कांग्रेस के पूर्व नेता और देश के कानून मंत्री रहे हंसराज भारद्वाज एक बार फिर से विवादों में हैं । कर्नाटक के रा्ज्यपाल के तौर पर उन्होंने सूबे के मुख्यमंत्री वाई एस येदुरप्पा के खिलाफ केस चलाने की इजाजत देकर राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है । एक जमाने में देश में विकास और गुड गवर्नेंस की मिसाल देनेवाला यह राज्य आज अपने संवैधानिक प्रमुख और सरकार के मुखिया के बीच के विवादों की मिसाल कायम कर रहा है । राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच जारी इस तनातनी में राज्य का प्रशासन और विकास दोनों ठप हो गए हैं । कार्यपालिका के मुखिया के खिलाफ केस चलाने की इजाजत देने के बाद एक बार फिर से राज्यपाल की भूमिका पर सवाल खड़े होने लगे हैं। सवाल इस इजाजत का नहीं है, बड़ा मुद्दा तो वो है जो सतह पर दिखाई नहीं देता । जिस तरह से आनन फानन में कुछ लोगों ने राज्यपाल से मुख्यमंत्री येदुरप्पा के खिलाफ केस चलाने की इजाजत मांगी और हंसराज भारद्वाज ने त्वरित गति से कार्रवाई करते हुए उसकी इजाजत दे दी । उससे राज्यपाल की नीयत और उनकी मंशा दोनों पर सवाल खड़ा होते हैं । संविधान के मुताबिक राज्यपाल को मंत्रिमंडल की सलाह पर काम करना होता है लेकिन इस तरह के मामलों में राज्यपाल को मंत्रिमंडल की सलाह ठुकराकर स्वतंत्र रूप से फैसला लेने का अधिकार प्राप्त है । दो हजार चार में सुप्रीम कोर्ट की एक पांच सदस्यीय खंडपीठ में ऐतिहासिक फैसले में यह कहा था कि भ्रष्टाचार के मामलों में मंत्रिमंडल की सिफारिश को नामंजूर करते हुए राज्यपाल मंत्रियों के गैर कानूनी कामों और भ्रष्ट आचरण के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दे सकते हैं । मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री के खिलाफ केस चलाने या आरोपी बनाने की इजाजत देने के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि यह निर्णय लेते वक्त राज्यपाल को पूरी स्वतंत्रता है और वह मंत्रिमंडल की सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं है । जाहिर सी बात है पूर्व कानून मंत्री रहे भारद्वाज को अपने इस अधिकार का बखूबी पता था और उन्होंने इसका इस्तेमाल करते हुए येदुरप्पा के खिलाफ केस चलाने की इजाजत दे दी । उस इजाजत के पहले और बाद के गवर्नर के बयानों पर गौर करें तो उनकी राजनीतिक मंशा साफ तौर पर रेखांकित की जा सकती है । इस देश के संविधान में राज्यपाल से ये अपेक्षा की गई है कि वो दलगत राजनीति से उपर उठकर काम करें लेकिन कर्नाटक के राज्यपाल उससे उपर उठ नहीं सके । भारद्वाज के इस फैसले से देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक गलत परंपरा को मजबूती मिलती है । उसके बाद जिस तरह से देश के गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भारद्वाज का बचाव किया उससे भी यह शक गहरा होता है कि केंद्र के इशारे पर हंसराज भारद्वाज ने येदुरप्पा के खिलाफ मुकदमे को हरी झंडी दिखाई । चंद मामूली आरोपों के आधार पर अगर राज्यों के मुख्यमंत्रियों के खिलाफ मुकदमा चलाने को मंजूरी दी जाने लगे तो इससे देश के शासन तंत्र में बड़ा बखेड़ा खड़ा हो सकता है ।
अब अगर कल को कोई एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ रुपए के टेलीकॉम घोटाले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ मुकदमा चलाने की कार्रवाई की इजाजत के लिए कुछ लोग राष्ट्रपति के पास पहुंच जाते हैं और इसकी इजाजत मांगते हैं तो क्या राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रोसिक्यूशन को स्वीकृति देंगी । येदुरप्पा के खिलाफ अपने रिश्तेदारों को गैरकानूनी तरीके से जमीन आवंटन के आरोप लगे हैं । उसी तरह प्रधानमंत्री के दामन पर भी टेलीकॉम घोटाले के छींटे तो पड़ ही रहे हैं । कॉमनवेल्थ घोटाले में उस वक्त के केंद्रीय शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी से लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री तक पर घोटाले के परोक्ष आरोप लगे । अगर कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज के तरीके से लोकतंत्र चले तो राष्ट्रपति को किसी भी अदने से वयक्ति की शिकायत पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ केस चलाने की अनुमति दे देनी चाहिए । हंसराज भारद्वाज के इस कदम को सही ठहरानेवाले कांग्रेस के नेता छोटे लाभ के लिए बड़े मूल्यों और मानदंडों को भुलाने में लगे हैं ।
दरअसल भारद्वाज कांग्रेस की पुरानी परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं । राज्यपाल के पद का दुरुपयोग 1967 से देश में शुरू हुआ । यह वो दौर था जब देश में एक पार्टी का शासन चल रहा था और विपक्ष बेहद कमजोर था । जब 1967 में गैरकांग्रेसवाद की लहर चली और कई सूबों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनी तो केंद्र की कांग्रेसी सरकार ने राज्यपाल का इस्तेमाल चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने के लिए शुरू कर दिया । इमरजेंसी के बाद जब इंदिरा गांधी दुबारा चुन कर आई तो उन्होंने राजनीतिक तौर पर बदला चुकाने के लिए जनता पार्टी के शासन वाले नौ राज्यों की सरकारों को भंग कर दिया और वहां राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था । आजाद भारत के इतिहासक में इंदिरा गांधी ने राज्यपाल नाम की संस्था का सबसे ज्यादा दुरुपयोग किया और चुनी हुई सरकारों को भंग कर दिया । 1984 में आंध्र प्रदेश में जब एन टी रामाराव ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी उस वक्त ठाकुर रामलाल ने इंदिरा गांधी के हुक्म पर बहुमत होने के बावजूद रामाराव को सरकार नहीं बनाने दिया और उनकी बजाए कांग्रेस के भास्कर राव को सरकार बनाने का न्यौता दे दिया था । जबकि एन टी रामाराव 48 घंटे के भीतर सदन में बहुमत साबित करने को तैयार थे । बाद में चौतरफ दबाव में रामाराव को सरकार बनाने दिया गया था । उसी तरह से जम्मू और कश्मीर की चुनी हुई सरकार के मुखिया फारुख अबदुल्ला को जगमोहन ने बर्खास्त कर दिया । जब राज्यपाल की भूमिका को लेकर देशव्यापी बहस शुरू हुई और सरकार की जमकर आलोचना होने लगी तो राज्यपाल की नियुक्ति को लेकर सरकारिया कमीशन का गठन हुआ । 27 अक्तूबर 1987 को सरकारिया आयोग ने राज्यपाल की नियुक्तियों को लेकर कुछ सुझाव दिए थे जिसपर ज्यादा अमल हो ना सका । सरकारिया आयोग दो एक अहम सुझाव दिये थे – पहला कि घोर राजनीतिक वयक्ति को जो हाल तक सक्रिय राजनीति में रहा हो उसको राज्यपाल नहीं बनाया जाना चाहिए । दूसरा कि केंद्र में जिस पार्टी की सरकार हो उसके सदस्य को विपक्षी पार्टी के शासन वाले राज्य में राज्यपाल नियुक्त ना किया जाए । कर्नाटक के मामले में कांग्रेस ने दोनों सुझावों की अनदेखी की । केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह नहीं पानेवाले कानून मंत्री को खुश करने के लिए कर्नाटक जैसे अहम राज्य का राज्यपाल मनोनीत कर दिया जहां कि भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में सरकार काम कर रही थी । गौरतलब हैं कि ये वही हंसराज भारद्वाज जिनपर कानून मंत्री रहते बोफोर्स तौप सौदे के दलाल क्वात्रोकी के खिलाफ कार्रवाई में ढिलाई बरतने का संगीन इल्जाम लगा था । भारद्वाज अपने इन कार्यकलापों से भारतीय जनता पार्टी की चुनी हुई सरकार को मुश्किल में डालकर कांग्रेस पार्टी और आलाकमान की नजर में अपना नंबर बढा़ना चाहते हैं । हाल तक सक्रिय राजनीति करनेवाले हंसराज भारद्वाज राजभवन के रास्ते एक बार फिर से राजनीति में सक्रिय होना चाहते हैं, इसलिए येदुरप्पा सरकार की राह में रोड़े अटकाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते हैं । लेकिन कानून और संविधान के जानकार हंसराज भारद्वाज यह भूल जा रहे हैं कि इससे कई गलत परपंराओं की नींव डल रही है जो अगर नजीर बन गई तो लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं होगा ।
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Saturday, January 29, 2011
Monday, November 22, 2010
सिद्दांत पर भारी सत्ता लोलुपता
एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ के टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला और उसके पहले हजारो करोड़ के कॉमनवेल्थ घोटाला और मुंबई के आदर्श सोसाइटी घोटालों के शोरगुल के बीच सुदूर दक्षिण के राज्य कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदुरप्पा पर भी जमीन के घोटाले के संगीन इल्जाम लगे हैं । दरअसल यह पहली बार हो रहा है कि देश के दूसरे सबसे बड़े राजनैतिक दल भारतीय जनता पार्टी के किसी मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाटाचार के इतने संगीन आरोप लगे हों । हो सकता है कि इस घोटाले के बाद येदुरप्पा को राहत मिल जाए और वो कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने रहें । लेकिन अगर हम पार्टी विद अ डिफरेंस का दावा करनेवाली भारतीय जनता पार्टी में घट रही राजनीतिक घटनाओं का विश्लेषण करें तो इस पार्टी के सिद्धांतों और कार्यकलाप में कई अहम बदलाव रेखांकित किए जा सकते हैं । दो साल पहले बनी कर्नाटक की सरकार पर आए दिन स्थायित्व पर खतरा मंडराता रहता है । मुख्यमंत्री येदुरप्पा पर अपने बेटों को फायदा पहुंचाने के आरोप के पहले पिछले पंद्रह महीने में वहां तीन मंत्रियों को भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्त किया गया । तीन मंत्रियों में कृष्णैय्या सेट्टी को पैसा कमाने के लिए अपने पद के दुरुपयोग की वजह से हटाया गया । एक और मंत्री हलप्पा पर बलात्कार का आरोप लगा था जिसके बाद उन्हें मंत्रीपद से हाथ धोना पड़ा । यह सिलसिला यहीं नहीं रुका, सरकारी नौकरियों में धांधली के आरोप में रामचंद्र गौड़ा की बर्खास्तगी हुई । एक और मंत्री डी सुधाकर पर भी सरकारी कार्यक्रमों में नियमों के विपरीत धन आवंटन का गंभीर आरोप लगा । कयास लगाए जा रहे थे कि येदुरप्पा अपने मंत्रिमंडल में बदलाव के वक्त इनकी छुट्टी कर देंगे लेकिन सुधाकर किसी तरह से बचने में कामयाब रहे । इसके अलावा कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं की ख्याति किसी से छुपी नहीं है । उनके खिलाफ भी सीआईडी और लोकायुक्त की जांच चल रही है । सूबे में अवैध खनन का मामला सुपीम कोर्ट तक आया था । पिछले साल तो रेड्डी बंधुओं ने केंद्रीय नेताओं की शह पर पूरी कर्नाटक सरकार को बंधक बना लिया था और उनके खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई करने में खुद को अक्षम पाने के बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री दिल्ली आकर फूट-फूटकर रोए भी थे । बाद में किसी तरह से समझौता हुआ और सरकार बच पाई । एक लाचार मुख्यमंत्री के रूप जाने वाले येदुरप्पा ने बाद में मंत्रिमंडल में बदलाव कर सरकार पर अपनी मजबूत पकड़ होने के संकेत तो दिए हैं लेकिन तीन दलित मंत्रियों को एक साथ हटाने का एक गलत संदेश पूरे प्रदेश में गया । लेकिन येदुरप्पा सरकार पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं ।
दूसरी अहम राजनीतिक घटना जो बीजेपी में हुई वो थी झारखंड में जेएमएम के साथ सरकार बनाना । झारखंड में सत्ता में वापस आने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने बार-बाऱ धोखा देने वाले और पार्टी की सरेआम फजीहत करानेवाले शिबू सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा से समझौता कर सरकार बनाई । भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी जेएमएम के नेताओं के साथ गलबहियां करते बीजेपी नेताओं की तस्वीर देशभर के अखबारों में प्रमुखता से छपी । इन तस्वीरों से बीजेपी का चाल चरित्र और चेहरा तीनों उजागर हो गए । झारखंड मुक्ति मोर्चा के सुप्रीमो शिबू सोरेन पर भ्रष्टाचार से लेकर हत्या तक के कई मुकदमे चल रहे हैं । अपने पीए शशिनाथ झा की हत्या के संगीन इल्जाम भी उनपर हैं । सीबीआई की चार्जशीट में तो हत्या के अलावा भी कुछ इतर कारण भी दर्ज हैं । कहा तो यह भी जाता है कि सत्ता मोह में पार्टी ने इतनी हड़बड़ी दिखाई कि अध्य़क्ष गडकरी ने वरिष्ठ नेताओं तक को इस गठजोड़ की भनक नहीं लगने दी । राजनीतिक हलकों में तैर रही खबरों के मुताबिक पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने संघ के अपने आकाओं से हरी झंडी लेकर ना केवल सत्ता वापसी की रणनीति बनाई बल्कि उसे अंजाम तक भी पहुंचाया । अगर इन बातों में जरा भी सचाई है तो वह और भी चौंकानेवाली है क्योंकि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ सार्वजनिक जीवन में शुचिता की बात जोर शोर से करता रहा है ।
लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वंयसंवक संघ के प्रचारक रहे और बाद में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बने पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने बाइस से पच्चीस अप्रैल उन्नीस सौ पैंसठ के बीच पांच लंबी तकरीर दी थी । राजनैतिक अवसरवाद पर जोर देते हुए पंडित जी ने कहा था- किसी भी सिद्धांत को नहीं मानने वाले अवसरवादी लोग देश की राजनीति में आ गए हैं । राजनीतिक दल और राजनेताओं के लिए ना तो कोई सिद्धांत मायने रखता है ना ही उनके सामने कोई व्यापक उद्देश्य या फिर कोई एक सर्वमान्य दिशा निर्देश हैं । कोई भी नेता किसी पार्टी को छोड़कर दूसरी पार्टी में जाने को गलत नहीं मानता । राजनीति दलों के गठबंधन और विलय में भी कोई सिद्धांत या मतभेद काम नहीं करता है - वो विशुद्ध रूप से चुनाव में जीत हासिल करने के लिए या सत्ता पाने के लिए किया जा रहा है । पंडित जी ने यह सब सन पैंसठ में कहा था । उन्हें क्या मालूम कि जिस पार्टी को उन्होंने अपनी मेहनत और निष्ठा से खड़ा किया है वह भी उन्ही रास्तों पर चल पड़ेगी जिसके वो खिलाफ थे । झारखंड में तो साफ तौर पर यह रेखांकित किया जा सकता है कि सिर्फ सत्ता हासिल करने के लिए बीजेपी ने जेएमएम के साथ हाथ मिलाया ।
अपने उसी भाषण में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने यह भी कहा था कि राजनीति दलों और नेताओं के इन्हीं कृत्यों की वजह से जनता के मानस में उनको लेकर एक अविश्वास की स्थिति पैदा होती जा रही है । राजनीतिज्ञों को लेकर शायद ही कोई वजह बची हो जिसकी बिना पर देश की जनता के बीच उनकी साख कायम हो सके । यह स्थिति बेहद चिंतनीय है । सवाल यह उठता है कि क्या आज की भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ अपने नेता दीनदयाल उपाध्याय के सिद्धांतो से अलग रास्ते पर चल निकली है । क्या यही वजह है कि कांग्रेस सरकार पर लगातार भ्रष्टाचार के दलदल में डूबते जाने के बावजूद बीजेपी कोई राजनीतिक फायदा नहीं उठा पा रही है । कर्नाटक और झारखंड में पार्टी के कृत्यों से आज देश के जनमानस में पार्टी की साख कायम नहीं हो पा रही है । पार्टी नेतृत्व को लेकर देश की जनता और उनके खुद के कॉडर के मन में एक दुविधा की स्थिति है । अब वक्त आ गया है जब बीजेपी और संघ के नेताओं को बैठकर आत्ममंथन करना चाहिए और सत्तालोलुप पार्टी नेताओं पर लगाम लगानी चाहिए ताकि पंडित उपाध्याय जैसे संघ के नेताओं की आत्मा को शांति मिल सके ।
दूसरी अहम राजनीतिक घटना जो बीजेपी में हुई वो थी झारखंड में जेएमएम के साथ सरकार बनाना । झारखंड में सत्ता में वापस आने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने बार-बाऱ धोखा देने वाले और पार्टी की सरेआम फजीहत करानेवाले शिबू सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा से समझौता कर सरकार बनाई । भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी जेएमएम के नेताओं के साथ गलबहियां करते बीजेपी नेताओं की तस्वीर देशभर के अखबारों में प्रमुखता से छपी । इन तस्वीरों से बीजेपी का चाल चरित्र और चेहरा तीनों उजागर हो गए । झारखंड मुक्ति मोर्चा के सुप्रीमो शिबू सोरेन पर भ्रष्टाचार से लेकर हत्या तक के कई मुकदमे चल रहे हैं । अपने पीए शशिनाथ झा की हत्या के संगीन इल्जाम भी उनपर हैं । सीबीआई की चार्जशीट में तो हत्या के अलावा भी कुछ इतर कारण भी दर्ज हैं । कहा तो यह भी जाता है कि सत्ता मोह में पार्टी ने इतनी हड़बड़ी दिखाई कि अध्य़क्ष गडकरी ने वरिष्ठ नेताओं तक को इस गठजोड़ की भनक नहीं लगने दी । राजनीतिक हलकों में तैर रही खबरों के मुताबिक पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने संघ के अपने आकाओं से हरी झंडी लेकर ना केवल सत्ता वापसी की रणनीति बनाई बल्कि उसे अंजाम तक भी पहुंचाया । अगर इन बातों में जरा भी सचाई है तो वह और भी चौंकानेवाली है क्योंकि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ सार्वजनिक जीवन में शुचिता की बात जोर शोर से करता रहा है ।
लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वंयसंवक संघ के प्रचारक रहे और बाद में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बने पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने बाइस से पच्चीस अप्रैल उन्नीस सौ पैंसठ के बीच पांच लंबी तकरीर दी थी । राजनैतिक अवसरवाद पर जोर देते हुए पंडित जी ने कहा था- किसी भी सिद्धांत को नहीं मानने वाले अवसरवादी लोग देश की राजनीति में आ गए हैं । राजनीतिक दल और राजनेताओं के लिए ना तो कोई सिद्धांत मायने रखता है ना ही उनके सामने कोई व्यापक उद्देश्य या फिर कोई एक सर्वमान्य दिशा निर्देश हैं । कोई भी नेता किसी पार्टी को छोड़कर दूसरी पार्टी में जाने को गलत नहीं मानता । राजनीति दलों के गठबंधन और विलय में भी कोई सिद्धांत या मतभेद काम नहीं करता है - वो विशुद्ध रूप से चुनाव में जीत हासिल करने के लिए या सत्ता पाने के लिए किया जा रहा है । पंडित जी ने यह सब सन पैंसठ में कहा था । उन्हें क्या मालूम कि जिस पार्टी को उन्होंने अपनी मेहनत और निष्ठा से खड़ा किया है वह भी उन्ही रास्तों पर चल पड़ेगी जिसके वो खिलाफ थे । झारखंड में तो साफ तौर पर यह रेखांकित किया जा सकता है कि सिर्फ सत्ता हासिल करने के लिए बीजेपी ने जेएमएम के साथ हाथ मिलाया ।
अपने उसी भाषण में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने यह भी कहा था कि राजनीति दलों और नेताओं के इन्हीं कृत्यों की वजह से जनता के मानस में उनको लेकर एक अविश्वास की स्थिति पैदा होती जा रही है । राजनीतिज्ञों को लेकर शायद ही कोई वजह बची हो जिसकी बिना पर देश की जनता के बीच उनकी साख कायम हो सके । यह स्थिति बेहद चिंतनीय है । सवाल यह उठता है कि क्या आज की भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ अपने नेता दीनदयाल उपाध्याय के सिद्धांतो से अलग रास्ते पर चल निकली है । क्या यही वजह है कि कांग्रेस सरकार पर लगातार भ्रष्टाचार के दलदल में डूबते जाने के बावजूद बीजेपी कोई राजनीतिक फायदा नहीं उठा पा रही है । कर्नाटक और झारखंड में पार्टी के कृत्यों से आज देश के जनमानस में पार्टी की साख कायम नहीं हो पा रही है । पार्टी नेतृत्व को लेकर देश की जनता और उनके खुद के कॉडर के मन में एक दुविधा की स्थिति है । अब वक्त आ गया है जब बीजेपी और संघ के नेताओं को बैठकर आत्ममंथन करना चाहिए और सत्तालोलुप पार्टी नेताओं पर लगाम लगानी चाहिए ताकि पंडित उपाध्याय जैसे संघ के नेताओं की आत्मा को शांति मिल सके ।
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