कि कबीर के महिलाओँ के बारे में क्या विचार थे। अभी यह जानकारी आना शेष है। कबीर महिलाओं को लेकर उतने क्रांतिकारी नहीं हैं जितने वो कुरीतियों के खिलाफ दिखते हैं। बावजूद इसके कबीर की महानता पर कोई शक नहीं लेकिन संदेह तो तब होता है या सवाल तब उठता है जब दो महान कवियों में से एक को सिर्फ इस आधार पर हाशिए पर डालने की कोशिश होती है कि वो भारत को सांस्कृतिक रूप से जोड़ने का काम करता है। हिंदी साहित्य में इस तरह की बेइमानियां लंबे समय से चल रही हैं और इसने साहित्य का बड़ा नुकसान किया। जितनी जल्दी इस प्रवृत्ति से छुटकारा मिल सकेगा उतनी जल्दी साहित्य का भला होना शुरू हो जाएगा।     


Monday, May 26, 2014

कबीर बानी से बुनी कविताएं

हिंदी साहित्य जगत पर रचनात्मकता के संकट की बहुत बातें होती रहती हैं । नब्बे के दशक में राजेन्द्र यादव ने अपनी पत्रिका हंस के माध्यम से लेखन पर महसूस किए जा रहे इस संकट पर लंबी बहस चलाई थी । हंस में चलाई गई उस बहस से कुछ हासिल हुआ हो या नहीं लेकिन कुछ लेखकों ने नहीं लिख पाने पर अपनी सफाई पेश कर दी थी । दरअसल हिंदी में लेखऩ पर संकट से ज्यादा जरूरी बहस होनी चाहिए कि कविता, कहानी, उपन्यास के अलावा अन्य विषयों पर हिंदी में संजीदगी से कोई कृति क्यों नहीं रची जा रही है । आज अगर हम हिंदी साहित्य के इतिहास और वर्तमान पर नजर डालें तो वहां साइंस फिक्शन, संगीत, कला, खेल,गीत, भारतीय संगीत, हेत्थ फिक्शन आदि पर बेहद कम किताबें नजर आती हैं । हिंदी के कउच लेखकों ने अवश्य इन विषयों पर विषयों पर मुकम्मल किताब लिखने का साहस दिखाया लेकिन उनकी संख्या इतनी कम है कि वो एक विधा के तौर पर हिंदी में स्थापित नहीं हो सकी । फिल्मों को लेकर हिंदी साहित्य के इतिहास में एक खास किस्म की उदासीनता दिखाई देती है । भारतीय फिल्म जगत में एक से बढ़कर एक कलाकार हुए, एक से बढ़कर एक संगीतकार हुए, एक से बढ़कर एक गीतकार हुए और लता मंगेशकर से लेकर मुहम्मद रफी जैसे गायक हुए । फिल्मों से जुड़े इन महान शख्सियतों पर हिंदी में इतनी कम सामग्री उपलब्ध है कि एक आलोचक ने सही टिप्पणी की थी कि फिल्मों के मुतल्लिक हिंदी में एक खास किस्म का सन्नाटा नजर आता है । फि्लमी दुनिया से कलाकारों के व्यक्तित्व, उनके संघर्ष और उनके योगदान को परखते हुए किताबों की भारी कमी है । जो है भी वो बेहद चालू किस्म की सुनी सुनाई बातों पर लिखी गई हैं । कुछ किताबें अवश्य छपकर सामने आई लेकिन ज्यादातर तो विभिन्न पत्र पत्रिकाओॆं में छपे लेखों के संग्रह ही हैं । मुझे लगता है कि हिंदी में प्रगतिशीलता के जोर और साहित्य पर वामपंथियों का कब्जा इस सन्नाटे के लिए जिम्मेदार है । प्रगतिशील समुदाय फिल्म, गीत-संगीत, नृत्य आदि को उल्लास, वैभव, हर्ष का प्रतीक मानता रहा है । वामपंथी विचारधारा इसको सर्वहारा के खिलाफ और अभिजात्य वर्ग का पोषक मानते रहे हैं । जब विचारधारा ही खिलाफ हो तो उसकी सुबह शामआरती उतारनेवाले अनुयायी तो उस दिशा में झांकने भी नहीं जाएंगें । उनके लिए तो कुमार गंधर्व और बिस्मिल्लाह खान पर लिखना भी गुनाह था, अमिताभ और ओमपुरी तक तो इनकी सोच ही नहीं पहुंच पाई । ज्ञानपीठ के एक कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन को बुलाने पर बेवजह का विवाद खड़ा करने की कोशिश की गई थी। लिहाजा लंबे समय तक वामपंथ के प्रभाव में रहा हिंदी का साहित्य समाज इन विषयों को अछूत मानता रहा । जिसने लिखने की कोशिश की उनपर वामपंथी लेखकों ने जमकर हमले किए और उन्हें साहित्य से खारिज करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी । नतीजा यह हुआ कि हिंदी लेखन इन विषयों में पिछड़ता चला गया । गाहे बगाहे कोई गंभीर किताब इन विषयों पर आती रहती है । जैसे दो हजार छह में पंकज राग ने –धुनों की यात्रा- लिखी । धुनों की यात्रा हिंदी फिल्म के संगीतकारों पर पर केंद्रित अहम किताब है जिसमें 1931 से लेकर 2005 तक के संगीतकारों की सृजनात्मकता को सामने लाया गया है । कुछ किताबें मधुप शर्मा ने भी लिखी हैं । संभव है कि कुछ और गंभीर किताबें प्रकाशित हुई हों लेकिन हिंदी साहित्य में फिल्म और उससे जुड़े लेखन को साहित्य की मुख्यधारा में अब तक जगह नहीं मिल पाई है और ना ही लेखक को प्रतिष्ठा । इसके अलावा हिंदी के युवा रचनाकारों में यतीन्द्र मिश्र गंभीरता से संगीत और संगीतकारों पर काम कर रहे हैं ।यतीन्द्र मिश्र ने श्रम पूर्वक गुलजार की रचनात्मकता को हिंदी में एक नए सिरे से परिभाषित करते हुए पेश किया है । इसके अलावा यतीन्द्र मिश्र ने गिरिजा देवी, सोनल मानसिंह और बिस्मिल्लाह खान पर मुक्कमल किताब लिखी जिसकी हिंदी साहित्य में उतनी चर्चा नहीं हो पाई नतीजे में लेखक को वो यश नहीं मिल पाया जिसके वो हकदार थे । इसके अलावा यतीन्द्र फिल्मों पर भी गंभीरता से काम कर रहे हैं लेकिन यतीन्द्र मिश्र मूलत: कवि हैं जो अपनी कविता में भी तरह तरह के प्रयोग करते रहते हैं ।

अभी हाल ही में यतीन्द्र मिश्र का ना कविता संग्रह विभास आया है । यह कविता संग्रह कबीर की कविताओं और उनके शब्दों को नए युग के मुताबिक परिभाषित करने की कोशिश है । लेखक के मुताबिक – यह कविताएं एक हद तक कबीप की वाणी को समकालीन अर्थों में नए सिरे से खोजने और अभिव्यक्ति के लिए एक नया बेहद रतने की कोशिश में लिखी गई है । अठासी पन्नों की इस किताब में कुछ पचास कविताएं संकलित हैं । इस किताब की विशेषता यह है कि कबीर और कविता के पांच विशेषज्ञों की छोटी छोटी टिप्पणी के आधार पर पांच खंड बनाए गए हैं । यतीन्द्र ने अपनी इस किताब में कबीर के शब्दों और मुहावरों को आधुनिक संदर्भों में पेश किया है । इस संग्रह में एक कविता है – बाजार में खड़े होकर । इसमें कवि ने कबीरा खड़ा बजार के शब्दों से एक नया मुहावरा गढ़ा है । कवि कहता है – कभी बाजार में खड़े होकर /बाजार के खिलाफ देखो/उन चीजों के खिलाफ/जिन्हें पाने के लिए आए हो इस तरफ/जरूरतों की गठरी कंधे से उतारकर देखो/कोने में खड़े होकर नकली चमक से सजा/तमाशा-ए-असबाब देखों । यहां कवि सीधे सीधे बाजारवाद पर हमला करता है और तंज करते हुए बाजार के खिलाफ खड़े होने की चुनौती भी देता है । इन कविताओं में कबीरियत साफ तौर पर देखी जा सकती है । इसी तरह से अगर इस संग्रह की अन्य कविताओं को भी देखें तो हमें कबीर के लेखन और फक्कडपन का आस्वादन होता है । कुछ कविताएं बेहद गूढ़ और गद्य की तरह लिखी गई हैं लेकिन कविता के सारे गुणों से लैस । जैसे भला हुआ मोरी गगरी फूटी या शामिलबाजे के विरुद्ध । कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि यतीन्द्र मिश्र का यह संग्रह हिंदी में कविताओं की बाढ़ के बीच चट्टान की तरह सर उठाकर खड़ा है और आलोचकों को उसे व्याख्यायित करने की चुनौती दे रहा है । यतीन्द्र की इन कविताओं के बारे में चित्रकार मनीष पुष्कले की टिप्पणी बेहद सटीक है – इन कविताओं में कबीर मात्र विषय नहीं हैं, यतीन्द्र यहां बेहद रोचकता से अपनी भाषा की ऐसी माटी गढ़ पाते हैं जिसमें कबीर की कबीरियत और यतीन्द्र की काबिलियत स्वत: प्रगट होती है । लिंडा हेस की टिप्पणी भी गौर करने लायक है- बानी कबीर का सूत था जिससे वो दुनिया बुनते थे । मैं सिर्फ इसमें यह जोड़ना चाहता हूं कि उसी वाणी से यतीन्द्र ने कविताएं बुन दी हैं ।