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Sunday, July 26, 2026

हिंदी का संवादप्रिय आलोचक


हिंदी अकादमिक और साहित्य जगत में नामवर सिंह का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी जन्म शताब्दी वर्ष में उनके लेखन और भाषणों पर समग्रता में विचार करने की आवश्कता है। नामवर सिंह पर अधिकांश लेख भक्ति भाव से लिखे जाते रहे हैं। बहुत कम लेख ऐसे लिखे गए जो उनकी रचनात्मकता के आधार पर उनका मूल्यांकन करने जैसा हो। या तो प्रशंसात्मक लिखा गया या उनकी व्यक्तिगत आलोचना की गई। नामवर सिंह ने अपने आरंभिक दिनों में विपुल लेखन किया। बाद में उन्होंने वाचन विधा को अपना लिया। मनसा वाचा कर्मणा वो आजीवन कम्युनिस्ट रहे। उनके लेखों में कभी भी कम्युनिस्ट विचारधारा से विचलन देखने को नहीं मिलता है। नामवर सिंह एक सच्चे पार्टी कार्यकर्ता की तरह साहित्य में भी अपनी विचारधारा के कार्यकर्ता थे। लेनिन का एक लेख है ‘पार्टी साहित्य और पार्टी संगठन’। इस लेख में वो पार्टी लेखकों से पक्षधरता का आग्रह करते हैं। नामवर सिंह के लेखन में लेनिन का वो आग्रह साकार दिखाई देता है। आलोचक होने के नाते उनका दायित्व था कि खोज-खोजकर हिंदी साहित्य के कवियों-लेखकों को मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित बताना और स्थापित करना। निराला को लेनिन के प्रभाव में बताने के लिए वो उनकी 1920 की एक कविता बादल राग की पंक्तियां लेकर आए थे। पंक्ति है- तुझे बुलाता कृषक अधीर/ऐ विप्लव के वीर। अब इस पंक्ति में चूंकि कृषक भी है और विप्लव भी तो निराला कम्युनिस्ट हो गए। नामवर सिंह ने तो जयशंकर प्रसाद पर भी लेनिन का प्रभाव देखा और कहा भी। दिनकर की किसी कविता में लेनिन का नाम आया तो उनको कम्युनिस्ट बताने लगे थे। प्रेमचंद को तो कम्युनिस्ट बता ही चुके थे। नामवर सिंह ने जो राह दिखाई थी उनके कम्युनिस्ट चेले उसी पर चलकर इन लेखकों कवियों के बारे में बोलने-लिखने लगे। परिणाम ये हुआ कि इन लेखकों का इकहरा और दोषपूर्ण मूल्यांकन हुआ। 

जब नामवर सिंह लेखन से वाचन की ओर आए तो उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा पर भी प्रहार किया। विचारधारा को लेकर चलनेवाले इस नामवर आलोचक ने किसी गोष्ठी में कह दिया कि विचारधारा हमें अमानवीकृत करती है। फिर किसी गोष्ठी में कह दिया कि शुक्र है कि हमारे देश में कम्युनिष्टों का शासन नहीं है वर्ना हम सभी यानि उनसे असहमति रखनेवाले जेलों में बंद होते। एक और इसी तरह का बयान था-भारतीय समाज में जो दुर्गति समाजवाद की है साहित्य में वही प्रतिबद्धता की। इन बयानों पर प्रगतिशील जमात के लेखकों ने खूब हो हल्ला मचाया था। एक बार मैंने राजेन्द्र यादव से पूछा था कि नामवर सिंह इस तरह के बयान क्यों देते हैं? उन्होंने छूटते ही कहा कि वो प्रचार-प्रिय आलोचक हैं। उनको पता है कि कैसे चर्चा के केंद्र में रहा जाता है। नामवर सिंह ने भी अशोक वाजपेयी के साथ एक बातचीत में कहा था कि विवादों के माध्यम से सिद्धांत का विकास हो सकता है और इनके माध्यम से ठोस साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन की दिशा में भी हम पाठकों की समझ ज्यादा बढ़ा सकते हैं, विकसित कर सकते हैं। उसी बातचीत में ये भी कहा था कि विवाद आलोचना कर्म और आलोचना धर्म में ही निहित है। नामवर सिंह के शिष्यों ने उनके व्याख्यानों को लिपिबद्ध कर पुस्तकाकार प्रकाशित करवाया है। उन व्याख्यानों से नामवर सिंह की जो तस्वीर बनती है वो लेखक नामवर सिंह से अलग है। ऐसा प्रतीत होता है कि नामवर सिंह लिखे हुए शब्दों और बोले गए शब्दों के महत्व को समझते थे। लिखे हुए को संशोधित करना या बदलना या अपनी स्थापना से पलट जाना कठिन होता है जबकि व्याख्यानों में ये सुविधा होती है। नामवर सिंह का जिस समय हिंदी साहित्य में डंका बज रहा था उस समय संचार के माध्यम बहुत ही कम थे। नामवर सिंह ने इसका लाभ उठाया। 

नामवर सिंह की आलोचना में तमाम विचलन होने के बावजूद इतना तो स्वीकार करना होगा कि उनके अध्ययन का दायरा बहुत विशाल था। उन्होंने हिंदी, संस्कृत, उर्दू और विदेशी साहित्य बहुत पढ़ा था। एक तरफ अपने व्याख्यानों में वो श्रीरामचरितमानस की पंक्ति उद्धृत करते थे तो मीर और गालिब की शायरी का भी धड़ल्ले से प्रयोग करते थे। अपनी स्थापना के समर्थन में विदेशी आलोचकों और लेखकों को उद्धृत करते थे। उनके व्याख्यानों से ये लगता है कि वो हर गोष्ठी में पूरी तैयारी के साथ जाते थे और कुछ न कुछ नया देने की कोशिश करते। जब भी वो विचारधारा और राजनीति से मुक्त होकर अकादमिक स्तर पर बोलते तो उनका व्याख्यान सुनने योग्य होता था। उनकी आलोचना का जो वाचिक स्वरूप था वो विमर्शात्मक होता था लेकिन जब वो लिखते थे तो सृजनात्मक हो जाते थे। नामवर सिंह ने कभी स्वयं इस बात को स्वीकार किया था कि सिद्धांत निर्माण की जगह मूल्ययांकन पर प्रतिक्रिया देकर संवाद बढ़ाया जाना अधिक बेहतर है। नामवर सिंह ने छायावाद पर जो पुस्तक लिखी थी उसने अपने समय में छायावाद पर नए सिरे से साहित्य जगत को सोचने पर मजबूर किया था। कविता के नए प्रतिमान और कहानी नई कहानी उनकी दो पुस्तकों ने हिंदी साहित्य पर विचार करने की एक नई जमीन तैयार की थी। उसी तरह से जैसे डा रामविलास शर्मा ने ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ लिखकर हिंदी नवजागरण को समझने की नई दृष्टि दी थी। नामवर सिंह क्रिया केवलम उत्तरम को अपना आदर्श वाक्य मानते थे और जीवन के अंतिम दिनों तक वो इसपर डटे रहे। बाद के दिनों में जब उनपर बहुत व्यक्तिगत हमले होने लगे थे तो एक दिन मैंने उनसे इस बाबत पूछा था। उन्होंने कहा- चढ़िए हाथी ज्ञान को, सहज दुलीचा डाल/स्वान रूप संसार है, भूंकन दे झकमार। 


Saturday, February 21, 2026

साहित्य से छंटती विवादों की धुंध


इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर उपभोक्ताओं के व्यतीत किए जानेवाले समय को लेकर इन दिनों खूब चर्चा हो रही है। इन प्लेटफार्म्स की सार्थकता को लेकर पक्ष विपक्ष के तर्क सामने आते रहते हैं। फेसबुक से लेकर एक्स और इंस्टा जैसे प्लेटफार्म पर डाली जानेवाली सामग्री चर्चा कें केंद्र में रहती है। हिंदी साहित्य के अधिकतर लोग फेसबुक पर अपनी मन की बात लिखते हैं। कोई पुस्तकों के बारे में बताता है तो कोई वैचरिक वातें करता है। कुछ कवि अपनी कविताओं का पाठ करके वीडियो फेसबुक पर डालते हैं। स्मार्ट फोन का चलन बढ़ने से और फोन के कैमरे की क्वालिटी बेहतर होने से वीडियो पोस्ट करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। कई बार फेसबुक पर इतिहास की घटनाओं की जानकारी भी मिल जाती है। कोई चर्चित साहित्यिक प्रसंग और उसपर हुई चर्चा भी अचानक आपके सामने आ जाती है। पिछले दिनों फेसबुक पर स्क्रोल करते समय एक ऐसे ही विवादित प्रंसग की जानकारी मिली। नामवर सिंह और उनके अनुज काशीनाथ सिंह की टिप्पणी और उसपर महाश्वेता देवी का प्रतिकार। ये पोस्ट कोलकाता से निकलनेवाली पत्रिका लहक के संपादक निर्भय देव्यांश की थी। इस पोस्ट में नामवर सिंह और काशीनाथ सिंह के बयान की चर्चा थी।  उक्त पोस्ट में लिखा था कि लखनऊ में एक पत्रिका के कार्यक्रम में नामवर सिंह ने साहित्यकारों की हैसियत सत्ता के समक्ष कांता यानि जोरू जैसी बताया। वहीं उनके कहानीकार भाई काशीनाथ सिंह ने कहा था कि साहित्यकार गांव के सिवान पर मुंह ऊपर उठाकर भूंकता हुआ कुकूर है। इसी पोस्ट के नीचे बांग्ला की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी की अंग्रेजी में लिखी हस्तलिखित प्रतक्रिया थी। जिसका अनुवाद है, मैं यह जानकर बहुत आहत हुई कि सम्मानित लेखक नामवर सिंह ने कहा है कि आज के लेखक सत्ता के समझ लार टपकानेवाले कुत्ते हैं, वे रखैल और जोरू की तरह हैं। उनके छोटे भाई भी उनके इस बयान से सहमत हैं। महाश्वेता देवी ने लिखा कि 29.4.2012 के समाचारपत्र में प्रकाशित समाचार को पढ़कर उनका दिल टूट गया। उन्होंने आगे लिखा कि वो बचपन से ही एक ऐसे भारत में विश्वास करती हैं जिसमें हिंदी, बांग्ला, मराठी, गुजराती, उर्दू व अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य का साझा विकास हो। यह संपदा सिर्फ भारत के पास है। महाश्वेता देवी ने अपनी हस्तलिखित नोट पर 4 मई 2012 की तिथि अंकित की थी। 

नामवर सिंह और काशीनाथ सिंह ने अगर इस तरह का बयान दिया था, महाश्वेता जी के पत्र से तो यही लगता है, तो यह बेहद आपत्तिजनक था साथ ही महिला और साहित्यकार विरोधी भी। हिंदी के शीर्ष आलोचक और प्रमुख कथाकार अगर अपने साथी लेखकों के बारे में इस तरह की बातें करेंगे तो अन्य भाषा के साहित्यकारों की बीच हिंदी जगत की क्या छवि बनी होगी। इस बात की कल्पना की जा सकती है। दरअसल हिंदी में ये देखा जाता है कि जो साहित्यकार शीर्ष पर पहुंच जाते हैं वो अपने साथी साहित्यकारों को हेय दृष्टि से देखने लगते हैं। उनका श्रेष्ठता बोध उनको अहंकारी बना देता है। अशोक वाजपेयी से लेकर रवीन्द्र कालिया तक इसके शिकार रहे हैं। राजेन्द्र यादव इसके अपवाद रहे हैं। वो लेखकों पर तीखा हमला करते थे, नाम लेकर करते थे, लेकिन कभी भी वो समान्यीकरण के शिकार नहीं होते थे। वो इस तरह की गर्वोक्ति नहीं कहते थे कि हिंदी के लेखकों को हवाई जहाज पर मैंने चढ़ाया। जब मैंने निर्भय की फेसबुक वाल पर ये पोस्ट देखी तो मुझे दशकों पहले एक चैनल पर करीब 20 वर्ष हुई परिचर्चा का स्मरण हो उठा। इस परिचर्चा में रवीन्द्र कालिया, ज्ञानरंजन, मैनेजर पांडे, विभूति नारायण राय, संतोष भारतीय,अखिलेश और मैंने हिस्सा लिया था। चर्चा का विषय था हिंदी साहित्य में विवादों का गिरता स्तर। हिंदी साहित्य में विवादों के स्तर पर होते हुई चर्चा साहित्य के सत्ता केंद्रों तक पहुंच गई। संतोष भारतीय ने रवीन्द्र कालिया से दिल्ली के साहित्यिक मठाधीश के बारे में जानना चाहा।  रवीन्द्र कालिया ने चर्चा का रुख मेरी तरफ मोड़ते हुए कहा था कि अनंत उन मठाधीशों को जानते हैं। अनंत उनको साहित्य का ब्रह्मा विष्णु महेश कहते हैं। मैं उन्हें ऐसा नहीं मानता बल्कि मैं उन तीनों को साहित्य का कफ, पित्त और वात कहता हूं। चर्चा में शामिल सभी लोगों को पता था कि कालिया जी नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी और राजेन्द्र यादव के बारे में बोल रहे थे। आज से करीब तीस वर्ष या उसके भी पहले हिंदी साहित्य में नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी और राजेन्द्र यादव की तूती बोलती थी। नामवर सिंह नियमित अंतराल पर विवादित बयान देते रहते थे। कई बार उन बयानों से लक्षित साहित्यकार या साहित्य समूह आहत भी होते थे। उनके विरुद्ध प्रदर्शन आदि भी होते थे। नरेन्द्र कोहली जी तो जीवनपर्यंत नामवर सिंह के आलोचक रहे और साहित्य को समग्रता में नहीं देखने की प्रवृत्ति के प्रवर्तक भी मानते रहे। अपनी विचारधारा के औसत लेखकों को बढ़ावा देनेवाले और विपरीत विचारधारा वाले लेखकों को हाशिए पर रखनेवाले मठाधीश।

एक बार फिर लौटते हैं नामवर और काशीनाथ सिंह के उक्त बयान पर जिसमें साहित्कारों पर अपमानजनक टिप्पणी की गई। उस टिप्पणी से दोनों भाइयों की मानसिकता का भी संकेत मिलता है। महाश्वेता देवी ने बहुत सधे हुए तरीके से अपनी प्रतिक्रिया दी थी। उस समय फेमिनिज्म का इतना जोर नहीं था अन्यथा नामवर सिंह के कथन पर उनकी जमकर आलोचना होती। प्रश्न ये उठता है कि साहित्य में इस तरह की टिप्पणियां शीर्ष पर माने जानेवाले साहित्यकार क्यों करते थे। दरअसल नामवर सिंह जिस कथित प्रगतिशील विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे उसमें महिलाओं को लेकर एक विचित्र भाव था। नामवर सिंह की उक्त टिप्पणी पर याद पड़ता है शायर कैफी आजमी की पत्नी शौकत कैफी से जुड़ा एक प्रसंग। शौकत कैफी ने अपनी किताब ‘यादों की रहगुजर’ में लिखा है कि शादी के बाद वो मुंबई (तब बांबे) में एक कम्यून में रहती थीं। उनको एक बेटा हुआ जो टी बी के कारण काल के गाल में समा गया। शौकत पूरी तरह से टूट गई थीं। दुख से उबरने की कोशिश में उनको पता चला कि वो फिर से मां बनने वाली हैं। अपनी इस खुशी को शौकत ने कम्यून में साझा की । तब शौकत कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले चुकी थी। पार्टी को जब इसका पता चला तो पार्टी ने शौकत से गर्भ गिरा देने का फरमान जारी किया। ये कैसी अमानवीय विचारधारा है। महिलाओं को लेकर कितना असंवेदनशील रवैया। हिंदी के शीर्ष आलोचक नामवर सिंह उसी विचारधारा के लंबे समय तक ध्वजवाहक रहे थे।  

हिंदी में विवादों की एक लंबी परंपरा रही है लेकिन साहित्यिक सत्ता में जब से मठाधीशी आरंभ हुई तब से व्यक्तिगत टिप्पणियां अधिक होने लगी। व्यक्ति केंद्रित कहानियां पहले से अधिक लिखी जाने लगी। हंस पत्रिका के पुनर्प्रकाशन के बाद इस प्रवृत्ति को मंच मिला। उदय प्रकाश ने कई ऐसी कहानियां लिखीं जिसके केंद्र में साहित्यकार लेखक थे। अशोक वाजपेयी ने साथी लेखकों पर कई व्यक्तिगत टिप्पणियां कीं। नामवर जी को अचूक अवसरवादी कहा। आज कम से उस तरह के विवाद साहित्य जगत में नहीं हैं। अपमानित करने की मंशा से होनेवाले विवादों का धुंध झंट सा गया लगता है।              


Saturday, June 7, 2025

कम्युनिस्ट नैरेटिव के नामवर आलोचक

हिंदी आलोचना में नामवर सिंह का नाम आदर के साथ लिया जाता रहा है। आरंभिक दिनों में उन्होंने विपुल लेखन किया। कालांतर में लेखन उनसे छूटा। वो भाषण और व्याख्यान की ओर मुड़ गए। दोनों स्थितियों में नामवर सिंह ने कम्युनिस्ट पार्टी के लिए कार्य किया। उनके निर्देशों के आधार पर नैरेटिव बनाने और बिगाड़ने का खेल खेला। आलोचना में भी उन्होंने नैरेटिव ही गढ़ा। उनके लेखों के विश्लेषण से ये स्पष्ट है। नामवर सिंह के शिष्यों ने उनके व्याख्यानों का लिप्यांतरण करके पुस्तकें प्रकाशित करवाईं। पिछले दिनों नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह और उनके जीवनीकार अंकित नरवाल ने एक पुस्तक संकलित-संपादित की, जमाने के नायक। प्रकाशन वाणी प्रकाशन से हुआ है। पुस्तक की भूमिका में नरवाल ने नामवर सिंह के बनने और सुदृढ होने को रेखांकित किया। उनकी प्रशंसा की, जो स्वाभाविक ही है। इस पुस्तक के लेखों में नामवर सिंह की आलोचना में फांक दिखती है। आलोचक कम पार्टी कार्यकर्ता अधिक लगते हैं। जिन साहित्यिक घटनाओं और कथनों को उद्धृत करके स्थापना देते हैं वो उनकी आलोचकीय ईमानदारी और विवेक
को संदिग्ध बनाती है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से प्रकाशित पुस्तक ‘लेनिन और भारतीय साहित्य’ से साभार नामवर सिंह का एक लेख इस पुस्तक में है। नामवरीय आलोचना का ऐसा उदाहरण जो उनकी छवि को धूमिल करता है। नामवर सिंह 1917 के बाद भारत की राजनीति को लेनिन से जोड़कर रूसी क्रांति के प्रभाव की पताका फहराते हैं। साहित्य में भी।  वो लिखते हैं, साहित्य का इस वातावरण से सर्वथा अस्पृष्ट रहना असंभव था। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना आकस्मिक नहीं बल्कि इन घटनाओं की सहज परिणति थी जिसके संगठनकर्ता लेनिन के विचारों को मानने वाले नौजवान कम्युनिस्ट थे, किंतु जिसमें निराला और पंत जैसे हिंदी के कवियों ने सहर्ष भाग लिया और अखिल भारतीय ख्याति के कथाकार प्रेमचंद ने जिसके अधिवेशन की अध्यक्षता की।

इसी पुस्तक में एक और लेख संकलित है, गोर्की और हिंदी साहित्य। यहां वो जोर देकर कहते हैं कि, तथ्य है कि गोर्की की मृत्यु से तीन महीने पहले प्रेमचंद प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना में योग देकर भारत में प्रगतिशील साहित्य के आंदोलन का सूत्रपात कर चुके थे। प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष पद से उन्होंने जो भाषण दिया था, वो गोर्की के विचारों का भारतीय भाष्य मात्र नहीं बल्कि भारत को अपने ऐतिहासिक संदर्भ में निर्मित साहित्य का सर्जनात्मक दस्तावेज है। यहां वो फिर से ये कहते हैं कि प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता की। नामवर ऐसा कहते हुए कहीं भी किसी सोर्स का उल्लेख नहीं करते हैं। सुनी-सुनाई बातें बार-बार लिखते हैं। नामवर सिंह और उन जैसे अन्य पार्टी लेखकों के कहने पर मान लिया गया कि प्रेमचंद ने अध्यक्षता की थी। नामवर को किसी दस्तावेज आदि के आधार पर ये कहना चाहिए था। उल्लेख तो इस बात का भी मिलता है कि प्रेमचंद जैनेन्द्र के कहने पर अधिवेशन में शामिल होने चले गए थे। उनका भाषण देने का कार्यक्रम नहीं था। जब अधिवेशन में पहुंचे तो वहां उपस्थित साहित्यकारों ने उनसे आग्रह किया और वो मंच से बोले। इसको प्रचारित करवा दिया गया कि प्रेमचंद प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापकों में से थे। बाद में संशोधन कर कहा जाने लगा कि वो पहले अधिवेशन के अध्यक्ष थे। अब प्रेमचंद के प्रगतिशील लेख संघ में दिए गए भाषण के अंश को देखते हैं, ‘प्रगतिशील लेखक संघ यह नाम ही मेरे विचार से गलत है। साहित्यकार या कलाकार स्वभावत: प्रगतिशील होता है। अगर वो इसका स्वभाव न होता तो शायद वो साहित्कार ही नहीं होता। उसे अपने अंदर भी एक कमी महसूस होती है, इसी कमी को पूरा करने के लिए उसकी आत्मा बेचैन रहती है।‘ सामान्य सी बात है कि अगर वो अध्यक्षता कर रहे होते तो ये प्रश्न नहीं उठाते। नामवर सिंह कहते हैं कि प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना में उनका योगदान था। अगर योगदान होता तो प्रगतिशीलता के नाम पर प्रेमचंद संघ के संस्थापकों के साथ पहले चर्चा करते। मंच से आपत्ति क्यों करते। अजीब मनोरंजक बात है कि लेखक संघ का नाम तय हो रहा था और स्थापना में योगदान करनेवाले को पता नहीं था। 

नामवर सिंह कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े थे। पार्टी के बाहर के लेखकों को वो येन केन प्रकारेण कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित साबित करने में लगे रहते थे। इसके लिए चाहे किसी भी शब्द की कैसी भी व्याख्या क्यों न करनी पड़े। इसके पीछे भी लेनिन की सीख थी। उक्त लेख में नामवर सिंह ने उल्लेख किया है, लेनिन का एक निबंध पार्टी साहित्य और पार्टी संगठन, जिसमें पार्टी लेखकों से पूरी पक्षधरता का आग्रह किया गया था। नामवर सिंह ने लेनिन की पक्षधरता वाली बात अपना ली। अब निराला को लेनिन के प्रभाव में बताने के लिए वो उनकी 1920 की एक कविता बादल राग की पंक्तियां लेकर आए। पंक्ति है- तुझे बुलाता कृषक अधीर/ऐ विप्लव के वीर। अब इस पंक्ति में चूंकि कृषक भी है और विप्लव भी तो निराला कम्युनिस्ट हो गए। विप्लव शब्द का प्रयोग निराला बांग्ला के प्रभाव में करते रहे हैं। राम की शक्ति पूजा से लेकर तुलसीदास जैसी उनकी लंबी कविता में भी ये प्रभाव दिखता है। खेत-खलिहान, किसान-मजदूर को बहुत आसानी से नामवर सिंह जैसे नैरेटिव-मेकर्स ने सर्वाहारा बना दिया था। नामवर सिंह ने तो जयशंकर प्रसाद को भी लेनिन से प्रभावित बता दिया। दिनकर की कविता में लेनिन शब्द आया तो उसपर लेनिन के विचारों का प्रभाव। वो स्वाधीनता के आंदोलन और आंदोलनकर्ताओं की भावनाओं को नजरअंदाज करके उसपर लेनिन की छाप बताने में लगे रहे। लेखकों को कम्युनिस्ट घोषित और स्थापित करते रहे, तथ्यों की व्याख्या से छल करते हुए। प्रेमचंद अगर कह रहे हैं कि आनेवाला जमाना अब किसानों मजदूरों का है तो उनको कम्युनिस्ट या लेनिन के प्रभाव वाले बताने में नामवर ने जरा भी विलंब नहीं किया। वो कम्युनिस्टों को लाभ पहुंचानेवाला नैरेटिव गढ़ रहे थे। नामवरी आलोचना का एक और उदाहरण देखिए, ‘निराला ने भी प्रेमचंद की तरह लेनिन पर स्पष्टत: कहीं कुछ नहीं लिखा पर उनकी विद्रोही प्रतिभा में लेनिन का प्रभाव बीज रूप में सुरक्षित अवश्य था।‘ ये विद्रोही प्रतिभा अंग्रेजों के खिलाफ उस दौर के सभी लेखकों कवियों में मिलता है। एक जगह कहते हैं कि प्रेमचंद समाजवादी यथार्थवाद से प्रभावित थे या नहीं, इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है लेकिन इतना निश्चित है कि...। यह वही प्रविधि है जिसका निर्वाह इतिहास लेखन में रोमिला थापर और बिपिन चंद्रा जैसे इतिहासकारों ने किया। वो अपनी स्थापना तो देते हैं लेकिन साथ ही लिख देते हैं, इट अपीयर्स टू बी, पासेबली, प्रोबैबिली आदि। इस प्रविधि का लाभ ये होता है कि आम पाठक वही समझता है जो लेखक कहना चाहता है। कभी अगर स्थापना पर सवाल उठे तो इन शब्दों की आड़ लेकर बचकर निकल सके। आज इस बात की आवश्कता प्रबल होती जा रही है कि नामवर सिंह ने कम्युनिस्ट पार्टी के लिए जो नैरेटिव गढ़ा उसको उजागर किया जाए क्योंकि उस नैरेटिव से किसी भी रचनाकार का सही आकलन संभव नहीं। 


Saturday, April 27, 2024

पार्टी भक्ति से संदिग्ध साहित्यधर्मिता


इस वक्त देश में आम-चुनाव चल रहे हैं। दो चरणों के लिए मतदान संपन्न हो चुके हैं। चुनाव के बीच इंटरनेट मीडिया पर साहित्यकारों का एक खेमा जमकर राजनीति की बात करता है। खुद को कथित रूप से प्रगतिशील कहने और देश में धर्मनिरपेक्षता की वकालत करनेवाले लेखक दिन-रात राजनीति पर लिखते रहते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना करते रहते हैं। कुछ लेखक तो राजनीतिक दलों के पूर्णकालिक कार्यकर्ता के तौर पर खुद को प्रस्तुत करते हैं। उनके लेखन में वामपंथ का एजेंडा साफ दिखता है। यह अलग बात है जबसे जनता ने वाम दलों को नकार दिया है तब से तमाम वामपंथी लेखकों को कांग्रेस में भविष्य नजर आने लगा है। ऐसे लेखक भी कांग्रेस की जयकार करते हुए भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आलोचना में जुटे रहते हैं। स्वयं को प्रगतिशील साबित करने की होड़ में बहुधा आलोचना की मर्यादा तोड़ते नजर आते हैं। फेसबुक, एक्स (पहले ट्विटर) और इंस्टा चूंकि स्वच्छंद इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स हैं, इसलिए वहां मर्यादाविहीन टिप्पणियां देखने को मिलती हैं। इस स्तंभ में कई बार इसकी चर्चा की जा चुकी है कि लेखक संगठनों, प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच, से जुड़े लेखक अपनी लेखन के लिए अपने राजनीतिक आकाओं का मुंह जोहते रहते हैं। कहना न होगा कि इन संघों से जुड़े लेखक अपनी रचना में भी जबरन पार्टी के सिद्धांतों को ठूंसने का प्रयत्न करते रहे हैं, अब भी कर रहे हैं। यह अकारण नहीं है कि हिंदी का पाठक साहित्य से दूर होता जा रहा है। इन वामपंथी लेखक संघों से जुड़े लेखक जिन साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक आदि हैं वो पत्रिकाएं भी संबंधित कम्युनिस्ट पार्टी का मुखपत्र नजर आता है। उसी तरह की कृतियों का चयन किया जाता है और उसपर एक खास वैचारिक दृष्टि से विचार करके उनको चर्चित करने का प्रयास किया जाता है। उन्हीं विषयों पर चर्चा की जाती है जिनमें भारतीय जनता पार्टी की आलोचना की संभावना हो। 

इंटरनेट मीडिया पर इन वामपंथी और कथित प्रगतिशील लेखकों की टिप्पणियों को देखते हुए 1974 में नामवर सिंह के लिखे एक लेख, प्रगतिशील साहित्य धारा में अंध लोकवादी रुझान, की पंक्तियों की याद आती है।  नामवर सिंह ने आज से पांच दशक पहले ये माना था कि वामपंथ से जुड़े लेखक पार्टी लाइन पर लेखन करते हैं। पचास वर्षों बाद भी बहुत कुछ नहीं बदला है। नामवर सिंह ने तब लिखा था, भारत में इस समय तीन या चार कम्युनिस्ट पार्टियां हैं और इनके अलावा भी अपने आपको मार्क्सवादी कहनेवाले कुछ समुदाय तथा व्यक्ति हैं, जिनमें से हर एक के पास कुछ न कुछ लेखक या तो संबद्ध हैं या सहानुभूति रखते हैं। इसलिए अपनी अपनी पार्टियों या समुदायों की राजनीतिक ‘लाइन’ के अनुसार लेखकों की राजनीतिक दृष्टि में भिन्नता स्वाभाविक है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि इन लेखकों से दलगत निष्ठा, प्रतिबद्धता या राजनीति से ऊपर उठने की बात कहना ज्यादती है। ऐसा कहने के पीछे नामवर सिंह का उद्देश्य चाहे जो रहा हो लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि वो ये स्वीकार कर रहे हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियों या मार्क्सवादी समुदायों से जुड़े लेखक राजनीतिक ‘लाइन’ पर लेखन कर रहे थे। नामवर सिंह ने अपने इस लेख में मार्क्सवाद को वैश्विक दृष्टि जरूर करार दिया लेकिन ऐसी कई बातें कह गए जो वामपंथी लेखकों की पोल खोल कर रख देते हैं। वो आगे कहते हैं कि एक निष्ठावान लेखक से उसकी राजनीति की साहित्यिक अंतर्वस्तु की मांग तो की ही जा सकती है क्योंकि एक लेखक के नाते उसका अपना कर्मक्षेत्र तो साहित्य ही है। विचित्र विडंबना है कि अधिकांश लेखक अपनी रराजनीति के अभीष्ट साहित्यिक रूपांतर में या तो असमर्थ हैं या फिर अनजान हैं। दरअसल इस समस्या के समाधान की उम्मीद अनेक निष्ठावान लेखकों को अपनी पार्टी के राजनीतिक नेताओं से है।...किसी समानधर्मा राजनीतिकर्मी तथा बुद्धिजीवी के अनुभव-ज्ञान का लाभ उठाना एक बात है, किंतु साहित्य के जिस क्षेत्र से उनका परिचय नही हैं उसके बारे में उससे समाधान की उम्मीद करना उसके साथ सरासर ज्यादती है। 

पता नहीं क्यों नामवर सिंह अपने वामपंथी कामरेडों पर इतने कुपित थे। उन्होंने यहां तक कह दिया कि राजनितिज्ञों से समाधान की उम्मीद करने से किसी लेखक की पार्टी-भक्ति भले ही प्रमाणित हो,उसकी अपनी सृजनशीलता और साहित्यधर्मिता संदिग्ध हो जाती है। राजनीति के पराश्रयी और राजनीतिक नेताओँ के पिछलग्गू लेखक ही इस दिशा में प्रवृत्त होते हैं। कोई स्वाभिमानी और सुबुद्ध साहित्यकार इस पराश्रयी वृत्ति को स्वीकार नहीं कर सकता है। नामवर की इन टिप्पणियों से स्पष्ट हो रहा है कि वामपंथी लेखक पार्टी-भक्ति करते रहे हैं, राजनीतिक नेताओं के पिछलग्गू रहे हैं और उनकी साहित्यधर्मिता संदिग्ध है। पार्टी भक्ति करनेवाले वामपंथी लेखकों पर नामवर सिंह ने 1974 जो बातें कही थीं उसका कोई असर नहीं दिखता है। अब भी जो पुराने, नववामपंथी या वामपंथ में इंटर्नशिप कर रहे लेखक सभी इसी लीक पर चल रहे हैं। वामपंथ कमजोर हुआ। वामपंथ कांग्रेस का पिछलग्गू बना। तो इस श्रेणी के लेखक भी कांग्रेस के पिछलग्गू बनकर इंटरनेट मीडिया पर क्रांति (?) करने में जुट गए। इस तरह के लेखक देशी विदेशी लेखकों का नाम लेकर अपनी विद्ता से जनता को प्रभावित करना चाहते हैं लेकिन जिस तरह से हर जगह ये सेलेक्टिव होकर बात करते हैं, वैसे ही विदेशी लेखकों को उद्धृत करने में भी इसी सलेक्टिव प्रविधि का उपयोग करते हैं। ग्राम्शी के लिखे को उद्धृत करते हैं। ये कभी नहीं बताते कि उन्होंने कहा था कि ‘राजनीतिज्ञ साहित्य-कला की दुनिया में अपने समय की एक निश्चित सांस्कृतिक दुनिया के निर्माण के लिए दबाव डालते हैं।‘ स्वाधीनता के बाद से ही कम्युनिस्ट नेता हमारे देश में भी साहित्य और कला के क्षेत्र में अपने तरह की सांस्कृतिक दुनिया बनाना चाहते थे। इसके लिए उन्हें पहले सोवियत रूस से और बाद में चीन से दिशा निर्देश मिलते थे। उन दिशा निर्देशों के अनुसार उन्होंने कला जगत को अपने कब्जे में लिया। 

वामपंथी लेखकों के साथ दिक्कत ये रही है कि वो बहुधा अपनी रचनाओं में राजनीतिक परिवर्तन का नारा लगाते रहे हैं। उनके लिए विरोधी विचारधारा की सरकार और सत्ता हमेशा से दमन का माध्यम है। वो वैचारिक रूप से विरोधी सरकार पर तमाम तरह के आरोप लगाते रहे हैं। अभिव्यक्ति की स्वाधीनता से लेकर संविधान के खतरे में होने तक का। राजनीतिक आरोपों में वो ऐसे फंसते हैं कि सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव के पक्ष में बातें नहीं कर पाते हैं। कम्युनिस्टों ने हमारे देश के लेखकों को प्रगतिशील संज्ञा दी। साथ ही प्रगतिशीलता और क्रांति की ऐसी घुट्टी पिलाई कि अधिकतर लेखक राजनीतिक बदलाव के पक्ष में रचनाएं लिखने लगे। होना यह चाहिए था कि वो समाज और संस्कृति को प्रभावित करनेवाली रचनाएं लिखते। ऐसी रचनाएं पाठकों के समक्ष रखते जिनसे पाठकों में भारत की संस्कृति के प्रति एक समझ बनती। भारत की सांस्कृतिक पहचान को गाढ़ा करनेवाली कहानियां, उपन्यास, कविताएं लिखी जाती। लेकिन हुआ इसके उलट। वामपंथी प्रगतिशील लेखकों ने खुद तो इस तरह की रचनाएं लिखी नहीं, जो लेखक इस तरह की रचनाएं लिख रहे थे उनको भी षडयंत्रपूर्वक हाशिए पर डाल दिया गया। कई बार अपमानित किया गया। योग्य लेखकों को सम्मान पुरस्कार से दूर रखा। लेखक संघों ने लेखकों के हितों में कोई कार्य किया हो ये ज्ञात नहीं है। वैचारिक संघर्ष की आड़ में ये दूसरे संघों से जुड़े लेखकों को नुकसान पहुंचाने में जुटे रहे। बेहतर होता कि ये लेखकों के हितों की रक्षा के लिए एकजुट होते। लेखकों के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए सरकार पर दबाव बनाते। पर ऐसा हो न सका। परिणाम लेखक संगठन भी अप्रसांगिक हो गए।  


Saturday, April 13, 2024

ईमानदारी और नैतिकता से बनेगी साख


कभी उपन्यास सम्राट प्रेमचंद ने कहा था कि साहित्य राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल है। इस समय लोकसभा चुनाव की सरगर्मी है। पांच दिनों बाद लोकसभा चुनाव के पहले चरण के लिए मतदान होगा लेकिन राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल कहीं दिखाई नहीं दे रही है। ऐसा क्या हुआ कि राजनीति के आगे चलनेवाला साहित्य गौण हो गया और राजनीति प्रमुख हो गई। क्या राजनीति ने साहित्य और साहित्यकारों को महत्व देना बंद कर दिया, या राजनीति के आगे साहित्य की मशाल थाम कर चलनेवाला कद्दावर साहित्यकार समकालीन साहित्य जगत में कोई बचा ही नहीं। स्वाधीनता के बाद कई ऐसे साहित्यकार हुए जो राजनीति में भी गए। कई साहित्यकार तो संसद और विधानसभाओं में भी पहुंचे। वो किसी मुद्दे पर जब बोलते या लिखते थे तो पूरा देश उनको सुनता था और उनके कहे का एक सम्मान होता था। संविधान लागू होने के 15 वर्षों बाद जब हिंदी के राजभाषा के दर्जा को लेकर राजनीति होने लगी तो संसद में साहित्य जगत के प्रतिनिधि के तौर पर नामित साहित्यकारों ने अपने विचारों से सरकार और समाज दोनों को प्रभावित किया था। दिनकर ने राज्यसभा में अपने भाषण में लालबहादुर शास्त्री के एक वक्तव्य पर कटाक्ष किया था। लाल बहादुर शास्त्री ने एक वक्तव्य कहा था कि  ‘हम अंग्रेजी को अनिश्चित काल के लिए जीवन-दान दे रहे हैं, अनंत काल के लिए नहीं।‘ तब दिनकर ने शास्त्री को घेरते हुए कहा था कि  ‘जिस प्रकार सरकार इस बारे में कार्य करती है, उससे मुझे भय होता है कि वह ‘कल-कल’ की बात अनंत काल तक बढ़ जाएगी।‘ 1962 में जब चीन ने भारत पर हमला किया था तब भी साहित्यकारों ने नेहरू जी को घेरा था। उनके निर्णयों की जमकर आलोचना की थी। इमरजेंसी के दौर में कई साहित्यकार जेल गए। इंदिरा गांधी का विरोध किया। कविताएं लिखीं, लेख लिखे। कई बार किसानों और गरीबों की समस्याओं पर लिखा। कहना न होगा कि साहित्यकारों ने समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी भूमिका को समझते हुए अपनी आवाज से लोकतंत्र को बल दिया था। 

लेखक-साहित्यकार स्वयं को अपनी ईमानदारी और नैतिकता से स्थापित करता है। इमरजेंसी के बाद से ही साहित्य और साहित्यकारों की ईमानदारी कठघरे में आ गई थी। इमरजेंसी के दौर में कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े कुछ लेखकों ने इंदिरा गांधी और इमरजेंसी का समर्थन किया था। उसके बाद लेखक संगठनों ने भी काफी गड़बड़ियां की जिससे जनता के बीच साहित्यकारों की छवि एक दल विशेष के कार्यकर्ता की बनती चली गई। विचारधारा विशेष की जकड़न में साहित्यकारों ने सच कहना बंद कर दिया। पार्टी और लेखक संघों से संबद्ध लेखक पार्टी और संघ की लाइन पर चलते दिखने लगे। उनके विचारों से वस्तुनिष्ठता कम होने लगी। लंबे अंतराल तक ऐसा चलने का परिणाम यह हुआ कि उनकी विश्वसनीयता छीजने लगी। 2015 में जब कुछ साहित्यकारों ने मोदी सरकार के विरुद्ध असहिष्णुता का आरोप लगाकर पुरस्कार वापसी का प्रपंच रचा तो शोर-शराबा तो बहुत हुआ, पर उसका प्रभाव जनमानस पर कम पड़ा। बाद में ये बात भी स्पष्ट हो गई कि बिहार विधानसभा चुनाव को प्रभावित करने के लिए कुछ लेखकों ने नेताओं के साथ मिलकर पुरस्कार वापसी का अभियान चलाया था। इस प्रसंग ने भी साहित्यकारों की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया। यह बात सार्वजनिक हो गई कि भारतीय जनता पार्टी और मोदी विरोध में पुरस्कार वापसी का अभियान चला था। कुछ लेखक और कलाकार राजनीति के टूल बन गए थे। 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले भी विचारधारा विशेष के इन्हीं लेखकों ने मोदी सरकार के विरुद्ध एक हस्ताक्षर अभियान चलाकर माहौल बनाने का प्रयास किया था। प्रभाव शून्य रहा था। यह अनायास नहीं है कि इस समय अधिकतर लेखक खामोश हैं या उनकी सर्जनात्मकता वो प्रभावोत्पादकता पैदा नहीं कर पा रही जो राजनीति के आगे मशाल  बनकर चल सके। 

इसका एक दूसरा पहलू भी है। जब प्रेमचंद ने कहा था कि साहित्य राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल है तब अपने उसी वक्तव्य में उन्होंने एक और बात कही थी। प्रेमचंद ने साहित्य को परिभाषित करते हुए कहा था कि साहित्य मन का संस्कार करता है। मन के संस्कार की बात तो दूर तथाकथित प्रगतिशील विचारधारा के साहित्यकारों ने व्यवहार को संस्कारित करने का कार्य करना भी बंद कर दिया। भारतीय संस्कारों को आगे बढ़ाने और समाज के बीच उन संस्कारों को गाढ़ा करने के बजाय विदेशी संस्कृति के संस्कारों को भारतीय पाठकों पर थोपने का कार्य किया था। विदेशी संस्कृति के रंग को गाढ़ा करने के लिए उन्होंने भारत और भारतीयता से जुड़े साहित्य और साहित्यकारों को नीचा दिखाना आरंभ कर दिया। जब उनकी ही विचारधारा के लेखक रामविलास शर्मा ने ऋगवेद पर लिखना आरंभ किया तो नामवर सिंह और उनकी मंडली ने उनको हिंदूवादी कहकर उपहास किया था। जब विद्यानिवास मिश्र जैसे लेखकों ने सनातन परंपराओं और पौराणिक ग्रंथों पर लिखना आरंभ किया तो नामवर सिंह ने उनको विद्याविनाश कहकर उनको अपमानित किया था। कुबेरनाथ राय जैसे निबंधकार को प्रगतिशीलों ने न केवल दरकिनार किया बल्कि लंबे समय तक उनके लेखन पर चर्चा ही नहीं की। भला हो साहित्य अकादमी और राष्ट्रीय पुस्तक न्यास का कि इन दोनों संस्थाओ ने कुबेरनाथ राय की रचनाओँ का संचयन प्रकाशित किया। नरेन्द्र कोहली से लेकर कमलकिशोर गोयनका तक ऐसे कितने ही लेखक हैं जिनको इस विचारधारा के पोषकों ने अपमानित किया। 

इन सबका परिणाम यह हुआ कि कम्युनिस्ट पार्टी या विचारधारा से संबद्ध लेखकों की साख समाप्त होती चली गई । आज हालत ये है कि हिंदी में कोई सार्वजनिक बुद्धीजीवी बचा ही नहीं। अशोक वाजपेयी गाहे बगाहे पब्लिक इंटलैक्टुअल की पोजिशनिंग करने का प्रयत्न करते हैं। लेकिन उनके पास इस पोजिशनिंग के लिए कुछ खास औजार नहीं बचे हैं। बार-बार असहिष्णुता और लोकतंत्र के सिकुड़न का राग अलापते हैं। कांग्रेस पार्टी से उनकी निकटता और उसके प्रदर्शन के कारण उनकी मनचाही छवि बन नहीं पाती। पहले अर्जुन सिंह से निकटता और अब राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में हिस्सा लेकर उन्होंने रही सही साख भी खो दी है। पहले अज्ञेय को बूढ़ा गिद्ध कहते हैं और बाद में अज्ञेय की प्रशंसा करते हैं। लेखकों की खामोशी का एक दूसरा पक्ष भी है। वह पक्ष है कि पिछले 10 वर्षों में नरेन्द्र मोदी सरकार ने साहित्य और शिक्षा को समृद्ध करने के लिए प्रशंसनीय प्रयास किया। साहित्य अकादमी ने अपने आयोजनों में विचारधारा को आधार बनाए बिना लेखकों को जुटाकर विश्वस्तरीय आयोजन किए। शिमला और भोपाल में उन्मेष नाम के कार्यक्रम में साहित्य अकादमी ने मोदी के विचार सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास और सबका विश्वास को साकार किया। एक जमाना था जब साहित्य अकादमी में वामपंथियों का दबदबा था और दूसरे विचार के साहित्यकार अघोषित प्रतिबंध का सामना करते थे। पिछले दस वर्षों में साहित्य अकादमी में सभी विचारों के लेखकों का प्रवेश संभव हुआ। सिर्फ इन दो कार्यक्रमों में ही नहीं बल्कि हाल ही समाप्त हुए साहित्योत्सव में भी संस्थान का समावेशी चरित्र गाढ़ा हुआ। ऐसे माहौल में वामपंथ से संबद्ध लेखकों को कहने के लिए कुछ बचा नहीं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र को भी अभिजात्य से मुक्ति मिली और वह भी एक समावेशी संस्था के रूप में स्थपित हुआ। दस वर्ष पहले वहां भी भारत और भारतीयता को लेकर जो उपेक्षा भाव था वो खत्म हुआ, बिना किसी के प्रति नकारात्मक हुए। इसके अलावा 2020 में घोषित राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं महत्व दिया गया। इसके कारण भारतीय भाषा भाषियों के बीच हिंदी को लेकर वैमनस्यता का भाव लगभग खत्म हो गया। साहित्य को राजनीति के आगे मशाल लेकर चलने की आवश्यकता आज भी है लेकिन उसके लिए विचार का साथ चाहिए विचारधारा की नहीं। 

Sunday, April 7, 2024

चुनावी जंग में साहित्यिक योद्धा


आगामी 19 अप्रेल को लोकसभा के चुनाव के प्रथम चरण के लिए वोट डाले जाएंगे। इस चुनाव में भारतीय भाषा के कई साहित्यकार और कवि अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। ऐसे राजनेता-साहित्यकार के बारे में देश को जानना चाहिए। ऐसे साहित्यकारों और कवियों के बारे में आगामी अंकों में बताएंगे लेकिन पहले उन पूर्वज साहित्यकारों के बारे में जान लेते हैं जिन्होंने सक्रिय राजनीति भी की और चुनाव भी लड़ा। 

एक बार किसी कार्यक्रम में राष्ट्रकवि दिनकर और उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पहुंचे थे। कार्यक्रम स्थल पर जाने के दौरान नेहरू सीढ़ियों पर लड़खड़ा गए थे, उस वक्त दिनकर ने उनका हाथ थाम लिया था। जवाहरलाल नेहरू ने इसके लिए दिनकर को धऩ्यवाद कहा। धन्यवाद के उत्तर में दिनकर ने कहा था ‘जब जब सत्ता लड़खड़ाती है तो सदैव साहित्य ही उसे संभालती है।‘ दिनकर ने उस समय चाहे ये बात हल्के अंदाज में कही हो लेकिन इसके मायने बहुत गंभीर हैं। स्वाधीनता के बाद कई ऐसे साहित्यकार हुए जिनको संसद के उच्च सदन में समय समय पर राष्ट्रपति ने नामित किया। कुछ ऐसे साहित्यकार-कवि हुए जिन्होंने लोकसभा चुनाव जीतकर संसद की गरिमा बढ़ाई तो कुछ ऐसे साहित्यकार हुए जिन्होंने लोकसभा का चुनाव तो लड़ा पर हार गए। 

सबसे पहले बात कर लेते हैं पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की। वाजपेयी कवि थे और उनके कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। राजनीति के मैदान में उतरे लेकिन उनका कवि मन पद्य में रमा रहा। पहला चुनाव 1952 में लड़ा लेकिन जीत नहीं सके। वाजपेयी ने हार नहीं मानी और 1957 में लोकसभा चुनाव जीत कर संसद पहुंचे। फिर हार जीत लगी रही। अटल जी की कविताओं का संग्रह मेरी इक्यावन कविताएं को लोगों ने खूब पसंद किया था। गीत नया गाता हूं और हिंदू तन मन हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय जैसी पंक्तियां अब भी लोगों को याद हैं। अटल जी कविताओं की भाषा उनको समकालीन कवियों से अलग दिखाती हैं। 

यह बहुत कम लोगों को पता होगा कि आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान वो धर्मवीर भारती के साथ मोर्च पर गए थे और वहां से उन्होंने रिपोर्ताज लिखे जो धर्मयुग पत्रिका में प्रकाशित हुए थे। विष्णुकांत शास्त्री कलकत्ता विश्वविद्यालय में आचार्य रहे। वे हिंदी के उन विरल आचार्यों में थे जिन्होंने कई विधाओं में श्रेष्ठ लेखन किया। आलोचना, निबंध, कविता के अलावा निराला और तुलसी की रचनाओं पर लिखा। दर्शन में उनकी विशेष रुचि थी और उन्होंने ज्ञान और कर्म के नाम से एक पुस्तक लिखी। 1944 में वो राष्ट्रीय स्वयंसेव संघ से जुड़े और 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर बंगाल विधानसभा के सदस्य चुने गए। कालांतर में उन्होंने हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल का दायित्व मिला। 

हिंदी आलोचना की जब भी चर्चा होती है तो नामवर सिंह का नाम आता है। उनकी पुस्तक दूसरी परंपरा की खोज काफी चर्चित रही और इस पुस्तक पर उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। उनकी पुस्तक हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग भी उल्लेखनीय रही। कहानियों पर वो नियमित स्तंभ लिखते रहे और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र के संस्थापक भी रहे। नामवर सिंह ने 1959 में चंदौली (उप्र) से कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन बुरी तरह से पराजित हो गए। उसके बाद हलांकि उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन प्रगतिशील लेखक संघ के माध्यम से राजनीति करते रहे। 

ख्यात हिंदी कवि बालकवि वैरागी में कवित्व के अलावा राजनीति भी कूट कूट कर भरी हुई थी। जितना वो काव्य मंचों पर सक्रिय रहते थे उससे अधिक राजनीति में उनकी सक्रियता रहती थी। जब वो मंच पर कविता पाठ करते थे तो उनकी ओजपूर्ण वाणी से श्रोता मुग्ध हो जाते थे। उनकी कविता झर गए पात, बिसर गए टहनी काफी लोकप्रिय रही। उन्होंने बच्चों के लिए भी काफी कविताएं लिखीं। कई फिल्मों के लिए गीत भी लिखे। वो मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के रहनेवाले थे। सक्रिय राजनीति में रहे और विधानसभा और लोकसभा का चुनाव लड़कर विधायक और सांसद बने। राज्यसभा के भी सदस्य रहे।      

    


Monday, November 13, 2023

मन के अंदर हों श्रीराम - मिश्र


हिंदी साहित्य के इतिहास में रामदरश मिश्र संभवत: पहले ऐसे लेखक हैं जो अपनी जन्म शताब्दी की देहरी पर खड़े हैं। अस्सी वर्षों से निरंतर साहित्य की विभिन्न विधाओं में सार्थक लेखन से उन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। इस उम्र में भी वो साहित्यिक बैठकी में जमकर संस्मरण सुनाते हैं और युवा लेखकों का उत्साहवर्धन भी करते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शिक्ष रहे रामदरश मिश्र के अंदर अब भी उनका गांव बसता है। गांव की चर्चा होते ही उनका चेहरा प्रफुल्लित हो जाता है। वो मानते हैं कि अनुभव और मानवीय मूल्य ही किसी रचना को उत्तम बनाते हैं। दैनिक जागरण के एसोसिएट एडिटर अनंत विजय ने  रामदरश मिश्र से उनके आरंभिक जीवन, शिक्षण के अनुभव, उनकी रचना प्रक्रिया, समकालीन साहित्यिक, सामाजिक, राजनीतिक परिदृश्य और अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण को लेकर उनसे लंबी बातचीत की। यह भी जानने का प्रयास किया गया कि उनके शतायु होने का राज क्या है। प्रस्तुत है उनसे विस्तृत बातचीत के प्रमुख अंशः

-आज का जो साहित्यिक परिदृश्य है, जिस तरह की चीजें लिखी जा रही हैं, उससे आपको कितनी संतुष्टि होती है या जितना आप पढ़ पाते हैं इस अवस्था में आने के बाद, जितना आपको सुनाया जाता है, या जितना आप जानते हैं, कोई आश्वस्ति होती है या लगता है कि जैसे कुछ छूट रहा है?

- पहली बात, मेरा लिखना-पढ़ना दोनों बंद हो गया है। जब लिखने की क्षमता कम हुई तो अपनी सर्जना को डायरी के माध्यम से, कभी-कभी गजल के माध्यम से व्यक्त करता रहा हूं।  मुझे लगता है कि इन दिनों चाहे गजल या कविता हो या कहानी, उनमें वो ऊंचाई नहीं है, गहराई नहीं है जो कुछ समय पहले तक थी। नागार्जुन, केदारनाथ, भवानी भाई के साथ जुड़ा हूं। इन लोगों को पढ़ने का जो एक आनंद था, वो मुझे महसूस नहीं होता है। किसी अच्छे कवि से संपर्क होता है, तो पता चलता है कि कुछ अच्छा भी लिखा जा रहा है। लेखन कोई भी हो, उसमें अपनापन होना चाहिए। जब जब हम चीजों को जीते हैं, तो जो रचनाएं उनकी अभिव्यक्ति होती हैं, वे प्रभावशाली होती हैं। उनमें अपने परिवेश से उपजा अनुभव होता है। हालांकि कई बार मात्र अनुभव ही पर्याप्त नहीं होता। लेखक अपने अनुभव से लिखते हैं, लेकिन लेखक का अपना निर्णय भी होता है कि क्या देना चाहिए और क्या नहीं।

- आपकी एक कविता है कि आप पहुंचे छलांगे लगाकर वहां मैं पहुंचा धीरे-धीरे। आप धीरे-धीरे लक्ष्य तक पहुंचे। साहित्य में प्रतिष्ठा मिली जो एक आलोचना का परिदृस्य था, काफी समय तक आपके साहित्य को मान्यता नहीं दी। उसमें कभी ऐसा लगा कि आपका देय आपको नहीं मिला?

- मेरा स्वभाव महत्वाकांक्षी नहीं है। मैं अपना काम करता हूं और यदि वो काम अच्छा होता है तो संतोष मिलता है, नहीं तो यह भी विश्वास रहता है कि कल वहां ये पहुंचेगा, जहां इसे पहुंचना चाहिए। लोगों की उपेक्षा से दुख इसलिए भी नहीं हुआ क्योंकि मैं मानता था कि एक विचारधारा है, एक दल है, वही सब कुछ निर्णय कर रहा है। वे अपने से अलग लोगों को हाशिये पर डाल रहे हैं, इसलिए उनकी चिंता मत करो, बस लिखते जाओ। यदि मैं उसमें शामिल हो गया होता तो मुझे भी वही मिलता, लेकिन मैं किसी दल से संबद्ध नहीं हुआ। बीएचयू में रहते हुए दो तीन-साल के लिए कम्युनिस्ट हुआ था लेकिन जल्दी ही ज्ञात हो गया कि उसके प्रभाव में जो लिख रहा हूं वो ठीक नहीं है। जब मेरी किताब आई तो उन कविताओं को हटा दिया। मैंने कोशिश की कि अपना रास्ता बनाऊं। अपने रास्ते पर चलने वालों की तारीफ करूं।  जिन पत्रिकाओं को मैं समझता था कि कुछ खास लोगों की हैं, जैसे अशोक बाजपेयी की 'पूर्वाग्रह', नामवर सिंह की 'आलोचना' हो, राजेंद्र यादव की 'हंस' हो वहां मैंने कुछ दिया ही नहीं, उन्होंने सम्मान से कुछ मांगा भी नहीं, एक तरह से अच्छा ही हुआ । मेरी नियति कुछ अजीब है। लगता है कि मेरा अपकार कर रही हैं, दुख दे रही है, फिर लगता है कि उस क्रिया में ही तो इतना सम्मान था। यौवनकाल में सब मस्ती से जी लेते हैं, लेकिन बुढा़पा सन्नाटों में भर जाता है, मेरी नियति ने बुढ़ापे को सम्मान से भर दिया। मुझे वृद्धावस्था में सम्मान और लोगों का प्यार मिल रहा है।

नियति पर बहुत भरोसा है, क्या आप भाग्यवादी हैं?

- भाग्यवादी नहीं हूं लेकिन जैसा मैंने अनुभव किया है उसके माध्यम से ये बात कह रहा हूं कि जब मेरे साथ दुर्घटना होती है तो लगता है कि एक बुरी नियति से जुड़ा हुआ हूं, लेकिन जब उसका दूसरा परिणाम आता है तो लगता है कि उस नियति का एक दूसरा पहलू भी है।

- आप बीएचयू के उस हिंदी विभाग में रहे हैं, जिसकी तुलना नामवर सिंह ने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से की है कि वहां भी तीन बड़े आलोचक रहे। उन्होंने रामचंद्र शुक्ल रचनावली की भूमिका में ये बात कही बीएचयू में आचार्य शुक्ल, नंददुलारे वाजपेजी, हजारीप्रसाद द्विवेदी की त्रिमूर्ति थी। द्विवेदी जी की यादें साझा करेंगे कि वे कैसे छात्रों से मिलते थे। उन पर आरोप लगा कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित थे?

- द्विवेदी जी कहते थे कि साहित्य मनुष्य के लिए है। मनुष्य के हित के लिए जो भी साहित्य लिखा जाए वो अच्छा साहित्य है। जब द्विवेदी जी आरएसएस में बोलने गए तो बड़ी बदनामी हुई, लेकिन जब स्टालिन की मृत्यु हुई थी, तो उन्होंने जो भाषण दिया वो अद्भुत था। न वो आरएसएस के थे, ना कम्युनिस्ट थे। वे मानवता से जुड़े थे। उनके अध्यापन की विशेषता थी कि वो कोई विषय बहुत व्यापक रूप में लेते थे। कबीर का दोहा है, वो मात्र दोहा नहीं रह जाता था है, उस दोहे के भाव में जो भी है, वो जहां से भी संभव हो लाकर डाल देते थे। पूरा साहित्य उसमें मूर्त हो जाता था। बेहद प्रसन्नचित्त थे। छात्रों को बहुत प्यार करते थे। उनके साथ शाम को घूमना बहुत अच्छा लगता था। उस समय वे ऐसी बातें कहते थे जो शायद क्लास में नही कह सकते थे। वे ऐसे ढंग से कहते थे कि वो भीतर तक पहुंच रही है। एक बार उनके घर में बैठे थे, एक संन्यासी का फोन आया। पंडित जी आ जाऊं। उन्होंने कहा आ जाइए। उस संन्यासी ने एक किताब लिखी थी, जो द्विवेदी जी को पढ़ने को दी। उन्होंने कहा कि हर लेखक का लक्षित पाठक होता है। आपने लिखा है कि हमारे घर की औरतों को श्रृंगार नहीं करना चाहिए, सिनेमा नहीं देखना चाहिए। क्या वो पढ़ेंगी इसको। हमारे घर की जो स्त्रियां श्रृंगार नहीं करती, वे उसे पढ़ेंगी, लेकिन वह उनके काम की नहीं है।

- एमए के दौरान कभी आपको ऐसा लगा कि शुक्ल जी ने तुलसी की व्याख्या की, लेकिन दिवेदी जी ने तुलसी पर विचार न करके कबीर को पकड़ा। क्या आपको लगा कि वे तुलसी के बरअक्स कबीर को खड़ा करना चाहते थे?

- देखिए कबीर को मानना का क्या होता है। जिसने निर्भीकता से आडंबर का विरोध किया, उसके प्रस्तोता आचार्य दिवेदी जी थे। ऐसा नहीं था कि उन्होंने तुलसीदास की उपेक्षा की थी। उन्हें लगा कि तुलसीदास को तो मिल गया है, उन्होंने जो छूट गया यानी कबीरदास जी को संभाला, ये बड़ी बात थी।

-आप डेढ़ दो साल के लिए कम्युनिस्ट हुए। नागार्जुन की वो पंक्ति याद आती है कि जब उन्होंने 1975 के बाद कहा था कि कोई 24 घंटे कम्युनिस्ट नहीं हो सकता। घंटा दो घंटा तो ठीक। नामवर जी ने चुनाव लड़ा था। क्या आप राजनीति में आना चाहते थे?

- जब मैं एएमए फाइनल में था तब भाई साहब ने मुझे चुनाव लड़ने को कहा। कालेज की छुट्टियां थीं। भाई साहब मुझे लेकर चुनाव प्रचार को जाते थे। पूरे गांव का समर्थन था। इतना समां बंध गया था कि लगा कि जीत जाऊंगा लेकिन एक नुक्ता रह गया था जिसकी वजह से पर्चा खारिज हो गया। हमारे भाई साहब उस फैसले के खिलाफ हाइकोर्ट तक गए थे, पर मैं सोचता हूं जो हुआ अच्छा हुआ। राजनीति में वो जाए जो मोटी चमड़ी का हो।

-आपने स्वतंत्रता से पहले और उसके बाद की राजनीति देखी है। क्या अंतर महसूस करते हैं?

-पुराने समय में राजनेता साहित्य में रुचि रखते थे। उनका सम्मान भी करते थे। उनकी भाषा संसद या संसद के बाहर ऐसी नहीं थी, जैसी आज हो गई है। बाबू जगजीवनराम का एक आत्मीय था, वो मेरा शिष्य। मुझे बताने लगा कि बाबू जी आपको बहुत याद करते हैं। मिलने चलिए उनसे।बहुत आग्रह के बाद उनके घर मिलने गया। उनका बाहरी कमरा नेताओं से भरा हुआ था। उस लड़के ने बाबू जी से जाकर बताया तो वे दौड़कर मिलने आए और गले लगा लिया। राजनीति और साहित्य के संबंध में एक घटना याद आती है। लाल किले पर एक विशाल वार्षिक कवि सम्मेलन हुआ करता था। उसमें दिनकर जी आए हुए थे। जवाहर लाल मंच जी सीढ़ी जी चढ़ रहे थे, फिसल गए तो दिनकर जी ने संभाल लिया और कहा, नेहरू जी जब राजनीति लड़खड़ाती है तो साहित्य उसे संभालता। अब तो किसी नेता को साहित्य से कोई वास्ता नहीं है। 

-नए लेखकों को कोई संदेश देना चाहेंगे?

- सबसे मैं यही कहता हूं कि अपना रास्‍ता बनाओ। बड़े लोगों से कुछ पाने के लिए उन जैसा न लिखो। इनके जैसा लिखूंगा, इनसे मिलूंगा तो यह मिल जाएगा तो तुम्‍हारा अपना नहीं होगा। तुम खुद अपना रास्‍ता चुनो। गिरो, पड़ो, उठो। जो तुम्‍हारा अपना रास्‍ता होगा, वही तुम्‍हारा अपना लेखन होगा। वही तुम्‍हे ताकत देगा। लोग उसी को याद करेंगे। यही मैं सबसे कहता हूं कि अपना रास्‍ता बनाओ।

-सौ साल तक जीने का क्या राज है?

- जिसने मुझे बनाया है, उससे पूछो। मैं क्‍या जवाब दूं। मैं यही जवाब दे सकता हूं कि मैंने कभी महत्‍वाकांक्षा नहीं पाली। महत्‍वाकांक्षा बहुत मारती है। वह पूरी नहीं होती है, तो लोग रोते हैं, तड़पते हैं और जिनसे आपका काम पूरा नहीं होता, उसे गाली देते हैं। मन में द्वेष रखते हैं। दूसरी बात यह कि नशा नहीं किया। बनारस में रहकर पान नहीं खाया। ये भी एक कारण है कि मैं कभी उम्र के संकट में नहीं पड़ा। बीमार तो पड़ता गया लेकिन मुझे कोई ऐसा रोग नहीं है जो कि यकायक मुझे खत्‍म कर दे। तीसरी बात यह है कि पत्‍नी के होने से सब चीजें घर में ही मिल जाती रहीं। बाजार से संबंध नहीं होना भी एक कारण हो सकता है। बाकी तो ईश्‍वर जानें।

आपकी दिनचर्या क्या रहती है?

- देखिए ऐसा है कि पत्‍नी बीमार हैं। मेरे पैर में फ्रैक्‍चर हो गया था। सर्जरी के बाद अब आराम हो गया है, लेकिन अब चाहे बुढ़ापा कहिए या कुछ और, दोनों पांवों में दर्द होता है। मैं चल तो लेता हूं। ठीक से चल लेता हूं, लेकिन दर्द होता रहता है। दिन में सो लेता हूं। अब तो खाली ही रहता हूं।

अपनी लेखन प्रक्रिया के बारे में बताइए?

- मेरे लेखन की एक प्रक्रिया रही है। सबकी अलग अलग होती है। मैं केवल सुबह लिखता था। सुबह के मतलब नाश्ता आदि करने के बाद। लेकिन जिस दिन क्‍लास लगती थी, उस दिन नहीं लिखता था। लिखने के लिए दो घंटे चाहिए होता है। मैं किस्‍तों में लिखता था। लेकिन लिखते लिखते मैं इतना लिख गया कि देखकर खुश होता हूं कि अरे इसे मैंने लिखा है। ये उपन्‍यास, ये कहानियां मैंने लिखी हैं। मैं ये सब देखकर अब आश्‍चर्य करता हूं।

आपके देखकर लगता नहीं कि आप क्रोध करते होंगे। क्या सचमुच ऐसा है?

- नहीं, मुझे भी क्रोध  आता है। खासकर जहां गलत काम देखता हूं। जब नागरिकता बोध को खंडित होते देखता हूं तो उस पर बहुत गुस्‍सा आता है। 

-रावण वध के बाद श्रीराम के अयोध्या पहुंचने के उपलक्ष्य में हर साल दीवाली मनाई जाती है, लेकिन पांच सौ साल बाद रामलला भव्य मंदिर में विराजमान होने जा रहे हैं। इस अर्थ में क्या यह दीवाली कुछ खास है। ?

- राम मंदिर बनना अपने आपमें एक बड़ी चीज है। हालांकि मैं सोचता हूं कि श्रीराम ने तो रावण का वध कर दिया, लेकिन क्या वह सचमुच में मर गया है? एक गजल याद आ रही है- वह न मंदिर में, न मस्जिद में, न गुरुद्वारे में हैं। वह पराई पीर वाली आंख के तारे में है…। अपने मन के भीतर एक मंदिर बनाइए। राम मंदिर तो एक प्रतीक है। उसके माध्‍यम से श्रीराम को भीतर ले आइये। कृष्‍ण और राम के रूप में ईश्वर की जो सगुण कल्‍पना की गई है, यह बहुत बड़ी बात है। ईश्वर के उन गुणों को अगर आपने नहीं अपनाया तो फिर मंदिर भी व्‍यर्थ है और बाकी सब कुछ भी।


Saturday, November 4, 2023

आकांक्षी लेखक व बुजुर्ग अवसरवादिता


लखनऊ में आयोजित होनेवाले आनंद सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान का निमंत्रण पत्र पिछले दिनों मिला। कथाक्रम सम्मान, लखनऊ निवासी उपन्यासकार शैलेन्द्र सागर पिछले कई वर्षों से प्रदान कर रहे हैं। कथाक्रम सम्मान के निमंत्रण पत्र को देख रहा था। वहां कोष्ठक में उल्लिखित रजा फाउंडेशन से सहयोग प्राप्त पढ़ते समय थोड़ी देर रुका। रजा फाउंडेशन पूर्व नौकरशाह अशोक वाजपेयी चलाते हैं। इसके पहले कानपुर के किसी महाविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम की प्रचार सामग्री इंटरनेट मीडिया पर दिखी थी। उसपर भी रजा फाउंडेशन का लोगो लगा था। हिंदी साहित्य से जुड़े कई अन्य कार्यक्रमों में रजा फाउंडेशन का सहयोग दिखता है। इसमें से अधिकतर कार्यक्रमों में रजा फाउंडेशन से संबद्ध अशोक वाजपेयी का नाम वक्ता के तौर पर होता है। कथाक्रम सम्मान समारोह के निमंत्रण पत्र पर भी वक्ता के तौर पर अशोक वाजपेयी का नामोल्लेख है। जब रजा फाउंडेशन का लोगो और अशोक वाजपेयी का नाम वक्ता के तौर पर देखा तो एक उपन्यासकार मित्र को फोन किया। चर्चा के दौरान उन्होंने और भी कई दिलचस्प बातें बताईं। उन्होंने कहा कि सिर्फ आनंद सागर कथाक्रम सम्मान क्यों, रजा फाउंडेशन तो देवीशंकर अवस्थी सम्मान और भारत भूषण अग्रवाल सम्मान में भी सहयोग करता है और वहां भी कई बार अशोक वाजपेयी वक्ता होते हैं। सम्मान और आयोजनों में सहयोग करके वक्ता बनने की ये प्रवृत्ति हिंदी साहित्य के लिए नई और दिलचस्प है। इसपर अगर गंभीरता से विचार किया जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि अशोक वाजपेयी रजा फाउंडेशन के माध्यम से हिंदी के पुरस्कारों का अधिग्रहण कर रहे हैं। क्या अशोक वाजपेयी हिंदी में एक नया साहित्यिक उपनिवेश बनाना चाहते हैं। 

हिंदी साहित्य में नया उपनिवेश बनते देखकर अशोक वाजपेयी की वर्षों पहले लिखी एक टिप्पणी का स्मरण हो उठा। बुजुर्ग अवसरवादिता के नाम से लिखी उस टिप्पणी में अशोक जी ने शायर कैफी आजमी और अली सरदार जाफरी पर प्रहार किया था। अशोक वाजपेयी ने तब लिखा था, सफलता के इस निर्लज्ज युग में अकसर यह मान लिया जाता है कि युवा लोग ही अवसरवादी होते हैं। पर सच यह नहीं है। हमारे बुजुर्ग चौहान भी अवसर का लाभ उठाने से कतई नहीं चूकते। गालिब की द्विशताब्दी के सिलसिले में दिल्ली के लालकिले के नौबतखाने पर जो मुशायरा मुनक्कद किया गया था उसमें, जाहिर है, गालिब को प्रणीति देनी थी। उर्दू में किसी पुराने कवि की जमीन पर नया कुछ कहकर प्रणीति देने की एक खूबसूरत परंपरा है। लेकिन उस शाम हमारे दो बुजुर्ग शायरों कैफी आजमी और सरदार अली जाफरी ने इस परंपरा को तज दिया जबकि बाकी सबने उसे बखूबी निभाया। इस टिप्पणी में अशोक वाजपेयी ने जाफरी साहब पर गालिब से अलग हटकर गोष्ठी को हिंद-पाक दोस्ती के गुणगान के कार्यक्रम में बदलने के लिए व्यंग्य किया। अशोक वाजपेयी इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने जाफरी साहब की आलोचना करते हुए लिखा कि उन्होंने अहमद फराज की दोस्ताना नज्म के उत्तर में हिंद-पाक के 1965 के युद्ध के समय लिखी अपनी नज्म सुनाई । उनकी टिप्पणी थी, माना कि बम परीक्षण के बाद हिंद-पाक संबंध फिर से हमारी चिंता के विषय हो गए हैं पर इसका यह मतलब तो नहीं कि हर मौके पर उसी का राग अलापा जाने लगे, वह भी गालिब को प्रणिति देने के बजाय। 

अशोक वाजपेयी ने अली सरदार जाफरी की अवसरवादिता का एक और उदाहरण अपनी उसी टिप्पणी में दिया था। उन्होंने लिखा था कि जाफरी साहब ने ज्ञानपीठ पुरस्कार के अवसर पर ऐसी ही अवसरवादिता का परिचय अपने स्वीकृति भाषण में दिया। अव्वल तो भारतीय संस्कृति में कमल के फूल के महत्व पर बेमौके काफी देर तक बोले जिसपर स्वयं प्रधानमंत्री जी ने भी बाद में चुटकी ली। दूसरे, उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की कविता उद्धृत की, प्रधानमंत्री जी को कवि की हैसियत से उनके बम-विरोध की याद दिलाने के लिए। अपनी टिप्पणी की अंतिम पंक्ति में अशोक वाजपेयी कहते हैं कि उम्र के इस पड़ाव पर जाफरी साहब को यह सब करने की क्या जरूरत है। आज से करीब 25 वर्ष पूर्व जब अशोक वाजपेयी उर्दू के दो कवियों के बहाने जिस बुजुर्ग अवसरवादिता को रेखांकित कर रहे थे वही अब परोक्ष रूप से उनके व्यवहार में या कर्म में दिखाई देता है। आयोजन को अपने फाउंडेशन के माध्यम से आर्थिक सहयोग देना और फिर उसी आयोजन में वक्ता बनना। यह तो ‘बुजुर्ग चौहान’ का अवसर का लाभ उठाने जैसा ही प्रतीत होता है। इस सहयोग का एक अन्य पहलू भी है। रजा फाउंडेशन के माध्यम से अशोक वाजपेयी साहित्य और संस्कृति की दुनिया में एक प्रतीकात्मक राजसत्ता की स्थापना कर रहे हैं। एक ऐसी राजसत्ता जिसमें साहित्यिक न्याय के लिए कोई जगह नहीं होगी। जिसमें समर्थकों और चाटुकारों को स्थान मिलेगा। स्थान उपलब्ध करवाने वाले के लिए नायकत्व का सृजन होगा। एक तरफ अपने राजनीतिक आकाओं के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कारों की वापसी का प्रपंच रचा जाता है दूसरी तरफ पूंजी की शक्ति का उपयोग करके पुरस्कारों का अधिग्रहण कर अपने समर्थकों को उपकृत किया जाता है। आयोजनों में ‘सहयोग’ देकर मंच हासिल करते हैं और फिर उस मंच से राग फासीवाद और समय का संकट जैसे राग अलापते हैं। अवसर मिलते ही ‘बुजुर्ग चौहान’ भारत जोड़ो यात्रा में शामिल होकर अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता, संबद्धता और संलिप्तता भी साबित करते हैं। 

एक जमाना था जब हिंदी पट्टी के साहित्यकार दिल्ली आते थे तो अकारण राजेन्द्र यादव से मिलने हंस पत्रिका के कार्यालय चले जाते थे। वहां जानेवालों का उद्देश्य साहित्य सत्ता के दरबार में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाना होती थी। नामवर सिंह के यहां भी पद और पुरस्कार के आकांक्षी लेखक अपनी हाजिरी लगाते थे। राजेन्द्र यादव और नामवर सिंह के निधन के बाद हिंदी के आकांक्षी लेखक अशोक वाजपेयी के दरबार में पहुंचने लगे। अशोक वाजपेयी के पास आर्थिक शक्ति भी है जिसका उद्घोष रजा फाउंडेशन से सहयोग प्राप्त, की पंक्ति निरंतर करती रहती है। ये पंक्ति आयोजनों की प्रचार सामग्री से लेकर पुस्तकों पर दिखती रहती है। हिंदी साहित्य में आपको कई ऐसे लेखक मिल जाएंगे जो रजा फाउंडेशन के लिए किसी दिवंगत हो गए लेखक की जीवनी लिख रहे होंगे। दिवंगत लेखक भी ‘बुजुर्ग चौहान’ की पसंद के होते हैं। लेखक को पैसे देकर जीवनी लिखवाना और फिर प्रकाशकों को सहायता प्रदान कर पुस्तकों का प्रकाशन। अब तो हालत यहां तक पहुंच गई है कि अपना साक्षात्कार भी ‘सहयोग और मदद’ से प्रकाशित करवा रहे हैं। परिणाम यह कि ‘बुजुर्ग चौहान’ के इर्द गिर्द आकांक्षी प्रकाशकों का जमावड़ा। आकांक्षी लेखक और आकांक्षी प्रकाशकों की मदद से नायकत्व का विस्तार होता जाता है। ‘बुजुर्ग चौहान’ फासीवाद-फासीवाद का राग भी अलापते रहते हैं लेकिन जब अपने नायकत्व को मजबूत कर रहे होते हैं तो एक प्रकार से साहित्यिक फासीवाद का पोषण कर रहे होते हैं। 

अशोक वाजपेयी ने सरदार जाफरी, कैफी आजमी से लेकर नामवर सिंह तक को अवसरवादी कहा और लिखा है। नामवर सिंह को तो उन्होंने उनके विचलनों के आधार पर अचूक अवसरवादी करार दिया था। जहां तक मुझे याद है तो इसी शीर्षक से एक लंबा लेख भी लिखा था। अपने साथी लेखकों को अवसरवादी करार देनेवाले अशोक वाजपेयी रजा फाउंडेशन के माध्यम से अपनी साहित्यिक महात्वाकांक्षओं की पूर्ति में लगे हैं। विचार करना होगा कि अपने को साहित्य का नायक स्थापित करने के लिए हर तरह के अवसर का लाभ उठाना अवसरवादिता है या नहीं। क्या साहित्य सेवा की आड़ में अपनी छवि को गाढ़ा करने का खेल अवसरवादिता है या नहीं। अंत में अशोक वाजपेयी के शब्दों के साथ में ही अगर कहूं तो, उम्र के इस पड़ाव पर आखिर ये सब करने की जरूरत क्या है।  


Sunday, October 8, 2023

साहित्य के इतिहास का ओझल पक्ष


बुधवार को एक साहित्यिक गोष्ठी में जाने का अवसर मिला। ये गोष्ठी हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जन्मतिथि पर आयोजित की गई थी। गोष्ठी में मंचासीन अधिकतर वक्ता विश्वविद्यालयों के शिक्षक थे। कार्यक्रम दो घंटे तक चला और सभी वक्ताओं ने आचार्य शुक्ल को हिंदी साहित्य का पहला व्यवस्थित और प्रमाणिक इतिहास लिखने के लिए याद किया। एक वक्ता ने आचार्य शुक्ल को नामवर सिंह के हवाले से उनको हिंदी नवजागरण से जोड़ते हुए उनके योगदान को रेखांकित किया। गोष्ठी का नियत समय दो घंटे था लेकिन समय अधिक लग गया। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद घर वापस लौटते हुए गोष्ठी में हुई चर्चा को याद कर रहा था। वहां आचार्य रामचंद्र शुक्ल के लेखकीय व्यक्तित्व के अपेक्षाकृत अधिक ज्ञात पक्षों पर चर्चा हुई। अपने समय की राजनीति पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी और अंग्रेजी में जो टिप्पणियां की थीं उसका किसी वक्ता ने उल्लेख नहीं किया। शुक्ल जी ने अपने लेखों में इतिहास पर लिखा, धर्म पर विचार किया, विज्ञान पर चर्चा की। अंग्रेजी में जो लेख उन्होंने लिखे उसमें कई जटिल विषयों पर अपने विचार जनता के समक्ष प्रस्तुत किए। उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों के संबंधों पर लिखा। जाति व्यवस्था से लेकर धर्म के विकास पर विस्तार से लिखा। गांधी के असहयोग आंदोलन की आलोचना की आदि। उन्होंने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद में विभेद करते हुए अंग्रेजों को साम्राज्यावादी करार दिया था। 

आज इतिहास के पुर्नलेखन को लेकर बहुत चर्चा होती है। पक्ष विपक्ष में अनेक प्रकार के तर्क दिए जाते हैं। मौजूदा सरकार पर कथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी आरोप लगाते हैं कि वो इतिहास बदलने की कोशिश कर रही है। इतिहास के पुनर्लेखन का अर्थ ये नहीं है कि इतिहास की घटनाओं को बदल दिया जाएगा। पुनर्लेखन का अर्थ है कि इतिहास लेखन को संतुलित और समग्र किया जाए। आचार्य शुक्ल के संबंध में जो लेखन हुआ या उनके लिखे पर बाद में जो विचार हुआ उसमें उनके व्यक्तित्व के कई आयामों को छोड़ दिया गया। जहां उन्होंने कांग्रेस की आलोचना की, जहां उन्होंने गांधी के कदमों को प्रश्नांकित किया उसको ओझल करने का प्रयास किया है। इस तरह का व्यवहार सिर्फ आचार्य शुक्ल के साथ ही नहीं किया बल्कि उन सभी लोगों के साथ किया गया जिन्होंने कांग्रेस की, गांधी की आलोचना की। उन सभी विचारों को बौद्धिक जगत की परिधि पर पहुंचाया गया ताकि उनपर कम से कम चर्चा हो सके। शुक्ल जी के राजनीतिक लेखों को आगे न बढ़ाकर उनको साहित्य के इतिहासकार और निबंधकार के रूप में रिड्यूस करने का खेल भी खेला गया। इसको लेकर एक जमाने में प्रगतिशील माने जाने वाले नामवर सिंह को भी कहना पड़ा कि हिंदी के लेखकों को बार-बार ये पढ़ाने और समझाने की कोशिश की जाती है कि यदि इंडियन नेशनल कांग्रेस न होती तो राष्ट्रीय चेतना हिंदी लेखकों में आई ही न होती। स्वाधीनता संग्राम का इतिहास सचमुच नए सिरे से लिखा जाना चाहिए और देखना चाहिए कि स्वाधीनता संग्राम में रोष्ट्रीय चेतना और स्वाधीनता की चेतना के विकास में देशी भाषाओं के लेखकों और साधारण जनता की क्या भूमिका है, उनकी अपेक्षा, जो अंग्रेजी माध्यम से इन तमाम चीजों का प्रचार किया करते थे। 1928 में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा था, कांग्रेस वर्ष में किसी एक दिन कहीं किसी बड़ी सभा में एकत्र होकर प्रस्ताव पास किया करती थी और स्वाधीनता की मांग याचना से आगे नहीं बढ़ती थी। 

जब उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को लेकर बहस चल रही थी तो 1907 में ही आचार्य शुक्ल ने द हिन्दुस्तान रिव्यू में एक लेख लिखकर स्पष्ट किया था कि साम्राज्यावद ही भारत में ब्रिटिश राज की नीति की प्रेरक शक्ति रही है। नामवर सिंह ने माना था कि आच्राय शुक्ल ही पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने साम्राज्यावाद पर अंगुली रखी। उनके अनुसार इसके पहले किसी ने अंग्रेज भारतीय शासकों को इतने स्पष्ट शब्दों में साम्राज्यवादी नहीं कहा था। तब नामवर सिंह ने इस बात की अपेक्षा जताई थी कि विश्वविद्यालयों में इसपर शोध होना चाहिए। नामवर सिंह ये बातें तो कहते रहे लेकिन उन्होंने शुक्ल जी पर इस तरह का कोई शोध करवाया हो ये ज्ञात नहीं है। स्वाधीनता आंदोलन में रत कांग्रेस पार्टी को भी उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को समझने में काफी समय लगा। इसी कारण से कांग्रेस को स्वराज्य और स्वाधीनता का स्वरूप तय करके उसके बारे में मत बनाने में भी समय लगा। लाहौर अधिवेशन में आकर कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य की मांग की। आचार्य शुक्ल का एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक लेख है जो उन्होंने असहयोग आंदोलन के समय लिखा था। आचार्य शुक्ल ने तब कहा था कि असहयोग आंदोलन देश के पूंजीपतियों का पक्षधर है। इस आंदोलन से पूंजीपतियों का हित हो रहा है। पश्चिम के राष्ट्र अपने को जिससे मुक्त करना चाह रहे हैं उसी पूंजीवाद की ओर यह बढ़ता कदम है। यह पूंजी बटोरने और समाज में व्यक्तिवादी जीवन मूल्यों के क्षुद्र अमेरिकी मानदंड स्थापित करने का प्रयास भर है। अगर 1907 में लिखे आचार्य शुक्ल के लेख और असहोयग आंदोलन पर लिखे उनके लेख को देखें तो ये पता चलता है कि किस तरह से हिंदी का एक लेखक स्वाधीनता आंदोलन के विभिन्न कोणों को देखते हुए उसकी व्याख्या कर रहा था। सिर्फ व्याख्या ही नहीं बल्कि उसकी स्वस्थ आलोचना कर समाज में एक नया विमर्श स्थापित करना चाहता था। आचार्य शुक्ल का एक और अधूरा लेख हिंदी साहित्य के सामने है जिसमें उन्होंने जाति व्यवस्था पर विचार किया था। 

आचार्य शुक्ल ने 1917 में लीडर पत्रिका में एक लेख हिंदी और मुसलमान नाम से लिखा था। इस लेख में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि उर्दू कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है। यह पश्चिमी हिंदी की एक शाखा मात्र है जिसे मुसलमानों द्वारा अपनी ऐकांतिक रुचियों और पूर्वग्रहों के अनुकूल एक निजी रूप दे दिया है। अपने इस लेख में रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी और उर्दू को लेकर जो भ्रांतियां विदेशी भाषाविज्ञानियों द्वारा पैदा की गई हैं उसका खंडन भी किया है। यह लेख उर्दू और हिंदी के संबंधों को समझने के लिए आवश्यक लेख है। हिंदी और उर्दू के बीच जो खिंचाव दिखाई देता है उसके ऐतिहासिक कारण है। कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो आचार्य शुक्ल सिर्फ हिंदी साहित्य का इतिहास लिखनेवाले लेखक नहीं थे बल्कि जैसी वो अपेक्षा करते थे वैसा ही उनका व्यक्तित्व भी था। वो एक साथ समाज सुधारक, राजनीतिक आंदोलनकर्ता, कवि और शिक्षाशास्त्री थे। आचार्य शुक्ल हिंदी के एक ऐसे लेखक थे जिनसे देश की नई पीढ़ी का परिचय करवाना बहुत आवश्यक है। उनके लेखन के विविध कोणों पर व्यापक शोध की आवश्यकता भी है ताकि उनके ओझल हो चुके विचारों को सामने लाया जा सके। इतिहास का पुनर्लेखन इसलिए भी आवश्यक है कि शुक्ल जी जैसे लेखकों का सोच समग्रता में सामने आ सके।         


Saturday, July 2, 2022

लड़खड़ाती हिंदी आलोचना


समकालीन हिंदी साहित्य में होनेवाले विमर्शों में अधिकतर लेखक आलोचना को लेकर उदासीन दिखाई पड़ते हैं। कुछ युवा और कई अधेड़ होते लेखक तो आलोचना के अंत की घोषणा करते नजर आते हैं। फेसबुकजीवी लेखक तो आलोचना की आवश्यकता को ही नकार रहे हैं। उनके मुताबिक साहित्य को न तो आलोचक की आवश्यकता है और न ही आलोचना की। हिंदी आलोचना पर कई तरह के आरोप लगते हैं। कुछ कहते हैं कि आलोचना रचना केंद्रित नहीं रही और वो लेखक केंद्रित हो गई है। आलोचकों के अलग अलग खेमे हैं और वो अपने खेमे के लेखकों की औसत रचनाओं को भी कालजयी साबित करने में जुटे रहते हैं। इसकी वजह से आलोचना की साख छीजती है। इसमें दो राय नहीं कि आलोचक की व्यक्तिगत रुचि और संबंधों के निर्वाह की वजह से आलोचना विधा को नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा एक महत्वपूर्ण तथ्य को भी रेखांकित किया जाना चाहिए। इस वक्त जो आलोचक सक्रिय हैं उनकी तैयारी भी उतनी नहीं है कि वो किसी रचना को व्याख्यायित करके पाठकों के सामने उसके अर्थ खोल सकें। आलोचना पर लगनेवाले तमाम आरोप सही हो सकते हैं लेकिन जो लोग आलोचना की आवश्यकता पर प्रश्न उठाते हैं उनको समझना चाहिए कि आलोचना के बिना रचना और रचनाकार की प्रतिष्ठा स्थापित नहीं हो सकती है। 

स्वाधीनता के बाद से देखें तो हिंदी साहित्य की अलग अलग विधा में अलग अलग तरह की प्रवृत्तियां दिखाई पड़ती हैं। उदाहरण के लिए कहानी में नई कहानी, अकहानी, आंचलिक कहानी, सचेतन कहानी, समांतर कहानी आदि का दौर दिखाई देता है। कविता में भी नई कविता,अकविता, प्रयोगवादी कविता, प्रगतिवादी कविता की चर्चा होती है। कविता और कहानी की इन प्रवृत्तियों को स्थापित करने में आलोचकों की बड़ी भूमिका रही है। समकालीन हिंदी साहित्यिक परिदृश्य में कोई विशेष प्रवृति नजर नहीं आती है, क्यों? क्योंकि समकालीन दौर के आलोचक इस विधा को गतिशील बनाए रखने में चूक गए। आलोचना के कई दशक पुराने औजारों के आधार पर ही रचना को परखने की ऐतिहासिक भूल हुई। हिंदी आलोचना पर तमाम तरह के आरोप लगते हैं, लेकिन आलोचना की दयनीय स्थिति क्यों हुई इसके पीछे के कारणों को जानने की गंभीर कोशिश नहीं होती। ये कोशिश इसलिए नहीं होती है कि अगर इन कारणों तक पहुंचेगें तो हिंदी आलोचना के पुराने गढ़ और मठ ध्वस्त होने लगेंगे। पाश्चात्य आलोचना के सिद्धांतों की नकल करते हुए पूर्व में जो विद्वतापूर्ण व्याख्याएं की गईं है वो सारी मान्यताएं संदेह के घेरे में आ जाएंगी। संस्कृत काव्यशास्त्र में रचना को समझने की जो प्रविधि है वो बेहद वैज्ञानिक है। इसमें जिस शब्द शक्ति की बात है वो पाश्चात्य आलोचना में कहां दिखाई देती है। हमारे देश का रस सिद्धांत या ध्वनि सिद्धांत कितनी बारीकी से कविता को विन्यस्त करता है इसकी कल्पना भी आई ए रिचर्ड्स को नहीं थी। जिस विदेशी लेखक को रस सिद्धांत या धव्नि सिद्धांत के बारे में जानकारी नहीं थी उससे सीखकर भारतीय आलोचक हिंदी कविता की व्याख्या कर रहे थे। ठीक से याद नहीं आ रहा है लेकिन कहीं पढ़ा था कि संस्कृत के अलंकारशास्त्र और उपमा के बारे में पश्चिमी आलोचकों की अज्ञानता उनको हास्यास्पद बना देती है। 

पश्चिम के आलोचकों के अलावा हिंदी आलोचना में मार्क्सवादी सिद्धातों के आधार पर रचना की आलोचना की गई। इस विचारधारा के लेखकों ने मार्क्सवादी सिद्धांतों की जड़ता को अपनी ताकत बनाने की कोशिश की। परिणाम ये हुआ कि मार्क्सवादी आलोचना जड़ होती चली गई और उनका विकास अवरुद्ध होता गया। रामचंद्र शुक्ल के बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा ने रचना से मुठभेड़ करते हुए आलोचना के अपने प्रतिमान बनाए। कुछ हद तक नामवर सिंह ने भी। नामवर के बाद जो भी ख्यात आलोचक हुए वो रचना से टकराने में हिचकते नजर आते हैं। मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में वो रचना को लेकर समाज की ओर जाते तो हैं लेकिन समग्रता से मूल्यांकन नहीं कर पाते हैं। इसका एक और दुपरिणाम ये हुआ कि रचना को खोलने के जो औजार रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा के यहां दिखाई देते हैं वो बाद के आलोचकों के यहां नहीं दिखते हैं। इन औजारों की अनुपस्थिति के कारण हिंदी आलोचना की धार कुंद होती चली गई और इस विधा में एक वैचारिक सन्नाटा पसरता चला गया। अशोक वाजपेयी कभी कभार आलोचना में तलवारबाजी करते हैं लेकिन वो भी इस विधा को गतिशील नहीं बना पाते हैं। उनकी अपनी सीमाएं हैं जिसको वो पार नहीं कर पाते हैं। बाद के आलोचकों ने भी रचना के पाठ में समय के साथ हो रहे बदलाव को पकड़ने की कोशिश नहीं की और वो आलोचना के नए प्रतिमान गढ नहीं पाए।  

पिछले दिनों सुधीश पचौरी की एक पुस्तक आई है ‘नयी साहित्यिक सांस्कृतिक सिद्धान्तकियां’। इस पुस्तक में सुधीश पचौरी ने आलोचना के नए प्रतिमान स्थापित करने की कोशिश की है। उन्होंने रचना से टकराने और फिर उसके आधार पर उसको व्याख्यित करने का आग्रह किया है। सुधीश पचौरी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि रचना सिर्फ रचना नहीं होती वह एक जटिल और पेचीदा नेटवर्क का हिस्सा होती है। इसको वो अलग तरीके से सामने रखते हैं। इस संदर्भ में वो जायसी की पद्मावत और तुलसीदास के रामचरित मानस का उदाहरण देकर नया प्रतिमान गढ़ने का प्रयास करते हैं। वो बताते हैं कि रामचंद्र शुक्ल ने करीब नब्बे वर्ष पहले जायसी के पद्मावत की भूमिका लिखी थी और उसे प्रेमगाथाओं की काव्य परंपरा में ऊंचा स्थान दिया था। इसमें उन्होंने लौकिक प्रेम की अलौकिकता के बारे में बताया था। शुक्ल जी का ये पाठ ही पद्मावत का अंतिम पाठ बन गया। उनकी स्थापना है कि जैसे ही संजय लीला भंसाली ने 2017 में फिल्म पद्मावत बनानी आरंभ की तो इसका नया पाठ सामने आने लगा। जैसे जैसे फिल्म को लेकर विवाद बढ़ा तो पद्मावत के तीन पाठ सामने आए। सुधीश पचौरी मानते हैं कि पद्मावत का पहला पाठ फिल्मी पाठ था जिसे निर्माता निर्देशक बना रहा था जो दो सौ करोड़ रुपए की आर्थिकी से जुड़ा था। दूसरा पाठ कर्णी सेना का क्षत्रियवादी (जातिवादी) पाठ था जिसमें इस्लाम विरोधी पाठ भी सक्रिय था। तीसरा पाठ राजनीतिक रहा जिसको संसद की बहसों और चुनाव के दौरान देखा गया। उनके मुताबिक इसके बाद पद्मावत का अकादमिक पाठ भी बदला। इसी तरह से जब तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की थी तो उस समय का उसका पाठ अलग था और अब बिल्कुल अलग है। अब उसको पावर टेक्सट कहा जा सकता है। 

अपनी इस पुस्तक में सुधीश पचौरी ने हिंदी आलोचना की सीमाओं पर ठीक से विचार किया है। वो मानते हैं कि आरंभ में हिंदी आलोचना खुद को संस्कृत से जोड़कर देखती थी। धीरे-धीरे वो इससे दूर होती चली गई। बाद में अंग्रेजी साहित्य शास्त्र ने उसकी जगह ले ली। वो बेहद तल्ख अंदाज में कहते हैं कि संस्कृत का काव्यशास्त्र जो हिंदी को उत्तराधिकार में मिला था उसकी कुंजियां बना ली गईं लेकिन उसमें गहरे नहीं उतरा गया। इसलिए उसका नया संस्कार नहीं हो सका। सुधीश पचौरी ने अपनी इस पुस्तक में भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा से रस, छंद, अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि आदि पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उन्होंने ध्वनि सिद्धांत के पुनर्पाठ की बात भी की है और इसकी पश्चिम के सिद्धांत और सिद्धांतकारों की स्थापनाओं से तुलना करके इसकी श्रेष्ठता साबित की है। हिंदी आलोचना को अगर कठघरे में खड़ा करना है तो इस तरह से करना होगा जैसे सुधीश पचौरी ने किया है। अगर हमें हिंदी आलोचना की दुर्दशा की बात करनी है तो उसकी भूल गलतियों को लेकर गंभीरता से विमर्श करना होगा।न इसका महत्वपूर्ण लाभ ये होगा कि जो ऐतिहासिक भूलें हुई हैं उसका परिमार्जन हो सकेगा।

Saturday, September 25, 2021

सूफियों पर पुनर्विचार की जरूरत


हिंदी के मार्क्सवादी आलोचक नामवर सिंह की एक पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ 1982 में प्रकाशित हुई थी। तब उस पुस्तक की बहुत चर्चा हुई थी। इसकी भूमिका में नामवर सिंह ने स्वीकार किया था कि ‘परंपरा के समान ही खोज भी एक गतिशील प्रक्रिया है’। उसी गतिशील प्रक्रिया के तहत उन्होंने अपने गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी की दृष्टि की खोज की थी। इस पुस्तक के प्रकाशन  के 37 साल बाद एक और मार्क्सवादी आलोचक सुधीश पचौरी ने ‘तीसरी परंपरा की खोज’ पुस्तक लिखी जिसे वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया। सुधीश पचौरी अपनी इस पुस्तक में ‘हिंदी साहित्य के उपलब्ध इतिहास की अबतक न देखी गई सीमा को उजागर करने’ का दावा करते हैं। ये भी कहते हैं कि ‘ये हिंदी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन का दरवाजा खोलती है’। इसमें नामवर सिंह की खोज से आगे जाकर सुधीश पचौरी ने कुछ ‘खोजा’ है। इस लेख का उद्देश्य इन दोनों पुस्तकों की तुलना करना नहीं है बल्कि सुधीश पचौरी की पुस्तक के कुछ निष्कर्षों पर विचार करना है। सुधीश पचौरी ने अपनी पुस्तक में सूफियों को इस्लाम का प्रचारक कहा है। अपनी इस अवधारणा के समर्थन में उन्होंने पूर्व में लिखी गई पुस्तकों और वक्तव्यों का सहारा लिया है। सुधीश पचौरी लिखते हैं, ‘मध्यकाल के इतिहास ग्रंथों में सूफी कवियों की छवि ठीक वैसी नजर नहीं आती जैसा कि हिंदी साहित्य के इतिहास में नजर आती है। साहित्य के इतिहास में वे सिर्फ कवि हैं जबकि इतिहास ग्रंथों में वो वे इस्लाम के प्रचारक के तौर पर सामने आते हैं। साहित्य के इतिहास का लेखन अगर अंतरानुशासिक नजर से किया जाता तो सूफियों की इस्लाम के प्रचारक की भूमिका स्पष्ट रहती।‘ सुधीश पचौरी ने इस बात को साबित करने की कोशिश की है कि सूफी लोग सुल्तानों के साथ आते थे। उनका काम इस्लाम का प्रचार होता था लेकिन यहां के यथार्थ की जटिलताओं को देखकर कई सुल्तान कट्टर की जगह नरम लाइन लेने लगते थे उसी तरह सूफी भी अपनी लाइन को बदलते थे। 

इतिहासकार मुजफ्फर आलम की बातों से इसकी पुष्टि भी होती है। उनके हवाले से लिखा गया है कि ‘उत्तर भारत में ग्यारहवीं शताब्दी में गजनवी के हमलों के साथ ही सूफियों का आगमन हो गया था। तेरहवीं शताब्दी में जब सल्तनत स्थापित हो गया तब सूफियों ने भी अपना विस्तार आरंभ किया’। सूफियों के विस्तार का तरीका बहुत चतुराई भरा था। वो इस्लाम के धर्मगुरुओं से अलग तरीके से काम करते थे लेकिन दोनों का उद्देश्य एक ही होता था कि जिन इलाकों को सुल्तान जीतता था उन इलाकों में इस्लाम को मजबूत करते चलना। इस काम के लिए वो भारत के संतों और महात्माओं से संवाद करते थे और उनकी उन बातों को अपनी रचनाओं में शामिल कर लेते थे जो उनके धर्म को बढ़ावा देने के काम आ सकती थीं। इतिहासकार जियाउद्दनी बरनी के हवाले से ये भी बताया गया है कि जब सुल्तान शम्सुद्दीन अलतुतमिश से इस्लाम के धर्मशास्त्रियों ने शरीआ लागू करने की मांग की और हिंदुओं के सामने इम्माइल इस्लाम-इम्माइल कत्ल यानि इस्लाम या कत्ल में से एक को चुनने का विकल्प दिया जाए तो सुल्तान ने बेहद चतुराई से इस मसले को टाल दिया था। सुल्तान ने तब कहा था कि अभी अभी हिन्दुतान को जीता गया है जहां हिन्दू बड़ी संख्या में रहते हैं। अगर अभी शरीआ लागू की गई तो हिंदू एकजुट हो सकते हैं और विद्रोह हो सकता है। जब मुस्लिम सेनाएं और ताकतवर हो जाएंगी तब हिंदुओं को इस्लाम या मृत्यु में से एक विकल्प चुनने की बात होगी। इस प्रसंग में अगर सूफियों के उपयोग की बात जोड़कर देखें तो पूरा परिदृश्य साफ हो जाता है। 

हिंदी साहित्य कि बात करें तो सूफियों को इस तरह से स्थापित किया गया कि वो सामाजिक समरसता को बढ़ाने में या सामासिक संस्कृति की जड़ें मजबूत करने के लिए अपनी कविताओं और गीतों का उपयोग करते थे। उनको इस तरह से स्थापित किया गया कि कई लोग तो सूफी ‘संत’ तक कहे जाने लगे। साहित्य के इतिहास में ऐसे कई ‘संतों’ का उल्लेख मिलता है। जबकि वो उन दिनों अपने धर्म का प्रचार करने के लिए इस भूमि पर आए थे। उनका उपयोग उस दौर के आक्रमणकारियों ने साफ्ट पावर के तौर पर किया था। जो काम तलवार नहीं कर पा रही थी उस काम को इन कथित संतों ने अपनी बोली और वाणी से करने का काम किया। इन ‘संतों’ को स्थापित और लोकप्रिय करने के लिए कई मार्क्सवादी इतिहासकारों ने श्रमपूर्वक इतिहास को अपने हिसाब से तोड़ा मरोड़ा। सतीश चंद्रा ने मध्यकालीन भारत का इतिहास लिखते हुए भक्तिकाल के कवियों की चर्चा में सूफियों को तो याद किया लेकिन तुलसीदास का नाम भी नहीं लिया। ये भूल नहीं हो सकती, ये सायास था। ऐतिहासिक घटनाओं की ऐसी व्याख्या प्रस्तुत की गई जिसने हमारे देश में इस्लाम के प्रचार प्रसार को अलग ही रंग दे दिया। युद्ध में जय पराजय को उस वक्त हमारे देश में व्याप्त सामाजिक स्थितियों से जोड़कर देखा गया। नागरीय क्रांति जैसे पद गढे गए। भारतीय समाज को जातियों में बांटकर इतिहास लेखन किया गया। उस वक्त समाज में व्याप्त कुरीतियों को भी इतिहास लेखन का आधार बनाया गया।  लेखन की इस पक्षपाती प्रविधि ने इतिहास को एकांगी कर दिया। अगर इतिहास को समग्रता में लिखा गया होता और सारी बातों जनता के सामने आती तो संभव है कि इतिहास के पुनर्लेखन की बात नहीं होती। दुनिया में इतिहास लेखन इस बात का गवाह है कि जब भी इतिहास लेखन एकांगी हुआ है तो उसको वर्षों बाद भी समावेशी करने की कोशिशें हुई हैं। अगर इतिहासकार किसी भी देश के इतिहास को यथार्थ से दूर लेकर जाते हैं और उसमें कल्पना या अपने सिद्धांत के आधार पर की गई व्याख्या को यथार्थ बनाने की कोशिश करते हैं तो फिर उसके पुनर्लेखन की बात होती ही है चाहे वो दशकों बाद हो या उससे भी बड़े कालखंड के बाद। 

सूफियों का जिस तरह से महिमामंडन किया गया वो भले ही बहुत लंबे कालखंड तक स्वीकार्य रहा लेकिन अब साहित्य के अंदर से ही उस महिमामंडन पर प्रश्न खड़े होने आरंभ हो गए हैं। हिंदी साहित्य में अनेक प्रकार के ज्ञानात्मक विमर्श होते रहे हैं लेकिन साहित्य के इतिहास लेखन को लेकर बहुत अधिक उत्साह नहीं दिखाई देता। यूरोप और अमेरिका में आज से करीब पचास पूर्व ही इतिहास लेखन को लेकर एक बहुत गंभीर बहस चली थी। न सिर्फ बहस चली बल्कि इतिहास को नए नजरिए से देखने की कोशिशें भी हुईं। हमारे देश में इतिहास लेखन को राजनीति से जोड़ दिया जाता है इस वजह से हमारे यहां इतिहास लेखन की प्रविधियों को लेकर न तो विमर्श हो पाता है और न ही नए दृष्टिकोण से लेखन। नतीजा यह होता है कि जब भी कोई लेखक इतिहास को नए सिरे से लिखने की कोशिश करता है तो उसको हतोत्साहित किया जाता है। आज जब हमारा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है कि तो ऐसे में इस बात की आवश्यकता है कि इतिहास लेखन को लेकर ऐसा माहौल बनाया जाए कि अलग अलग तरीके से घटनाओं और प्रवृतियों पर विचार किया जाए। हिन्दुस्तान पर आक्रमण करके उसको गुलाम बनानेवाली ताकतों और उन ताकतों को भारत में स्थापित करने वाले तमाम लोगों, समूहों और शक्तियों के बारे में उपलब्ध जानकारियों के आधार पर समग्र विश्लेषण हो। कोई तथ्य न दबाया जाए न छिपाया जाए। न तो सतीश चंद्रा जैसी गलती होने दी जाए और न ही सूफियों के बारे में उपलब्ध तथ्यों को दबाया जाए। 


Saturday, July 17, 2021

लापरवाहियों से खंडित होता इतिहास


मेरे एक मित्र हैं, संजीव सिन्हा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं। दो दिन पहले उन्होंने चहकते हुए फोन किया, भाई साहब, नामवर सिंह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संस्थापक थे, क्या आपको मालूम है? जब संघ पर प्रतिबंध लगा था तो वो जेल भी गए थे। मैंने अनभिज्ञता प्रकट की तो उन्होंने पूरा प्रकरण बताया। दरअसल हुआ ये है कि नामवर सिंह की एक जीवनी प्रकाशित हुई है, नाम है ‘अनल पाखी’। इस जीवनी को लिखा है अंकित नरवाल ने। इस पुस्तक में हिंदी के शिक्षक-लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी के हवाले से नामवर सिंह को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का अपने जिले का संस्थापक बताया गया है। दरअसल 2017 में नामवर सिंह और विश्वनाथ त्रिपाठी की एक बातचीत प्रकाशित हुई थी जो बाद में 2019 में एक पुस्तक में संकलित हुई। पुस्तक का नाम है ‘आमने-सामने’। प्रकाशक हैं राजकमल प्रकाशन। इस पुस्तक का संकलन-संपादन किया है नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह ने। इसका प्रकाशन जुलाई 2019 में हुआ था। हम इस विषय़ पर आगे बात करें इसके पहले साक्षात्कार का वो अंश देख लेते हैं जिसके आधार पर जीवनीकार से भूल हुई है। विश्वनाथ त्रिपाठी का प्रश्न है, आप पहले आरएसएस में थे, फिर वामपंथी कैसे हो गए? नामवर सिंह का उत्तर है, ‘मैं कोई किताब या मार्क्स को पढ़कर प्रगतिशील नहीं हुआ। लेकिन हां, मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अपने जिले के संस्थापकों में से हूं। गांधी की हत्या के बाद तीन महीने जेल में भी था, पुणे से मुझे लखनऊ सेंट्रल जेल भेजा गया। जब छूटा तो अटल जी मेरे सम्मान में जेल के द्वार  पर खड़े थे। मैंने उनको कविताएं भी सुनाई थीं। आरएसएस में था जरूर लेकिन मुसलमान और वामपंथियों से मेरी दोस्ती थी।...संघ हिंदू संगठन है और वहां भी पैसे वालों का दबदबा है। जात-पात छूआछूत जैसी विसंगतियां देखने को मिलीं। इसी वर्गभेद की वजह से मैं वामपंथ में चला गया।‘ 

इन बातों के सामने आने के बाद विश्वनाथ त्रिपाठी की तरफ से किसी और ने सफाई पेश की। सफाई में कहा गया कि ‘नामवर जी आजीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी विचारधारा के सक्रिय विरोधी रहे थे। नामवर सिंह मार्क्सवादी थे, प्रगतिशील लेखक संघ और सीपीआई से संबद्ध थे। सीपीआई के उम्मीदवार के तौर पर चंदौली से लोकसभा चुनाव भी लड़े थे।‘  विश्वनाथ त्रिपाठी के भक्त और कम्युनिस्ट लेखक इस अभियान में लग गए हैं कि उनको इससे बरी कर दिया जाए। चाहे कितना भी बड़ा अभियान चला लें,इस साहित्यिक अपराध को ढंकने की कितनी भी कोशिश की जाए, लेकिन ये अक्षम्य है। चार साल पहले एक साक्षात्कार छपा,फिर दो साल पहले वो बातचीत एक पुस्तक में संकलित हुई, लेकिन विश्वनाथ जी दोनों को ही देख नहीं पाए। क्या ये मान लिया जाए कि हिंदी का ये लेखक अपना लिखा नहीं पढ़ते हैं या अपने कृतित्व को लेकर बेहद असावधान हैं। इस जीवनी के प्रकाशक भी पूरे मामले को ढंकने की कोशिश कर रहे हैं और इस पुस्तक की बची हुई प्रतियों पर चिट लगाकर भूल सुधार की डुगडुगी बजा रहे हैं। अगले संस्करण में उस अंश को हटाने की घोषणा भी की गई है। सवाल फिर वही उठता है कि जो प्रतियां बिक गईं या जो पाठकों तक पहुंच गईं या जो बातें इंटरनेट मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक हो गईं उनका परिमार्जन कैसे हो पाएगा। हो भी पाएगा या नहीं।  

जीवनीकार अंकित नरवाल से गलती ये हुई कि उन्होंने इस तथ्य की पुष्टि के लिए विश्वनाथ त्रिपाठी से स्पष्ट रूप से इस मुद्दे पर बात नहीं की और प्रकाशित बातचीत को सही मान लिया। बहुधा लेखक ऐसा करते हैं। अंकित ने दावा किया है कि ‘इसके संबंध में विश्वनाथ त्रिपाठी जी से मेरी बातचीत हुई थी। उनसे पूरी तरह यह पांडुलिपि तैयार होने से पहले और बाद में भी घंटों-घंटो बातचीत होती थी। उन्होंने अपनी बातचीत में हमेशा यह दोहराया है कि उन्होंने नामवर जी के बारे में जो इधर-उधर संस्मरण लिखे हैं, वह सभी प्रामाणिक तथ्य हैं। उनके साथ हुए साक्षात्कारों के संबंध में भी उनकी यही दृढ़ता बनी रहती थी। अब जब यह मामला तूल पकड़ गया है, तो उन्होंने अपने उस साक्षात्कार से किनारा कर लिया है।‘ लगता है कि अंकित नरवाल, विश्वनाथ जी के अतीत में कहने-पलटने की आदत से परिचित नहीं रहे होंगे। त्रिपाठी जी बहुधा पल्ला झाड़ते रहे हैं और किसी न किसी बहाने की ओट लेते रहते हैं। अपनी पुस्तक ‘व्योमकेश दरवेश’ में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के हिंदी भाषा के संयोजक रहते हुए साहित्य अकादमी पुरस्कार से संबंधित एक प्रसंग लिखा। उस प्रसंग की सत्यता के बारे में जब इस स्तंभ में सवाल उठाया गया तो उन्होंने अगले संस्करण में उस पूरे प्रसंग को ही पुस्तक से हटा दिया। इसी तरह से एक साहित्यिक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में जब कुछ आपत्तिजनक बातें उनके हवाले से छपीं तो उससे किनारा कर लिया और ठीकरा बातचीत करनेवालों पर फोड़ दिया। मैत्रेयी पुष्पा से संबंधित एक साहित्यिक पत्रिका में अश्लील टिप्पणी करने के बाद उनको फोन करके हाथ-पांव जोड़े थे।

नामवर जी से जुड़े इस प्रसंग पर उठे विवाद से कई बड़े प्रश्न खड़े हो रहे हैं। ये प्रश्न लेखकों की साख, प्रकाशकों की विश्वसनीयता और पुस्तकों के संपादकों की गंभीरता को लेकर भी खड़े होते हैं। कोई भी लेखक क्यों नहीं तथ्यों की पड़ताल के लिए प्राथमिक स्त्रोत तक जाने की कोशिश करता है, क्यों वो सेकेंडरी सोर्स पर आश्रित रहता है। इसी तरह से प्रकाशकों की किसी पुस्तक को लेकर क्या कोई जिम्मेदारी नहीं होती है? क्या आधार प्रकाशन और इसके स्वामी देश निर्मोही का दायित्व नहीं था कि वो नामवर सिंह की जीवनी में प्रकाशित हो रहे तथ्यों के बारे में जांच पड़ताल करते। क्या आधार प्रकाशन सिर्फ प्रिंटर हैं कि जो भी आया छापा और उसको बाजार में भेज दिया। जब उसपर आपत्ति आई तो अगले संस्करण में सुधार की बात कहकर किनारे हो गए। इस पूरे प्रसंग से एक बार फिर से प्रिंटर और प्रकाशक की भमिका पर विचार करने का आधार हिंदी साहित्य जगत के सामने है। देश निर्मोही स्वयं प्रगतिशीलता का डंडा-झंडा लेकर चलते रहते हैं लेकिन उनको भी नामवर सिंह के बारे में इस तथ्य की पड़ताल की जरूरत नहीं लगी। राजकमल प्रकाशन से नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह के संपादन में आमने सामने छपी, उसमें भी विश्वनाथ त्रिपाठी का नामवर का लिया साक्षात्कार छपा लेकिन न तो उनके पुत्र ने इसको जांचने की जहमत उठाई और न ही प्रकाशक के स्तर पर इसकी कोशिश हुई। अब प्रकाशक ने पुस्तक में संशोधन की बात की है।

दरअसल ये पूरा मामला ही लापरवाहियों से भरा हुआ है। इससे हिंदी साहित्य और प्रकाशन जगत में व्याप्त अगंभीरता सामने आती है। ऐसा प्रतीत होता है कि जिनको हम बड़े साहित्यकार या बड़े प्रकाशक मानते हैं उनको अपनी साख की कोई चिंता नहीं । एक और बात जो प्रमुखता से उभर कर सामने आई है कि खुद को प्रगतिशील कहनेवाले कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े लेखक अपनी विचारधारा से जुड़े लोगों की भूल गलतियों के लिए उनको कठघरे में खड़ा नहीं करते। कम्युनिस्ट लेखक ये काम बहुत ही संगठित तरीके से करते हैं। पूरा माहौल बनाते हैं कि उनकी विचारधारा के लेखक की गलती नहीं है वो तो परिस्थितियों के शिकार हो गए हैं आदि आदि। अब वक्त आ गया है कि साहित्य में वामपंथ की गलतियों और उनको ढ़कने और छुपाने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया जाए। साहित्य में सत्य का अनुकरण हो और झूठ और मिथ्या की इस विचारधारा के बचे खुचे ध्वजवाहकों को आईना दिखाया जाए।

Saturday, June 13, 2020

साहित्य की नामवरी असावधानी के स्मारक

कोरोना के संकट के दौरान पुस्तकें पढ़कर समय बिताना एक बेहतर विकल्प है। बाजार आदि भले ही खुल गए हैं लेकिन बहुत आवश्यक होने पर ही वहां जाना होता है। लोगों से मिलने-जुलने वाली संस्कृति पर भी फिलहाल विराम लगा हुआ है। पिछले करीब अस्सी दिन में कई किताबें पढ़ने का सुयोग बना। नामवर सिंह की पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ को करीब बीस साल बाद दोबारा पढ़ी। इसी क्रम में नामवर सिंह की ही एक और पुस्तक ‘हिंदी का गद्यपर्व’ पढ़ी। यह किताब नामवर सिंह के जीवित रहते ही 2010 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी और इसका संपादन काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के शिक्षक आशीष त्रिपाठी ने किया है। मैंने इस पुस्तक की पहली आवृत्ति, जो 2011 में प्रकाशित हुई थी, पढ़ी। नामवर सिंह के आलोचनात्मक लेखन के साठ साल पूरे होने के अवसर पर प्रकाशित हुई थी। इसके संपादक आशीष त्रिपाठी ने लिखा है कि ‘यह पुस्तक साक्ष्य है नामवर जी के सक्रिय साठ वर्षों का-एक दस्तावेजी साक्ष्य। इसमें उनका पहला प्रकाशित निबंध है और अभी तक लिखित अंतिम निबंध द्वा सुपर्णा... और पुनर्नवता की प्रतिमूर्ति।‘ संपादक के इन दावों को पढ़कर इस पुस्तक को पढ़ने की रुचि और बढ़ गई।
इस किताब में एक लेख है ‘हिंदी साहित्य के पच्चीस वर्ष’। इस लेख के बारे में बताया गया है कि ‘स्वतंत्रता की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर साहित्य अकादमी ने भारत की विभिन्न भाषाओं में साहित्यिक प्रगति का एक सर्वेक्षण अंग्रेजी में प्रकाशित किया गया था, इंडियन लिटरेर सिंस इंडिपेंडेंस। इस ग्रंथ के लिए हिंदी साहित्य का सर्वेक्षण किया था डॉ नामवर सिंह ने। उस सर्वेक्षण का हिंदी रूप।‘ इस पूरे लेख में कई त्रुटियां हैं। नामवर सिंह जैसी पकी आंखों वाले आलोचक जो तथ्यों को लेकर बहुत सावधान रहते थे उनसे एक लेख में इतनी तथ्यात्मक गलतियां चौंकाती हैं। इस लेख (पृ.71) में उन्होंने निर्मल वर्मा की मशहूर कहानी ‘परिंदे’ का प्रकाशन वर्ष 1960 बताया है। जबकि इस कहानी का प्रकाशन 1957 में हुआ था। प्रेमचंद के स्मृति दिवस 8 अक्तूबर 1957 को ‘हंस’ का साहित्य संकलन-1, प्रकाशित हुआ था, जिसके संपादक बालकृष्ण राव और अमृतराय थे। इस संकलन में पहली बार निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ का प्रकाशन हुआ था। आश्चर्य की बात ये है कि ‘हंस’ के उस संकलन में नामवर सिंह का भी लेख प्रकाशित है। सिर्फ 15 वर्ष के अंतराल में नामवर सिंह से ये चूक हो जाती है। वो भी तब जब नामवर सिंह ने निर्मल की इस कहानी को ‘नई कहानी की पहली कृति’ घोषित करते हुए एक लंबा लेख लिखा था। अगर नामवर सिंह से ये चूक हुई है तो वो एक बेहद असावधान आलोचक थे और अगर अनुवाद और संपादन में ये भूल हुई है तो ये अक्षम्य है। महत्वपूर्ण ये है कि इस पुस्तक का प्रकाशन नामवर सिंह के जीवित रहते हो गया था, लेकिन इस भूल की ओर ध्यान नहीं दिया गया। साहित्य के शोधार्थियों को ध्यान में रखकर अगर विचार किया जाए तो ये गलती बहुत बड़ी नजर आती है। 
इस पुस्तक में सिर्फ एक गलती नहीं है बल्कि अनेक तथ्यात्मक भूलें हैं। अपने इसी लेख में नामवर सिंह लिखते हैं कि ‘रोमांटिक मोह के युग में भी मुक्तिबोध मोहभंग के प्रयास करते रहे। उन्होंने 1953 में यह लिखा था कि ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’।‘  नामवर सिंह अपने जीवनकाल में लगातार मुक्तिबोध की कविताओं पर बोलते-लिखते रहे थे। मुक्तिबोध को वामपंथी विचारधारा के अग्रणी कवि के तौर पर स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील भी रहे। वामपंथी विचारधारा के कवि के तौर पर मुक्तिबोध का रेखांकन करते-करते नामवर सिंह इस कविता का प्रकाशन वर्ष लिखने में चूक कर बैठे। मुक्तिबोध की ये प्रसिद्ध कविता ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ पटना से प्रकाशित काव्य संकलन ‘विविधा’ में छपी थी जिसका प्रकाशन 1956-57 में हुआ था। इस काव्य संकलन के संपादक राजेन्द्र किशोर और रणधीर सिन्हा थे। इस एक तथ्य के आधार पर भी यह कहा जा सकता है कि नामवर सिंह असावधान आलोचक थे। साहित्य के इतिहास में तिथियों का बहुत महत्व होता है और एक भी गलत तिथि का उल्लेख कालखंडों के आकलन के निष्कर्षों को गलत कर सकता है। इसी पुस्तक में एक लेख है ‘एक अन्तर्यात्रा के प्रदेश’ इस लेख की पहली पंक्ति है सन 1884 में भारतेन्दु हरिश्चंद्र का अवसान हुआ और रामचंद्र शुक्ल का उदय। ये तो बहुत ही बड़ी चूक है क्योंकि भारतेन्दु हरिश्चंद्र का निधन 1884 में नहीं बल्कि 1885 में हुआ। इसके आलोक में देखें तो पहली पंक्ति से वो जो स्थापित करना चाहते थे उसकी बुनियाद ही गलत थी। पता नहीं किन परिस्थितियों में नामवर सिंह ने अपने लेख में भारतेन्दु का अवसान उनकी मृत्यु के पहले ही मान लिया था। इसी लेख में ‘हंस’ के आत्मकथा अंक का प्रकाशन वर्ष 1931 बताया गया है जबकि इसका प्रकाशन 1932 में हुआ था। बाद में बनारस के एक प्रकाशक ने भी ‘हंस’ के इस अंक को प्रकाशित किया था। इस पुस्तक में तथ्यात्मक भूलों के अलावा प्रूफ और नाम में भी ढेरों गलतियां हैं, ईश्वरचंद्र को रमेशचंद्र, नागेन्द्र को नरेन्द्र, रामकुमार को राजकुमार कह दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि न तो संपादक ने और न ही प्रकाशक ने तथ्यों के अलावा लेखों में उल्लिखित नामों को जांचने का कष्ट किया। 
2019 में राजकमल प्रकाशन से ही नामवर जी के साक्षात्कारों की एक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसका नाम है ‘आमने सामने’। इस पुस्तक का संकलन संपादन नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह ने किया। इसमें विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा किया गया नामवर सिंह का एक साक्षात्कार प्रकाशित है जिसका शीर्षक है, ‘भैरव का सोंटा’। इसमें एक जगह विश्वनाथ त्रिपाठी साहित्य अकादमी के पुरस्कारों को छोड़ने और न छोड़ने पर उनकी राय पूछते हैं। इसके उत्तर में नामवर सिंह अपनी बात रखते हैं कि ये संस्था लेखकों की है, सरकार से क्या लेना देना। अपनी बात रखने के क्रम में वो बताते हैं कि साहित्य अकादमी का जब गठन हुआ तो कृष्णा कृपलानी इसकी सचिव थीं। इसको पढ़ते हुए स्पष्ट है कि नामवर सिंह ये कह रहे थे कि कृष्णा कृपलानी महिला थीं। जबकि साहित्य अकादमी से प्रकाशित डी एस राव की पुस्तक ‘फाइव डिकेड्स’ में भी और इसके हिंदी अनुवाद में भी इस बात का साफ उल्लेख है उनका नाम कृष्ण कृपलानी था और वो पुरुष थे। भारत सरकार ने 1954 में उनको दो वर्षों के लिए साहित्य अकादमी के पहले सचिव के रूप में नियुक्त किया था। बाद में अकादमी के कार्यकारी मंडल ने उनको कई सेवा विस्तार दिए और वो 1971 तक साहित्य अकादमी के सचिव पद पर बने रहे।  अब ये इतनी हास्यापद बात है कि नामवर सिंह की छवि को देखते हुए इसको स्वीकार कर पाना थोड़ा कठिन है कि नामवर सिंह को ये नहीं पता होगा कि साहित्य अकादमी के पहले सचिव पुरुष थे, महिला नहीं। पता तो इस बात का विश्वनाथ त्रिपाठी को भी होना ही चाहिए। फिर एक संपादक भी हैं जिन्होंने इस तथ्य पर गौर नहीं किया, क्या इतनी असावधानी होनी चाहिए थी ? और सबसे उपर तो प्रकाशक की भी जिम्मेदारी बनती है। एक अच्छा आलोचक वो होता है जिसकी स्मृति बहुत अच्छी हो, वो आलसी न हो और तथ्यों की जांच करने के लिए सिर्फ अपनी स्मृति पर भरोसा न रखे और संदर्भ ग्रंथ देखने के लिए बार बार अपनी मेज से उठे। क्या नामवर इतने सतर्क आलोचक थे? लगता तो नहीं।   


Saturday, June 6, 2020

साहित्य के ‘लाइव काल’ का संकट

कोरोना वायरस के संकट के बीच जब पूर्ण लॉकडाउन चल रहा था और साहित्यिक सभाएं और गोष्ठियां बंद हो गई थीं, तो हिंदी साहित्य से जुड़े लेखकों ने फेसबुक पर एकल गोष्ठियां करनी शुरू कर दीं। कई साहित्यिक संस्थाओं और प्रकाशकों ने भी हिंदी की विभिन्न विधाओं के लेखकों का लाइव करना शुरू किया। धीरे धीरे तो ऐसा लगा कि संपूर्ण हिंदी साहित्य लाइव मोड में ही आ गया है। हर समय किसी ने किसी फेसबुक पेज पर या लोगों के व्यक्तिगत अकाउंट पर लाइव करते लेखक नजर आने लगे। जब भई आप अपने फेसबुक अकाउंट में लॉगइन करें तो आपकी टाइमलाइन पर लाइव होता दिखने लगा। क्या युवा, क्या अधेड़, क्या बुजुर्ग, सभी वय के लेखक फेसबुक पर अपनी मन की बात करते नजर आने लगे। कुछ लेखकों ने तो दिन में दो वक्त लाइव करना शुरू दिया। फेसबुक पर साहित्यिक लाइव की मानो बाढ़ सी आ गई। इस स्थिति को देखते हुए यह भी कहा गया कि आज अगर नामवर सिंह जीवित होते तो बेहद खुश होते क्योंकि जिस वाचिक परंपरा को उन्होंने अपनाया और लेखन को छोड़कर व्याख्यान की ओर गए उसको पल्लवित और पुष्पित होते देखकर वो आनंद से भर उठते। लेकिन कोरोना संकट के इस दौर में लेखकों के लाइव को देखने के बाद एक महत्वूपूर्ण तथ्य को भी रेखांकित किया जाना चाहिए। दरअसल आभासी माध्यम बेहद पारदर्शी है, वो हाथ के हाथ ये बता देता है कि आपको कितने लोग सुन रहे हैं या आपके लाइव का वीडियो कितने लोगों तक पहुंचा। तो हम जिस महत्वपूर्ण तथ्य की बात कह रहे थे वो ये कि बुजुर्ग और वरिष्ठ लेखकों को सुनने के लिए ही ज्यादा श्रोता या दर्शक फेसबुक पर पहुंचे। इनकी तुलना में युवाओं को बहुत ही कम दर्शक या श्रोता मिले। लगभग नगण्य। हिंदी की वरिष्ठ लेखिका ऊषाकिरण खान हों या मैत्रेयी पुष्पा या फिर विनोद कुमार शुक्ल या अशोक वाजपेयी ही क्यों न हों, इनको उन युवा लेखकों के मुकाबले ज्यादा लोगों ने सुना और देखा जो खुद को साहित्य का सितारा मानते हैं। अगर इस संख्या को लोकप्रियता का पैमाना माना जाए तो हमारे वरिष्ठ लेखक अब भी युवाओं पर भारी हैं। हिंदी साहित्य की आभासी दुनिया में जो भी उपस्थिति हो उसको ही पैमाना मानें तो ये बात और स्पष्ट हो जाती है। बहुत कम युवा लेखक ऐसे रहे जिनको सुनने के लिए सौ दर्शक फेसबुक पर लाइव जुड़े या फिर बाद में उनके वीडियो की पहुंच एक हजार लोगों तक हुई। साहित्य के भविष्य के लिए यह बहुत ही चिंता की बात है।
इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि हमारे युवा लेखक जो खुद को साहित्य का सितारा मानते हैं, श्रेष्ठता बोध इतना कि वो अपने आगे न तो रामचंद्र शुक्ल को कुछ मानते हैं और न ही प्रेमचंद को। एक वाक्य बोलकर या लिखकर अपने पूर्वज लेखकों का सब किया धरा लीप-पोत कर रखने की कोशिश करते हैं। हिंदी साहित्य के इसी लाइव काल में फेसबुक पर एक निरर्थक बहस चली जिसमें आचार्य रामचंद्र शुक्ल को लेकर न सिर्फ अनाप-शनाप कहा गया बल्कि उनके योगदान को खारिज करने जैसी बातें भी हुईं। रामचंद्र शुक्ल को खारिज करने के लिए कम से कम उनका लिखा पढ़ना आवश्यक है। बगैर रामचंद्र शुक्ल को पढ़े, सुनी सुनाई बातों के आधार पर और उनके नाम में लगे शुक्ल के आधार पर उनपर हमले किए गए। जिन लोगों ने भी रामचंद्र शुक्ल पर हमले किए या उनके साहित्यिक अवदान को न्यूनतम बताने की कोशिश की उनकी टिप्पणियां बेहद स्तरहीन और मूर्खतापूर्ण थीं। शुक्ल जी को कबीर विरोधी करार देनेवाले फेसबुक वीर अतिउत्साह में शुक्ल जी को ब्राह्मणवादी आलोचक तक करार देने में नहीं हिचके। काशी हिंदू विश्वविद्लय से जब हजारी प्रसाद द्विवेदी जी को जाना पड़ा था तब वो कुछ पंक्तियां कहा करते थे, उनमें से एक पंक्ति क्षमा सहित थोड़े बदलाव के साथ कि ‘वे द्विज और होंगे जो उल्लू के नखों की चोट से घायल हो जाते हैं।‘ 
आचार्य रामचंद्र शुक्ल की स्थापनाओं पर प्रश्न खड़े करने के लिए नामवर सिंह को भी ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जैसी पुस्तक लिखनी पड़ी लेकिन उसमें भी नामवर सिंह ने बहुत संभलकर शुक्ल जी की आलोचना की। उद्धरणों के सहारे ही शुक्ल जी के लेखन पर सवाल उठाए। कई युवा लेखक आत्ममुग्धता में इतने पर भी नहीं रुकते हैं बल्कि वो इस बात में गौरव महसूस करते हैं कि वो हिंदी परंपरा को नहीं जानते हैं। वो बहुत गर्व से कहते हैं कि वो पंत और महादेवी को नहीं जानते या सिर्फ इतना जानते हैं कि वो हिंदी में ‘कुछ’ लिखते थे। इस तरह की टिप्पणियां अहंकारी लग सकती हैं पर दरअसल ये अज्ञान का सार्वजनिक प्रदर्शन है। अस्वीकार का साहस भी उन लेखकों के पास ही होता है जिसे अपनी परंपरा का ज्ञान होता है। नामवर सिंह ने भी दूसरी परंपरा की खोज लिखा था तो उसकी भूमिका में उल्लेख किया था, ‘अनपेक्षित प्रसंग वे कहे जा सकते हैं जहां अन्य विद्वानों की आलोचना है, लेकिन उसके बिना द्विवेदी जी के वैचारिक संघर्ष का संदर्भ अस्पष्ट और अमूर्त रह जाता। इसलिए शिष्टता पर स्पष्टता को तरजीह क्षम्य होनी चाहिए। कहने की आवश्यकता नहीं कि पूर्वपक्ष के ऋषि कुछ कम पूज्य नहीं-यह एहसास मुझमें है। लेकिन इन दिनों तो शिष्टता पर मूर्खता को तरजीह मिल रही है।‘ यह भी एक वजह हो सकती है कि जिससे उन युवा लेखकों को दर्शक या श्रोता नहीं मिल पा रहे हैं जिनको हिंदी साहित्य की परंपरा का ज्ञान नहीं है इसलिए जब वो विषय विशेष को उठाते हैं तो उसमें न तो गंभीरता रहती है और न ही कोई ऐसा रोचक प्रसंग जो दर्शक या श्रोता को समृद्ध कर सके। दरअसल लाइव अपने श्रोताओं से पाठकों से या दर्शकों के समझ जाना और उनको बांधे रखना एक अलग ही किस्म की कला है। या तो आपकी वक्तृत्व कला ऐसी हो जो दर्शकों को बांध सके या फिर आपके कहने में ऐसा कंटेंट हो जिसको सुनने के लिए लोग वक्ता के साथ जुड़े रह सकें। इन दोनों ही कसौटी पर हमारे दौर के वरिष्ठ लेखक युवाओं पर भारी पड़ते हैं।
किसी भी साहित्य में चलने वाले विमर्श, साहित्यकारों के बीच के नोंक-झोंक, हास परिहास और रचनात्मक आक्रमण उसकी जीवंतता को भी इंगित करते हैं लेकिन अगर फेसबुक पर चलनेवाले इन लाइव को हिंदी साहित्य का विमर्श मान लें तो जीवंतता कम आत्ममुग्धता ज्यादा दिखाई देती है। इसके अलावा एक और प्रवृत्ति है जिसको भी रेखांमकित करना आवश्यक है वो है युवा लेखकों में अपनी रचनाओं की कमी के बारे में सुनने का धैर्य नहीं होना। अपनी रचना में कमी या कमजोरी को वो सुनना नगीं चाहते हैं और अगर कोई वरिष्ठ साहित्यकार इस ओर ध्यान दिलाना चाहता है तो वो अपने मित्रों के साथ उनपर ही टूट पड़ते हैं। आलोचना और आलोचक को लेकर एक अजीब किस्म की उदासीनता और उपेक्षा का भाव दिखाई देता है। ज्यादातर युवा लेखक फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को आलोचकों की जगह रखते हैं और इसको लिखकर स्वीकार भी करते हैं। नतीजा यह है कि अभी अभी लिख रही युवा पीढ़ी का कोई अपना आलोचक तैयार नहीं हो सका जो उनकी रचनाओं के अर्थ खोलकर पाठकों तक पहुंचा सके। ऐसी परिस्थिति में अगर कोई युवा लेखक अपनी रचना को लेकर पाठकों के बीच भी जाता है और लाइव करता है तो उसको भी अपेक्षित संख्या नहीं मिल पाती है। इन स्थितियों पर विचार करने से स्थिति स्पष्ट होगी।