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Saturday, March 25, 2017

राजेन्द्र यादव होने की चाहत

कई सालों से यह कहा जाता रहा है कि दिल्ली देश की साहित्यक राजधानी भी है । चंद सालों पहले तक यह भी कहा जाता था कि नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, अशोक वाजपेयी इस राजधानी के सत्ता केंद्र हैं । इन्हीं चर्चाओं के बीच रवीन्द्र कालिया नया ज्ञानोदय के संपादक बनकर दिल्ली आए तो वो भी एक सत्ता केंद्र के तौर पर देखे जाने लगे थे हलांकि वो इस बात से लगातार इंकार करते थे । राजेन्द्र यादव जी और रवीन्द्र कालिया जी का निधन हो गया । नामवर जी अपनी बढ़ती उम्र की वजह से उतने सक्रिय नहीं हैं और अशोक वाजपेयी की सत्ता से दूरी उनको केंद्र से उठाकर परिधि तक पहुंचा चुकी है। ऐसी स्थिति में देश की कथित साहित्यक राजधानी में कोई सत्ता केंद्र रहा नहीं, छोटे-छोटे मठनुमा केंद्र बचे हैं लेकिन वो लेखकों के बड़े समुदाय को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं । सेमिनार, गोष्ठियों में बुलाकर उपकृत भर कर सकने की क्षमता इन मठाधीशों के पास है । हिंदी में जो तीन चार साहित्यक पत्रिकाएं निकल रही हैं उनमें से भी सत्ता केंद्र बनने की ललक किसी संपादक में दिखाई नहीं देती है । नया ज्ञानोदय के संपादक लीलाधर मंडलोई पत्रिका को संजीदगी से निकाल रहे हैं और विवाद आदि से दूर ही रहते हैं । कथादेश के संपादक हरिनारायण जी पत्रिका के शुरुआती दौर से ही पत्रिका की आवर्तिता को लेकर ही संघर्षरत रहे हैं और वहां जो भी लोग जुड़े हैं वो सभी लगभग मध्यमार्गी रहे हैं, लिहाजा पत्रिका नियमित निकालकर ही संतुष्ट नजर आते है । अब रही साहित्यक पत्रिका हंस की बात तो राजेन्द्र यादव के निधन के बाद संजय सहाय ने उसका जिम्मा संभाला । अपने संपादकीय में वो लगातार हमलावर और आक्रामक दिखते हैं लेकिन अमूमन सभी संपादकीयों में उनकी पसंद और नापसंदगी दिखने लगती है, विचारधारा के स्तर पर विरोध कम दिखता है । इसके अलावा संजय सहाय की अगुवाई में जो अंक निकल रहे हैं उसमें ज्यादातर में योजना का अभाव दिखता है । सामान्य कहानी, कविता, लेख , स्तंभ आदि आते रहते हैं और छपते रहते हैं । संजय जी के सामने यादव की विरासत एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है और उस चुनौती से मुठभेड़ करना आसान नहीं है, इस बात को वो स्वीकार भी कर चुके हैं । अभी हंस का एक विशेषांक निकला है रहस्य रोमांच, भूत-प्रेत आदि पर । संपादकीय संयोजन में कोई खास छाप यह अंक नहीं छोड़ पाई ।  
प्रेम भारद्वाज के सापंदन में पाखी में बहुधा एक स्पार्क दिखता है, यादव जी की तरह साहित्य की जमीन पर विवाद उठाने की ललक भी दिखाई देती है । कई बार तो विवाद उठाने में सफल भी होते रहे हैं । अभी हाल ही में अल्पना मिश्र के साक्षात्कार पर साहित्य जगत में काफी हलचल दिखी । जिस तरह के प्रश्न और उत्तर थे वो पत्रिका की विवाद उठाने की मंशा को साफ कर रहे थे । पाखी में इल तरह के प्रयोजनों से यह सवाल उठता है कि क्या कोई साहित्य में राजेन्द्र यादव होना चाहता है । फेसबुक पर इस बारे में सवाल और कई दिलचस्प उत्तर भी पोस्ट किए जा चुके हैं । इस सिलसिले मुसाफिर कैफे जैसी चर्चित कृति के युवा लेखक और दिल्ली की साहित्यक राजनीति से दूर मुंबई में रहनेवाले दिव्य प्रकाश दूबे की बात का स्मरण हो रहा है । मुंबई में एक साहित्यक बैठकी के दौरान दिव्यप्रकाश जी ने कहा था कि हिंदी में कई लेखक इस वक्त राजेन्द्र यादव होना चाहते हैं । ज्यादातर लेखकों के मन के कोने-अंतरे में ये ख्वाहिश पलती रहती है और वो हमेशा राजेन्द्र यादव होने की फिराक में लगे रहते हैं । संभव है दिव्य ने ये बातें मजाक में कही हों लेकिन दिल्ली के कई लेखकों पर यह बात लागू होती है । लेखक राजेन्द्र यादव तो होना चाहते हैं लेकिन उनके अंदर वो आग, वो साहस, वो सक्रियता, वो आकर्षण, वो नवाचारी स्वभाव कहां हैं । इसके अलावा नए लोगों को आगे बढ़ाने की कला भी तो नहीं है ।            
राजेन्द्र यादव के छिहत्तरवें जन्मदिन पर जब भारत भारद्वाज और साधना अग्राल के संपादन में हमारे युग का खलनायक नाम की पुस्तक का प्रकाशन हुआ था तब उसके शीर्षक पर हिंदी जगत चौंका था लेकिन यादव जी ने खूब मजे लिए थे । यह राजेन्द्र यादव का जिगरा था कि उन्होंने इस शीर्षक को भी इंज्वाय किया था । इस पुस्तक के संपादक भारत भारद्वाज ने लिखा था -  ‘राजेन्द्र यादव के लेखन का रेंज ही बहुत बड़ा नहीं है, उनकी दिलचस्पी और रुचि का रेंज भी । इन्होंने विश्व साहित्य का अधिकांश महत्वपूर्ण पढ़ रखा है , ठीक है कि वो सार्त्र भी होना चाहते हैं और अपनी दुनिया में अपने लिए एक सिमोन भी तलाश करते रहते हैं । घर-बार भी इन्होंने छोड़ा, यह छोटी बात नहीं है । हमें देखना यह है कि अपनी जिंदगी में कितनी छूट इन्होंने ली ।‘ अब इसमें सिमोन और सार्त्र वाली बात ही यादव जी के बाद की पीढ़ी के लेखकों को आकर्षित करती है । राजेन्द्र यादव होने की चाहत पालने वाले कई लेखक सार्त्र तो होना चाहते हैं, सिमोन की तलाश में मंडी हाउस से लेकर साहित्यक गोष्ठियों में नजर भी आते हैं , लेकिन उनमें यादव जी वाला साहस नहीं है । राजेन्द्र यादव जी ने जो किया वो खुल्लम खुल्ला किया, प्यार किया तो डंके की चोट पर, फलर्ट तो वो खुले आम करते ही रहते थे । जब मन्नू जी ने उनको घर से निकाला था तब भी उन्हें किसी तरह का कोई मलाल नहीं था, बल्कि वो उस अप्रिय प्रसंग को भी अपनी आजादी के तौर पर देखते थे । 
उनकी जिंदगी के आखिरी दिनों में जब एक अप्रिय प्रेम प्रसंग आया तो भी वो डरे नहीं, लड़ाई झगड़े के बाद जब पंचायत बैठी तो हंस के दफ्तर में उन्होंने अपनी पुत्री और वकीलों के सामने स्वीकार किया कि वो प्रेम में हैं और उसी लड़की से प्रेम करते हैं । किस शख्स में इतनी हिम्मत होती है कि वो बुढ़ापे में सार्वजनिक तौर पर समाज के सामने अपने प्रेम को स्वीकार करने का साहस दिखा सके । यहां तो लोग जवानी में अपने प्रेम को छिपाते घूमते हैं । सार्त्र बनने के लिए इसी तरह के साहस और समाज से टकराने के जज्बे की जरूरत होती है । लेकिन दिल्ली में मौजूद हिंदी के लेखक बगैर इस साहस और जज्बे के राजेन्द्र यादव बनना चाहते हैं । मुझे याद आता है कि करीब दस-बारह साल पहले एक पत्रिका में राजेन्द्र यादव के पंज प्यारे के नाम से किसी ब्रह्मराक्षस का लेख छपा था जिसमें उनके शिष्यों की सूची थी । जिसमें संजीव, शिवमूर्ति, प्रेम कुमार मणि,भारत भारद्वाज आदि के नाम थे । इस सूची का भी कोई लेखक भी यादव जी वाला साहस नहीं दिखा पाया । अगर हम राजेन्द्र यादव की शख्सियत पर विचार करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि यह उनके व्यक्तित्व का वो हिस्सा है जो उनकी ही वजह से प्रचारित हुआ और उनको बदनामी भी दिलाया । लेकिन राजेन्द्र यादव को अपना छपा हुआ नाम और फोटो देखकर बहुत खुशी होती थी और वो इसके लिए कई तरह के जोखिम उठाने को तैयार रहते थे।

राजेन्द्र यादव बनने के लिए समकालीन साहित्यक परिदृश्य पर पैनी नजर होनी चाहिए । ऐसी नजर जो नए से नए और पुराने से पुराने लेखकों से बेहतर लिखवाने का उपक्रम कर सके । यादव जी को यह भी मालूम होता था कि किस लेखक में क्या लिखने की क्षमता है और एक संपादक के लिए इस दृष्टि का होना बेहद आवश्यक है । इसके अलावा एक संपादक के तौर पर राजेन्द्र यादव ने कई घपले भी किए । उन्होंने कहानीकारों की खूबसूरत तस्वीरें छापनी शुरू की,खासकर महिला कथाकारों की । उनको लगता था कि पाठक कहानीकारों की तस्वीरों को देखकर हंस खरीद लेंगे । यह परंपरा आज भी कायम है । हंस के माध्यम से यादव जी ने लेखकों को उठाने और गिराने का खेल भी खूब खेला । जैसे मैत्रेयी पुष्पा और संजीव की कृतियों की कई कई समीक्षाएं एक साथ छापकर उसको स्थापित करने की चाल चलते थे । इतना ही नहीं वो तो समीक्षाओं में लेखक को बगैर बताए अपनी तरफ से जोड़ भी देते थे । यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है जब उन्होने मेरे एक लेख के अंत में कुछ ऐसा जोड़ दिया जो बिल्कुल वांछित नहीं था । गिराने का खेल इस तरह होता था कि जिसको वो पसंद नहीं करते थे या जो उनके दरबार में मत्था नहीं टेकता था उसकी नोटिस भी नहीं लेते थे । यहां सिर्फ एक अपवाद काम करता था कि रचना अगर उनको पसंद आ जाए तो फिर किसी की नहीं सुनते थे । राजेन्द्र यादव बनने की चाहत रखने के लिए जोखिम उठाने के लिए तैयार रहना होगा, तभी सार्त्र की सिमोन की तलाश पूरी होगी ।  

Saturday, December 17, 2016

महान विभूतियों का नमन और स्मरण

वर्ष दो हजार सोलह बीतने को है, साहित्य और संस्कृति को लेकर इस बीतते हुए साल में काफी कोलाहल हुआ । आजादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि किसी और विचारधारा ने स्थापित विचारधारा को चुनौती दी । इसके पीछे राजनीतिक और गैर राजनीतिक कारण हो सकते हैं लेकिन इस बीतते हुए वर्ष में विमर्श के कोलाहल के बीच साहित्य, संस्कृति और कला के दिग्गजों के निधन ने अपनी अपनी विधाओं को विपन्न कर दिया । इस साल के शुरुआत में ही हिंदी के यशस्वी कथाकार और बेहतरीन संपादक रवीन्द्र कालिया का छिहत्तर साल की उम्र में निधन हो गया । रवीन्द्र कालिया बेहतर कथाकार थे या बेहतर संपादक ये तय करना मुश्किल है लेकिन एक बात जिसपर पूरे साहित्य में मतैक्य है वो ये कि वो एक बेहतरीन और बेहद जिंदादिल इंसान थे । हंस के संपादक राजेन्द्र यादव के निधन के बाद बोरियत की हद तक गंभीरता का आवरण ओढे दिल्ली की साहित्यक जमात में कालिया जी ही थे जो अपने विट और ह्यूमर से इसको बहुधा तोड़ते रहते थे । कालिया जी ने शिक्षण से अपने करियर की शुरुआत की फिर वो धर्मयुग में  धर्मवीर भारती की सोहबत में पत्रकारिता के तमाम गुर सीखे थे । मुंबई में रहते हुए कालिया जी ने साहित्य और पत्रकारिता को बेहद नजदीक से देखा जो बाद में उनकी कहानी काला रजिस्टर में सामने भी आया । रवीन्द्र कालिया, धर्मवीर भारती के साथ काम करने के पहले मोहन राकेश की नजर में आ गए थे । माना जाता है कि भाषा का जो अनुशासन रवीन्द्र कालिया में दिखाई देता है वो मोहन राकेश की ही सोहबत का असर था । एक अनुमान के मुताबिक उनकी किताब ‘गालिब छुटी शराब’ धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों के देवता’ के बाद हिंदी में सबसे ज्यादा बिकनेवाली किताबों में से है ।  एक बार कालिया जी ने कहा था कि हिंदी साहित्य में कुछ कथाकार एक दूसरे को जलील करने के लिए कहानियां लिख रहे हैं । पात्रों के चयन से ये बात साफ होती भी रही है । आज वो नहीं हैं लेकिन उनकी कही कई बातें आज भी साहित्य में गूंज रही हैं
कालिया जी के निधन से साहित्य जगत उबरा भी नहीं था कि निदा फाजली के निधन ने एक बार फिर से इस दुनिया को हिला दिया । निदा फाजली हिंदी-उर्दू की तरक्कीपसंद अदबी रवायत के प्रतिनिधि शायर थे । मजरूह सुल्तानपुरी के बाद निदा ऐसे शायर थे जिन्होंने शायरी को उर्दू और फारसी की गिरफ्त से आजाद कर आम लोगों तक पहुंचाया । उन्होंने हिंदी-उर्दू की जुबां में शायरी की । कह सकते हैं कि हिन्दुस्तानी उनकी शायरी में बेहतरीन रूप से सामने आई । ताउम्र निदा हिंदी और उर्दू के बीच की खाई को पाटने में लगे भी रहे । वो इस बात के विरोधी थे कि मुशायरों में सिर्फ शायरों को और कवि सम्मेलनों में सिर्फ कवियों को बुलाया जाए । उन्होंने कई मंचों पर गोपाल दास नीरज के साथ साझेदारी में कविताएं पढ़ी थी । उनकी शायरी को देखते हुए ये लगता था कि उन्होंने हिंदू मायथोलॉजी का गहरा अध्ययन किया था । सूरदास और कबीर के पदों से उन्होंने प्रेरणा ली और शायरी की । कबीर की तरह निदा भी कहते हैं - ‘बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान, एक खुदा के पास इतना बड़ा मकान’ या फिर ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें , किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए ।‘ उनकी शायरी के ये स्वर अमर हैं । निदा के बाद काल के क्रूर हाथों ने हमसे उर्दू के सबसे बड़े कहानीकारों में एक जोगेन्द्र पॉल को छीन लिया । जोगेन्द्र पॉल पूरे उपमहाद्वीप में उर्दू पाठकों के बीच बेहद लोकप्रिय थे । जोगेन्द्र पॉल का मानना था कि उर्दू भाषा नहीं बल्कि तहजीब है वो अपना रचनात्मक लेखन एक तहजीब में करते हैं । जोगेन्द्र पॉल ने विपुल लेखन किया है और उनके तेरह से अधिक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें खुला, खोदू बाबा का मकबरा और बस्तिआन शामिल हैं । कहानियों के अलावा पॉल ने कई उपन्यास भी लिखे जिनमें से एक बूंद लहू की खासी चर्चित रही है । पॉल की ज्यादातर किताबें हिंदी में भी अनूदित हैं ।
हिंदी और उर्दू के ये महान विभूति एक एक कर जा रहे थे और साहित्य जगत सदमे में था । लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था । हिंदी के मशहूर लेखक मुद्राराक्षस का भी निधन हुआ ।छोटे कदकाठी के मुद्राराक्षस अंत तक अपने सिद्धांतों पर डिगे ही नहीं रहे बल्कि उसको फैलाने के लिए सक्रिय भी रहे । विचारों से मार्क्सवादी-लेनिनवादी मुद्रा जी ने सामजिक आंदोलनों में भी भागीदारी की । लखनऊ के पास बेहटा में जन्मे मुद्राराक्षस ने रंगमंच की दुनिया में भी अपना लोहा मनवाया । उनका लिखा - आला अफसर – बेहतरीन नाटक है ।
बांग्ला की प्रख्यात साहित्यकार महाश्वेता देवी भी इस साल अपनी महायात्रा पर निकल गईं । महाश्वेता देवी लिखती अवश्य बांग्ला में थीं लेकिन वो पूरे देश में समादृत थीं । महाश्वेता देवी के लेखन में समाज के हाशिए के लोगो की आवाज प्रमुखता से दिखाई देती थीं । महाश्वेता देवी के लेखन में एक खास किस्म का यथार्थ दिखाई देता था जो कि गढ़े हुए यथार्थ से अलग होता था । महाश्वेता देवी जितना साहित्य में सक्रिय थी उतनी ही सक्रियता से वो राजनीति के मसलों पर भी अपनी राय रखती थीं । उन्नीस सौ छब्बीस में ढाका में साहित्यक परिवार में पैदा हुई महाश्वेता के पिता मनीष घटक मशहूर कवि थे और चाचा ऋत्विक घटक मशहूर फिल्मकार । महाश्वेता देवी की हजार चौरासी की मां, अरण्येर अधिकार, झांसीर रानी, अग्निगर्भा आदि मशहूर कृतियां थी । महाश्वेता देवी को ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, रोमन मैगसेसे अवॉर्ड समेत कई सम्मान मिल चुके थे । भारत सरकार ने उनको पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया था ।

महाश्वेता के जाने से साहित्य जगत की जो क्षति हुई है उतना ही बड़ा नुकसान सैयद हैदर रजा के निधन से कला क्षेत्र को हुआ है । रजा साहब की चित्रकारी में अद्वैत दर्शन को साफ तौर पर देखा जा सकता था । वो कहते भी थे कि दिव्य शक्तियों के सहयोग के बिना कला संभव नहीं है । विशेषज्ञों का मानना है कि सैयद हैदर रजा रंगों के माध्यम से भारतीय मिथकों के प्रतीकों का अपने चित्रों में इस्तेमाल करते हैं । इसी साल मशहूर तबला वादक और गायक लच्छू महाराज भी हमें छोड़कर चले गए । स्वभाव से ठेठ बनारसी लच्छू महाराज के जाने से भारतीय तबला वादन परंपरा में एक खास किस्म की खामोशी आई है । पंजाबी के मशहूर कथाकार गुरदयाल सिंह भी इस वर्ष हमसे जुदा हो गए । गुरदयाल सिंह का लेखन पचास सालों से ज्यादा के कालखंड में फैला है । उनका उपन्यास मरही दे दीवा पंजाबी साहित्य में बेहद लोकप्रिय है और इस उपन्यास ने ही उनको उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठा दिलाई । इनके उपन्यासों पर फिल्में भी बनी हैं । गुरदयाल सिंह को उनके लेखन के लिए प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला था । मलयालम के मशहूर कवि ओ वी एन कुरुप का निधन भी साहित्य के लिए बड़ा झटका था । साल दो हजार सोलह अब बीतने को हो रहा था लेकिन समय के गर्भ में क्या छुपा था इसका अंदाज तब लगा जब यशस्वी संपादक और लेखक प्रभाकर श्रोत्रिय भी इस दुनिया को छोड़कर चले गए । प्रभाकर श्रोत्रिय नेअपने लेखन से हिंदी साहित्य को तो समृद्ध किया ही उन्होंने अपने संपादन से युवा लेखकों की पहचानन कर उनको संस्कारित भी किया । यह उनका साहित्य का बड़ा योगदान है । उन्होंने वागर्थ, नया ज्ञानोदय और साहित्य अकादमी की पत्रिकाओं का संपादन किया । पूरब के प्रेमचंद कहे जानेवाले विवेकी राय भी इस साल हमसे बिछुड़ गए । विवेकी राय ने पचास से अधिक किताबें लिखीं । उनकी रचनाओं में भारत का गांव अपने समग्र परिवेश के साथ उपस्थित रहता था । इनके ललित निबंध हिंदी साहित्य की थाती हैं और कहा जाता है कि हजारी प्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र और कुबेरनाथ राय की परंपरा तो विवेकी राय ने काफी आगे बढ़ाया । बनारस और गाजीपुर इलाके में अपना जीवन बिकानेवाले विवेकी राय जी के जाने से साहित्य में गांव की मिट्टी की सोंधी खुशबू कम होगी । विवेकी राय के अलावा हाल ही में उपन्यासकार ह्रदयेश का भी निधन हुआ । ह्दयेश हिंदी के उन चंद लेखकों में थे जो खामोशी के साथ बगैर किसी शोर-शराबे के लेखन में जुटे रहते थे । उनके दस के करीब उपन्यास और दर्जनभर कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । इनकी आत्मकथा को भी हिंदी के पाठकों ने खासा पसंद किया था । मशहूर कलाकार और पद्मविभूषण से सम्मानित के जी सुब्रह्मण्य भी इस साल हमसे बिछड़ गए । इस साल पत्रकारिता को भी एक बड़ा झटका लगा जब वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर का निधन हो गया । दिलीप उन संपादकों में थे जो इस संस्था की गरिमा और साख बचाने के लिए अंतिम समय तक संघर्षरत रहे । इन तमाम विभूतियों की स्मृति को नमन और श्रद्धांजलि ।  

Saturday, June 11, 2016

हिंदी के बुढ़ाते युवा लेखक

बात  नब्बे के शुरुआती दशक की रही होगी, संभवत उन्नीस सौ तिरानवे की । उस वक्त राजेन्द्र यादव के संपादन में निकलनेवाली पत्रिका हंस की हिंदी साहित्य में तूती बोलती थी । यादव जी अपनी पत्रिका में नए नए प्रयोग के उसको नई ऊंचाई प्रदान कर रहे थे । आमतौर पर उन दिनों हंस के प्रकाशन की तिथि के आसपास पत्रिका के कार्यालय चला जाता था । उसका एक फायदा यह होता था कि डाक डाकुओं के प्रकोप से पत्रिका बच जाती थी और वक्त से पहले हंस पढ़ने की चाहत भी पूरी हो जाती थी । ऐसे ही एक दिन हंस का अंक छप कर आया था । अंत उलटते पलटते उसमें एक महिला कथाकार की तस्वीर पर नजकर गई । सालों पुरानी तस्वीर छपी थी बल्कि यों कहें कि उनकी उस जमाने की तस्वीर छपी थी जब वो युवा रही होंगी । उस वक्त वो अपने उम्र के चौथे वय में थीं लेकिन यादव जी हंस के पन्नों पर उनको जवान बनाए हुए थे । मैंने यादव जी से चुटकी ली और उसकी वजह जाननी चाही तो उन्होंने कहा कि अरे वो तो अभी युवा लेखिका है । मेरे अनुमान के मुताबिक जिस यादव जी उनको युवा बता रहे थे उस वक्त वो पैंसठ के आसपास की रही होंगी । यादव जी ने इस तरह के कई युवा लेखक हिंदी साहित्य को दिए । मुझे हमेशा ऐसा लगता रहा कि उनका मानना था पाठक कगानीकार की फोटो देखकर कहानियां पढ़ लेते हैं या इसको इस तरह भी कहा जा सकता है कि कहानीकारों की ग्लैमरस फोटो देखकर पत्रिका भी खरीद लेते हैं । इसी सोच के तहत यादव जी लेखिकाओं की तरुणाई की तस्वीरें छापते रहे और उन्होंने युवा लेखक के बारे में साहित्य में एक भ्रम की स्थिचि पैदा की । जवानी की तस्वीरें देख-देख कर रचनाकार खुद तो युवा मानचा रहा और साथी लेखकों से ये अपेक्षा भी करता रहा कि उसे युवा लेखक माना जाए । दूसरी ओर रवीन्द्र कालिया ने युवाओं पर एक के बाद एक कई अंक निकालकर हिंदी साहित्य तो युवामय कर दिया था । दर्जनों लेखक तब से लेकर अबतक युवा ही बने हुए हैं । कालिया जी ने जिलस तरह से युवा लेखकों की फौज खड़ी की थी उससे तई बेहतरीन लेखक निकल कर आए लेकिन जो बच गए वो सिर्फ युवा लेखन की दुकान खोलकर साहित्य में अपने उत्पादन को खपाने की फिराक में रहते हैं । रवीन्द्र कालिया ने कभी सोचा नहीं होगा कि उन्होंने जिन युवा लेखकों को मंच देकर साहित्य की दुनिया में लांच किया था वो लॉंचिंग पैड पर ही जमकर बैठ जाएंगे । इसी तरह से 27-28 दिसबंर 1970 में पटना में एक विशाल युवा लेखक सम्मेलन हुआ था । उस दौर के सभी चर्चित युवा लेखकों को उसमें बुलाया गया था । उस वक्त भी युवा लेखकों को लेकर भ्रम की स्थिति बनी थी लेकिन मोटेतौर पर चालीस के आसपास के लेखकों को बी उसमें बुलाया गया था । कुछ अपवाद अवश्य थे । जैसे नामवर सिंह तैंतालीस के थे । परंतु ज्यादातर लेखक तीस साल के थे जिनमें अशोक वाजपेयी, रवीन्द्र कालिया, वेणुगोपाल. इब्राहिम शरीफ आदि थे । तब नागार्जुन को उसमें बुलाया गया था परंतु उन्होंने तब लिखा था या कहा था कि वो युवा लेखक सम्मेलन में बूढ़े बंदर की तरह इधर उधर डोलना नहीं चाहते हैं । उस वक्त जिन युवा लेखकों की पहचान की गई थी उसमें से ज्यादातर कालांतर में हिदीं साहित्य के मूर्धन्य कवि, कहानीकार और आलोचक के तौर पर स्थापित हुए ।      
दरअसल हिंदी साहित्य में युवा लेखकों को लेकर बेहद भ्रम की स्थिति है । पचास पार के लेखक अबतक खुद को युवा कहलवाना चाहते हैं । इस चाहत का असर ये होता है कि वो साठ-पैसठ तक आते आते भी लेखन में बौआ जी बने रहते हैं । हिंदी के इस तरह के कथित युवा लेखकों की स्थिति बिहार के जमींदार परिवार के बौआ जी जैसी होती है । बिहार के जमींदार परिवारों में अक्सर देखा जाता है कि जमींदार साहब के घर जब बेटा पैदा होता है तो उसको प्यार से उनके घरवाले और जमींदारी के सारे लोग बौआजी कहकर बुलाते हैं । तरुणाई खत्म होते होते बौआ जी की शादी कर दी जाती है और साल दो साल में बौआजी पिता भी बन जाते हैं । बौआजी की उम्र बढ़ती जाती है लेकिन पिता के जीवित रहने की वजह से उनको जमींदारी के काम-काज को करने का मौका नहीं मिल पाता है । वक्त बीतने के साथ साथ बौआ जी का पुत्र बड़ा होने लगता है और उसके दादा जी प्यार प्यार में उसको धीरे-धीरे जमींदारी के गुर सिखाने लग जाते हैं । इन सबसे बेखबर बौआजी तो बौआजी ही बने रहते हैं वो भी सोचते हैं कि चलो अच्छा है बेटा काम-काज सीख रहा है । इस चक्कर में जमींदार साहब के निधन या उनके बहुत बुजुर्ग होने की वजह से उनके पोते को जमींदारी की कमान मिल जाती है और बौआजी बेचारे पिता और पुत्र के बीच के सत्ता हस्तांतरण के गवाह बनकर रह जाते हैं क्योंकि वो अधेड़ हो चुके होते हैं । हिंदी की इस वक्त की कथित युवा पीढ़ी भी बौआजी सिन्ड्रोम से गुजर रहा है । पिछली पीढ़ी अब  तक जीवित और सृजनरत है और अगली पीढ़ी तैयार हो चुकी है यानि कई कथित युवा लेखक बौआजी ही बने रह गए हैं । मतलब ये कि पचास पचपन के अधेड़ होने के बावजूद वो युवा ही बने हैं या बने रहना चाहते हैं, जिसका नतीजा सबके सामने है ।
हिंदी साहित्य में युवा लेखक की कोई उम्र सीमा तय नहीं है । पचास तक तो युवा ही माना जाता है । पिछले दिनों एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में गया था तो वहां जिस लेखिका की किताब का विमोचन हो रहा था उनके बेटी दामाद भी मौजूद थे लेकिन संचालनकर्ता बार-बार उनको युवा लेखिका कह रहा था । जब जब संचालनकर्ता उनके नाम के पहले युवा शब्द का उद्घोष करता तो लेखिका महोदय के चेहरा दमकने लगता । इस तरह के कई वाकए आपको साहित्य से जुड़े आयोजनों में जाने पर देखने को मिल सकते हैं । हिंदी के इन अधेड़ लेखकों को युवा कहलवाने की क्या जरूरत है यह बात आजतक मेरे समझ से बाहर की रही है । इन अधेड़ लेखकों की इस चाहत को समझते हुए युवाओं को मंच देनेवाले कई संस्था साहित्य में सक्रिय हैं । वो खुद को युवाओं का माल बेचने वाले दुकानदार के तौर पर पेश करते हैं । तीस के आसापास के उम्र के लेखकों की रचनाओं के साथ साथ इन बुढ़ाते लेखकों की रचनाएं आदि छापकर उनकी युवा बने रहने की आकांक्षा को तृप्त करते रहते हैं । यहां वो भी राजेन्द्र यादव की राह पर चलते हुए लेखिकाओं और लेखकों की उन तस्वीरों को तवज्जो देते हैं जिनमें बालों की सफेदी ना दिखाई दे । वैसे भी हिंदी साहित्य में बालों की सफेदी को छुपाने का जबरदस्त रिवाज है । इसका फायदा यह होता है कि दूर-दराज के जो पाठक इन मंचों पर पहुंचते हैं और इन कथित युवा लेखकों या लेखिकाओं से मिले नहीं होते हैं वो उनको युवा मान लेते हैं और रचनाओं पर प्रतिक्रिया देते वक्त भी युवा छवि को ध्यान में रखते हैं । इन अधेड़ लेखकों को युवा बनाए रखने में पाठकों की प्रतिक्रियाएं संजीवनी का काम करती हैं । रही सही कसर फेसबुक पूरी कर देती है जहां युवा की परिभाषा किसी चौहद्दी में नहीं बांधी जा सकती है । बस आपके चार छह लेखकनुमा फेसबुकिया गुंडे आपके साथ खड़े हों जो सच कहनेवालों के खिलाफ अंटशंट लिखकर उनको अपमानित कर सकें । इनके दम पर आप जबतक चाहें युवा बने रह सकते हैं । दरअसल एक और बड़ी बिडंवना इनके साथ है ये खुद को मौके बे मौके वरिष्ठ कहलवाना भी पसंद करते हैं और युवाओं के संग युवा होने का मौका भी नहीं गंवाते हैं । इस वक्त पूरे देश में साहित्य से लेकर राजनीति तक में राग युवा बजाया जा रहा है तो हिंदी के अधेड़ साहित्यकार भी इस राग में शामिल होना चाहते हैं ।

इस बात पर गंभीरता से विचार होना चाहिए कि हिंदी के युवा लेखक की अधिकतम उम्र कितनी होनी चाहिए । क्या आज हिंदी के किसी लेखक में ये साहस है कि वो नागार्जुन की तरह युवाओं के नाम पर होनेवाले अखिल भारतीय आयोजन में जाने से इंकार कर दे । फिलहाल तो ऐसा कोई लेखक या लेखिका दिखाई नहीं देता है । युवा की अगर शब्दकोश की परिभाषा को छोड़ भी दें तो एक सीमा तो होनी चाहिए । हिंदी के मृतप्राय लेखक संगठनों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वो इस तरह की कोई पहल करेंगे । पहल तो खुद साहित्यकारों को ही करनी होगी और युवा कहलवाने के लाभ लोभ को त्यागना होगा । 

Monday, January 18, 2016

बहुत याद आएंगे कालिया जी

हिंदी के यशस्वी कथाकार और बेहतरीन संपादक रवीन्द्र कालिया का निधन हो गया । छिहत्तर साल की उम्र में उन्होंने लंबी बीमारी क बाद दिल्ली के एक अस्पताल में अंतिम सांसे लीं । रवीन्द्र कालिया बेहतर कथाकार थे या बेहतर संपादक ये तय करना मुश्किल है लेकिन एक बात जिसपर पूरे साहित्य में मतैक्य है वो ये कि वो एक बेहतरीन और बेहद जिंदादिल इंसान थे । हंस के संपादक राजेन्द्र यादव के निधन के बाद बोरियत की हद तक गंभीरता का आवरण ओढे दिल्ली की साहित्यक जमात में कालिया जी ही थे जो अपने विट और ह्यूमर से इसको बहुधा तोड़ते रहते थे । पंजाब के जालंधर में 11 नवंबर 1938 को जन्मे रवीन्द्र कालिया ने कई शहरों की यायावरी की और बाद में एक बार फिर दिल्ली आए और फिर यहीं के होकर रह गए । कालिया जी ने शिक्षण से अपने करियर की शुरुआत की फिर वो धर्मयुग पहुंच गए और वहां धर्मवीर भारती की सोहबत में पत्रकारिता के तमाम गुर सीखे थे । मुंबई में रहते हुए कालिया जी ने साहित्य और पत्रकारिता को बेहद नजदीक से देखा जो बाद में उनकी कहानी काला रजिस्टर में सामने भी आया । रवीन्द्र कालिया, धर्मवीर भारती के साथ काम करने के पहले मोहन राकेश की नजर में आ गए थे । मोहन राकेश के साथ और प्रेरणा से कालिया जी ने कहानियां लिखनी शुरू की । माना जाता है कि भाषा का जो अनुशासन रवीन्द्र कालिया में दिखाई देता है वो मोहन राकेश की ही सोहबत का असर है । मेरा कालिया जी से संपर्क अस्सी के दशक से था जब वो इलाहाबाद में रहते हुए एक अखबार गंगा-जमुना निकाला करते थे । उनके साथ पत्र व्यवहार होता था और वो बहुधा मेरे साहित्यक पत्र अपने अखबार में छाप दिया करते थे । ये पत्र संपर्क नियमित नहीं था लेकिन हमारी पीढ़ी कालियाजी की कहानियों की दीवानी थी । मुझे याद है कि जब उनकी किताब गालिब छुटी शराब छपी थी तो हॉस्टल में उसकी खूब चर्चा थी । मेरा अनुमान है कि धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों के देवता’ के बाद ‘गालिब छुटी शराब’ ऐसी किताब है जिसको कई पाठकों ने कई बार खरीदी होगी क्योंकि जो उस किताब को पढ़ने के लिए ले जाता है वापस नहीं करता है । मैंने ही कम से कम उसकी दस प्रतियां खरीदी होगी लेकिन अब मेरे पास एक भी प्रति नहीं है । यह लेखक की लोकप्रियता का सबूत है ।
रवीन्द्र कालिया के व्यक्तित्व के अलग अलग शेड्स थे और ये सभी शेड्स एक दूसरे को चुनौती देते थे । कहानीकार के रूप में ‘काला रजिस्टर’ और ‘नौ साल छोटी पत्नी’ हिंदी कथा साहित्य में अलग से दिखाई देता है । इसी तरह से जब एक संस्मरणात्मक किताब- गालिब छुटी शराब देखते हैं तो लगता है कि यार कमाल का संस्मरण लेखक है ये शख्स । फिर इनके उनके संपादन के शेड्स पर नजर डालते हैं तो सामने आता है उन्नीस सौ इक्यानवे में ‘वर्तमान साहित्य’ के दो कहानी महाविशेषांक । आज खबरिया चैनलों में बहुधा महा शब्द का प्रयोग किया जाता है जैसे महा-बहस, महा-कवरेज आदि । परंतु मेरे जानते महा शब्द को इस अर्थ में लोकप्रिय किया कालिया जी वर्तमान साहित्य के कहानी महाविषेशांके के जरिए । दो अंकों में प्रकाशित वर्तमान साहित्य के उस महाविशेषांक में कृष्णा सोबती की लंबी कहानी ‘ऐ लड़की’ प्रकाशित हुई थी । उस महाविशेषांक के पहले अंक को देखकर उपेन्द्र नाथ अश्क ने लिखा था- ‘मैं इक्यासी साल का होने जा रहा हूं और मैं कालिया को इस बात की दाद देना चाहूंगा कि उसने भैपव प्रसाद गुप्त, ज्ञानरंजन या राजेन्द्र यादव जैसे कमज़र्फ संपादकों की तरह अपने व्यक्तिगत राग-द्वेष अथवा मानापमान को अपने संपादन कार्य के आड़े नहीं आने दिया और ज्यादा से ज्यादा जीवंत कथाकारों का सहयोग लेने की कोशिश की । विगत साठ वर्षों यानि जब से मैं कहानियां लिख रहा हूं, मैंने कम से कम हिंदी में ऐसा विशाल कथा विशेषांक नहीं देखा ।‘ कालिया जी के इस संपादन कौशल को बाद में हिंदी के पाठकों ने वागर्थ के अंकों में भी महसूस किया जब वो उसके संपादक बने थे । कालांतर में जब कालिया जी नया ज्ञानोदय के संपादक बनकर दिल्ली आए तो फिर तो उन्होंने अपने संपादन के दौरान हिंदी में युवा लेखकों की पूरी पीढ़ी खड़ी कर दी । युवा लेखकों को लेकर कालिया जी के अंदर एक खास किस्म का उत्साह रहता था और वो उनसे कुछ भी नया करवा लेने की कोशिश में रहते थे । नया ज्ञानोदय में मेरा स्तंभ कालिया जी ने ही शुरू किया था और इसके लिए वो मुझे करीब तीन साल तक उत्साहित करते रहे थे । ज्ञानपीठ के किसी सम्मान समारोह में मुझसे राष्ट्रीय संग्रहालय में मिले तो उन्होंने आदेशात्मक अंदाज में मुझसे कहा था कि अगले अंक से तु्म्हारा स्तंभ जाएगा । तब जाकर स्तंभ शुरू हुआ जो अब भी चल रहा है । अंग्रेजी की किताबों के बारे में पाठकों को परिचित करवाने उस स्तंभ का उद्देश्य है ।

कालिया जी साहित्य में दो बातों को लेकर चिंतित भी रहा करते थे । वर्ष दो हजार एक की बात रही होगी तब मैंने एक न्यूज चैनल था तब वहां मैंने साहित्य में विवादों के गिरते स्तर पर परिचर्चा आयोजित की थी । उस परिचर्चा में रवीन्द्र कालिया, अखिलेश, विभूति नारायण राय, मैनेजर पांडे, ज्ञानरंजन, संतोष भारतीय थे । उस परिचर्चा में कालिया जी ने साफ तौर पर कहा था कि उनकी साहित्य में विमर्श के गिरते स्तर से ज्यादा चिंता की बात है उसमें पनप रहा जातिवाद । कालिया जी कहा था- ‘मेरी खास चिन्ता का विषय यह है कि साहित्य में एक खास तरह का जातिवाद पनप गया है । जैसे यह भी देखने में आ रहा है कि यहां एक खास तरह का ब्राह्मणवाद भी है,ठाकुरवाद भी है, कायस्थवाद भी । क्या यह अकारण है कि ठाकुरों को ठाकुरों की ही रचनाएं पसंद आती हैं कायस्थों को नहीं आती, ब्राह्णों को कायस्थों की नहीं आती ।‘ आज के डेढ दशक पहले जिस बात की ओर कालिया जी ने इशारा किया था आज वो विद्रूप रूप से हमारे सामने है । कालिया जी अपने बेबाक राय के लिए भी जाने जाते थे। गंभीर बातों को भी हल्के अंदाज में कह देने की उनकी अदा साहित्य जगत में मशहूर थी । एक बार उन्होंने कहा था कि आजकल हिंदी साहित्य में कुछ कथाकार एक दूसरे को जलील करने के लिए कहानियां लिख रहे हैं । पात्रों के चयन से ये बात साफ होती भी रही है । आज वो नहीं हैं लेकिन उनकी कही कई बातें आज भी साहित्य में गूंज रही हैं और साहित्यकारों को सोचने पर विवश कर रही हैं । कालिया जी आप बहुत याद आएंगे क्योंकि आपके जाने से साहित्य जगत की जीवंतता लगभग समाप्त हो गई है और बच गए हैं गंभीरता का आवरण ओढे साहित्यकार जिनके पास जाने में युवाओं को सोचना पड़ता है ।  

Saturday, September 7, 2013

स्यापा नहीं पहल जरूरी

साहित्य अकादमी के इतिहास में पहली बार हिंदी भाषा से अध्यक्ष बने विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को इस बात का दुख है कि हिंदी में पाठकों की संख्या बेहद कम है, जबकि अन्य भाषाओं में पाठक बड़ी तादाद में मौजूद हैं । उन्हें इस बात का भी मलाल है कि हिंदी प्रदेशों में बंगाल, महाराष्ट्र और केरल जैसा साहित्यक माहौल नहीं बन पाया । साहित्य अकादनमी का अध्यक्ष अगर इस तरह के बयान देता है तो उसके हल्के में नहीं लिया जा सकता है क्योंकि अकादमी के अध्यक्ष की साहित्य जगत में एक अहमियत और उनके बयान का वजन होता है । इस वजह से विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के पाठकों की कमी के विलाप पर विचार होना चाहिए और इसकी पड़ताल भी होनी चाहिए । क्या सचमुच हिंदी में पाठकों की कमी है । यह सवाल हिंदी में कई दशकों से बार-बार उठता रहा है और इसके पक्ष-विपक्ष में तर्क भी दिए जाते रहे हैं । दरअसल अगर हम गंभीरता से विचार करें तो यह लगता है कि हिंदी के पाठकों की कमी पर साहित्य अकादमी के अध्यक्ष का बयान सामान्यीकरण के दोष का शिकार हो गया है । अकादमी अध्यक्ष ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि साल दर साल आने वाले रीडरशिप सर्वे चीख चीख कर इस बात की गवाही दे रहे हैं कि हिंदी के पाठकों की संख्या लगातार बढ़ रही है । हर साल हिंदी अखबारों के नए-नए संस्करण खुल रहे हैं और उनका विस्तार हिंदी क्षेत्रों के अलावा गैर हिंदी क्षेत्रों में भी हो रहा है । इंडियन रीडरशिप सर्वे की पहली तिमाही के नतीजों के मुताबिक अखबारों की पाठक संख्या में एकाध अपवाद को छोड़कर बढ़ोतरी दर्ज की गई है । ना सिर्फ हिंदी अखबारों बल्कि पत्रिकाओं के पाठक संख्या में भी इजाफा हो रहा है । हो सकता है साहित्य अकादमी के अध्यक्ष जब पाठकों की कमी की बात कर रहे हों तो उनके अवचेतन मन में साहित्य के पाठकों की बात रही हो । अगर ऐसा है तो उनकी यह आशंका बिल्कुल ठीक है कि हिंदी में साहित्य के पाठक कम हुए हैं । यह बात हिंदी के तमाम प्रकाशक भी मानते हैं कि कविता-कहानी-उपन्यास के पाठक कम हुए हैं । आलोचना के पाठक तो पहले ही कम थे । साहित्येत्तर विषयों की किताबें धड़ाधड़ बिक रही है । हिंदी के कई शीर्ष प्रकाशकों ने तो साहित्य छापना ही कम कर दिया है । साहित्य अकादमी के अध्यक्ष होने के नाते विश्वनाथ तिवारी की यह जिम्मेदारी बनती है कि वो हिंदी साहित्य के नए पाठक वर्ग के निर्माण में अकादमी के मंच का इस्तेमाल करते हुए महत्वपू्र्ण भूमिका निभाएं ।
पाठकों तक पहुंचने का काम साहित्य अकादमी कर भी रही है । लेकिन अभी तक इस तरह के जो भी काम हो रहे हैं वो सिर्फ रस्म अदायगी के तौर पर हो रहे हैं । अकादमी लेखकों से मिलिए जैसे जो भी कार्यक्रम करती है वो लेखकों से मिलिए कम अकादमी के कर्मचारियों का गेट-टुगेदर ज्यादा होता है । दिल्ली के रवीन्द्र भवन में आयोजित इस तरह के कार्यक्रमों में वही वही चेहरे नजर आते हैं जो कभी भी आपको साहित्य अकादमी में दिख जा सकते हैं । साहित्य अकदामी का जब गठन हुआ था तो उसका उद्देश्य था कि सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य की समृद्ध परंपरा और विरासत का एक साझा मंच बने जहां साहित्य पर गंभीर विचार-विनिमय और विमर्श हो सके । साहित्य अकादमी के गठन के पीछे यह एक भावना यह भी थी कि अकादमी सेमिनार, सिंपोजिया, कांफ्रेंस और अन्य माध्यमों से एक दूसरे भाषा के बीच संवाद स्थापित करेगी । यह सारी चीजें साहित्य अकादमी कर रही है लेकिन करने के तरीके में घनघोर मनमानी और अपनों को उपकृत करने का काम हो रहा है । अपने गठन के दशकों बाद साहित्य अकादमी अपने इस उद्देश्य से भटकती नजर आ रही है । सत्तर के शुरुआती दशक से ही अकादमी मठाधीशों के कब्जे में चली गई और वहां इस तरह की आपसी समझ बनी कि हर भाषा के संयोजक अपनी अपनी भाषा की रियासत के राजा बन बैठे । साझा मंच की बजाए यह स्वार्थ सिद्धि का मंच बनता चला गया । अब से कुछ सालों पहले तक अकादमी पर वामपंथी विचारधारा का कब्जा था और यह बात जगजाहिर है कि वामपंथियों ने किस तरह अपनी विचारधारा वाले लेखकों को आगे बढ़ाया और विरोधियों को निबटाया । वामपंथी विचारधारा के लेखकों के कमजोर होने के बाद एक खास किस्म के अवसारवादी लेखकों का कब्जा अकादमी पर हो गया जो प्रतिभाशाली लेखकों से आक्रांत रहते थे, लिहाजा उन्होंने एक ऐसी व्यूह रचना रची कि प्रतिभाशाली लेखक अकादमी के अंदर नहीं आ पाएं । आमसभा से लेकर हर जगह प्रतिभा को रोकने का षडयंत्र शुरू हो गया । रचनात्क लेखकों के बजाए विश्वविद्यालयों के बुजुर्गों का क्लब बनते चला गया । उदाहरण के तौर पर हिंदी के वरिष्ठ लेखक उपन्यासकार रवीन्द्र कालिया को लेकर साहित्य अकादमी ने अबतक कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जबकि कालिया सालों से दिल्ली में रह रहे हैं । जबकि हिंदी के कई प्रतिभाहीन लेखकों को साहित्य अकादमी ने मंच मुहैया करवाया । सवाल यह उठता है कि जबतक पाठकों के सामने किसी भी भाषा का सर्वश्रेष्ठ लेखक और उसका लेखन नहीं आएगा तबतक हमें पाठकों की कमी का रोना रोते रहना पड़ेगा । कमलेश्वर जी को भी अकादमी पुरस्कार तबतक नहीं मिल पाया जबतक कि डील नहीं हो गई । राजेन्द्र यादव को तो अबतक नहीं मिल पाया है । अकादमी की इस मठाधीशी का फायदा अफसरों ने भी उठाया और वो लेखकों पर हावी होते चले गए । अकादमी के पूर्व सचिव पर जांच भी चल रही थी इस बीच वो रिटायर हो गए । जांच के नतीजे का पता नहीं ।
इसके अलावा हिंदी में एक और समस्या है जिसकी वजह से पाठकों की संख्या का आकलन होना मुमकिन नहीं है । वह है हिंदी में किताबों की बिक्री का सही आंकड़ा सामने नहीं आ पाना । कई बार यह सवाल उठा है कि हिंदी के प्रकाशक लेखकों को उनकी किताबों की बिक्री का सही आंकड़ा नहीं बताते हैं । प्रकाशकों का दावा यह होता है कि किताबें बिकती ही नहीं है । साहित्य अकादमी के पचास साल पूरे होने के मौके पर उस वक्त के अकादमी अध्यक्ष गोपीचंद नारंग ने अकादमी की स्वयत्ता को लेकर जवाहरलाल नेहरू का एक वक्तव्य उद्धृत किया था । लेकिन अकादमी जवाहरलाल नेहरू के 13 मार्च 1954 के उस पत्र को भूल गई जिसमें उन्होंने हिंदी प्रकाशन की दशा और दिशा की ओर इशारा किया था । सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की बदहाली के मद्देनजर उनके लिए मासिक धन की योजना बनाने के बावत नेहरू जी ने साहित्य अकादमी के तत्कालीन सचिन कृष्ण कृपलानी को एक पत्र लिखा था । उस पत्र में उन्होंने लिखा कि निराला की किताबें जमकर बिक रही हैं और प्रकाशक मालामाल हो रहे हैं लेकिन निराला को कुछ भी नहीं मिल पा रहा है और वो लगभग भुखमरी की कगार पर हैं । अपने उस पत्र में नेहरू जी ने कृपलानी से कॉपीराइट एक्ट को दुरुस्त करवाने के लिए कोशिश करने का भी आग्रह किया था । लेकिन अकादमी ने नेहरू जी के उस पत्र से कोई सीख नहीं ली । अबतक अकादमी ने इस दिशा में कोई पहल या काम किया हो वो ज्ञात नहीं है । हिंदी में अबतक लेखकों प्रकाशकों के बीच का अनुबंध पत्र का भी मानकीकरण नहीं हो पाया है । किताबों की बिक्री के आंकड़ों के लिए कोई मैकेनिज्म बनाने का भी प्रयास नहीं हो पाया है । जब साहित्यक किताबों की बिक्री जानने की कोई व्यवस्था ही नहीं बन पाई है तो पाठकों की संख्या का पता कैसे चल पाएगा । इस बार के साहित्य अकादमी की आम सभा में हिंदी प्रकाशन जगत का एक नुमाइंदा भी चुना गया है । अकादमी का अध्यक्ष भी हिंदी का ही है । अपेक्षा इस बात की है कि बजाए पाठकों की कमी का स्यापा करने के इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं । साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों को भाषा के संयोजकों के चंगुल के मुक्त करना होगा और कार्यक्रमों के आयोजन में पूर्वग्रहों से उपर उठकर लेखकों और साहित्यप्रेमियों की भागीदारी बढ़ानी होगी । अगर ऐसा हो पाता है तो साहित्य के पाठकों का एक नया वर्ग संस्कारित होगा और अखबारों के पाठकों की तरह साहित्य के पाठकों में भी इजाफा होगा । यह सब कर पाना तिवारी जी के लिए बड़ी चुनौती है । अगर वो इन दोनों काम को कर पाने में सफल हो जाते हैं तो हिंदी साहित्य के इतिहास में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा वर्ना अन्य अकादमी अध्यक्षों की तरह वो भी इतिहास के बियावन में गुम हो जाएंगे ओर हिंदी साहित्य में पाठकों की कमी का स्यापा होते रहेगा ।

Monday, October 24, 2011

अमिताभ का विरोध क्यों ?

हमारे देश के सबसे बड़े साहित्यिक पुरस्कार को लेकर विवाद पैदा किया जा रहा है । विवाद और आपत्ति इस बात को लेकर है कि शहरयार और अमरकांत को ज्ञानपीठ पुरस्कार हिंदी फिल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन के हाथों दिया गया । इस बात को लेकर कई साहित्यकारों को घोर आपत्ति है कि हिंदी फिल्मों में नाचने गाने वाला कलाकार हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक को सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार देने योग्य कैसे हो गया । दरअसल ये हिंदी के शुद्धतावादी लेखकों की कुंठा है जो किसी ना किसी रूप में प्रकट होती है । मेरी जानकारी में सबसे पहले ये सवाल हिंदी के आलोचक वीरेन्द्र यादव ने सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर उठाया । वीरेन्द्र यादव ने फेसबुक पर लिखा- हिंदी के दो शीर्ष लेखकों श्रीलाल शुक्ल और अमरकांत को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने का समाचार इन दिनों सुर्खियों में है । फिलहाल इस बात से ध्यान हट गया है कि ज्ञानपीठ में अब अमिताभ बच्चन का दखल हो गया है । अभी पिछले ही हफ्ते शहरयार को अमिताभ बच्चन ने यह पुरस्कार दिया है । यानि अब मूर्धन्य साहित्यकार बॉलीवुड के ग्लैमर से महिमामंडित होंगे । जिस सम्मान को अबतक भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और नेल्सन मंडेला जैसी विभूतियां देती रही हों उसकी यह परिणति दयनीय नहीं है । वीरेन्द्र यादव ने फेसबुक पर क्या नहीं की शक्ल में सवाल भी उछाला । वीरेन्द्र यादव एक समझदार और सतर्क आलोचक हैं । उनसे इस तरह की हल्की टिप्पणी की उम्मीद मुझे नहीं थी । अमिताभ बच्चन इस देश के एक बड़े कलाकार हैं और सिर्फ फिलमों में लंबू तंबू में बंबू लगाए बैठा और झंडू बाम का विज्ञापन कर देने भर से उनका योगदान कम नहीं हो जाता । क्या वीरेन्द्र यादव को अमिताभ बच्चन की उन फिल्मों का नाम गिनाना होगा जिसमें उन्होंने यादगार भूमिकाएं की । क्या वीरेन्द्र यादव को अमिताभ बच्चन के अभिनय की मिसाल देनी होगी । मुझे नहीं लगता है कि इसकी जरूरत पड़ेगी । अमिताभ बच्चन इस सदी के सबसे बड़े कलाकार के तौर पर चुने गए हैं । वीरेन्द्र यादव को यह समझना होगा कि हर व्यक्ति की अपनी आर्थिक जरूरतें होती हैं और वो जिस पेशे में होता है उससे अपनी उन आर्थिक जरूरतों को पूरा करने की कोशि्श करता है । अमिताभ बच्चन ने भी वही किया । सचिन तेंदुलकर और शबाना आजामी भी कई उत्पादों का विज्ञापन करते हैं तो क्या सिर्फ उन विज्ञापनों के आधार पर ही उनके क्षेत्र में उनके योगदान को नकार दिया जाए । अमिताभ बच्चन की तरह बिरजू महाराज भी झंडू बाम का विज्ञापन करते हैं तो इसी आधार परक उनके योगदान को कम कर दिया जाना चाहिए । लगता है वीरेन्द्र जी की नजर से यह विज्ञापन नहीं निकला वर्ना वो बिरजू महाराज को और उनके योगदान को खारिज कर देते । कई बड़े कलाकार विज्ञापन करते हैं ये बातें उनके पेशे से जुड़ी है । अमिताभ बच्चन पोलियो ड्राप का भी विज्ञापन करते हैं । वीरेन्द्र यादव की बहस में अमिताभ की इस बात के लिए भी आलोचना की गई है कि वो गुजरात के ब्रैंड अंबेस्डर हैं । उस गुजरात के जिसके मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं । लेकिन इस बात को छुपा लिया गया कि वही अमिताभ बच्चन उस जमाने में केरल के ब्रैंड अंबेसडर थे जब वहां वामपंथी सरकार थी । तो इस तरह के तर्क और इस तरह की समझ पर सिर्फ तरस आ सकता है ।
हिंदी के एक और लेखक अशोक वाजपेयी -जिनका दायरा और एक्सपोजर किसी भी अन्य लेखक से बड़ा है- ने भी अमिताभ बच्चन के हाथों ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने को संस्थान की एक दयनीय कोशिश करार दिया है । अशोक वाजपेयी ने अपने साप्ताहिक कॉलम में लिखा कि – यह समझना मुश्किल है कि अब अपने को सिनेमाई चमक से जोड़ने की जो दयनीय कोशिश भारतीय ज्ञावपीठ कर रहा है, उसका कारण क्या है । अशोक वाजपेयी जी को यह समझना होगा कि ज्ञानपीठ की यह कोशिश अपने को सिनेमाई चमक से जोड़ने की नहीं बल्कि हिंदी के बड़े लेखक को एक बड़े कलाकार के हाथो सम्मानित करवाने की हो सकती है । मुझे नहीं मालूम कि ज्ञानपीठ की मंशा क्या थी । वो सिनेमाई चमक से जुड़कर क्या हासिल कर लेगा । इस मंशा और वजह को अशोक वाजपेयी बेहतर समझते होंगे । अशोक जी के मुताबिक ज्ञानपीठ का किसी अभिनेता को बुलाने का निर्णय किसी कलामूर्धन्य को बुलाने की इच्छा से नहीं जुड़ा है क्योंकि ऐसी इच्छा के ज्ञानपीठ में सक्रिय होने का कोई प्रमाण या परंपरा नहीं है । प्रसंगव श उन्होंने भारत भवन में कालिदास सम्मान के लिए तीन कलामूर्धन्यों को बुलाने की बात कहकर अपनी पीठ भी थपथपा ली । वाजपेयी जी के इन तर्कों में कोई दम नहीं है और ज्ञानपीठ की परंपरा की दुहाई देकर वो अमिताभ बच्चन के योदगान को कम नहीं कर सकते । अमिताभ का हिंदी के विकास में जो योदगान है उसे अशोक वाजपेयी के तर्क नकार नहीं सकते । अमिताभ बच्चन ने हिंदी के फैलाव में जिस तरह से भूमिका निभाई उसको बताने की कोई आवश्यकता नहीं है । लेकिन वह उनके आलोचकों को वह भी दिखाई नहीं देता । अमिताभ बच्चन हिंदी फिल्मों के एकमात्र कलाकार हैं जो हिंदी में पूछे गए सवालों का हिंदी में ही जवाब देते हैं । मुझे तो लगता है कि हाल के दिनों में जिस तरह से घोटालों के छीटें यूपीए सरकार पर पड़ रहे हैं उस माहौल में मनमोहन सिंह से बेहतर विकल्प तो निश्चित तौर पर अमिताभ बच्चन हैं । दरअसल अशोक वाजपेयी जैसा संवेदनशील लेखक जो कला और कलाकारों की इज्जत करते रहे हैं उनकी लेखनी से जब एक बड़े कलाकार के लिए छोटे शब्द निकलते हैं तो तकलीफ होती है । अशोक वाजपेयी को अमिताभ बच्चन के हाथों ज्ञानपीठ पुरस्कार दिलवाने पर तो आपत्ति है लेकिन जब हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश को कट्टर हिंदूवादी नेता योगी आदित्यनाथ अपने कर कमलों से पुरस्कृत करते हैं तो अशोक वाजपेयी चुप रह जाते हैं । अशोक वाजपेयी जैसे बड़े लेखक की जो ये सेलेक्टेड चुप्पी होती है वह साहित्य और समाज के लिए बेहद खतरनाक है ।
मुझे लगता है कि अशोक वाजपेयी का विरोध अमिताभ से कम ज्ञानपीठ से ज्यादा है । उसी विरोध के लपेटे में अमिताभ बच्चन आ गए हैं । जिस तरह से किसी जमाने में प्रतिष्ठित रहा अखबार ज्ञानपीठ के खिलाफ मुहिम चला रहा है उससे यह बात और साफ हो जाती है । अशोक वाजपेयी की देखादेखी कुछ छुटभैये लेखक भी अमिताभ बच्चन और ज्ञानपीठ के विरोध में लिखने लगे । अखबार ने उन्हें जगह देकर वैधता प्रदान की कोशिश की लेकिन अखबार के कर्ताधर्ताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि पाठक मूर्ख नहीं होते हैं । उन्हें प्रायोजित चर्चाओं में और स्वत:स्फूर्त स्वस्थ साहित्यिक बहस में फर्क मालूम होता है । वो यह भांप सकता है कि कौन सा विवाद अखबार द्वारा प्रायोजित है और उसके पीछे की मंशा और राजनीति क्या है । कहना ना होगा कि ज्ञानपीठ और अमिताभ को विवादित करने के पीछे की मंशा भी साफ तौर पर लक्षित की जा सकती है । इस विवाद को उठाने के पीछे की मंशा के सूत्र आप छिनाल विवाद से भी पकड़ सकते हैं । लेकिन इतना तय मानिए कि हिंदी के लोगों का फिल्म के कलाकारों को लेकर जो एक ग्रंथि है वो उनके खुद के लिए घातक है । फिल्म में काम करनेवाला भी कलाकार होता है और किसी भी साहित्यकार, गायक, चित्रकार से कम नहीं होता । मेरा तो मानना है कि अमिताभ बच्चन को बुलाकर ज्ञानपीठ ने एक ऐसी परंपरा कायम की है जिससे हिंदी का दायरा बढेगा । इस बात का विरोध करनेवाले हिंदी भाषा के हितैषी नहीं हो सकते । उनसे मेका अनुरोध है कि वयक्तिगत स्कोर सेट करने के लिए किसी का अपमान नहीं होना चाहिए ।

Saturday, September 4, 2010

हिंदी साहित्य में लालूवाद

अभी इस बात को ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कौड़ा पर अरबों रुपये के घोटाले के आरोप लगे । मधु कौड़ा से जुड़ी खबरें हर रोज मीडिया में सुर्खियां बनती रही । उसके कई सहयोगियों के नाम भी सामने आने लगे । मधु कौड़ा और उनके सहयोगियों के बारे में तफ्तीश शुरू हुई । इस बीच अचानक से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व रेल मंत्री लालू यादव ने एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर यह सफाई दी कि उनका मधु कौड़ा से कोई लेना देना नहीं है । लालू की इस सफाई से लोगों को हैरानी भी हुई । कई पत्रकारों ने प्रेस कांफ्रेंस में उनसे सवाल भी पूछा कि वो क्यों सफाई दे रहे हैं,जबकि उनका नाम कहीं से मधु कौड़ा के घोटाले में शामिल नहीं है । लालू यादव ने अपने ही अंदाज में बात को हवा में उड़ा दिया और कहा कि उन्हें अपने स्त्रोंतो से पता चला कि लोग उनपर शक कर रहे हैं सो उन्होंने मुनासिब समझा कि सफाई दी जाए । ठीक इसी तरह का वाकया अब हिंदी साहित्य में सामने आया है । विभूति-कालिया प्रकरण में जब विवाद ठंड़ा पड़ने लगा तो अचानक से पिछले हफ्ते हिंदी के वरिष्ठ कवि और ललित कला अकादमी के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी ने जनसत्ता के अपने कॉलम कभी-कभार में लालू यादव के तर्ज पर इस विवाद को पर्दे के पीछे से हवा देने के आरोपों पर अपनी सफाई दी । अशोक वाजपेयी ने लिखा- इस बीच एक और अफवाह फैलाई गई । कुंवर नारायण और मैं इस प्रसंग में ज्ञानपीठ की अध्यक्ष इंदु जैन से मिले हैं । अव्वल तो इस प्रसंग को लेकर कुंवर जी से मेरी बात तक नहीं हुई । दूसरे इंदू जैन से कोई बीस बरस पहले नाश्ते पर एक सौजन्य भेंट हुई थी जब मुझे नवभारत टाइम्स के संपादक का पद ऑफर किया गया था । उसके बाद उनसे कभी नहीं मिला । तीसरे जो कुछ मैं इस विवाद में चाहता हूं उसे खुलकर बता चुका हूं – गुप कोई काम करना मेरी आदत में शामिल नहीं है । पर इस झूठ को सरासर फैलाने का काम शुरू किया गया । इस प्रकरण में अशोक जी ने के विक्रम सिंह से लेकर विजय मोहन सिंह और केदार नाथ सिंह का नाम भी लिया । लेकिन सवाल यह उठता है कि अशोक जी को सफाई देने की जरूरत क्यों पड़ी । ऐसी कौन सी अफवाह फैलाई जा रही थी कि अशोक जी जैसे गंभीर लेखक को अपने लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ में सफाई देने की जरूरत पड़ी ।
दूसरी बात जो अशोक वाजपेयी ने अपने स्तंभ में उठाई वो नैतिकता और लेखकों के अपमान की । अशोक वाजपेयी के मुंह से नैतिकता की बात भी उसी तरह लगती है जैसे कि लालू यादव के मुंह से । साहित्य जगत उन्नीस सौ चौरासी के अशोक वाजपेयी के बयान को भूला नहीं है । भोपाल गैस त्रासदी के आसपास ही अशोक वाजपेयी ने एशिया पोएट्री का आयोजन किया था । तब वो मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के चहेते अफसर और भारत भवन के कर्ता-धर्ता थे । जब भोपाल गैस त्रासदी में हजारों लोगों की जान गई तो उसी शहर में कविता पर उक्त आयोजन पर सवाल खड़े होने लगे थे। तब अशोक वाजपेयी ने बयान दिया था कि मरनेवालों के साथ कोई मर नहीं जाता । अशोक वाजपेयी का वह बयान बेहद अमानवीय और मनुष्यता के खिलाफ था और एक लेखक और वयक्ति की संवेदनहीनता का सबसे बड़ा नमूना।
साहित्य में स्वतंत्रता और जनपक्षधरता की बात करनेवाले अशोक वाजपेयी मूलत: नौकरशाह हैं और भारत में अफसरशाही की कंडीशनिंग इस तरकह से होती है कि वहां ना तो संवेदना के लिए कोई जगह होती है और ना ही नैतिकता के लिए । आप खुद इस बात का अंदाजा लगाइये कि जिस शहर में तकरीबन पच्चीस हजार लोग काल के गाल में समा गए हों उसी शहर के अफसर अशोक वाजपेयी का उक्त बयान कितना संवेदनहीन है । उस एक बयान के लिए ही अशोक वाजपेयी को माफ नहीं किया जा सकता है । आज अशोक वाजपेयी नैतिकता की दुहाई देते हैं लेकिन तब उनकी नैतिकता कहां चली गई थी जब संस्कृति मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहते हुए साहित्य अकादमी का पुरस्कार हथिया लिया था । गौरतलब है कि साहित्य अकादमी एक स्वायत्त संस्था है लेकिन वो संबद्ध तो संस्कृति मंत्रालय से ही है । नैतिकता का उपदेश देने के पहले अशोक जी को खुद के गिरेबां में झांक कर देख लेना चाहिए । यहां भी वो लालू यादव के पद चिन्हों पर ही चलते नजर आ रहे हैं । घोटालों के आरोप से घिरे लालू यादव भी गाहे बगाहे नैतिकता और राजनैतिक शुचिता की बात करते हैं ।
अशोक वाजपेयी ने लिखा है कि हिंदी लेखक समाज अपने सदस्यों के अपमान करनेवालों को सुख चैन से अपनी कुर्सी पर बैठने नहीं देगा । जो निर्लज्ज फिर भी उंची कुर्सी पर जमे हैं वे खुद जानते हैं कि उनका कद कितना नीचा हो गया है । आज अशोक वाजपेयी को हिंदी साहित्य समाज के अपमान की याद आ रही है लेकिन वो खुद हिंदी के लेखकों का कितनी बार अपमान कर चुके हैं , कितनी बार उसका मजाक उड़ा चुके हैं यह उनको याद दिलाने की जरूरत है । अशोक वाजपेयी जब साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पद का चुनाव हारे थे तब हिंदी के लेखकों के खिलाफ विषवमन किया था । अपनी हार से तिलमिलाए अशोक वाजपेयी ने कहा था कि – जिन हिंदी के लेखकों को महीनों-महीने रखा, खिलाया पिलाया, हवाई जहाज से यात्राएं करवाई उन्होंने ही मुझे धोखा दिया । उनके निशाने पर हिंदी के एक वरिष्ठ आलोचक और एक कवि थे । आज वही अशोक वाजपेयी हिंदी के लेखकों के अपमान करनेवालों के निर्लज्ज कह रहे हैं । क्या यही भाषा एक वरिष्ठ लेखक को इस्तेमाल करनी चाहिए । क्या लिखते लिखते अशोक वाजपेययी मर्यादा भूल जाते हैं या फिर व्यक्तिगत खुन्नस लेखक पर हावी हो जा रहा है । जिनको वो निर्लज्ज कह रहे हैं उनका कद साहित्य में अशोक वाजपेयी से कई गुना बड़ा है, उम्र में तो उनसे बड़े हैं ही ।
अपने उसी स्तंभ में अशोक वाजपेयी साहित्य के परिसर को मूल्यों का परिसर बताते हुए विभूति नारायण राय और रविन्द्र कालिया पर वार करते हैं । अभी इस बात को ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब अशोक वाजपेयी महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति थे । तब उनपर एक बड़े परिसर में मूल्यों के दायित्व का निर्माण करने की महती जिम्मेदारी थी लेकिन उस वक्त भी वहां क्या-क्या गुल खिले थे वो किसी से छिपे नहीं हैं इस विषय पर कभी विस्तार से चर्चा होगी । अशोक जी हिंदी के मूर्धन्य रचनाकार हैं, किसी भी विवाद पर पूरा हिंदी जगत उनसे बगैर किसी पूर्वग्रह के हस्तक्षेप की उम्मीद करता है । लेकिन इस पूरे विवाद में अशोक जी पूर्वग्रहों से उपर नहीं उठ सके ।