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Saturday, January 3, 2026

ताजा हवा के झोंके की तरह अपराध कथा


ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म्स पर चलने वाली वेबसीरीज की बात आते ही पहली प्रतिक्रिया होती है गालियों की भरमार होगी। जबरदस्ती ठूंसी गई यौनिकता या न्यूडिटी होगी। जबरदस्त हिंसा होगी। शरीऱ के अंगों को काटा जा रहा होगा और तड़पते हुए कटे अंग होंगे। प्रश्न आता है कि कोई अच्छी और साफ-सुथरी वेबसीरीज बताइए। उत्तर मिलता है पंचायत और गुल्लक। अच्छी कहानी, साफ सुथरी प्रस्तुति, कम गाली-गलौच और न्यूमतम हिंसा जिस वेबसीरीज में हो उसकी संख्या कम है। हमारे देश में विशेषकर हिंदी में बनने वाली वेब सीरीज एक ऐसी राह पर चली गई जिसमें निर्माता और निर्देशकों को लगता है कि बगैर गालियों के, बिना यौनिकता और हिंसक दृष्यों के वेबसीरीज लोगों को पसंद नहीं आएंगी। लिहाजा सफलता के लिए ये तीन अवयव जबरदस्ती कहानी में ठूंसे जाते हैं। अपराध कथा हो तो ये तो आवश्यक ही होते हैं। भले ही ये कहानी का सत्यानाश क्यों न कर हो जाए। पता नहीं निर्देशकों को क्या लगता है और वो भारतीय दर्शकों की मानिकता को किस तरह से विश्लेषित करते हैं। इनको पता नहीं ये बात कब समझ में आएगी कि दर्शकों को कहानी चाहिए। बेहतर कहानी और बेहतर ट्रीटमेंट ही किसी सीरीज को दर्शकों को पसंद बना सकती है। एक जमाने में इसी तरह से हिंदी फिल्मों में अश्लीलता दिखाने के लिए तर्क गढ़े जाते थे। नायिकाओं को बिकिनी या अर्धनग्न दिखाने के लिए उसको कहानी का हिस्सा बनाया जाता था। कई ऐसी फिल्में दर्शकों ने पसंद भी की थीं लेकिन ये ट्रेंड लंबे समय तक नहीं चल सका और दर्शक जबरदस्ती ठूंसी गई नग्नता से ऊब गए। फिर हिंदी फिल्मों ने अपनी राह बदली।

आज वेबसीरीज के निर्माताओं को इसपर विचार करने की आवश्यकता महसूस होनी चाहिए। वेबसीरीज पर चूंकि किसी प्रकार के सेंसर या प्रमाणन की व्यवस्था नहीं है इस कारण वहां अराजकता जारी है। इस स्तंभ में अनेकों बार इस ओर ध्यान दिलाया गया है। स्वनियंत्रण और स्वनियमन की आड़ में प्रमाणन को रोका गया है। सरकार इस कारण से इस दिशा में गति से नहीं बढ़ रही है क्योंकि अगर प्रसारण पूर्व प्रमाणन का निर्णय होता है तो एक अलग संस्था बनानी होगी। अलग संस्था नहीं बनाई जाती है और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को ये दायित्व दे दिया जाता है तब भी बहुत बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होगी। मानव संसाधन की आवश्यकता तो होगी ही। इसलिए सरकार जल्द निणय लेने के मूड में नहीं दिखाई देती है। सरकार ने एक व्यवस्था बनाई है और जब किसी वेबसीरीज को लेकर अधिक विवाद होता है या अधिक आलोचना आदि होती है तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय अपने स्तर से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हस्तक्षेप करके ममले को सुलझा देता है। आज चर्चा वेबसीरीज के प्रमाणन पर नहीं बल्कि एक ऐसी वेबसीरीज की करनी है जो बहुत ही साफ-सुथरी, न्यूनतम गाली गलौच के साथ और बगैर किसी अश्लीलता और जुगुप्साजनक हिंसा के बनाई गई है। ये वेबसीरीज अपराध कथा है, उसमें मर्डर है, ग्लैमर और लड़कियां हैं, प्रेम-प्रसंग हैं, अश्लीलता दिखाने का अवसर भी है, लेकिन अश्लीलता या नग्नता कम से कम है। इस वेबसीरीज को परिवार के सभी लोग एक साथ बैठकर देख सकते हैं। रोचकता अपने चरम पर है और दर्शकों के दिमाग में इसको देखते हुए बस यही चलता रहता है कि आगे क्या?  यही तो निर्माता निर्देशक की सफलता है।

बात हो रही है एक वेबसीरीज मिसेज देशपांडे की। छह एपिसोड की ये सीरीज एक सीरीयल किलर को पकड़ने की कथा है। कहा गया है कि ये किसी फ्रेंच कहानी पर आधारित सीरीज है लेकिन इसके निर्देशक और लेखक नागेश कुकनूर ने जिस प्रकार से कहानी को भारतीय पुट दिया है वो प्रशंसनीय है। अपने जमाने की सुपरस्टार रही माधुरी दीक्षित लीड रोल में हैं। उन्होंने अपने अभिनय कला से दर्शकों को बांधे रखा है। अधिक मेकअप के बिना और चेहरे पर बढ़ती उम्र के निशान के बावजूद माधुरी दीक्षित ने जिस तरह से मिसेज देशपांडे के पात्र को पर्दे पर जीवंत किया है वो उल्लेखनीय है। माधुरी दीक्षित अपनी परिस्थियों के कारण सीरीयल किलर बन जाती है। पकड़ ली जाती हैं और मिसेज देशपांडे को जेल में जीनत का नाम मिलता है। वो इस पहचान के साथ जेल में सूर्य नमस्कार करती है और साथी कैदियों को भोजन बनाकर खिलाती हैं। सीरियल किलर होने के बावजूद अन्य कैदी, जो संभवत: उसके अपराध से परिचत नहीं है, माधुरी का सम्मान करती हैं। ये सीरीयल किलिंग पुणे में हुई थी। मिसेज देशपांडे के केस की फाइल किसी एक लड़की के हाथ लग जाती है। यहां भी कहानी में एक दिलचस्प मोड़ है वो लड़की पहले लड़का होती है लेकिन अपनी मानसिक स्थिति के कारण वो चिकित्साकीय रास्ते से लड़की बनती है। ये लड़की पुणे की सीरियल किलर मिसेलज देशपांड की कापी कैट किलर बनती है। उसके ही अंदाज में अपने शिकार का नायलान की रस्सी से गला घोंटकर हत्या करती है और उसका आंख खोल देती है।

जब कापीकैट किलर ने मुंबई में कत्ल करना आरंभ किया तो पुलिस कमिश्नर ने मिसेज देशपांडे यानी जीनत की मदद लेना तय किया। कहानी में इतने चक्करदार घुमाव हैं कि मिसेज देशपांडे इस केस की जांच करनेवाले पुलिस आफिसर की मां होती है और कापीकैट किलर जांच अधिकारी की पत्नी की दोस्त। कहानी इतने दिलचस्प मोड़ लेती है कि दर्शक उससे बंधे रहने पर मजबूर होता है। जब दर्शक को लगता है कि पुलिस किलर के पास पहुंच गई है तो कहानी में एक नया मोड़ आता है और किलर की नए सिरे से तलाश आरंभ हो जाती है। कोई नया क्लू मिलता है। जिसपर किलर होने का शक होता है या जिसको किलर की तरह पेश किया जाता है वो तो किसी और ही मानसिक स्थिति में होता है। दर्शक जब उसकी सचाई जानता है तो उसके प्रति संवेदना से भर उठता है। प्रश्न उठता है कि किलर कौन ? निर्देशक ने कहानी को किसी तरह से लाउड नहीं होने दिया है। ना ही किसी प्रकार का छद्म वातावरण तैयार करके अपराध कथा को तिलस्मी स्वरूप प्रदान करने का प्रयास किया। बगैर लाउड हुए कहानी का ट्रीटमेंट बेहतरीन है। बस कहानी में एक ही चीज खटकती है। अंत में भेद खुलता है कि मिसेज देशपांड को उसके पिता ने ही सेक्सुअली अबयूज किया था। वो अपने पिता की हत्या के लिए पहुंचती है। वो छत से कूदकर अपनी जान दे देते हैं। पश्चिम में इस तरह की कहानी होती होगी लेकिन भारतीय दर्शकों के लिए ये एक झटके की तरह है। इस तरह की वेबसीरीज से एक उम्मीद जगती है कि ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री में परिपक्वता आनी आरंभ हो गई है। दूसरे निर्माता भी इसको देखकर प्रेरित होंगे और कहानी का इस तरह का ट्रीटमेंट करेंगे। मिसेज देशपांड को एक शुभ संकेत की तरह लिया जाना चाहिए। इसकी सफलता ने ये संकेत भी दिया है कि साफ सुथरी वेबसीरीज दर्शकों को भाती है। मिसेलज देशपांडे उन निर्देशकों के लिए मिसाल है जो सेक्स और हिंसा दिखाकर सफल होना चाहते हैं।  

 

Sunday, August 4, 2024

परिवार परंपरा को स्थापित करती फिल्म


देश में 1991 में आर्थिक उदारीकरण का दौर आरंभ हुआ तो उसने अर्थव्यवस्था के अलावा समाज पर भी गहरा प्रभाव छोड़ा था। उदारीकरण के कारण विदेशी फिल्में और सीरियल्स भी सुलभ हुए। इससे पश्चिम की खिड़की खुली। वहां की संस्कृति से परिचय हुआ। भारतीय मनोरंजन जगत पर भी प्रभाव पड़ा। पश्चिम को आधुनिक बताने का विमर्श आरंभ हुआ। परिणाम ये हुआ कि हमारा समाज संयुक्त परिवार से एकल परिवार की ओर बढ़ा। खान-पान, वेशभूषा में परिवर्तन दिखने लगा। हिंदी सिनेमा भी इससे अछूता नहीं रहा। नायिकाओं के कपड़े पश्चिम की तर्ज पर बनने लगे। कहना ना होगा कि समाज और सिनेमा दोनों जगह पश्चिम का अंधानुकरण आरंभ हुआ। ऐसे में 1994 में एक फिल्म आती है, हम आपके हैं कौन। यह फिल्म न केवल व्यावसायिक रूप से सफल हुई बल्कि इसने भारतीय परिवार परंपरा को स्थापित भी किया। सूरज बड़जात्या ने इस फिल्म को लिखा और निर्देशित किया। बड़जात्या परिवार पारिवारिक फिल्में बनाने के लिए ही जाने जाते हैं। फिल्म हम आपके हैं कौन में जिस प्रकार से विवाह, गोदभारई की रस्मों को दिखाया गया उसने भारतीय जनमानस को गहरे तक प्रभावित किया। इस फिल्म की नायिका माधुरी दीक्षित ने जिस तरह से चुलबुली लड़की निशा का अभिनय किया या जिस तरह से इन रस्मों में अपनी भागीदारी की उसने इन रस्मों को हिंदू परिवारों में स्थापित कर दिया। शादियों में वर का जूता छुपाना और साली का अपने होनेवाले जीजा से जूते के बदले पैसे की मांग करना, वर पक्ष के लड़कों का जूता खोजना फिर वर और दोनों पक्षों में नोंक-झोंक होना, ये इस फिल्म की विशेषता के तौर पर रेखांकित की गई। माधुरी दीक्षित ने तब एक इंटरव्यू में इस बात को स्वीकार भी किया था कि ये फिल्म दर्शकों को अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए प्रेरित करती है, पूरे परिवार का साथ रहने और जीने की सीख भी देती है। 

अगर इस फिल्म पर विचार करें तो इसमें न तो कोई खलनायक है, न ही मार-पीट, खून खराबा है, न ही गोलियों की तड़तड़ाहट है। इस फिल्म में है कर्णप्रिय संगीत और गाने। लता मंगेशकर के स्वर में माय नि माय और लता और एस पी बालासुब्रह्ण्यम का युगल गीत दीदी तेरा देवर दीवाना बेहद लोकप्रिय हुआ था। वर्षों तक और अब भी शादी के समय ये गीत अवश्य सुनाई पड़ जाते हैं। फिल्म निर्माण के समय जब ये बात सामने आई कि इस फिल्म में 14 गीत हैं तो फिल्मों के जानकार ने इसको बहुत ज्यादा बताया था। लेकिन दर्शकों ने इन सुरीले गानों को हाथों हाथ लिया था। गानों के अलावा इस फिल्म ने भारतीय वेशभूषा को स्थापित किया। आप याद कीजिए हम आपके हैं कौन में माधुरी दीक्षित ने जो बैंगनी रंग की कढाई की गई साड़ी पहनी थी वो कितनी लोकप्रिय हुई थी। साड़ी के साथ डोरी वाला मैचिंग बैकलेस ब्लाउज और कुंदन का भारी नेकलेस। साड़ी पहनने का माधुरी का अंदाज यानि सीधा पल्लू । यह अनायास नहीं था कि इस फिल्म के पोस्टर पर माधुरी दीक्षित को इसी साड़ी में दिखाया गया था। अब भी वो रंग, उस पर की गई कढ़ाई, बैकलेस डोरी वाला ब्लाउज विवाह समारोह के समय महिलाओं की पहली पसंद बनी हुई है। हम आपके हैं कौन फिल्म से माधुरी ने अपनी भारतीय नारी की छवि को पुख्ता तो किया ही पश्चिम वेशभूषा के बढ़ते चलन पर ब्रेक लगाई। इस फिल्म में भारतीय पारिवारिक मूल्यों को भी इस तरह से दिखाया गया है कि दर्शक प्रभावित हो सकें। गोदभराई की रस्म के बाद निशा की भूमिका निभा रही माधुरी दीक्षित की बड़ी बहन पूजा एक दुर्घटना का शिकार हो जाती है। परिवार में तय होता है कि पूजा के छोटे बच्चे की खातिर निशा का विवाह पूजा के पति से करवा दिया जाए। पूजा तैयार हो जाती है लेकिन नाटकीय घटनाक्रम में पूजा और प्रेम का विवाह हो जाता है। पूजा और प्रेम पहली ही मुलाकात से एक दूसरे की तरफ आकर्षित हो गए थे। भाभी की बहन से प्यार की कहानियां भी भारतीय समाज में बहुत सुनी जाती रही हैं। कुल मिलाकर अगर कहा जाए तो हम आपके हैं कौन संयुक्त परिवार की अवधारणा को मजबूत करती है। इस फिल्म के दृष्य, इसकी संवाद अदायगी, नायिकाओं के कपड़े और आभूषण, उनको पहनने का तरीका, गीत, संगीत सभी का एक ऐसा आकर्षक कोलाज था जिसने भारतीय दर्शकों को अबतक अपने मोहपाश में बांध रखा है। 


Thursday, May 16, 2024

बिना पायल के बजे घुंघरू


माधुरी दीक्षित। हिंदी फिल्म जगत का ऐसा सितारा जिसने फिल्मों में नृत्य की समृद्ध परंपरा को अपने नवाचार से समृद्ध किया। माधुरी दीक्षित जब पर्दे पर नृत्य करती थीं तो सिनेमाघऱ में बैठे दर्शक मंत्रमुग्ध होकर नायिका के शरीर के मूवमेंट्स में खो जाते थे। चाहे तेजाब का प्रख्यात गाना एक दो तीन चार हो या बेटा का धक धक करने लगा या फिर खलनायक का चोली के पीछे क्या है या देवदास का डोला रे डोला हो। यह सूची और लंबी हो सकती है। हिंदी फिल्मों में सितारा देवी से लेकर त्रावणकोर सिस्टर्स के नाम से मशहूर रागिनी, पद्मिनी और ललिता के अलावा वैजयंती माला, आशा पारिख, वहीदा रहमान, हेमा मालिनी, रेखा और श्रीदेवी की जो परंपरा रही उसको माधुरी ने अपने नृत्य कौशल से नई ऊंचाई दी। यह अनायास नहीं था कि लता मंगेशकर ने कहा था कि माधुरी की नृत्यकला को देखकर उनको वहीदा रहमान की याद आती है क्योंकि माधुरी उनकी ही तरह की समर्थ नृत्यांगना हैं। लता मंगेशकर ही नहीं बल्कि चित्रकार एम एफ हुसैन से लेकर बिरजू महाराज तक माधुरी की नृत्य प्रतिभा के कायल थे। बिरजू महाराज ने तो संजय लीला भंसाली की फिल्म देवदास में माधुरी के गाने को कोरियोग्राफ भी किया था। हुसैन ने तो यहां तक कह दिया था कि माधुरी दीक्षित के चेहरे का भाव और शरीर की लय और लचक देखकर उनको ग्रेटा गार्बो और मर्लिन मुनरो की याद आती है। 

कहीं पढ़ा था कि माधुरी दीक्षित का जब फिल्मों में पदार्पण हो रहा था तो वो दौर बदलाव का था। एंग्री यंगमैन की टाइप्ड भूमिकाओं वाली फिल्मों से लोगों का मोहभंग हो गया था। सिनेमा घर में जाकर फिल्म देखने की दर्शकों की रुचि भी बदल रही थी। लोग किराए पर फिल्मों के कैसेट लाकर घर पर ही वीडियो कैसेट प्लेयर पर फिल्में देखने लगे थे। कहा जाता है कि माधुरी दीक्षित के डांस ने दर्शकों की इस बदलती रुचि पर ब्रेक लगाया था। उनको फिर से सिनेमाहाल तक खींच लाए थे। दरअसल माधुरी जब नृत्य करती थीं तो उनके चेहरे का भाव और कैमरे के लेंस को देखती आंखें दर्शकों को रिझाती थीं। शारीरिक लय भी। माधुरी दीक्षित के अंग प्रत्यंग से एक भाव तरंग उत्पन्न होता था जिसमें मादकता होती थी, अश्लीलता नहीं। आप याद करिए फिल्म खलनायक का गाना चोली के पीछे क्या है। इस गाने में माधुरी के शरीर का मूवमेंट उसका रिदम और कैमरे पर देखती आंखें गजब प्रभाव पैदा करती हैं। ये बहुत कम होता है कि किसी गाने के बोल पर नायिका का नाम पड़ जाए। फिल्म बेटा का एक गाना है धक-धक करने लगा। इस गाने के बाद से माधुरी का नाम ही धर-धक गर्ल पड़ गया। इस गाने के नृत्य के दौरान उनकी सेंसुअस अदा को जिस तरह से फिल्माया गया है वो अप्रतिम है। गाने के दौरान जिस तरह की लाइटिंग की गई वो पूरे माहौल को मादक बना देता है। इस माहौल को माधुरी के स्टेप्स, मूवमेंट और चेहरे के भाव की सपनीली दुनिया से दर्शकों का निकलना मुश्किल हो जाता था। ये माहौल सिनेमा हाल में ही मिलता था। फिल्म बेटा के गीत का मुखड़ा है, धक धक करने लगा, हो मोरा जियरा डरने लगा/ सैंया बैंया छोड़ ना, कच्ची कलियां तोड़ ना। मुखड़े के पहले गायिका आउच बोलती हैं। आउच के बाद गहरी सांस का साउंड इफेक्ट है। आउच और गहरी सांस के साउंड इफेक्ट पर माधुरी जिस प्रकार से अपने अपने शरीर में लय पैदा करती हैं वो इस गाने को शेष बना देता है। इस गीत के मुखड़े के पहले आउच जोड़ने की दिलचस्प कहानी है। जब समीर ने इसको लिखा था तब मुखड़े के पहले आउच नहीं था। गाने की रिकार्डिंग के समय गायिका अनुराधा पौडवाल ने संगीतकार आनंद-मिलिंद को आउच जोड़ने का सुझाव दिया था। फिर आउच के हिसाब से ही गहरी सांस का साउंड इफैक्ट रचा गया। 

किसे पता था कि राजश्री प्रोडक्शन की फ्लाप फिल्म अबोध से अपनी फिल्मी करियर का आरंभ करनेवाली माधुरी दीक्षित एक दिन हिंदी फिल्मों की सुपरस्टार बनेंगी। ऐसी सुपरस्टार जिनका फिल्म के पोस्टर पर नाम होना ही फिल्मों की सफलता की गारंटी होगी। इस सफलता के पीछे एक लंबा संघर्ष है। पहली फिल्म के असफल होने के बाद वो वापस पढ़ाई की ओर लौट गईं। लेकिन फिल्मों में काम करने की ललक बनी रही। इसी ललक के कारण माधुरी ने कई बी ग्रेड फिल्मों में छोटी-मोटी भूमिकाएं कीं। लगातार पांच फिल्में फ्लाप। ये वो दौर था जब माधुरी को बी ग्रेड फिल्मों की हिरोइन कहा गया था। इन असफलताओं ने माधुरी के इरादों को मजबूती दी। माधुरी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि फिल्मों के असफल होने के कारण उनके अंदर गुस्सा था। उनको लगता था कि वो जो करना चाहती हैं उसमें असफल कैसे हो रही हैं। वो स्वयं को सही और दूसरों को गलत साबित करना चाहती थीं। तभी एन चंद्रा की फिल्म तेजाब आई और माधुरी स्टार बन गईं। उसके बाद की कहानी तो इतिहास में दर्ज है।   


Saturday, April 8, 2017

सोई धड़कन गा उठी

बहुत कम ऐसा होता है कि कोई फिल्मी गीत किसी नायिका के नाम के साथ चस्पां हो जाए । ऐसा ही हुआ आज से पच्चीस साल पहले रिलीज एक फिल्म बेटा की नायिका माधुरी दीक्षित के साथ । उस फिल्म के एक गाने के बोल धक धक करने लगा से माधुरी दीक्षित को एक नया नाम मिला था धक धक गर्ल ।  समीर के लिखे इस गीत को माधुरी दीक्षित ने अपनी नृत्यकला से अमर कर दिया । उनकी सेंसुअस अदा को जिस तरह से फिल्माया गया है वो दर्शकों के दिलो दिमाग पर छा जाता है । गाने के दौरान लाइटिंग का बेहतरीन इस्तेमाल पूरे माहौल को मादक बना देता है । माधुरी दीक्षित के स्टेप्स और उनके मूवमेंट इस गाने को मादकता की उस ऊंचाई पर ले जाते हैं जहां उनके चेहरे पर आने वाले भाव गाने के बोल के साथ मिलकर एक नए किस्म की प्रभावोदत्पकता पैदा करते हैं । लता मंगेशकर ने एक बार कहा था कि माधुरी दीक्षित की नृत्यकला को देखकर उनको वहीदा रहमान की याद आती है क्योंकि माधुरी उनकी ही तरह की समर्थ नृत्यांगना हैं । सिर्फ लता मंगेशकर ने ही नहीं बल्कि शबाना आजामी ने भी कुछ दिनों पहले ट्वीट करके कहा था कि एक बार फिर से धक-धक देखा । माधुरी की सेंसुअस अदा बगैर फूहड़ हुए मन मोह लेती है । दरअसल इस गाने में माधुरी ने जिस तरह नृत्य के दौरान मादकता को संभाला है और उसको जुगुप्साजनक होने से बचाया है यह उनकी बेहतरीन ट्रेनिंग का ही कमाल है ।
फिल्म बेटा के इस गाने के बनने की भी दिलचस्प कहानी है । धक धक करने लगा, हो मोरा जीयरा डरने लगा/ सैंया बैंया छोड़ ना, कच्ची कलियां तोड़ ना ये इस गीत का मुखड़ा है । इसके पहले जिस तरह से गायिका अनुराधा पौडवाल अंग्रेजी के शब्द आउच बोलती हैं और उसके बाद गहरी सांस का साउंड इफेक्ट डाला जाता है और उसपर माधुरी का बॉडी मूवमेंट इस गाने को एक अलग ही स्तर पर ले जाता है । जब ये गीत लिखा गया था तब इसकी शुरुआत आउच से नहीं होती थी लेकिन जब इसको कंपोज किया जा रहा था तो अचानक से गायिका अनुराधा पौडवाल ने संगीतकार आनंद-मिलिंद को ये सुझाव दिया जिसे रिकार्ड करने के बाद मान लिया गया और समीर ने भी इसपर कोई आपत्ति नहीं जताई । इस आउच से श्रोताओं को शुरुआत से ही ये गाना बांध लेता है ।
किसी भी गाने की सफलता के पीछे उसके बोल और नायिका की अदा तो रहती ही है लेकिन इनके बराबर अहमियत होती है उसके धुनों की । बेटा फिल्म के इस गाने की धुन मशहूर संगीत चित्रगुप्त के बेटों आनंद और मिलिंद ने बनाई थी । ये आनंद मिलिंद वही हैं जिन्होंने मंसूर खान की सुपरहिट फिल्म कयामत से कयामत तक के सुपरहिट गीत पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा का संगीत दिया था । इस दौर में आनंद मिलिंद ने कई प्रयोग किए थे । कयामत से कयामत तक के एक गाने काहे सताए, काहे को रुलाए, राम करे तुझको नींद ना आए में स्वरलहरी और ताल का ऐसा संगम पेश किया था जो उस वक्त के शोर शराबे वाली धुनों के बीच एकदम ताजा हवा के झौंके की तरह आया था । इसके बाद जब बेटा फिल्म के गानों को उन्होंने अपने धुनों से सहेजा तो उनकी गिनती चोटी के संगीतकार में होने लगी । आनंद मिलिंद की सबसे बड़ी खूबी ये थी वो इस समय तक अपनी स्वरलहरी को बरकरार रखने में कामयाब रहे थे । बाद में वो जब डेविड धवन की फिल्मों में धुन बनाने लगे तो स्वरलहरी का सिरा उनके हाथ से छूटता चला गया । हलांकि बाद की एकाध फिल्मों जैसे अमोल पालेकर की दायरा में बेहतर संगीत दिया लेकिन तबतक उनपर से ध्यान हट चुका था ।

बेटा फिल्म के निर्देशक इंदर कुमार चाहते थे कि इस फिल्म में एक ऐसा सेंसुअस गाना हो जो कि चार पांच साल पहले आई श्रीदेवी अनिल कपूर की फिल्म मिस्टर इंडिया के गाने काटे नहीं कटते ये रात दिन जैसा हो और इस गाने की वजह से दर्शक सिनेमा हॉल तक खिंचे चले आएं । इंदर कुमार ने अपनी इच्छा से सिर्फ गीतकार समीर को ही अवगत नहीं करवाया बल्कि उन्होंने इसके बीट्स कैसे हों इस बारे में आनंद मिलिंद से भी लंबी चर्चा की । आनंद मिलिंद के साथ बैठकर कई बीट्स सुने और इंदर कुमार ने उनको लोकधुनों समेत दक्षिण की कई फिल्मों के बीट्स सुनाए और कहा कि ऐसी धुन बनाओ जिसमें मेलोडी को कायम रखते हुए बीट्स और झंकार श्रोताओ को झंकृत कर सकें । इंदर कुमार की इस ख्वाहिश को पूरा करने के लिए समीर ने गीत लिखा, आनंद मिलिंद ने धुन बनाई और जब तैयारी हो गई तो फिर अनुराधा पौडवाल और उदित नारायण ने इसको अपनी आवाज दे दी । यह सब होने के बावजूद एक बड़ी समस्या आकर खड़ी हो गई जब ये पता चला कि ना तो फिल्म के नायक अनिल कपूर के पास डेट्स है और ना ही माधुरी के पास । निर्देशक इंदर कुमार ने परेशानी में दोनों को फोन कर ये आग्रह किया कि एक बार गाना सुन लें । अनिल कपूर और माधुरी ने जब गाना सुना तो दोनों इसको फिल्माने के लिए तैयार हो गए । रात में इस गाने को शूट किया गया और रिलीज के चंद दिनों पहले इसको फिल्म में जोड़ा गया । इंदर कुमार ने जब ये जोखिम उठाया था तब उनको भी शायद ही इस बात का अंदाज रहा होगा कि ये गाना इतना हिट होगा । अंदाजा तो माधुरी दीक्षित को भी नहीं रहा होगा कि जिस गाने के लिए उसके पास वक्त नहीं था वही गाना उनकी पहचान बन जाएगा । नया नाम दे जाएगा । अब भी माधुरी किसी शो में जाती हैं तो उनसे इस गाने की फरमाइश जरूर की जाती है । सही कहा गया है कि इतिहास बताकर नहीं बनता वो अनायस ही बन जाता है । धक-धक करने लगा इस बात की तस्दीक करता है ।