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Saturday, December 1, 2018

राहुल की व्याख्या पर राजनीति का तड़का


एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त देश भर में सवा तीन सौ से अधिक लिटरेचर फेस्टिवल हो रहे हैं, जिनको लिट फेस्ट या साहित्योत्सव भी कहा जाता है ।अमूमन सभी लिटरेटर फेस्टिवल में साहित्य को केंद्र में रखकर इसकी विभिन्न विधाओं और प्रवृत्तियों पर चर्चा होती है। इस मायने में दैनिक जागरण का लखनऊ में आयोजित जागरण संवादी इन तमाम साहित्योत्सवों से अलग है। जागरण संवादी जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि ये संवाद करनेवालों का मंच है। इसमे साहित्य की विधाओं और प्रवृत्तियों पर भी बात होती है लेकिन ये इससे अलग हटकर विचार और विमर्श पर केंद्रित आयोजन होता है। साहित्य से जुड़े लोग भी साहित्यिक विमर्शों पर मंथन करते हैं। इस वर्ष लखनऊ के संगीत नाटक अकादमी परिसर में तीस नवंबर से 2 दिसबंर तक आयोजित इस उत्सव में भी विचार केंद्रित कई सत्र बेहद दिलचस्प रहे। कई नए स्थापनाएम और मान्यताएं भी चर्चा के दौरान सामने आई। उत्तर प्रदेश की रचनात्मकता पर केंद्रित एक सत्र में साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष और हिंदी के वरिष्ठ लेखक विश्वनाथ तिवारी, साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवि लीलाधर जगूड़ी और उपन्यासकार शैलेन्द्र सागर ने अपनी बातें रखीं। इस सत्र का संचालन युवा कथाकार राहुल नील कर रहे थे। सत्र में अपने आरंभिक वक्तव्य में लीलाधर जगूड़ी ने संचालक के नाम की बेहद दिलचस्प व्याख्या कर दी। उन्होंने संचालक राहुल से पूछा कि उनको अपने नाम का अर्थ पता है। राहुल ने जब उनको अपने नाम का अक्थ बताना शुरू ही किया था कि जगूड़ी ने उनको रोकते हुए कहा कि राहुल का एक और अर्थ होता है और वो है बाधा। अपनी बात को पुष्ट करने के लिए लीलाधर जगूड़ी ने महात्मा बुद्ध से जुड़ा एक किस्सा बताया। उन्होंने कहा कि जब जब सिद्धार्थ के पिता को जब इस बात का एहसास हुआ कि उनके बेटे सिद्धार्थ का सांसारिकता से मोहभंग होने लगा है तो उन्होंने उनका विवाह यशोधरा से करवा दिया। ज्ञान प्राप्ति के पहले गौतम बुद्ध का नाम सिद्धार्थ था। विवाह के बाद यय़ोधरा गर्भवती हुईं और तान का जन्म हुआ तो ये खुशखबरी सिद्धार्त को सुनाई गई कि आपोक बेटा हुआ है। लीलाधर जगूड़ी ने बताया कि जातक में इस बात का उल्लेख है कि बेटे के जन्म की खबर सुनकर सिद्धार्थ ने कहा राहुलो जात: । इसका अर्थ है कि बाधा हो गई। जगूड़ी के अनुसार उस वक्त से ही राहुल को एक मुहावरे की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा जिसका अर्थ है कि सोचे हुए काम में बाधा या जो रास्ता है उसमें बाधा। बात आई गई हो गई लेकिन बाद में श्रोताओं ने जगूड़ी जी को घेरा। उनमें से ही एक ने जगूड़ी जी की बात को आगे बढ़ाते हुए इसको ज्योतिष से जोड़ दिया। उनके मुताबिक राहु शब्द से राहुल बना है। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक जब किसी व्यक्ति पर राहु लग जाता है तो वो बाधाकारक हो जाता है। किसी काम को बनने में वो स्पीड ब्रेकर की तरह आ जाता है काम की गति को धीमा कर देता है या सोचे गए काम को पूरा नहीं होने देता है। दक्षिण में भी राहु कालम का अर्थ यही होता है। जागरण संवादी के मंच पर लीलाधर जगूड़ी ने राहुल शब्द की व्याख्या संचालक से संदर्भ में की लेकिन वहां इसके राजनीतिक अर्थ निकाले जाने लगे। सोशल मीडिया पर भी इस व्याख्या को लेकर बहस शुरू हो गई। ट्वीटर पर हर कोई इसको राहुल गांधी से जोड़कर देखने लगा। पक्ष और विपक्ष में टिप्णियां आने लगीं। किसी पूछा कि राहुल किसी बाधा कांग्रेस की या भारतीय जनता पार्टी की। किसी ने लिखा कि भारत की राजनीति में ‘राहु’ल काल कभी ना आए। तो कोई जगूड़ी को नसीहत देने लगे। इस बीच जगूड़ी का फोन भी घनघनाने लगा और उनके कुछ मित्रों ने उनको राहुल गांधी पर इस तरह की टिप्पणी करने के लिए निशाने पर ले लिया। जगूड़ी सफाई देने लगे कि उन्होंने तो संचालक राहुल नील को उसके नाम का अर्थ समझाया था उनका आशय राहुल गांधी से कतई नहीं था। यह महज संयोग है कि जागरण संवादी के मंच पर इस सत्र के संचालक का नाम और भारतीय राजनीति में प्रमुख विपक्षी दल के अध्यक्ष का नाम राहुल है। लेकिन जिस तरह से इसको लेकर राजनीति शुरू हो गई है उसने बेहद दिलचस्प मोड़ ले लिया है। दरअसल देश में जब राजनीति अपने चरम पर हो और राज्यों के चुनाव चल रहे हों और चंद महीनों के बाद लोकसभा के चुनाव आनेवाले हों तो इस तरह की टिप्पणियों को राजनीति से जोड़कर देखा ही जाएगा।
संस्कार और संस्कृति वाले सत्र में भी मशहूर नृत्यांगना, राज्य सभा की सांसद पद्म विभूषण सोलन मानसिंह ने लखनऊ की धरती पर बेहद बेबाकी से अपनी बातें रखीं। उन्होंने शुभारंभ के समय दीपक जलाने को लेकर भी एक दिलचस्प बात कही। उनका कहना था कि शुभ अवसर पर दीपक को जलाया नहीं जा बल्कि वो प्रकट होती है। लेकिन जब वो अपनी रौ में आईं तो उन्होंने अपने तमाम कड़वे अनुभवों को साझा किया। उन्होंने पूरा किस्सा बयान किया कि किस तरह से उनको अमेरिका में आयोजित विश्व हिंदू सम्मेलन में जाने के पहले रोकने की कोशिश की गई। किस तरह से उस वक्त की कांग्रेस की सरकार ने उनको वीजा मिलने में बाधाएं खड़ी कीं। किन परिस्थितियों में उनको संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष पद से हरकिशन सिंह सुरजीत के इशारे पर हटाया गया। कैसे संगीत नटक अकादमी के दफ्तर में जांच एजेंसियों को इस आदेश के साथ भेजा गया कि सोलम मानसिंह के खिलाफ सबूत जमा करें। चार दिनो तक एजेंसी के अधिकी संगीत नाटक अकादमी की फाइलों को छानते रहे लेकिन उनको कुछ मिला नहीं। ये सब बातें बहुत ही बेबाकी से संवादी के मंच पर कही गईं। इसी तरह से शोभा डे ने अपने सत्र में भी अपने विचारों को उन्मुक्त होकर सामने रखा। सत्तर साल की शोभा डे से जब संजोय रॉय ने मी टू के बारे में सवा पूछा तो उन्होंने साफ तौर पर ये कहा कि उनको पूरी जिंदगी के दौरान इस तरह की कोई बात झेलनी नहीं पड़ी लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि कि ऐसा नहीं होता होगा। उन्होंने खुलकर कहा कि अगर किसी भी महिला के साथ किसी भी तरह की ज्यादती होती है तो वो उनके साथ हैं। सबसे दिलचस्प यह रहा कि लखनऊ के श्रोताओं ने शोभा डे को पहली बार हिंदी में बात करते हुए सुना। संचालक लगातार अंग्रेजी में उनसे सवाल पूछ रहे थे और वो सभी प्रश्नों के उत्तर हिंदी में दे रही थीं। संगीत नाटक अकादमी के लॉन में शाम की हल्की ठंड के बीच शोभा डे को हिंदी में सुनना में बेहद आनंद से भरा था। लखनऊ के श्रोताओं ने उनको हिंदी में बोलने के लिए ध्नयवाद भी दिया। यही तो संवादी का उद्देश्य भी है कि सभी भाषाओं के लोग एक मंच पर इकट्ठे होकर हिंदी में संवाद करें। जागरण संवादी का आयोजन दैनिक जागरण की मुहिम हिंदी हैं हम के तहत होता है।  
इसी तरह से एक और विचारोत्तेजक सत्र रहा जब संगीत के अध्येता यतीन्द्र मिश्र ने लोकगायिका मालिनी अवस्थी से संगीत के अच्छे दिनों के बारे में सवाल पूछा। मालिनी अवस्थी ने संगीत मे जारी वर्ण व्यवस्था को रेखांकित किया और कहा कि शास्त्रीय संगीत की परंपरा में लोकगीत को वर्णव्यवस्था में निचले पायदान पर रखा जाता था लेकिन अब ये वर्जनाएं टूटी हैं और लोकगीत को भी पर्याप्त महत्व मिलने लगा है। इस संदर्भ में उन्होंने मध्यप्रदेश में आयोजित होनेवाले तानसेन संगीत समारोह का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा दो साल पहले तानसेन संगीत समारोह के कर्टन रेजर में उनको लोकगीत गाने के लिए आमंत्रित किया गया था। उनके ऐसा कहने का मतलब था कि तानसेन संगीत समारोह में पहले सिर्फ शास्त्रीय संगीत के कलाकारों को ही आमंत्रित किया जाता था । उन्होंने जोर देकर कहा कि ये दौर संगीत के लिए अच्छे दिन लेकर आया है क्योंकि संगीत मे सदियों से चली आ रही वर्ण व्यवस्था टूटने लगी है। विचार के इस महामंच पर इस तरह से खुलकर बेबाकी से एक कलाकार अपनी ही बिरादरी के बारे में बात कर रही थी और वहां की विसंगतियों को देश के सामने रख रही थीं। साहित्योत्सवों की भीड़ के बीच संवादी इन वजहों से ही अलग दिखाई देता है और पांच साल के छोटे से अंतराल के बीच हिंदी समाज में अपने लिए एक मजबूत स्थान बना पाने में कामयाब रहा है। यह इस वजह से भी संभव हो पाया है कि संवादी में विचारधारा और विचारों की अस्पृश्यता बिल्कुल नहीं होती है, हर विचारधारा और मत को मानने वाले लोग खुलकर इस मंच पर अपनी बात कहते हैं, बिना किसी रोक टोक के ।     

Tuesday, January 26, 2016

साहित्य पर भारी सितारों की चमक

जयपुर में पांच दिनों तक चलनेवाला सालाना साहित्यक जलसा जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल खत्म हो गया । साल दर साल इस सालाना जलसे में लेखक और साहित्यक विमर्श नेपथ्य में जा रहे हैं और सेलिब्रिटी की चमक ज्यादा महसूस की जा रही है । जब जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल शुरू हुआ था तब ये माना गया था कि इसका उद्देश्य साहित्य और समाज के सवालों से टकराने का है । वरिष्ठ लेखक आपस में साहित्य की समकालीन समस्याओं से लेकर नई लेखकीय प्रवृत्तियों पर चर्चा करेंगे जिससे उस भाषा के पाठक संस्कारित होंगे । परंतु हाल के दिनों में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सितारों और गंभीर लेखकों के बीच का फर्क मिट सा गया है । जिस तरह से प्रकाशक फिल्मी सितारों, राजनेताओं, सेलिब्रिटी पत्रकारों की किताबें छापने में लगे हैं उसी तरह अब लिटरेचर फेस्टिवल के कर्ताधर्ता भी फिल्मी सितारों से लेकर पूर्व और वर्तमान राजनेताओं की भागीदारी सुनिश्चित करते हैं । लिटरेचर फेस्टिवल में गुलजार साहब स्थायी भाव की तरह मौजूद रहते हैं भले ही उन साहित्यक मेलों में केदारनाथ सिंह, लीलाधर जगूड़ी या विनोद कुमार शुक्ल हों या ना हों । गुलजार को बुलाने के पीछे की मंशा उनकी बेहतरीन कविताएं सुनने की अवश्य रहती होंगी लेकिन भीड़ जुटाना और पाठकों को आकर्षित करना भी एक मकसद रहता है । ऐसा नहीं है कि सिर्फ जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में ही ऐसा होता है पूरी दुनिया में लिटरेचर फेस्टिवल में सितारों की चमक साहित्यक विमर्श पर भारी पड़ते हैं । बेस्टसेलर उपन्यास चॉकलेट की लेखक जॉन हैरिस ने भी एक बार कहा था कि कई लिटरेचर फेस्टिवल इन सितारों के चक्कर में लेखकों पर होनेवाले खर्चे में भारी कटौती करते हैं । आयोजकों को लगता है कि सितारों के आने से ही उनको हेडलाइन मिलेगी । उनका मानना था कि इससे आयोजकों को फायदा होता है पर साहित्य नेपथ्य में चला जाता है । बाजार के विषेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के साहित्यक आयोजनों तभी सफल हो सकते हैं जब इसमें शिरकत करनेवाले सितारे हों क्योंकि विज्ञापनदाता उनके ही नाम पर स्पांसरशिप देते हैं । विज्ञापनदाताओं की रणनीति होती है कि जितना बड़ा सितारा होगा उतनी बड़ी भीड़ जुटेगी और उनके उत्पाद का प्रचार बड़े उपभोक्ता वर्ग तक पहुंचेगा । परंतु सवाल यही है कि क्या इस तरह के आयोजनों में साहित्य या साहित्यकारों पर पैसे को तरजीह दी जानी चाहिए । अगर उद्देश्य साहित्य पर गंभीर विमर्श है, अगर उद्देश्य पाठकों को साहित्य के प्रति संस्कारित करने का है तब तो हरगिज नहीं । हां अगर उद्देश्य साहित्य के मार्फत कारोबार करना है तो फिर इस तरह से लटके झटके तो करने ही होंगे । अब तो जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में मीना बाजार की तर्ज पर राजस्थानी पोशाक से लेकर हस्तशिल्प तक की बिक्री भी होती है । गहने जेवर की दुकान से लेकर चप्पल जूतों तक की दुकान देखी जा सकती है ।
इस बार भी दुनियाभर के तमाम बड़े लेखक और लेखिकाओं ने जयपुर के लिटरेचर फेस्टिवल में शिरकत की लेकिन इन सब पर करन जौहर, काजोल, गुलजार, जावेद अख्तर आदि की उपस्थिति भारी पड़ी । पहले ही दिन करन जौहर ने लोकतंत्र को मजाक बताकर विवाद खड़े करने की कोशिश की। करन ने व्यंग्यात्मक लहजे में ये कहकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की कि हमारे देश में फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन सबसे बड़ा जोक है । करन जौहर इतने पर ही नहीं रुके और उन्होंने यहां तक कह दिया कि लोकतंत्र तो उससे भी बड़ा मजाक है । करन के मुताबिक अगर आप अपने मन की बात कहना चाहते हैं तो ये देश सबसे मुश्किल है । करन के बयान से हल्का फुल्का ही सही पर विवाद हुआ । कहने का मतलब ये कि जयपुर लिटरेटर फेस्टिवल में विमर्श और विवाद साथ-साथ चलते हैं । इस साहित्यक आयोजन की निदेशक नमिता गोखले बार-बार ये दोहराती हैं कि विवादों में उनकी रुचि नहीं है लेकिन जिस तरह से कुछ सत्र में विषयों और वक्ताओं का चुनाव होता है उससे लगता है कि अन्य आयोजकों की मंशा नमिता के मत से अलग है । पूर्व के वर्षों में विवादों ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को खासा चर्चित किया । चाहे वो सलमान रश्दी के कार्यक्रम में आने को लेकर उठा विवाद हो या फिर आशुतोष और आशीष नंदी के बीच का विवाद हो, सबने मिलकर इस फेस्टिवल को साहित्य की चौहद्दी से बाहर निकालकर आम जनता तक पहुंचा दिया ।



Saturday, October 17, 2015

अकादमी में पारदर्शिता का सवाल

जितने लोगों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए हैं उनमें से ज्यादातर वामपंथी हैं और ये पूरा मामला कहीं ना कहीं राजनीति से प्रेरित है । यह कहना है साहित्य अकादमी से सम्मानित बुजुर्ग लेखक गोविंद मिश्र का । इसके बाद हम गौर करें अरुण कमल के वक्तव्य पर जहां वो कहते हैं – साहित्य सभी तरह के पुरस्कारों, सम्मानों और सुविधाओं का प्रतिकार करता है । इसलिए पुरस्कार आदि वापस करना हमारा मुख्य मुद्दा है ही नहीं । मैंने अपने जीवन में अपने सिद्धांतों को त्याग कर कभी भी पुरस्कार, सम्मान और लाभ अर्जित नहीं किया । अशोक वाजपेयी जैसे लेखक जो लगातार सत्ता विरोधी लेखकों को कमतक करके आंकते रहे हैं उनकी दृष्टि अभी भी साफ नहीं हो पाई है । साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित एक और लेखक वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी मानते हैं कि कुछ लेखकों के साहित्य अकादमी पुरस्कार को लौटाने को लेकर वो कोई दबाव महसूस नहीं करते हैं । उनका कहना है कि साहित्यकार को सामाजिक और आर्थिक विषमताओं के मुद्दों पर आंदोलन करना चाहिए । वो जोर देकर कहते हैं कि इस बात को सामने आना चाहिए कि लेखक के सरोकार क्या हैं । लीलाधर जगूड़ी कहते हैं कि साहित्य अकादमी का काम कानून व्यवस्था को ठीक करना नहीं है । ये तीन वरिष्ठ लेखकों के वक्तव्य हैं जो कि कमोबेश अलग अलग धारा के हैं । अब इन वक्तव्यों के आलोक में हम साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने के पीछे की राजनीति की पड़ताल करते हैं तो वहां सिसायत की एक अलग तरह की रेखा दिखाई देती है । सिसायत केंद्र सरकार के खिलाफ और सियासत साहित्य अकादमी की स्वायत्ता के खिलाफ । साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की शुरुआत उदय प्रकाश ने की उस वक्त मुद्दा था कालबुर्गी की हत्या के बाद साहित्य अकादमी की संवेदनहीनता । तब यह भी प्रचारित किया गया था कि साहित्य अकादमी से सम्मानित लेखक कालबुर्गी की हत्या के बाद साहित्य अकादमी ने ना तो विरोध जताया और ना ही उन्होंने कोई शोक सभा की । कालांतर में यह बात भी झूठ साबित हुई जब यह बात सामने आई कि साहित्य अकादमी ने बैंगलोर में कालबुर्गी की हत्या के बाद एक शोक सभा की थी जिसमें अकादमी के उपाध्यक्ष कंबार समेत कई स्थानीय लेखक मौजूद थे । अब इस बात पर विचार होना चाहिए कि पुरस्कार वापसी अभियान की शुरुआत की जो बुनियाद थी उसमें झूठ की भी एक ईंट थी । उदय प्रकाश के बाद दो धवलकेशी साहित्यकारों- अशोक वाजपेयी और नयनतारा सहगल ने भी साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान किया । अबतक साहित्यकारों पर हो रहे हमलों का प्रतिरोध हो रहा था लेकिन इन दो लेखकों ने इसमें बहुलतावादी संस्कृति पर खतरे को भी अपने प्रतिरोध से जोड़ दिया । इन्होंने दादरी हत्याकांड और गोमांस विवाद पर प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल खड़े कर दिए । अशोक वाजपेयी और नयनतारा सहगल के बाद तो करीब दो दर्जन साहित्यकारों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान कर दिया । साहित्य अकादमी पर भी दबाव बना और उसके अध्यक्ष ने तेइस अक्तूबर को कार्यकारिणी की बैठक बुलाने का एलान कर दिया। लेकिन अशोक वाजपेयी और नयनतारा सहगल के केंद्र सरकार को इसमें घसीटने के बाद धीरे-धीरे विरोध करनेवालों की मंशा साफ होने लगी । आज तक वामपंथियों के निशाने पर रहे अशोक वाजपेयी अचानक से उनको अच्छे लगने लगे । लेकिन खेल इतना सीदा नहीं था । इस खेल के पीछे हैं केंद्र सरकार पर हमले की आड़ में साहित्य अकादमी में अराजकता पैदा करना । साहित्य अकादमी की इस अराजकता की आड़ में उसके अध्यक्ष को अस्थिर करना । अब इस बात का खतरा पैदा हो गया है कि इस स्वायत्त संस्था पर इस अराजकता की आड़ में संस्कृति मंत्रालय दखल दे और इसका हाल भी ललित कला अकादमी जैसा हो । हमारा साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा कर प्रतिरोध जता रहे लेखकों से इस बात को लेकर ही विरोध है कि वो परोक्ष रूप से सरकार की मदद कर रहे हैं । वो एक ऐसी जमीन तैयार करके सरकार को दे रहे हैं जो भविष्य में साहित्य अकादमी की स्वायत्ता के लिए खतरा हो सकती है । यह बात इस वजह से कह रहा हूं कि इन लेखकों ने पूर्व में साहित्य अकादमी की गड़बड़ियों पर कभी भी रोष नहीं जताया । पुरस्कारों के लिए लेखकों के चयन में होनेवाली धांधली पर इन्होंने कभी भी एतराज नहीं जताया क्योंकि साहित्य अकादमी में मिल बांट कर खाने की परंपरा चली आ रही है । क्या इन लेखकों के कभी साहित्य अकादमी के संविधान में लंबे समय से चली आ रही खामियों पर कोई सवाल उठाया । क्या पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों ने कभी भी साहित्य अकादमी की सामान्य सभा के सदस्यों के चुनाव में होनेवाली धांधली पर सवाल खडडे किए । क्या कभी इन लेखकों ने साहित्य अकादमी की गतिविधियों में पारदर्शिता लाने की मांग करते हुए कोई आवाज उठाई । क्या इन लेखकों ने साहित्य अकादमी के लेखकों में हित में काम करने के लिए दबाव बनाने के लिए कुछ किया । हर सवाल का जवाब मिलेगा नहीं । लिहाजा अब जब वो साहित्य अकादमी को घेरने की कोशिश कर रहे हैं तो अपेक्षित माहौल नहीं बन पा रहा है ।
साहित्य अकादमी के गठन के बाद से ही उसके संविधान में कई गड़बड़ियां हैं । भारत के संविधान में काल और परिस्थिति के हिसाब से करीब सौ संशोधन हो चुके हैं लेकिन अकादमी के संविधान में कितने संशोधन हुए हैं ये ज्ञात नहीं है । 1954 में जब साहित्य अकादमी की स्थापना की गई थी तो कौशल विकास और शोध प्रमुख उद्देश्य थे । तकरीबन छह दशक के बाद भी साहित्य अकादमी देश की सभी भाषाओं में शोध और कौशल विकास को अपेक्षित स्तर पर नहीं ले जा पाई ।
सत्रह दिसंबर दो हजार तेरह को संसद के दोनों सदनों में सीताराम येचुरी की अध्यक्षता वाली एक संसदीय कमेटी ने अपनी रिपोर्ट पेश की थी । इस रिपोर्ट में साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी के अलावा इंदिरा गांधी कला केंद्र और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के कामकाज पर टिप्पणियां की गई थी । येचुरी की अगुवाई वाली इस समिति ने माना था कि साहित्य अकादमी के पुरस्कारों में पारर्दर्शिता का अभाव है । अकादमियों की इन बदइंतजामियों के बारे में संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट के पैरा 56 में लिखा- समिति यह दृढता से महसूस करती है कि ऐसी स्थिति को बनाए नहीं रखा जा सकता है और इन अकादमियों को व्यवस्थित करने के लिए कुछ करने का यह सही समय है । सांस्कृतिक संस्थानों के कार्यक्रमों की नियमित समीक्षा की जानी चाहिए । ये समीक्षाएं बाहरी व्यक्तियों और समितियों द्वारा की जानी चाहिए और उन्हें उन वार्षिक प्रतिवेदनों में शामिल किया जाना चाहिए । संसदीय समिति की इस रिपोर्ट के बाद जनवरी 2014 में यूपीए सरकार के दौरान अभिजीत सेन की अध्यक्षता में एक हाई पॉवर कमेटी का गठन किया गया । अकादमियों के कामकाज की समीक्षा के बारे में 1988 में हक्सर कमेटी बनी थी और तकरीबन पच्चीस साल बाद अब सेन कमेटी का गठन हुआ था । इस कमेटी में  नामवर सिंह, रतन थियम, सुषमा यादव, ओ पी जैन आदि सदस्य थे । इस कमेटी का गठन इन अकादमियों के संविधान और उसके कामकाज में बदलाव को लेकर सुझाव देना था । इस कमेटी ने मई 2014 में अपनी रिपोर्ट पेश की । लगभग सवा सौ पृष्ठों की रिपोर्ट में इस कमेटी ने भी माना कि इन अकादमियों में जमकर गड़बड़झाले को अंजाम दिया जा रहा है । इस कमेटी ने अपनी सिफारिश में कहा है कि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष की उम्र सीमा भी 70 साल हो । उपाध्यक्ष के पद को बेकार मानते हुए उसे खत्म करने और सचिव का कार्यकाल तीन साल करने की सिफारिश की गई है ।
इसके अलावा अगर हम साहित्य अकादमी के संविधान पर गौर करें तो सामान्य सभा के चुनाव में जिस तरह से सदस्यों का चुनाव होता है वह माफियागीरी को बढ़ावा देता है । हर भाषा के नुमाइंदे बंटवारा कर लेते हैं और चुनाव हो जाता है । इसी तरह से अगर किसी भाषा का प्रतिनिधि अपने कार्यकाल के बीच में सदस्यता छोड़ता है या उसका निधन हो जाता है तो उसकी जगह खाली रहेगी । ये विसंगति दूर होनी चाहिए और सामान्य सभा के सदस्यों का चुनाव मतपत्र के आधार पर होना चाहिए । इस तरह की पारदर्शिता के बगैर अकादमी ना तेवल अपनी साख खोती जा रही है बल्कि स्वायत्ता खत्म करने के लिए सरकार के हाथ में हथियार भी दे रही है । आवश्यकता इस बात की है कि वर्तमान अध्यक्ष और सचिव साहित्य अकादमी को उसके मूल उद्देश्यों की ओर ले जाएं और वहां प्रतिभा का सम्नान हो । सेटिंग गेटिंग का खेल साहित्य अकादमी में बंद होना चाहिए ।