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Saturday, December 3, 2022

विवाद का कारण बनते गुलामी के चिह्न


स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने पांच प्रण बताए थे। इसमें से एक प्रण गुलामी के चिह्नों को समाप्त करने का है। अमृत काल में अपेक्षा की गई कि इन पांच प्रण को आत्मसात किया जाए। प्रधानमंत्री ने जब गुलामी के चिह्नों को हटाने की बात की तो उनको इस बात का अंदाज होगा कि सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रहने के कारण इसके चिह्न हमारे जीवन और सरकारी क्रियाकलापों में रच-बस गए हैं। उनको हटाना कठिन है। इसका ताजा उदाहरण है गोवा में आयोजित 53वें अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल आफ इंडिया (इफ्फी) में विवेक रंजन अग्निहोत्री की फिल्म द कश्मीर फाइल्स को लेकर उठा विवाद। अंतराष्ट्रीय जूरी के चेयरमैन और इजरायल के फिल्मकार नादव लैपिड ने इस फिल्म को भद्दा और प्रोपगंडा फिल्म बताया। ये कहने के लिए उन्होंने इफ्फी के समापन समारोह के मंच का उपयोग किया। जहां उनके सामने केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर, गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत, कई मंत्री और जूरी के अन्य सदस्य उपस्थित थे। ये भी गुलामी के एक चिह्न के बने रहने के कारण ही हुआ। कैसे ? इसको समझने के लिए फिल्म समारोह के नियमों को देखते हैं। 

इस वर्ष फिल्म समारोह का आयोजन राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) ने किया। एनएफडीसी के प्रबंध निदेशक की तरफ से जारी नियम के बिंदु संख्या 3 (1) में कहा गया है कि फीचर फिल्म के अंतराष्ट्रीय कंपटीशन में कुल 15 फिल्में होंगी। इनमें से तीन भारतीय फिल्में होंगी। फिक्शन फिल्म की अवधि 70 मिनट या उससे अधिक होनी चाहिए। इसी नियमावली के 4.4 में कहा गया है कि अंतराष्ट्रीय कंपटीशन के लिए एक जूरी होगी जिसमें चेयरमैन और कम से कम दो सदस्य या अधिकतम चार सदस्य होंगे। इसके अगले बिंदु में ये स्पष्ट किया गया है कि फिल्मों के बारे में जूरी का फैसला उपस्थित सदस्यों के सामान्य बहुमत के आधार पर होगा। जूरी फिल्मों की प्रविष्टियों के बारे में निर्णय लेने के लिए अपने नियम बना सकती है। इसी में आगे कहा गया है कि एनएफडीसी के प्रबंध निदेशक और/या उनके प्रतिनिधि जूरी के साथ फिल्मों पर मंथन के दौरान उपस्थित रहेंगे, लेकिन उनको वोट देने का अधिकार नहीं होगा। अब इस पूरी नियमावली में कहीं भी इस बात का उल्लेख नहीं है कि अंतराष्ट्रीय जूरी का चेयरमैन कैसे नियुक्त किया जाता है। बताया जा रहा है कि इफ्फी के अंतराष्ट्रीय जूरी के चेयरमैन का चयन एनएफडीसी करती है। इस वर्ष आयोजित मुंबई अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल, जिसका आयोजन भी सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत होता है, की अंतराष्ट्रीय जूरी का मैं सदस्य था। मेरे साथ इजरायल के डान वोलमैन, फ्रांस में बस गई ईरानी फिल्मकार मीना राड, फ्रांस के ही जेएन पियरे और भारत से नल्लामुत्थू सदस्य थे। इसमें सभी सदस्यों ने आम सहमति के आधार पर मीना राड का चुनाव जूरी के चेयरमैन के तौर पर किया था। इस पूरी प्रक्रिया और फिल्मों के चयन के दौरान फिल्म डिवीजन के एक सहयोगी निरंतर उपस्थित थे। सारी बातें सुन रहे थे और नोट्स भी ले रहे थे। जो नियमवाली थी उसमें भी ये स्पष्ट लिखा गया था कि सदस्य आम सहमति के आधार पर चेयरमैन का चयन करेंगे। किसी कारणवश अगर सहमति नहीं बन पाती है तो फेस्टिवल डायरेक्टर चेयरमैन की नियुक्ति करेगा। मुंबई अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल की अंतराष्ट्रीय जूरी के चेयरमैन भारतीय फिल्मकार भी होते रहे हैं। आमतौर पर वरिष्ठता को आधार बनाया जाता है।      

इफ्फी ने जो 53वें फिल्म फेस्टिवल के लिए नियमावली जारी की उसमें इस बात का भी उल्लेख नहीं है कि अंतराष्ट्रीय जूरी का सदस्य कोई भारतीय नहीं हो सकता है। लंबे समय से ये एक अलिखित सा नियम या कहें कि परंपरा चल रही है कि इंटरनेशनल जूरी का सदस्य कोई विदेशी फिल्मकार ही होगा। फिल्म फेस्टिवल में जब से अंतराष्ट्रीय जूरी बनने लगी होगी तब किसी ने कह या तय कर दिया होगा कि अंतराष्ट्रीय जूरी का सदस्य कोई विदेशी होगा। तब से ही ये चला आ रहा है। किसी ने इस पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं समझी। इस बर्ष भी यही हुआ होगा और फेस्टिवल डायरेक्टर ने किसी की अनुशंसा पर इजरायली फिल्मकार नादव लैपिड को चेयरमैन नियुक्त कर दिया होगा। यहां ये देखा जाना चाहिए कि किसने नादव लैपिड की अनुशंसा किसने की थी। इसी तरह की स्थितियों के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुलामी के चिह्न हटाने की बात अपने पांच प्रण में की थी।

इफ्फी की नियमावली में एक और बात लिखी हुई है, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है कि फिल्मों पर जब जूरी के सदस्य मंथन करेंगे तो एनएफडीसी के प्रबंध निदेशक या उनके प्रतिनिधि उपस्थित रहेंगे। अब यहां प्रश्न ये उठता है कि मंच से जो बात नादव लैपिड ने कही क्या उसपर मंथन के दौरान चर्चा नहीं हुई। उन्होंने तो एक साक्षात्कार में ये भी कहा कि स्पेन और फ्रांस के जूरी सदस्य से बात कर ली जाए वो भी इसी मत के थे। अंतराष्ट्रीय जूरी के एकमात्र भारतीय सदस्य सुदोप्तो सेन ये दावा कर रहे हैं कि नादव लैपिड ने जो मंच से बोला ये उनकी व्यक्तिगत राय है। एनएफडीसी को मंथन के दौरान उपस्थित अपने प्रतिनिधि से बात करनी चाहिए और सच की तह तक पहुंचने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने मंथन के दौरान नोट्स लिए होंगे या जूरी के सदस्यों की राय भी दर्ज हुई होगी, उसको देखा जाना चाहिए कि उन्होंने क्या लिखकर दिया है। उससे राय स्पष्ट हो जाएगी। ऐसा क्यों हुआ इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि आगे क्या किया जाए जिससे ऐसी अप्रिय घटनाएं न हों । एक तो जूरी चेयरमैन के चयन की प्रक्रिया एकदम स्पष्ट हो और दूसरा जिनको बनाया जाए उनकी पृष्ठभूमि के बारे में भी चयनकर्ता या अनुशंसा करनेवाले को जानकारी हो। 

सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इस वर्ष 4 जुलाई को 53वें इफ्फी के लिए मंत्री की अध्यक्षता में एक संचालन समिति का गठन किया था। इसमें कुल 26 सदस्य थे, जिनमें से 13 गैर सरकारी सदस्य थे। संचालन समिति के गठन के साथ ही इस समिति का उत्तरदायित्व और उसकी भूमिका तय की गई थी। इसमें 13वें बिंदु पर स्पष्ट है कि ये समिति इंटरनेशनल जूरी सदस्यों का चयन करेगी। गैर सरकारी सदस्यों में करण जौहर समेत कई बड़े नाम हैं। यह जानना दिलचस्प होगा कि जूरी के चयन में संचालन समिति के सदस्यों की कोई भूमिका थी या नहीं? अगर थी तो नादव लैपिड का नाम किसने सुझाया था। इफ्फी के लिए संचालन समिति को अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय करने की आवश्यकता है। कई नाम तो ऐसे हैं जो बस सूची में हैं। देखा जाना चाहिए कि सदस्यों की जो भूमिका और उत्तरदायित्व तय किए गए हैं उसको लेकर वो कितने गंभीर हैं। 

फिल्मों से जुड़े आयोजनों और पुरस्कारों के बारे में मंत्रालय को गंभीरता से विचार करना होगा। इनको पुराने ढर्रे पर चलते हुए काफी समय हो गया है। बदलते वक्त के साथ चलना होगा। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। उसमें इतनी अधिक श्रेणियां और पुरस्कार हैं कि पुरस्कार वितरण समारोह काफी लंबा हो जाता है। इसको तर्कसंगत बनाना होगा। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में फीचर फिल्म और लेखन का पुरस्कार एक साथ कर देना चाहिए। गैर फीचर फिल्म और अन्य पुरस्कार को मुंबई अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल से जोड़ देना चाहिए क्योंकि वो फेस्टिवल गैर-फीचर फिल्मों का ही है। फिल्म समारोहों के नियमों पर पुनर्विचार करके उसको स्पष्ट करना होगा। एक पूर्णकालिक फेस्टिवल निदेशक की नियुक्ति करनी होगी ताकि वो पूरे वर्ष फेस्टिवल को लेकर कार्ययोजना बनाकर अमल कर सकें। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अह्वान के अनुसार जहां जहां गुलामी के चिह्न हैं उनको हटाने का प्रयास सरकारी स्तर पर भी करना होगा।

Saturday, March 26, 2022

धर्मांधता ने बदली कश्मीर की संस्कृति


कश्मीरी पंडितों को नुकसान हुआ, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। कश्मीरी पंडित मारे गए, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। कश्मीरी पंडित तबाह बर्बाद हो गए इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। मैं तकरीबन तकरीबन जब भी जब भी कश्मीर पर चर्चा हुई है पार्लियामेंट के अंदर मैंने कहा कश्मीरी पंडितों के बगैर कश्मीर अधूरा है। क्योंकि ओरिजनल कश्मीरी जितने मुसलमान हैं वो सब कंवर्ट हो गए हैं कश्मीरी पंडितों से। मैंने कहा कि 600 साल पहले मेरे बुजुर्ग भी कश्मीरी पंडित थे। मैंने पार्लियामेंट में भी कहा। कइयों को शर्म आती है, नहीं आती है लेकिन इतिहास जो है वो तो ठीक कहना चाहिए। मेरे ख्याल में सभी, एकाध लीडर को छोड़कर जो बाहर से आए, सभी लीडरों के या सभी पार्टी के लीडरों के छह सौ साढे छह सौ साल पहले कश्मीरी पंडित थे। तो खून एक है कश्मीरियों का उसको जुदा कैसे कर सकते हैं। ये कहना है कांग्रेस के नेता और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद का। वो विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे। इसके आगे भी उन्होंने फिल्म में सत्य और अर्धसत्य की बातें की। फिल्म में दिखाई बातों को लेकर अलग-अलग राय आती रहेगी लेकिन इतना तो माना ही जाना चाहिए कि विवेक अग्निहोत्री ने अपनी इस फिल्म के जरिए कश्मीर और वहां के भुला दिए गए इतिहास को एक बार फिर से विमर्श के केंद्र में ला दिया है। गुलाम नबी आजाद जो बात कह रहे हैं वो बेहद महत्वपूर्ण है और इस पर एक देशव्यापी विमर्श होना चाहिए। 

गुलाम नबी आजाद के मुतिबक कश्मीर की आबादी पहले हिंदू थी जो बाद में इस्लाम स्वीकार करके मुसलमान बन गई। आजाद के इस बयान को दो हिस्से में बांट कर देखा जाना चाहिए। पहला ये कि कश्मीर की अधिसंख्यक आबादी पहले हिंदू थी और दूसरी ये कि बाद में उन्होंने अपना धर्म बदल दिया और वो मुसलमान हो गए। ऐसा नहीं है कि आजाद ने कोई नई बात कही है या कोई नया अन्वेषण कर खुलासा किया है। आजाद ने जिस बात को स्वीकार किया है जो हमारे पौराणिक ग्रंथों में तो है ही कई आधुनिक इतिहासकार और लेखक भी इस बात को लगातार कह रहे हैं। ये अवश्य है कि इन ऐतिहासिक तथ्यों को प्रचारित नहीं किया गया। पाठ्य पुस्तकों में छात्रों को इस बात को पढाया नहीं गया। ये विषय सेमिनारों में विमर्श का विषय नहीं बन पाए। उल्टे कश्मीर के बारे में जो बताया जाता रहा है वो अर्धसत्य रहा है। अभी हाल ही में कुमार निर्मलेन्दु की कश्मीर पर एक पुस्तक आई है जिसका नाम है ‘कश्मीर इतिहास और परंपरा’। इस पुस्तक में लेखक ने बेहद स्पष्ट तरीके से सप्रमाण ये बताया है कि कश्मीरी हिंदूओं को कैसे मुसलमान बनाया गया। निर्मलेन्दु ने लिखा है कि ‘1339 ई. तक कश्मीर एक स्वशासित हिंदू राज्य था। परन्तु मध्यकालीन हिंदू शासकों की दुर्बलता और उनके सामंतों के षडयंत्रों के कारण वहां अराजकता का वातावरण पैदा हो गया। इस स्थिति का लाभ उठाते हुए 1939 में शाहमीर नाम के एक मुसलमान ने कश्मीर के राजसिंहासन पर कब्जा कर लिया।‘  शाहमीर के पूर्वज काम की तलाश में कश्मीरआए थे । शाहमीर को राजा उदयन देव के समय में राजदरबार में नौकरी मिली थी। राजा उदयन देव के निधन के बाद उनकी पत्नी कोटा देवी के सत्ता की बागडोर संभालने का जिक्र इतिहास की पुस्तकों में मिलता है। उस समय तक शाहमीर राज दरबार में प्रमुख पद पर पहुंच चुका था उसने वहां की सेना में भी अपनी पैठ बना ली थी और एक दिन उसने रानी कोटा को चुनौती दी। रानी कोटा ने उसके साथ युद्ध किया लेकिन शाहमीर ने उनको हराकर बंदी बना लिया और खुद को कश्मीर का राजा घोषित कर दिया। निर्मलेन्दु लिखते हैं कि, ‘शाहमीर द्वारा प्रवर्तित राजवंश का छठा सुल्तान सिकंदर  बहुत ही अत्याचारी और धर्मान्ध था। उसके अत्याचारों ने अधिकांश हिंदू जनता को मुसलमान बनने को विवश कर दिया। अनेक हिंदू कश्मीर छोड़कर चले गए और जो रह गए उनपर जजिया कर लगाया गया। तत्कालीन कश्मीरी हिंदुओं का जीवन बहुत कष्टप्रद रहा। मंदिरों और मूर्तियों का वह ऐसा शत्रु था कि उसका नाम ही बुतशिकन (मूर्तिभंजक) पड़ गया था।… उसने परिहासपुर के विशाल मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। जैन राजतरंगिणी में भी इस बात का जिक्र मिलता है कि कट्टर मुसलमानों से प्रेरित होकर सुल्तान सिकंदर ने सभी संस्कृत ग्रंथों को जलाकर भस्म कर दिया था। उस समय मुसलमानों के उपद्रव से आतंकित होकर धर्मपरायण हिंदू अपने पवित्र ग्रंथों को लेकर कश्मीर से पलायन कर गए थे।‘ 

ऐसा नहीं है कि कश्मीर की सामाजिक और सांस्कृतिक स्थितियों में बदलाव का उल्लेख सिर्फ निर्मलेन्दु की पुस्तक में मिलता है। इस तरह की बातों का उल्लेख कल्हण की राजतरंगिणी, जैन राजतरंगिणी से लेकर विदेशी यात्रियों के लेखन में भी उपलब्ध है। जैन और बौद्ध साहित्य में भी कश्मीर और वहां बदल रही सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों और उसके बदले जाने का उल्लेख मिलता है। कालांतर में जब कश्मीर को अकबर ने अपने साम्राज्य का हिस्सा बना लिया तो उसके बाद से ही वहां योजनाबद्ध तरीके से वहां के समाज और संस्कृति को इस्लामिक संस्कृति से जोड़ने का अङियान आरंभ हुआ। ये अकारण नहीं है कि जो कश्मीर वैदिक धर्म का प्रमुख स्थान था। जहां शारदा पीठ जैसा विद्या अध्ययन का प्रमुख केंद्र था जहां देशभर के विद्वान जुटते थे और अपनी रचनाओं पर विमर्श करते थे। जिनकी अपनी की लिपि थी। जिसको शारदा लिपि के नाम से जानते हैं। कई दुर्लभ पांडुलिपियां शारदा लिपि में में हैं। अब के जम्मू कश्मीर से लेकर हिमाचल प्रदेश में मौजूद कई शिलालेखों पर शारदा लिपि में ही संदेश उकेरा हुआ मिलता है। कश्मीर एक ऐसा भौगोलिक प्रदेश रहा है जहां की धरती पर एक से एक विद्वान पैदा हुए जिन्होंने अपनी रचनाओं से भारतीय सनातन संस्कृति को समृद्ध किया। अभिनवगुप्त, भामह और मम्मट जैसे उच्च कोटि के लेखकों का नाम लिया जा सकता है। यह सूची बहुत लंबी है। जहां से शंकराचार्य का गहरा नाता रहा है। जहां शैव, वैष्णव दर्शन को मजबूती मिली, जहां कई भव्य और दिव्य मंदिर थे। वहां से जब हिंदुओं का पलायन होता है तो उसपर बहस तो होनी ही चाहिए। उन बातों की पड़ताल और उसका प्रचार भी होना चाहिए कि किन परिस्थितियों में कश्मीर जैसे ज्ञान का केंद्र, सनातन धर्म का प्रमुख केंद्र आज आतंकवाद और विवाद से घिर गया है। 

विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ को फिल्म और उसकी सफलता, दो सौ करोड़ से अधिक की कमाई आदि के प्रिज्म से नहीं देखकर उसको इस तरह से देखा जाना चाहिए कि इस फिल्म ने इतिहास के एक विस्मृत पन्ने को पढ़ने की उत्सुकता जगा दी है। क्या देश के हिंदुओं को ये जानने का अधिकार नहीं है कि उसका इतिहास क्या रहा है, क्या उनको ये जानने का अधिकार नहीं है कि वैदिक धर्म की ज्ञान परंपरा कैसी रही है, क्या उनको ये जानने का अधिकार नहीं है कि किन लोगों और परिस्थियों ने हिंदुओं की इस समृद्ध विरासत को पूरी तरह से बदल दिया। फिल्म द कश्मीर फाइल्स ने तो एक कालखंड में कश्मीर से हिंदुओं के पलायन और नरसंहार को दिखाकर एक शुरुआत की है। क्या अब वक्त नहीं आ गया है कि शाहमीर के दौर में हिंदुओं पर हुए अत्याचार को सामने लाया जाय, उस समय हिंदुओं के पलायन पर बात हो। आजादी पूर्व शेख अब्दुल्ला के कार्यों को लेकर नए सिरे से तथ्यों की खोजबीन की जाए।  क्योंकि अगर हम इतिहास के साथ छल करते हैं तो देश का अहित करते हैं।  


Saturday, March 19, 2022

इकोसिस्टम पर प्रहार करती फिल्म


बिहार के मुंगेर-जमालपुर-भागलपुर क्षेत्र में एक पौधा होता है जिसे उरकुस्सी कहते हैं। उस पौधे का पत्ता अगर शरीर के किसी हिस्से को छू जाए तो काफी देर तक खुजली होती रहती है। उस अंचल में कई बार उरकुस्सी के पत्ते का उपयोग बारात में आए नखरेबाज अतिथियों को ठीक करने में किया जाता है। जब बारात दुल्हन के घर की ओर जा रही होती है तो कन्या पक्ष का कोई व्यक्ति चुपके से नखरेबाज व्यक्ति के शरीर के किसी हिस्से से उरकुस्सी का पत्ता छुआ देता है। उसके बाद शरीर के उस हिस्से में होनेवाली खुजली से वो इस कदर परेशान हो जाता है कि सारे नखरे भूल जाता है। उरकुस्सी का असर काफी देर तक रहता है। देश के अलग-अलग अंचल में इस पौधे को अलग-अलग नाम से जानते हैं। कुछ राज्यों में इसको झुनझुनिया कहते हैं तो कहीं बिछुआ पत्ती या बिच्छू बूटी कहते हैं । हिमाचल प्रदेश में इसको ऐण के नाम से जाना जाता है। विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ की रिलीज के बाद उरकुस्सी के पौधे और उसके पत्ते की याद आ रही है। इस फिल्म के रिलीज होने के बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कथित झंडाबरदारों या फिर समाजिक समरसता की पैरोकारी का दंभ भरनेवालों की प्रतिक्रिया देखकर लग रहा है कि किसी ने उनको उरकुस्सी का पत्ता छुआ दिया है। खुद को लिबरल जमात कहने वाले ये लोग ‘द कश्मीर फाइल्स’ रूपी उरकुस्सी के पत्ते से होनेवाली खुजली से परेशान हैं। इस फिल्म की सफलता ने उनकी परेशानी और बढ़ा दी है। 

उरकुस्सी का ये रूपक फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ को लेकर वितंडा खड़ा करनेवालों पर एकदम फिट बैठ रहा है। प्रतीत हो रहा है कि ‘द कश्मीर फाइल्स’ रूपी उरकुस्सी या बिच्छू बूटी के पत्ते को किसी ने इकोसिस्टम को छुआ दिया है और इकोसिस्टम खुजली से परेशान है। ‘द कश्मीर फाइल्स’ से पैदा हुई खुजली से परेशान कुछ लोग इस फिल्म को नफरत फैलाने वाला करार दे रहे हैं। कुछ इसमें तथ्यों की कमी ढूंढ रहे हैं। समग्रता में बात नहीं हो रही है। इस फिल्म की सफलता के बाद कुछ लोग अपने माथे पर इतिहासकार की कलगी लगाकर मैदान में उतर आए हैं। खुद को कश्मीर विशेषज्ञ मानने वाले भी परिदृश्य पर अवतरित हो गए हैं। इन कथित इतिहासकारों और विशेषज्ञों ने फिल्म के कई तथ्यों पर सवाल खड़ा करना आरंभ कर दिया है। फिल्म के व्याकरण पर बात नहीं करके उसके दृश्यों और प्रसंगों पर प्रश्नचिन्ह लगाया जा रहा है। ये बात समझ नहीं पा रहे हैं कि सफल फिल्म वही होती है जो दर्शकों के मन को छू ले। ‘द कश्मीर फाइल्स’ पूरे देश के लोगों के मन को छू रही है। दर्शकों के साथ अपना कनेक्ट बना रही है। इस फिल्म में तथ्य और घटनाओं और संवाद में सत्य ढूंढनेवाले लोग पूर्व में बनी फिल्मों के एकतरफा संवाद, दृश्य और फिल्मांकन को लेकर हमेशा से अपने मुंह पर पट्टी लगाए रहे हैं। 

फिल्मों पर सर्वश्रेष्ठ लेखन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित लेखक विनोद अनुपम ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा- ‘माचिस’ में गुलजार भाई साहब ने आतंकवादियों की वकालत करते हुए लिखा, आतंकवादी खेतों में नहीं उगते। ‘फना’ में यश चोपड़ा जी ने कश्मीर में जनमत संग्रह के वादे की याद दिलाई। ‘हैदर’ में विशाल भाई कहते हैं, यह डेमोक्रेसी नहीं, दम घोंटनेवाला क्रेसी है(तंत्र) है। ‘फिजा’, ‘मिशन कश्मीर’....लिस्ट लंबी है। तबतक ‘द कश्मीर फाइल्स’ देख लीजिए और फिर पक्षधरता तय कीजिए।‘  विनोद अनुपम की बात में दम तो है। उनकी इस छोटी टिप्पणी ने कई फिल्मकारों और उनसे जुड़े ईकोसिस्टम की कमजोर नस दबा दी है। फिल्म फना में आतंकवाद को प्रेम का आवरण देकर एक खूबसूरत रंग देने की कोशिश की गई थी। फिल्म की कहानी याद कीजिए कि कैसे आतंकवादियों के मनोविज्ञान के विश्लेषण को आधार बनाकर परोक्ष रूप से कश्मीर के आतंकवाद को आजादी की लड़ाई कहा गया था। फराह खान की फिल्म ‘मैं हूं ना’ के संवाद पर एकाध लोगों ने ही सवाल उठाया था। उस फिल्म में भारतीय सेना के एक अधिकारी को बेहद क्रूर दिखाया गया है। वो अधिकारी भारत की सीमा में पानी लेने के लिए आए सामान्य पाकिस्तानी नागरिकों को पंक्तिबद्ध कर गोली मार देता है। बच्चों को भी नहीं छोड़ता। काल्पनिक कहानी के आधार पर भारतीय सेना की छवि खराब करने की कोशिश का उदाहरण। फिल्म के अंतिम कुछ मिनटों के संवाद में पाकिस्तानियों का महिमामंडन भी चकित करनेवाला था। इकोसिस्टम चुप रहा।  

ये तो कुछ वर्ष पहले की फिल्मों की बात हुई। हाल में भी ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म पर कुछ वेब सीरीज ऐसी आईं जिनमें खुलकर हिन्दू मुसलमान किया गया। हमारे देश की पुलिस को, व्यवस्था को खुलकर मुस्लिम विरोधी करार दिया गया लेकिन सब खामोश रहे। इन वेब सीरीज के संवाद तो देश की संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ एक संप्रदाय को उकसाने वाले भी थे। आज जिनको ‘द कश्मीर फाइल्स’ में नफरत दिखाई दे रही है वो गुजरात दंगों  की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों और डाक्यूमेंट्री को लेकर कभी उत्तेजित नहीं हुए। उनकी उत्तेजना कभी मुजफ्फरनगर दंगों पर बनी फिल्म को लेकर भी सामने नहीं आई। फिल्म ‘परजानिया’ के दृश्यों में या संवाद में या फिर नंदिता दास की फिल्म ‘फिराक’ के संवादों में किसी कथित इतिहासकार ने तथ्य खोजने और उसकी सत्यता को परखने की कोशिश नहीं की। क्यों? क्योंकि वो इकोसिस्टम के अनुसार है।  2002 के गुजरात दंगों का जिक्र उसके बाद बनी कई फिल्मों में आया। लगभग सभी समीक्षकों ने फिल्मों में दिखाई गई कहानियों को सच मानकर आंखें मूंद लीं। जो कुछ लोग बोलने की कोशिश करते दिखे उनको हाशिए पर डाल दिया गया। उन फिल्मों में से कुछ पर विवाद हुआ तो तर्क दिया गया कि फिल्म को कलात्मक अभिव्यक्ति मानकर ही देखा और परखा जाना चाहिए। अब उनमें से ही कई लोग ‘द कश्मीर फाइल्स’ में दिखाए कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार में तथ्य ढूंढ रहे हैं। तथ्य खोजने के चक्कर में सिर्फ ये प्रतिस्थापित करने की कोशिश की जा रही है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। नहीं होता होगा लेकिन कश्मीरी हिंदुओं के साथ जो हुआ उसमें तो स्पष्ट रूप से मजहब की आड़ ली गई थी।गिरिजा टिक्कू पर हुए अत्याचार को लोग भूले नहीं हैं। जिंदलाल कौल और जगन्नाथ की पेड़ से लटका कर एक एक करके अंगों को काटा गया था। इन वारदातों के चश्मदीद अभी जिंदा है। कश्मीर में हिंदुओ के नरसंहार को लेकर अन्य नैरेटिव स्थापित करना कठिन है। इन तथ्य खोजक इतिहासकारों को उन परिस्थियों पर विचार करना चाहिए जिसकी वजह से कश्मीर में हिंदुओं ने मानवता के इतिहास की क्रूरतम यातनाएं झेलीं। जम्मू कश्मीर के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस पी वैद के मुताबिक राजनीतिक फैसले की वजह से आईएसआई से प्रशिक्षित 70 आतंकवादियों को पुलिस को छोड़ना पड़ा था। इस फैसले के असर का आकलन शेष है। 

‘द कश्मीर फाइल्स’ पर फिल्म निर्माण की दृष्टि से विचार करते हैं तो पाते हैं कि ये  फिल्म निर्माण के क्षेत्र में प्रस्थान बिंदु है। पिछले सालों में हिंदी फिल्मों की कहानियों के क्षितिज का विस्तार हुआ है। छोटे शहरों की कहानियों पर सफल फिल्में बनीं। ‘द कश्मीर फाइल्स’ की सफलता से हिंदी फिल्मों के निर्माताओं को उन प्रदेशों में प्रवेश का हौसला मिलेगा जिनमें घुसने से वो हिचकते थे। बहुत संभव है कि स्वाधीन भारत की अन्य घटनाओं जैसे पंजाब समस्या और उसका समाधान, पूर्वोत्तर में आतंकवाद, दिल्ली में हुए सिखों के नरसंहार पर फिल्में बनाने के लिए निर्माता आगे आएं। ‘द कश्मीर फाइल्स’ की सफलता से हिंदी फिल्मों की कहानियों का क्षेत्र विस्तार होगा और दर्शकों के सामने विकल्प की विविधता होगी।