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Saturday, November 19, 2022

हिंदू शासकों के पराक्रम की अनदेखी


भुवनेश्वर में आयोजित ओडिशा लिटरेरी फेस्टिवल के एक सत्र में इतिहास पर चर्चा थी। उसमें भाग ले रही इतिहासकार नंदिता कृष्णा ने इतिहास लेखन में असंतुलन का प्रश्न उठाया। इस प्रश्न पर कम या नहीं के बराबर चर्चा हुई है। नंदिथा के अनुसार भारत के इतिहासकारों ने दक्षिण भारत के हिंदू राजाओं के शौर्य, पराक्रम और सनातन संस्कृति से प्रेम के बारे में अपेक्षाकृत कम लिखा। इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में मुगलों के शासन काल, ब्रिटिश औपनिवेशिकता और स्वाधीनता आंदोलन के बारे में विस्तार से लिखा गया लेकिन महान भारतीय राजाओं या सम्राटों के बारे में संक्षेप में। 1206 से लेकर 1526 तक चला सल्तनत काल सिर्फ दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश तक सीमित था लेकिन उनको या फिर 1526 से लेकर 1739 तक के मुगल काल को इतिहास की पुस्तकों में प्रमुखता से स्थान दिया गया। उन्होंने इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद से लेकर आर सी मजुमदार तक की पुस्तकों का उदाहरण दिया। उनका दावा था कि ईश्वरी प्रसाद की पुस्तक में वैदिक काल, उत्तर वैदिक काल, जैन, बुद्ध, मौर्य सम्राज्य, शक, हूण, कुषाण, गुप्त काल और राजपूत राजाओं के बारे में 115 पृष्ठों में विवरण है लेकिन दक्षिण भारत के राजाओं और शासकों के बारे में सिर्फ सात पृष्ठों में। इसी तरह से मध्यकालीन इस्लामिक काल, जिसमें गजनी, गोरी के भारत पर आक्रमण गुलाम राजवंश, खिलजी, तुगलक, सैयद, लोदी और मुगलों के बारे में विवरण है, को 190 पृष्ठ दिए गए हैं। जबकि उसी काल में दक्षिण भारत के बारे में कोई विवरण इस पुस्तक में नहीं है। 

सिर्फ ईश्वरी प्रसाद की पुस्तक ही नहीं बल्कि उन्होंने आर सी मजुमदार और रोमिला थापर की पुस्तकों का उदाहरण भी दिया। आर सी मजुमदार की पुस्तक में भी उत्तर भारत के इतिहास के बारे में 171 पृष्ठ हैं जबकि सातवाहन, राष्ट्रकूट, पल्लव और चालुक्यों के बारे में सिर्फ नौ पृष्ठ। मध्यकाल में मुस्लिम आक्रांताओं के भारत आक्रमण पर 146 पेज, मुगल अफगान आक्रमणकारियों पर 192 पेज और विजयनगर के बारे में 77 पेज और ओडिशा में उस काल में घट रही घटनाओं पर सिर्फ 3 पेज। इसी तरह से रोमिला थापर की पुस्तक में उत्तर भारत के इतिहास पर 195 पृष्ठ और दक्षिण भारत के इतिहास पर सिर्फ 17 पेज।  

नंदिता कृष्णा ने इतिहास की पुस्तकों के इस असंतुलन को रेखांकित किया था। प्रश्न ये उठता है कि इतिहास की पुस्तकों के लेखकों ने ऐसा क्यों किया। जितनी जगह बादशाहों या मुस्लिम आक्रांताओं को दी गई उतना वर्णन दक्षिण भारत के हिंदू राजाओं के शासनकाल का क्यों नहीं किया गया। इस संदर्भ में दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य का जिक्र आवश्यक प्रतीत होता है। चोल साम्राज्य के शासक भारतवर्ष के पहले शासक थे जिन्होंने नौसेना का उपयोग करके अपने साम्राज्य को विस्तार दिया था। आज के श्रीलंका, मालदीव और इंडोनेशिया तक अपनी सत्ता कायम की थी। चोल सम्राट राजेन्द्र चोल प्रथम के पास कुशल नौसैनिकों और जहाजों का बहुत ही मजबूत बेड़ा था। उनके नौसैनिकों इतने कुशल थे कि वो हवा के रुख का भी अनुमान लगा लेते थे। इसी अनुमान पर आक्रमण की रणनीति बनती थी। इसी शक्ति के बल पर राजेन्द्र चोल प्रथम ने आज के सुमात्रा तक अपनी विजय पताका फहराई थी। राजेन्द्र चोल प्रथम के पिता राजराजा ने श्रीलंका पर आक्रमण करके उसको जीत कर अपने साम्राज्य में मिला लिया था। इतना ही नहीं उन्होंने आज के मालदीव को भी अपने साम्राज्य का हिस्सा बना लिया था। आज के इंडोनेशिया और उस समय के श्रीविजय के राजा का 14 बंदरगाहों पर आधिपत्य था। वो समुद्री रास्ते से होनेवाले कारोबार पर न केवल अपनी शर्तें थोपते थे बल्कि कारोबार को नियंत्रित भी करते थे। राजेन्द्र चोल को श्रीविजय के राजा संग्राम विजयतुंगबर्मन की ये नीतियां रास नहीं आ रही थी। लिहाजा उन्होंने एक साथ उनके चौदह बंदरगाहों पर हमला कर उनपर अपना आधिपत्य कायम कर लिया। उन्होंने राजा संग्राम को बंदी बना लिया था। कुछ इतिहास पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि राजेन्द्र चोल प्रथम ने राजा संग्राम विजयतुंगबर्मन की पुत्री से विवाह भी किया था। संभव है कि राजेन्द्र चोल ने अपने साम्राज्य से होनेवाले व्यावसायिक हितों की रक्षा के लिए सुमात्रा पर हमला किया हो लेकिन इससे उनके शौर्य और पराक्रम को कम नहीं किया जा सकता है। नंदिथा कृष्णा ने भी इस बात को रेखांकित किया था कि चोल साम्राज्य के राजा भारत के पहले हिंदू शासक थे जिन्होंने समुद्री रास्ते से जाकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया था और उसको श्रीलंका से लेकर सुमात्रा तक फैलाया था। 

तंजावुर के शिलालेख में भी राजेन्द्र चोल प्रथम के इस नौसैनिक अभियान का उल्लेख मिलता है। राजेन्द्र ने इस आक्रमण के लिए अपने जहाज के माध्यम से हाथियों को भी रणभूमि में भेजा था। हाथियों पर सवार सैनिक श्रीविजय के बंदरगाहों पर धावा बोला था और विजय में निर्णाय़क भूमिका निभाई थी।  इतिहास में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ये कहा जा सकता है कि चोल राजवंश ने बहुत लंबे समय तक शासन किया। पूरी दुनिया में इतने लंबे समय तक एक भूभाग पर एक ही राजवंश के शासन का उदाहरण कम मिलता है। कहा जाता है कि चोल राजवंश सबसे लंबे कालवधि तक राज करनेवाला वंश था। चोल राजवंश के बारे में अशोक के शिलालेखों में भी उल्लेख मिलता है और उनको मौर्य शासकों का मित्र बताया गया है। चोल राजवंश के हिंदू राजाओं के शौर्य और पराक्रम की चर्चा इतिहास की पुस्तकों में कम है। इतना ही नहीं उनके कला और संस्कृति प्रेम और इस क्षेत्र में उनके योगदान को भी रेखांकित करने का उपक्रम नहीं किया बल्कि वामपंथी इतिहासकारों ने तो इसको प्रयासपूर्वक ओझल किया। 

इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि इतने बड़े तथ्य या इतनी बड़ी ऐतिहासिक घटना को इतिहासकारों ने अपने लेखन के केंद्र में क्यों नहीं रखा। दरअसल इसके पीछे अपने विचारधारा को पुष्ट करने की मंशा दिखाई देती है। वामपंथी और नेहरूवादी इतिहासकारों ने स्वाधीनता के बाद इतिहास लेखन की जो पद्धति अपनाई वो इतिहास लेखन कम वैचारिक प्रोपगैंडा अधिक था। चाहे वो प्राचीन भारत का इतिहास लिख रहे थे या मध्यकालीन भारत का या फिर आधुनिक भारत का उन्होंने एजेंडा और प्रोपगैंडा को महत्व दिया। स्कूली पाठ्यक्रम लिखने का जिम्मा इन्हीं वामपंथी इतिहासकारों को मिला। वामपंथी इतिहासकारों ने जनता की दृष्टि से इतिहास को देखने का प्रचार तो किया लेकिन जन इतिहास लेखन की पद्धति के पीछे पार्टी की विचारधारा थी। वामपंथी इतिहासकारों ने लेखन के समय एक और छल किया कि उन्होंने हिंदू धर्म सिद्धांतों की अनदेखी की। उसकी मौलिकता को रेखांकित करने की बजाए वो आक्रांताओं की संस्कृति और कला को महत्व देने लगे। यहां भी चोल राजवंश का उदाहरण देना उपयुक्त रहेगा। चोल राजवंश के समय कला और संस्कृति को खूब बढ़ावा मिला। स्थापत्य कला की दृष्टि से भी अनेक उत्कृष्ट मंदिरों का निर्माण हुआ। मंदिरों पर जिस तरह की कलाकारी की गई वो अप्रतिम है। कहा जाता है कि नटराज की जो मूर्ति प्रचलन में है उसको चोल राजवंश के ही किसी राजा ने बनवाया था। उसके पहले शिव की उस मुद्रा की मूर्ति के साक्ष्य नहीं मिलते हैं। वामपंथी इतिहासकारों ने जिस तरह से इतिहास लिखा उससे समाज के विभाजित होने का खतरा है। आर्य-अनार्य की अवधारणा ,जाति और वर्ग के आधार पर किसी कालखंड का मूल्यांकन करके वामपंथी इतिहासकारों ने विभाजन के बीज डाले। इतिहास लेखन में जो असंतुलन दिखाई देता है उसे दूर करने के लिए भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद को पहल करनी चाहिए। इस समय राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन का कार्य चल रहा है। पाठ्य पुस्तक तैयार करते समय भी इस असंतुलन को दूर किया जाना चाहिए।