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Saturday, September 5, 2026

प्रयोगधर्मिता से ‘एक्शन’ में नायिकाएं,


हाल के दिनों में दो नायिका प्रधान फिल्में आई। दोनों एक्शन फिल्म है। दोनों फिल्मों में बच्चियों की जिंदगी केंद्र में है। जुलाई में शिव रवैल के निर्देशन में आई फिल्म अल्फा में आलिया और शरवरी मुख्य भूमिका में हैं। जबकि इसी महीने देवाशीष मखीजा के निर्देशन में बनी फिल्म गांधारी आई। इसमें तापसी पन्नू मुख्य भूमिका में है। गांधारी के पहले तापसी और कंगना के बीच विवाद भी उठा था। कई बार देखा गया है कि जब कोई फिल्म रिलीज होनेवाली होती है तो उससे जुड़े नायक-नायिका या कहानी को लेकर विवाद होता है। कुछ लोगों का मानना है कि फिल्म की रिलीज के समय इस तरह के विवाद उठाने के पीछे मंशा फिल्म को चर्चित करने की होती है। कंगना और तापसी के बीच के विवाद को तापसी ने खत्म करने का प्रयास किया, लेकिन विवाद की चर्चा तो हो ही गई। फिल्म को इससे कितना लाभ मिला ये कहना तो कठिन है लेकिन विवाद की टाइमिंग को तो रेखांकित किया ही जाना चाहिए। इस लेख का विषय दो नायिकाओं के बीच विवाद की चर्चा नहीं हे। चर्चा तो नायिका प्रधान एक्शन फिल्मों की करना चाह रहे हैं। 

हिंदी फिल्मों में इस बात की बहुत चर्चा होती रही है कि नायिकों को सिर्फ उनके ग्लैमर औरर आकर्षण के कारण फिल्मों में शो पीस की तरह रखा जाता है। ये बात तो कई दशकों से कही सुनी जा रही है कि हिंदी फिल्मों में नायिकाओं को पेड़ के चारों तरफ घूमते हुए डांस करना और रोमांटिक सीन देने के लिए फिल्मों रखा जाता है। पिछले सालों में तो चर्चा ये होने लगी थी नायक और नायिकाओं को फिल्म में काम करने के लिए एक समान पैसे मिलते हैं या नहीं। अगर नायिकाओं को कम दिए जाते हैं तो क्यों। एक दौर ऐसा भी आया था कि फिल्मों में माधुरी दीक्षित को कई नायकों से अधिक पैसे मिलते थे। टीवी की दुनिया में स्मृति इरानी को साथी पुरुष कलाकारों से अधिक पैसे मिला करते थे। लेकिन ये एक दो उदाहरण हैं। हिंदी फिल्मों में नायकों को अधिक और नायिकाओं को कम पैसे मिलते रहे हैं। अभी भी मिल रहे हैं। इसके पीछे का कारण तो सिर्फ व्यवसाय ही नजर आता है। इसमें नायक नायिका में भेद-भाव की मानसिकता जैसी कोई बात ना तो समझ आती है और ना ही नजर। फिल्म उद्योग पूरी तरह से कारोबारी दुनिया है जहां सबकुछ लाभ-हानि को ध्यान में रखकर होता है। अगर कोई फिल्म नायक के नाम और छवि पर सफल होती है तो उसका बाजार भाव बढ़ जाता है। अगर कोई फिल्म नायिका अपने कंधे पर उठाकर सफलता की सीढ़ी चढ़ती है तो उसका बाजार भाव निश्चित रूप से बढता है। 

फिल्म अल्फा यशराज फिल्म्स की स्पाई यूनिवर्श की कहानी है। इसमें अनिल कपूर, बाबी देओल, ऋतिक रोशन भी हैं लेकिन कहानी आलिया भट्ट और शरबरी के इर्द गिर्द ही घूमती है। कहानी अच्छी है। स्पाई यूनिवर्स की कहानियों में सरप्राइज एलिमेंट बहुत होते हैं। इस फिल्म में भी है। बाबी देओल का जो फिल्मी चरित्र है वो खुद को देशभक्त कहता है लेकिन अंत में उसका भेद खुलता है और वो पाकिस्तानी एजेंट होता है। वो सेना और आर एंड डब्ल्यू को चकमा देने में सफल रहता है। कहानी बहुत सधे तरीके से आगे बढ़ती है। फिल्म में मार-धाड़ बहुत है लेकिन निर्देशक ने फिल्म को जुगुप्साजनक हिंसा से बचा लिया है। हिंसक दृष्यों को देखकर मन खराब नही होता है। आलिया अपने एक्शन दृष्यों में स्वाभाविक लगती है लेकिन शबरबी की एंट्री के साथ ही वो आलिया पर भारी पड़ती दिखती है। आलिया की तुलना में शरबरी का रोल कम है लेकिन जितनी भी देर वो पर्द पर रहती है आलिया को टक्कर देती नजर आती है। अपने अपियरेंस से, अपने एटीट्यूड से और अपने अभिनय से। इस फिल्म में निर्देशक शिव रवैल की भी प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने कथानक को बहुत मजबूती से बुना। दर्शक कहीं उबता नहीं है। कहानी में सरप्राइज एलिमेंट्स भी हैं जो कथानक के बढने के साथ साथ खुलता है। दर्शकों के मन में फिल्म देखते हुए ये चलता रहता है कि आगे क्या। यही आगे क्या किसी फिल्म की सफलता का पैमाना होना चाहिए, खासकर अगर स्पाई यूनिवर्स की फिल्म है तो। शिव रवैल ने इसके पहले भोपाल गैस त्रासदी पर आधारित वेबसीरीज द रेलवे मैन निर्देशित की थी। उस सीरीज को दर्शकों का प्यार मिला था और शिव के काम की सराहना हुई थी। शिव रवैल एक समृद्ध विरासत को भी आगे बढ़ा रहे हैं, उनके पिता राहुल रवैल और दादा एचएस रवैल ने कई सुपर हिट फिल्में बनाई थीं। फिल्म अल्फा में शिव रवैल ने पहली बार निर्देशक की भूमिका का निर्वाह किया है। 

फिल्म गांधारी में तापसी पन्नू अपनी छवि के अनुरूप किरदार निभा रही हैं। एक मध्यमवर्गीय परिवार की महिला जिसकी बेटी का अपहरण हो जाता है। बेटी की तलाश में पूरी फिल्म है। तापसी ने एक्शन करने का भी प्रयास किया है लेकिन जब वो फाइट सीन देती है तो स्वाभाविक नहीं लगती हैं। अपनी बेटी की तलाश करते करते उसको छह साल से कम उम्र की बच्चियों को अवैध तरीके से विदेश भेजने के गैंग का पता चलता है। कहानी बहुत उलझी हुई है और कथानक में गैप है जिसको भरने में निर्देशक विफल रहे हैं। दर्शकों को चौंकाने के चक्कर में कथानक की निरंतरता बाधित होती है। फिल्म में धर्म का ज्ञान भी दिया गया है लेकिन ये आउट आफ प्लेस लगता है। जैसे तापसी की ही एक अन्य फिल्म अस्सी में जबरदस्ती हिंदी के कवियों का नाम पात्रों से कहलवाया गया था। ना तो उसकी कोई प्रासंगिकता थी और ना ही आवश्यकता। निर्देशक और फिल्म लेखक को लगा होगा कि उन नामों के उल्लेख से उनको हिंदी साहित्य का ज्ञाता मान लिया जाएगा। फिल्म गांधारी के कई दृश्यों में तापसी स्वाभाविक भी लगी है। जब वो दृष्टिहीन महिला के रोल में थाने के बाहर बैठकर बेबस दिखती हैं। ये बहुत ही पावरफुल सीन है। ऐसा फिल्म में बहुत कम जगह दिखा है। कई जगह तो अस्वाभिवक से लगने वाले दृष्य भी निर्देशक ने ठूंसे हैं। बहुरूपियों की दुनिया को दिखाने का प्रयत्न भी किया गया है लेकिन उस दुनिया को लेकर और रिसर्च करने की जरूरत थी। 

फिल्म अल्फा और गांधारी को देखने के बाद लगता है कि हिंदी की फिल्मी दुनिया अब नायिका प्रधान फिल्मों में ज्यादा निवेश करने लगी है। कंगना की फिल्म भारत भाग्य विधाता भी नायिका प्रधान थी। नायिका प्रधान फिल्म बनाना अच्छी बात है लेकिन कहानी और उसके ट्रीटमेंट को लेकर बहुत सजग और सावधान रहने की आवश्कता होती है। जहां भी अनावश्यक रूप से नायिका को सुपर हीरो बनाने या दिखाने का प्रयास होता है, दर्शक फौरन भांप लेता है। परिणाम फिल्म असफलता के रास्ते पर चल पड़ती है। बावजूद इसके अगर नायिकाओं को लीड रोल और विशेषकर एक्शन रोल में लेकर फिल्में बनने लगी हैं तो यह एक सुखद ट्रेंड है। हिंदी दर्शकों को के लिए भी और फिल्मकारों के लिए भी।    


Saturday, August 20, 2022

बहिष्कार के मकड़जाल में बालीवुड


इन दिनों कुछ फिल्मों के बहिष्कार को लेकर खूब चर्चा हो रही है। इंटटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर फिल्मों के बायकाट को लेकर पक्ष विपक्ष में हलचल दिखती है। अभिनेता आमिर खान की फिल्म लाल सिंह चड्ढा की रिलीज के पहले से उसके बायकाट की अपील जारी होने लगी थी। फिल्म रिलीज हुई और फ्लाप हो गई। इसी तरह से अक्षय कुमार की फिल्म रक्षाबंधन को लेकर भी बायकाट की अपील इंटरनेट मीडिया पर हुई। ये फिल्म भी फ्लाप हो गई। हम इन फिल्मों के बायकाट और इनके फ्लाप होने पर बात करेंगे लेकिन उसके पहले देख लेते हैं कि और कौन सी बड़ी बजट की फिल्में फ्लाप हुईं। यशराज फिल्म्स की दो बेहद महात्वाकांक्षी फिल्म आई, सम्राट पृथ्वीराज और शमशेरा। दोनों फिल्मों ने बाक्स आफिस पर अपेक्षित प्रदर्शन नहीं किया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार फिल्म सम्राट पृथ्वीराज की लागत तीन सौ करोड़ रुपए थी और उसने बाक्स आफिस पर तिरानवे करोड़ रुपए का बिजनेस किया। इसी तरह से शमशेरा के निर्माण की लागत डेढ सौ करोड़ रुपए थी और इस फिल्म ने भी चौंसठ करोड़ रुपए का बिजनेस किया। अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म बच्चन पांडे को बनाने में एक सौ अस्सी करोड़ रुपए खर्च हुए और बाक्स आफिस बिजनेस तेहत्तर करोड़ का रहा। बच्चन पांड को लेकर कहा गया था कि वो ‘द कश्मीर फाइल्स’ की वजह से पिट गई थी।खुद अक्षय कुमार ने भी भोपाल में चित्र भारती के मंच से ऐसा ही कहा था। सम्राट पृथ्वीराज और शमशेरा के खिलाफ न तो कोई बायकाट की अपील थी और न ही कोई हैशटैग चला था। बायकाट की अपील होती क्यों हैं इसके पीछे के कारणों को देखना चाहिए। 

आज से करीब दो दशक पहले गुजरात में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। उसके बाद अभिनेता आमिर खान ने एक साक्षात्कार दिया था। उस साक्षात्कार में उन्होंने उस वक्त के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर जमकर आरोप लगाए थे। गुजरात में हुई हिंसा में मरनेवालों के लिए नरेन्द्र मोदी को उत्तरदायी माना था। उसी साक्षात्कार में आमिर खान ने नरेन्द्र मोदी को अमेरिका का वीजा नहीं मिलने का उपहास भी उड़ाया था। 2006 में आमिर खान मेधा पाटकर के साथ नर्मदा बचाओ आंदोलन में शामिल हुए थे और उस वक्त की गुजरात सरकार के विरोध में जमकर बयानबाजी की थी। 2015 में जब गजेन्द्र चौहान को पुणे के भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान का चेयरमैन नियुक्त किया गया था तो छात्रों ने उसका विरोध किया था। आंदोलन भी हुआ था। उस समय भी आमिर खान मुखर हुए थे और आंदोलनकारी छात्रों का समर्थन किया था। 2015 में ही जब पुरस्कार वापसी अभियान चल रहा था तब भी आमिर खान ने देश में असहिष्णुता का राग अलापा था। उस वक्त की अपनी पत्नी किरण राव से एक बातचीत का हवाला दिया था और कहा था कि वो देश के माहौल से डरकर देश छोड़ने की बात करती है। आमिर खान के इन बयानों से स्पष्ट है कि वो राजनीति में एक पक्ष विशेष का विरोध कर रहे थे और परोक्ष रूप से एक पक्ष का समर्थन कर रहे थे। जब आप राजनीतिक होना चाहते हैं तो विरोध के लिए भी तैयार रहना चाहिए। ये संभव नहीं कि जब आपकी फिल्म आए तो लोग राजनीतिक समरत् या विरोध को भुलाकर फिल्म देखने चले जाएं। आपकी फिल्म को सफल बनाएं। आप जिस पक्ष का विरोध कर रहे थे उनको भी तो आपके विरोध का अधिकार है। उसी अधिकार की परिणति है बहिष्कार की अपील। बायकाट का हैशटैग।

आमिर खान या तमाम वो अभिनेता जो राजनीतिक टिप्पणियां करते रहे हैं उनके खिलाफ अगर बायकाट की अपील होती है तो इससे उनको परेशान नहीं होना चाहिए। राजनीति में तो वार पलटवार होते ही रहते हैं। दीपिका पादुकोण भी जब अपनी फिल्म छपाक के रिलीज के पहले दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू युनिवर्सिटी के छात्रों के प्रदर्शन में गई थीं तो उसका नकारात्मक प्रभाव फिल्म के कारोबार पर पड़ा था। अभी एक और फिल्म रिलीज हुई दोबारा, जिसमें अभिनेत्री तापसी पन्नू हैं। पिछले दिनों तापसी पन्नू और उस फिल्म के निर्देशक का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वो फिल्मों के बायकाट के ट्रेंड का मजाक बना रही थीं। उनका निर्देशक भी राजनीतिक बातें कर रहा था। वो पहले भी नेताओं को लेकर अपमानजनक और घटिया बातें करता रहा है। उनको गंभीरता से कोई लेता नहीं। तापसी की इस फिल्म को लेकर भी बायकाटदोबारा ट्विटर पर ट्रेंड हुआ। फिल्म पहले दिन सिर्फ 72 लाख का कारोबार कर पाई। कई शोज रद्द करने पड़े। थिएटरों में सन्नाटा रहा। इस फिल्म की लागत भी करीब तीस करोड़ रुपए है। अब तापसी पन्नू और उसके निर्देशक को समझ में आ रहा होगा कि ये बहिष्कार की अपील का मजाक उड़ाना उनको कितना महंगा पड़ा। हो सकता है कि इन अभिनेताओं, अभिनेत्रियों और निर्देशकों को फिल्मों के फ्लाप होने पर धनहानि न होती हो क्योंकि पैसा तो निर्माता का लगता है। ये लोग फिल्म पूरी करके अपना मेहनताना लेकर निकल लेते हैं। लेकिन इनको ये सोचना होगा कि इसका प्रभाव उनके करियर पर पड़ सकता है। 

बहिष्कार को लेकर एक बात और कही जाती है कि इंटरनेट मीडिया के जमाने में ये नया ट्रेंड आरंभ हुआ है। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म पर भले ही बहिष्कार नया लगता हो लेकिन हमारे देश में तो बहिष्कार की अपील स्वाधीनता पूर्व से होती रही है। गांधी जी ने भी अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए बहिष्कार की अपील को अपना हथियार बनाया था। इमरजेंसी के दौर में भी लोगों ने बहिष्कार की अपील की थी। पिछले दिनों जगदीशचंद्र माथुर का नाटक कोणार्क पढ़ रहा था। इस पुस्तक में मई 1961 में लिखी माथुर साहब की एक टिप्पणी है, ‘यों तो इस नाटक के विषय में मुझे अनेक रोचक अनुभव हुए, किंतु सबसे दिलचस्प अनुभव हुआ दिल्ली के अंग्रेजी समाचारपत्रों में इस नाटक के अभिनय की समालोचना पढ़कर । उनमें से एक समालोचक महोदय (अथवा महोदया!) ने लिखा कि इस नाटक की भाषा इतनी दुरूह है कि इस नाटक का बहिष्कार होना चाहिए, क्योंकि लेखक ने यह नाटक संस्कृतमयी हिंदी का प्रचार करने के लिए लिखा है।‘ इससे स्पष्ट है कि रंगमंच की दुनिया में 1961 में बहिष्कार की अपील की गई थी। ये अलग बात है कि उस समय इंटरनेट मीडिया नहीं था। तो जो लोग इसको नया ट्रेंड बता रहे हैं उनको इतिहास में जाने और समझने की आवश्यकता है। 

एक और बात है जो बायकाट ट्रेंड के साथ सामने आ रही है। पहले फिल्मों का जब विरोध होता था तो सिनेमा हाल के पोस्टर फाड़े जाते थे, कई बार उनमें आग भी लगा दी जाती थी। विरोध प्रदर्शन जब उग्र होता था तो शहरों में भी प्रदर्शन आदि होते थे। ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब फिल्म पद्मावत को लेकर कई शहरों में विरोध प्रदर्शन और आगजनी हुई थी। अब इस तरह के प्रदर्शन लगभग बंद हो गए हैं और इंटरनेट मीडिया पर विरोध होता है। क्या इसको भारतीय समाज के मैच्योर होने के संकेत के तौर पर देखा जाना चाहिए। हिंसा और आगजनी वाले विरोध प्रदर्शन से अलग विरोध का एक ऐसा तंत्र जिसमें अपनी बात भी पहुंच जाए और सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान भी न हो। पुलिस और अन्य तंत्र का समय भी खराब न हो। फिल्मों के फ्लाप होने की एकमात्र वजह बायकाट नहीं है। उसपर एक अलग लेख लिखा जा सकता है कि इन दिनों बड़े बजट की अधिकतर हिंदी फिल्में क्यों पिट रही हैं। क्यों वो अपनी लागत तक नहीं निकाल पा रही हैं। लेकिन बायकाट के इस खेल में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री उलझ गई है और उसको फिलहाल कोई रास्ता दिख नहीं रहा है। 

Friday, October 11, 2019

किरदार को लेकर बेवजह विवाद


कई बार फिल्मों पर उठ रहे विवादों को देखने के बाद लगता है कि ये विवाद आखिरकार हुआ क्यों? इसके पीछे कहीं प्रचार पाने की मंशा तो नहीं है। फिल्म से जब अनुराग कश्यप का नाम जुड़ा हो तो किसी भी तरह के विवाद की उम्मीद की जा सकती है क्योंकि अनुराग इस फन में माहिर हैं। वो किसी भी मसले पर विवाद खड़ा कर सकते हैं। ऐसा ही एक विवाद दीवाली पर रिलीज होनेवाली फिल्म ‘सांड की आंख’ को लेकर उठा है। इस फिल्म में तापसी पन्नू और भूमि पेडणेकर ने बड़ी उम्र की शूटर दादी के नाम से मशहूर चंद्रो तोमर और प्रकाशी तोमर की भूमिका की है। विवाद इस बात को लेकर उठा है कि तापसी और भूमि अपने से अधिक उम्र की महिलाओं के रोल क्यों कर रही हैं। आश्चर्यजनक किंतु सत्य कि इसके पक्ष और विपक्ष में फिल्म इंडस्ट्री के कुछ गंभीर और अगंभीर दोनों तरह के लोगों ने भी अपनी राय और प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी। दरअसल ये बेवजह का विवाद है क्योंकि यह एक कलाकार और फिल्मकार के बीच का मसला है कि वो कौन सी भूमिका करना या करवाना चाहता या चाहती है। एक कलाकार के लिए यह तो बेहद चुनौतीपूर्ण है कि वो अपने से अधिक उम्र के व्यक्ति का किरदार कैसे निभाए। युवा होकर अपने से दोगुने उम्र के चरित्र के हिसाब से अभिनय करना और उस चरित्र को जीवंत कर देना चुनौती भरा हो सकता है। हिंदी फिल्मों में जिस तरह से नायिकाएं अपनी छवि और ग्लैमर को लेकर सजग रहती हैं उसमें तो अनी से बड़ी उम्र के किरदार को पर्दे पर उतारना जोखिम भरा भी माना जा सकता है। लेकिन बेहतर कलाकार तो वही जो खतरा और जोखिम दोनों उठाने के लिए तैयार रहे। वैसे भी हिंदी फिल्मों में तो कई बार ऐसा हुआ है कि अभिनेताओं ने अपने से अधिक उम्र के किरदार को अभिनीत किया है और वो किरदार अमर हो गया है। फिल्म ‘मदर इंडिया’ में नरगिस का किरदार कौन भूल सकता है। जब नर्गिस ने फिल्म ‘मदर इंडिया’ किया था तो वो तीस साल की भी नहीं हुई थीं। हिंदी फिल्म का अमर किरदार है वो। इसी तरह से ‘सारांश’ फिल्म में अनुपम खेर ने बुजुर्ग का रोल किया था और उसी रोल ने ना केवल अनुपम को पहचान दी थी बल्कि उनको स्थापित भी किया था। शबाना आजमी और स्मिता पाटिल ने भी बुजुर्ग महिलाओं का रोल किया है।
इस विवाद को देखते हुए एक सवाल मन में उठता है कि इस तरह का बेवजह का विवाद कभी अभिनेताओं को लेकर क्यों नहीं उठता है। राजू हीरानी की फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ में आमिर खान ने छात्र की भूमिका निभाई थी तब तो किसी ने नहीं कहा कि उस दौर में कम उम्र के अभिनेताओं को वो रोल करना चाहिए था। सैकड़ों ऐसी फिल्में बनी हैं जिसमें पचास के आसपास के अभिनेताओं ने कमउम्र के नायक का रोल किया है। सवाल यह उठता है कि इस तरह के विवाद अभिनेत्रियों को लेकर ही क्यों उठते हैं?क्या इसके पीछे भी हमारे समाज में हावी पितृसत्तात्मक सोच है जो महिलाओं को लेकर अब भी सहज नहीं हो पाई है और जब भी इस तरह का कोई चुनौतीपूर्ण कार्य सामने आता है तो किसी ना किसी बहाने से उकी आलोचना शुरू हो जाती है या उसको विवादों के घेरे में ले लिया जाता है। इन प्रश्नों के उत्तर तलाशने की कोशिश करनी चाहिए।