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Saturday, August 24, 2024

पुस्तक महोत्सव से जगती आस


जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई है। 5 अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया गया था। उसके एक वर्ष पहले जून 2018 में जम्मू कश्मीर में राजनीतिक उठापटक के बाद राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था। अनुच्छेद 370 हटने के बाद अक्तूबर 2019 में जम्मू कश्मीर राज्य का पुनर्गठन करते हुए इसको दो केंद्र शासित क्षेत्र में बांट दिया गया था। एक जम्मू कश्मीर और दूसरा लद्दाख। अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू कश्मीर में भारत के सभी कानून लागू हो गए थे। वहां के स्थानीय कानून जो भारत के संविधान से अलग थे वो भी समाप्त हो गए थे। पिछले लगभग पांच वर्षों से वहां जनहित के बहुत सारे कार्य हुए और जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के विष का असर कम हुआ। अब वहां करीब छह वर्षों के बाद फिर से विधानसभा का गठन होने जा रहा है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद दो बार कश्मीर जाने का अवसर मिला। दो वर्ष पहले अक्तूबर 2022 में एक साहित्य महोत्सव में कश्मीर जाना हुआ था। श्रीनगर में आयोजित कुमांऊ लिट फेस्ट का आयोजन डल झील के किनारे शेर-ए-कश्मीर अंतराष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र में हुआ था। उस समय के हिसाब से आयोजन बहुत अच्छा रहा था। लेकिन तब सुरक्षा व्यवस्था सख्त थी। केंद्र के गेट से लेकर अंदर तक सुरक्षा के इंतजाम थे। तब भी स्थानीय लोगों की भागीदारी थी लेकिन आमंत्रण पर ही लोग आए थे। उस साहित्य उत्सव में भी कला, संस्कृति और फिल्मों से जुड़े देशभऱ के लोग आए थे। 

दूसरी बार इस सप्ताह जाना हुआ। अवसर था चिनार पुस्तक महोत्सव का जिसका आयोजन शिक्षा मंत्रालय के राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने किया था। नौ दिनों का ये आयोजन 17 अक्तूबर को आरंभ हुआ। ये भी शेर-ए-कश्मीर अंतराष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र में ही चल रहा है। इस बार लोगों की भागीदारी बहुत अधिक दिखी, विशेषकर महिलाओं और लड़कियों की। इस आयोजन में पूरा दिन बिताने के बाद और वहां उपस्थित छात्राओं और महिलाओं से बात करने के बाद ये लगा कि उनके भी अपने सपने हैं, उनकी भी अपनी आकांक्षाएं हैं। पहले भी रही होंगी। अब उनको लगने लगा है कि वो अपने सपनों को पूरा कर सकती हैं। फिल्म और साहित्य पर एक सत्र के दौरान जब वहां उपस्थित लड़कियों से पूछा गया कि कौन कौन फिल्म प्रोडक्शन के क्षेत्र में आना चाहती हैं तो दो लड़कियों ने अपने हाथ खड़े किए। सार्वजनिक रूप से श्रीनगर के एक आयोजन में लड़कियों का इस तरह से सामने आना और ये कहना कि वो फिल्म प्रोडक्शन के क्षेत्र में आना चाहती हैं, बड़ी बात थी। इन आयोजनों का सांस्कृतिक फलक तो बड़ा होता ही है इसका असर भी गहरा होता है। । कश्मीर के युवा पाठकों को बाहर की दुनिया से परिचय करवाने से लेकर भारत की सफलता की कहानी भी पुस्तक महोत्सव में दर्शाई गई थी। इसरो के बारे में, उसकी सफलता के बारे में और मंगलयान के बारे में जानने की जिज्ञासा प्रतिभागियों में प्रबल थी। अंतरिक्ष में इसरो की उड़ान से वो बेहद प्रभावित लग रही थीं। कुछ लड़कियां इस बारे में बात कर रही थीं कि कैसे इस संस्था से जुड़ा जा सकता है। सुरक्षा के इंतजाम रहे होंगे पर वो दिख नहीं रहे थे। प्रतिभागी खुले मैदान में बैठकर बातें कर रहे थे। अलग अलग पंडालों में करीब सवा सौ पुस्तकों की दुकानें थीं जिसमें कश्मीर की कला संस्कृति से जुड़ी पुस्तकों के अलावा हिंदी और अंग्रेजी की पुस्तकें भी प्रदर्शित की गई थीं। उर्दू प्रकाशकों के भी कई स्टाल लगे थे। युवाओं के हाथ में किताब देखकर कुछ अलग ही संकेत मिल रहे थे। कश्मीर के युवाओं की जो छवि बनाई गई थी उससे अलग पुस्तकों के प्रति उनका प्रेम अलग ही कहानी कह रहा था। ऐसा लग रहा था कि कश्मीर के युवा बंदूकों की आवाज या बारूद की गंध से ऊब चुके हैं। वो बेहतर जीवन के रास्ते तलाश रहे हैं। 

चिनार पुस्तक महोत्सव में सिर्फ पुस्तकों के स्टाल ही नहीं थे बल्कि स्थानीय कश्मीरी कलाकारों को भी मंच मिल रहा था। कश्मीरी संगीत, कश्मीरी वाद्य, कश्मीरी कलाकारों से लेकर कश्मीरी कवियों के कृतित्वों पर चर्चा हो रही थी। पुस्तक महोत्सव में शामिल होनेवाले लोग इसका आनंद उठा रहे थे। कला और संस्कृति के प्रति उनका लगाव नैसर्गिक था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वो हिंदुस्तान की मुख्यधारा में शामिल होना चाह रहे हैं। वहां इस बात की भी चर्चा हो रही थी कि इतने बड़े स्तर पर कला-संस्कृति और शिक्षा को लेकर कश्मीर में ये पहला अखिल भारतीय आयोजन था। अपने देश के स्वाधीनता सेनानियों के बारे में जानने के लिए भी वहां आए लोग उत्सुक थे। वहां लगी प्रदर्शनी में जुटी भीड़ से इसका पता चल रहा था। कश्मीर में इस तरह के आयोजन प्रतिवर्ष किए जाने चाहिए ताकि अधिक से अधिक युवाओं को जोड़ा जा सके। ऐसा नहीं था कि वहां सिर्फ श्रीनगर के प्रतिभागी ही आए थे। भद्रवाह से लेकर सोनमर्ग और गुलमर्ग के भी युवा भी वहां मिले। युवाओं के अलावा नागरिक संगठन के लोग भी इस आयोजन में दिखे। नागरिकों के समर्थन के बगैर इस तरह का और इतना बड़ा आयोजन संभव भी नहीं है। इस तरह के आयोजन का एक और लाभ है कि वो लोगों को मिलने जुलने और खुलकर बोलने बतियाने के अलावा अपने आयडिया साझा करने का अवसर भी प्रदान करता है। जब एक दूसरे के साथ विचारों का आदान प्रदान होता है तो बेहतर भविष्य का रास्ता निकलता है। लोग एक दूसरे से विचारों के माध्यम से जुड़ते हैं और विभाजन की लकीर धुंधली पड़ने लगती है।

नौ दिनों के इस आयोजन को एक इवेंट मानकर समाप्त नहीं करना चाहिए। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय को इसकी निरंतरता के बारे में विचार करना चाहिए। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की स्थापना 1957 में हुई थी। इसकी स्थापना के समय ये अपेक्षा की गई थी कि ये संस्था देश में पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा देगी। पुस्तकों के प्रकाशन का कार्य राष्ट्रीय पुस्तक न्यास लंबे समय से कर रही है। पिछले कुछ वर्षों में गंभीर आयोजनों के माध्यम से पाठकों को पुस्तक तक पहुंचाने का उपक्रम किया जा रहा है जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए। चिनार पुस्तक महोत्सव का आकलन वहां बिकी पुस्तकों की संख्या या बिक्री से हुई आय या आयोजन पर हुए व्यय से नहीं किया जा सकता है। इसके दीर्घकालीन प्रभाव के बारे में विचार करना चाहिए। भारत सरकार वर्षों से कश्मीर की बेहतरी के लिए और सुरक्षा इंतजामों पर करोड़ों रुपए खर्च करती रही है। कला संस्कृति पर खर्च करना भी उतना ही आवश्यक है क्योंकि ये एक ऐसा माध्यम है जो बिना किसी दावे के, बिना किसी शोर शराबे के लोगों को जोड़ती है। अब चुनाव की घोषणा हो गई है। नेताओं का कश्मीर आना जाना आरंभ हो गया है। दलों के बीच गठबंधन भी होने लगे हैं। जैसे जैसे चुनाव की तिथि नजदीक आएगी तो बयानवीर नेता अपने बयानों से वहां का माहौल खराब करेंगे। आवश्यकता इस बात की है कि कश्मीर के तीन हजार वर्ष के इतिहास को संजोकर रखा जाए और उस परंपरा को बढ़ाने की दिशा में कार्य हो।  

Saturday, January 27, 2024

चरित्र और संवाद के माध्यम से राजनीति


फिल्मों के माध्यम से पहले भी और अब भी एक विचारधारा विशेष को प्रमोट करने की युक्ति चल रही है। उसका विस्तार भी हो रहा है। जब भारत अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुआ तो स्वाधीनता के बाद जब उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट कर दिया था कि फिल्म इंडस्ट्री नए बने राष्ट्र की प्राथमिकता में नहीं है नेहरू के इस बान के बाद इंडस्ट्री से जुड़े लोग चिंतित हो गए थे। उस समय हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने सरकार को प्रसन्न करने के लिए नेहरू की विचारधारा के अनुसार फिल्में बनाने का उपक्रम आरंभ किया था। नेहरू साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित थे। फिल्मकारों को लगा कि अगर साम्यवादी विचारधारा की कहानियों पर फिल्में बनाई जाएं तो नेहरू खुश होंगे। उनको खुश करने के लिए हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने मार्क्स के बहुविध स्त्रोत से निर्माण के सिद्धांत को अपना लिया। इस प्रविधि में अलग अलग क्षेत्र के विशेषज्ञ अलग अलग भाग का निर्माण करते हैं और उन सबको एक जगह जमा करके या जोड़ करके एक पूरी फिल्म बना ली जाती थी। परिणाम यह हुआ कि पूंजीवादी व्यवस्था से फिल्में बनने वाली फिल्मों की निर्माण प्रक्रिया साम्यवादी रही। लेखन में भी साम्यवादी व्यवस्था धीरे धीरे हावी होने लगी। 

जब नेहरू से मोहभंग का युग आरंभ हुआ तो हिंदी फिल्मों में साम्यवादी और पूंजीवादी धारा दोनों दिखाई देने लगी। फिर इंदिरा गांधी का दौर आया। उस दौर में हिंदी फिल्मों में साम्यवादी व्यवस्था और मजबूत हुई। इस कालखंड में साम्यवादी व्यवस्था में एक और रसायन मिलाया गया वो था हिंदू मुस्लिम एकता का। हिंदू महिला को उसके पुत्र के मुस्लिम दोस्त का खून चढ़ाकर बचाने जैसे दृष्य फिल्मों का हिस्सा बनने लगे। देश के विभाजन के समय हिंदू मुसलमान के बीच जो एक खाई बनी थी उसको पाटने की आड़ ली गई। इंदिरा जी ने देश में इमरजेंसी लगाई और संविधान की प्रस्तावना में मनमाने तरीके से समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जोड़ा गया। संविधान की प्रस्तावना में संशोधन का असर भी फिल्मों पर भी पड़ा। अब हिंदू मुसलमान दोस्ती की मिसाल देनेवाली कहानियों पर फिल्में बनने लगीं। संवाद में कथित गंगा-जमुनी तहजीब की झलक दिखाई जाने लगी। साझा संस्कृति की बात होने लगी। इसके बाद असल खेल आरंभ होता है वो है फिल्मों में सनातन या हिंदू धर्म को नीचा दिखाना और अन्य धर्मों को बेहतर दिखाने की प्रवृत्ति का आरंभ। नायक भगवान को कोसते नजर आने लगे। देश में जब आतंकवाद का दौर आया तो उसका असर फिल्मों पर भी दिखा। स्वाधीनता के बाद फिल्मों में साम्यवाद का प्रभाव था तो उस दौर की फिल्मों में नायकों के अपराधी बनने को जमींदारों या दबंगों के अत्याचार से जोड़कर दिखाया गया था। इसी तरह से मुसलमानों के आतंकवादी बनने को पुलिस प्रशासन की ज्यादतियों से जोड़ा जाने लगा। कश्मीर के आतंकवादियों को लेकर भी हिंदी के कई फिल्मकारों ने यही उक्ति अपनाई। चाहे वो आमिर खान और काजोल अभिनीत फिल्म फना हो या संजय दत्त और ह्रतिक रोशन की फिल्म मिशन कश्मीर हो। इस तरह की फिल्मों की सूची लंबी है, जहां हिंदी फिल्मकारों ने आतंकवादियों को लेकर रोमांटिसिज्म दिखता है। धीरे धीरे ये प्रवृत्ति बढ़ती ही चली गई। 

जब ओवर द टाप (ओटटीटी) प्लेटफार्म प्रचलन में आए तो वहां दिखाई जानेवाली वेबसीरीज में भी इस तरह का रोमांटिसिज्म दिखा। संवाद में आतंकवादियों ने वो बातें कहीं जो विचारधारा विशेष की राजनीति के अनुकूल थीं। हाल ही में एक वेब सीरीज आई है जिसको मशहूर फिल्मकार रोहित शेट्टी ने बनाई है। सात भागों में बनी इस वेब सीरीज का नाम है द इंडियन पुलिस फोर्स। इसमें भी मुस्लिम आतंकवादियों को लेकर एक विशेष प्रकार का रोमांटिसिज्म दिखता है। इंडियन मुजाहिदीन के लिए काम करनेवाले आतंकवादी जरार का चित्रण मानवीय तरीके से किया गया है।वेबसीरीज में दिखाया जाता है कि आतंकवादी जरार का परिवार कानपुर का रहनेवाला है। दंगाइयों ने उसकी फैक्ट्री में जिंदा जला दिया। उसका चाचा भी उस आग में जिंदा जल गया। प्रतिशोध के लिए में वो आतंकवादी बनता है। ये चित्रण आतंक और आतंकवाद को जस्टिफाई करने जैसा है। 

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है कि संवादों के माध्यम से भी उन स्थितियों को बल दिया जाता है जिसमें जरार जैसे लोग आतंकवादी बनते हैं। द इंडियन पुलिस फोर्स में एक मुसलमान पुलिस अफसर जब आतंकवादी जरार को पकड़ लेता है तो दोनों के बीच का संवाद उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है। आतंकी जरार पुलिस अफसर कबीर से कहता है, एक बात बताइए कबीर साहब! अपनी कौम पर होते जुल्म को देखकर भी रात को आसानी से नींद आ जाती है आपको? कैसा लगता है खुदा से नाशुक्री करके, कैसा लगता है इन काफिरों का कुत्ता बनकर। इतना सुनकर कबीर उसके पास पहुंचता है और उससे कहता है कि इस्लाम तेरे ... का है, तू ठेकेदार है खुदा का। वो मेरा नहीं है, नफीसा का नहीं है जिसकी जिंदगी तुमलोगों ने बरबाद की । तुम लोग सिर्फ मजहब की आड़ में अपनी कमजोरी, नाकामी, फ्रस्टेसन गुस्सा निकालनेवाले लोग हो। सिर्फ अपना उल्लू सीधा करनेवाले खूनी। आतंकवादी। और कुछ नहीं। फिर रोष में जरार बोलता है कि आप सुनना चाहते हैं कि आतंकवादी कौन है। उसके बाद वो अपने बचपन की खौफनाक कहानी कहता है जिसमें कानपुर में उसके परिवार पर जुल्म होता है। गुड मुस्लिम- बैड मुस्लिम का संवाद चलता रहता है। इस सीरीज में कई जगह इस प्रकार के संवाद हैं। ये ठीक है कि सीरीज को समग्रता में देखें तो अच्छाई की बुराई पर जीत होती है। परंतु दर्शकों के मन में एक सवाल तो छोड़ ही देती है। अगर कानपुर कं दंगे में जरार की फैक्ट्री न जलाई जाती या उस दंगे में उसके चाचा को जिंदा न जला दिया गया होता तो वो आतंकवादी नहीं बनता। इसका ट्रीटमेंट उसी प्रकार है जब पहले की फिल्मों में दिखाया जाता था कि बीहड़ में कोई डकैत बनता था तो उसके पीछे दबंगों का जुल्म होता था।

प्रश्न सिर्फ द इंडियन पुलिस फोर्स की कहानी या संवाद का नहीं है बल्कि उस प्रवृत्ति का है जिसके अंतर्गत हिंदी फिल्मों की दुनिया से जुड़े लोग इस तरह की बातों को न केवल दिखाते हैं बल्कि प्रमुखता से उसको प्रचारित भी करते हैं। वेब सीरीज के माध्यम से ओटीटी पर चलनेवाली फिल्मों के माध्यम से जिस तरह की एजेंडा आधारित सामग्री दिखाई जाती है उसको लेकर समाज को ही विचार करना होगा। पिछले दिनों एक तमिल फिल्म आई थी अन्नपूर्णी। नेटफ्लिक्स पर प्रसारित इस फिल्म में दिखाया गया था एक ब्राह्मण लड़की देश का श्रेष्ठ शेफ बनना चाहती है। बताया गया कि इसके लिए उसको मांसाहारी खाना भी बनाना होगा। इसके संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया। हिंदू लड़की को नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया। तर्क ये दिया गया कि उसने बिरयानी बनाना एक मुस्लिम महिला से सीखा था इसलिए आभार प्रकट करने के लिए उसने नमाज पढ़ी। ये फिल्म सिनेमाघरों में एक दिसंबर को रिलीज हुई और महीने भर बाद ओटीटी प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स पर आई। ओटीटी प्लेटफार्म पर आने के बाद इसके संवाद और दृष्य पर केस हुआ। केस के बाद इसके निर्माता कंपनी ने क्षमा मांगी और नेटफ्लिक्स से इसको हटाया गया। ये सब कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हुआ। पर इस फिल्म की टाइमिंग देखिए। अयोध्या में 22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होनी थी। कुछ राजनीतिक दल और साम्यवादी बौद्धिक इसका विरोध कर रहे थे। उसी समय पर राम को मांसाहारी बतानेवाली फिल्म ओटीटी पर रिलीज की गई। ओटीटी प्लेटफार्म की लोकप्रियता या व्याप्ति जैसी है उसको ध्यान में रखना होगा। मनोरंजन को लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होनी चाहिए लेकिन धर्म की आड़ में राजनीतिक खेल बंद होना चाहिए। 


Wednesday, December 23, 2015

आतंक से मुक्त हो सोशल साइट्स

देश में इंटरनेट के फैलाव के बाद तेजी से सोशल मीडिया ने अपने पांव-पसारे हैं । शहरों से लेकर गांवों तक में फेसबुक के कंज्यूमरों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है । ट्विटर के यूजर्स भी लगातार बढ़ रहे हैं । प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के मंत्रियों और विभागों के ट्विटर पर सक्रिय होने की वजह से आम आदमी के बीच भी इस माध्यम को लेकर उत्सुकता बढ़ी है । इसका नतीजा यह हुआ है कि फेसबुक और ट्विटर हमारे देश के गांवों तक अपनी पैठ बनाने में कामयाब हो चुका है । स्मार्ट फोन और इंटरनेट पैक के सस्ता होने से भी फेसबुक की लोकप्रियता में खासा इजाफा हुआ है । डिजीटल क्रांति के इस दौर में ये बेहतर है कि हम भी दुनिया के अन्य देशों की तरह ही सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म का उपयोग करने में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं । लेकिन इस मीडिया के अपने खतरे भी हैं । इन खतरों से सचेत रहने और उसको रोकने की दिशा में भी कदम उठाने की आवश्यकता है । अभी हाल ही में खबर आई कि जयपुर में रहने वाला एक तीस साल का मार्केटिंग मैनेजर खूंखार आतंकवादी संगठन आई एस के संपर्क में था और उसके लिए काम कर रहा था । उसकी गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में ये बात सामने आई कि वो देश के युवाओं को सोशल मीडियाके माध्यम से प्रतिबंधिक आतंकवादी संगठन आई एस में भर्ती करने का काम कर रहा था । उसके फेसबुक पर अपनी कई फेक आईडी बनाई हुई थी जिसके मार्फत वो हजारों लोगों के संपर्क में था और आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दे रहा था । वो ना केवल फेसबुक पर सक्रिय था बल्कि व्हाट्स एप और टेलीग्राम जैसे नेटवर्किंग टूल्स का भी इस्तेमाल कर रहा था । वो फेसबुक पर डायरी ऑफ अ मुजाहदीन के नाम से एक पेज भी चला रहा था । इस पेज के माध्यम से वो सिस्टम से खपा युवकों की तलाश कर उसको आतंकवादी बनाने की कोशिश करता था । पुलिस की आगे की जांच में पता चलेगा कि उसके मंसूबे क्या थे लेकिन जो जानकारियां छन कर आ रही हैं उसके हिसाब से उसके मंसूबे बेहद खतरनाक थे । इसी तरह से पुणे की एक सोलह साल की लड़की को आई एस ने अपने चंगुल में ले लिया । कॉंन्वेंट स्कूल की छात्रा को आई एस के श्रीलंका के एक ऑपरेटिव ने पहले अपने चंगुल में फंसाया और फिर उससे फेसबुक और ट्विटर के जरिए उसका ब्रेनवॉश शुरू हो गया । उसके बाद कई मैसेज इस बात की पुष्टि करते हैं कि आई एस ने उस नाबालिग लड़की को सीरिया में आतंकवादी संगठन ज्वाइन करने के लिए राजी कर लिया था और वो चंद दिनों बाद वहां जाने को तैयार हो गई थी । इससे भी खतरनाक बात यह हुई कि जब से वो आई एस के आतंकवादियों के संपर्क में आई तो उसने जीन्स और शर्ट पहनना छोड़कर बुर्का पहनना शुरू कर दिया । ये दो उदाहरण है कि किस तरह से सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर आतंकवादी संगठन हमारे देश में पांव पसार रहे हैं । इस साल फरवरी में केंद्र सरकार ने आई एस पर बैन लगा दिया था और कहा था कि ये आतंकवादी संगठन भारत समेत पूरी दुनिया के युवाओं को दिग्भ्रमित कर रैडिकलाइज कर रहा है । इस प्रतिबंध के बावजूद सोशल मीडिया के जरिए ये आतंकवादी संगठन पूरे देश में सक्रिय है

बावजूद इसके सोशल मीडिया आतंकवादी संगठन आई एस और उसके समर्थकों के पेज को हटाने को तैयार नहीं है । खबरों के मुताबिक पैरिस में हुए आतंकवादी हमले के बाद एक शख्स ने आई एस के पेज को लेकर शिकायत भेजी थी लेकिन फेसबुक ने कहा था कि वो उसके कम्युनिटि स्टैंडर्ड और नीतियों के खिलाफ नहीं है । दरअसल इन फैन पेज पर जाने के बाद वहां सक्रिय लोग विजिटर को आई एस के नियंत्रण वाले बेवसाइटस पर रिडायरेक्टर कर देते हैं । यही हालत ट्विटर की भी है जहां कोई भी खलीफा न्यूज जैसे कई हैंडल सक्रिय हैं जो आई एस की जानकारियां साझा करते रहते हैं । ट्विटर पर आई एस के समर्थकों की पूरी फौज है जिनकी पहचान करना आसान नहीं है लेकिन वो खामोशी के साथ अपने काम को अंजाम देते रहते हैं । कुछ दिनों पहले तक पाकिस्तानी आतंतवादी हाफिज सईद भी ट्विटर पर खासा सक्रिय था बाद में उसके अकाउंट को सस्पेंड किया गया । इसी तरह से यूट्यूब पर आई एस की आतंकवादी करतूतों के कई दिल दहलाने वाले वीडियो मौजूद हैं । इस वक्त हमारे देश को आतंकवादियों से जबरदस्त खतरा है ऐसे में सोशल मीडिया साइट्स की निगरानी आवश्यक है । इसका मतलह यह कतई नहीं है कि इन साइट्स पर किसी भी तरह की सेंसरशिप होनी चाहिए बल्कि सोशल मीडिया पर आतंकवादी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कोई मैकेनिज्म बनाया जाना चाहिए । दरअसल ये साइट्स पूरी दुनिया में लोग उपयोग करते हैं, लिहाजा आतंकवादी संगठनों के समर्थकों पर नजर रखना काफी मुश्किल काम है । परंतु हमारे देश में फेसबुक पर फेक आईडी बनाकर आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देनेवालों और अफवाह फैलाने वालों पर लगाम लगाने के लिए फोन नंबर या आधार कार्ड नंबर को प्रोफाइल के साथ अनिवार्य किया जा सकता है । मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगों के दौरान फेसबुक का कितना गलत इस्तेमाल हुआ ये पूरी दुनिया ने देखा । कई बार तो अफवाह फैलाने वालों की पहचान हो जाती है लेकिन कई बार जब फेक आई डी विदेश से बनाई जाती है और उसका इस्तेमाल किया जाता है तब उसको ट्रैक करना बहुत मुश्किल होता है । कार्रवाई करना तो लगभग नामुमकिन ही होता है । इसके अलावा इन सोशल साइट्स को भारत में अपने सर्वर लगाने की भी आवश्यकता है । फेसबुक और ट्विटर भारत सरकार के साथ कई महात्वाकांक्षी योजनाओं को आगे बढ़ाने का मंसूबा पाले बैठे हैं लेकिन उनको पहले बारत की इन चिंताओं पर भी ध्यान देना होगा ।