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Saturday, October 4, 2025

सबरीमाला मंदिर की आस्था पर चोट


केरल में अगले वर्ष विधानसभा के चुनाव होनेवाले हैं। सभी राजनीतिक दल चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं। पिछले दो विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्टों के गठबंधन ने केरल में सरकार बनाई। पी विजयन मुख्यमंत्री बने। उनके नेतृत्व में कम्युनिस्ट गठबंधन तीसरी बार राज्य में सरकार बनाने के लिए प्रयत्नशील है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस भी वामपंथी गठबंधन को चुनावी मात देकर दस साल बाद सत्ता में वापसी के मंसूबे पाले बैठी है। भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से केरल की राजनीति में अपनी उपस्थिति को मजबूत करने में लगी है। चुनाव की आहट के साथ त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड ने पिछले महीने वैश्विक अयप्पा संगमम का आयोजन किया। घोषित तौर पर इस संगमम का उद्देश्य सबरीमाला मंदिर की महिमा का वैश्विक स्तर पर विस्तार करना था। केरल के राजनीतिक दलों ने कम्युनिस्ट सरकार पर आरोप लगाया कि हिंदू वोटरों को रिझाने के लिए संगमम का आयोजन किया गया। संगमम की चर्चा के बीच सबरीमाला मंदिर प्रशासन एक अन्य कारण से विवाद में घिर गया। सबरीमाला मंदिर से करीब पांच किलो सोना चोरी होने की आशंका है। इस समाचार के बाहर आते ही कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी केरल की कम्युनिस्ट सरकार पर हमलावर है। सरकार ही त्रावणकोर देवोस्थानम बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति करती है। बोर्ड की स्थापना तीर्थयात्रियों की सुविधाओं के अलावा मंदिरों की संपत्ति की सुरक्षा के लिए की गई थी। 

सबरीमाला मंदिर से पांच किलो सोना गायब होने का मामला केरल और दक्षिण भारत में इन दिनों खूब चर्चा में है। मंदिर प्रशासन पर आरोप लग रहे हैं मंदिर के गर्भगृह और उसके बाहर लगे द्वारपाल की मूर्ति और अन्य जगहों पर मढ़े गए सोने का वजन उसकी सफाई या बदलाव के दौरान पांच किलो कम हो गया। पूरा मामला इस तरह से है। 1998-99 में कारोबारी विजय माल्या, जो इन दिनों आर्थिक अपराध के आरोप में देश से फरार हैं, ने सबरीमाला मंदिर में 30 किलो सोने का चढ़ावा दिया था। उस समय ये बात सामने आई थी कि मंदिर प्रशासन ने उस सोना का उपयोग गर्भगृह और उसके बाहर लगे द्वारपाल की प्रतिमा को स्वर्णसज्जित करने में किया था। करीब बीस वर्षों के बाद जब त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड ने मंदिर के रखरखाव के लिए स्वर्ण परतों को हटाया तो पता चला कि वो सोने का नहीं था। अब इस बात की जांच की जा रही है कि सोना लगाते समय ही उसकी जगह किसी अन्य धातु का उपयोग किया गया था या बाद में उसको बदला गया। इस तरह की बात भी आ रही है कि गर्भगृह की दीवारों पर लगी स्वर्ण परतों को साफ सफाई के लिए चेन्नई भेजा गया था। जब वहां से प्लेट्स वापस आईं तो उसका वजन करीब पांच किलो कम था। त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड की विजिलेंस टीम ने कार्यालय से दस्तावेज जब्त किए हैं। अब इन दस्तावेजों और उनकी प्रामाणिकता पर भी संदेह व्यक्त किया जा रहा है। संपत्तियों की रजिस्टर में एंट्री पर भी प्रश्न उठने लगे हैं। केरल हाईकोर्ट ने पूर्व हाईकोर्ट जज की देखरेख में मंदिर की संपत्ति का ब्योरा जुटाने का आदेश दिया है। केरल हाईकोर्ट ने त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड को सही तरीके से रिकार्ड नहीं रख पाने के लिए लताड़ लगाई है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने केरल हाईकोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच की मांग की है। 

जिस तरह के समाचार केरल से आ रहे हैं उससे तो ये प्रतीत होता है कि सबरीमाला मंदिर के गर्भगृह में और उसके बाहर लगी मूर्तियों की स्वर्णसज्जा के साथ छेड़छाड़ की गई है। आरोप ये भी लग रहे हैं कि सोने को निकालकर उसकी जगह पीतल से सज्जा कर दी गई। ये खबरें सिर्फ एक सामान्य चोरी की खबर नहीं है बल्कि भगवान अयप्पा के भक्तों की श्रद्धा पर डाका जैसा है। केरल की कम्युनिस्ट सरकार की जिम्मेदारी है कि वो दोषियों को जल्द से जल्द पकड़कर मंदिर के सोने की बरामदगी करवाए। मंदिर की फिर से स्वर्णसज्जा हो। भगवान अयप्पा के भक्त सिर्फ केरल में ही नहीं बल्कि पूरे भारत और विश्व के अन्य देशों में भी हैं। सबकी आस्था और श्रद्धा इस मंदिर से जुड़ी हुई है। जैसे जैसे इस चोरी की परतें खुल रही हैं हिंदू श्रद्धालुओं के अंदर क्षोभ बढ़ता जा रहा है। निश्चित है कि भगवान अयप्पा मंदिर से सोना चोरी चुनावी मुद्दा भी बनेगा। आपको याद होगा कि ओडीशा विधानसभा चुनाव के दौरान भगवान जगन्नाथ मंदिर के रत्न भंडार की चाबी को लेकर विवाद हुआ था। कोर्ट के आदेश के बाद भगवान जगन्नाथ मंदिर की संपत्तियों की जांच और उसकी सूची को लेकर रत्न भंडार खोला गया था। जब इस कार्य को कर रहे लोग रत्न भंडार तक पहुंचे तो वहां ताला बंद था। उस ताले की चाबी की तलाश की गई। चाबी नहीं मिली। जब 1978 में भगवान जगन्नाथ मंदिर के रत्न भंडार का सर्वे हुआ तो वहां 149 किलो स्वर्ण आभूषण और 258 किलो के चांदी के बर्तनों की सूची बनी थी। उसके बाद 2018 में फिर से सर्वे का प्रयास हुआ तो चाबी ही नहीं मिल पाई। विधानसभा चुनाव के दौरान रत्न भंडार की चाबी गायब होने का मुद्दा बड़ा हो गया था। नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली राज्य सरकार कठघरे में आ गई थी। भगवान जगन्नाथ और भगवान अयप्पा में हिंदुओं की आस्था इतनी गहरी है कि उसको जब भी ठेस लगती है तो जनता अपनी प्रतिक्रिया देती है। ओडिशा में नवीन पटनायक की हार का एक बड़ा कारण रत्न भंडार की चाबी का ना मिलना भी बना। 

इन दो उदाहरणों से मंदिरों की संपत्ति की सुरक्षा को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। भक्त अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपने आराध्य को भेंट अर्पित करते हैं। जिनपर भक्तों की भेंट को सुरक्षित रखने का दायित्व है वो उसका निर्वहन ठीक तरीके से नहीं कर पा रहे हैं तो उसको लेकर सरकार को गंभीरता से विचार करना होगा। विचार तो इसपर भी करना चाहिए कि मंदिरों की संपत्ति का कस्टोडियन सरकार हो या हिंदू समाज। इससे संबंधित एक एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना होगा जिससे प्रभु की संपत्ति में सेंध ना लग सके। क्या अब समय आ गया है कि मंदिरों का प्रबंधन सरकार को हिंदू समाज को सौंप देना चाहिए। कोई ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिसमें सरकार और हिंदू समाज साथ मिलकर मंदिरों की संपत्ति की रक्षा कर सकें। आप इस बात की कल्पना करिए कि अगर भगवान अयप्पा के गर्भगृह की स्वर्ण सज्जा को हटाकर उसको पीतल से आच्छादित कर दिया गया तो इसके पीछे कितनी गहरी साजिश रही होगी। कितने लोगों की मिलीभगत रही होगी तब जाकर इस पाप को किया जा सका होगा। अगर ये साबित हो जाता है कि सोना चोरी करके वहां पीतल लगा दिया गया तो भक्तों की आस्था को कितनी ठेस पहुंचेगी। हिंदू समाज को अपनी आस्था के इन केंद्रों की सुरक्षा को लेकर संगठित होकर एक कार्ययोजना पेश करना होगा, ताकि सरकार उसपर विचार कर सके। दोनों की सहमति से कोई ठोस निर्णय लिया जा सके। समाज जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह मंदिर प्रबंधन को लेकर राष्ट्रव्यापी नीति बनाने की आवश्यकता है।   


Tuesday, December 20, 2016

देशद्रोह के घेरे में फिर लेखक

एक लेखक ने फेसबुक पर अपनी कृति का एक अंश पोस्ट किया, कुछ लोगों को ये राष्ट्रगान का अपमान लगा, उन्होंने पुलिस में शिकायत दी । हरकत में आई पुलिस ने आनन-फानन में लेखक को राष्ट्रद्रोह के मुकदमे में आरोपी बनाते हुए गिरफ्तार कर लिया । यह भी तब हुआ जब लेखक अग्रिम जमानत के लिए अदालत जाने की तैयारी में था । दरअसल ये पूरा वकया है केरल का जहां मलयालम लेखक और रंगकर्मी कमल चवारा को पुलिस ने राष्ट्रद्रोह यानि आईपीसी की धारा 124 ए के अंतर्गत गिरफ्तार किया । उनपर आरोप है कि उन्होंने फेसबुक पर अपने ताजा उपन्यास का एक अंश पोस्ट किया जिसमें उन्होंने लिखा – हर दिन चार बजे स्कूल में राष्ट्रगान के लिए खड़ा होना पड़ता था लेकिन पेशाब करना उनके लिए जन गण मन से ज्यादा अहम था लिहाजा वो स्कूल के सबसे अनुशासनहीन छात्र थे । संभव है कि कुछ लोगों को इसमें राष्ट्रगान का अपमान दिखता हो लेकिन किताब को और प्रसंग को समग्रता में देखा जाना चाहिए । बगैर समग्रता में किसी मसले को समझे और लेखक की मंशा को जाने बगैर राष्ट्रद्रोह में गिरफ्तारी सत्ता के दमनकारी चरित्र को ही उभारता है । राष्ट्रद्रोह की धारा में गिरफ्तारी के पहले यह काम पुलिस को करना चाहिए था । भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए साफ तौर पर कहता है कि कोई भी व्यक्ति जो अपने लेखन से या भाषण से या अपने क्रियाकलापों से विधि द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ घृणा या विद्रोह की चिंगारी को हवा देता हो, इसमें आरोपित हो सकता है । लेकिन इस कानून में ही ये व्याख्या भी की गई है कि किन परिस्थितियों में लेखन, भाषण आदि राष्ट्रद्रोह नहीं होते हैं । सवाल यही उठता है कि इस तरह का लेखन राष्ट्रद्रोह कैसे हो गया । ज्यादा से ज्यादा पुलिस इस मामले में 295 ए की धारा लगा सकती है । भावनाओं के आहत होने के मामले में इसका प्रयोग उचित होता या राष्ट्रगान के अपमान से निबटने के लिए बनाए गए कानून का सहारा लेना चाहिए था । इस पूरे मसले पर सबसे दिलचस्प बयान केरल के वामपंथी मुख्यमंत्री विजयन का आया है जिन्होंने इसके लिए राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की सांप्रदायिक राजनीति को जिम्मेदार ठहराया है । उनका आरोप है कि संघ परिवार से जुड़े लोग लेखक को मुस्लिम राष्ट्रद्रोही करार दे रहे थे और सांप्रदायकिता का जहर फैला रहे थे । अगर ऐसा था तो क्या सरकार शिकायतकर्ताओं के दबाव में काम करती हैं । क्या कानून की धारा का उपयोग पुलिस किसी की मंशा को ध्यान में रखकर लगाती है या फिर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ध्वजवाहक होने का दावा करनेवाली वामपंथी विचारधारा की सरकार ने भी वही किया जिसका आरोप उनके नेता दिल्ली पुलिस पर लगाती रही है । जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर जब राष्ट्रहोह की धारा लगाकर उसको गिरफ्तार किया गया तो वामपंथियों का इल्जाम था कि दिल्ली पुलिस मोदी सरकार के इशारे पर अभिव्यक्ति की आजादी को दबाना चाहती है । अब क्या । अब तो सरकार भी आपकी और पुलिस भी आपकी, फिर भी राष्ट्रद्रोह का मुकदमा ? वामपंथियों का ये दोहरा चरित्र ही उनकी विचारधारा पर सवाल खड़े करती है । यही चरित्र उस वक्त पश्चिम बंगाल में भी देखने को मिला था जब वामपंथियों की सरकार ने कोलकाता में निर्वासित जीवन बिता रही तस्लीमा नसरीन को सूबे से निकाल दिया था । जब ममता बनर्जी की सरकार आई तब भी उनको बंगाल में रहने की इजाजत नहीं मिली । दरअसल सत्ता का चरित्र एक जैसा होता है । सरकार चाहे किसी भी दल की हो उसका व्यवहार करीब करीब एक जैसा होता है । आजम खान पर फेसबुक पर टिप्पणी भी एक लेखक को जेल भिजवा चुकी है । ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं लेकिन हाल के दिनों में इसको राष्ट्रद्रोह से जोड़ दिया जा रहा है गोया कोई नेता ही राष्ट्र हो गया हो । तमिल लेखक मुरुगन के मामले में भी ऐसा ही हुआ था । स्थानीय विरोध और पुलिस और प्रशासन के जबरन माफीनामे के बाद उन्होंने एक लेखक की मौत का एलान कर दिया था । मामला जब मद्रास हाईकोर्ट में पहुंचा तो विद्वान न्यायधीश संजयकिशन कौल ने करीब एक सौ साठ पन्नों का ऐतिहासिक फैसला दिया । फैसले में लेखकीय स्वतंत्रता को कायम रखने पर जोर देते हुए कहा गया है कि अगर कोई किसी किताब से इत्तफाक नहीं रखता है या उसमें लिखे हुए शब्दों से उसकी भावनाएं आहत होती हैं तो वो उसको अलग रख दे । फैसले में साफ कहा गया है कि कोई भी चीज जो पहले स्वीकार्य ना हो वो बाद में स्वीकार की जा सकती है । न्यायाधीश ने इस संबंध में लेडी चैटर्लीज लवर का उदाहरण भी दिया ।
अब वक्त आ गया है कि राष्ट्रद्रोह की इस धारा पर देशव्यापी बहस हो । जब संविधान बना था तब देश की स्थितियां कुछ और थीं और सत्तर साल बाद देश काफी बदल चुका है और बदल चुकी है देश के नेताओं की मानसिकता । पुलिस इस धारा का बेजा इस्तेमाल नहीं कर सके उसके लिए यह आवश्यक है कि या तो संसद या फिर देश की शीर्ष अदालत इस कानून की उन स्थितियों को और साफ करे जिनमें देशद्रोह लगाया जा सकता है ।


Saturday, June 2, 2012

सियासत का खूनी खेल !

केरल के मार्क्सवादी नेता के एक बयान ने सीपीएम के चेहरे से नकाब हटा दिया है और पूरी पार्टी के कठघरे में खड़ा कर दिया है । केरल के इडुक्की जिला सीपीएम के अध्यक्ष और राज्य कमेटी के सदस्य एम एम मणि ने ये कहकर सनसनी फैला दी कि उनकी पार्टी राजनैतिक विरोधियों की हत्या करवाने में यकीन रखती है । मणि ने ये बातें खुलेआम एक रैली में की । इस बयान को जोश में होश खो देने वाला बयान बता कर खारिज नहीं किया जा सकता है क्योंकि मणि ने अपने मरने मारनेवाले बयान के बाद उसके समर्थन में उदाहरण देकर उसी सही भी ठहराया और कहा कि पार्टी को उन हत्याऔं की जिम्मेदारी लेने से कोई गुरेज भी नहीं है जो उसने करवाई है । पहले तो मणि ने खुलेआम ये कहा कि हमें मरने और मार डालने की आदत है । इसलिए उनकी पार्टी सीपीएम और उसके कार्यकर्ताओं को कोई धमकी ना दे । उन्होंने सरेआम ये ऐलान किया कि जो भी पार्टी के खिलाफ काम करेगा उसे रास्ते से हटा दिया जाएगा । मणि के मुताबिक सीपीएम ने 1982 में तेरह लोगों की सूची बनाई थी जिन्हें कत्ल करना था । इस सूची में से एक को गोली मारकर हत्या कर दी गई । दूसरे की सरेआम पीट-पीट कर हत्या कर दी गई और तीसरे शख्स को तो चाकुओं से गोदकर मार डाला गया । आरोपों को मुताबिक कत्ल किए गए दो लोगो कांग्रेस के कार्यकर्ता थे और एक भारतीय जनता पार्टी के लिए काम करता था । इंतहां तो तब हो गई थी जब इनमें से एक हत्या के चश्मदीद का भी कत्ल हो गया । इन हत्याओं के आरोप उस वक्त भी सीपीएम पर लगे थे । लेकिन उन हत्याओं में पड़ताल कहां तक पहुंची इसका पता ही नहीं चल पाया ।

मणि के इस बयान के बाद केरल समेत देश की राजनीति में भूचाल आ गया है । केरल सीपीएम के ताकतवर नेता पिनयारी विजयन ने इस बयान पर सफाई दी और कहा कि मणि ने सार्वजनिक रूप से बयान देकर गलत किया है और यह पार्टी के स्थापित मानदंडों के खिलाफ है । यहां यह बात गौर करने लायक है कि विजयन ने मणि के बायन को गलत नहीं ठहराया बल्कि सार्वजनिक रूप से बयान देने को गलत करार दिया । तो क्या यह मान लिया जाए कि विजयन की मणि के बयानों से सहमति हैं । केंद्रीय नेतृत्व को ये साफ करना होगा । मणि के इस बयान और विजयन की सफाई को केरल में हाल ही में सीपीएम छोड़कर अपनी पार्टी बनाने वाले टी पी चंद्रशेखरन की हत्या से जोड़कर देखा जाने लगा है । चंद्रशेखरन की हत्या के बाद पिनयारी विजयन के बयान को देखें तो उससे भी हिंसा की इस राजनीति की तस्वीर थोड़ी और साफ होती है । चंद्रशेखरन के कत्ल के बाद विजयन ने कहा था कि वो दलबदलू और विश्वासघाती थे । विजयन ने ये बयान उस वक्त दिय़ा था जब केरल के कद्दावर कम्युनिस्ट नेता वी एस अच्युतानंदन उनको श्रद्धांजली दे रहे थे । पिनयारी विजयन के इस बयान के अपने निहितार्थ हैं जिसको मणि के बयानों ने उजागर कर दिया है । एम एम मणि के बयान को सीपीएम के आला केंद्रीय नेता यह कहकर दबा देने के चक्कर में हैं कि वो पार्टी का एक बहुत छोटा नेता है लिहाजा उसके बयान को पार्टी की विचारधारा नहीं मानी जानी चाहिए । ये सही भी है कि किसी भी ऱाष्ट्रीय पार्टी(अगर सीपीएम अब भी है तो) के एक जिले के अध्यक्ष के बयान को पार्टी की विचारधारा नहीं माना जा सकता है लेकिन अगर उस जिलाध्यक्ष का इतना रुतबा हो कि विधानसभा चुनाव के वक्त अपनी पार्टी के शीर्ष नेता और सूबे के मुख्यमंत्री को प्रचार के लिए अपने इलाके में नहीं आने दे तो उसके रुतबे का अंदाजा लगाया जा सकता है । पिछले विधानसभा चुनाव के वक्त मणि ने अच्युतानंदन को इडुक्की नहीं आने दिया था । ये है मणि की पार्टी में हैसियत और ताकत । उसके अलावा एम एम मणि पच्चीस साल से ज्यादा वक्त से जिलाध्यक्ष हैं और पार्टी में कोई कार्यकर्ता उनके खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं कर सकता । क्यों नहीं कर सकता, इसकी वजह मणि ने खुद साफ कर दी है ।

ऐसा नहीं है कि वामपंथी दलों के शासन वाले राज्यों में पहली बार राजनीतिक हिंसा की बात सामने आ रही है । पश्चिम बंगाल में भी दशकों तक मार्क्सवादियों ने राज किया किया लेकिन उनका दामन भी सियासी हत्याओं से दागदार रहा है । ममता बनर्जी की पार्टी के नेता तो उस दौरान पचास हजार से ज्यादा राजनीतिक हत्या का आरोप लगाते रहे हैं । हो सकता है उसमें अतिशोक्ति हो लेकिन तटस्थ विश्लेषकों की मानें तो वामपंथी शासनकाल के दौरान तकरीबन चार हजार राजनैतिक कार्यकर्ताओं की हत्या हुई । उन्नीस सौ सतहत्तर से लेकर अब तक पंद्रह सौ कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की हत्या हुई और तकरीबन बीस हजार परिवारों को घर छोड़कर भागना पड़ा । तृणमूल कांग्रेस के भी दो हजार कार्यकर्ताओं की हत्या के आरोप सीपीएम पर लगे। जब ममता बनर्जी सूबे में सत्तारूढ हुई तो कई सीपीएम नेताओं घर के पिछवाड़े में बने गार्डन से नरकंकाल बरामद होने से इन आरोपों को और बल मिला है ।  

दरअसल मणि के बयानों ने पार्टी की एक सचाई को उजागर कर दी । सीपीएम की बुनियाद और विचारधारा का आधार ही हिंसा रहा है । उन्नीस सौ साठ में जब कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन हुआ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्कसवादी का गठन हुआ तो उनकी आत्मा और विचारधारा चीन की तरफ झुकी हुई थी । सीपीआई तो सिस्टम में बनी रही लेकिन सीपीएम सशस्त्र संघर्ष के जरिए भारतीय गणतंत्र को हथियार के बल पर जीतने की ख्वाहिश पाल बैठी । उनके सामने माओवादी चीन का मॉडल था और वो बड़े फख्र के साथ नारा लगाया करते थे – चीन का चेयरमैन, हमारा चेयरमैन । जाहिर तौर पर बात माओ की होती थी । माओ ने चीन में जिस विचारधारा की बुनियाद रखी चीन कमोबेश उसी पर आगे चलता रहा है । हलांकि माओ के विचारधारा पर डेंग जियाओपिंग ने उन्नीस सौ सत्तर में लगाम लगा दी थी लेकिन थियेन अन मन चौक पर जिस तरह से प्रदर्शनकारियों को टैंकों से कुचल दिया गया वह माओ की ही विचारधारा की परिणति थी। चीन में भी राजनीतिक विरोध करनेवालों को कुचला गया, सामूहिक नरसंहार किया गया । उसी चीनी कम्युनिस्ट विचारधारा की बुनियाद पर बनी पार्टी भारत में अब खुलेआम अपने राजनैतिक विरोधियों के कत्ल की बात करने लगी है ।

लेकिन चीन के चेयरमैन माओ की विचारधारा को सही मानने वाले लोग यह भूल गए कि भारत गांधी का देश है और यहां हिंसा और नफरत की राजनीति करनेवाले लोग सियासत में ज्यादा दिन टिक नहीं पाते हैं । बंगाल और केरल में में हार के बाद सीपीएम जिस तरह से पूरे देश में सिमट गई है उससे यह लगने लगा है कि हिंसा की बुनियाद पर राजनीति करने वाले कुछ वक्त के लिए तो प्रासंगिक हो सकते हैं लेकिन फिर जनता उनको नकार ही देती है । देश में कम्युनिस्टों के लाल झंडे को लहराने के पचहत्तर साल हो गए हैं । बाइस मई उन्नीस सौ सैंतीस को अलापुझा के राधा थिएटर में पहली बार हशिया और हथौड़ा वाला लाल झंडा फहराया गया ता लेकिन सिर्फ पचहत्तर साल में लाल रंग फीका पड़ने लगा है । दिक्कत ये है कि हमारे यहां के मार्कसवादी भारत को माओ के सिद्धांतो के अनुरूप बदलना चाहते हैं । उनको ये बिल्कुल गंवारा नहीं कि माओ के सिद्धांतों को भारतीयता के अनुरूप बदला जाए । जिस दिन वो इस बात को समझ पाएंगे उस दिन से सियासत का खूनी खेल बंद हो जाएगा और उनकी स्वीकार्यता भी बढ़ जाएगी ।